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शनिवार, 4 मार्च 2017

निशाचर जिंदावाद

संस्कृत में एक कहावत है

"या निशा सर्वभूतानाम्
तस्मात् जाग्रति संयमीः ।"

प्राचीनकाल मे अपने परिवार तथा जनवस्ती को हिंस्रजन्तुओं से रक्षा करनेवालों के लिए.....
घर के पालतू कुत्तों के लिए
तथा निरंतर तप करनेवाले मुनि ऋषिओं के लिए संभवतः ऐसे कहावत प्रचलन मे आया हो ...

आजकल इंटरनेट के जमाने मे यह कहावत काफी हद् तक अर्थहीन हो गया है
परंतु आज भी इस कहावत को जीवित रखने को कुछ लोग व जीव यत्नवान है....

कुत्ते तो पिछले ७०००० साल से इंसानो के साथ है ही
उल्लु व चमकादड भी रात्रीको ही खाद्य अन्वेषण मे लगे रहते है । उनके लिए
दिन के अपेक्षा रात कहीं अधिक
सुरक्षित होता है ।

मानवों में गरीब मजदुर लोग नाइट सिफ्ट करते समय सयंम बरतते है
निद्रा के लिए मशीन तोड फोड नहीं देते.....
इसलिए #निशाचर प्राणिओं का सत्कार होना चाहिए
च्युंकि इन्होने जीवों कि उस आदिम संस्कृति को आज भी जीवित रखा हुआ है
है कि नहीं 😂😂😂😂😂
जय निशाचर जय हो 😉😉

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

दारुल ईस्लाम कि सच्चाई

-क्या कोई मुस्लिम जिसनें दारुल इस्लाम के लिए लाखों हिंदुओ का क़त्ल किया हो, क्या वो मरने के बाद हिंदुओ की मन्नतें पूरी करेगा"

सैयद सालार गाज़ी की क़ब्र के सामने हिंदुओ का माथा टेकना उन लाखों हिन्दू वीर योद्धाओं के साथ धौखा होगा जिन्होंने उस गाज़ी से लड़ते हुए अपने प्राण त्याग दिए,

आज के हिंदुओं का गाज़ी के सामने सर झुकाना उन लाखों माँओं के साथ विश्वासघात होगा जिन माँओं ने गाज़ी को रोकने के लिए अपने लाल खोए, उन अर्धांगिनियों के साथ विश्वासघात होगा जिन्होंने उस गाज़ी से लड़ने के लिये अपना सिंदूर उजाड़ा ।

लाखों हिंदुओ को मारने वाले गाज़ी के सामने सर झुकाने से बेहतर, मैं शमसान घाट की उन आत्मा के सामने सर झुकाना बेहतर समझूँगा जिसनें अपने जीवन में किसी का क़त्ल नही किया हो,

आप सभी क्या जानते हो "सैयद सालार गाज़ी" के बारे में कौन था वो, तो सुनों मैं आपको उसकी सच्चाई बताता हूँ

"आप सभी महमूद गज़नवी (गज़नी) के बारे में तो जानते ही होंगे, वही मुस्लिम आक्रांता जिसने सोमनाथ पर 17 बार हमला किया और भारी मात्रा में सोना हीरे-जवाहरात आदि लूट कर ले गया था।

महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर आखिरी बार सन् 1024 में हमला किया था तथा उसने व्यक्तिगत रूप से सामने खड़े होकर शिवलिंग के टुकड़े-टुकड़े किये और उन टुकड़ों को अफ़गानिस्तान के गज़नी शहर की जामा मस्जिद की सीढ़ियों में सन् 1026 में भी लगवाया।

उसी लुटेरे महमूद गजनवी का ही भांजा था सैयद सालार मसूद उर्फ़ आपका गाज़ी बाबा,
यह बड़ी भारी सेना लेकर सन् 1031 में भारत आया। सैयद सालार मसूद उर्फ़ गाज़ी बाबा एक सनकी किस्म का धर्मान्ध इस्लामिक आक्रान्ता था।

महमूद गजनवी तो सिर्फ़ लूटने के लिये भारत आता था,
लेकिन सैयद सालार मसूद उर्फ़ गाज़ी बाबा भारत में विशाल सेना लेकर आया था उसका मक़सद भारतभूमि को “दारुल-इस्लाम” बनाकर रहना था, और इस्लाम का प्रचार पूरे भारत में करना था जाहिर है कि तलवार के बल पर।

सैयद सालार मसूद अपनी सेना को लेकर “हिन्दुकुश” पर्वतमाला को पार करके पाकिस्तान (आज के) के पंजाब में पहुँचा, जहाँ उसे पहले हिन्दू राजा आनन्द पाल शाही का सामना करना पड़ा, जिसका उसने आसानी से सफ़ाया कर दिया।

मसूद के बढ़ते कदमों को रोकने के लिये सियालकोट के राजा अर्जुन सिंह ने भी आनन्द पाल की मदद की लेकिन इतनी विशाल सेना के आगे वे बेबस रहे। मसूद धीरे-धीरे आगे बढ़ते-बढ़ते राजपूताना और मालवा प्रांत में पहुँचा, जहाँ राजा महिपाल तोमर से उसका मुकाबला हुआ, और उसे भी मसूद ने अपनी सैनिक ताकत से हराया। एक तरह से यह भारत के विरुद्ध पहला जेहाद ही युद्ध था जो भारत को इस्लामिक मुल्क़ बनाने के लिए हुआ था। सैयद सालार मसूद सिर्फ़ लूटने की नीयत से भारत नही आया था बल्कि बसने राज्य करने और इस्लाम को फ़ैलाने का उद्देश्य लेकर भारत आया था।

पंजाब से लेकर उत्तरप्रदेश के गांगेय इलाके को रौंदते, लूटते, हत्यायें-बलात्कार करते सैयद सालार मसूद अयोध्या के नज़दीक स्थित बहराइच पहुँचा, जहाँ उसका इरादा एक सेना की छावनी और राजधानी बनाने का था। इस दौरान इस्लाम के प्रति उसकी सेवाओं को देखते हुए उसे “गाज़ी बाबा” की उपाधि दी गई।

इस मोड़ पर आकर भारत के इतिहास में एक विलक्षण घटना घटित हुई, ज़ाहिर है कि इतिहास की पुस्तकों में जिसका कहीं जिक्र नहीं किया गया है।

इस्लामी खतरे को देखते हुए पहली बार भारत के उत्तरी इलाके के हिन्दू राजाओं ने एक विशाल गठबन्धन बनाया, जिसमें लगभग 20 राजा अपनी सेना सहित शामिल हुए और उनकी संगठित संख्या सैयद सालार मसूद की विशाल सेना से भी ज्यादा हो गई।

जैसी कि हिन्दुओ की परम्परा रही है, सभी राजाओं के इस गठबन्धन ने सालार मसूद के पास संदेश भिजवाया कि यह पवित्र धरती हमारी है और वह अपनी सेना के साथ चुपचाप भारत छोड़कर निकल जाये लेकिन सालार मसूद ने माँग ठुकरा दी उसके बाद ऐतिहासिक बहराइच का युद्ध हुआ, जिसमें संगठित हिन्दुओं की सेना ने सैयद मसूद की सेना को धूल चटा दी।

इस भयानक युद्ध के बारे में इस्लामी विद्वान शेख अब्दुर रहमान चिश्ती की पुस्तक मीर-उल-मसूरी में विस्तार से वर्णन किया गया है। उन्होंने लिखा है कि मसूद सन् 1033 में बहराइच पहुँचा, तब तक हिन्दू राजा संगठित होना शुरु हो चुके थे।

यह भीषण रक्तपात वाला युद्ध मई-जून 1033 में लड़ा गया। युद्ध इतना भीषण था कि सैयद सालार मसूद के किसी भी सैनिक को जीवित नहीं जाने दिया गया, यहाँ तक कि युद्ध बंदियों को भी मार डाला गया… मसूद का समूचे भारत को इस्लामी रंग में रंगने का सपना अधूरा ही रह गया।

बहराइच का यह युद्ध 14 जून 1033 को समाप्त हुआ।

जब फ़िरोज़शाह तुगलक बहराइच आया और मसूद के बारे में जानकारी पाकर वह बहुत प्रभावित हुआ और उसने उसकी कब्र को एक विशाल दरगाह और गुम्बज का रूप देकर सैयद सालार मसूद को “एक धर्मात्मा” के रूप में प्रचारित करना शुरु किया, एक ऐसा इस्लामी धर्मात्मा जो भारत में इस्लाम का प्रचार करने आया था।

मेरे हिन्दु भाईओं
इस इस्लामिक आक्रांता के आगे आप सभी माथा टेकते हो, जिसने अपने जीवित रहते हुए लाखों हिंदुओ को मारा हो क्या वो मरने के बाद हिन्दुओँ की मनोकामनाएं पूरी करेगा,
किसी के सामने सर झुकाने से पहले उसके इतिहास और चरित्र को तो जान लो फिर उसे सम्मान दो, जो भारतभूमि में भारत को सम्मान नही देता और हिन्दू धर्म को सम्मान नही देता, मैं उनके सामने अपना सर नही झुकाता।
ऐसे पापी अधमों के आगे आप भी माथा न झुकाओ अन्यथा अपने पूर्वजों का अनजाने में हीं अपमान कर बैठेगें ।

