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रविवार, 2 जुलाई 2017

भारत में इमली

भारत में मिठे से ज्यादा खट्टे फल दिखजाते....
आम को लोग चाहें कितना ही मिठा कह लें है तो वो एक खट्टा फल ही ...
mangifera यानी आम जाति के सभी फलों का जन्म च्युंकि भारत में हुआ
इसलिए इसे राष्ट्रीय फल का दर्जा प्राप्त है
लेकिन अकेला आम ही ऐसा खट्टा फलोंवाला वृक्ष नहीं है जो भारतीय भूभागों का मूलनिवासी रहा हो ।
Tamarindus indica यानी कि इमली भी एक मूल भारतीय वृक्ष है । युरोपिय लोग इसके अरवी नाम #तमार से इसे जानते थे जिसका मतलब होता है इंडियन डेट् ।
संस्कृत में इसके कई नाम मिलजाते है
जैसे #अम्लिका,#चूत्रिका,#चिंचिका,#चिंच,#दन्तशठा तथा #तिन्तिडि.....

संस्कृत के #तिंतिडी शब्दसे odia में #तिन्तिलि व #तिन्तुली शब्द का जन्म हुआ है
वही शब्द बाद में ओर बदलकर #तेन्तुली बनगया....
तेन्तुली से मिलता जुलता शब्द आसामीया भाषामें प्रचलित हे #चेंतुली
लेकिन ओडिआमें इसके अलावा भी इमलीका एक ओर नाम है
#कइँआ #कँया
कहते है इस शब्द का जन्म एक द्रविड़ शब्द
#पुलिकाइ से हुआ है ।
यहां पुलि शब्द लुप्त हो केवल कइ/काइ बचगया ओर बादमें वही कइ/काइ शब्द अपभ्रंश के वजह से बदलकर कइँआ या कँया हुआ ।
इस बात का सबसे बडा सबुत
आज भी तामिलनाडु में लोग इमली को #पुलि
कहते है ।
पुराने हिंदीमें चिंच तथा अम्ली शब्द पहले इमली के लिए प्रचलन में था
बादमें अम्ली शब्द अपभ्रंश होकै इमली शब्द बनगया है ।
चिंच को मराठी लोग बहुतायत में व्यवहार करते है
चिंच से मिलता-जुलता एक शब्द तेलुगु में इमली के लिए है #चिंट
वैसे तेलुगु लोग इमलीको चिंतापांडु भी कहते है 😎

द पिपल्स टैक्स

आज एक फेसबुकिए  ने 1908 में ब्रिटन संसद द्वारा पारित किए गये "द पिपल्स टैक्स" के बारे में अपना बहुमूल्य ज्ञान बांटा .....

हमारे मट्ठा दद्दा बताते है
कि इस टैक्स के लगजाने से ब्रितानी समाज ने उसका इसलिए विरोध किया च्युंकि
सरकार ने जनता पर कम् टैक्स लगाया था 😀😀😀😀

जबकी सच्चाई कुछ ओर है
इस ऐतिहासिक किताब के मुताबिक
The people's tax एक war tax था
जो जब १९०६ में लाया गया देशभर भारी बवाल मचा था ...

29 अप्रैल 1909 को डेविड लॉयड जॉर्ज द्वारा ब्रिटिश संसद में इस बजट को पेश किया गया था। तब पार्लामेंट में लॉयड जॉर्ज ने तर्क दिया था कि  "द पीपल्स टैक्स" से गरीबी को समाप्त करदिया जाएगा ।
उन्होंने कुछ इस प्रकार इसकी सराहना की:-

"This is a war Budget. It is for raising money to wage implacable warfare against poverty and squalidness. I cannot help hoping and believing that before this generation has passed away, we shall have advanced a great step towards that good time, when poverty, and the wretchedness and human degradation which always follows in its camp, will be as remote to the people of this country as the wolves which once infested its forests."
इसका हिंदी भावार्थ कुछ युं है...

यह एक युद्ध बजट है । यह गरीबी और झूठ के खिलाफ कपटपूर्ण युद्ध को खत्म करने लिए धन जुटाने हेतु लाया गया है ।
मैं उम्मीद कर रहा हूं कि इस पीढ़ी के मरजाने से पहले पहल
हम आशा कर सकते हैं कि उस अच्छे समय की दिशा में एक महान कदम उठाचुके होगें ।
ओर तब  गरीबी,नीचता और मानवीय पतन जो हमेशा अपने शिविर में होता है,वह सब लोगों से बहुत दूर होगी । ओर तब लोग याद करते हुए कहेगें  देखो हम वो भेड़िये है जो एक समय अपने जंगलों में ही पीड़ित थे ।

तीन साल तक चले बाद विवाद के बाद
House of Commons ने 1909 में इसे मंजूरी दे दी लेकिन  House of Lords ने इसे चुनावों के चलते April 1910 तक ब्लॉक कर दिया । चुनाव के बाद ये कर लागु
हो गया और १९२० तक जारी रहा ।
इस
बजट में लिबरल कल्याण सुधारों को फंड देने के लिए कई प्रस्तावित कर बढ़ने हेतु कानुन शामिल थे ।
इन करों में आम नागरिक पर  नौ पेंसे आयकर का बृद्धि  किया गया था......

£ 2,000 से कम आय वाले आय पर पाउंड (9 डी या 3.75%), जो कि आज के पैसे में £ 1, 000 के बराबर था आयकर लगा  -ओर एक शिलिंग पर  (12 डी, या 5%) की ऊंची दर £ 2,000 से अधिक की आय पर प्रस्तावित थी ,
और 6D (अतिरिक्त 2.5%) अधिभार या "सुपर कर" उनपर लगता था जो £ 5000 (£ 470,000 आज ) से या £3,000 (£280,000 ) से ज्यादा कमाते थे ।
इस कर में Succession tax या death duties भी भरने होते थे ओर इसमें
नौसेना के पुनर्मिलन पर कर बृद्धि  का प्रस्ताव भी दिया गया था ।

इब्स bill कि सबसे बडी बात जिसके लिए वर्षों विरोध हुआ वो था भूमि सुधार कानुन । इसके तहत ब्रिटिश लोगों के भूमि का पून: आवंटन होना था । तो च्युंकि कंजरवेटिव लोग जो कि देशके बडे बडे भूमिओं के मालिक हुआ करते थे इसका विरोध करने लगे ।
ओर इस तरह आम आदमी से लेकर अमीर तक हरकोई इसके खिलाफ हो गया था ।

खैर ब्रिटिश पार्लियामेंट अपने उटपटांग कर के कारण सारे विश्व में फैमस है
ये लोग एक समय स्कॉटलैंड पर विंडो टैक्स लगादिए थे
यही बात उन लोगों ने पराधीन अमरीका में करना चाहा था जो बादमें अमरीका के स्वतंत्रता का सर्वप्रथम कारण बना ....

