"अच्छा डॉक्टर साहब, थोड़ी ब्रांडी लेंगे क्या?"
"ज़रूर, डालिए।"
बूढ़े जहाज़ी-सर्जन ने अपना गिलास आगे बढ़ाकर, उसे धीरे-धीरे सुनहरे रंग के तरल पदार्थ से भरते हुए देखा। फिर, गिलास को अपनी आँखों के सामने रखकर, उन्होंने लैंप की रोशनी को उसके आर-पार जाने दिया, उसे सूँघा, कुछ बूँदें चखीं और आनंद से अपने होंठ चाटते हुए कहा:
"आह! कैसा मनमोहक विष! या यूँ कहें, एक मोहक हत्यारा, मानव समाज का एक आनंददायक विनाशक!"
"आप इसे उतना नहीं जानते जितना मैं जानता हूँ। आपने शायद वह प्रशंसनीय पुस्तक L'Assommoir पढ़ी होगी, लेकिन आपने मेरी तरह यह नहीं देखा कि शराब किस तरह एक पूरी आदिवासी जनजाति को, नीग्रो लोगों के एक छोटे राज्य को नष्ट कर देती है — वह शराब जिसे लाल दाढ़ी वाले अंग्रेज़ नाविक शांति से बैरल-दर-बैरल खाली कर देते हैं।
"यहीं पास में, पॉन्ट-ल'आबे के निकट ब्रिटानी के एक छोटे गाँव में, मैंने एक बार शराब के कारण घटी एक अजीब और भयानक दुखद घटना अपनी आँखों से देखी थी। मैं अपने पिता द्वारा छोड़े गए एक छोटे देहाती घर में अपनी छुट्टियाँ बिता रहा था। आप जानते ही होंगे उस समतल तटीय क्षेत्र के बारे में जहाँ दिन-रात हवा सन्नाटे से बहती है, जहाँ खड़े या पड़े हुए वे विशाल पत्थर देखे जा सकते हैं जिन्हें प्राचीन काल में रक्षक माना जाता था और जो आज भी अपने भीतर कुछ राजसी और प्रभावशाली गुण बनाए हुए हैं। मैं हमेशा यह उम्मीद करता हूँ कि वे शायद जीवंत हो उठेंगे और दानवों की तरह धीमी और भारी चाल से उस क्षेत्र में चलना शुरू कर देंगे, या अपने विशाल ग्रेनाइट पंख फैलाकर द्रुइदों के स्वर्ग की ओर उड़ जाएँगे।
"चारों ओर बस समुद्र है, ज़रा-सी उत्तेजना पर अपने क्रोध में उठने को और जो लोग उसके क्रोध का सामना करने का साहस करते हैं, उन पर अपने झागदार बाल झाड़ने को हमेशा तैयार।
"और जो लोग इस भयानक समुद्र में यात्रा करते हैं, जो अपनी हरी पीठ की एक ही हरकत से उनकी कमज़ोर नावों को उलट सकता है और निगल सकता है — वे अपनी छोटी नावों में दिन-रात निकल पड़ते हैं, कठोर परिश्रमी, थके हुए और शराब पीते हुए। वे अक्सर शराब पीते हैं। उनकी एक कहावत है: 'जब बोतल भरी होती है, तब तुम पानी के भीतर का चट्टान (रीफ़) देख सकते हो, लेकिन जब वह खाली हो जाती है तो तुम उसे और नहीं देख पाते।'
