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सोमवार, 11 अगस्त 2025

घूसखोर ज्योतिषी(चंदामामा कहानी)

छत्रपुर राज्य में एक ज्योतिषी रहता था। नाम था कंर्कट शास्त्री। वह इस बात का दावा करता था कि देवी की उस पर विशेष कृपा है और इसलिए वह किसी भी घटना अथवा अपराध की सच्ची जानकारी बता सकता है। उसने इसी आधार पर राजा का विश्वास प्राप्त कर दरबार में एक विशेष स्थान बना लिया था । राजा फरियादों और शिकायतों के बारे में कर्कट शास्त्री की सलाह के अनुसार ही फ़ैसला सुनाते । शास्त्री को जो अधिक घूस देता, वह उसी के पक्ष में फ़ैसला दिलवा देता ।
यह अफ़वाह राजा तक पहुँच गई। राजा ने मंत्री से इस बात की सच्चाई का पता लगाने के लिए कहा। मंत्री ने राजा को इसके लिए एक उपाय सुझाया। दूसरे दिन राजा ने कर्कट शास्त्री से कहा- "हमारे दरबार के एक अधिकारी श्रीपति ने किसी पर घूस लेने का आरोप लगाया है। मैंने किसी कारण वश उस व्यक्ति का नाम गुप्त रखा है। आप श्रीपति की शिकायत की सच्चाई का पता लगा कर कल दरबार में आकर बताइए । यदि वह व्यक्ति सचमुच रिश्वतखोर साबित हुआ तो उसे कठिन दण्ड दिया जायेगा ।

उसी दिन रात को श्रीपति कर्कट शास्त्री के घर पहुँचा और बोला- "मैंने एक व्यक्ति पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया है। यदि यह आरोप सच साबित न हुआ तो राजा मुझे कठिन दण्ड देंगे। इसलिए सहायता

के लिए मैं आप के पास आया हूँ।" यह कह कर श्रीपति ने शास्त्री के हाथ एक हज़ार सिक्के दिये रख दी । दूसरे दिन दरबार में जब राजा ने श्रीपति की शिकायत के बारे में शास्त्री से पूछा तो उन्होंने देवी का नाम लेकर ध्यान करके कहा- "जय देवी ! महाराज, श्रीपति की शिकायत बिल्कुल सही है।"

राजा ने तुरन्त सिपाहियों को आदेश दिया- "कर्कट शास्त्री को बन्दों बना लो ।"

शास्त्री काँपता हुआ बोला- "महाराज! मुझे किस अपराध में बन्दी बनाया जा रहा है ?" "श्रीपति ने जिस व्यक्ति पर घूस लेने का आरोप लगाया था, वह आप ही हैं।" राजा ने उत्तर दिया ।'

रविवार, 21 अगस्त 2022

धंधे का भेद(चंदामामा)

शिलंगेरी गांव का धर्मानंद अपनी पत्नी और पुत्री के साथ एक विशेष पुण्यस्थली के तीर्थ पर अपने गांव से रवाना हुआ । उस पुण्यस्थली तक पहुंचने के लिए एक नदी को पार करना पड़ता था । नदी के किनारे पहुंचे तो वहां पहले ही कुछ यात्री इंतज़ार में दिखें । उन्हें भी नदी पार जाना था । वहां एक नाव भी थी । नाव का मल्लाह भी वहीं था । धर्मानंद ने उससे पूछा , " भाई , पार ले जाने के कितने पैसे लोगे ? ' " ' एक रुपया , फी यात्री , " मल्लाह ने उत्तर दिया । नदी में पानी काफी था । बल्कि उसका कोई ओर छोर ही दिख नहीं रहा था । धर्मानंद को हैरानी हुई । केवल एक रुपया ! खैर , वह मल्लाह से कुछ नहीं बोला और अपनी पत्नी और बेटी के साथ नाव में जा बैठा । बाकी यात्री भी बैठ गये ।

 नदी पार करने के बाद सब यात्री देव दर्शन के लिए वहां के मंदिर पर पहुंचे और दर्शन करने के बाद वापस नदी किनारे आ गये । दरअसल , उन्हें उसी दिन वापस नदी पार जाना था , क्योंकि मंदिर पर रुकने की कोई व्यवस्था न थी और न ही वहां भोजन की कोई व्यवस्था थी । उधर अंधेरा भी उतरने को और वे अंधेरे में किसी प्रकार का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे । मल्लाह अपनी नाव के साथ वापस जाने को तैयार था , लेकिन अब वह फी यात्री पांच रुपये मांग रहा था । " यह क्या ? " धर्मानंद को फिर हैरानी हुई । " उधर से आये तो केवल एक रुपया फी यात्री मांगा , और अब पांच रुपये फी यात्री मांग रहे हो ! तुम्हारा मतलब है , अब हम तुम्हें तीन रुपये के बजाय पंद्रह रुपये दें ? हद कर रहे हो ! " " ' आप परेशान क्यों होते हैं , हुज़ूर ! आपको भी अब यह इत्ती सी बात बतानी पड़ेगी ? यह तो धंधे का भेद है " उत्तर देते हुए मल्लाह मंद - मंद मुस्करा रहा था । -

(किशन आर्य)

गुरुवार, 18 अगस्त 2022

दायित्व किसे सौंपें ?(रामकृष्ण शास्त्री)


एक गांव में मदनसिंह नाम का एक पहलवान रहता था । उसने अनेक कुश्तियां लड़ीं , अनेक पहलवानों को धूल चटायी और अनेक पुरस्कार प्राप्त किये । यह सब कुछ गांव के मुखिया से छिपा न था । 

इसलिए उसने मदनसिंह के कहने पर फौरन उसे गांव के पंचायत का चौकीदार नियुक्त कर दिया । - मदनसिंह को गांव की तरफ से कर वसूली का काम सौंपा गया , जिसे वह बड़ी ईमानदारी के साथ करता था । लेकिन एक रात चोरों ने मौका पाकर पंचायत घर का ताला तोड़ा और वहां से इकट्ठी का गयी तमाम राशि लेकर चंपत हो गये । मुखिया को जब इसकी खबर मिली तो उसका पारा एकदम चढ़ गया । उसने मदनसिंह को बुलवाया और उससे पूछा , 


" उन चोरों को तुमने क्यों नहीं पकड़ा ? क्यों नहीं तुमने उनका मुकाबला किया ? आखिर , बात क्या थी ? ” 

इस पर मदनसिंह ने बड़े सहज भाव से कहा , " मालिक , जब मैं कुश्ती लड़ता हूं तो लोग सीटियां बजा बजा कर मेरी हिम्मत बंधाते हैं । वे तालियां पीटते हैं जिससे अपने मुकाबले पर आये दूसरे पहलवान को पटकने के लिए मुझ में तूफानी जोश भर जाता है । रात को चोर जब पंचायत का खज़ाना लूटने लगे , तो उस समय मुझे जोश दिलाने वाला कोई नहीं था । इसीलिए मैंने उनका सामना नहीं किया । मैं क्या करूं , लाचर था । "

 और यह कहकर मदनसिंह अपनी मूंछों पर ताव देने लगा । मदनसिंह की बात सुनकर मुखिया की आँखें खुलीं । उसे पहली बार इस बात का एहसास हुआ कि किसी की शक्ल - सूरत देखकरं ही उसे दायित्व नहीं सौंप देना चाहिए , उसके स्वभाव को जानना भी बहुत ज़रूरी है ।
 
लेखक - रामकृष्ण शास्त्री