इस विषय पर और
जानकारी के लिए विकिपीडिया में देखें

https://en.m.wikipedia.org/wiki/People's_Budget?_e_pi_=7%2CPAGE_ID10%2C7612528509

शुक्रवार, 30 जून 2017

ब्राह्मी लिपि ही भारतीय लिपियों कि मूल है

≥ब्राह्मी लिपि भातिप्रोलु लिपि में बदलकर बादमें
आधुनिक तेलुगु लिपि में बदला है

≥कन्नड भाषा कि लिपि कदम्ब लिपि से १०वीं सदी में जन्मी ओर कदम्ब लिपि ३ शदीमें ब्राह्मीलिपि से

≥तामिल लिपि भी दक्षिण ब्राह्मी लिपि से जन्मी है ओर  कदंब लिपि द्वारा प्रभावित हुई है

≥मलायलम भाषा कि बर्तमान लिपि ग्रंथ लिपि से जन्मी । दक्षिण ब्राह्मी लिपि  बदलकर पल्लव लिपि बना जिससे बादमें ग्रंथलिपि का जन्म हुआ । वहीं दुसरी ओर पल्लव लिपि से तामिल प्रभावित सिंहली लिपि  जन्मा था

≥ आजका ओडिआ लिपि १० वीं सदीके आसपास प्राचीन कलिंगलिपि से जन्मा ओर कलिंगलिपि ब्राह्मी लिपि से जन्मा है । कलिंग लिपि तथा दक्षिण के कदम्ब लिपि में काफी समानताएं देखागया है ।

≥ बर्तमान बंगाली मैथिली आसामी लिपिओं का जन्म गुप्त लिपि से हुआ है ओर गुप्त लिपि ब्राह्मी लिपि से जन्मा है

≥ ब्राह्मी लिपि बदलकर गुप्त लिपि बना उस गुप्त लिपि से नागरी लिपि का जन्म हुआ ओर देवनागरी उसी नागरी लिपि का बदला हुआ आधुनिक रुप है । इस नागरी लिपि से आधुनिक गुजराती ओर मराठी कि मोडी लिपिका जन्म हुआ था ।

≥पंजाबमें ब्राह्मी से जन्मा गुप्त लिपि बदलकर सारदा लिपि बनी, सारदा फिर लंडा लिपि में बदलकर अंततः गुरमुखी लिपि बनकर उभरी ....

≥बर्मा कि बर्मीज लिपि का जन्म
Pyu तथा Mon लिपि से हुआ ओर यह दोनों लिपिओं पर कलिंगलिपि,गुप्तलिपि,कदम्ब लिपि तथा पल्लव लिपि से प्रभावित मानेजाते है
बहरहाल बर्मीज लिपिके मूलमें भी ब्राह्मी लिपि ही है इसबात से सभी सहमत होगें !!!

≥ थाइलैंड कि आधुनिक थाई लिपि खमेरलिपि से जन्मा
खमेर लिपि पल्लव तथा कलिंग लिपि से प्रभावित है ओर इसका मूल भी ब्राह्मी को ही माना जाता है

भारतमें आधुनिक मुंडा/मुंडारी भाषा परिवार का सांताली लिपि आलचिकि (ᱟᱥᱝᱫᱷᱡᱡ) ही अकेला इकलौता ऐसा लिपि है जिसे ओडिशा में जन्में श्री रघुनाथ मुर्मू जी ने डेवलप किया था । यह भारत का अन्यतम आधुनिक लिपि है

तो जैसा कि हमने देखा
भारतवर्ष में प्रचलित बडे  भाषाएं​ ओर उनके शब्द चाहें जितने भी अलग हो जाये
लेकिन उन सभी लिपिओं का मूल ब्राह्मी लिपि ही रहा है ।

तो सभी भारतवासियों से आंतरिक निवेदन है कि वो किसी भी भारतीय लिपियों का अपमान न करें

बुधवार, 28 जून 2017

आस्ट्रोसाइटिक भाषाएं-विश्व कि सबसे प्राचीन भाषाएं----

इस देश में सेंकडो भाषाएं बोली जाती है
लेकिन उनमें सबसे प्राचीन तो द्राविड़-अनार्य भाषा परिवार के
ऑस्ट्रोसाईटिक भाषाएं हीं निर्विवादित माने जा सकते है ।
लोग आर्य भाषाओं को ही श्रेष्ठ मानते है ओर यह उनका नीजी विचार हो सकता है लेकिन
ये बात अब किसी से छिपी नहीं है कि आदिवासियों कि भाषाएं हीं इस देश की सबसे प्राचीन भाषाएं है ।

हाल ही में किये गये वर्गीकरण के मुताबिक सोम-खमेर के पर्याय बड़े हैं.... च्युंकि यह एक
महाद्वीपीय भाषा परिवार है....
इन भाषाओं को बोलने वाले अधिवासी (रेसिडेंट्स)
दक्षिण पूर्व एशिया के भारत, बांग्लादेश, नेपाल,मोरेशियस् और चीन की दक्षिणी सीमा में फैले हुए हैं।
आस्ट्रोकियाटिक शब्द मूलतः लाटिन है ओर "दक्षिण" और "एशिया" दो शब्दों के संधि से बना है ....

इसका आक्षरिक अर्थ हे "दक्षिण एशिया"।
इन भाषाओं में, केवल वियतनामी,
खमेर, और सोम में लंबे समय से स्थापित रिकॉर्ड इतिहास है, और केवल वियतनामी और खमेर में आधुनिक राष्ट्रीय भाषाओं के रूप में आधिकारिक दर्जा प्राप्त है ।
उपनिवेश स्तर पर, खासी को मेघालय में आधिकारिक स्थिति मिली हुई है जबकि संथाली,
हो और मुंदरी झारखंड की आधिकारिक भाषा हैं जिसमें सांताली भाषा भारतीय संबिधान के आधिकारीक २२भाषाओं में भी सामिल है....

वहीं
म्यामांर में, Wa भाषा को वहां के Wa राज्त में आधिकारिक दर्जा प्राप्त है ।  बाकी अस्ट्रोसाईटिक भाषाएं अल्पसंख्यक समूहों द्वारा बोली जाती हैं और उनको आधिकारिक स्थिति नहीं मिली है....

भाषाविदों​को अबतक १६८  Austroasiatic भाषाओं के बारे में पता है जो कि १३ निर्विवादित उपपरिवारों में बंटे हुए है (कुछ भाषावि १४वां उपपरिवार के तौर पर Shompen को भी जोडते है ),
निम्न में उनके नाम इस प्रकार है:-
•Munda
•Khasi – Palaungic
•Khmuic
•Pakanic
•Vietic
•Katuic
•Bahnaric
•Khmer
•Pearic
•Nicobarese
•Aslian
•Monic
ओर
•Shompen ।।।।।।।

वैसे सांस्कृतिक नियमानुसार यह भाषाएं २ उपपरिवारों में विभक्त किये जाते रहे है
१=>सोम-खमेर और
२=>मुंडा
हालांकि, एक हालिया वर्गीकरण के हिसाब से तीन समूह है -मुंडा, मोन-खमेर और अन्य...... 
ज्यादातर भाषाविद इस बात से एकमत हे कि
ऑस्ट्रोआशियाटिक भाषाओं का मूलभाषा भारत में ही जन्मा था जो बादमें माईग्रेसन के वजह से​ बांग्लादेश, नेपाल और दक्षिणपूर्व एशिया में फैला था....
अश्ट्रोसाईटिक भाषाएं बोलनेवाले
प्राचीन अधिवासी च्युंकि अपने पड़ोसी इंडो-आर्यन, ताई-कदई,चीनी-तिब्बती,द्रविड़ियन, ऑस्ट्रोनियन, और दक्षिण पूर्व एशिया की स्वायत्त भाषा के से प्रभावित हुए है अतः आज इनमें काफी पारस्परिक अंतर आ गया है फिर भी मूल शब्द मिल ही जाते है ....

(क्रमशः)

मंगलवार, 2 मई 2017

----------माता--------

भारतीय सभ्यता के वह शब्द
जिन्हें आज भी 700 करोड लोग अपनी माताको संबोधित करने को पुकारने को इस्तेमाल कररहे है.......

1.मा~माँ~माता

हमारे वैदिक भाषा में प्रचलित #मा धातु
से हमें माता शब्द प्राप्त हुआ है....
मा धातु के कई अर्थ हें
जैसे पालनकरना,सम्भालना,रखरखाव करना,
नाँपना,निर्माण करना,प्रस्तुत करना,बांटना,दिखाना,शब्दकरना आदि....

मा या मां/माँ शब्द इतना प्रभावशाली था /है कि भारत से निकलकर सारे संसार में फैलगया........