मेरी आत्मकथा-पुष्प कि आत्मकथा

जी हाँ, मैं पुष्प हूँ -पुष्प! प्रकृति माँ का सब से सुकुमार, कोमल, भावुक और सुन्दर बेटा- पुष्प! उपवन मेरा घर है । हवा मेरी सहचर है । मेरी सुगंध का अदृश्य, कोमल, विस्तृत चारों ओर फैला हुआ मेरा संसार है । ऐसा संसार, जिस में आकर कोई भी मनुष्य भाव से भर कर आनन्द से मस्त हुए बिना नहीं रह पाता । यह कहे बिना भी नहीं रह पाता कि बड़े सुगन्धित पुष्प खिले हैं यहाँ! जी हाँ, ऐसा ही महक और मादकता भरा है मुझ पुष्प का संसार । उतना ‘ ही सुन्दर और .मुक्त भी'। मैं सुन्दरता का साकार रूप हूँ । अपनी सुन्दरता से सारे वातावरण को तो सुन्दर बना ही देता हूँ उसकी चर्चा भी दूर-दूर तक फैला दिया करता हूँ! जी हाँ, मुझे छू कर मेरी सुगंध को अपने अदृश्य पंखों में भर कर यह छलिया पवन दूर-दूर तक मेरी सुन्दरता और सुगंध का ढिंढोरा पीट आया करता है तब लोग मेरी तरफ भागे आते हैं । मुझे तोड़ कर ले जाते हैं । कोई गुलदस्ते में सजा कर अपने घर की शोभा बढ़ाता है, तो कोई हार में पिरो कर मुझे अपने गले का हार बना लिया करता है । कभी मैं गजरा बन कर किसी सुन्दरी के जूड़े पर धर कर उसकी सुन्दरता में चान्दनी भर देता हूँ तो कभी अकेला ही बालों में टाँगा जा कर सभी का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच लिया करता हूँ । कई बार सुन्दरियों के कानों में झूलकर उन के गोरे कोमल गालों को चूम लेने का सौभाग्य भी पा लिया करता हूँ । भगवान् के भक्त और पुजारी मुझे भगवान् के चरणों पर चढ़ा कर आनन्द पाते हैं, तो निराश प्रेमी अपनी प्रेमी- प्रेमिकाओं के मजासे पर अर्पित कर एक तरह की शान्ति प्राप्त करते हैं । कई बार मुझे गुलदस्ते या हार के रूप में विशिष्ट लोगों को भेंट में भी दिया जाता है । अरे हाँ, मुझे ‘एक भारतीय आत्मा’ नामक क्रान्तिकारी कवि की वे पंक्तियाँ आज तक याद हैं, कि जो मुझे देखकर, मेरी भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए उसके होंठों पर मचल उठी थीं; ''मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर तुम देना फेंक; मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक !''लेकिन ऐसा मान-सम्मान और प्रशंसा-गान मुझे ऐसे ही प्राप्त नहीं हो गया । इसके लिए मुझे बीज के रूप में कई दिनों तक धरती माँ की माटी भरी गोद में घुटती साँसों के साथ बन्द रहना पड़ा है । आप अनुमान नहीं लगा सकते, उस पल अपने साँसों को घुटते और तन को गलते-सड़ते देखकर तब मेरे मन पर क्या बीता करती थी । उस पर सूर्य की किरणें जब ऊपर से धरती को गर्मा और झुलसा दिया करतीं, तब धरती के भीतर भी कई बार पसीने से तर होकर दम और भी घुटने लगता । तब अचानक. कहीं से पानी की कोई धार आकर उस गर्मी से तो राहत पहुँचाती; पर सड-गल रहे तन की रक्षा उस से भी न हो पाती । कई बार किसी खाद के कडुवे-कसैले स्वाद भी चखने पडते, कई बार कड़बी-तीखी दवाइयाँ निगलकर मितली-सी भी आने लगती । कई बार ऐसा भी हुआ, माली या किसान की गुड़ाई ने मिट्टी के साथ-साथ मेरे तन-मन को भी उलट-पलट कर रख दिया । इस प्रकार की स्थितियों का सामना करते समय मन में क्या गुजरती है न तो वह सब बता पाना ही सभव है और न उस सब का आप अनुमान ही लगा सकते हैं । लेकिन यह क्या? एक दिन मैंने अपने -सडगल चुके शरीर में धरती माँ के आशीर्वाद से एक नया जोश, नया उत्साह अंगड़ाईयाँ लेते हुए अनुभव किया । मुझे लगा कि मैं अपने अंगों का विस्तार-फैलाव करते हुए धरती माँ से उछलकर उसकी गोद में आ रहा हूँ । मैंने माली से लगने वाले आदमी को किसी से कहते हुए सुना-बड़े सुन्दर अंकुर फूट रहे हैं इस बार तो । तो मुझे समझ आया कि जैसे मेरा नाम ‘अंकुर’ है । वह एक जन्म-नाम हुआ करता है न, वैसा ही कुछ मेरा भी था । कुछ दिन और बीतने पर उस आदमी के मुँह से फिर सुनाई पड़ा-'कितना बढ़िया है यह पौधा ।'बस, मैंने समझा कि मैं अंकुर नहीं, पौधा हूँ -पौधा । अब वह आदमी मेरा बडे ध्यान रखने लगा । ठीक समय पर पानी तो पिलाता ही, कुछ खाद-सी भी दो-एक बार डाल गया । बड़े ध्यान और सावधानी से निराई-गुड़ाई कर के उग आई फालतू घास, खरपतवार आदि को निकाल देता । इस प्रकार पौधे के रूप में लगातार बड़ा होता गया । एक दिन मैंने अपने ऊपरी पोरों में कुछ गाँठें-सी पड़ने का अनुभव किया । बस, चिन्ता में पड़ गया कि यह नई मुसीबत कौन-सी आने वाली है? अपने इस प्रश्न का उत्तर अभी प्राप्त भी नहीं कर पाया था कि एक बार मैंने उन गाँठों के धीरे-धीरे चटकने की आवाजें सुनी । 'हाय राम! यह क्या होने जा रहा है?'मैं चौक गया; लेकिन किसी के आने की आहट पा कर कुछ बोला नहीं, बस चुपचाप देखने लगा । देखा कुछ क्षण बाद वह आहट मेरे पास आकर रुक गई है । आने वाला मेरा रखवाला माली ही था । वह मेरी दशा देख कर मुस्करा उठा और लगातार मुस्कराता गया । फिर होंठों- हीं-होंठों में बोला-'सुबह तक ये कलियाँ (गाँठें) अवश्य ही खिल कर मुस्कराता फूल बन जाएँगी । 'फूल!'एक बार मैं फिर चौंक पड़ा । पहले बीज, फिर अंकुर उसके बाद पौधा, फिर वे गाँठें- सी चटकती हुईं और अब फूल? पता नहीं क्या-क्या बनना है अभी मुझे? लेकिन तब तक रात ढल आई थी, सो वह माली चला गया । मेरी चिन्ता कम नहीं हुई । रात भर चिन्ता में डूबा रहा । जैसे ही प्रभात काल की मन्द पवन का झोंका आया, उसका मधुर-कोमल स्पर्श पाकर मैं पूरी तरह से खिलकर जैसे अपनी ही सुगन्ध से नहा उठा । पवन के और झोंके आकर मुझे लोरियाँ देने लगे-देते रहे लगातार । जी हाँ , अब मैं खिलकर पुष्प जो बन चुका था । जी, बस इतनी सी ही है मेरी आत्म-कथा!