"उनकी किसी भी झोपड़ी में चले जाइए; आपको वहाँ कभी पिता नहीं मिलेंगे। यदि आप उस महिला से पूछेंगे कि उसके पति का क्या हुआ, तो वह अपनी बाँह उस अंधकारमय समुद्र की ओर फैला देगी जो तट पर गरजता रहता है। वह एक रात वहीं रह गया, जब उसने बहुत ज़्यादा शराब पी रखी थी; उसके बड़े बेटे के साथ भी यही हुआ। उसके अभी चार और बड़े, मज़बूत, गोरे बालों वाले बेटे हैं। बहुत जल्द उनका भी समय आएगा।"
"जैसा मैंने कहा, मैं पॉन्ट-ल'आबे के पास एक छोटे घर में रहता था। मैं वहाँ अकेला अपने नौकर, एक बूढ़े नाविक, और एक स्थानीय परिवार के साथ रहता था, जो मेरी अनुपस्थिति में ज़मीन-जायदाद की देखभाल करते थे। उस परिवार में तीन सदस्य थे, दो बहनें और एक व्यक्ति, जिसने उनमें से एक से विवाह किया था और बगीचे की ज़िम्मेदारी संभालता था।
"क्रिसमस से कुछ ही समय पहले मेरे माली की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया। पति ने मुझसे धर्म-पिता (गॉड-फादर) बनने का अनुरोध किया। मैं उसका अनुरोध ठुकरा नहीं सका, इसलिए उसने कहे अनुसार नामकरण के खर्च के लिए मुझसे दस फ्रांक उधार लिए।
"जनवरी की दूसरी तारीख़ को उत्सव की तारीख़ के रूप में चुना गया। उससे एक सप्ताह पहले धरती एक विशाल सफ़ेद बर्फ़ के गलीचे से ढकी हुई थी। उस बर्फ़ की चादर के कारण यह समतल और निचला देश असीम और अनंत विस्तृत प्रतीत हो रहा था। इस श्वेत प्रांतर के विपरीत समुद्र काला दिखाई दे रहा था। उसकी लहरें लहराते हुए बढ़ती आ रही थीं, उग्र होकर गरज रही थीं और उन्मत्त होकर उछल पड़ती थीं; ऐसा लगता था कि वह अपने उस सफ़ेद पड़ोसी को पूरी तरह मिटा देना चाहता है। लेकिन वह बर्फ़ से ढकी ज़मीन इतनी शांत, निस्तब्ध और हिमशीतल थी कि उसे देखकर मृतप्राय जान पड़ती थी।
"सुबह नौ बजे पिता केराँदेक अपनी साली, बड़ी केर्मागान और दाई के साथ मेरे दरवाज़े पर आया, जो नवजात को कंबल में लपेटे हुए थी। हम गिरजाघर की ओर निकल पड़े। मौसम इतना ठंडा था कि लगता था यह त्वचा को सुखाकर फाड़ देगा। मैं हमारे आगे ले जाए जा रहे उस बेचारे छोटे प्राणी के बारे में सोच रहा था, और खुद से कह रहा था कि यह ब्रेटन जाति निश्चय ही लोहे की बनी होगी, अगर उनके बच्चे जन्म लेते ही ऐसे बाहरी वातावरण को सहने में सक्षम होते हैं।
"हम गिरजाघर के पास पहुँचे, लेकिन दरवाज़ा बंद था; पादरी के आने में देर हो रही थी।
"फिर दाई एक सीढ़ी पर बैठकर बच्चे के कपड़े खोलने लगी। पहले मुझे लगा शायद कोई छोटी दुर्घटना हो गई है, लेकिन मैंने देखा कि वे उस बेचारे छोटे बच्चे को बर्फ़ जैसी ठंडी हवा में पूरी तरह नग्न छोड़ रहे हैं। ऐसी मूर्खता देख गुस्से में आकर मैंने विरोध किया:
'अरे, तुम पागल हो गई हो क्या! तुम बच्चे को मार डालोगी!'
महिला ने शांति से उत्तर दिया: 'ओहो, नहीं, महोदय; उसे प्रभु के सामने नग्न होकर प्रतीक्षा करनी चाहिए।'
पिता और मौसी बिना किसी चिंता के देख रहे थे। यह एक प्रथा थी। अगर इसका पालन न किया जाए तो छोटे बच्चे पर निश्चित दुर्भाग्य आएगा।
"मैंने डाँटा, धमकाया और मिन्नतें कीं। मैंने उस कमज़ोर शिशु को ढकने के लिए बलपूर्वक कोशिश की। सब व्यर्थ गया। दाई मुझसे बर्फ़ लेकर दूर भाग गई, और उस छोटे बच्चे का शरीर बैंगनी रंग का हो गया। मैं इन पशुओं को छोड़कर जाने ही वाला था कि तभी देखा पादरी उस क्षेत्र से होकर आ रहे हैं और उनके पीछे-पीछे गिरजाघर का सेवक और एक छोटा लड़का आ रहा है। मैं उनकी ओर दौड़ा और अपना गुस्सा प्रकट किया। लेकिन उन्होंने कोई आश्चर्य प्रकट नहीं किया और न ही अपनी चाल की गति ज़रा भी बढ़ाई। बल्कि उन्होंने मुझे उत्तर दिया:
'आप क्या उम्मीद करते हैं, महाशय? यह प्रथा है। सब ऐसा ही करते हैं और उन्हें रोकने की कोशिश करने से कोई लाभ नहीं होगा।'
'लेकिन कम से कम जल्दी कीजिए!' मैं चिल्लाया।
उन्होंने उत्तर दिया: 'लेकिन मैं इससे तेज़ नहीं चल सकता।'
"पादरी गिरजाघर के वस्त्र-परिवर्तन कक्ष में प्रवेश कर गए और हम बाहर गिरजाघर की सीढ़ियों पर रह गए। मुझे बहुत तकलीफ़ हो रही थी। लेकिन उस बेचारे छोटे प्राणी का क्या हो रहा होगा जो प्रचंड ठंड के कारण रो-रोकर चीख रहा था।
"आख़िरकार दरवाज़ा खुला। वे गिरजाघर के भीतर गए। लेकिन बेचारे बच्चे को पूरे उत्सव के दौरान नग्न ही रहना पड़ा। यह समाप्त ही नहीं हो रहा था। पादरी लैटिन शब्दों को घसीट-घसीटकर बोल रहे थे और उनका भयंकर ग़लत उच्चारण कर रहे थे। वे धीरे-धीरे और भारी क़दमों से चल रहे थे। उनका सफ़ेद वस्त्र मेरे हृदय को ठंडा कर गया। ऐसा लगता था जैसे, एक निर्दयी और बर्बर देवता के नाम पर, उन्होंने ख़ुद को एक और तरह की बर्फ़ में लपेट लिया हो ताकि ठंड से तड़प रहे इस छोटे मानव-शिशु को यातना दी जा सके।
"आख़िरकार विधि के अनुसार नामकरण समाप्त हुआ और मैंने देखा दाई फिर से उस बर्फ़ बन चुके, रोते हुए बच्चे को कंबल में लपेटकर ले गई।
"पादरी ने मुझसे कहा: 'क्या आप रजिस्टर पर हस्ताक्षर करना चाहेंगे?'
"अपने माली की ओर मुड़कर मैंने कहा: 'जल्दी करो और तुरंत घर जाओ ताकि तुम बच्चे के शरीर को गरम कर सको।' अगर बहुत देर न हुई हो, तो निमोनिया के भयानक हमले से बचाने के लिए मैंने उसे कुछ सलाह दी। उसने मेरे निर्देशों का पालन करने का वादा किया और अपनी साली व दाई के साथ चला गया। मैं पादरी के पीछे-पीछे वस्त्र-कक्ष में गया और जब हस्ताक्षर कर रहा था, तब उन्होंने खर्च के नाम पर पाँच फ्रांक की माँग की।
"चूँकि मैं पहले ही पिता को दस फ्रांक दे चुका था, इसलिए मैंने दोबारा पैसे देने से मना कर दिया। पादरी ने काग़ज़ फाड़कर नामकरण रद्द करने की धमकी दी। मैंने बदले में उन्हें ज़िला वकील द्वारा दंडित कराने की धमकी दी। विवाद लंबे समय तक चलता रहा और आख़िरकार मजबूर होकर मैंने पादरी को पाँच फ्रांक देकर लौटा दिए।
"घर पहुँचते ही सब कुछ ठीक है या नहीं यह जानने के लिए मैं केराँदेक के घर गया। पिता, साली या दाई — कोई भी अभी तक नहीं लौटा था। बच्चे की माँ वहाँ अकेली थी, ठंड से काँपते हुए बिस्तर पर पड़ी थी और भूखी थी, क्योंकि उसने पिछले दिन से कुछ नहीं खाया था।
'वे कहाँ गए होंगे?' मैंने पूछा। उसने बिना किसी आश्चर्य या क्रोध के उत्तर दिया, 'वे उत्सव मनाने के लिए कुछ पीने गए हैं: यह प्रथा है।' फिर मैंने अपने उन दस फ्रांक के बारे में सोचा जो गिरजाघर में देने के लिए थे और अब निःसंदेह शराब पर खर्च हो रहे थे।
"मैंने माँ के लिए कुछ सूप भिजवाया और कमरे में अच्छी तरह आग जलाने का आदेश दिया। मैं बेचैन और क्रोधित था और इन पशुओं को भगा देने की क़सम खा रहा था, लेकिन यह सोचकर भी डर रहा था कि उस बेचारे शिशु का क्या होगा।
"तब तक छह बज चुके थे, और वे अभी तक नहीं लौटे थे। मैंने अपने नौकर से उनकी प्रतीक्षा करने को कहा और सोने चला गया। बहुत जल्द मुझे नींद आ गई और मैं गहरी नींद में सो गया। सुबह मेरे नौकर ने मुझे जगाया और वह मेरे लिए गरम पानी लाया था।
"आँख खोलते ही मैंने उससे पूछा: 'केराँदेक की क्या ख़बर है?'
"आदमी हिचकिचाया और फिर घसीट-घसीटकर बोला: 'ओह! वह आधी रात के बाद ही लौट आया था, लेकिन इतनी शराब पी रखी थी कि चल नहीं पा रहा था और केर्मागान व दाई की भी वही हालत थी। मुझे लगता है वे ज़रूर किसी गड्ढे में सो गए होंगे, क्योंकि छोटा बच्चा मर गया और उन्हें इस बारे में बिल्कुल पता नहीं चला।'
"मैं बिस्तर से उछल पड़ा और चीख़ उठा:
'क्या! बच्चा मर गया?'
'जी हाँ। वे उसे "माँ केराँदेक" के पास वापस ले आए थे। जब उसने यह देखा, तो वह रोने लगी और अब वे उसे सांत्वना देने के लिए शराब पिला रहे हैं।'
'क्या कहा? वे उसे शराब पिला रहे हैं!'
'जी हाँ। मुझे यह आज सुबह ही पता चला। चूँकि केराँदेक के पास अब न ब्रांडी थी न पैसे, वह लैंप के लिए साहब का दिया हुआ काठ का अल्कोहल (स्पिरिट) ले आया और अब वे चारों वही पी रहे हैं। माँ अब बहुत बीमार महसूस कर रही है।'
"मैंने जल्दी से कुछ कपड़े पहने, और उन नरपिशाचों की पीठ पर बरसाने के इरादे से एक छड़ी लेकर, माली के घर की ओर दौड़ पड़ा।
"माँ अपने मृत शिशु के नीले पड़ चुके शरीर के पास अत्यधिक शराब पीकर बड़बड़ा रही थी।
केराँदेक, दाई और केर्मागान की स्त्री फ़र्श पर पड़े खर्राटे भर रहे थे। मुझे उस माँ की देखभाल करनी पड़ी, जिसकी दोपहर तक मृत्यु हो गई।"
बूढ़े डॉक्टर चुप हो गए। उन्होंने ब्रांडी की बोतल उठाई और एक और गिलास डाला। उन्होंने उसे लैंप की ओर उठाकर देखा और उसमें से आती रोशनी उस तरल पदार्थ को गले हुए पुखराज मणि जैसा पीला रंग दे रही थी। फिर उन्होंने एक ही घूँट में उस विश्वासघाती पेय को पी लिया।
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(यह Le Baptême कहानी गाए द मोपासाँ (1850-1893) द्वारा रचित है)
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लेखक परिचय: गाए द मोपासाँ का जन्म 5 अगस्त 1850 को फ़्रांस के नॉर्मंडी में हुआ था। आधुनिक लघुकथा के जनक के रूप में प्रसिद्ध। गाए द मोपासाँ उन्नीसवीं सदी के एक प्रसिद्ध फ़्रांसीसी लेखक थे। उन्होंने लगभग 300 से अधिक लघुकथाएँ, 6 उपन्यास और अनेक यात्रा-वृत्तांत लिखे। उनकी कहानियों में यथार्थवाद, मानवीय दुर्बलता, सामाजिक कुरीतियाँ, शराब का अंधकारमय पक्ष और जीवन का निष्ठुर सत्य अत्यंत सहज और सजीव रूप से प्रकट होता है। उनकी प्रसिद्ध कहानियों में 'द नेकलेस', 'बुल दे सुइफ़' और 'द होर्ला' प्रमुख हैं।
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द्रष्टव्य: गाए द मोपासाँ की उपर्युक्त कहानी उन्नीसवीं सदी के फ़्रांस की भौगोलिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय पृष्ठभूमि पर आधारित है। कहानी में प्रयुक्त कुछ महत्वपूर्ण और कम-परिचित विषयों की संक्षिप्त जानकारी नीचे दी गई है।
(क) L'Assommoir
L'Assommoir फ़्रांसीसी साहित्य के विशिष्ट लेखक एमील ज़ोला द्वारा 1877 में लिखा गया एक कालजयी उपन्यास है। इस पुस्तक में शराब किस तरह श्रमिक वर्ग के मनुष्य और उसके परिवार को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से पूरी तरह नष्ट कर देती है, इसका यथार्थ चित्रण है। कहानी के डॉक्टर ने शराब की भयावहता समझाने के लिए इसी पुस्तक का उदाहरण दिया है।
(ख) लाल दाढ़ी वाले अंग्रेज़ नाविकों द्वारा ड्रम-दर-ड्रम शराब भरकर लाने और उड़ेलने का प्रसंग
जिन लाल-दाढ़ी वाले अंग्रेज़ नाविकों के ड्रम-दर-ड्रम शराब उड़ेलने का उल्लेख कहानी में है, उसके पीछे एक इतिहास है। अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में उपनिवेशवाद के दौर में अंग्रेज़ और यूरोपीय व्यापारी जहाज़ों से अफ़्रीका और अन्य द्वीपों की ओर जाते थे। वे अपने जहाज़ से लकड़ी के ड्रम (बैरल) भर-भरकर सस्ती शराब (जैसे रम, ब्रांडी, जिन) वहाँ के आदिवासियों और शासकों को बेचते थे या बदले में सोना, हाथी-दाँत और दास लेते थे। वे सीधे-सादे आदिवासी लोग पहले कभी शराब नहीं पीते थे, इसलिए वे भयंकर नशे के आदी हो गए। परिणामस्वरूप उनकी सामाजिक व्यवस्था बिखर गई, बीमारियाँ बढ़ गईं और पूरा समुदाय तहस-नहस हो गया।
