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रविवार, 14 दिसंबर 2025

◉मनुष्योंने सर्किट बोर्ड कैसे बनाया?◉

आपके टीवी, रेडियो, मोबाइल के अंदर आमतौर पर एक या अधिक हरे रंग के कार्ड लगे होते हैं। उस कार्ड को कई लोग शायद सर्किट बोर्ड या Printed Circuit Board - PCB नाम से जानते होंगे। इस PCB या सर्किट बोर्ड को देखकर साधारण लोग सोचते होंगे हाँ इसमें क्या विशेषता है? लेकिन यह साधारण दिखने वाला हरा बोर्ड ही आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स का मूल आधार है। इसके बिना आज के स्मार्टफोन, कंप्यूटर, टेलीविजन या अन्य यंत्रों की कल्पना नहीं की जा सकती। इस बोर्ड का इतिहास अत्यंत रोमांचक है और आज से लगभग 2600 वर्ष पहले स्थिर विद्युत की पहली उल्लेख के साथ इसका इतिहास आरंभ हुआ था।
ईसापूर्व 600 ईसवी में मिलेटस नगर के दार्शनिक थेलस ने एक अद्भुत घटना देखी। उन्होंने देखा कि Amber (ग्रीक भाषा में elektron) नामक एक पीले रंग के पत्थर को ऊन या बालों से रगड़ने पर उसमें एक अदृश्य शक्ति उत्पन्न होती है, जो अनाज के दाने, कागज के टुकड़े या बालों को अपनी ओर खींच लाती है। इस घटना को उन्होंने संभवतः पहली बार रिकॉर्ड किया। यह स्थिर विद्युत (Static Electricity) है और इस ग्रीक शब्द elektron से बहुत बाद में अंग्रेजी में Electricity और Electron शब्द बने। प्राचीन रोमन, भारत और चीन देशों में भी यह परीक्षण हो रहा था। लेकिन उस समय कोई भी इस स्थिर विद्युत को निरंतर प्रवाह में बदल नहीं पाया था।

मध्ययुग में धार्मिक एकछत्रवाद के कारण विद्युत विषय पर विशेष प्रगति नहीं हुई। चर्च और धर्मग्रंथों के प्रभाव में वैज्ञानिक विचारधारा दमित हुई। लेकिन सोलहवीं शताब्दी में रेनेसां युग आने के बाद पुनः जिज्ञासा जागृत हुई। 1600 ईसवी में इंग्लैंड के वैज्ञानिक William Gilbert ने अपनी पुस्तक De Magnete में स्थिर विद्युत और चुंबकत्व के अंतर को समझाया और पहली बार लैटिन शब्द “electrica” का प्रयोग किया।

अठारहवीं शताब्दी में अमेरिका के बेंजामिन फ्रैंकलिन ने अपनी प्रसिद्ध पतंग प्रयोग करके दिखाया कि बिजली और स्थिर विद्युत एक ही प्रकार की शक्ति है। फ्रैंकलिन ने तूफानी बारिश के दिन रेशमी धागे के साथ एक सिल्क हैंडकरचिफ से बनी पतंग उड़ाई। पतंग के ऊपरी बिंदु पर एक नुकीला लोहे का तार लगाया था जो बिजली को आकर्षित कर सकता था। धागे के नीचे एक लोहे की चाबी बांधी थी और उस चाबी के साथ एक लेडेन जार (Leyden jar) नामक प्राचीन विद्युत संचयक यंत्र जोड़ा था। फ्रैंकलिन खुद एक सूखे जगह में घर के बरामदे के नीचे खड़े होकर रेशमी धागे का हिस्सा पकड़े थे। यह रेशम विद्युत का अपरिवाही होने से सुरक्षित था।

जब बादल पर बिजली चमक रही थी और तूफानी बारिश हो रही थी, पतंग बादल के निकट जाकर वायुमंडल में मौजूद विद्युत आवेश (electric charge) को आकर्षित करती थी। वह विद्युत पतंग के तार से धागे के नीचे आकर चाबी के निकट संचित होती थी। फ्रैंकलिन ने उंगली चाबी के निकट लाने पर चमकीली स्फुलिंग (spark) निकली और लेडेन जार में विद्युत संचय हुआ। इससे स्पष्ट प्रमाण मिला कि वज्रपात और स्थिर विद्युत एक ही प्रकार की है। यह प्रयोग अत्यंत जोखिमपूर्ण था और बाद में कई लोग इसका अनुकरण करके मर गए फिर भी इसने विद्युत विज्ञान का मूल द्वार खोल दिया और बाद में फ्रैंकलिन ने इसके आधार पर वज्र निरोधक दंड (lightning rod) का आविष्कार किया जो आज सभी ऊंची इमारतों में लगाया जाता है।

बेंजामिन फ्रैंकलिन ने लेडेन जार (Leyden Jar) नामक एक साधारण कैपेसिटर का प्रयोग करके विद्युत को स्टोर करने का पहला प्रयोग किया। लेकिन यह भी स्थिर विद्युत थी। निरंतर प्रवाही विद्युत या Continuous Current के आविष्कार के लिए विश्व को और ढाई सौ वर्ष इंतजार करना पड़ा।

1800 ईसवी में इटली के पाविया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर Alessandro Volta ने एक युगांतरकारी आविष्कार किया। उन्होंने देखा कि दो अलग धातुएं - जिंक और कॉपर एक इलेक्ट्रोलाइट (नमक पानी) के संपर्क में आने पर उनसे निरंतर विद्युत प्रवाह होता है। इस सिद्धांत पर उन्होंने जिंक और कॉपर की चकतियों को नमक पानी में भिगोए कार्डबोर्ड से अलग करके एक स्टैक बनाया। इसे उन्होंने नाम दिया Voltaic Pile। यह था पृथ्वी का पहला रासायनिक बैटरी। इस बैटरी से पहली बार मनुष्य को निरंतर विद्युत प्रवाह (Direct Current – DC) मिला। इस बैटरी के दो सिरों पर तार जोड़कर एक बंद पथ (Closed Loop) बनता था — यह वास्तव में पहला विद्युत सर्किट (Electric Circuit) था। इस आविष्कार के बाद विश्व के अन्य वैज्ञानिकों ने विद्युत पर प्रयोग शुरू किए। वोल्टा के नाम पर वोल्ट (Volt) नामक इकाई आज भी प्रयोग होती है।

वोल्टा की बैटरी उद्भावन के बाद कई वैज्ञानिक विद्युत के गुण समझने लगे। 1820 ईसवी में डेनमार्क के भौतिक विज्ञानी Hans Christian Ørsted ने एक ऐतिहासिक प्रयोग किया। उन्होंने देखा कि तार में विद्युत प्रवाह होने पर पास रखी कंपास की सुई हिल जाती है। अर्थात विद्युत प्रवाह चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) उत्पन्न करता था। इस आविष्कार ने विद्युत और चुंबकत्व के अविच्छेद्य संबंध को पहली बार प्रमाणित किया। इसे आधार बनाकर फ्रांसीसी वैज्ञानिक André-Marie Ampère ने विद्युत प्रवाह और चुंबकीय शक्ति के गणितीय संबंध समझाए। उनके नाम पर आज विद्युत प्रवाह की इकाई को एम्पियर या Ampere कहा जाता है।

इस समय इंग्लैंड के Michael Faraday ने सबसे महत्वपूर्ण आविष्कार किया। 1831 ईसवी में उन्होंने दिखाया कि चुंबक को तार की कुंडली में घुमाने या कुंडली को चुंबक के सामने घुमाने पर तार में विद्युत प्रवाह उत्पन्न होता है। इसे उन्होंने नाम दिया विद्युत-चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction)। इस सिद्धांत पर आज के विद्युत जेनरेटर, मोटर, ट्रांसफॉर्मर सब काम करते हैं। इस समय सर्किट अत्यंत साधारण था — केवल तार, बैटरी और कुछ धातु के टुकड़े ही इसके विशेष अंग थे। सब हाथ से जोड़े जाते थे और इसे Point-to-point wiring कहा जाता है। यह अत्यंत धीमा, असुविधाजनक और गलतीपूर्ण था। एक छोटा यंत्र बनाने में भी कई दिन लग जाते थे।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में थॉमस अल्वा एडिसन और निकोला टेस्ला के बीच प्रसिद्ध “War of Currents” चली। एडिसन DC विद्युत का समर्थन करते थे जबकि टेस्ला और जॉर्ज वेस्टिंगहाउस AC (Alternating Current) की दिशा में कार्य करते थे। अंत में AC राष्ट्रीय विद्युत जीत गई क्योंकि इसे ट्रांसफॉर्मर से उच्च वोल्टेज में दूर दूर तक भेजकर फिर कम वोल्टेज में बदलकर घर घर पहुंचाया जा सकता था। इस समय भी सर्किट हाथ से बनते थे। रेडियो, टेलीफोन, टेलीग्राफ जैसे यंत्रों में सैकड़ों तारों का समूह जोड़ा जाता था। यह अत्यंत महंगा और समयसापेक्ष था।

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में प्रिंटेड सर्किट की धारणा धीरे धीरे जन्म लेने लगी। 1903-1904 के बीच जर्मनी के इंजीनियर Albert Hanson ने एक पेटेंट दर्ज किया जिसमें उन्होंने फ्लैट धातु तारों को पैराफिन पेपर पर लगाकर इंसुलेटिंग बोर्ड में रखने का प्रस्ताव दिया। यह आज के PCB का अति साधारण रूप था। इसी तरह 1925 में अमेरिका के Charles Ducas ने पेटेंट लिया जिसमें उन्होंने स्टेंसिल से इंक में कंडक्टिव पाउडर लगाकर सर्किट प्रिंट करने की प्रक्रिया वर्णन की। लेकिन ये सभी धारणाएं केवल कागज पर ही रह गईं।

वास्तविक परिवर्तन लाए ऑस्ट्रिया में जन्मे यहूदी इंजीनियर Paul Eisler। 1936 ईसवी में लंदन में रहते हुए उन्होंने एक रेडियो सेट के अंदर असंख्य तार देखकर सोचा कि इसे कैसे संक्षिप्त किया जा सकता है। उन्होंने कॉपर फॉयल को बेकेलाइट या ग्लास बेस पर लगाकर अनावश्यक हिस्से को Etching प्रक्रिया से हटाकर केवल Conductive Track रखा। यह था पहला आधुनिक प्रिंटेड सर्किट बोर्ड। लेकिन उनके इस आविष्कार को उस समय किसी ने महत्व नहीं दिया। उन्होंने कई कंपनियों को दिखाया फिर भी कोई स्वीकार नहीं किया। अंत में दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो गया।

1940 से 1942 के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका के वैज्ञानिक और सेना एक गुप्त प्रौद्योगिकी बना रहे थे जो आर्टिलरी गोले में लगाई जाती थी और दुश्मन विमान निकट आने पर गोला स्वतः फट जाता था और इसे कहा जाता था Proximity Fuze या VT Fuze या Variable Time Fuze। यह मुख्यतः विमान विरोधी आर्टिलरी के लिए डिजाइन थी जो नौसेना के जहाजों को कामिकाजे हमलों से बचाती थी और बाद में जर्मनी के V-1 रॉकेट और स्थल युद्ध में भी प्रयोग हुई।

लेकिन इस यंत्र के अंदर वैक्यूम ट्यूब थी और हजारों तार जोड़े जाते थे। लेकिन वह गोला विशेष आघात प्राप्त होने पर उसके अंदर के तार टूट जाते थे। इसलिए अमेरिकी सेना से जुड़े वैज्ञानिकों ने पॉल ऐसलर के पेटेंट देखकर उनकी प्रक्रिया को संशोधित करके एक कठोर बोर्ड पर कॉपर फॉयल लगाकर एचिंग करके सर्किट बनाया। यह यंत्र 1943 से प्रयोग में आया और युद्ध में विपुल सफलता दी। युद्ध के बाद अमेरिका सरकार ने 1948 में इस प्रौद्योगिकी को साधारण लोगों के लिए मुक्त कर दिया। इसके बाद जापान और अमेरिका की कंपनियां व्यापक सर्किट उत्पादन शुरू करने लगीं।

1950 के दशक में एक और बड़ा वैज्ञानिक सिद्धि मिली और वह था ट्रांजिस्टर का आविष्कार। 1947 दिसंबर 23 तारीख को बेल लेबोरेटरीज में जॉन बार्डीन, वाल्टर ब्रैटेन और विलियम शॉकली ने जर्मेनियम क्रिस्टल पर गोल्ड फॉयल लगाकर पहला पॉइंट कॉन्टैक्ट ट्रांजिस्टर बनाया।

यह वैक्यूम ट्यूब से हजार गुना छोटा था और कम शक्ति खर्च करता था तथा अधिक विश्वसनीय था। 1954 में टेक्सास इंस्ट्रुमेंट्स कंपनी ने पहला सिलिकन ट्रांजिस्टर का व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया। ट्रांजिस्टर और PCB के मिश्रण से इलेक्ट्रॉनिक्स जगत में विशेष परिवर्तन दिखा। फलतः एक छोटे PCB पर सैकड़ों ट्रांजिस्टर लगाकर रेडियो, टेलीविजन, कैलकुलेटर बनने लगे।

इस वैज्ञानिक क्रांति को और एक स्तर पर ले गए Jack Kilby और Robert Noyce। 1958 में किल्बी ने टेक्सास इंस्ट्रुमेंट्स में एक जर्मेनियम चिप पर ट्रांजिस्टर, रेसिस्टर और कैपेसिटर एक साथ बनाया। इसे उन्होंने नाम दिया Integrated Circuit (IC)। 1959 में रॉबर्ट नॉयस ने फेयरचाइल्ड कंपनी में सिलिकन पर प्लानार प्रक्रिया (Planar Process) का आविष्कार किया जिसके अनुकरण में आज सभी IC बनते हैं। इन दो आविष्कारों के फलस्वरूप माइक्रोचिप युग शुरू हो गया। 1960 के दशक में पहला व्यावसायिक IC बाजार में आया। एक छोटी चिप के अंदर सैकड़ों ट्रांजिस्टर रखना संभव हो गया।

1965 ईसवी में इंटेल के सह-संस्थापक Gordon Moore ने अपना नियम Moore's Law घोषित किया — इस नियम में कहा गया था कि हर 18-24 महीने में एक चिप में रखे जा सकने वाले ट्रांजिस्टर की संख्या दोगुनी हो जाती है। यह नियम आज तक लगभग सही रहा है। 1971 में इंटेल ने 4004 माइक्रोप्रोसेसर जारी किया जिसमें 2300 ट्रांजिस्टर थे। आज एप्पल के M2 अल्ट्रा चिप में 134 बिलियन (13,400 करोड़) ट्रांजिस्टर हैं।

आज का PCB अत्यंत जटिल है। एक आधुनिक मदरबोर्ड में 16-24 लेयर होती हैं, Microvia, HDI (High Density Interconnect), फ्लेक्सिबल PCB, रिजिड-फ्लेक्स PCB जैसे कई प्रकार हैं। यह एयरबस विमान, मंगल यान, कृत्रिम हृदय पंप से लेकर आपके जेब में मौजूद स्मार्टफोन तक सबमें है। इसका विकास केवल वैज्ञानिकों का नहीं, युद्ध, अर्थनीति, राजनीति और मानव जिज्ञासा का मिश्रण है। थेलस के एम्बर रगड़ने से शुरू होकर आज के नैनोमीटर प्रक्रिया (3nm, 2nm) तक यह यात्रा मानव सभ्यता का सबसे अविश्वसनीय अध्याय है। यह हरा बोर्ड आज हमारे जीवन का अविच्छेद्य अंग है। इसके बिना आधुनिक सभ्यता की कल्पना करना असंभव है। 

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तथ्य सूची :—

१. "Crystal Fire: The Invention of the Transistor and the Birth of the Information Age" by Michael Riordan and Lillian Hoddeson.

२. "The Chip: How Two Americans Invented the Microchip and Launched a Revolution" by T.R. Reid.

३. "Empires of Light: Edison, Tesla, Westinghouse, and the Race to Electrify the World" by Jill Jonnes.

४. "Benjamin Franklin: An American Life" by Walter Isaacson.

५. "Much Ado About Almost Nothing: Man's Encounter with the Electron" by Hans Camenzind.
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बुधवार, 19 नवंबर 2025

मानव जाति की उत्पत्ति कैसे हुई?

मानव जाति की उत्पत्ति के बारे में वैज्ञानिक चिंतन प्राचीन काल से शुरू होकर धीरे-धीरे विकसित हुआ है। सबसे पहले मनुष्य के मन में अपनी जाति की सृष्टि कैसे हुई—यह प्रश्न उभरा। उस समय के विद्वानों ने अपने-अपने ज्ञान के बल पर इसके कारण प्रस्तुत किए। इसी कारण विश्व की विभिन्न संस्कृतियों में मानव जाति की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग पौराणिक कथाएँ सुनने को मिलीं। प्राचीन समय में ये धार्मिक सृष्टिवाद पर आधारित थीं और मनुष्य दैवीय कार्यों के कारण सृजित हुए—ऐसा विश्वास किया जाता था।  

प्राचीन चीन की पौराणिक कथा के अनुसार विश्व में सबसे पहले एक अंडा था। उस अंडे के अंदर पहला देवता पांगु (Pangu) धीरे-धीरे जागृत हुए। उन्होंने अपने हाथ के कुल्हाड़े से अंडा तोड़कर आकाश और पृथ्वी को अलग कर दिया। हल्का भाग ऊपर उठकर आकाश बना, भारी भाग नीचे रहकर पृथ्वी बना। पांगु ने हजारों वर्षों तक आकाश को ऊपर धकेलकर रखा, जिससे विश्व बढ़ने लगा। अंत में पांगु की मृत्यु हो गई। उनके शरीर का आश्चर्यजनक रूपांतरण हुआ—उनका श्वास वायु और मेघ बना, गर्जना से वज्रपात उत्पन्न हुआ, बायाँ नेत्र सूर्य और दायाँ नेत्र चंद्रमा बना। शरीर के अंग पर्वत बन गए, रक्त नदियों-समुद्रों में बदल गया, मांसपेशियाँ मिट्टी बनीं, बाल वृक्ष-लताएँ बने, हड्डियाँ खनिज और धातु बनीं, यहाँ तक कि उनका पसीना वर्षा और ओस बन गया। लेकिन उस समय पृथ्वी पर कोई मनुष्य नहीं था। तब देवी नूवा (Nuwa) प्रकट हुईं। वे आधी मानव और आधी सर्प शरीर वाली सुंदर देवी थीं। हुआंग हे (Yellow River) नदी के किनारे घूमते हुए अपनी परछाई देखकर उन्हें अकेलापन महसूस हुआ। उन्होंने नदी की मिट्टी लेकर मनुष्य गढ़ने का निश्चय किया। पहले उन्होंने हाथ से धनी और शक्तिशाली लोगों को गढ़ा। बाद में जब मनुष्यों की संख्या बढ़ने लगी तो एक रस्सी को कीचड़ में डुबोकर छींटे मारकर साधारण लोगों को बनाया। चीनी पुराण के अनुसार इसी प्रकार मानव जाति की सृष्टि हुई और नूवा मानवजाति की माता के रूप में पूजित हुईं।  

प्राचीन मिस्र की पौराणिक कथा में मानव जाति की उत्पत्ति की अलग कहानी है। नील नदी के किनारे देवता ख्नूम (Khnum) राज्य करते थे। उनका सिर भेड़ के सींग वाला था, शरीर मानव का और हाथ में कुम्हार का चक्र था। ख्नूम नदी के कीचड़ से मनुष्य गढ़ते थे। प्रत्येक मनुष्य का शरीर और आत्मा एक साथ सृजित होता था। उनकी साँस से जीवन प्रवेश करता था। पहले वे शरीर की आकृति बनाते, फिर मंत्र पढ़कर आत्मा का संचार करते। वे राजा से लेकर साधारण किसान तक सभी को गढ़ते थे—राजाओं के लिए सुंदर और शक्तिशाली शरीर, सैनिकों के लिए बलिष्ठ देह, किसानों के लिए कठोर परिश्रमी शरीर। प्रत्येक मनुष्य का भाग्य और आयु भी ख्नूम निर्धारित करते थे। उनके साथ देवी हेकेत (Heket) थीं, जो निर्जीव शरीर में जीवन का अंकुर देती थीं और गर्भवती महिलाओं के पास रहकर सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित करती थीं। एलिफैंटाइन द्वीप के मंदिर में ख्नूम की पूजा होती थी। वे नदी की वार्षिक बाढ़ को नियंत्रित करते थे, जिससे भूमि उर्वर होती थी। इसलिए ख्नूम सृष्टिकर्ता, जीवनदाता और उर्वरता के देवता कहलाते थे। मिस्री विश्वास करते थे कि प्रत्येक मनुष्य ख्नूम के कुम्हार चक्र से जन्म लेता है और मृत्यु के बाद वहीं लौटता है।  

प्राचीन ग्रीस की पौराणिक कथा के अनुसार टाइटन प्रोमेथियस (Prometheus) ने मनुष्यों को सृजित किया। एक दिन पर्वत शिखर पर खड़े होकर उन्होंने देखा कि देवताओं ने पृथ्वी को खाली छोड़ रखा है। उन्होंने नदी किनारे की मिट्टी और जल लेकर मनुष्यों की आकृतियाँ गढ़ीं—सिर, हाथ, पैर आदि। प्रोमेथियस ने मनुष्यों को देवताओं की प्रतिमूर्ति में बनाया, लेकिन वे जीवित नहीं हुए।  

प्रोमेथियस स्वर्ग जाकर ओलिंपस से आग चुराकर लाए और मिट्टी के पुतलों के वक्ष में छुआ। आग की लौ निर्जीव हृदय में प्रवेश कर आत्मा जागृत कर गई। मिट्टी के पुतले साँस लेने लगे, आँखें खोलीं और खड़े हो गए। इस प्रकार मानवजाति का जन्म हुआ।  

यह देखकर ज़ीउस क्रोधित हुए और प्रोमेथियस को काकेशस पर्वत पर बेड़ियों से जकड़ दिया। रोज़ एक गिद्ध आकर उनका कलेजा खाता था, जो रात में फिर बढ़ जाता था। यह अनंत यातना थी। फिर भी प्रोमेथियस ने आग देकर मनुष्य को सभ्यता का मार्ग दिखाया—खाना पकाना, गर्मी, धातु गलाकर औज़ार बनाना आदि सिखाया। वे मानव के मित्र और ज्ञानदाता कहलाए। अंत में हेराक्लीज़ ने उन्हें मुक्त किया। यह कथा मानव सृष्टि, आग के महत्व और देवताओं के अन्याय के विरुद्ध विद्रोह का प्रतीक है।  

ग्रीक कथा में ही आगे बताया गया है कि प्रोमेथियस द्वारा सृजित पहली मानवजाति धीरे-धीरे अहंकारी और दुराचारी हो गई। उन्होंने देवताओं की अवहेलना की, बलि में मांस छिपाकर हड्डियाँ चढ़ाईं और हिंसा से पृथ्वी को रक्तरंजित कर दिया। ज़ीउस ने उन्हें पूरी तरह नष्ट करने का निर्णय लिया। आकाश काले बादलों से ढक गया, वज्रपात हुआ, समुद्र उफन पड़ा। महाप्रलय आया—नदियाँ उफनाईं, समुद्र ने स्थल को निगल लिया, गाँव-शहर डूब गए। केवल प्रोमेथियस के पुत्र धर्मपरायण ड्यूकालियन और उनकी पत्नी पाइरा बच गए। पिता की सलाह पर उन्होंने लकड़ी का एक बड़ा संदूक बनाया था और नौ दिन-रात तूफान में तैरते हुए पार्नासस पर्वत पर पहुँचे।  

जल घटने के बाद वे अकेले रह गए। देवी थेमिस के मंदिर में प्रार्थना की तो आकाश से आवाज़ आई—“अपनी माँ की हड्डियाँ पीछे की ओर फेंको।” पहले वे भयभीत हुए, फिर समझ गए कि “माँ” अर्थात् धरती माता और “हड्डी” अर्थात् पत्थर। उन्होंने मुँह ढँककर पत्थर फेंके। ड्यूकालियन के पत्थर पुरुष बने, पाइरा के पत्थर स्त्री बने। यह नई मानवजाति पत्थर की कठोरता और धैर्य लेकर जन्मी। ये पहले मानवों से अधिक कठोर और सहनशील थे। इस प्रकार महाप्रलय के बाद पृथ्वी फिर जीवंत हुई। ड्यूकालियन और पाइरा मानव सभ्यता के नए माता-पिता कहलाए।  
  
माया सभ्यता के लिखित पुराण ग्रंथ पॉपोल वुह के अनुसार प्राचीन काल में केवल शांत समुद्र और आकाश था। तेपेउ, गुक्मात्स, हुराकान जैसे देवता थे। उन्होंने सबसे पहले प्रकाश, पर्वत, जंगल, पशु-पक्षी बनाए। लेकिन पशु बोल नहीं सकते थे और देवताओं की स्तुति नहीं कर सकते थे। देवताओं ने पहले मिट्टी से मनुष्य बनाए, पर वे नरम थे, टूट जाते थे, बोल नहीं सकते थे और पानी में घुल जाते थे। देवताओं ने उन्हें नष्ट कर दिया; उनके अवशेष से कीड़े बने।  

फिर लकड़ी से मनुष्य बनाए। वे चलते-हँसते थे, घर बनाते थे, पर उनमें हृदय-मन नहीं था; देवताओं को भूलकर पशु मारते, वृक्ष काटते और प्रकृति नष्ट करते थे। हुराकान ने क्रोधित होकर तूफान, रक्त-वर्षा, बाढ़ और आग से उन्हें नष्ट कर दिया। बचे हुए लकड़ी के मनुष्य बंदर बन गए।  

अंत में देवताओं ने सफेद और पीले मक्के से चार पुरुष बनाए—बालम कित्से, बालम आकाब, माहुकुताह और इकि बालम। वे बुद्धिमान थे, सब कुछ देखते थे और देवताओं की स्तुति गाते थे। देवता डर गए कि कहीं मनुष्य उनसे भी श्रेष्ठ न हो जाएँ। हुराकान ने उनकी दृष्टि और ज्ञान सीमित कर दिया। उन्हें पत्नियाँ मिलीं, संतान हुई और माया सभ्यता बनी। मक्के से बने होने के कारण माया लोग मक्के को देवता मानकर पूजते थे।  

इंका सभ्यता में मानव सृष्टि की अलग कहानी है। प्राचीन काल में सूर्य, चंद्रमा और तारे नहीं थे, संसार अंधेरे में डूबा था। पवित्र टिटिकाका झील के गहरे जल से सृष्टिकर्ता देव वीराकोचा प्रकट हुए। उनकी एक उँगली हिलाने से झील के एक द्वीप से सूर्य उदय हुआ, फिर चंद्रमा और तारे बने। भूमि, पर्वत, नदियाँ और जंगल बनाकर उन्होंने पहले पत्थरों से विशाल पत्थर-मानव बनाए। लेकिन वे बहुत बड़े, जंगी और विनाशकारी थे। वीराकोचा ने उन्हें फिर पत्थर में बदल दिया (जो आज प्राचीन पत्थर मूर्तियों के रूप में दिखते हैं)। फिर वे तियाहुआनाको पहुँचे और मिट्टी में अपना रक्त मिलाकर छोटे मनुष्य गढ़े। हर समूह के लिए पत्थर से बने नेता और गर्भवती स्त्रियाँ दीं। उन्हें जीवित कर कृषि, नियम और पूजा-विधि सिखाई। कुछ समूहों को पूर्व, कुछ को उत्तर भेजकर पृथ्वी को अपनी संतानों से भरने का आदेश दिया। जो अवज्ञा करते, उन्हें पत्थर बना देते। अंत में वीराकोचा पुनः आगमन का वचन देकर प्रशांत महासागर पार करके चले गए।  

अब्राहमिक समुदायों में सबसे प्राचीन यहूदी परंपरा है। तोराह के बेरेशित (Genesis) के अनुसार ईश्वर ने छह दिन में विश्व की सृष्टि की। पहले प्रकाश, आकाश, पृथ्वी, वनस्पति और जीव-जंतु बने। छठे दिन ईश्वर ने मनुष्य को सृजित किया। पहले आदम को पृथ्वी की धूल से गढ़ा और उनके नथुनों में जीवन की साँस फूँकी। उन्हें एडेन उद्यान में रखा और सभी वृक्षों के फल खाने की अनुमति दी, पर भले-बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल निषेध किया। आदम अकेले थे, इसलिए ईश्वर ने उनकी पसली से हव्वा (Eve) को बनाया। सर्प रूपी लूसिफर (शैतान) के प्रलोभन में हव्वा ने निषिद्ध फल खाया और आदम को भी खिलाया। इसके बाद उन्हें अपनी नग्नता का ज्ञान हुआ। ईश्वर ने उन्हें उद्यान से निष्कासित किया, आदम को भूमि जोतने और हव्वा को प्रसव-पीड़ा का शाप दिया। यह कथा ईश्वर और मनुष्य के संबंध, अवज्ञा और पाप की उत्पत्ति बताती है। यहूदी, ईसाई और इस्लाम में आदम-हव्वा की यह सृष्टि कथा मूल रूप से समान है।  

भारतीय पुराणों के अनुसार सृष्टि के आरंभ में केवल अनंत शून्य था, जिसे “असत्” या “तमस्” कहा जाता है। उस शून्य से विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हुए प्रकट हुए। उनके नाभि से एक विशाल पद्म निकला और उसमें से ब्रह्मा स्वयंभू रूप में जन्मे। ब्रह्मा ने सबसे पहले अपने मन से दस प्रजापतियों को सृजित किया—मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष और नारद। इनमें से सात (सप्तर्षि) आकाश के सात तारों के रूप में स्थापित हुए।  

सृष्टि बढ़ाने के लिए ब्रह्मा ने पहले चार कुमार (सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार) बनाए, जो सदा बाल-ब्रह्मचारी रहे। क्रोध आने पर उनकी भृकुटि से रुद्र (शिव) प्रकट हुए, जिन्हें बाद में एकादश रुद्र बनाया गया। फिर दक्ष आदि प्रजापतियों ने सृष्टि का कार्य संभाला।  

दक्ष ने पहले हजारों पुत्र बनाए, पर नारद के प्रभाव से वे मोक्ष चले गए। फिर साठ हजार पुत्र बनाए, जो समुद्र में डूबकर मोक्ष प्राप्त कर गए। इसके बाद दक्ष ने अपनी इच्छा-शक्ति से एक कन्या अष्टावक्रा (या वीरिणी/असिक्नी) उत्पन्न की, जिससे साठ कन्याएँ हुईं। इन कन्याओं का विवाह विभिन्न ऋषियों-देवताओं से कर सृष्टि बढ़ाई गई।  

सबसे महत्वपूर्ण 13 कन्याएँ कश्यप (मरीचि-पुत्र) से ब्याही गईं—अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इला, कद्रू, विश्वा और मुनी। कश्यप को “प्रजापति” कहा जाता है क्योंकि उनसे देव, असुर, मानव, पशु-पक्षी सभी उत्पन्न हुए।  

- अदिति से आदित्य (12 देवता)  
- दिति से दैत्य  
- दनु से दानव  
- कद्रू से नाग  
- विनता से गरुड़ और अरुण  
- सुरभि से गाय  
- ताम्रा से पक्षी आदि  

मानव जाति की सीधी धारा अदिति-पुत्र विवस्वान (सूर्य) से शुरू हुई। विवस्वान की पत्नी संज्ञा से यम, यमी और वैवस्वत मनु जन्मे। वैवस्वत मनु सातवें मनु हैं और महाप्रलय के बाद मानवजाति के पुनर्स्थापक हैं।  

महाप्रलय में समस्त पृथ्वी जलमग्न हो गई। विष्णु मत्स्य रूप में प्रकट होकर सत्यव्रत (वैवस्वत मनु) को सावधान किया। मनु ने सप्तऋषियों के साथ एक विशाल नौका बनाई, जिसमें सभी बीज, औषधियाँ, पशु-पक्षी और वेद सुरक्षित थे। मत्स्य ने नौका को अपने सींग से बाँधकर प्रलय के जल में तैराया और अंत में हिमालय के मालिनी शिखर पर पहुँचाया।  
प्रलय के बाद मनु ने यज्ञ किया। उस यज्ञ से इला (या इडा) नामक कन्या उत्पन्न हुई। मनु-श्रद्धा के दस संतान हुए—नौ पुत्र (इक्ष्वाकु आदि) और कन्या इला। इक्ष्वाकु से सूर्यवंश (राम तक) और इला-बुध से पुरुरवा के द्वारा चंद्रवंश (कृष्ण, पांडव-कौरव तक) चला।  

इक्ष्वाकु अयोध्या के पहले राजा और सूर्यवंश के संस्थापक बने। उनके वंश में मांधाता, हरिश्चंद्र, सगर, भगीरथ, दिलीप, रघु, दशरथ, राम आदि हुए। चंद्रवंश में पुरुरवा → ययाति → यदु (यादव-कृष्ण) और पुरु → भरत (जिसके नाम पर भारतवर्ष) → कुरु → शांतनु → पांडव-कौरव।  

वैवस्वत मनु को वर्तमान कलियुग के मनुष्यों का आदि पिता माना जाता है। उन्होंने मनुस्मृति के द्वारा वर्णाश्रम, राजधर्म, विवाह और दंड-विधान की स्थापना की।  

इस प्रकार भारतीय पुराणों में ब्रह्मा → मानस पुत्र → दक्ष की कन्याएँ → कश्यप → विवस्वान → वैवस्वत मनु → महाप्रलय-पश्चात् पुनर्सृष्टि → सूर्यवंश और चंद्रवंश—इस क्रम में मानव जाति की उत्पत्ति और विस्तार बताया गया है। यह केवल मानव उत्पत्ति की कथा नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि को एक विशाल पारिवारिक वृक्ष में बदल देती है, जिसमें देवता, असुर, मानव, पशु-पक्षी सभी एक ही मूल से उत्पन्न हैं—यह अद्वैत और एकता का प्रतीक है।  
(भाग—२ में हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आधुनिक खोजों पर चर्चा करेंगे।)
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तथ्य स्रोत : 
1."Chinese Mythology" by Anne Birrell
2. "The Complete Gods and Goddesses of Ancient Egypt" by Richard H. Wilkinson
3."Mythologiae" by Hesiod (translated by Hugh G. Evelyn-White); "Theogony" by Hesiod
4."Popol Vuh: The Definitive Edition of the Mayan Book of the Dawn of Life" translated by Dennis Tedlock
5."Inca Religion and Customs" by Bernabé Cobo; "History of the Inca Empire" by Father Bernabé Cobo
6. "The Bible: Genesis" (Old Testament); "The Torah: A Modern Commentary" by W. Gunther Plaut
7. "Vishnu Purana" translated by Horace Hayman Wilson
8. "Matsya Purana" translated by a B.I. Series
9. "Bhagavata Purana" translated by Bibek Debroy
10. "Manu Smriti" translated by G. Buhler
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बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

"Le Voyageur Imprudent" उपन्यास कि काहानी

द्वितीय विश्व युद्ध के समय फ्रांस के एक छोटे शहर में पियरे नामक एक युवक रहता था। पियरे बहुत चतुर और जिज्ञासु था। वह हमेशा विज्ञान और अज्ञात रहस्यों के बारे में सोचता रहता था। उसका एक वैज्ञानिक साथी था, डॉक्टर मैथ्यू। मैथ्यू एक अज्ञात शोध में लगा हुआ था, जो समय यात्रा का एक मशीन तैयार करने का था। मैथ्यू ने एक अज्ञात रसायन की खोज की थी, जो मनुष्य को समय में आगे-पीछे यात्रा करा सकता था। इस रसायन का नाम था "नोएलिट"।

पियरे मैथ्यू के साथ उनके लेबोरेटरी में काम करता था। मैथ्यू ने उसे नोएलिट के बारे में बताया। यह एक ऐसा पदार्थ था, जिसे शरीर में इंजेक्ट करने पर मनुष्य समय में यात्रा कर सकता था। लेकिन यह अत्यंत खतरनाक था, क्योंकि इसके प्रभाव कितने समय तक रहेंगे या यह कैसे काम करेगा, यह पूरी तरह से ज्ञात नहीं था। पियरे इस आविष्कार से विशेष रूप से उत्साहित हो गया। उसने सोचा, "अगर मैं अतीत में जा सकूं, तो मैं इतिहास को अपनी आंखों से देख सकूंगा।"

लेकिन मैथ्यू ने पियरे को चेतावनी दी, "पियरे, समय यात्रा कोई खेल नहीं है। अतीत में कुछ बदल दिया तो भविष्य पूरी तरह बदल सकता है।" लेकिन पियरे की जिज्ञासा उसे रोक नहीं सकी। उसने नोएलिट का उपयोग करके अतीत में जाने का निश्चय कर लिया।

पियरे ने नोएलिट का एक छोटा डोज लिया और मन ही मन एक समय सोचा—18वीं शताब्दी, जब फ्रांसीसी क्रांति शुरू ही होने वाली थी। वह खुद को एक पुराने शहर में पा गया, जहां लोग अज्ञात वस्त्र पहने घोड़ागाड़ियों में आ-जा रहे थे। पियरे बहुत आश्चर्यचकित हुआ। उसने चारों ओर देखा और लोगों से बात करने की कोशिश की। लेकिन थोड़े ही समय में उसे समझ आ गया कि उसकी आधुनिक बातें और वस्त्र लोगों को अजीब लग रहे हैं।

वह एक छोटे गांव में पहुंचा, जहां उसे एक युवक से मुलाकात हुई, जिसका नाम था जीन। जीन उसके पूर्वज थे—यानी पियरे के परदादा। जीन एक साधारण किसान था, लेकिन बहुत उदार। पियरे ने जीन के साथ कुछ समय बिताया और उसके जीवन के बारे में जाना। जीन ने उसे बताया कि वह एक महिला से विवाह करना चाहता है, लेकिन गांव का जमींदार कई असुविधाएं पैदा कर रहा है।

पियरे ने सोचा, "अगर मैं जीन की सहायता करूं, तो मेरे परिवार का भाग्य बदल सकता है।" उसने जमींदार के विरुद्ध जीन की सहायता करने का निश्चय किया। लेकिन इस सहायता के लिए उसने एक खतरनाक योजना बनाई। उसने जमींदार के घर में चोरी करने की योजना बनाई, जो जीन को आर्थिक सहायता दे सकती थी।

पियरे की योजना सफल हुई, लेकिन इसका परिणाम भयानक हुआ। जमींदार के घर में चोरी होने के बाद गांव में एक बड़ा विवाद हो गया। अंत में जीन पर शक गया और उसे पकड़कर सजा दे दी गई। पियरे समझ गया कि उसके हस्तक्षेप ने जीन के जीवन को और खराब कर दिया। उसने मन ही मन सोचा, "मैंने अतीत को बदलने की कोशिश की, लेकिन इससे और बुरा हो गया।"

पियरे ने एक और नोएलिट डोज लिया और फिर अतीत में यात्रा की, जहां वह जीन को बचाने की कोशिश करे। इस बार वह और पीछे चला गया—17वीं शताब्दी। यहां उसे जीन के पूर्वज से मुलाकात हुई, जिसका नाम था फ्रांस्वा। फ्रांस्वा जीन के पिता थे। पियरे ने सोचा, "अगर मैं फ्रांस्वा को कुछ कर दूं, तो जीन का जन्म ही न होगा, और उसके कारण होने वाली समस्याएं भी मिट जाएंगी।"

पियरे ने एक खतरनाक निश्चय लिया। उसने फ्रांस्वा को मारने की योजना बनाई, जो जीन के जन्म को रोक देगी। लेकिन जब वह फ्रांस्वा को मारने की कोशिश करने लगा, तो उसके मन में एक अज्ञात भय जागा। उसने सोचा, "अगर मैं फ्रांस्वा को मार दूंगा, तो जीन का जन्म नहीं होगा। जीन का जन्म न होने पर मेरे परिवार का कोई जन्म नहीं होगा। और मैं खुद भी जन्म न लूंगा। तो मैं यहां कैसे आया?"

यह चिंता उसके मन को उलझा देती। वह समझ गया कि अतीत में कुछ बदलने से एक अज्ञात चक्र बन जाता है, जो उसके अपने अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगा देता है। इसे ग्रैंडफादर पैराडॉक्स कहा जाता है। पियरे अंत में फ्रांस्वा को मारना बंद कर दिया, क्योंकि वह इसके परिणाम से डर गया।

अतीत में बहुत असुविधाएं देखकर पियरे ने निश्चय किया कि वह भविष्य में जाए। उसने नोएलिट का एक और डोज लिया और 3000 ईस्वी में यात्रा की। भविष्य में उसने एक अज्ञात दुनिया देखी, जहां मनुष्य आकाश में उड़ रहे थे, रोबोट सभी काम कर रहे थे और पृथ्वी एक अज्ञात रूप ले चुकी थी। लेकिन इस दुनिया में मनुष्य बहुत एकाकी थे तथा यंत्रों पर पूरी तरह निर्भर थे।

पियरे को एक वैज्ञानिक से मुलाकात हुई, जिसने उसे बताया कि नोएलिट एक खतरनाक आविष्कार था, जो कई समयों में असंगति पैदा कर चुका था। उसने पियरे को चेतावनी दी कि वह जिस समय में है, वह उसके मूल टाइमलाइन का नहीं है। पियरे के अतीत में किए गए परिवर्तन ने एक नया टाइमलाइन बना दिया है।

पियरे समझ गया कि उसने अतीत और भविष्य में कई गलतियां की हैं। वह अपने मूल समय में लौटने की कोशिश करने लगा, लेकिन नोएलिट का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो रहा था। उसने डॉक्टर मैथ्यू से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उसका मूल टाइमलाइन बदल चुका था।

अंत में, पियरे ने एक कठिन निश्चय लिया। उसने नोएलिट का उपयोग बंद कर एक नया जीवन शुरू किया। वह समझ गया कि समय एक जटिल नियम से चलता है, जिसे बदलना मनुष्य के हाथ में नहीं है।

फ्रांसीसी लेखक रेने बार्जावेल ने 1943 में अपनी उपन्यास "ले वॉयाजर इम्प्रूडां" (द इम्प्रूडेंट ट्रैवलर) में यह संक्षिप्त कहानी प्रस्तुत की है। इस उपन्यास का एक टेलीविजन आधारित रूपांतरण (टेलेफिल्म) 1982 ईस्वी में फ्रांस में निर्मित हुआ था तथा पहली बार 1982 में टेलीविजन पर प्रसारित हुआ था।
1982 के टेलीविजन फिल्म (टेलेफिल्म) "ले वॉयाजर इम्प्रूडां" में कहानी को थोड़ा परिवर्तित किया गया था तथा पियरे को द्वितीय विश्वयुद्ध के समय के एक सैनिक के रूप में दर्शाया गया था। यह उपन्यास से एक भिन्न रूपांतरण था, जिसमें कहानी को समसामयिक बनाने के लिए यह परिवर्तन किया गया था। तब ले वॉयाजर इम्प्रूडां उपन्यास की कहानी ग्रैंडफादर पैराडॉक्स संबंधी प्रश्न प्रस्तुत करती है।

ग्रैंडफादर पैराडॉक्स समय यात्रा (टाइम ट्रैवल) संबंधी एक दार्शनिक और वैज्ञानिक पैराडॉक्स (पैराडॉक्स) है। यह एक ऐसी स्थिति को समझाता है जिसमें एक व्यक्ति अतीत में यात्रा करके अपने दादा या नाना (ग्रैंडफादर) को मार देता है। यदि दादा/नाना मर जाते हैं, तो उस व्यक्ति के पिता या मां का जन्म नहीं होगा, और उनके जन्म न होने पर वह स्वयं भी जन्म नहीं लेगा। लेकिन यदि वह जन्म ही न हुआ हो, तो वह अतीत में जाकर दादा या नाना को कैसे मारेगा? यह एक तार्किक चक्र (लॉजिकल लूप) पैदा करता है, जो समय यात्रा की संभावना पर प्रश्न उठाता है।

ग्रैंडफादर पैराडॉक्स सबसे पहले 1931 ईस्वी में नेथनियल शैक्नर नामक एक विज्ञान काल्पनिक लेखक द्वारा अपनी एक काल्पनिक कहानी में प्रस्तुत किया गया था। बाद में रेने बार्जावेल नामक एक फ्रांसीसी लेखक ने 1943 में अपनी उपन्यास "ले वॉयाजर इम्प्रूडां" (द इम्प्रूडेंट ट्रैवलर) में इस पैराडॉक्स को और स्पष्ट रूप से वर्णन किया था। उपर्युक्त कहानी "ले वॉयाजर इम्प्रूडां" की मुख्य कथावस्तु है।

बाद में वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के बीच ग्रैंडफादर पैराडॉक्स एक लोकप्रिय चर्चा का विषय बन गया है।
ग्रैंडफादर पैराडॉक्स के संबंध में दोनों पक्षों के समर्थक और विपक्षी मत हैं। समर्थक कहते हैं कि अतीत में कुछ बदलने से भविष्य में एक असंगति या इनकंसिस्टेंसी पैदा हो जाती है। जैसे, दादा या नाना को मारने से यात्री स्वयं अस्तित्व में रह ही नहीं पाता, जो एक तार्किक असंभवता है। यदि समय एक सरल रेखा में चलता है, तो अतीत में कुछ बदलने से वह पूरे भविष्य को बदल देता है तथा यह पैराडॉक्स पैदा करता है। कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि यह पैराडॉक्स दर्शाता है कि अतीत में यात्रा करना वैज्ञानिक दृष्टिकोण से असंभव है, क्योंकि यह कारण-कार्य नियम या लॉ ऑफ कॉजैलिटी को तोड़ देता है।

अवश्य ही कुछ वैज्ञानिक और दार्शनिक कहते हैं कि अतीत में कुछ बदलने से एक नया समानांतर विश्व या पैरेलल यूनिवर्स पैदा हो जाता है। अर्थात, दादा या नाना को मारने से एक नया टाइमलाइन तैयार हो जाता है, लेकिन मूल टाइमलाइन अपरिवर्तित रहता है। यह पैराडॉक्स को निष्क्रिय कर देता है।

नोविकोव की आत्मसंगति सिद्धांत या नोविकोव्स सेल्फ-कंसिस्टेंसी प्रिंसिपल प्रस्तुत करके रूसी भौतिक वैज्ञानिक इगोर नोविकोव ने प्रस्ताव दिया था कि अतीत में कोई ऐसी घटना घटित नहीं हो सकती जो भविष्य को असंगत बना दे। अर्थात, यदि आप अतीत में जाते हैं, तो आप अपने दादा या नाना को मार ही नहीं पाएंगे, क्योंकि समय के नियम इसे रोक देंगे। कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि क्वांटम मैकेनिक्स के अनुसार समय यात्रा एक अनिश्चित फल (प्रोबेबिलिस्टिक आउटकम) दे सकती है, जिसमें पैराडॉक्स पैदा नहीं होता।

ग्रैंडफादर पैराडॉक्स और समय यात्रा आधारित कई फिल्म निर्मित हो चुके हैं।
समय यात्रा संबंधी सबसे प्रसिद्ध फिल्म है बैक टू द फ्यूचर (1985) तथा इसके तीन भाग रिलीज हो चुके थे। कई फिल्म और वेबसीरीज इस फिल्म की कहानी से प्रभावित होकर बाद में निर्मित हो चुके हैं। इस फिल्म में मार्टी मैकफ्लाई अतीत में जाकर अपने माता-पिता के विवाह को बाधा देने की आशंका पैदा करता है, जो उसके अपने अस्तित्व को खतरे में डाल देता है। यह पैराडॉक्स का एक लोकप्रिय उदाहरण है।
इसी प्रकार समय यात्रा संबंधी द टर्मिनेटर (1984) फिल्म में एक रोबोट अतीत में जाकर जॉन कोनर की मां को मारने की कोशिश करता है, जो जॉन के जन्म को रोक देगा। यह भी पैराडॉक्स का एक रूप है। लूपर (2012) फिल्म में समय यात्रा माध्यम से अपने भविष्य के संस्करण को मारने की कोशिश दिखाई जाती है, जो पैराडॉक्स का एक भिन्न रूप प्रस्तुत करता है। प्रीडेस्टिनेशन (2014) फिल्म समय यात्रा का एक जटिल चक्र दिखाता है जिसमें पैराडॉक्स का समाधान एक आत्मसंगति चक्र (सेल्फ-कंसिस्टेंट लूप) माध्यम से होता है। मार्वल सिनेमैटिक यूनिवर्स के एवेंजर्स: एंडगेम (2019) फिल्म में समय यात्रा को समानांतर विश्व तत्व आधार पर व्याख्या किया गया है जिसमें अतीत में परिवर्तन नया टाइमलाइन पैदा करता है।

ग्रैंडफादर पैराडॉक्स समय यात्रा का एक महत्वपूर्ण दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रश्न है। यह कारण-कार्य नियम, समय की प्रकृति और अस्तित्व पर चर्चा करने को आमंत्रित करता है। समर्थक इसे समय यात्रा की असंभवता का प्रमाण मानते हैं और विपक्षी समानांतर विश्व या आत्मसंगति तत्व माध्यम से इसके समाधान को संभव बताते हैं। यह पैराडॉक्स विज्ञान और काल्पनिक गल्पों में कई आकर्षक फिल्म और चर्चाओं को जन्म दे चुका है।

शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

आचरण कि पहचान

एक बार एक राजा के पास दूर-दूर से लोग नौकरी के लिए आते थे। एक सुबह राजदरबार में एक अनजान व्यक्ति आया, सिर झुकाकर बोला,  
"महाराज ! मैं आपकी सेवा में काम करना चाहता हूँ।"  

राजा ने मुस्कुराकर पूछा, "तुम्हारी विशेष योग्यता क्या है?"  

वह शांत स्वर में बोला, "मैं किसी का चेहरा देखकर बता सकता हूँ कि वह इंसान है या पशु।"  

राजा ठिठक गए और उत्सुक होकर उसे अपने सबसे प्रिय घोड़े की देखभाल का जिम्मा सौंपा।  

कुछ दिन बाद राजा ने पूछा, "मेरे सबसे कीमती घोड़े के बारे में क्या राय है?"  

वह बोला, "महाराज ! घोड़ा दिखने में सुंदर है, पर यह अपनी नस्ल का नहीं है।"  

राजा हैरान हुए और अनुभवी घुड़सवार को बुलाकर पूछा। घुड़सवार ने बताया, "घोड़ा अपनी नस्ल का ही है, पर जन्म के बाद इसकी माँ मर गई थी। इसे गाय के दूध पर पाला गया।"  

राजा ने उस व्यक्ति से पूछा, "तुमने यह कैसे जाना?"  

वह बोला, "महाराज ! यह घोड़ा घास खाते समय गाय की तरह सिर नीचे करता है, जबकि असली घोड़े घास मुँह में लेकर सिर ऊपर करके खाते हैं।"  

राजा उसकी बुद्धिमानी से प्रभावित होकर उसे अनाज, घी, बकरी, मुर्गियाँ आदि पुरस्कार दिए और उसे रानी के महल की जिम्मेदारी सौंपी।  

कुछ दिन बाद राजा ने पूछा, "रानी के महल के बारे में क्या राय है?"  

वह शांत स्वर में बोला, "रानी बहुत शालीन हैं, उनका व्यवहार राजसी है, पर वे जन्म से रानी नहीं हैं।"  

राजा हैरान हुए और रानी की माँ को बुलाकर पूछा। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, "हाँ, यह सच है। तुम्हारे जन्म से पहले हमने अपनी बेटी खो दी थी। इसलिए दूसरी कन्या को अपनी बेटी की तरह पाला।"  

राजा ने उस व्यक्ति से पूछा, "तुमने यह कैसे जाना?"  

वह बोला, "महाराज ! असली राजकन्याएँ अपनी दासियों से सम्मान और सौजन्य से बात करती हैं। पर आपकी रानी दासियों को आदेश मानने वाली मशीन की तरह व्यवहार करती हैं।"  

राजा फिर प्रभावित हुए और उसे अनाज, घी, भेड़, बकरी आदि पुरस्कार दिए, साथ ही दरबार में स्थायी नियुक्ति दी।  

कुछ महीने बाद राजा ने हँसते हुए कहा, "तुमने सबको परख लिया, अब मेरे बारे में बताओ।"  

वह चुप रहा, फिर बोला, "महाराज ! यदि आप वचन दें कि मुझे मृत्युदंड नहीं देंगे, तो बताऊँगा।"  

राजा ने गंभीरता से कहा, "मैं वचन देता हूँ।"  

वह सिर झुकाकर बोला, "आप राजपरिवार के संतान नहीं हैं, और आपके व्यवहार में भी राजसी रक्त नहीं है।"  

राजा का चेहरा गुस्से से लाल हो गया, पर वचन याद आया। वे अपनी माँ के पास गए और पूछा।  

रानी माँ ने गहरी साँस लेकर कहा, "हाँ, यह सच है। हम निःसंतान थे, इसलिए एक पशुपालक के बच्चे को गोद लेकर तुम्हें पाला।"  

राजा ने उस व्यक्ति से पूछा, "तुमने यह कैसे जाना?"  

वह हल्के से मुस्कुराकर बोला, "महाराज ! राजा पुरस्कार में सोना, हीरा, नीलम, मोती देते हैं। पर आप जो पुरस्कार देते हैं—अनाज, घी, बकरी, भेड़—ये पशुपालक का स्वभाव है।"  

थोड़ा रुककर उसने कहा, "महाराज ! इंसान की असली पहचान उसका चेहरा नहीं, उसका व्यवहार है। पद, प्रतिष्ठा या धन कितना भी हो, इंसान को इंसान उसका व्यवहार बनाता है।"


क्या पहले के लोग आजके लोगों से ज्यादा विद्वान हुआ करते थे ?

प्राचीन ग्रीक सभ्यता के समय, लगभग 2300 वर्ष पूर्व, अलेक्जेंड्रिया (वर्तमान मिस्र) में एराटोस्थेनीज़ नामक एक गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे। उन्होंने एक पुस्तक में पढ़ा कि सायनी (वर्तमान लीबिया में स्थित) नामक शहर में 21 जून को दोपहर 12 बजे, यदि एक लकड़ी का खंभा सीधा जमीन में गाड़ा जाए, तो उसकी छाया नहीं पड़ती। अर्थात्, उस दिन सूर्य सायनी में ठीक सिर के ऊपर (या जेनिथ पर) होता है।
इस तथ्य की सत्यता जानने के लिए एराटोस्थेनीज़ ने एक प्रयोग किया। 21 जून को दोपहर 12 बजे उन्होंने अलेक्जेंड्रिया में एक सीधा लकड़ी का खंभा जमीन में गाड़ा और देखा कि उसकी छाया पड़ रही थी। इसका कारण था कि अलेक्जेंड्रिया में उस दिन सूर्य ठीक सिर के ऊपर नहीं था। इस अवलोकन से उन्होंने समझा कि पृथ्वी समतल नहीं, बल्कि गोलाकार है, क्योंकि एक समतल सतह पर एक ही समय में एक स्थान पर छाया न पड़ना और दूसरे स्थान पर छाया पड़ना असंभव है।

इसके बाद, उन्होंने नाविकों की सहायता से अलेक्जेंड्रिया और सायनी के बीच की दूरी मापी, जो लगभग 5,000 स्टेडिया थी। एक स्टेडियम लगभग 157.5 मीटर होता है, अर्थात् कुल दूरी आधुनिक इकाई में लगभग 800 किलोमीटर थी। अलेक्जेंड्रिया में छाया का कोण 7.2 डिग्री था, जबकि सायनी में सूर्य सिर के ऊपर होने के कारण कोण 0 डिग्री था।

एराटोस्थेनीज़ ने गणना की: यदि 7.2 डिग्री एक इकाई है, तो 360 डिग्री के एक वृत्त में 50 इकाइयाँ (360 ÷ 7.2) होंगी। यदि एक इकाई की दूरी 5,000 स्टेडिया है, तो पृथ्वी की परिधि 5,000 × 50 = 2,50,000 स्टेडिया होगी, जो आधुनिक इकाई में लगभग 40,000 किलोमीटर है। यह आधुनिक माप के साथ अत्यंत समान है। यह गणना उनकी गणितीय और अवलोकन क्षमता को प्रमाणित करती है। इसलिए, पृथ्वी की परिधि को सबसे पहले मापने का श्रेय प्राचीन ग्रीक गणितज्ञ और खगोलशास्त्री एराटोस्थेनीज़ को दिया जाता है। आधुनिक माप में पृथ्वी की परिधि 40,075 किमी है, और एराटोस्थेनीज़ की गणना इसके अत्यंत निकट थी। यह उनके समय में एक असाधारण उपलब्धि थी।

लगभग 800 वर्ष बाद, भारतीय खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने अपने ग्रंथ आर्यभटीयम में पृथ्वी को एक गोलाकार वस्तु के रूप में वर्णित किया और इसके गति तथा अन्य ग्रहों के साथ संबंधों पर चर्चा की। उन्होंने पृथ्वी की परिधि की गणना की, जो लगभग 39,968 किलोमीटर थी। यह आधुनिक माप (40,075 किमी) के बहुत निकट थी। शोधकर्ताओं का मानना है कि आर्यभट्ट की गणना स्वतंत्र थी और ग्रीक गणना से प्रभावित नहीं थी।

निश्चित रूप से, एराटोस्थेनीज़ और आर्यभट्ट अपने समय के श्रेष्ठ शोधकर्ता थे, लेकिन मैं देखता हूँ कि आजकल कुछ अति विद्वान लोग उनके और उनके कार्यों का उदाहरण देकर यह मत रखते हैं कि वर्तमान पीढ़ी की तुलना में उस समय के लोग अधिक बुद्धिमान और विद्वान थे। लेकिन यह पूर्णतः सत्य नहीं है।

आज की युवा पीढ़ी की बुद्धिमत्ता और योग्यता की तुलना पूर्व पीढ़ियों से करने पर यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक काल के लोग कई क्षेत्रों में समान या अधिक दक्ष हैं।

फ्लिन प्रभाव (Flynn Effect) इसका समर्थन करता है। न्यूजीलैंड के मनोवैज्ञानिक जेम्स फ्लिन के शोध के अनुसार, 20वीं शताब्दी में औसत मानव IQ में प्रत्येक दशक में लगभग 3 अंक की वृद्धि हुई है। इसके कई कारण हैं। आधुनिक शिक्षा प्रणाली अधिक विस्तृत और सुलभ हो गई है, जिसने युवा पीढ़ी को जटिल समस्याओं के समाधान में दक्ष बनाया है। बेहतर स्वास्थ्य और पोषण ने मानव मस्तिष्क के विकास में सहायता की है। इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों ने युवा पीढ़ी को ज्ञान तक व्यापक पहुँच प्रदान की है, जिससे उनकी बौद्धिक क्षमता बढ़ी है। यह प्रभाव दर्शाता है कि आज की पीढ़ी का औसत IQ पूर्व पीढ़ियों से अधिक है। आज की युवा पीढ़ी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), कोडिंग, डेटा विश्लेषण, और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में अग्रणी है। उदाहरण के लिए, इसरो के चंद्रयान और नासा के मंगल मिशन में युवा वैज्ञानिकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पूर्व पीढ़ी प्राकृतिक अवलोकन और सरल गणित पर निर्भर थी, जबकि आज की युवा पीढ़ी जटिल एल्गोरिदम और सुपरकंप्यूटर का उपयोग कर अधिक सटीक और तेज गणना करती है।

इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म के कारण आज की युवा पीढ़ी के पास विज्ञान, इतिहास, और खगोलविज्ञान से संबंधित सूचनाओं का अपार भंडार है। सोशल मीडिया के माध्यम से युवा पीढ़ी विज्ञान और खगोलविज्ञान से संबंधित चर्चाओं में भाग ले रही है, जो पूर्व पीढ़ी के लिए असंभव था। पूर्व पीढ़ी कृषि, पंचांग, और प्राकृतिक चक्रों से संबंधित समस्याओं का समाधान करती थी। आज की पीढ़ी जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा, और वैश्वीकरण जैसी जटिल समस्याओं का समाधान कर रही है। आधुनिक मनुष्य नवीकरणीय ऊर्जा, बायोटेक्नोलॉजी, और अंतरिक्ष अन्वेषण में नए आविष्कार कर रहे हैं, जो पूर्व पीढ़ियों के समय में अकल्पनीय था। आज के लोग सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण, और वैश्विक समस्याओं के प्रति अधिक जागरूक हैं। वे वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग कर रहे हैं, जो पूर्व पीढ़ी के स्थानीय दृष्टिकोण से भिन्न है।

पूर्व पीढ़ी के मनीषियों ने अपने समय में असाधारण कार्य किए, लेकिन आज की पीढ़ी भी अपने समय की चुनौतियों के अनुसार समान या अधिक दक्षता प्रदर्शित कर रही है। फ्लिन प्रभाव और अन्य वैज्ञानिक शोध दर्शाते हैं कि आज की पीढ़ी का IQ और बौद्धिक क्षमता पूर्व पीढ़ियों से कम नहीं है। वे नई प्रौद्योगिकी, ज्ञान की सुलभता, और वैश्विक सहयोग के माध्यम से कई क्षेत्रों में प्रगति कर रहे हैं। प्राचीन काल में यदि एराटोस्थेनीज़ और आर्यभट्ट थे, तो आधुनिक युग में भी अल्बर्ट आइंस्टीन, वर्नर हाइजेनबर्ग, स्टीफन हॉकिंग, एडवर्ड विटेन, लिसा रैंडल, जेनिफर डाउडना, डेमिस हसाबिस, रोजर पेनरोज, और ग्रेगरी पर्लमैन जैसे अनगिनत विद्वान प्रत्येक क्षेत्र में हुए हैं ।

डेमोक्रिटस, एराटोस्थेनीज़, या आर्यभट्ट के समय में सभी लोग विद्वान नहीं थे, और न ही इस युग में सभी लोग विद्वान हैं। चार अंगुलियाँ कभी समान नहीं होतीं। इसलिए, आज की पीढ़ी को “कम बुद्धिमान” या “अक्षम” कहना अनुचित और आधारहीन है।

वर्तमान पीढ़ी को पूर्व पीढ़ियों से कम बुद्धिमान मानने का दावा मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से कुछ पक्षपातों (biases) और भ्रांत धारणाओं से उत्पन्न होता है। कुछ लोग नॉस्टैल्जिया बायस के कारण अतीत को आदर्श मानते हैं और वर्तमान को कमतर चित्रित करते हैं। ऐसे लोग अतीत की सफलताओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं और वर्तमान की जटिलताओं और प्रगति को अनदेखा करते हैं। इसके साथ ही, “पतनवाद” (declinism) नामक एक मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति भी कुछ लोगों के मन को प्रभावित करती है। पतनवाद से प्रभावित लोग मानते हैं कि समय के साथ समाज या बुद्धिमत्ता में ह्रास हो रहा है। यह दृष्टिकोण अक्सर अपर्याप्त तथ्यों या भ्रांत धारणाओं पर आधारित होता है।

इसके अतिरिक्त, अतिसाधारणीकरण (overgeneralization) और “रूढ़िबद्धता” (stereotyping) जैसे संज्ञानात्मक पक्षपात (cognitive biases) भी इस दावे में परिलक्षित होते हैं। एक संपूर्ण पीढ़ी को बिना प्रमाण के नकारात्मक रूप से चित्रित करना एक सरलीकृत और गलत निष्कर्ष है। 

इसके अलावा, इसे “प्रसंगबद्धता” (framing) के रूप में भी देखा जा सकता है, जहाँ सूचना को एक विशिष्ट दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर पाठकों के मन में नकारात्मक भावना जगाई जाती है। यह अक्सर भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करने या प्रेरणा देने के लिए किया जा सकता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, IQ एक जटिल मापक है जो पर्यावरण, शिक्षा, और सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। फ्लिन प्रभाव दर्शाता है कि आधुनिक युग में औसत IQ में वृद्धि हुई है, जो बेहतर शिक्षा, पोषण, और प्रौद्योगिकी की सुलभता के कारण संभव हुआ है। इसलिए, वर्तमान पीढ़ी को कम बुद्धिमान मानना मिथ्यासूचना पक्षपात (misinformation bias) का एक उदाहरण है, जो तथ्यात्मक रूप से गलत और मनोवैज्ञानिक पक्षपातों से उत्पन्न है।

संक्षेप में, वर्तमान पीढ़ी की बौद्धिक क्षमता को कम आंकना एक अनुचित और भ्रांत धारणा है, जो मनोविज्ञान में नॉस्टैल्जिया, पतनवाद, और रूढ़िबद्धता जैसे पक्षपातों से प्रभावित है। आज की युवा पीढ़ी अपने समय की चुनौतियों का सामना अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और वैश्विक ज्ञान की सहायता से कर रही है। यह पीढ़ी अतीत की सफलताओं का सम्मान करते हुए अपनी स्वतंत्र योगदान को प्रमाणित कर रही है।

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2025

Closed-Mindedness क्या है ? ये कितनी प्रकार कि होती है ?

एक विद्वान ने राजदरबार में तीन खोपड़ी लाकर उनके माध्यम से तार की परीक्षा की। पहले खोपड़ी में तार एक कान से प्रवेश करके दूसरे कान से निकल गया। दूसरे खोपड़ी में तार एक कान से प्रवेश करके मुंह की ओर निकल गया। तीसरे खोपड़ी में तार एक ओर के कान से प्रवेश किया, लेकिन किसी भी रास्ते से बाहर नहीं निकला। विद्वान ने इसका अर्थ समझाने के लिए पंडित मंडली से अनुरोध किया। सभी पंडित असफल होने पर कालिदास ने कहा, "पहला खोपड़ी अधम, दूसरा मध्यम, और तीसरा उत्तम व्यक्ति का है।" राजा ने इसका कारण पूछा। कालिदास ने समझाया: अधम खोपड़ी जिस व्यक्ति का था, वह अपने कान से ज्ञान सुनता था, लेकिन उसे ग्रहण न करके भूल जाता था। मध्यम खोपड़ी जिस व्यक्ति का था, वह ज्ञान सुनता और ग्रहण करता था, लेकिन उसे आत्मसात न करके केवल दूसरों को बता देता और भूल जाता था। उत्तम खोपड़ी जिस व्यक्ति का था, वह ज्ञान ग्रहण करके आत्मसात करता था और जीवन में उसका उपयोग भी करता था।
परंतु मैं कहता हूँ कि कालिदास के युग में उस विद्वान को चौथा प्रकार का खोपड़ी मिला ही नहीं था। इस प्रकार का खोपड़ी उन दिनों बहुत दुर्लभ था और इस तरह के खोपड़ी के कान का छेद ही नहीं होता है। यदि छेद होता, तो खोपड़ी में तार डाला जा सकता था! यह खोपड़ी जिसका है, वह अधम से भी हीन है, क्योंकि वह ज्ञान प्राप्त करने या नई बातें जानने से घृणा करता है। ऐसे व्यक्ति ज्ञान या विज्ञान की बात सुनने को बिल्कुल तैयार नहीं होते, पूरी तरह अज्ञानी और मूर्ख रहते है। आज के समय में ऐसे खोपड़ीवले लोगों कि भरमार है समाज में पर कालिदास के समय यह दुर्लभ हुआ करते थे । 

चौथे प्रकार के खोपड़ीवाले व्यक्ति की मानसिक अवस्था "Closed-Mindedness" जैसी होती है। यह मानसिक अवस्था नए दृष्टिकोण या ज्ञान को ग्रहण करने की अनिच्छा पैदा करती है, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति ज्ञान-विज्ञान की बात सुनने को बिल्कुल तैयार नहीं होता और अज्ञानी रह जाता है। यह अधम प्रकार से भी हीन है क्योंकि इस अवस्था में व्यक्ति नए ज्ञान के सभी प्रवेश पथ (लाक्षणिक अर्थ में: कान) ही बंद कर देता है।

Closed-Mindedness मन की ऐसी अवस्था है जिसमें प्रभावित व्यक्ति नई बातें, विचार, मत या ज्ञान को सुनने या ग्रहण करने को बिल्कुल तैयार नहीं होता। वह अपनी पुरानी मान्यताओं, आदतों या विचारधारा में इतना अटल रहता है कि किसी भी नए परिवर्तन का विरोध करता है। सरल भाषा में कहें तो यह बंद मन की मानसिक अवस्था है, जिसमें नई बातें प्रवेश करने का कोई रास्ता ही नहीं होता। फलस्वरूप, ऐसे लोग अज्ञानी रह जाते हैं और जीवन में उनकी बौद्धिक प्रगति अपेक्षानुरूप नहीं हो पाती। यह बुद्धिजीविता विरोध का एक प्रमुख रूप है, जिसमें ज्ञान प्राप्त करने की संभावना ही बंद हो जाती है।

मान लीजिए, एक बुजुर्ग व्यक्ति स्मार्टफोन का उपयोग करने को बिल्कुल सहमत नहीं होता। वह कहता है, "पुराना फोन ही अच्छा है, नई चीजें सीखने की क्या जरूरत?" उसके परिवार वाले उसे मोबाइल रखने के फायदे कई बार समझाते हैं, लेकिन वह सुनने की कोशिश ही नहीं करता, बल्कि कभी-कभी क्रोधित हो जाता है। यह Closed-Mindedness का एक सरल उदाहरण है – नए ज्ञान का द्वार बंद रहने से वह पीछे रह जाता है। Closed-Mindedness के विभिन्न प्रकार हैं।

Religious Closed-Mindedness से प्रभावित व्यक्ति अपनी धार्मिक मान्यताओं में इतना अटल रहता है कि अन्य धर्मों या दृष्टिकोण को सुनने या समझने को तैयार नहीं होता। वह अपने धर्म को एकमात्र सत्य मानता है। पठान और ख्रिश्चन लोग अक्सर इस मानसिक अवस्था से प्रभावित होते हैं।

एक व्यक्ति अपनी राजनीतिक पार्टी की मान्यताओं में इतना अटल है कि विपक्षी पक्ष की कोई भी अच्छी बात सुनने को तैयार नहीं होता। उदाहरण के लिए, वह कहता है, "मैं उनकी बात कभी नहीं सुनूंगा, वे सब गलत हैं।" इसके फलस्वरूप, वह नए दृष्टिकोण को ग्रहण नहीं कर पाता और सत्य के पथ पर नहीं चल पाता। भारत में वर्तमान में विपक्षी दलों के नेता और सदस्य अक्सर इस मानसिक अवस्था से प्रभावित हैं। इसे Political Closed-Mindedness कहा जाता है।

Scientific Closed-Mindedness से भी कई लोग प्रभावित हैं। इस मानसिक अवस्था में प्रभावित व्यक्ति वैज्ञानिक प्रमाण या नए आविष्कार को अस्वीकार करता है क्योंकि यह उसकी पूर्व मान्यताओं या आदतों के विरुद्ध होता है। ये लोग वैज्ञानिक तथ्यों पर अविश्वास करते हैं। जब टेलीफोन का आविष्कार हुआ, तो उस समय के पठानों ने इसे शैतान की आवाज कहकर विरोध किया था। आज भारत जैसे सहिष्णु हिंदुओं के देश में दिन में पांच बार नमाज की अजान लाउडस्पीकर से बजती है। जीवाश्म विज्ञान हो या विकासवाद विज्ञान, लाखों लोग ऐसे हैं जो आधुनिक युग में इतने वैज्ञानिक शोधों के बाद भी इन्हें स्वीकार नहीं करते। Flat Earther हों या सात दिन में ब्रह्मांड की सृष्टि की बात करने वाले धार्मिक अंधविश्वासी, विज्ञान को न मानने वाले Scientific Closed-Mindedness के शिकार लाखों लोग मिल जाएंगे।