लाटिन में माता शब्द से Mater शब्द बना और ग्रीक् में μητέρα(मितेरा)...
अन्यभाषाओं में माता शब्द बदलकर कुछ युं बना......
.........
अंग्रेजी Mom/mother,
स्पेनिश - madre,
अफ्रिकान्-moeder,
डच् - moeder,
आइरिस-máthair,
इटालियन-madre,
रुषी भाषा में мать(mat')
चीनीभाषा में मुकिन् 母親 ,
डेनिस-Mor,
फ्रेंच-mère,
पुर्तगाली-mãe,
जर्मनभाषा में Mutter,
जुलुभाषामें-umama,
भिएतनामी-mẹ,
अरवी -   al'umm (الأم ),
Chichewa-amayi,
हिव्रु- अमा,इम्मा ama,imma(אמא),
युक्रेनीआन् -мати माति,
लिथुआनिआन्-motina,
Czech-matka,
खमेर-   मतै (mteay) (ម្តាយ),
पर्सियन-مادر मद्र,
आर्मेनियान् ~मैर (մայր)
लाटभिआन्-माते māte,
आइसलैंडिक् -móðir,
थाईलैंड कि थाई भाषा में माइ (แม่),
बर्मीभाषा में मिआकांई (မိခင်),
सिंहली भाषा में माभा -මව,
फ्रिसिआन frisian में -mem मेम,
Catalan भाषा में mare,

तो जैसा कि आपने देखा विश्व कि समस्त प्रमुख भाषाओं में मा धातु से जन्में शब्द प्रचलित है
लेकिन कैसे ?
क्या सभी विश्व प्राचीनकाल में भारतका अनुकरण करता था या सारे विश्व में भारत से निकलकर जा बसे थे....

मुझे लगता है
मा शब्द गाय नें इंसान को दिया था.....

प्राचीनकाल में
भारतीयों ने शायद कुत्तों के बाद गायों का पालन करना सिखा होगा .....
उन्होनें देखा
गायों का राँभना  सबसे अलग और मनोहारी है ।
शायद वह प्राचीनलोग
संभवतः पहले #शब्दकरने के अर्थ में
मा शब्द का प्रोयोग करते रहे होगें
जैसा कि गाय करती है हम्मा हम्मा.....

फिर वही शब्द माताओं के लिए भी प्रयोग हुआ होगा
च्युंकि प्राचीनकाल से ही भारतीयों के लिए गाय एक पवित्र जीव रही हें और तो क्या भारतीय प्राचीन ग्रंथ भी गाभी को नव माताओं मे से एक बताता है ।
भारतीयों के देखादेखी बादमें सारे विश्व ने गोपालन करना सिखा होगा.....
अथवा भारतीय ही भारत से निकलकर
अन्य भूभागों में जा बसे थे.....
मा शब्द कि तरह चार  ओर भारतीय शब्द है
जो विदेशों में माता को पुकारने के लिये इस्तेमाल किये जाते है....

2.नना

ऋकवेद में नना शब्द माता के अर्थ में प्रयोग हुआ है ....
कई संस्कृत पंडितों का मत है कि यह नना शब्द
नृ धातु कि प्रथमा विभक्ति प्रथम शब्दरुप ना होता है । उसी ना के साथ न जोडकर नना शब्द बना ....
नः ना यानी जो मानव नहीं/जो नर नहीं वह देवता है नना है.....
नना शब्द ओडिआभाषा में ननी हुआ जिसका अर्थ कन्या होता है
ओडिशा में कहीं कहीं नना बडे भाईको तो कहीं पिता को भी नना कहाजाता है....
इसी नना शब्द से ओडिआ शब्द नानी बना
बडी बहनों को तथा बुआ को ओडिशा में नानी कहते है ।
हिन्दी में वही नना शब्द नाना, नानी बनगयी हें....
जहाँ तक बात विश्व कि है
यहां आज भी ऐसे कई भाषाएँ है जिन्हे बोलनेवाले लोग
अपनी माता को नना शब्द से मिलतेजुलते
शब्दों से पुकारते है....

अजरवैजानी भाषी अपनी मां को ana
कहके पुकारते.....
●Cebuano लोग inahan, Nanay कहते है
●तूर्क लोग मां को anne संबोधित करते है ....
●Igbuभाषा में मां के लिए nne शब्द है
●samoan-tinā
●Galician-nai
●हंगेरभाषी-anya
●Azeri (Latin Script)Ana
●Albanian ~ Nënë
●Chechenजाति के लोग ~Nana
●Ilongo~ Nanay, Nay
●Mapunzugunभाषा में Ñuke, Ñuque

3.आई
मराठी लोग आमतौर पर अपनी माताको आई कहके पुकारते है...
आई शब्द संस्कृत आर्या शब्द का बदला हुआ रुप है...
अतिप्राचीन काल में भारतीय लोग अपनी माताको आर्या पिताको आर्य कहते थे
पितामाता सभ्य होते थे इसलिए
वह आर्य आर्या कहलाते थे....
आर्या शब्द बदलकर अज/अजा बना
वहीं आर्या बना आई ......
ओडिशामें मातमह व मातामहीको क्रमानुसार हम
अजा आई कहते है.....
प्राचीन हिन्दीमें भी आजो शब्द प्रचलन में था....
आई शब्द से मिलतेजुलते
शब्द आज भी विश्व के कई भाषाओं में प्रचलित है ।
Marathi=>आई
Odia,bengali=>ଆଈ(नानी),আঈ
Assamese=aai
Yoruba= iya
Finnish= Äiti
Frisian=Kantaäiti, Äiti
आदि
4.आष्ट्रो एसिआटिक भाषापरिवार से जन्मा
शब्द
बोउ भारत से निकलकर एक तरफ भिएतनाम् तथा कुछ चीनी क्षेत्र में प्रचलित हुआ
वहीं पूर्वभारतीय द्वीपसमूह देशों में भी बोला जाता है....
द्राविड शब्द तिल्ली,तिलैया से मिलतेजुलते शब्द कई अफ्रिकी देशों के भाषा में प्रचलित है
वह भी माता अर्थ में....

ऐसा लगता है एक समय भारतीयों ने समग्र विश्व को एक करदिया था..
तभी तो बोल पाये
वसुधैव कुटुम्बकम्
कोई ओर सभ्यता ऐसा क्यों न कह सका....

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

बंगाली साहित्यकार बुद्धीजीवीओं ओडिआ भाषा को मार देने का षडयन्त्र रचा था..........

1866 अकाल तथा अंग्रेजी आक्रोश को झेल रहे ओडिआ लोगों के खिलाफ उनके अपने ही पडोशी भाईओं ने षडयन्त्र रचे थे....

Odia भाषा का कत्ल करदेना ...
यही उनका असली मसद था....

कान्तिलाल भटाचार्य ने इसकी नींव
यह कहते हुए रख दिया....

"ओडिआ ऐक् स्वतंत्रो भाषा नोय्,
इटा बांग्लादेर एकटा उपभाषा"

इसी विषय पर एक किताब भी छपा
Archive .com मे एक किताब इसी नामसे बंगाली मे उपलब्ध है....

राजेन्द्र लाल मित्र ....
पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ओडिशा के प्रत्नतत्व पर गहन शोध किया और इसपर अपना किताब भी लिखडाला....

उन्होने
एकबार कहा था....

"जबतक ओडिआ भाषा विलुप्त नहीं हो जाती ओडिआओं का विकाश असम्भव है"

उमाचरण हलदार बाबु को बंगाल ओडिशा एकत्रीकरण मे खास रुची थी
वह चाहते थे इस एकता हेतु उत्कलीय-ओडिआ लिपि कि बली चढादिया जाय.....

उनका बयान था
ओडिआ को बंगाली लिपि मे लिखा जाय.....
ज्ञात रहे बंगालीओं का बर्तमान लिपि কখগঘঙচছ मात्र 200 साल पुराना है....
इन लोगों ने उत्कलीय-ओडिआ लिपि से काफी हदतक मिलता जुलता अपना प्राचीन लिपि त्याग दिया था....
अब वो चाहते थे हम भी वैसा करें.....

