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शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

•राजा बरबास की लोककथा•

एक समय की बात है, एक राजा थे जिनका नाम था बरबास। राजा बरबास को फलों से बहुत प्रेम था। आम, कटहल, अंगूर, नाशपाती, अनार, लीची, बेर और पीच जैसे दुनिया भर के फल उन्हें बेहद पसंद थे। वह हर तरह के फल खाते और उनके स्वाद में खो जाते। फलों के प्रति उनकी दीवानगी इतनी थी कि वह हर मौसम में नए-नए फल ढूंढकर खाते।

एक दिन जब राजा बरबास फल खा रहे थे, तभी एक वृद्ध महिला उनके पास आई और भूख से व्याकुल होकर उनसे खाने के लिए कुछ मांगने लगी। राजा को उस समय गुस्सा आ गया और उन्होंने तीखे स्वर में कहा, "क्या तुम नहीं देख रही कि मैं फल खा रहा हूँ? बाद में आना, जो मांगोगी, दे दूंगा।" वृद्धा ने फिर विनती की, "मुझे बहुत भूख लगी है, बस एक फल दे दीजिए, यह मेरे लिए बहुत बड़ी मदद होगी।" लेकिन राजा बरबास, जो फलों के प्रति लालची थे, ने कोई फल देने से मना कर दिया। उन्होंने अपने सैनिकों को बुलाकर वृद्धा को वहां से हटाने का आदेश दिया।

जाते-जाते वृद्धा ने गुस्से में राजा को श्राप दे दिया। उसका श्राप फलित हुआ और कुछ ही दिनों में राजा का शरीर फल की तरह फूलने लगा। उनका शरीर इतना भारी हो गया कि वह चलने-फिरने में असमर्थ हो गए। उनकी शारीरिक शक्ति धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी और उनका मन भी दुर्बल हो गया। कुछ ही समय बाद राजा बरबास की मृत्यु हो गई।

जब राजा को दफनाया गया, तो उस स्थान पर एक अजीब सा पेड़ उगा। इस पेड़ के फल अनोखे थे, जिनके सिरे पर राजमुकुट जैसी आकृति दिखाई देती थी। ये फल कच्चे होने पर कसैले और पकने पर अमृत जैसे मीठे होते थे। लोग इसे "पिजुली" कहने लगे। इस फल का नाम राजा बरबास के नाम पर रखा गया और इसे "बयाबास" (bayabas) कहा जाने लगा। यह लोककथा दक्षिण-पूर्व एशिया में विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
पर अमरुद कि Bayabas नाम का वास्तविक व्युत्पत्ति (Etymology) इतिहास भिन्न है । लोककथा में बयाबास का नाम राजा बरबास से जोड़ा गया है, लेकिन वास्तव में "बयाबास" शब्द की उत्पत्ति टैगालॉग और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई भाषाओं में प्रचलित है। यह शब्द स्पेनिश भाषा के "guayaba" से लिया गया है, जो अमरूद (guava) को दर्शाता है। स्पेनिश शब्द "guayaba" की उत्पत्ति प्राचीन अमेरिकी भाषा ताइनो (Taíno) के शब्द "wayaba" से हुई है, जो कैरिबियाई क्षेत्र के स्वदेशी लोगों की भाषा थी। ताइनो भाषा में "wayaba" का अर्थ था अमरूद का पेड़। 

स्पेनिश उपनिवेशकों ने इस शब्द को अपनाया और इसे "guayaba" के रूप में प्रयोग किया, जो बाद में दक्षिण-पूर्व एशियाई भाषाओं जैसे टैगालॉग में "bayabas" के रूप में प्रचलित हुआ। इस प्रकार, "बयाबास" शब्द का संबंध राजा बरबास की लोककथा से नहीं, बल्कि ताइनो भाषा के "wayaba" से है, जो स्पेनिश "guayaba" के माध्यम से विभिन्न भाषाओं में फैला । 

सोमवार, 26 मई 2025

मिस्टर, मिस, मिसेज और मैडम : व्युत्पत्ति और भ्रामक धारणाएँ

कई वर्षों से भारत में अंग्रेजी शब्दों जैसे "मिस," "मिस्टर," "मिसेज," और "मैडम" आदि को लेकर अनेक भ्रांतियों का प्रचार किया जा रहा है। इन शब्दों को आधार बनाकर अंग्रेजी भाषा और यूरोप के लोगों को अनावश्यक रूप से हीन और निम्न सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, इन शब्दों की व्युत्पत्ति, इतिहास और ऐतिहासिक प्रयोग भिन्न तथ्य प्रस्तुत करते हैं।

मिस्टर (Mister) को संक्षेप में Mr., मिस (Miss) को Ms., और मिसस (Missus), मिसेज (Misses) या मिस्ट्रेस (Mistress) को Mrs. लिखा जाता है। यूरोप में आमतौर पर नाम से पहले Mr., Ms., और Mrs. का उपयोग किया जाता है। भारत में भी हम श्री, श्रीमान, श्रीलश्रीमान, श्रीमती, देवी, और कुमारी जैसे शब्दों का उपयोग नाम से पहले करते हैं।

मिस्टर, मिस, और मिसस इन तीनों शब्दों को लेकर विश्व में एक भ्रांति प्रचलित है कि जो "मिस" यानी खो गया या छूट गया, उसे मिस्टर, मिस, या मिसस कहा जाता है। लेकिन इन तीनों शब्दों की व्युत्पत्ति (Etymology) बताती है कि यह एक गलत धारणा है और कुछ नहीं।

मिस्टर (Mister):
मिस्टर शब्द अंग्रेजी में 15वीं शताब्दी से प्रचलित है और यह मूल रूप से "मास्टर" (Master) शब्द का एक अनाघटित (Unaccented) रूप है, जिसका अर्थ है मालिक, प्रभु, शिक्षक, या नेता। यह शब्द ब्रिटेन में रोमन शासन काल से लैटिन मूल का है। मध्ययुग में अंग्रेजी में मास्टर शब्द को maister, mayster, meister, maistren आदि रूपों में लिखा जाता था, और प्राचीन अंग्रेजी में यह mǣster, mæġster, mæġester, mæġister, magister के रूप में प्रचलित था। मास्टर शब्द का मूल लैटिन शब्द magister या magester है, जिसका अर्थ है मुखिया, शिक्षक, या नेता। पाश्चात्य भाषाविदों ने मास्टर शब्द की प्राक्-भारोपीय धातु *méǵh₂s (बड़ा, महान) मानी है। इस धातु से भारतीय भाषाओं में "महान, महत्, महस्" जैसे शब्द भी उत्पन्न हुए हैं। इस प्रकार, मिस्टर शब्द मास्टर का एक भिन्न अर्थ में प्रयुक्त होने वाला रूप है, जो 15वीं शताब्दी से प्रचलित है।

मिस, मिसस, और मिसेज (Miss, Missus, Mrs.):

ये तीनों शब्द वास्तव में "मिस्ट्रेस" (Mistress) शब्द के संक्षिप्त रूप हैं। अंग्रेजी में मिस्ट्रेस का मध्ययुगीन रूप maistresse था, जो प्राचीन फ्रांसीसी शब्द maistresse से लिया गया है। सतही विश्लेषण (Surface Analysis) के दृष्टिकोण से कहा जा सकता है कि mist(e)r शब्द में स्त्रीवाचक प्रत्यय -ess जोड़कर मिस्ट्रेस शब्द बना। आधुनिक अंग्रेजी में मिस्ट्रेस का अर्थ रखैल, प्रेयसी, या सर्वगुणसंपन्न महिला भी होता है, लेकिन इसका मूल अर्थ था मालकिन, गृहस्वामिनी, या महिला शिक्षिका।

यूरोप के प्राचीन साहित्य से पता चलता है कि विभिन्न कालखंडों में मिस्ट्रेस शब्द का उपयोग विभिन्न अर्थों में हुआ। 13वीं शताब्दी में यह शब्द महिला शिक्षिका, गृहपरिचारिका, या गवर्नेस (Governess) को संबोधित करने के लिए प्रचलित था। प्राचीन फ्रांसीसी में maistresse का अर्थ प्रेमिका, गृहपरिचारिका, गवर्नेस, या शिक्षिका था। बड़े राजप्रासादों या धनी व्यक्तियों के घरों में कार्य संचालन करने वाली महिलाओं, जो अन्य कर्मचारियों को निर्देश देती थीं, उन्हें मिस्ट्रेस कहा जाता था। 15वीं शताब्दी में उन महिलाओं को भी मिस्ट्रेस कहा जाता था, जो किसी कला या क्षेत्र में विशेष दक्षता रखती थीं। कुछ क्षेत्रों में रखैल के अर्थ में भी इस शब्द का उपयोग हुआ। लेकिन 13वीं शताब्दी से पहले मिस्ट्रेस शब्द मास्टर का स्त्रीवाचक रूप था, जिसका अर्थ गृहस्वामिनी था।

आधुनिक उपयोग:
आजकल अंग्रेजी भाषी देशों में अविवाहित कन्याओं, तलाकशुदा महिलाओं, विधवाओं, भोजन परोसने वाली महिलाओं, और अविवाहित शिक्षिकाओं को "मिस" कहकर संबोधित किया जाता है। लेकिन 17वीं शताब्दी से पहले ब्रिटेन में सभी विवाहित और अविवाहित महिलाओं को "मिस" कहा जाता था। वहीं, Mrs., Misses, और Missus जैसे संबोधन 18वीं शताब्दी तक केवल कुलीन और उच्चवंशीय विवाहित या अविवाहित महिलाओं के लिए उपयोग होते थे, जो बाद में केवल विवाहित महिलाओं के लिए प्रचलित हुए।

मिस्टर, मिस, मिसस, और मिस्ट्रेस जैसे शब्द लैटिन या इटैलिक भाषा मूल के हैं, और इनका जर्मनिक मूल के "मिस" (खोना) या "मिसिंग" शब्दों से कोई संबंध नहीं है। अंग्रेजी एक जर्मनिक भाषा है और अंग्रेज जाति एक जर्मनिक जाति है, इसलिए अंग्रेजी में "मिस" जैसे कई जर्मनिक मूल के शब्द हैं, जो वास्तव में मूल अंग्रेजी शब्द हैं। "खोना" अर्थ वाला मिस शब्द मध्ययुगीन अंग्रेजी में missen और प्राचीन अंग्रेजी में missan था। इस मिस शब्द का प्राक्-जर्मनिक रूप missijaną (खोना, गलत होना, असफल होना) और प्राक्-भारोपीय रूप *meytH- माना गया है, जिसका भारतीय शब्दों जैसे मेथति, मेथेते, और मिथस् से संबंध है।

महिलाओं को संबोधित करने वाले मिस, Ms., Mrs., और Missus जैसे शब्द लैटिन मूल के हैं, जबकि "खोना" अर्थ वाला मिस शब्द जर्मनिक मूल का है। इन दोनों असंबंधित शब्दों को एक मानकर लोग यह भ्रांति फैलाते हैं कि जो खो गया, उसे मिसस या मिस कहा जाता है। लेकिन व्युत्पत्ति की दृष्टि से यह एक विचित्र मत है और कुछ नहीं।

मैडम (Madam) और मा’म (Ma’am):

यूरोप और अमेरिका में महिलाओं को मैडम या मा’म कहकर संबोधित किया जाता है, जो अधिकांश क्षेत्रों में सम्मानजनक संबोधन माना जाता है। बाद में कुछ क्षेत्रों में वेश्यालय चलाने वाली मुख्य महिलाओं को भी मैडम कहा गया। भारत जैसे कुछ देशों में मैडम शब्द कभी-कभी अपमानजनक माना जाता है और इसे अहंकारी या अपमान करने वाली महिला के लिए उपयोग किया जाता है। लेकिन प्राचीन काल में मैडम शब्द केवल गृहस्वामिनी के लिए उपयोग होता था। मिस्ट्रेस की तरह मैडम शब्द भी मालकिन को संबोधित करने के लिए प्रचलित था।

मैडम शब्द लैटिन भाषा के mea domina का आधुनिक रूप है, जिसका शाब्दिक अर्थ है "मेरी गृहस्वामिनी" या "मेरी मालकिन"। Dominus का स्त्रीवाचक रूप domina था, और दोनों शब्द क्रमशः गृहस्वामी/मालिक और गृहस्वामिनी/मालकिन के अर्थ में लैटिन भाषा में प्रचलित थे। इसका प्राक्-इटैलिक रूप domos और प्राक्-भारोपीय मूल dṓm (घर, गृह) और धातु dem- (निर्माण करना, गढ़ना) माना गया है। इस दृष्टि से आधुनिक मैडम शब्द में मौजूद dam शब्द प्राचीन ग्रीक δόμος (dómos), अल्बानियाई dhomë (कमरा), अवेस्तानी 𐬛𐬀𐬨- (dam-), और संस्कृत दम (dáma, घर) जैसे शब्दों से संबंधित है।

आज भी अमेरिका और यूरोप में राष्ट्रपति की पत्नी को First Lady और ब्रिटेन में महारानी को My Lady कहकर संबोधित किया जाता है। कुछ लोग मैडम का अर्थ "मेरी स्त्री" करते हैं, लेकिन वे यह नहीं जानते कि मैडम शब्द का मूल लैटिन mea domina का अर्थ "मेरी गृहस्वामिनी" था। समय के साथ कुछ क्षेत्रों में मैडम शब्द अपमानजनक बन गया, लेकिन क्या इससे मैडम शब्द अपशब्द हो गया?

भारत में "बाई" शब्द कुछ क्षेत्रों में दादी या माँ को संबोधित करने के लिए और कुछ क्षेत्रों में सम्मानसूचक शब्द के रूप में, जैसे रानी लक्ष्मीबाई, उपयोग होता है। लेकिन उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में वेश्याओं को उनके नाम के साथ "बाई" जोड़कर संबोधित किया जाता है। तो क्या "बाई" शब्द अश्लील है, और क्या भारतीय अपनी दादी, माँ, या रानियों को बाई कहकर अप्रत्यक्ष रूप से वेश्या कह रहे हैं?

एक शब्द का उपयोग अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग अर्थों में होता है। इसलिए किसी शब्द के एक विशिष्ट अर्थ को लेकर उसका उपयोग करने वाली मानवजाति पर दोषारोपण करना कितना उचित है? Mea domina का शाब्दिक अर्थ "मेरी गृहस्वामिनी" था, जिससे मैडम शब्द बना। अगर कुछ लोग इसका अर्थ "मेरी स्त्री" करें, तो क्या यह उचित है? First Lady और My Lady का अभिप्राय प्रथम महिला या मेरे देश की प्रथम महिला है। अगर कोई My Lady का शाब्दिक अर्थ "मेरी महिला" या "मेरी स्त्री" माने, तो उसे कौन समझाए?

आधा-अधूरा ज्ञान लेकर बहुत से लोग किसी शब्द पर विवादास्पद भाषण देना बड़ी बात नहीं मानते। कई लोग ऐसा कर चुके हैं और आगे भी करेंगे। शब्द की व्युत्पत्ति को समझे बिना, केवल सतही जानकारी के आधार पर किसी शब्द को लेकर एक विशिष्ट समाज पर आक्षेप करना नया नहीं है। ओडिशा में भी "बोउ, बुई, बेई, बाई, नाना, नानी, ददा" जैसे शब्दों को लेकर कुछ क्षेत्रवादी लोग तटीयवासियों पर आक्षेप और अपमान करते हैं। यह केवल द्वेष भावना से किया गया मानसिक व्यभिचार है और कुछ नहीं।

सभी भाषाएँ श्रेष्ठ हैं, सभी शब्द श्रेष्ठ हैं। यह मनुष्य की चिंतनधारा पर निर्भर करता है कि वे किसी शब्द को किस तरह देखते हैं। द्वेष करने वाले लोग "बोउ(ओड़िआ में माता को किया जानेवाला मधुर संबोधन)" जैसे मधुर शब्द में भी दोष निकाल सकते हैं। इसलिए शब्द अश्लील नहीं, मनुष्य की चिंतनधारा अश्लील होती है, क्योंकि शब्द तो स्वयं ब्रह्म है!

सोमवार, 12 मई 2025

क्या अवधी भाषा के निआर शब्द से अंग्रेजी Near शब्द बना है?