(ग) ब्रिटानी और पॉन्ट-ल'आबे
ब्रिटानी, फ़्रांस के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित एक तटवर्ती क्षेत्र है। यह प्रचंड ठंडी हवा, चट्टानी समुद्र-तट और मछुआरे गाँवों के लिए जाना जाता है। पॉन्ट-ल'आबे उसी ब्रिटानी क्षेत्र में स्थित एक छोटा ऐतिहासिक शहर है।
(घ) द्रुइद
प्राचीन यूरोप की केल्टिक संस्कृति के पुरोहित या धर्मगुरु थे — द्रुइद। ब्रिटानी क्षेत्र में प्राचीन काल के मेगालिथ्स नामक बड़े-बड़े पत्थर स्थापित हैं, जिन्हें द्रुइदों का पूजा-स्थल माना जाता था। डॉक्टर ने उन विशाल पत्थरों को देखकर द्रुइदों की याद की है।
(ङ) ब्रेटन जाति
ब्रेटन लोग ब्रिटानी क्षेत्र के स्थानीय निवासी हैं। तटवर्ती क्षेत्र की कठोर जलवायु और प्रचंड ठंड सहते-सहते ये लोग शरीर से मज़बूत हो गए थे। इसीलिए लेखक ने उन्हें "लोहे जैसा कठोर" कहा है। इन लोगों में अनेक अंधविश्वास और स्थानीय कुरीतियाँ प्रचलित थीं।
(च) ईसाई नामकरण (Christening/Baptism) और 'धर्म-पिता' (Godfather)
नामकरण या Christening ईसाई धर्म की एक पवित्र रीति है जिसमें नवजात शिशु को गिरजाघर ले जाकर जल-सिंचन किया जाता है और धर्म में दीक्षित किया जाता है। इस उत्सव के दौरान परिवार से बाहर के किसी सम्मानित व्यक्ति को शिशु का 'धर्म-पिता (गॉडफादर)' चुना जाता है, जो आध्यात्मिक रूप से शिशु की ज़िम्मेदारी लेता है (यहाँ डॉक्टर ही धर्म-पिता बने थे)।
(छ) उड (वुड) अल्कोहल
Wood Alcohol या मेथेनॉल पीने के लिए प्रयुक्त होने वाली साधारण शराब या एथेनॉल नहीं है। यह लैंप जलाने या उद्योग में प्रयुक्त होने वाला एक अत्यंत विषैला रसायन है। इसे पीने से मनुष्य की आँखें अंधी हो जाती हैं, स्नायु मर जाते हैं और अंततः मृत्यु हो जाती है। नशे का आदी केराँदेक शराब न मिलने पर यही विषैला स्पिरिट पी लेने के कारण अंततः उसका स्वास्थ्य बिगड़ गया और उसकी पत्नी की भी मृत्यु हो गई।
(ज) फ्रांक
यूरो आने से पहले 'फ्रांक' फ़्रांस की आधिकारिक मुद्रा थी। कहानी में उस समय की मुद्रा के आधार पर दस फ्रांक और पाँच फ्रांक का उल्लेख है। 1 जनवरी 1999 को यूरोपीय संघ (EU) द्वारा यूरो को बैंकिंग, हिसाब-किताब और व्यावसायिक लेन-देन के लिए आधिकारिक रूप से अपनाया गया। 1 जनवरी 2002 को फ़्रांस सहित यूरोप के अन्य देशों में यूरो के काग़ज़ी नोट और सिक्के बाज़ार में आए। 17 फ़रवरी 2002 से फ़्रांस में पूरी तरह से 'फ्रांक' का प्रयोग बंद हो गया और यूरो फ़्रांस की एकमात्र वैध मुद्रा बन गई।
(झ) कहानी में मौजूद मूल लोकोक्ति
"Quand la bouteille est pleine, on voit le récif ; quand elle est vide, on ne le voit plus !" (जब तक बोतल भरी रहती है, समुद्र की चट्टान दिखाई देती है, लेकिन बोतल ख़ाली हो जाने पर कुछ नहीं दिखता।)
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इस कहानी से हमने क्या सीखा?
दर्शनशास्त्र में एक बड़ा प्रश्न है — "मनुष्य के कष्ट के प्रति प्रकृति या ईश्वर क्या संवेदनशील है?" यह कहानी दर्शाती है कि प्रकृति (बर्फ़, प्रचंड ठंडी हवा, गरजता समुद्र) मनुष्य की असहायता के प्रति पूरी तरह उदासीन है। इसी तरह, "प्रभु के सामने शिशु को नग्न रहना चाहिए" जैसा जो धार्मिक नियम बताया गया, वह ईश्वर की दया के बजाय एक निर्दयी सत्ता को दर्शाता है। लेखक की भाषा में — पादरी मानो "एक निर्दयी और बर्बर देवता के नाम पर" बर्फ़ की चादर ओढ़कर शिशु को यातना दे रहे थे। कहानी दिखाती है कि जब समाज अंधपरंपरा और कुरीतियों में जकड़ जाता है, तब मनुष्य का मौलिक विवेक और स्नेह-ममता लुप्त हो जाती है। एक नवजात शिशु को प्रचंड बर्फ़ में नग्न रखना तर्कसंगत नहीं है। लेकिन "यह हमारी परंपरा है" कहकर माँ, पिता, दाई और स्वयं पादरी अपने नैतिक दायित्व से मुँह मोड़ लेते हैं। परंपरा जब अंधविश्वास में बदल जाती है, तो वह मानवता की हत्या कर देती है। लेखक ने कहानी में गिरजाघर और पादरी के चरित्र के माध्यम से संस्थागत धर्म पर कटाक्ष किया है। शिशु ठंड में पड़ा नीला पड़ता जा रहा था, तब भी पादरी के मन में कोई दया या व्यग्रता नहीं थी। वे अपनी औपचारिक कर्मकांड-प्रक्रिया धीरे-धीरे पूरी करते रहे। कहानी के अंत में, पादरी शिशु का जीवन बचाने के लिए तुरंत घर भेजने के बजाय, और पाँच फ्रांक के लिए तर्क-वितर्क करते हैं और पैसे न देने पर काग़ज़ात फाड़ देने की धमकी देते हैं। यह दर्शाता है कि धर्म अक्सर आध्यात्मिकता खोकर केवल पैसे और शुष्क नियमों का व्यवसाय बन जाता है।
शराब किस तरह मनुष्य की उस समय की चेतना को नष्ट करके उसे 'मानवीय पशु' या Human Beast में बदल देती है, यही इस कहानी का मुख्य दार्शनिक पक्ष है। शराब केवल शरीर को नहीं बल्कि मनुष्य की आत्मा और संवेदना को भी मार देती है। शिशु की मृत्यु होने के बावजूद माता-पिता और संबंधी दुःख प्रकट करने के बजाय और अधिक शराब पीने में मग्न रहते हैं। अंततः शराब न मिलने पर वे विषैला स्पिरिट "वुड अल्कोहल" पीकर अपने जीवन को भी संकट में डाल देते हैं। नशा मनुष्य को स्वार्थी, निर्दय और आत्मघाती बना देता है।
कहानी की सबसे बड़ी दार्शनिक विडंबना स्वयं कथावाचक (डॉक्टर) के चरित्र में ही छिपी है। डॉक्टर शराब को "मनमोहक विष, मोहक हत्यारा, मानव समाज का विनाशक" मानते हैं। उन्होंने अपनी आँखों से शराब के कारण एक शिशु और माँ की मृत्यु देखी है। फिर भी, वे स्वयं क्या करते हैं? वह भयानक कहानी सुनाते-सुनाते वे स्वयं गिलास भरकर एक ही घूँट में वही ब्रांडी (शराब) पी जाते हैं! यह मानव प्रकृति के गहरे पलायनवाद या Escapism को उजागर करता है। मनुष्य जानता है कि कौन-सी चीज़ उसे नष्ट कर रही है, वह सत्य को समझता है, फिर भी वह उस दुःख और यंत्रणा से बचने के लिए पुनः उसी विष की शरण लेता है। इसलिए मोपासाँ की यह कहानी हमें सिखाती है कि प्रकृति निर्दयी है, समाज कुरीतियों से ग्रस्त है, धर्म अक्सर संवेदनहीन हो जाता है, और मनुष्य अपनी दुर्बलता और व्यसन का दास है। यह जीवन का एक कठोर, नग्न और यथार्थवादी दार्शनिक सत्य है।
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