"महाराज ! मैं आपकी सेवा में काम करना चाहता हूँ।"
राजा ने मुस्कुराकर पूछा, "तुम्हारी विशेष योग्यता क्या है?"
वह शांत स्वर में बोला, "मैं किसी का चेहरा देखकर बता सकता हूँ कि वह इंसान है या पशु।"
राजा ठिठक गए और उत्सुक होकर उसे अपने सबसे प्रिय घोड़े की देखभाल का जिम्मा सौंपा।
कुछ दिन बाद राजा ने पूछा, "मेरे सबसे कीमती घोड़े के बारे में क्या राय है?"
वह बोला, "महाराज ! घोड़ा दिखने में सुंदर है, पर यह अपनी नस्ल का नहीं है।"
राजा हैरान हुए और अनुभवी घुड़सवार को बुलाकर पूछा। घुड़सवार ने बताया, "घोड़ा अपनी नस्ल का ही है, पर जन्म के बाद इसकी माँ मर गई थी। इसे गाय के दूध पर पाला गया।"
राजा ने उस व्यक्ति से पूछा, "तुमने यह कैसे जाना?"
वह बोला, "महाराज ! यह घोड़ा घास खाते समय गाय की तरह सिर नीचे करता है, जबकि असली घोड़े घास मुँह में लेकर सिर ऊपर करके खाते हैं।"
राजा उसकी बुद्धिमानी से प्रभावित होकर उसे अनाज, घी, बकरी, मुर्गियाँ आदि पुरस्कार दिए और उसे रानी के महल की जिम्मेदारी सौंपी।
कुछ दिन बाद राजा ने पूछा, "रानी के महल के बारे में क्या राय है?"
वह शांत स्वर में बोला, "रानी बहुत शालीन हैं, उनका व्यवहार राजसी है, पर वे जन्म से रानी नहीं हैं।"
राजा हैरान हुए और रानी की माँ को बुलाकर पूछा। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, "हाँ, यह सच है। तुम्हारे जन्म से पहले हमने अपनी बेटी खो दी थी। इसलिए दूसरी कन्या को अपनी बेटी की तरह पाला।"
राजा ने उस व्यक्ति से पूछा, "तुमने यह कैसे जाना?"
वह बोला, "महाराज ! असली राजकन्याएँ अपनी दासियों से सम्मान और सौजन्य से बात करती हैं। पर आपकी रानी दासियों को आदेश मानने वाली मशीन की तरह व्यवहार करती हैं।"
राजा फिर प्रभावित हुए और उसे अनाज, घी, भेड़, बकरी आदि पुरस्कार दिए, साथ ही दरबार में स्थायी नियुक्ति दी।
कुछ महीने बाद राजा ने हँसते हुए कहा, "तुमने सबको परख लिया, अब मेरे बारे में बताओ।"
वह चुप रहा, फिर बोला, "महाराज ! यदि आप वचन दें कि मुझे मृत्युदंड नहीं देंगे, तो बताऊँगा।"
राजा ने गंभीरता से कहा, "मैं वचन देता हूँ।"
वह सिर झुकाकर बोला, "आप राजपरिवार के संतान नहीं हैं, और आपके व्यवहार में भी राजसी रक्त नहीं है।"
राजा का चेहरा गुस्से से लाल हो गया, पर वचन याद आया। वे अपनी माँ के पास गए और पूछा।
रानी माँ ने गहरी साँस लेकर कहा, "हाँ, यह सच है। हम निःसंतान थे, इसलिए एक पशुपालक के बच्चे को गोद लेकर तुम्हें पाला।"
राजा ने उस व्यक्ति से पूछा, "तुमने यह कैसे जाना?"
वह हल्के से मुस्कुराकर बोला, "महाराज ! राजा पुरस्कार में सोना, हीरा, नीलम, मोती देते हैं। पर आप जो पुरस्कार देते हैं—अनाज, घी, बकरी, भेड़—ये पशुपालक का स्वभाव है।"
थोड़ा रुककर उसने कहा, "महाराज ! इंसान की असली पहचान उसका चेहरा नहीं, उसका व्यवहार है। पद, प्रतिष्ठा या धन कितना भी हो, इंसान को इंसान उसका व्यवहार बनाता है।"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें