आपके टीवी, रेडियो, मोबाइल के अंदर आमतौर पर एक या अधिक हरे रंग के कार्ड लगे होते हैं। उस कार्ड को कई लोग शायद सर्किट बोर्ड या Printed Circuit Board - PCB नाम से जानते होंगे। इस PCB या सर्किट बोर्ड को देखकर साधारण लोग सोचते होंगे हाँ इसमें क्या विशेषता है? लेकिन यह साधारण दिखने वाला हरा बोर्ड ही आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स का मूल आधार है। इसके बिना आज के स्मार्टफोन, कंप्यूटर, टेलीविजन या अन्य यंत्रों की कल्पना नहीं की जा सकती। इस बोर्ड का इतिहास अत्यंत रोमांचक है और आज से लगभग 2600 वर्ष पहले स्थिर विद्युत की पहली उल्लेख के साथ इसका इतिहास आरंभ हुआ था।
ईसापूर्व 600 ईसवी में मिलेटस नगर के दार्शनिक थेलस ने एक अद्भुत घटना देखी। उन्होंने देखा कि Amber (ग्रीक भाषा में elektron) नामक एक पीले रंग के पत्थर को ऊन या बालों से रगड़ने पर उसमें एक अदृश्य शक्ति उत्पन्न होती है, जो अनाज के दाने, कागज के टुकड़े या बालों को अपनी ओर खींच लाती है। इस घटना को उन्होंने संभवतः पहली बार रिकॉर्ड किया। यह स्थिर विद्युत (Static Electricity) है और इस ग्रीक शब्द elektron से बहुत बाद में अंग्रेजी में Electricity और Electron शब्द बने। प्राचीन रोमन, भारत और चीन देशों में भी यह परीक्षण हो रहा था। लेकिन उस समय कोई भी इस स्थिर विद्युत को निरंतर प्रवाह में बदल नहीं पाया था।
मध्ययुग में धार्मिक एकछत्रवाद के कारण विद्युत विषय पर विशेष प्रगति नहीं हुई। चर्च और धर्मग्रंथों के प्रभाव में वैज्ञानिक विचारधारा दमित हुई। लेकिन सोलहवीं शताब्दी में रेनेसां युग आने के बाद पुनः जिज्ञासा जागृत हुई। 1600 ईसवी में इंग्लैंड के वैज्ञानिक William Gilbert ने अपनी पुस्तक De Magnete में स्थिर विद्युत और चुंबकत्व के अंतर को समझाया और पहली बार लैटिन शब्द “electrica” का प्रयोग किया।
अठारहवीं शताब्दी में अमेरिका के बेंजामिन फ्रैंकलिन ने अपनी प्रसिद्ध पतंग प्रयोग करके दिखाया कि बिजली और स्थिर विद्युत एक ही प्रकार की शक्ति है। फ्रैंकलिन ने तूफानी बारिश के दिन रेशमी धागे के साथ एक सिल्क हैंडकरचिफ से बनी पतंग उड़ाई। पतंग के ऊपरी बिंदु पर एक नुकीला लोहे का तार लगाया था जो बिजली को आकर्षित कर सकता था। धागे के नीचे एक लोहे की चाबी बांधी थी और उस चाबी के साथ एक लेडेन जार (Leyden jar) नामक प्राचीन विद्युत संचयक यंत्र जोड़ा था। फ्रैंकलिन खुद एक सूखे जगह में घर के बरामदे के नीचे खड़े होकर रेशमी धागे का हिस्सा पकड़े थे। यह रेशम विद्युत का अपरिवाही होने से सुरक्षित था।
जब बादल पर बिजली चमक रही थी और तूफानी बारिश हो रही थी, पतंग बादल के निकट जाकर वायुमंडल में मौजूद विद्युत आवेश (electric charge) को आकर्षित करती थी। वह विद्युत पतंग के तार से धागे के नीचे आकर चाबी के निकट संचित होती थी। फ्रैंकलिन ने उंगली चाबी के निकट लाने पर चमकीली स्फुलिंग (spark) निकली और लेडेन जार में विद्युत संचय हुआ। इससे स्पष्ट प्रमाण मिला कि वज्रपात और स्थिर विद्युत एक ही प्रकार की है। यह प्रयोग अत्यंत जोखिमपूर्ण था और बाद में कई लोग इसका अनुकरण करके मर गए फिर भी इसने विद्युत विज्ञान का मूल द्वार खोल दिया और बाद में फ्रैंकलिन ने इसके आधार पर वज्र निरोधक दंड (lightning rod) का आविष्कार किया जो आज सभी ऊंची इमारतों में लगाया जाता है।