एक अन्य मानसिक अवस्था Social Closed-Mindedness है। इसमें प्रभावित व्यक्ति लोग की उम्र, जाति, लिंग, संस्कृति या सामाजिक स्थिति के आधार पर उनकी योग्यता और क्षमता का आकलन करते हैं और उन्हें छोटा मानकर उनके मत को ग्रहण नहीं करते। ये लोग अपनी संस्कृति या समूह को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति गांव से आए लोगों को "अज्ञानी" मानता है और उनकी अनुभव या मत को सुनने में रुचि नहीं लेता। कोई महिला चाहे कितनी कुशल ड्राइवर हो, इस प्रकार के लोग हमेशा संदेह करते हैं कि वह गाड़ी चलाते समय दुर्घटना कर देगी। कम उम्र के व्यक्ति चाहे कितना सच कहें, Social Closed-Mindedness से प्रभावित वयस्क उसकी बात नहीं सुनते।

Personal Closed-Mindedness वाले व्यक्ति भी हैं, जो अपनी व्यक्तिगत आदतों, जीवनशैली या विचारधारा में अटल रहते हैं और नए परिवर्तन को आसानी से स्वीकार नहीं करते। ये अपनी अज्ञानता को अस्वीकार करते हैं। उदाहरण के लिए, इस मानसिक अवस्था वाला व्यक्ति स्मार्टफोन या इंटरनेट को "अनावश्यक" मानता है और पुराने फोन का उपयोग जारी रखता है। नई तकनीक उसका जीवन सरल कर सकती है, लेकिन वह इसमें रुचि नहीं लेता।

Cultural Closed-Mindedness वाले लोग भी हैं, जो अपनी संस्कृति या परंपरा को ही पृथ्वी पर एकमात्र उपयुक्त और सही मानते हैं और अन्य संस्कृतियों के रीति-रिवाजों को समझने की कोशिश नहीं करते, बल्कि आवश्यक होने पर उनका विरोध भी करते हैं। उदाहरण के लिए, अब्राहमिक समुदाय, विशेष रूप से पठान और ख्रिश्चन, अपनी धर्म और संस्कृति को ही सर्वश्रेष्ठ बताकर दूसरों की धर्म और संस्कृति को कमतर या हीन दिखाने की हमेशा कोशिश करते हैं।

Educational Closed-Mindedness से प्रभावित लोग भी देखे जाते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति नई शिक्षण पद्धति, ज्ञान या शिक्षा के स्रोत को ग्रहण नहीं करते। ये अपने पुराने ज्ञान को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। उदाहरण के लिए, आज भी कुछ शिक्षक हैं जो नई डिजिटल शिक्षण पद्धति को "अनुपयोगी" मानते हैं और पुरानी ब्लैकबोर्ड पद्धति से ही पढ़ाना जारी रखते हैं। नई शिक्षण पद्धति छात्रों के लिए अधिक सहायक हो सकती है, लेकिन Educational Closed-Mindedness का शिकार शिक्षक ऐसा होने नहीं देते।

इस प्रकार विभिन्न प्रकार के Closed-Mindedness के शिकार लोग हैं। Closed-Mindedness जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अज्ञानता और विभाजन को बढ़ाता है। यह मानवजाति की प्रगति के मार्ग में कांटे की तरह कार्य करता है। प्राचीन काल से अब तक नया कुछ जानने, नया कुछ करने की निरंतर कोशिश के कारण मानवजाति आज Type I civilization नहीं हुई, तो भी Type 0.7 civilization निश्चित रूप से बन चुकी है। सोचिए, यदि मानवजाति में नई बातें, विचार, मत या ज्ञान को सुनने या ग्रहण करने की इच्छा न रखने वाले Closed-Mindedness वाले लोगों की संख्या बढ़ जाए, तो क्या होगा? मानव समाज फिर से जंगली हो जाएगा और बाघ, भालू, वानरों की तरह असभ्य होकर रह जाएगा। अतः Closed-Mindedness से प्रभावित लोग मानवजाति के लिए आटे में कीड़े के समान हैं। मानव समाज से Closed-Mindedness का विनाश ही मानवजाति का मंगल है!

गुरुवार, 18 सितंबर 2025

पृथ्वी के युग

भारतीय पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मा का जीवनकाल 100 वर्ष है, जो मानव वर्षों में 311.04 लाख करोड़ (311,040,000,000,000) वर्ष के बराबर है। मनुस्मृति में इस संबंध में कहा गया है:

“यदा स देवो जागर्ति तदेदं चेष्टति जगत्।  
यदा स्वपिति शान्तात्मा तदा सर्वं निमीलति ॥”

अर्थात, जब वह देवता (ब्रह्मा) जागृत होते हैं, तब यह विश्व सक्रिय हो जाता है। जब वह शांतचित्त होकर निद्रा में जाते हैं, तब सब कुछ स्थिर हो जाता है।

इसी तरह, सूर्य सिद्धांत में उल्लेख है कि ब्रह्मा का आयुष्काल 100 ब्रह्मा वर्ष (311.04 ट्रिलियन मानव वर्ष) है, और वर्तमान में उनके आयुष्काल का दूसरा अर्ध (50वां वर्ष) चल रहा है, जिसमें पहला कल्प प्रारंभ हुआ है:

“परमायुः शतं तस्य तथाहोरात्रसंख्यया।  
आयुषोऽर्धमितं तस्य शेषकल्पोऽयमादिमः ॥”

ब्रह्मा का एक दिन एक कल्प कहलाता है, जो लगभग 432 करोड़ वर्ष का होता है, और उनकी एक रात (प्रलय) भी समान अवधि की होती है। एक कल्प में 14 मन्वंतर होते हैं, जिनमें प्रत्येक में 71 महायुग (43,20,000 वर्ष) शामिल होते हैं।

सूर्य सिद्धांत (रंगनाथ टीका) में कहा गया है:

“इत्थं युगसहस्रेण भूतसंहारकारकः।  
कल्पो ब्राह्ममहः प्रोक्तं शर्वरी तस्य तावती ॥”

अर्थात, इस प्रकार एक हजार युगों (चतुर्युग) से निर्मित एक कल्प, जो जीवों के संहार का कारण है, ब्रह्मा का दिन (अहः) कहलाता है। उनकी रात (शर्वरी) भी उतनी ही अवधि की होती है।

प्रत्येक महायुग चार युगों में विभक्त है: •सत्ययुग(17,28,000 वर्ष)
•त्रेतायुग(12,96,000 वर्ष)
•द्वापरयुग(8,64,000 वर्ष)
•कलियुग(4,32,000 वर्ष)। 

वर्तमान में हम श्वेतवराह कल्प के सातवें मन्वंतर के 28वें महायुग के कलियुग में हैं, जो 3102 ई.पू. में शुरू हुआ था। 2025 ई. के अनुसार, कलियुग के 5126 वर्ष बीत चुके हैं। श्वेतवराह कल्प ब्रह्मा के जीवनकाल के 51वें वर्ष का पहला दिन है। यह गणना विश्व को एक चक्रीय, अनंत प्रक्रिया के रूप में दर्शाती है, जिसमें सृष्टि, स्थिति और प्रलय का चक्र चलता रहता है।

आधुनिक विज्ञान ब्रह्मांड की आयु को बिग बैंग सिद्धांत के आधार पर मापता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, ब्रह्मांड की उत्पत्ति लगभग 13.8 बिलियन (13,800,000,000) वर्ष पहले हुई थी। यह गणना कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड रेडिएशन, हबल स्थिरांक, और तारों तथा गैलेक्सियों की आयु के आधार पर की गई है। ब्रह्मांड का भविष्य डार्क एनर्जी से प्रभावित है, जो इसके विस्तार को त्वरित कर रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार, ब्रह्मांड अनिश्चित काल तक विस्तार करता रहेगा, जिसके परिणामस्वरूप "बिग फ्रीज" या "हीट डेथ" की स्थिति आएगी, जिसमें ब्रह्मांड ठंडा और निष्क्रिय हो जाएगा। यह प्रक्रिया ट्रिलियन-ट्रिलियन (10^24) वर्ष या उससे अधिक समय ले सकती है। ब्लैक होल्स हॉकिंग रेडिएशन के माध्यम से 10^100 वर्ष (गूगोल वर्ष) में वाष्पित हो जाएंगे। अन्य संभावनाएं जैसे "बिग क्रंच" (संकोचन) या "बिग रिप" भी हैं, लेकिन डार्क एनर्जी के प्रभाव के कारण "बिग फ्रीज" सबसे संभावित है।

पौराणिक गणना चक्रीय समय की अवधारणा पर आधारित है, जिसमें सृष्टि और प्रलय बार-बार होते हैं। यह दार्शनिक और आध्यात्मिक है, जो ब्रह्मा के दैवीय चक्र पर जोर देता है। वहीं, आधुनिक विज्ञान रैखिक समय की अवधारणा पर आधारित है, जिसमें बिग बैंग से शुरू होकर ब्रह्मांड एक निश्चित दिशा में बढ़ता है। पौराणिक गणना में ब्रह्मा का जीवनकाल (311.04 ट्रिलियन वर्ष) विज्ञान की वर्तमान आयु (13.8 बिलियन वर्ष) की तुलना में विशाल है, लेकिन विज्ञान का भविष्यकाल (10^100 वर्ष) पौराणिक समय से भी अधिक है। पौराणिक गणना समय को अनंत चक्र के रूप में देखती है, जबकि विज्ञान एक सीमित शुरुआत और अनिश्चित अंत पर जोर देता है।

भारत के अलावा, किसी भी प्राचीन सभ्यता में इतने विशाल पैमाने पर समय की गणना नहीं की गई। चीन और मिस्र की सभ्यताओं में राजवंशों के शासनकाल के आधार पर युगों की गणना होती थी। अन्य प्राचीन संस्कृतियों में भारत की तरह चतुर्युग की अवधारणा नहीं थी।

भारतीय कालगणना के बहुत बाद, प्राचीन ग्रीक कवि हेसिओड ने 8वीं शताब्दी ई.पू. में अपनी रचना Ἔργα καὶ Ἡμέραι (एर्गा कै हेमेराई) में मानव इतिहास को पांच युगों में विभाजित किया। उनके अनुसार:
1.स्वर्ण युग (Golden Age): शांति और समृद्धि का समय।
2.रजत युग (Silver Age): नैतिकता में कमी।
3.कांस्य युग (Bronze Age): युद्ध और हिंसा का युग।
4.वीर युग (Heroic Age): महान वीरों का समय, जिसमें ट्रोजन युद्ध हुआ।
5.लौह युग (Iron Age): अधर्म और दुख का युग।

यह युग विभाजन भी पौराणिक और दार्शनिक था, जिसमें धातुओं के उपयोग के साथ नैतिकता और सामाजिक स्थिति का वर्णन किया गया।

कई वर्षों बाद, डेनिश पुरातत्वविद क्रिस्टियन जुरगेनसेन थॉमसन ने 1836 में अपनी पुस्तक Ledetraad til Nordisk Oldkyndighed (Guide to Northern Antiquities) में तीन-युग प्रणाली प्रस्तुत की। उन्होंने मानव इतिहास को तीन युगों में विभाजित किया:
1.पाषाण युग (Stone Age):मानव पत्थर से उपकरण और हथियार बनाते थे (लगभग 25 लाख वर्ष पहले से 3000 ई.पू. तक), जिसे पुनः पुरापाषाण (Paleolithic), मध्यपाषाण (Mesolithic), और नवपाषाण (Neolithic) में विभाजित किया गया।
2.कांस्य युग (Bronze Age):तांबे और टिन के मिश्रण से कांस्य उपकरण बनाए गए (लगभग 3000 ई.पू. से 1200 ई.पू. तक)।
3.लौह युग (Iron Age): लोहे से हथियार और उपकरण बनाए गए (लगभग 1200 ई.पू. से ऐतिहासिक युग तक)।

इस प्रणाली को बाद में अन्य पुरातत्वविदों ने विस्तारित किया, और यह विश्व भर में प्राचीन इतिहास के अध्ययन का आधार बनी। लौह युग के बाद मानव इतिहास को शास्त्रीय युग, मध्ययुग, आधुनिक युग, और वर्तमान डिजिटल युग या सूचना युग में विभाजित किया गया।

आधुनिक विज्ञान ने पृथ्वी की आयु को चार युगों में विभाजित किया है, जो लगभग 4540 मिलियन वर्ष पहले सूर्य के प्रोटोप्लैनेटरी डिस्क से बनी पृथ्वी से शुरू होती है:
1.हेडियन युग (Hadean, 4540 से 4000 मिलियन वर्ष पहले)
2.आर्कियन युग (Archean, 4000 से 2500 मिलियन वर्ष पहले)
3.प्रोटेरोज़ोइक युग (Proterozoic, 2500 से 538.8 मिलियन वर्ष पहले)
4.फैनरोज़ोइक युग (Phanerozoic, 538.8 मिलियन वर्ष पहले से वर्तमान तक)

हेडियन युग पृथ्वी का सबसे प्राचीन भूवैज्ञानिक युग है। यह पृथ्वी के गठन और प्रारंभिक विकास का एक नाटकीय अध्याय था, जब पृथ्वी एक अग्निमय, अस्थिर और जीवन के लिए अनुपयुक्त अवस्था में थी। "हेडियन" नाम ग्रीक पौराणिक कथाओं से लिया गया है, जिसका अर्थ "नरक जैसा" परिवेश है। इस युग का नामकरण 1972 में भूवैज्ञानिक प्रेस्टन क्लाउड द्वारा किया गया। हेडियन युग में कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं, जिन्होंने पृथ्वी को जीवन योग्य ग्रह बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । 

सूर्य को घेरने वाली प्रोटोप्लैनेटरी डिस्क में धूल और गैस के कणों के आपसी टकराव और संयोजन (Accretion) से पृथ्वी बनी। यह एक गलित अग्निगोला थी, जिसमें उच्च तापमान और अस्थिरता थी। इस गलित अवस्था ने पृथ्वी के आंतरिक भाग में कोर, मैंटल, और प्रारंभिक भूत्वक (crust) जैसे स्तरों का गठन किया।
   
 "जायंट इम्पैक्ट हाइपोथेसिस" के अनुसार, मंगल ग्रह के आकार का प्रोटोप्लैनेट "थिया" पृथ्वी से टकराया। इस टक्कर से निकली सामग्री ने पृथ्वी के चारों ओर एक डिस्क बनाई, जो बाद में दो चंद्रमाओं में परिणत हुई। बाद में छोटा चंद्रमा बड़े चंद्रमा से टकराया, जिससे आज का विशाल चंद्रमा बना। इससे चंद्रमा की एक सतह दूसरी की तुलना में अधिक सघन है। इस घटना ने पृथ्वी की भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं और अक्षीय झुकाव पर गहरा प्रभाव डाला।
   
हेडियन युग में पृथ्वी का वायुमंडल मुख्य रूप से जलवाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन, और अमोनिया जैसे गैसों से बना था, जो अग्निक गतिविधियों और धूमकेतु टक्करों से आए। जैसे-जैसे पृथ्वी ठंडी हुई, जलवाष्प घनीभूत होकर वर्षा में बदली, जिससे प्रारंभिक महासागर बने। कुछ जल धूमकेतुओं और उल्कापिंडों से भी आया, और कुछ प्रारंभ से ही पृथ्वी में अन्य पदार्थों के साथ मिश्रित था, जो बाद में प्राकृतिक प्रक्रियाओं से तरल और ठोस रूप में जमा हुआ।
   
इस दौरान पृथ्वी और चंद्रमा पर असंख्य उल्कापिंड और धूमकेतुओं की टक्कर हुई, जिसने पृथ्वी की सतह पर विशाल गड्ढे बनाए और इसके परिवेश को और अस्थिर किया। इस समय जीवन के प्रारंभिक चिह्न नहीं मिले, लेकिन इन घटनाओं ने बाद के युग में जीवन की उत्पत्ति के लिए रासायनिक परिवेश तैयार किया।

हेडियन युग में पृथ्वी की गलित अवस्था धीरे-धीरे ठंडी होने लगी, जिससे एक पतला और अस्थायी भूत्वक बना। यह भूत्वक मुख्य रूप से बेसाल्टिक था और अक्सर उल्कापिंड टक्करों से नष्ट हो जाता था। फिर भी, यह पृथ्वी की भूवैज्ञानिक स्थिरता की दिशा में पहला कदम था। पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में मिले जिरकॉन क्रिस्टल(लगभग 4400 मिलियन वर्ष पुराने) इस युग के अवशेष हैं और प्रारंभिक भूत्वक की उपस्थिति को दर्शाते हैं।

हेडियन युग में पृथ्वी का आंतरिक भाग अत्यधिक गर्म था, जिसके कारण तीव्र अग्निक गतिविधियां होती थीं। ये अग्निक गतिविधियां जलवाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसों का उत्सर्जन करती थीं, जो प्रारंभिक वायुमंडल के गठन में सहायक थीं। ये गतिविधियां महासागरों के गठन में भी योगदान देती थीं, क्योंकि जलवाष्प घनीभूत होकर जल में बदल रहा था।

हालांकि हेडियन युग में जीवन का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला, इस दौरान जीवन की उत्पत्ति के लिए आवश्यक रासायनिक परिवेश बनना शुरू हुआ। धूमकेतु और उल्कापिंडों के माध्यम से एमिनो एसिड जैसे जैविक अणु पृथ्वी पर आए। प्रारंभिक महासागरों में हाइड्रोथर्मल वेंट्स में रासायनिक प्रक्रियाएं जीवन के प्रारंभिक रासायनिक विकास में सहायक हो सकती थीं।

कुछ वैज्ञानिक तथ्य बताते हैं कि हेडियन युग में पृथ्वी के कोर में तरल लोहे और निकल की गति के कारण एक प्रारंभिक चुम्बकीय क्षेत्र बन सकता था। यह क्षेत्र वायुमंडल को सौर वायु से बचाने में सहायक हो सकता था, जो बाद में जीवन के विकास के लिए महत्वपूर्ण था।

आर्कियन युग पृथ्वी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण काल था, जो हेडियन युग के अस्थिर और अग्निमय परिवेश से अधिक स्थिर और जीवन योग्य पृथ्वी की ओर संक्रमण का समय था। इस युग का नामकरण ग्रीक शब्द "ἀρχαῖος" (archaios) से हुआ, जिसका अर्थ "प्राचीन" या "पुरातन" है। यह नाम 1970 के दशक में भूवैज्ञानिकों द्वारा विशेष रूप से उपयोग किया गया, हालांकि इसका प्रारंभिक उपयोग 1911 में जेम्स डाना और अन्य भूवैज्ञानिकों द्वारा शुरू हुआ।

हालांकि हेडियन युग निश्चित रूप से आर्कियन युग से पुराना है, फिर भी आर्कियन युग का नामकरण इसके भूवैज्ञानिक महत्व के कारण किया गया। इस युग में पहली बार स्थिर महाद्वीपीय भूत्वक (continental crust) का गठन हुआ और जीवन की उत्पत्ति भी इसी युग में हुई। हेडियन युग में अस्थिर परिस्थितियां थीं, जो पृथ्वी के इतिहास को शुरू होने से पहले ही नष्ट कर सकती थीं। इसलिए, वैज्ञानिकों ने गहन विचार-विमर्श के बाद इस युग का नामकरण किया।

हेडियन युग में बना पतला और अस्थायी भूत्वक आर्कियन युग में अधिक स्थिर होने लगा। इस समय बेसाल्टिक भूत्वक के साथ ग्रेनाइटिक भूत्वक का गठन शुरू हुआ, जो आज के महाद्वीपीय भूत्वक का पूर्ववर्ती था। ये ग्रेनाइटिक भूत्वक आज भी "क्रेटन" (cratons) के रूप में मौजूद हैं, जैसे कनाडा का शील्ड क्षेत्र और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया का पिलबारा क्रेटन। ये क्रेटन पृथ्वी की सबसे पुरानी शिलाएं संरक्षित करते हैं, जो आर्कियन युग के भूवैज्ञानिक इतिहास को समझने में सहायक हैं।

इस युग में प्लेट टेक्टॉनिक्स संभवतः एक प्रारंभिक रूप में शुरू हुई। हालांकि आधुनिक प्लेट टेक्टॉनिक्स पूरी तरह स्थापित नहीं थी, कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि भूत्वक की गतिशीलता और अंतर्ग्रसन (subduction) प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। इससे महाद्वीपीय भूत्वक की वृद्धि और अग्निक गतिविधियां तेज हुईं।

आर्कियन युग में पृथ्वी का आंतरिक भाग अभी भी गर्म था, जिसके कारण तीव्र अग्निक गतिविधियां होती थीं। ये गतिविधियां जलवाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन, और अमोनिया जैसे गैसों का उत्सर्जन करती थीं, जो प्रारंभिक वायुमंडल का निर्माण करती थीं। हेडियन युग की तुलना में आर्कियन युग का वायुमंडल अधिक स्थिर था, लेकिन इसमें ऑक्सीजन की मात्रा नगण्य थी। यह वायुमंडल "अपचायक" (reducing) प्रकृति का था, जो जैविक अणुओं के गठन के लिए अनुकूल था। जलवाष्प घनीभूत होकर वर्षा में बदली, जिससे महासागरों का विस्तार और गहराई बढ़ी।

आर्कियन युग की सबसे महत्वपूर्ण घटना जीवन की उत्पत्ति थी। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि लगभग 3800 मिलियन वर्ष पहले बैक्टीरिया जैसे साधारण एककोशीय जीव (prokaryotes) विकसित हुए। ये जीव मुख्य रूप से महासागरों में, विशेष रूप से हाइड्रोथर्मल वेंट्स के पास विकसित हुए, जहां गर्म जल और खनिज पदार्थ रासायनिक प्रतिक्रियाओं के लिए अनुकूल परिवेश प्रदान करते थे।

इस युग के प्रारंभिक जीव सूक्ष्मजीव (microbes) थे, जो अवायवीय श्वसन (anaerobic respiration) करते थे। ये methanogens या अन्य रासायनिक ऊर्जा पर निर्भर थे। पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में मिले 3500 मिलियन वर्ष पुराने स्ट्रोमाटोलाइट्स इस प्रारंभिक जीवन के प्रमाण हैं। स्ट्रोमाटोलाइट्स सायनोबैक्टीरिया द्वारा बनाए गए शिला स्तर हैं, जो पृथ्वी के पहले जीव थे और प्रकाशसंश्लेषण (photosynthesis) के माध्यम से ऑक्सीजन उत्पन्न करते थे।

आर्कियन युग के अंत तक (लगभग 3000 मिलियन वर्ष पहले) सायनोबैक्टीरिया जैसे जीव विकसित हुए, जो सूर्य की प्रकाश ऊर्जा का उपयोग कर कार्बन डाइऑक्साइड और जल से शर्करा उत्पन्न करते थे, जिसके उप-उत्पाद के रूप में ऑक्सीजन निकलता था। इससे वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ने लगी, जिसका प्रभाव बाद के प्रोटेरोज़ोइक युग में अधिक स्पष्ट हुआ।

आर्कियन युग में पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र अधिक स्थिर हुआ। पृथ्वी के तरल बाह्य कोर में लोहे और निकल की गतिशीलता ने डायनमो प्रभाव उत्पन्न किया, जो चुम्बकीय क्षेत्र बनाता था। यह क्षेत्र वायुमंडल को सौर वायु और अंतरिक्षीय विकिरण से बचाता था, जो जीवन के विकास और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण था।

हेडियन युग की तीव्र उल्कापिंड टक्करें आर्कियन युग में धीरे-धीरे कम हुईं। इससे पृथ्वी की सतह अधिक स्थिर हुई, जो जीवन के विकास और भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के लिए अनुकूल थी।

आर्कियन युग पृथ्वी के इतिहास में एक क्रांतिकारी काल था, जिसमें भूवैज्ञानिक और जैविक विकास ने मिलकर पृथ्वी को जीवन योग्य ग्रह बनाया। इस युग के बाद प्रोटेरोज़ोइक युग(2500 से 538.8 मिलियन वर्ष पहले) शुरू हुआ, जो पृथ्वी के विकास में अगला चरण था।
प्रोटेरोज़ोइक युग (2500 से 538.8 मिलियन वर्ष पहले) पृथ्वी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण काल था, जिसमें आर्कियन युग में शुरू हुई भूवैज्ञानिक और जैविक प्रक्रियाएं और विकसित हुईं, जिसने फैनरोज़ोइक युग में जीवन के विस्फोट (Cambrian Explosion) के लिए मंच तैयार किया। "प्रोटेरोज़ोइक" शब्द ग्रीक शब्दों "प्रोटेरो" (पूर्व) और "ज़ोए" (जीवन) से लिया गया है, जो प्रारंभिक जीवन के समय को दर्शाता है। इस युग का नामकरण 1900 के दशक में भूवैज्ञानिकों द्वारा किया गया था।

प्रोटेरोज़ोइक युग में महाद्वीपीय भूत्वक (continental crust) का विकास तेज हुआ। आर्कियन युग में बने क्रैटन्स (प्राचीन और स्थिर भूत्वक) इस युग में एकत्रित होकर विशाल महाद्वीपों का निर्माण करने लगे। इस युग में प्लेट टेक्टॉनिक्स की प्रक्रिया अधिक सक्रिय हुई, जिसने महाद्वीपों के टकराव और विभाजन में योगदान दिया। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप कई सुपरकॉन्टिनेंट्स बने और टूटे। उदाहरण के लिए, लगभग 1800 मिलियन वर्ष पहले कोलंबिया नामक सुपरकॉन्टिनेंट बना और बाद में टूट गया। इसके बाद, लगभग 1100 मिलियन वर्ष पहले रोडिनिया नामक एक और सुपरकॉन्टिनेंट बना, जो प्रोटेरोज़ोइक युग के अंत तक टूटकर आधुनिक महाद्वीपों के पूर्ववर्ती भागों का निर्माण किया। इन सुपरकॉन्टिनेंट्स के निर्माण और विखंडन ने पृथ्वी के भूवैज्ञानिक इतिहास को गहराई से प्रभावित किया और महासागरों व भूभागों के विन्यास को बदल दिया।

प्रोटेरोज़ोइक युग की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी GOE या द ग्रेट ऑक्सिडेसन इवेंट जो लगभग 2400 से 2000 मिलियन वर्ष पहले घटी। आर्कियन युग में प्रकाशसंश्लेषण करने वाले सायनोबैक्टीरिया ने ऑक्सीजन उत्पादन शुरू किया था, लेकिन प्रोटेरोज़ोइक युग में ऑक्सीजन की मात्रा नाटकीय रूप से बढ़ी। यह ऑक्सीजन पृथ्वी के वायुमंडल और महासागरों में जमा होने लगी, जिसने पृथ्वी के रासायनिक परिवेश को मौलिक रूप से बदल दिया। प्रारंभ में, उत्पादित ऑक्सीजन ने महासागरों में मौजूद लोहे और अन्य खनिजों के साथ प्रतिक्रिया कर ऑक्साइड बनाए, जिनका प्रमाण आज बैंडेड आयरन फॉर्मेशन्स (BIFs)के रूप में देखा जाता है। ये BIFs महासागरों में ऑक्सीजन की वृद्धि का प्रमाण हैं। बाद में, जब इन खनिजों ने ऑक्सीजन के साथ पूरी तरह प्रतिक्रिया कर ली, तब ऑक्सीजन वायुमंडल में जमा होने लगी। इससे सूक्ष्मजीवों में ऑक्सीजन-निर्भर श्वसन (aerobic respiration) का विकास हुआ, जिसने जीवन की विविधता को बढ़ाया।

 हालांकि, वायुमंडल में ऑक्सीजन की वृद्धि कई सूक्ष्मजीवों के लिए विषाक्त थी, क्योंकि पहले अधिकांश सूक्ष्मजीव ऑक्सीजन-मुक्त (anaerobic) परिवेश में विकसित हुए थे। इसे "ऑक्सीजन संकट" भी कहा जाता है, जिसने जीवन के विकास में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन लाया।

प्रोटेरोज़ोइक युग में जीवन की विविधता नाटकीय रूप से बढ़ी। आर्कियन युग में बने प्रोकैरियोट्स (prokaryotes) जैसे एककोशीय सूक्ष्मजीव इस युग में और विकसित हुए। इस युग में यूकैरियोट्स(eukaryotes) नामक जटिल कोशिकाओं वाले जीवों की उत्पत्ति हुई, जिनमें नाभिक (nucleus) और अन्य कोशिकांग (organelles) होते हैं। लगभग 2000 मिलियन वर्ष पहले यूकैरियोटिक कोशिकाओं का उद्भव हुआ, जो संभवतः एंडोसिम्बायोसिस प्रक्रिया के माध्यम से हुआ। इस प्रक्रिया में एक प्रोकैरियोटिक जीव (जैसे सायनोबैक्टीरिया) दूसरे कोशिका के अंदर रहकर माइटोकॉन्ड्रिया या क्लोरोप्लास्ट जैसे कोशिकांग में परिवर्तित हुआ।

प्रोटेरोज़ोइक युग के अंत में, लगभग 800-600 मिलियन वर्ष पहले, एककोशीय जीव बहुकोशीय जीवों के रूप में विकसित होने लगे। ये जीव मुख्य रूप से साधारण शैवाल (algae) और अन्य सरल बहुकोशीय जीव थे। एडियाकरण बायोटा (635-538.8 मिलियन वर्ष पहले) जटिल बहुकोशीय जीवों का पहला प्रमाण है। ये जीव नरम शरीर वाले थे और मुख्य रूप से महासागरों में रहते थे। इसने फैनरोज़ोइक युग में होने वाले कैम्ब्रियन विस्फोट के लिए मंच तैयार किया।

प्रोटेरोज़ोइक युग में पृथ्वी के जलवायु में व्यापक परिवर्तन हुए। इस युग में कई वैश्विक हिमयुग (global glaciations) हुए, जिन्हें स्नोबॉल अर्थ कहा जाता है, जिसमें पृथ्वी की सतह लगभग पूरी तरह हिमाच्छादित हो गई थी। ये घटनाएं मुख्य रूप से 750-580 मिलियन वर्ष पहले हुईं, जिन्हें क्रायोजेनियन हिमयुग (Cryogenian Glaciations) कहा जाता है। इस दौरान पृथ्वी के ध्रुवीय क्षेत्रों से लेकर विषुवतीय क्षेत्र तक बर्फ से ढके हुए थे। इन हिमयुगों का कारण संभवतः वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड) की कमी और ऑक्सीजन की वृद्धि थी, जिसने जलवायु को ठंडा किया। इन चरम जलवायु परिवर्तनों ने जीवन पर गहरा प्रभाव डाला, लेकिन साथ ही जीवन के विकास को भी तेज किया। हिमयुग के बाद ज्वालामुखी उद्गारों से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ, जिसने पृथ्वी को फिर से गर्म किया और बहुकोशीय जीवों के विकास में सहायता की।

इस युग में ज्वालामुखी उद्गार जारी रहे, जिसने वायुमंडल और महासागरों में गैसें और खनिज प्रदान किए। महासागर अधिक गहरे और विस्तृत हुए, जो जीवन के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण परिवेश प्रदान करते थे। हाइड्रोथर्मल वेंट्स इस युग में भी जीवन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे, क्योंकि ये रासायनिक ऊर्जा और जैविक अणु प्रदान करते थे।

प्रोटेरोज़ोइक युग में पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र अधिक स्थिर हुआ। यह क्षेत्र वायुमंडल को सौर हवाओं और अंतरिक्षीय विकिरण से बचाता था, जो जीवन के विकास और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण था। यह वायुमंडल में ऑक्सीजन और अन्य गैसों के संरक्षण में सहायक था।

प्रोटेरोज़ोइक युग में पृथ्वी ने भूवैज्ञानिक और जैविक दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रगति की। इस युग में कोई बड़े आकार के जीव जैसे मछलियां या सरीसृप नहीं थे; जीवन मुख्य रूप से सूक्ष्मजीवों और सरल बहुकोशीय जीवों तक सीमित था। जटिल और बड़े जीवों का विकास बाद के फैनरोज़ोइक युग में हुआ।

फैनरोज़ोइक युग (538.8 मिलियन वर्ष पहले से वर्तमान तक) पृथ्वी के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण और जीवन से परिपूर्ण काल है। "फैनरोज़ोइक" नाम ग्रीक शब्दों "फैनेरोस" (दृश्य) और "ज़ोए" (जीवन) से लिया गया है, जो इस युग में दृश्यमान जीवन के व्यापक विकास को दर्शाता है। इस युग का नामकरण 1835 में जॉन फिलिप्स द्वारा किया गया था।

फैनरोज़ोइक युग को तीन प्रमुख उपयुगों में विभाजित किया गया है:
-पैलियोज़ोइक(538.8-251.9 मिलियन वर्ष पहले)
-मेसोज़ोइक(251.9-66 मिलियन वर्ष पहले)
-सेनोज़ोइक (66 मिलियन वर्ष पहले से वर्तमान तक)

फैनरोज़ोइक युग की शुरुआत में, पैलियोज़ोइक उपयुग के कैम्ब्रियन काल(538.8-485.4 मिलियन वर्ष पहले) में कैम्ब्रियन विस्फोट नामक एक ऐतिहासिक घटना घटी। इस दौरान, भूवैज्ञानिक दृष्टि से बहुत कम समय (20-25 मिलियन वर्ष) में जीवन की विविधता नाटकीय रूप से बढ़ी। ट्राइलोबाइट्स,मॉलस्क्स, और अन्य अकशेरुकी (invertebrates) जीव महासागरों में उभरे। इस विस्फोट के पीछे के कारण थे: ऑक्सीजन की वृद्धि, जलवायु स्थिरता, और कठोर कंकाल व शरीर संरचना जैसे नए अनुकूलन। इसने जटिल जीवन का आधार स्थापित किया।

पैलियोज़ोइक उपयुग में कशेरुकी जीवों (vertebrates) की उत्पत्ति भी हुई। ऑर्डोविशियन काल(485.4-443.8 मिलियन वर्ष पहले) में एग्नैथन्स जैसे प्रारंभिक मछलियां विकसित हुईं। इसके बाद,डिवोनियन काल (419.2-358.9 मिलियन वर्ष पहले) में मछलियों की इतनी प्रजातियां उभरीं कि इसे "मछलियों का युग" (Age of Fishes) कहा जाता है। इस काल में जबड़े वाली मछलियां (jawed fish) और प्रथम उभयचर (amphibians) विकसित हुए। उभयचरों ने जल से स्थल पर संक्रमण शुरू किया, जो बाद में सरीसृपों, पक्षियों, और स्तनधारियों के विकास में सहायक रहा।

कार्बोनिफेरस और पर्मियन काल (358.9-251.9 मिलियन वर्ष पहले) में स्थल पर जीवन का विकास तेज हुआ। फर्न, लाइकोफाइट्स, और अन्य पौधों ने विशाल वनों का निर्माण किया, जो स्थल को आच्छादित करते थे। इन पौधों ने प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन उत्पन्न की, जिससे वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ी। इस ऑक्सीजन वृद्धि के कारण विशाल आकार के कीड़े विकसित हुए, जैसे कि 70 सेंटीमीटर लंबे कनखजूरे। इस काल में प्रथम सरीसृप भी विकसित हुए। इन वनों के जैव पदार्थों का जमाव आज के कोयले का स्रोत बना।

पैलियोज़ोइक युग में कई हिमयुग देखे गए, जैसे ऑर्डोविशियन-सिलुरियन और कार्बोनिफेरस-पर्मियन हिमयुग। मेसोज़ोइक युग अधिक गर्म था, जिसने डायनासोरों और पौधों के विकास में सहायता की। सेनोज़ोइक युग में पृथ्वी धीरे-धीरे ठंडी होने लगी, जिसके परिणामस्वरूप क्वाटरनरी काल में कई हिमयुग आए।

भूवैज्ञानिक दृष्टि से, पैंजिया नामक सुपरकॉन्टिनेंट पैलियोज़ोइक युग में बना और मेसोज़ोइक युग में टूटकर आधुनिक महाद्वीपों में परिवर्तित हुआ। सेनोज़ोइक युग में हिमालय पर्वत का निर्माण भारत और यूरेशिया प्लेट के टकराव से हुआ।

फैनरोज़ोइक युग में वायुमंडल अधिक ऑक्सीजन-समृद्ध हुआ। पैलियोज़ोइक युग में पौधों के विस्तार ने ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाई, जिसने जटिल जीवन के विकास में सहायता की। सेनोज़ोइक युग में वायुमंडल आधुनिक अवस्था में पहुंचा, जिसमें ऑक्सीजन (21%) और नाइट्रोजन (78%) प्रमुख घटक हैं।

फैनरोज़ोइक युग में कई वृहद विलुप्ति घटनाएं घटीं, जिन्होंने जीवन के विकास को गहराई से प्रभावित किया:
-ऑर्डोविशियन-सिलुरियन विलुप्ति (लगभग 443 मिलियन वर्ष पहले): इसने पृथ्वी की लगभग 85% प्रजातियों को नष्ट किया, मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन और हिमयुग के कारण।
-डिवोनियन विलुप्ति(375-360 मिलियन वर्ष पहले): इसने समुद्री जीवन, विशेष रूप से मछलियों और प्रवालों को प्रभावित किया।
-पर्मियन-ट्रायासिक विलुप्ति(251.9 मिलियन वर्ष पहले): यह पृथ्वी की सबसे बड़ी विलुप्ति थी, जिसमें 96% समुद्री और 70% स्थलीय प्रजातियां नष्ट हो गईं। इसका कारण तीव्र ज्वालामुखी उद्गार, जलवायु परिवर्तन, और ऑक्सीजन की कमी थी।
-क्रेटेशियस-पेलियोजीन विलुप्ति(66 मिलियन वर्ष पहले): इसने डायनासोरों और कई अन्य प्रजातियों को नष्ट किया, जो चिक्सुलुब उल्कापिंड प्रभाव के कारण हुआ।

इन विलुप्तियों ने जीवन के विकास को नए दिशाओं में मोड़ा और नई प्रजातियों के विकास के लिए अवसर प्रदान किए।

मेसोज़ोइक युग को "डायनासोर युग" के रूप में जाना जाता है, जिसमें सरीसृपों, विशेष रूप से डायनासोरों का आधिपत्य था। ट्रायासिक, जुरासिक, और क्रेटेशियस काल में डायनासोर जैसे सॉरोपॉड्स,ब्रैकियोसॉरस और थेरोपॉड्स विभिन्न आकारों और प्रकारों में विकसित हुए। इस युग में आर्कियोप्टेरिक्स जैसे प्रथम पक्षी भी विकसित हुए।  
क्रेटेशियस काल में पुष्पीय पौधों या सपुष्पक पौधों(flowering plants) का उदय हुआ, जिन्होंने परागण करने वाले कीटों और अन्य जीवों के साथ जैविक संबंध बनाए। इन पौधों ने पारिस्थितिकी तंत्र और खाद्य शृंखला को और जटिल किया।

क्रेटेशियस-पेलियोजीन विलुप्ति के बाद डायनासोरों के अंत ने स्तनधारियों को विकास का अवसर प्रदान किया। पेलियोजीन और नियोजीन काल में व्हेल, हाथी, घोड़े, और प्राइमेट्स जैसे विभिन्न स्तनधारी विकसित हुए।

प्राइमेट्स का विकास लगभग 66 मिलियन वर्ष पहले पेलियोसीन युग में शुरू हुआ। इस समय प्लेसियाडैपिफॉर्म्स जैसे आदिम प्राइमेट्स उभरे, जो छोटे, वृक्षवासी जीव थे और जिनमें बड़े आंखें और नाखून जैसे लक्षण थे।  
ईयोसीन युग (56-33.9 मिलियन वर्ष पहले) में वास्तविक प्राइमेट्स का विकास हुआ। एडापिडे और ओमोमायिडे जैसे जीव इस समय उभरे, जो बड़े मस्तिष्क और सामाजिक व्यवहार प्रदर्शित करते थे। ओलिगोसीन युग(33.9-23 मिलियन वर्ष पहले) में पुराने विश्व के वानर (कैटार्हिनी) और आदिम वानर (होमिनोइडिया) की उत्पत्ति हुई। एजिप्टोपिथेकस जैसे जीव अफ्रीका और एशिया में विकसित हुए और आधुनिक वानरों व मनुष्यों के साझा पूर्वज माने जाते हैं। मियोसीन युग(23-5.3 मिलियन वर्ष पहले) में प्राइमेट्स की विविधता बढ़ी। प्रोकॉन्सुल और ड्रायोपिथेकस जैसे आधुनिक वानर विकसित हुए। प्रोकॉन्सुल अफ्रीका में मनुष्यों और अन्य वानरों के साझा पूर्वज थे, जबकि ड्रायोपिथेकस यूरोप और एशिया में गोरिल्ला, चिंपैंजी, और ओरंगुटान के पूर्वज थे। प्लियोसीन कल्प (5.3 मिलियन वर्ष पहले) में होमिनिडे का विकास शुरू हुआ। साहेलैंथ्रोपस और आर्डिपिथेकस जैसे जीव अफ्रीका में उभरे, जिनमें द्विपाद चलने के प्रारंभिक लक्षण थे। ऑस्ट्रालोपिथेकस(जैसे "लूसी") भी इस समय विकसित हुए, जो द्विपादी थे लेकिन वानर जैसे छोटे मस्तिष्क और लंबी भुजाएं रखते थे।  
प्लेइस्टोसीन कल्प (2.58 मिलियन वर्ष पहले) में होमो प्रजाति की उत्पत्ति हुई। होमो हैबिलिस,होमो इरेक्टस और बाद में होमो सेपियन्स अफ्रीका में विकसित हुए। होमो हैबिलिस औज़ार निर्माण में दक्ष थे, होमो इरेक्टस ने अफ्रीका से एशिया और यूरोप में विस्तार किया और आग का नियंत्रण व जटिल औज़ार बनाए। होमो सेपियन्स, आधुनिक मनुष्य, लगभग 300,000 वर्ष पहले अफ्रीका में उभरे और सामाजिक संरचना, भाषा, और संस्कृति में अग्रणी हुए।

फैनरोज़ोइक युग में जीवन की विविधता और जटिलता ने पृथ्वी को एक गतिशील और जीवनमय ग्रह बनाया। कैम्ब्रियन विस्फोट, कशेरुकी और स्थलीय जीवन का विकास, डायनासोरों का आधिपत्य, स्तनधारियों और मनुष्यों की उत्पत्ति, वृहद विलुप्तियां, और जलवायु परिवर्तन इस युग की प्रमुख घटनाएं थीं। सबसे महत्वपूर्ण बात, इस युग में होमो सेपियन्स की उत्पत्ति हुई, जो बाद में पृथ्वी पर सर्वोच्च प्रजाति बने।  
आधुनिक मनुष्य ने अपने और अपने पूर्वजों के ज्ञान की निरंतरता (Persistence of Knowledge) के बल पर पृथ्वी के कोटि-कोटि वर्ष पुराने इतिहास को जीवाश्मों, शिलाओं, और अन्य भूवैज्ञानिक साक्ष्यों के माध्यम से समझने में सफलता प्राप्त की।  

कुछ ने समय को दैवीय चक्रों में देखा, कुछ ने मानवीय नैतिकता के उत्थान-पतन में, कुछ ने प्रौद्योगिकी के कदमों में, और कुछ ने विज्ञान की सटीक गणनाओं में। लेकिन सभी दृष्टिकोणों में एक सत्य स्पष्ट है—समय मानवीय चिंतन की सीमाओं को पार करने वाला एक अनंत साक्षी है। पृथ्वी का इतिहास हमें सिखाता है कि समय में सब कुछ जन्म लेता है, विकसित होता है, और समय के साथ लीन भी हो जाता है। समय एक अनंत प्रवाह है, जो सभी को अपनी गति में आगे ले जाता है। यह सृष्टि और विनाश का साक्षी है और परिवर्तन का मूल चालक है। आने वाले समय में, समय हमें नई संभावनाएं, प्रौद्योगिकी की अभूतपूर्व प्रगति, और मानवीय चेतना का गहरा उद्भव दिखा सकता है। लेकिन यह हमें संभावित संकटों, नैतिक प्रश्नों, और अज्ञात अनिश्चितताओं की ओर भी ले जा सकता है। समय की यह अनिश्चित प्रकृति ही इसे एक रहस्यमय और अपरिहार्य शक्ति बनाती है। आगे क्या होगा, यह कोई निश्चित रूप से नहीं बता सकता, लेकिन समय की गति में हम सभी एक अज्ञात यात्री हैं। यह हमें सिखाता है कि जीवन के प्रत्येक क्षण को ग्रहण कर, सीखकर, और अग्रगामी होकर ही हमारी सार्थकता है।


बुधवार, 13 अगस्त 2025

सुपरमैन: डिस्टेंट फायर्स की कहानी

एक अंधेरे भविष्य में, पृथ्वी का आकाश धूसर और धूल भरा हो चुका है। एक भयानक परमाणु युद्ध ने पूरे विश्व को विनाश के रास्ते पर ला दिया है। शहर खंडहर में तब्दील हो चुके हैं, अधिकांश जनसंख्या मृत है, और परमाणु विकिरण ने सुपरहीरो और खलनायकों की अलौकिक शक्तियों को भी नष्ट कर दिया है। इस अंधेरे संसार में एक व्यक्ति अकेला जीवन जी रहा है – वह है क्लार्क केंट, जो कभी सुपरमैन के नाम से जाना जाता था।

मेट्रोपोलिस के खंडहरों के बीच क्लार्क एक उदास जीवन जी रहा है। उसकी अलौकिक शक्तियाँ – उड़ान, असाधारण शारीरिक बल, एक्स-रे दृष्टि – सभी विकिरण द्वारा नष्ट हो चुकी हैं। वह अब केवल एक साधारण इंसान है, जो जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहा है। उसकी प्रियतम लोइस लेन, दोस्त जिमी ओल्सन, पेरी व्हाइट, और बैटमैन जैसे अन्य हीरो इस युद्ध में अपनी जान गँवा चुके हैं। क्लार्क ने अपने हाथों से उन्हें मेट्रोपोलिस के मलबे में दफनाया है। उसके मन में एक अनंत शून्यता और दुख की छाया बनी हुई है।

क्लार्क का एकमात्र साथी है एक विशाल बिल्ली, जिसे उसने क्रिप्टोनाइट नाम दिया है। यह बिल्ली विकिरण के कारण विकृत हो चुकी है, लेकिन इसका शारीरिक गठन असाधारण है। क्रिप्टोनाइट एक जंगली शेर की तरह दिखता है, फिर भी क्लार्क के लिए एक शांत साथी है। हर दिन वह इसे दुलारता है, इसके सिर पर हाथ फेरकर अपनी अकेलापन को दूर करता है। क्रिप्टोनाइट उसके साथ जंगल में भोजन की खोज करता है और विशाल चूहों तथा अन्य विकृत जीवों से उसकी रक्षा करता है।

परमाणु विकिरण ने पृथ्वी के पर्यावरण को विषाक्त कर दिया है। जंगल विषैले पौधों और विकृत प्राणियों से भरे हुए हैं। क्लार्क एक पुराने धातु के डिब्बे में भोजन इकट्ठा करता है, जिसमें कुछ बचा हुआ खाद्य सामग्री होती है। लेकिन हर कदम पर उसे खतरे का सामना करना पड़ता है। एक दिन, जंगल में भोजन की खोज करते समय एक विशाल चूहा उस पर जानलेवा हमला करता है। इसका आकार एक कुत्ते जैसा है, दाँत तेज और पूँछ विषैली। क्लार्क अपनी पुरानी धातु की छड़ का उपयोग करके इसे मार देता है, लेकिन क्रिप्टोनाइट उसकी मदद करता है। बिल्ली चूहे पर झपट्टा मारकर उसका गला दबा देती है, जिससे क्लार्क बच जाता है। यह घटना उसे क्रिप्टोनाइट के और करीब लाती है।

एक अन्य दिन, जंगल में भोजन की खोज के दौरान क्लार्क की एक आश्चर्यजनक मुलाकात होती है। वह वंडर वुमन को देखता है, जो इस आपदा से बच गई है। उसकी अमेज़ोनियन शक्तियाँ नष्ट हो चुकी हैं, लेकिन उसका साहस और दृढ़ता बरकरार है। दोनों एक-दूसरे को देखकर खुशी से अभिभूत हो जाते हैं। वंडर वुमन उसे चैंपियन नामक एक जंगल आश्रय स्थल पर ले जाती है, जहाँ अन्य बचे हुए हीरो और खलनायक एक साथ रह रहे हैं। क्रिप्टोनाइट भी उनके साथ जाता है और वहाँ सभी का प्रिय बन जाता है।

चैंपियन में क्लार्क कई परिचित चेहरों को देखता है। फ्लैश (वैली वेस्ट), गाय गार्डनर, मिस्टर मिरेकल, बिग बार्डा, चीता, और जोकर आदि। आश्चर्यजनक रूप से, जोकर ने परमाणु विकिरण के कारण अपनी पागलपन खो दिया है और एक शांत इंसान बन गया है। सभी सुपरहीरो और सुपरविलेन अपनी अलौकिक शक्तियाँ खो चुके हैं और एक नया जीवन बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। चैंपियन एक जंगली आश्रय स्थल है, जहाँ बचे हुए लोग एक छोटा समुदाय बनाकर रहते हैं। यह स्थान विषाक्त जंगल और विकृत प्राणियों से सुरक्षित रहने के लिए पुराने धातु के टुकड़ों और लकड़ी से बनी दीवार से घिरा हुआ है।

क्लार्क का साथी क्रिप्टोनाइट भी वहाँ रहता है। चैंपियन में क्रिप्टोनाइट बिल्ली सभी का ध्यान आकर्षित करती है। उसका शक्तिशाली शरीर और तेज दाँत समुदाय के लोगों की सुरक्षा में मदद करते हैं। क्रिप्टोनाइट अक्सर दीवार के बाहर विकृत जीवों, जैसे विशाल चूहों या विषैले साँपों, से लड़ता है। विकिरण के कारण पृथ्वी के जीव अस्वाभाविक आकार और शक्ति प्राप्त कर चुके हैं। एक दिन, एक विशाल चूहा दीवार तोड़कर चैंपियन में घुस आता है। क्रिप्टोनाइट इससे भयंकर लड़ाई में जीत जाता है, लेकिन उसे गहरे घाव हो जाते हैं। क्लार्क और वंडर वुमन मिलकर उसका इलाज करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप दोनों एक-दूसरे के प्रति प्रेम महसूस करने लगते हैं।

चैंपियन में क्लार्क और वंडर वुमन एक-दूसरे के करीब आते हैं। दोनों एक-दूसरे की मदद करते हैं, साथ खाते-पीते हैं, और धीरे-धीरे उनके बीच प्रेम जन्म लेता है। वंडर वुमन, यानी डायना, क्लार्क के दुख और अकेलेपन को समझती है। वह उसे अपने थीमिस्कीरा की कहानियाँ सुनाती है, जो अब नष्ट हो चुका है, और क्लार्क उसे क्रिप्टोन की यादें साझा करता है। यह रिश्ता समुदाय में आशा की किरण पैदा करता है, लेकिन यह सभी को खुश नहीं करता।

बिली बैट्सन, जो कभी “शज़ाम” शब्द उच्चारण करके कैप्टन मार्वल में बदल जाता था, अब शक्तिहीन है। वह चैंपियन में वंडर वुमन के साथ रिश्ते में था, लेकिन क्लार्क के आगमन से वह ईर्ष्या से भर जाता है। बिली के मन में क्रोध और असंतोष बढ़ता जाता है। वह क्लार्क को प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है और चैंपियन में अपनी जगह खोने का डर करता है।

क्रिप्टोनाइट बिल्ली चैंपियन का अभिन्न हिस्सा बन जाती है। यह समुदाय के लोगों को विकृत प्राणियों से बचाती है। एक रात, एक विषैला साँप दीवार तोड़कर अंदर घुस आता है। इसका जहर इतना शक्तिशाली है कि एक काटने से इंसान तुरंत मर सकता है। क्रिप्टोनाइट उस साँप से लड़ती है और उसका गला दबाकर मार देती है, लेकिन इस लड़ाई में उसके पैर में गहरे घाव हो जाते हैं। क्लार्क और डायना उसकी देखभाल करते हैं, और क्रिप्टोनाइट धीरे-धीरे ठीक हो जाती है। यह घटना क्रिप्टोनाइट को चैंपियन का हीरो बनाती है।

बिली बैट्सन की ईर्ष्या उसे अंधेरे रास्ते पर ले जाती है। वह अकेले जंगल में जाकर “शज़ाम” शब्द उच्चारण करता है। आश्चर्यजनक रूप से, एक जादुई बिजली उसे मारती है और वह कैप्टन मार्वल में बदल जाता है, हालांकि यह शक्ति थोड़े समय के लिए रहती है। यह उसे नई शक्ति और आत्मविश्वास देता है, लेकिन उसे नहीं पता कि यह बिजली पृथ्वी की भूगर्भीय स्थिरता को नष्ट कर रही है। हर बार जब वह “शज़ाम” कहता है, भूकंप और ज्वालामुखी सक्रिय होने का खतरा बढ़ जाता है।

बिली अपनी ईर्ष्या और क्रोध में अंधा होकर मेटालो नामक एक बचे हुए खलनायक के साथ हाथ मिलाता है। मेटालो, जिसका शरीर विकिरण के कारण और अधिक विकृत हो चुका है, चैंपियन को नष्ट करना चाहता है। वह विकृत जीवों को इकट्ठा करता है और बिली के साथ मिलकर आक्रमण की योजना बनाता है।

चैंपियन में एक भयंकर युद्ध शुरू होता है। मेटालो और बिली बैट्सन विकृत जीवों के साथ दीवार पर हमला करते हैं। क्लार्क, वंडर वुमन, फ्लैश, और बिग बार्डा मिलकर लड़ते हैं। क्रिप्टोनाइट भी इस युद्ध में हिस्सा लेती है और एक विशाल विकृत जीव को मारकर समुदाय की रक्षा करती है। लेकिन इस युद्ध में मार्शियन मैनहंटर और वंडर वुमन अपनी जान गँवा देते हैं। बिली, कैप्टन मार्वल के रूप में, वंडर वुमन को स्वयं मार देता है, जिससे क्लार्क क्रोध में पागल हो जाता है।

क्लार्क भले ही शक्तिहीन हो, लेकिन अपने अडिग साहस के कारण वह एक ज्वालामुखी के शिखर पर बिली से आमने-सामने होता है। युद्ध तीव्र होता है, लेकिन अचानक एक शक्तिशाली बिजली बिली को मारती है, जिससे उसकी मृत्यु हो जाती है। क्लार्क उसके शरीर को ज्वालामुखी में फेंक देता है। क्रिप्टोनाइट भी इस युद्ध में गंभीर रूप से घायल हो जाती है और क्लार्क की गोद में मर जाती है। यह क्लार्क को और तोड़ देता है।

क्लार्क को पता चलता है कि बिली की बिजली ने पृथ्वी की भूगर्भीय स्थिरता को नष्ट कर दिया है। ज्वालामुखी सक्रिय हो रहा है, और पृथ्वी जल्द ही नष्ट होने वाली है। वह चैंपियन में एक मृत ग्रीन लैंटर्न की पावर रिंग ढूँढता है, जिसमें थोड़ी सी शक्ति बची है। क्लार्क इसका उपयोग करके अपने बेटे ब्रूस के लिए एक शक्ति-चालित रॉकेट बनाता है। वह ब्रूस को इस रॉकेट में अंतरिक्ष में भेज देता है, जो उसे एक नए जीवन की आशा देता है।

क्लार्क स्वयं पृथ्वी पर रह जाता है, जहाँ वह अकेले मृत्यु की प्रतीक्षा करता है। वह क्रिप्टोनाइट के मृत शरीर के पास बैठकर पृथ्वी के अंतिम क्षणों को देखता है। वह अब क्रिप्टोन का अंतिम पुत्र है और पृथ्वी का भी अंतिम पुत्र।

यह कहानी आशा, निराशा, प्रेम, और विश्वासघात की एक मार्मिक कथा है। सुपरमैन, जो हमेशा मानवजाति का रक्षक रहा, शक्तिहीन होने के बावजूद अपने बेटे और मानवजाति के भविष्य के लिए लड़ा। क्रिप्टोनाइट की वीरता और वंडर वुमन का बलिदान इस कहानी को और गहरा बनाते हैं। यह हमें याद दिलाता है कि सबसे अंधेरे समय में भी आशा की एक किरण बनी रहती है।

सोमवार, 11 अगस्त 2025

घूसखोर ज्योतिषी(चंदामामा कहानी)

छत्रपुर राज्य में एक ज्योतिषी रहता था। नाम था कंर्कट शास्त्री। वह इस बात का दावा करता था कि देवी की उस पर विशेष कृपा है और इसलिए वह किसी भी घटना अथवा अपराध की सच्ची जानकारी बता सकता है। उसने इसी आधार पर राजा का विश्वास प्राप्त कर दरबार में एक विशेष स्थान बना लिया था । राजा फरियादों और शिकायतों के बारे में कर्कट शास्त्री की सलाह के अनुसार ही फ़ैसला सुनाते । शास्त्री को जो अधिक घूस देता, वह उसी के पक्ष में फ़ैसला दिलवा देता ।
यह अफ़वाह राजा तक पहुँच गई। राजा ने मंत्री से इस बात की सच्चाई का पता लगाने के लिए कहा। मंत्री ने राजा को इसके लिए एक उपाय सुझाया। दूसरे दिन राजा ने कर्कट शास्त्री से कहा- "हमारे दरबार के एक अधिकारी श्रीपति ने किसी पर घूस लेने का आरोप लगाया है। मैंने किसी कारण वश उस व्यक्ति का नाम गुप्त रखा है। आप श्रीपति की शिकायत की सच्चाई का पता लगा कर कल दरबार में आकर बताइए । यदि वह व्यक्ति सचमुच रिश्वतखोर साबित हुआ तो उसे कठिन दण्ड दिया जायेगा ।

उसी दिन रात को श्रीपति कर्कट शास्त्री के घर पहुँचा और बोला- "मैंने एक व्यक्ति पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया है। यदि यह आरोप सच साबित न हुआ तो राजा मुझे कठिन दण्ड देंगे। इसलिए सहायता

के लिए मैं आप के पास आया हूँ।" यह कह कर श्रीपति ने शास्त्री के हाथ एक हज़ार सिक्के दिये रख दी । दूसरे दिन दरबार में जब राजा ने श्रीपति की शिकायत के बारे में शास्त्री से पूछा तो उन्होंने देवी का नाम लेकर ध्यान करके कहा- "जय देवी ! महाराज, श्रीपति की शिकायत बिल्कुल सही है।"

राजा ने तुरन्त सिपाहियों को आदेश दिया- "कर्कट शास्त्री को बन्दों बना लो ।"

शास्त्री काँपता हुआ बोला- "महाराज! मुझे किस अपराध में बन्दी बनाया जा रहा है ?" "श्रीपति ने जिस व्यक्ति पर घूस लेने का आरोप लगाया था, वह आप ही हैं।" राजा ने उत्तर दिया ।'

रविवार, 3 अगस्त 2025

जीवन क्यों दुर्लभ है ?

ब्रह्मांड के असीम विस्तार में जीवन का अस्तित्व एक अद्भुत और अत्यंत दुर्लभ घटना है। यह असंख्य जटिल और अति विशिष्ट परिस्थितियों के संयोग का परिणाम है, जिसने पृथ्वी जैसे ग्रह पर जीवन को संभव बनाया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, जीवन की दुर्लभता इसके जैविक, भौतिक और खगोलीय समीकरणों में निहित है।

जीवन के लिए किसी ग्रह के पर्यावरण में कई विशिष्ट परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। सबसे पहले, जीवन के लिए तरल जल, उपयुक्त तापमान और स्थिर वायुमंडल आवश्यक हैं, जो ब्रह्मांड में अत्यंत दुर्लभ हैं। मंगल जैसे ग्रहों में इन सभी की कमी के कारण वहां जीवन स्थापित नहीं हो सका। ग्रह का अपने तारे से सुरक्षित हैबिटेबल ज़ोन(वासयोग्य क्षेत्र) में होना जरूरी है, जहां जल तरल अवस्था में रह सके। शुक्र ग्रह पर कभी जल था और जीवन की संभावना भी थी, लेकिन यह सुरक्षित क्षेत्र में न होने के कारण अब वहां का वातावरण नरक के समान है। ग्रह का आकार और भूगर्भीय संरचना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र जीवन को अंतरिक्षीय विकिरण से बचाता है। मंगल का चुंबकीय क्षेत्र अत्यंत कमजोर है, जिसके कारण वहां जीवन संभव नहीं है। प्लेट टेक्टॉनिक्स ,जलवायु नियंत्रण और खनिज चक्र के लिए आवश्यक है, लेकिन यह अन्य ग्रहों पर दुर्लभ है। यदि मंगल पर पृथ्वी जैसे भूगर्भीय हलचल होती, तो यह प्राकृतिक सक्रियता जैविक गतिविधियों को बढ़ावा दे सकती थी।

ग्रह की घूर्णन गति और कक्षा की स्थिरता दिन-रात चक्र और तापमान संतुलन के लिए जरूरी है। चंद्रमा का प्रभाव, ग्रह की अक्षीय स्थिरता और जलवायु नियंत्रण में सहायक है। बिना इनके पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं होता। पृथ्वी की घूर्णन गति (लगभग 24 घंटे में एक परिक्रमा) दिन-रात का चक्र बनाती है, जो जीवन के लिए आवश्यक है। यह चक्र तापमान में संतुलन बनाए रखता है, जिससे दिन में सूर्य की गर्मी और रात में ठंडक के बीच नियंत्रित परिवर्तन होता है। यह जैविक प्रक्रियाओं जैसे प्रकाश-संश्लेषण, नींद-जागृति चक्र और प्रजनन के लिए अनुकूल है। पृथ्वी की कक्षा सूर्य के चारों ओर लगभग 365.25 दिनों में एक परिक्रमा करती है, जिससे ऋतु चक्र बनता है। यह स्थिर कक्षा और अक्षीय झुकाव (23.5 डिग्री) जलवायु और ऋतु चक्र में स्थिरता लाता है, जो जीवन के विकास और विविधता के लिए आवश्यक है। मंगल की घूर्णन गति (24.6 घंटे) पृथ्वी के समान है, लेकिन इसकी कक्षा अधिक दीर्घवृत्ताकार (elliptical) है, जिससे तापमान में अत्यधिक परिवर्तन होता है। मंगल का अक्षीय झुकाव (25.2 डिग्री) भी ऋतुएं बनाता है, लेकिन इसका पतला वायुमंडल, कमजोर चुंबकीय क्षेत्र और सौर ऊर्जा की कमी तापमान संतुलन के लिए अनुकूल नहीं है। इसलिए मंगल पर जीवन की स्थिरता बनाए रखना कठिन है।

इसी तरह, पृथ्वी पर जीवन की स्थिरता में चंद्रमा का योगदान महत्वपूर्ण है। चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी के अक्षीय झुकाव को स्थिर रखती है। यह पृथ्वी के अक्ष को अत्यधिक डगमगाने (wobbling) से बचाती है, जिससे जलवायु में दीर्घकालिक स्थिरता बनी रहती है। यदि चंद्रमा न होता, तो पृथ्वी का अक्षीय झुकाव अनियमित रूप से बदलता, जिससे जलवायु में अत्यधिक अस्थिरता उत्पन्न होती और जीवन असंभव हो जाता। मंगल के दो छोटे उपग्रह (फोबोस और डीमोस) होने के बावजूद उनका गुरुत्वाकर्षण इतना कमजोर है कि वे मंगल को अक्षीय स्थिरता प्रदान नहीं कर सकते। इसलिए मंगल की जलवायु दीर्घकालिक रूप से अस्थिर है। चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी पर ज्वार-भाटा उत्पन्न करता है, जो समुद्र में जल को गति देता है। यह ज्वार-भाटा जीवन की उत्पत्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। ज्वार-भाटा द्वारा उत्पन्न गति समुद्र में जैव रासायनिक प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित कर सकती है, जो जीवन के प्रारंभिक रूपों के निर्माण में सहायक रही होगी। उदाहरण के लिए, ज्वार-भाटा द्वारा समुद्र तट पर खनिजों और जैविक पदार्थों का मिश्रण जीवन के रासायनिक विकास को सरल बनाता है। मंगल पर बड़े उपग्रह की अनुपस्थिति के कारण ऐसा ज्वार-भाटा उत्पन्न नहीं होता, जो जीवन की उत्पत्ति के लिए अनुकूल वातावरण बना सके। चंद्रमा पृथ्वी की जलवायु नियंत्रण में भी सहायक है। ज्वार-भाटा द्वारा समुद्री धाराएं उत्पन्न होती हैं, जो ग्रह के तापमान संतुलन में मदद करती हैं। उदाहरण के लिए, गल्फ स्ट्रीम जैसी धाराएं गर्म जल को उच्च अक्षांशों तक ले जाकर जलवायु को नम बनाए रखती हैं। मंगल पर तरल जल और ज्वार-भाटा की अनुपस्थिति के कारण ऐसा जलवायु नियंत्रण संभव नहीं है।

जीवन की उत्पत्ति और विकास के लिए जैविक अणुओं जैसे अमीनो एसिड और न्यूक्लिक एसिड का निर्माण आवश्यक है, जो अत्यंत जटिल है। अजैविक पदार्थों से जैविक जीवन की उत्पत्ति (एबायोजेनेसिस) एक दुर्लभ प्रक्रिया है। कार्बन, ऑक्सीजन और नाइट्रोजन जैसे रासायनिक तत्वों की उपस्थिति और वायुमंडल की रासायनिक संरचना का उपयुक्त संयोजन जीवन के लिए अपरिहार्य है। जल की रासायनिक विशेषताएं, जैसे इसकी विलायक क्षमता और तापमान नियंत्रण, जीवन को संभव बनाती हैं, लेकिन यह अन्य ग्रहों पर दुर्लभ है। खगोलीय धूल से भारी तत्वों की उत्पत्ति, जो सुपरनोवा विस्फोट से आते हैं, भी दुर्लभ है। जैविक चयापचय और जीवन की प्रजनन क्षमता के लिए जटिल प्रक्रियाएं आवश्यक हैं। सूक्ष्मजीवों का सहजीवन (जैसे माइटोकॉन्ड्रिया की उत्पत्ति) जीवन के विकास में महत्वपूर्ण है। ऑक्सीजन का विकास, जो सायनोबैक्टीरिया जैसे जीवों द्वारा संभव हुआ, जटिल जीवन के लिए आवश्यक है।

जीवन का विकास एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है। एककोशिकीय जीवों से बहुकोशिकीय जटिल जीवन में विकसित होने के लिए अरबों वर्षों की विकासवादी प्रक्रिया आवश्यक है। आनुवंशिक विविधता और उत्परिवर्तन का उपयुक्त संयोजन जीवन की विविधता और अनुकूलन के लिए जरूरी है। बहुकोशिकीय जीवन की उत्पत्ति एक कठिन और दुर्लभ घटना है। चेतना का उद्भव, जैसा कि मनुष्यों में देखा जाता है, अत्यंत असाधारण है। जैविक अनुकूलन का समय और विकासवादी संयोग जीवन को पर्यावरण के अनुकूल बनाने में सहायक है, लेकिन इसकी संभावना अत्यंत कम है। जैव रसायन का संयोजन, जैसे कार्बन-आधारित जीवन, अन्य रासायनिक व्यवस्थाओं से अधिक संभावनायुक्त है, लेकिन फिर भी दुर्लभ है। जैविक विविधता के विकास के लिए दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता आवश्यक है। इन सभी कारणों से पृथ्वी जैसे ग्रह और उस पर जीवन अत्यंत दुर्लभ हैं।

किसी ग्रह पर जीवन के लिए पर्यावरणीय स्थिरता और जलवायु संतुलन अपरिहार्य हैं। ऊर्जा की उपलब्धता, जैसे सौर ऊर्जा या भूतापीय ऊर्जा, जीवन के चयापचय के लिए जरूरी है। सौर विकिरण का संतुलन जीवन को अत्यधिक गर्मी या ठंड से बचाता है। ग्रह के भूगर्भीय चक्र, जैसे कार्बन चक्र, जीवन को बनाए रखने में मदद करते हैं। आकाशगंगा के घनत्व के दृष्टिकोण से जीवन के लिए एक मध्यम क्षेत्र आवश्यक है, जहां तारों का घनत्व न तो अत्यधिक हो और न ही बहुत कम। तारे की स्थिरता, जैसे पृथ्वी का सूर्य, दीर्घकालिक ऊर्जा आपूर्ति के लिए जरूरी है। खगोलीय संयोग और समय का समन्वय जीवन की उत्पत्ति और विकास के लिए उपयुक्त स्थान और समय पर मिलन को दर्शाता है। ड्रेक समीकरण द्वारा व्यक्त अज्ञात संभावनाएं बुद्धिमान जीवन की अत्यंत कम संभावना को दर्शाती हैं।

ये सभी कारण स्पष्ट करते हैं कि जीवन, विशेष रूप से बुद्धिमान जीवन, ब्रह्मांड में एक असाधारण घटना है। पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व एक खगोलीय “चमत्कार” है, जो असंख्य संयोगों का परिणाम है। यह जीवन के मूल्य को और बढ़ाता है, क्योंकि यह ब्रह्मांड में एक अनूठी घटना है। मानव जीवन की चेतना, बुद्धि और संस्कृति सृजन की क्षमता इसे और मूल्यवान बनाती है।

ब्रह्मांड में जीवन की दुर्लभता इसकी जैविक, भौतिक और खगोलीय जटिलता में प्रतिबिंबित होती है। उपयुक्त ग्रहीय परिस्थितियां, रासायनिक समन्वय, विकासवादी जटिलता और खगोलीय स्थिरता—जीवन की असाधारण संभावना को स्पष्ट करते हैं। यह जीवन के मूल्य को और गहरा करता है और हमें इसके संरक्षण और सम्मान के लिए प्रेरित करता है। जीवन की यह दुर्लभता हमें मानव अस्तित्व की अनूठी प्रकृति और इसके महत्व को अनुभव कराती है।

कबीर के शब्दों में:
“मानुष जन्म दुर्लभ है,  
मिले न बारंबार।  
तरुवर से पत्ता टूट गिरे,  
बहुर न लागता डार॥”

अर्थात् मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है और यह बार-बार नहीं मिलता। यह एक अमूल्य अवसर है, जो व्यक्ति को आध्यात्मिक और नैतिक उन्नति के लिए प्राप्त होता है। जैसे पेड़ से टूटा पत्ता फिर से डाल पर नहीं लगता, वैसे ही एक बार खोया हुआ मानव जीवन फिर से नहीं मिलता। इसलिए जीवन के मूल्य को समझकर, इसकी वैज्ञानिक दुर्लभता को जानकर इसका उचित उपयोग करें। हमें प्राप्त यह जीवन ब्रह्मांड का एक अलौकिक उपहार है, इसलिए इस दुर्लभ जीवन का सम्मान करना हम सभी का कर्तव्य होना चाहिए।