राजाकृष्ण मुखोपाध्याय....महाराज ने तो यहाँ तक कहदिया था कि
समुचे बंगाल मे बंगाली को ही केवल मात्र शिक्षा क्षेत्र मे अग्राधिकार मिले
और बाकी ओडिआ विहारी भाषाएं जाएं तेल लेने.......

20 फरवरी 2014 मे ଓଡିଆ ओडिआ भाषा को शास्त्रीय मान्यता साबित करता है....
यह
सच्चाई....
1.*बंगाली खुद कई उपभाषाओं को इकट्ठा करके बनाया गया एक भाषा है
ओडिआ इसके उपरी भाषाओं मे से एक है.....
2.*ओडिआ आर्य भाषाओं मे संस्कृत के बाद सबसे अधिक शास्त्रीय तथा 6 भारतीय मौलिक भाषाओं मे से एक है...

3.*इस भाषा को राष्ट्रिय स्तर के शिक्षण संस्थानो़ मे भी पढाया जाय....
इसको सभी सरकारी कार्यालयों मे लागु किया जाय......

(डॉ. देवाशीश जेठी जी के वाल से.....)

रविवार, 30 अक्टूबर 2016

लोहार्गल


राजस्थान के झुंझुनु जिल्ला मे
लोहार्गल नामक एक जगह है ।

कहते है
पाण्डव वंधु महाभारत युद्ध के बाद स्वजन हत्या दोष से मुक्ति हेतु श्रीकृष्ण के शरणापन्न हुए

तब श्रीकृष्ण ने उन्हेँ भारतवर्ष मे तीर्थाटन करने को कहा
ओर
ये भी कि जहाँ तुम्हारे अस्त्र अदृश्य हो जाएगेँ
तुम पापमुक्त हो जाओगे ।

पूर्व भारत ,दक्षिण भारत मेँ विभिन्न तीर्थस्थलोँ मे भ्रमण करते हुए
वे जब
राजस्थान के
इसी लोहार्गल मे अपने पूर्वज
तथा हतभ्राताओँ को
तर्पण देने को जल मे उतरे
एक अदभुत घटना घटा !

पांडवोँ के सारे अस्त्र गल गये

तभी
लौह+अर्गल=लौहर्गल
से आधुनिक लोहार्गल शब्द बना हो !

उस प्राचीन घटना को याद करने हेतु आज भी यहाँ के पवित्र
सूर्यकुण्ड ,भीमकुण्ड मे
सूर्यपराग व चन्द्रग्रहण के शुभ अवसर पर मेला लगता है ।

लोक विश्वास है
यहाँ पूर्वजोँ कि अस्थीओँ का विसर्जन करने पर वो गल जाते है
तथा
पितरोँ को परम गति प्राप्त होते है ।

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

दुहिता से Daughter तक

दुहिता -
(दुह् धातु+कर्ता.तृ)
मूल
संस्कृत का ये शब्द
कन्याओँ के लिए प्रयोग किया जाता था ।
च्युँकि प्राचीनकाल के भारत मे गाय दोहने का काम कन्याएँ
करती थी....
जब ये शब्द प्राचीन भारत से
अरब होते हुए
युरोप पहँचा
इसके रुप बदलते गये

फार्सी मेँ - #दख्तर् हुआ
ग्रीक् मे-दाइगेटर
जर्मनी -डवटर्
और
अंग्रेजी मे आते आते
यही दुहिता शब्द
डटर या Daughter हो गया ।

आजकल स्थानीय लोग
दुहिता शब्द
को
"दोनोँ कुल के लिए हिता"
कह कर इस शब्द का अर्थ करते पाये जाते है ।

"Twin city queen ellora"

"Twin city queen ellora "

स्वर्गीय अक्षय महान्ती द्वारा
लिखा ,गाया गया ये
गीत
अपने आप मे 70के दशक कि कहानी वयाँ करता है ।

वे Ollywood के
R.D Burmen है Kishor kumar है ।

श्री अमिताभ जी के तरह
आकाशवाणी (Cuttack) ने उनको भी रिजेक्ट करदिया था
लेकिन बाद मे अक्षय
मशहुर गीतकार ,गायक,संगित निर्देशक कहलाए ।

अच्छा
तो
ये गीत
twin city cuttack-bhubneswer के बारे मे है ।

गायक
बारबार
कटक भूवनेश्वर के बीचमे उन कम विकशित क्षेत्र तथा वहाँ रहनेवाले लोगोँ पर कटाक्ष करते नजर आते है ।

ये जगह FULLNAKHARA के नामसे जाना जाता है ।
यहाँ उनदिनोँ
लुटपाट कि वारदातेँ ज्यादे हुआ करते थे ।

आजकल यहाँ के लोग सुधरगये है और अब इस क्षेत्र मे
तरह तरह के दुकान हो गये है
और उनमे रसगुला के दुकान ज्यादातर पाये जाते है



रविवार, 27 दिसंबर 2015

युट्रेक्ट - नैदरलैँड का सांस्कृतिक सहर

युट्रेक्ट नेदरल्य़ाण्ड्स संयुक्तराज्य का चौथा सबसे बड़ा सहर व सांस्कृतिक केन्द्र है !
2014 जनगणना के मुताबिक सहर मे प्राय़ः 330,772 लोग रहते है ।
युट्रेक्ट , युरोप कि पुरातन सहरोँ मे से एक है
यहाँ आज भी आपको आधुनक मध्ययुगीय बिल्डिंग्स देखने को मिलजायेगेँ !

आठवीँ सदी से ही युट्रेक्ट को इसाई लोग धार्मिक स्थल मानते आ रहे है ।
डच लोगोँ के स्वर्ण युग Dutch Golden Age मे इस सहर को काफि महत्वपूर्ण माना जाता था लेकिन बाद मे जब Amsterdam को राजधानी बनया गया इस सहर की प्रशिद्धि घटने लगी !

नेदरलैँड्स कि सबसे बड़ी युनिवर्सिटि मानीजानेवाली Utrecht University इसी सहर मेँ आता है । च्युँकि युट्रेक्ट
संयुक्तराज्य नैदरलेँडस् कि मध्यभाग मे आता है इसलिये
इसे देश का सबसे महत्वपूर्ण ट्रान्सपोर्ट हॉव के रुप मे जाना जाता है ।
इस सहर का नाम 2012 मेँ Lonely Planet के top 10 of the world’s unsung places आया था !
रोमन साम्राज्य जब समुचे युरोप मे व्याप्त था
युट्रेक्ट इस साम्रज्य कि उत्तरी सीमा कि प्रमुख सहरोँ मे से एक हुआ करता था !
तब इस सहर को रोमन लोग Traiectum ट्रेईक्टम् कहते थे ! अब Old Dutch भाषा मे कभी कभी T से पहले "uut" U का उच्चारण होता था !
इसलिये U-trecht नाम हुआ होगा । वहीँ 11वीँ सदी मे मिले कुछ सरकारी दस्तावेजोँ मे इसका नाम लाटिन भाषा मे Ultra Traiectum लिखा मिला है । ये भी हो सकता हे कि Ultra शब्द को पुरा न कहकर इस शब्द से सिर्फ U उच्चारण के साथ बाकी नाम लिया जाता था
जो बाद मे युट्रेक्ट हो गया हो !!

रोमन ऐतिहासिकोँ के हिसाब से
सेयुट्रेक्ट सहर को 50 से 56 AD के बीच रोमान लोगोँ ने वसाया था और उसका प्रारम्भिक नाम रखा गया था Traiectum Romanum !!

इस सहर मे 1579 को नैदरलैँडस् कि 7 उत्तरी राज्योँ ने मिलकर "Unie van Utrecht" (Union of Utrecht) का गठन किया था ।
इसी सहर मे स्पैनीश शासकोँ के खिलाफ राष्ट्रवादी डचीओँ ने स्वतंत्रता संग्राम कि घोषणा कि थी !
Dom (toren) Tower के लिये भी ये सहर जाना जाता है ।
डोमटोरेन Dom मीनार को 14वीँ सदी मे बनवाया गया था । 50 Bells के साथ इसकी कुल उँचाई 112 मिटर है । कहते है आसमान साफ होने पर इस मिनार कि उँचाई से आमष्टरडैम सहर को देखा जा सकता है ।


Extrashot:-नैदरलैँड्स गणराज्य को कुछलोग Holland भी कहते है ।
वाकी देशोँ मे ये बात आम है लेकिन नैदरलैँडस् उत्तरी भाग मे जाकर के अगर आप Holland कहेगेँ तो ये बात स्थानीय लोगोँ को बुरी लग सकती है ।
कहते है ये पुरा क्षेत्र कभी सिर्फ हॉलाण्ड के नामसे जाना जाता था
फिर राजनैतिक कारणोँ से North holland व South holland हुआ ।

North holland के लोग धीरे धीरे उस क्षेत्र को नैदरलैँड [nor -land] कहने लगे जबकी South holland का हॉलाण्ड नाम ही बना रहा !!!

बुधवार, 19 अगस्त 2015

मध्यप्राच्य का प्यारा द्वीप सोकोट्रा ...

सोकोट्रा.....Sokotra......

अमरिकीलोग इसे पृथ्वी पर परग्रह वासीओँ का द्वीप कहते है ।
Asia महादेश का यमन व African देश सोमालिया के मध्य समंदरमेँ आता है ये 4 द्वीपोँ वाला क्षेत्र !
4 द्वीपोँ मेँ सोकोर्टा सबसे बड़ा व मुख्य द्वीप है ।
यहाँ कि जनसंख्या कुल 30,000 के आसपास बताया जाता है ।
इसकी क्षेत्रफल 3796 वर्ग किलोमिटर हे ।
20वीँ सदी के शुरुवात मेँ पश्चिमी सोधकर्ता माना करते थे कि सोकोर्टा नाम संभवतः किसी ग्रीक शब्द का परिवर्तीत रुप होगा । परंतु बाद मेँ प्राच्य विद्वानोँ ने साबित किया कि सोकोर्टा मूल संस्कृत शब्द #सुखाधार का बदला हुआ रूप है । संस्कृत मेँ सुखाधार का अर्थ हे "सभी सुखोँ से लवरेज" !
सदीओँ पहले एसिआ व अफ्रिका व युरोप के बीच अछा व्यापारीक संपर्क हुआ करता था ।
सोकोर्टा का इसमेँ एहम योगदान हुआ करता था च्युँकि सोकोट्रा उन दिनोँ वाणज्यकेन्द बनकर उभरा था ।

गुजराती नौचालक इस द्वीप से आ रहे अजीव गर्जना के कारण इसे "सिकोतरो सिँह" कहते है ।

1967 से ये द्वीप यमन के शासनाधीन हे । इससे पहले लम्बे समयकाल तक यह द्वीप पर्तुगाली फिर अंग्रेजोँ के हातोँ मे आया था ।
सोकोर्टा का सबसे बड़ा सहर हाड़िवो मेँ जनसंख्या 8,000 है ,हालांकि बाकी 3 द्वीपोँ मे
कउतना विकाश नहीँ करपाया ।
यहाँ के लोग खजुर उत्पादन ,मत्स व पशुपालन आदि व्यवसाय के जरीये अपना गुजारा चलाते है ।
च्युँकि यहाँ कोई विद्युत उत्पादन व्यवस्था नही है अतः समूचे द्वीप मेँ मात्र जेनरटरो द्वारा ही विजली कि आपुर्ति कि जाती है !

आप यह जानकर और भी हैरान होगेँ कि यहाँ आज भी ऐसे लोग रहते हे जो रुपिया पैसा देकर नहीँ वरन अपनी मनपसंद चिजोँ के बदले सामान बेचा करते है ।
बैसे आधुनिकता ने यहाँ भी अपना कदम थाम लिया है परंतु लगता हे यहाँ वास्तुवादी विकाश मे अभी और वक्त लगेगा ।
अफ्रिकन आरब व भारतीय प्रजा के रक्तगत समिश्रण से सोकोट्रा प्रजा का सृष्ठि मानाजाता है । कहते है यमन का नाम दुनिया मेँ जनसंख्या के मुकाबले गन रखनेवाले देशोँ मे टप पर आता हे परंतु यमन का हिस्सा होकर भी सोकोर्टा के लोग हतियार नहीँ करते ।
यहाँ के लोगो का परस्पर अभिवादन का अपना एक अलग अनोखी रीत पायीजाती है ।
यहाँ के लोग आपसमेँ मिलते समय दुआ सलाम के बदले परस्पर नाक स्पर्श द्वारा अभिवादन करते है ।
सोकोर्टा मेँ बहत कम लोग अंग्रेजी बोलपाते हे इसलिये पुरे के पुरे द्वीप मेँ अलग अलग स्पेलिंग के साथ लिखा पायाजाता है सोकोर्टा नाम !!
द्वीतीय विश्वयुद्ध के दिनो मेँ नेदरलैँड ने इस द्वीप को कामचलाउ सैन्य कैँप बनाया था

फिर कुछ कालोँ तक यह जमीन सोमालियन लुटेरोँ का चारणभूमि बना परंतु अंत मे यमन ने इसपर अपना अधिकार प्राप्त करने मे सफल हो पाया ।
सोकोर्टा मे सिर्फ इंसान ही नहीँ यहाँ दिखनेवाले जानवर व वृक्षोँ का स्वरूप मूल भंखण्ड से भिन्न पाया गया है ।

***300 वर्षोँतक जीवित पायेजानेवाला #लोवान वृक्ष सोकोट्रा का मुख्य आकर्षण तथा रहस्यमय विषय है ।
इसे अंग्रेजी मे ड्रेगन ब्लॉड़ ट्री कहाजाता है ।
इस वृक्ष कि खासियत इसकी खास आकार व जीवनधारण प्रणाळी हे !
दूर से लोबान वृक्षोँ को देखनेपर लगता है मानो ये वृक्ष नहीँ वरन यहाँ किसीने सजा कर गुलदस्ता रखदिया हो ।
ये चिँताजनक हे कि सोकाट्रा मेँ लोवान वृक्षोँ कि संख्या सीमित व निरंतर घटता जा रहा है जो आनेवाले दिनोँ मेँ सोकोट्रा के जैव विवधता को क्षति पहचाँ सकता है ।

वहीँ सोकोट्रा पर इन दिनोँ ISIS व अलकाएदा का नजर पड़ा है । कुछ दिनोँ पूर्व इंलण्ड कि "द इकोनोमिस्ट" पत्रिका मेँ इस विषय पर खास लेख छपा था ! यदि इन संगठनोँ को इस क्षेत्र मेँ आतंकी गतिविधी बढ़ाने का मौका मिला तो सोकोट्रा को भयावह परस्थितिओँ का सामना करना पड़ सकता है ।