बेंजामिन फ्रैंकलिन ने लेडेन जार (Leyden Jar) नामक एक साधारण कैपेसिटर का प्रयोग करके विद्युत को स्टोर करने का पहला प्रयोग किया। लेकिन यह भी स्थिर विद्युत थी। निरंतर प्रवाही विद्युत या Continuous Current के आविष्कार के लिए विश्व को और ढाई सौ वर्ष इंतजार करना पड़ा।
1800 ईसवी में इटली के पाविया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर Alessandro Volta ने एक युगांतरकारी आविष्कार किया। उन्होंने देखा कि दो अलग धातुएं - जिंक और कॉपर एक इलेक्ट्रोलाइट (नमक पानी) के संपर्क में आने पर उनसे निरंतर विद्युत प्रवाह होता है। इस सिद्धांत पर उन्होंने जिंक और कॉपर की चकतियों को नमक पानी में भिगोए कार्डबोर्ड से अलग करके एक स्टैक बनाया। इसे उन्होंने नाम दिया Voltaic Pile। यह था पृथ्वी का पहला रासायनिक बैटरी। इस बैटरी से पहली बार मनुष्य को निरंतर विद्युत प्रवाह (Direct Current – DC) मिला। इस बैटरी के दो सिरों पर तार जोड़कर एक बंद पथ (Closed Loop) बनता था — यह वास्तव में पहला विद्युत सर्किट (Electric Circuit) था। इस आविष्कार के बाद विश्व के अन्य वैज्ञानिकों ने विद्युत पर प्रयोग शुरू किए। वोल्टा के नाम पर वोल्ट (Volt) नामक इकाई आज भी प्रयोग होती है।
वोल्टा की बैटरी उद्भावन के बाद कई वैज्ञानिक विद्युत के गुण समझने लगे। 1820 ईसवी में डेनमार्क के भौतिक विज्ञानी Hans Christian Ørsted ने एक ऐतिहासिक प्रयोग किया। उन्होंने देखा कि तार में विद्युत प्रवाह होने पर पास रखी कंपास की सुई हिल जाती है। अर्थात विद्युत प्रवाह चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) उत्पन्न करता था। इस आविष्कार ने विद्युत और चुंबकत्व के अविच्छेद्य संबंध को पहली बार प्रमाणित किया। इसे आधार बनाकर फ्रांसीसी वैज्ञानिक André-Marie Ampère ने विद्युत प्रवाह और चुंबकीय शक्ति के गणितीय संबंध समझाए। उनके नाम पर आज विद्युत प्रवाह की इकाई को एम्पियर या Ampere कहा जाता है।
इस समय इंग्लैंड के Michael Faraday ने सबसे महत्वपूर्ण आविष्कार किया। 1831 ईसवी में उन्होंने दिखाया कि चुंबक को तार की कुंडली में घुमाने या कुंडली को चुंबक के सामने घुमाने पर तार में विद्युत प्रवाह उत्पन्न होता है। इसे उन्होंने नाम दिया विद्युत-चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction)। इस सिद्धांत पर आज के विद्युत जेनरेटर, मोटर, ट्रांसफॉर्मर सब काम करते हैं। इस समय सर्किट अत्यंत साधारण था — केवल तार, बैटरी और कुछ धातु के टुकड़े ही इसके विशेष अंग थे। सब हाथ से जोड़े जाते थे और इसे Point-to-point wiring कहा जाता है। यह अत्यंत धीमा, असुविधाजनक और गलतीपूर्ण था। एक छोटा यंत्र बनाने में भी कई दिन लग जाते थे।
उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में थॉमस अल्वा एडिसन और निकोला टेस्ला के बीच प्रसिद्ध “War of Currents” चली। एडिसन DC विद्युत का समर्थन करते थे जबकि टेस्ला और जॉर्ज वेस्टिंगहाउस AC (Alternating Current) की दिशा में कार्य करते थे। अंत में AC राष्ट्रीय विद्युत जीत गई क्योंकि इसे ट्रांसफॉर्मर से उच्च वोल्टेज में दूर दूर तक भेजकर फिर कम वोल्टेज में बदलकर घर घर पहुंचाया जा सकता था। इस समय भी सर्किट हाथ से बनते थे। रेडियो, टेलीफोन, टेलीग्राफ जैसे यंत्रों में सैकड़ों तारों का समूह जोड़ा जाता था। यह अत्यंत महंगा और समयसापेक्ष था।
बीसवीं शताब्दी के आरंभ में प्रिंटेड सर्किट की धारणा धीरे धीरे जन्म लेने लगी। 1903-1904 के बीच जर्मनी के इंजीनियर Albert Hanson ने एक पेटेंट दर्ज किया जिसमें उन्होंने फ्लैट धातु तारों को पैराफिन पेपर पर लगाकर इंसुलेटिंग बोर्ड में रखने का प्रस्ताव दिया। यह आज के PCB का अति साधारण रूप था। इसी तरह 1925 में अमेरिका के Charles Ducas ने पेटेंट लिया जिसमें उन्होंने स्टेंसिल से इंक में कंडक्टिव पाउडर लगाकर सर्किट प्रिंट करने की प्रक्रिया वर्णन की। लेकिन ये सभी धारणाएं केवल कागज पर ही रह गईं।
वास्तविक परिवर्तन लाए ऑस्ट्रिया में जन्मे यहूदी इंजीनियर Paul Eisler। 1936 ईसवी में लंदन में रहते हुए उन्होंने एक रेडियो सेट के अंदर असंख्य तार देखकर सोचा कि इसे कैसे संक्षिप्त किया जा सकता है। उन्होंने कॉपर फॉयल को बेकेलाइट या ग्लास बेस पर लगाकर अनावश्यक हिस्से को Etching प्रक्रिया से हटाकर केवल Conductive Track रखा। यह था पहला आधुनिक प्रिंटेड सर्किट बोर्ड। लेकिन उनके इस आविष्कार को उस समय किसी ने महत्व नहीं दिया। उन्होंने कई कंपनियों को दिखाया फिर भी कोई स्वीकार नहीं किया। अंत में दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो गया।
1940 से 1942 के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका के वैज्ञानिक और सेना एक गुप्त प्रौद्योगिकी बना रहे थे जो आर्टिलरी गोले में लगाई जाती थी और दुश्मन विमान निकट आने पर गोला स्वतः फट जाता था और इसे कहा जाता था Proximity Fuze या VT Fuze या Variable Time Fuze। यह मुख्यतः विमान विरोधी आर्टिलरी के लिए डिजाइन थी जो नौसेना के जहाजों को कामिकाजे हमलों से बचाती थी और बाद में जर्मनी के V-1 रॉकेट और स्थल युद्ध में भी प्रयोग हुई।
लेकिन इस यंत्र के अंदर वैक्यूम ट्यूब थी और हजारों तार जोड़े जाते थे। लेकिन वह गोला विशेष आघात प्राप्त होने पर उसके अंदर के तार टूट जाते थे। इसलिए अमेरिकी सेना से जुड़े वैज्ञानिकों ने पॉल ऐसलर के पेटेंट देखकर उनकी प्रक्रिया को संशोधित करके एक कठोर बोर्ड पर कॉपर फॉयल लगाकर एचिंग करके सर्किट बनाया। यह यंत्र 1943 से प्रयोग में आया और युद्ध में विपुल सफलता दी। युद्ध के बाद अमेरिका सरकार ने 1948 में इस प्रौद्योगिकी को साधारण लोगों के लिए मुक्त कर दिया। इसके बाद जापान और अमेरिका की कंपनियां व्यापक सर्किट उत्पादन शुरू करने लगीं।
1950 के दशक में एक और बड़ा वैज्ञानिक सिद्धि मिली और वह था ट्रांजिस्टर का आविष्कार। 1947 दिसंबर 23 तारीख को बेल लेबोरेटरीज में जॉन बार्डीन, वाल्टर ब्रैटेन और विलियम शॉकली ने जर्मेनियम क्रिस्टल पर गोल्ड फॉयल लगाकर पहला पॉइंट कॉन्टैक्ट ट्रांजिस्टर बनाया।