श्री सुधांशु त्रिवेदी जी अपने कई साक्षात्कारों में रामचरितमानस के किष्किन्धा कांड में मौजूद एक चौपाई का उल्लेख करते हैं:

“बरषहिं जलद भूमि निअराएँ।
 जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।
बूँद अघात सहहिं गिरि कैसे। 
खल के बचन संत सह जैसें॥2॥”

इसके बाद वे कहते हैं कि इस चौपाई में ‘निअर’ शब्द है, जिसका अर्थ है निकट। कोई कह सकता है कि रामचरितमानस में अंग्रेजी शब्द ‘Near’ (निकट) आकर मिल गया है। लेकिन क्या तुलसीदास के समय में अयोध्या में अंग्रेजों का शासन था? नहीं, नहीं था! इसलिए अवधी का यह ‘निअर’ शब्द ही अंग्रेजी भाषा में ‘Near’ शब्द के रूप में प्रचलित हुआ।

शब्द व्युत्पत्ति विज्ञान को जाने बिना जब लोग केवल दो शब्दों के बीच बाहरी समानता देखकर एक शब्द को दूसरे का मूल घोषित कर देते हैं, तो देश के भाषाविदों को इसका सत्य-असत्य जानकर समाज को सूचित करना चाहिए।

दुख की बात है कि 140 करोड़ की जनसंख्या वाले भारत में कोई भी इस भ्रामक टिप्पणी के खिलाफ तर्कसंगत मत व्यक्त नहीं करता, न ही कभी किया है।

“(शब्द व्युत्पत्ति विज्ञान के क्षेत्र में) यदि दो शब्दों के बीच व्युत्पत्तिगत संबंध हो, तो उन्हें सगोत्रीय या phylogenetically linked कहा जाता है। असगोत्रीय शब्दों को केवल बाह्य समानता के आधार पर जोड़ना सांख्यिकी में spurious association कहलाता है। ऐसा करने से पाठक स्वयं भ्रमित होते हैं और दूसरों को भी भ्रमित करते हैं।”

सुधांशु त्रिवेदी ने अवधी के ‘निअर’ और अंग्रेजी के ‘Near’ के बीच बाहरी समानता देखकर दोनों को एक ही मूल का मान लिया और स्वयं भ्रम में पड़कर दूसरों को भी भ्रमित कर दिया।

वास्तव में, अवधी का ‘निअर’ (निकट) और अंग्रेजी का ‘Near’ (निकट) अर्थ में समान हैं, दोनों के उच्चारण में भी कुछ समानता है, लेकिन कोई सगोत्रीय संबंध नहीं है।

अंग्रेजी में प्रचलित ‘Near’ शब्द एक शुद्ध अंग्रेजी शब्द है। इसका मध्यकालीन अंग्रेजी रूप nere और ner था, और प्राचीन अंग्रेजी में nēar। अंग्रेजी ‘Near’ का मूल पश्चिमी जर्मनिक रूप nēhw (“near”) था, जिससे अन्य भाषा जैसे डच में naar (“to, towards”), जर्मन में näher (“nearer”), डेनिश में nær(“near, close”), नॉर्वेजियन में nær (“near, close”), और स्वीडिश में nära (“near, close”) जैसे शब्द बने। ये सभी भाषाएँ इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की जर्मनिक शाखा की हैं, इसलिए एक ही अर्थ वाले सगोत्रीय शब्दों का कई भाषाओं में प्रचलन आश्चर्यजनक नहीं है। भाषाविदों ने अंग्रेजी ‘Near’ का मूल इंडो-यूरोपीय धातु *h₂neḱ- (पहुँचना, प्राप्त करना) के रूप में निर्धारित किया है। इस दृष्टि से अवधी का ‘निअर’ नहीं, बल्कि संस्कृत के आनट्, आष्ट, अश्नोति, अक्ष् धातु और अक्षति जैसे शब्द अंग्रेजी के ‘Near’ और ‘Nigh’ जैसे शब्दों से सगोत्रीय संबंध रखते हैं।

तो फिर अवधी में प्रचलित ‘निअर’ शब्द की व्युत्पत्ति क्या है?