बुधवार, 1 जुलाई 2015

1 जुलाई डॉक्टर डे विशेष

भारत मेँ आज 1 जुलाई डॉक्टरोँ का खास दिन राष्ट्रिय चिकित्सक दिवस यानी की ‪#‎ National_Doocto rs_Day‬हे । India that is भारत देश मेँ इसकी शुरुवात
भारत सरकार द्वारा 1991 मे किया गया था ।
1 जुलाई 1882 को पटना, बिहार मेँ प्रसिद्ध भारतीय चिकत्सक Dr B.C ROY [Bidhan Chandra Roy] का जन्म हुआ था और एक जुलाई को ही 80 वर्ष के उर्म मेँ 1962 को इंतकाल हो गया था !
चिकत्सा क्षेत्र मेँ उनके वहुमूल्य योगदान के लिये भारत सरकार ने उनके जन्म व मृत्युदिवस को National Docters Day का दर्जा दिलाया ।
विधान चंद्र रॉय ने कोलकत्ता मेँ अपनी मेडिकाल ग्रेजुएसन पुरा किया था और लंदन से वे 1911 को MRCP और FRCS डिग्री लेकर के भारत मेँ मेडिकल प्रक्टिस के लिये लौटे !
उसी वर्ष वे कोलकत्ता मेडिकल कॉलेज से मेडिकल शिक्षक के तौर पर जुडे और बादमेँ Campbell Medical School व Carmichael Medical College मेँ भी कुछदिनोँ के लिये कार्यरत थे ।
इस बिच महात्मा गांधी के नेतृत्वमे हो रहे अहिँसक आंदोलन मेँ भी उन्होने भागलिया ।
स्वतंत्रता के पश्चात वे कंग्रेस लिडर बने और पश्चिम बंगाल के द्वितीय मुख्यमंत्री भी !
भारत सरकार ने उनको 4 फरवरी 1961 मे भारतरन्त पुरस्कार से सन्मानित किया था
और
1976 से हरवर्ष उत्कृष्ट डक्टरोँ को चिकित्सा के क्षेत्र मेँ उनके अछे काम के लिये Dr. B. C. Roy National Award दिया जा रहा है ।
वहीँ विश्व मेँ सबसे पहले डॉक्टर डे Doctors’ Day 30 March, 1933, विन्डर [Winder] जर्जिआ मे मनाया गया था ।
इसे मनाने कि Idea Dr. Charles B Almond कि पत्नी Eudora Brown Almond को सबसे पहले आयी थी ।
उन्होने सुझाव दिया कि प्रथम सफल साधारण anesthesiain surgery च्युँकि March 30, 1842, को Jefferson , Ga. Dr. Crawford Longused etherto ने किया था इसी दिन को डॉक्टर डे के रुप मेँ मनाया जाय । उसी वर्ष जर्जिआ मेँ कुछ डॉक्टरोँ ने मिलकर डॉक्टर डे मनाया ।
October 30, 1990 को US पार्लामेँट ने कानुन पारित कर 30 मार्च को United nation का National Doctor's Day के रुप मेँ दर्जा दिया था ।
ड़ॉक्टर डे मेँ डॉक्टरोँ को समाज के सेवाहेतु नूतन उर्जा मिलता है ।
भारतीय डॉक्टरोँ से अनुरोध हे कि वे अपनी सेवा सिर्फ गाँव तक सीमित न रखते हुए गाँव के दूर्गम क्षेत्रोँ मेँ भी चिकित्सा सेवा मुहैया कराएँ तभी ‪#‎ DOCTERSDAY‬मनाये जाने के पिछे का उद्देश्य सफल होगा ।

मंगलवार, 2 जून 2015

पिँजौर ....

शिवालिक पर्वतमाला अंचल मेँ स्थित पंजपुरा क्षेत्र को अज्ञातवास हेतु पांडव बंधुओँ द्वारा चयन किया गया था । पंजपुरा उन दिनोँ मत्स्य देश के अंतर्गत पड़ता था .यहाँ राजा विराट का राज चलता था ।
पांडवोँ ने पंजपुरा को अज्ञातवास के लिये चयन तो कर लिया परंतु दुविधा ये थी कि 1 वर्षतक दूर्योधन के गुप्तचरोँ से कैसे छुपाजाय किसी को उनपर संदेह न हो । अंत मेँ युद्धिष्ठिर नेँ छद्म रुप से नाम व भेष बदलकर विराट नगर मेँ एक वर्ष का समय व्यतित करने का सुझाव दिया । सभी नेँ इसपर मोहर लगा दी और इसतरह पांडव विराट नगर मेँ अज्ञातवास का 1 वर्ष बिताने लगे ।

महाभारत का यही पंजपुरा कालान्तर मेँ पंचपुरा बना और फिर अपभ्रंष हो कर के पिँजौर Pinjore बनगया । बर्तमान भारत मेँ पिँजौर हरियाणा राज्य कि पंचकुला जिल्ला मेँ आता है ।
पांडवो द्वारा प्रायः 300 से भी अधिक बावड़ीयोँ का निर्माण किया गया था । जनश्रुति है कि पांडव बंधु प्रतिदिन एक बावड़ी का निर्माण करते थे, यहाँ आप भीम द्वारा बड़े बड़े पत्थरोँ को रखा हुआ देख सकते है ।

पिँजौर मेँ मंदिरोँ के अलावा एक मस्जिद और गुरुद्वारा भी है ।
पिँजौर गुरुद्वारा का निर्माण महाराजा रणजीत सिँह ने करवाया था ।

1574 विक्रमी उदासी तिसरी मेँ सिखोँ के पहले गुरु श्रीगुरुनानक देवजी भी पिँजौर आए थे । उस समय यहाँ घनघोर जंगल था । गुरु साहिब ने धारामंडल बैठकर आराधना की थी और गुरु ग्रंथ साहिब के श्लोक लिख लिख पढ़िया तेता काढ़िया का उच्चारण किया था । कहा जाता है कि यहाँ की एक बावड़ी मेँ गुरु साहिब ने राजा भुआणा जिसके जन्म से ही कलाई तक हाथ थे ,को हाथ धोकर आने को कहा था और राजा भिआणा के हाथ भले चंगे हो गे थे ।

पिँजौर मेँ राजस्थानी व मौगली कलाओँ के मिश्रण से बना पिँजौर गार्डेन का मोगल काल के प्रकृतिप्रेमी सरदार फिदेई खाँ द्वारा बनाया गया था ।
हालांकि इसी गार्डेनवाली जगह पर 1030 तक एक उद्यान हुआ करता था जो बादमेँ रखरखाव कि कमीओँ के कारण कदावर दिखने लगा था ।
फिदेई खाँ द्वारा 1672 से 1675 तक इसे नेया रुप दिलवाया गया । इसके अलवा पिँजौर एचएमटि[ the Hindustan Machine Tools]फैक्टरी के लिये भी भारत भर मेँ जाना जाता है ।

रविवार, 31 मई 2015

केरल का वायनड जिल्ला....

वायनाड (Wayanad) केरल का 12 वाँ जिल्ला है इसे 1 नवेम्बर 1980 को जिल्ला के रुप मेँ अधिकार दी गई । केरला के उत्तरपूर्व क्षेत्र मेँ स्थित वायनड़ जिल्ला का Kalpetta कलपेटा सिटी मुख्यालय व सबसे बड़ा सहर है । जिल्ला के मध्यभाग कम उचाँईवाले क्षेत्र है परंतु उत्तरीभाग पर्वत व जंगल से घिरे है , वहीँ पूर्वी भाग खुला व समतलक्षेत्र है । पुराणोँ मेँ इसे मायाक्षेत्र कहागया है (Maya's land) ! भाषावित के हिसाब से मायाक्षेत्र शब्द अपभ्रंस होकर मायानड और मायानड से वायनड़ शब्द बना व प्रचलित हुआ ।
भाषाविदोँ के हिसाब से वयनाड शब्द Vayal धान के खेत( paddy field) और Naad(land) भुमि के संधि से हुआ है और इसका अर्थ है 'The Land of Paddy Fields' धान खेतोँ कि भुमि । यहाँ कई आदिम आदिवासी जनजाति वास करती है और जिल्ला के अर्धाधिक जनसंख्या Tribal या आदिवासीओँ का है । वायनड़ समुद्री जलस्थर से
700 to 2100 m. उचाँई पर स्थित केरल का सबसे कम जनसंख्या वाली जिल्ला है ।
केरल के अन्य जिल्लाओँ कि विपरीत इस जिल्ला मेँ वायनड़ के नामसे कोई गाँव या सहर नहीँ है । वायनड़ केरल का इकलौता जिल्ला है जिसके वोर्डर कर्नाटक व तामिलनाड़ु राज्य से लगेहुए हो । इस जिल्ला के कुरीछाया जाति (The Kurichyas) के लोगोँ ने स्वतंत्रता संग्राम के समय अंग्रेजोँ के खिलाफ पज्हासी राजा (Pazhassi Raja) की सेना के साथ हतियार उठाया था । कुरिछया जाति के लोग अछे तीरंदाज बताये जाते है । कई पुरातन दक्षिणभारतीय काव्य गंथोँ मेँ कुरिच्छाया लोगोँ को उत्कृष्ठ धनुर्धर बताया गया है ।

वीरोँ कि जाति वाघेरजाति.......

गुजरात राज्य के वीर जाति वाघेराओँ को अंग्रेज सरकार नेँ गुनेगार कौम के मंडलीओँ मे बिठादिया था । जबकी हकीकत ये था वाघेरा जाति के लोग स्वातंत्र्यप्रेमी देशप्रेमी थे । वे अपने जमीन के लिये जाट पाईक गुर्जरोँ कि भाँति लढ़रहे थे । वाघेर जाति के लोग वहुतायत मेँ सौराष्ट्र कि सागरकंठा क्षेत्र स्थित ओखामंडलमेँ वसे हुए है । कहाजाता हे वे 7वीँ सदी से इस क्षेत्र मेँ स्थायी निवास कर रहे है । वाघेर प्रजा कि संस्कृतिमे ग्रीक, आसीरीआ, स्कीधीया, ईरानी और सिंध व भारतीय संस्कृतिका प्रभाव पड़ा हुआ लगता है । वाघेर प्रजाकी अपनी खुदकी कोई धर्म नहीँ ये लोग 16वीँ सदी मेँ भक्तिवादी संतो के कारण वैष्णवोँ के प्रभाव मेँ आये जिससे द्वारिकानाथ इनके परम आराध्य बने और ज्यादातर अब हिँदुधर्म अनुयायी है । माणेकवंशकी पांचसौ छेसौ वर्ष ईतिहासमे कोइ वाघेर सरदार खुदकी ग्राम मेँ मंदिर निर्माण या प्रतिष्ठा कि कोई प्रमाण नहीँ मिलता ये बात ओखामंडलके वाघेराजाति के लेखक कल्याणराय जोशी ने लिखा है । वाघेराओँ के लोकदेवो मेँ वाछरुदादा, खेतरपाळ, आशापुरा, शिकोतर, गात्राळ, शीतळा, आवडय, शूरापुरा और देवी सती आदि प्रमुख है । जनसृतिओँ के हिसाब से वाघेर प्रजा कच्छ से 7वीँ सदी मेँ ओखामंडल पर स्थायी निवास कर रहा है । कुछ एक ऐतिहासिक मानते कि वाघेरोँ का पूर्वज, भुजके राजपूत, जाम हमीरजी जाडेजा द्वारा एक गरासिया कन्या साथे लग्न संपन्न हुआ । इसतरह से इस समुदायमेँ खांटजैसी राजपूत जूथका समावेश हुआ हो माना जाता है । कहाजाता हे कि मूल संस्कृतशब्द वागुरा से वाघेर शब्द आया है । इनकी उत्पत्ति के विषय मेँ एक पौराणिक कथा जोड़ाजाता है वो इस प्रकार है एकबार जब श्रीकृष्ण गोमतीमे जलक्रीडा कररहे थे तब उनपर केशी नामक एक असुर ने हमला करदिया । मल्लयुद्धमेँ श्रीकृष्ण जीते और उसे पाताल कि एक गड्डे फेँकदिया । उसे गड्डे मेँ फेँकने पर उसमेँ से एक पुरुष का उत्पन हुआ उसे वाघेराओँ का आदिपुरुष मानाजाता है । एक और मान्यता अनुसार वाघ को घेरनेवाला, वाघ के शिकारी, ऐसा वाघेर का अर्थ भी कहीँ कहीँ निकालाजाता है . संस्कृत शब्द वागुरा का अर्थ भी ‘जाल, फांस, पास’ आदि के लिये उपयोग मेँ लायाजाता था । यहाँ हम ये मानसकते है कि मुख्यत्वे ये अर्थ समुदाय की शौर्यका घोतक है । ये समुदाय आज भी कच्छी भाषा बोलता है इसमेँ कई कुल या गोत्र पायेजाते मुख्यतः मानेक માણેક, केर કેર, सुमानीया સુમાણીયા,जाम જામ,हाथल હાથલ,भाथड ભાથડ,वथिया બથિયા,गोहिल ગોહિલ,परमार પરમાર,गड ગડ, गिग्गला ગિગ્ગ્લા,मापानीમાપાણી,टिलायत ટિલાયત और भायड ભાયડ । वाघेर जाति के ज्यादातर लोग हिँदु है परंतु कुछ लोग अब मुस्लिम बनजाने के पश्चात् खुदको मुस्लिम वाघेर कहकर अपना परिचय दोते है । 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पश्चिम गुजरात में स्थित भगवान श्रीकृष्ण का देवालय एक प्रमुख केन्द्र बना था । लगातार संघर्ष करते हुए इन लोगों ने समूचा द्वारिकाधीश अंग्रेजों के अधिकार क्षेत्र से मुक्त कराया। तब वडोदरा के गायकवाड़ ने अंग्रेजी सैन्य सहायता से पुन: आक्रमण कर दिया। विक्टोरिया और जे मोबिया जहाजों से ब्रिटिश नौसेना ने समुद्र से तोपों से गोले बरसाने शुरू किये। द्वारिका का गढ़ बहुत मजबूत था। माणेक महिलाओं ने तोपों के गोलों को भीगे हुए गद्दों से शांत कर दिया। लेकिन माणेकों के पास आधुनिक शस्त्र नहीं थे। अंग्रेज सेनापति ने जब इन्हें अधीनता स्वीकार करने का संदेश भेजा तो वाघेरों माणेकों ने आह्वान किया, असां रांडीरांड पुतर वयूं। असां जो बेली द्वारिकाधीश आय। टोपीवारा को ही फरी आय। अर्थात्
हम कोई निराश्रित बच्चे नहीं, हमारा तो द्वारिकाधीश है। इन टोपीवालों अंग्रेजों के दिन समाप्त हुए । 1868 तक इन वीर वाघेरों ने संघर्ष किया। वाघेर समाज के मुलू माणेक, जोधा माणेक, बापू माणेक, भोजा माणेक, देवा छबानी, रणमल माणेक और दीपा माणेक ने अंग्रेजों के विरुद्ध द्वारिका, ओखा और रणछोरराय में संघर्ष किया था । ये भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का यह एक अनूठा अध्याय है ।
द्वारिका में ब्रिटिश सेना के मारे गए अधिकारियों का तो कीर्तिस्तंभ है, पर हमारे वीर बलिदानी क्रांतिकारियों का स्मारक कहांं है]

रविवार, 17 मई 2015

योद्धाओँ कि जाति पाइक जाति

पाईक paika ओड़िशा का एक जाति है बर्तमान समय मेँ यह मुख्य रुप से तिन अलग अलग उपजातिओँ मेँ बँटगया है ।
1.खंडायत
2.बेणायत
3.पहरी - काळिँजि
इसके अलावा वाणुआ और ढ़ेँकिया भी पाईक कहलाते है

1.युद्धक्षेत्र मेँ तलवार चलानेवाले सैनिक
2.बेणायत घोड़े व हाथी पर लढ़नेवाले
3.कौतवाल व पहरादेनेवाले पहरी
4. युद्धक्षेत्रोँ मेँ तीरंदाजी करनेवाले बाणुआ कहलाते थे

5.आतर्कित ढ़ाल बर्छे से हामला करने वाले ढ़ेँकिया कहलाते ।
पाईक/Paika शब्द मूलतः संस्कृत से आया है जिसका अर्थ है पदातिक/Padatika meaning [[ the infantry, and hence the name of the dance is battle (paika) dance (nrutya)]] .