यह वैक्यूम ट्यूब से हजार गुना छोटा था और कम शक्ति खर्च करता था तथा अधिक विश्वसनीय था। 1954 में टेक्सास इंस्ट्रुमेंट्स कंपनी ने पहला सिलिकन ट्रांजिस्टर का व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया। ट्रांजिस्टर और PCB के मिश्रण से इलेक्ट्रॉनिक्स जगत में विशेष परिवर्तन दिखा। फलतः एक छोटे PCB पर सैकड़ों ट्रांजिस्टर लगाकर रेडियो, टेलीविजन, कैलकुलेटर बनने लगे।
इस वैज्ञानिक क्रांति को और एक स्तर पर ले गए Jack Kilby और Robert Noyce। 1958 में किल्बी ने टेक्सास इंस्ट्रुमेंट्स में एक जर्मेनियम चिप पर ट्रांजिस्टर, रेसिस्टर और कैपेसिटर एक साथ बनाया। इसे उन्होंने नाम दिया Integrated Circuit (IC)। 1959 में रॉबर्ट नॉयस ने फेयरचाइल्ड कंपनी में सिलिकन पर प्लानार प्रक्रिया (Planar Process) का आविष्कार किया जिसके अनुकरण में आज सभी IC बनते हैं। इन दो आविष्कारों के फलस्वरूप माइक्रोचिप युग शुरू हो गया। 1960 के दशक में पहला व्यावसायिक IC बाजार में आया। एक छोटी चिप के अंदर सैकड़ों ट्रांजिस्टर रखना संभव हो गया।
1965 ईसवी में इंटेल के सह-संस्थापक Gordon Moore ने अपना नियम Moore's Law घोषित किया — इस नियम में कहा गया था कि हर 18-24 महीने में एक चिप में रखे जा सकने वाले ट्रांजिस्टर की संख्या दोगुनी हो जाती है। यह नियम आज तक लगभग सही रहा है। 1971 में इंटेल ने 4004 माइक्रोप्रोसेसर जारी किया जिसमें 2300 ट्रांजिस्टर थे। आज एप्पल के M2 अल्ट्रा चिप में 134 बिलियन (13,400 करोड़) ट्रांजिस्टर हैं।
आज का PCB अत्यंत जटिल है। एक आधुनिक मदरबोर्ड में 16-24 लेयर होती हैं, Microvia, HDI (High Density Interconnect), फ्लेक्सिबल PCB, रिजिड-फ्लेक्स PCB जैसे कई प्रकार हैं। यह एयरबस विमान, मंगल यान, कृत्रिम हृदय पंप से लेकर आपके जेब में मौजूद स्मार्टफोन तक सबमें है। इसका विकास केवल वैज्ञानिकों का नहीं, युद्ध, अर्थनीति, राजनीति और मानव जिज्ञासा का मिश्रण है। थेलस के एम्बर रगड़ने से शुरू होकर आज के नैनोमीटर प्रक्रिया (3nm, 2nm) तक यह यात्रा मानव सभ्यता का सबसे अविश्वसनीय अध्याय है। यह हरा बोर्ड आज हमारे जीवन का अविच्छेद्य अंग है। इसके बिना आधुनिक सभ्यता की कल्पना करना असंभव है।
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तथ्य सूची :—
१. "Crystal Fire: The Invention of the Transistor and the Birth of the Information Age" by Michael Riordan and Lillian Hoddeson.
२. "The Chip: How Two Americans Invented the Microchip and Launched a Revolution" by T.R. Reid.
३. "Empires of Light: Edison, Tesla, Westinghouse, and the Race to Electrify the World" by Jill Jonnes.
४. "Benjamin Franklin: An American Life" by Walter Isaacson.
५. "Much Ado About Almost Nothing: Man's Encounter with the Electron" by Hans Camenzind.
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