इस प्रश्न का उत्तर आज से साठ-सत्तर वर्ष पहले भाषाविद सर राल्फ लिली टर्नर ने अपनी व्युत्पत्ति कोश A Comparative Dictionary of Indo-Aryan Languagesके 409वें पृष्ठ पर दिया था। सर टर्नर के अनुसार, अवधी में प्रचलित ‘निअर’ शब्द संस्कृत के ‘निकट’ शब्द से निकला देसी शब्द है। इस व्युत्पत्ति कोश के अनुसार, संस्कृत का ‘निकट’ शब्द पालि में निकट्ठे, प्राकृत में णिअड्, णिअल, णिअडिअ, और बौद्ध संस्कृत शैली में nī́er के रूप में प्रचलित था। 

पाकिस्तान, भारत और अफगानिस्तान में कई इंडिक भाषाएँ प्रचलित हैं, जिन्हें दार्दिक भाषाएँ कहा जाता है। कई दार्दिक इंडिक भाषाओं में भी ‘निकट’ शब्द विभिन्न रूपों में प्रचलित है। उदाहरण के लिए, दार्दिक भाषा दमेली में nyεiŕ और nyäyᵃ, दरवाली में niō, दार्दिक भाषा पशाई में nyōṛṓ, दार्दिक भाषा Gawar-Bati में nyāṛɔ, साबी में nyeṛo, और पालुला या अस्राती में nihā́ṛa जैसे शब्द ‘निकट’ शब्द के मूल से हैं समानार्थी भी हैं। सबसे प्रसिद्ध दार्दिक भाषा कश्मीरी में nyūrᵘ, nīrᷴ, nēri, nēṛē (रामवाणी उपभाषा), *niōṛᵘ* (कष्टवारी उपभाषा), और *nēṛi* (पोगुली शैली) जैसे शब्द ‘निकट’ अर्थ में प्रचलित हैं। 

इसी तरह, पश्चिमी पंजाबी लहण्डा भाषा में ‘निकट’ से सगोत्रीय शब्द neṛe समान अर्थ में प्रचलित है, जबकि पंजाबी में neṛā (आसपास) और neṛe (निकट) शब्द प्रचलित हैं। 

पश्चिमी पहाड़ी भाषा में nēṛō और *nīṛ*, कामायुनी में neṛo, नेपाली में nira, बंगाली में niaḍi और niyaṛ, मराठी और भोजपुरी में niyar, हिंदी में neṛe, nīṛe और nīre, तथा गुजराती में neṛε जैसे शब्द ‘निकट’ शब्द से समोद्भूत हैं और समान अर्थ में प्रचलित हैं, जैसा कि सर राल्फ लिली टर्नर के व्युत्पत्ति कोश में उल्लेखित है।

इस व्युत्पत्ति कोश के अनुसार, ओड़िया भाषा में भी एक शब्द ‘निआड़’ प्रचलित है, जो इसी मूल का शब्द है। पूर्णचंद्र भाषा कोश में ‘निआड़’ शब्द के अर्थ के रूप में सामने, निर्अंतराल, प्रत्यक्ष और निकटवर्ती आदि उल्लेखित हैं। साथ ही, कथित ओड़िया शब्दकोश के 669वें पृष्ठ पर ‘निआत’ शब्द का उल्लेख अनुगोल क्षेत्र में ‘निकट’ अर्थ में प्रचलित होने के रूप में किया गया है।

इसलिए, कुल मिलाकर, संस्कृत का ‘निकट’, प्राकृत का णिअड् और णिअल, अवधी का ‘निअर’, और ओड़िया का ‘निआड़’ आदि शब्दों के साथ अंग्रेजी के ‘Near’ शब्द का कोई भी सगोत्रीय संबंध नहीं है । 

सुधांशु त्रिवेदी जैसे विद्वान वक्ता और ज्ञानी भी भूल कर सकते हैं। इसलिए, चाहे कितने बड़े व्यक्ति का कथन या लेख हो, शब्द व्युत्पत्ति से संबंधित मतों को आँख मूंदकर स्वीकार करने के बजाय उनके सत्य-असत्य की जाँच करना हमारा कर्तव्य होना चाहिए, है न?