ओड़िशा मेँ गंग साम्राज्य Gango empire And gajapati गजपति राजत्व काल को स्वर्णयुग कहाजाता है ।
तब ओड़िशा का विस्तार गंगा से गोदावरी तक था
और साम्राज्य बचाने का जिम्मेदारी पाईकवीरोँ पर होता था । पाईक Paika नियमित योद्धा नहीँ थे परंतु वे नियमित अभ्यास करते थे आज भी गाँव के Paika akhada पाईक आखड़ाओँ मेँ युद्धाभ्यास होता है परंतु आज यह केवल कुछ एक क्षेत्रोँ मेँ देखने को मिलता हे खासकर उनगाँव मेँ जहाँ क्षेत्रिय कूल वहुतायत मेँ पायेजाते हो । पाईक PAIKA शान्तिकाल मेँ राजा द्वारा प्राप्त भूमि पर खेति करते थे और युद्ध कि घोषणा पर युद्धभुमि मेँ जाकर लढ़ते थे
। पाईकोँ नेँ लम्बे समयकाल तक मुगलोँ,तुर्क तथा मराठीओँ से लोहा लिया परंतु 16वीँ सदीके बाद
*श्री चैतन्य आदि द्वारा भक्तिवाद का प्रचार
के वजह से लोग आलसी व अंधभक्त बने
*जलवायु मेँ उतारचढ़ाव से लगातार सुनामी आनेलगा और कलिंगसागर कहलानेवाला जलराशी गहराई खोनेलगा जिससे ओड़िशा मेँ चक्रवात और बाढ़ कि स्थिति उत्पन हो गई । च्युँकि पाईकोँ का गुजारा खेती से चलता था उनको इस प्राकृतिक आपदा से भारी नैराश्य और नुकशान हुआ ।
* पुरी खोर्दा कटक ढ़ेकानाल गंजाम पारलाखेमुंडी अनगुल आदि क्षेत्र के राजघरानोँ मेँ आपसी कलह भी एक पाईकोँ मेँ आपसी मतभेद का मूल कारण है
अठारवीँ सदी तक पाईकोँ का पुरा का पुरा संगठन अलग अलग उपजातिओँ मेँ बँटचुका था परंतु 1803 मेँ अंग्रेजोँ का ओड़िशा पर चढ़ाई से स्वाभिमानी ओड़िआ जाति खासकर पाईकोँ मेँ पुनः एकता आनेलगा । 1803 से 1819 तक ओड़िआ जाति अंग्रेजोँ के खिलाफ लढ़ती रही 1857 से 40साल पूर्व हुए इस विद्रोह को पाईक विद्रोह कहाजाता है ।
यह भारत का सर्ब प्रथम ज्ञात विद्रोह था इसके नेता थे बक्सी जगबंधु ।
वो भारत के पहले ऐसे शहीद है जिन्हे अंग्रेजोँ द्वारा कटक की एक बरगद के वृक्षशाखा मेँ फांसी दिया गया था ।

आज कर्पुर उड़गया है बस महक बचा है
आज भी कटक ,मयुरभंज ,अनगुल ,ढ़ेकानाल ,नयागड़ ,जाजपुर ,पुरी आदि क्षेत्रोँ मेँ आखड़ाघर है लौँड़े समर अभ्यास कम गप्पे मारने जाते है

विभिन्न पुजापर्व मेँ पाईक तलवारकला पदर्शन होता हे
इसे CHAOU नृत्य कहाजाता है । ओड़िशा के अंश रहचुके सरेईकेला खरसुँआ आदि क्षेत्रोँ मेँ भी पाईकोँ का समुह निवाश करता है ये पहरी कूल के पाईक है जिनका कार्य होता था राज्य कि सीमा सुरक्षा करना ।

रविवार, 19 अप्रैल 2015

आम का शब्दिक परिचय

कुछ दिन पहले फलोँ के राजा "आम"(Mango) के लिये संस्कृत शब्द प्रयोग पर किसी के लेख कर भारी वहस छीडगया था । संस्कृत मेँ आम के लिये एक शब्द है चुतक और इसका एक रुप है ‪#‎ चुत‬!
वैसे संस्कृत मेँ आम के लिये कई शब्द प्रयोग किया गया है जैसे
स्त्रीप्रिय,अम्लफल,चामरपुष्प,राजफल,वसन्तद्रु,आम्रफल,मधूली,सुमदन,प्रियाम्ब,मधुद्रुम,फलोत्पति,पिकराग,पलालदोहद,वृद्धवाहन,वसन्तदूत,चुतक,लक्ष्मीश,माकन्द,कामेष्ट,कीरेष्ट,कोकिलावास,गन्धबन्धु"
आदि कई नाम पायेजाते है । तो केवल एक शब्द के लिये इतना भेजामारी करने से क्या फायदा जबकी इस फल का कई नाम प्रयुक्त हो चुके है ?
हिन्दी साहित्य मेँ इसके अनेक नाम पायाजाता हे, जैसे सौरभ, रसाल, चुवत, टपका, सहकार, आम, पिकवल्लभ आदि ।
गुजराती मेँ केरी (કેરી) ,ओड़िआ मेँ आम्ब+अ (ଆମ୍ବ) , मलायलम मेँ माव् (മാവ്) ,तेलुगु मेँ
भारतीय मामिडि(మామిడి) , इटली मेँ आम को Pelem , और इंडोनेशिया मेँ MANGA कहाजाता है ।
अंग्रेजी मेँ Mango शब्द पर्तुगिज शब्द माङ्ग सेँ गया है और यह माङ्ग शब्द मूलतः मलायलम शब्द "माव्" का परिबर्तित रुप है । पुर्तुगालीऔनेँ आम को ले जा कर युरोप को इस फल के बारे मेँ परिचय दिलाया था ।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

इरिट्रिया उत्तर अफ्रिका का एक छोटा सा देश का संक्षिप्त परिचय

उत्तर आफ्रिका के इथिउपिआ व सुदान मध्य़ मेँ इरिट्रीआ नामक एक देश आता है । 24 मई 1993 को यहाँ राष्ट्रीय दिवस के रुप मे मनाया जाता है । इस देश की ज्यादातर लोग टिग्रिन्या और एरेबिट भाषा मेँ बात करते है परंतु सरकारी भाषा के तौर पर फ्रेँच और अरबी को मान्यता मिला हे । इस देश कि अंदाजन जनवसति ५७ लाख है और प्रायः 90% लोग इस्लामिक है और 10% इसाई व अन्य धर्मालम्बी पायेजाते हे । इस देश का राष्ट्रगीत को
‪#‎ सोलोमोन_त्सेहाय े‬
नामके जानेमाने कवि और टिग्रिन्या बोलीके कंठ्य परंपराके अभ्यासीओँ ने मिलकर लिखा था । सोलोमोन त्सेहाये ऐसेवैसे कवि नहीँ थे उन्होने इरिट्रीआ को स्वतंत्र करने के लिये लम्बी लढ़ाई छेड़ा था । 1991 मेँ इरिट्रीआको आजादी मिलने के बाद इस कवि को शिक्षणक्षेत्र मेँ सांस्कृतिक प्रवृत्ति विभाग के मुखिया बन थे । स्वतंत्रा के पश्चात इरिट्रिया और पड़ोशी मुल्क इथिओपिया के बीच सीमा विवाद और जंग छीड़ गया । इस युद्ध मेँ इरिट्रिया को सामरिक हार का सम्ना करना पड़ा परंतु अंतराष्ट्रिय कोर्ट नेँ इरिट्रिया के पक्ष मेँ न्याय किया । उस जीत को याद रखने के लिये इस खास दिन को राष्ट्रिय दिवस के रुप मेँ इरिट्रिया मेँ मनाया जाता है ।