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

*महानदी जलविवाद*

#महानदी का #जन्म छतिशगड मे मगर #यौवन व #महासंगम ओडिशा में हुआ है । कभी #चित्रोत्पला के नामसे विख्यात रही यह नदी  लगभग 851 कि.मी लम्बा है जिसमें से केवल 286 km. छतिशगड में आता है ।

ओडिशा के पास ओर भी नदीआँ है लेकिन छतिसगड के पास सिर्फ महानदी ।
छतिसगड के 58.48% जलश्रोत महानदी ओर उसकी शाखा नदीओं के जल ही है ! 1948 में हिराकुद जैसे विशाल #डैम (25√किमी.) बनते समय #मध्यप्रदेश के हजारों लोग जो कि #ओडिआ ही थे को अपना भूमि गवाँना पडा था । आज हिराकुद के 87% हिस्सा छतिशगड में है बाकी ओडिशा में .........

#मध्यप्रदेश छतिसगड सरकार ने कई
बार #हिराकुद से लाभ लेना चाहा लेकिन ओडिशा सरकार ने होने नहीं दिया ......। ज्यादातर लाभ ओडिआओं को ही मिलता रहा ....छतिसगड का पानी ओडिआ लोग पिइते नहाते इंडस्ट्रिल युज करते रहे.......
छतिसगड बेचार ठगा सा वर्षौं मूकदर्शक बनारहा .....

छतिशगड नें महानदी व उसके शाखा नदीओं पर जब बांध बनाने लगा तब #bjd के #कुम्भकर्ण नेताओं कि #निद्रा भंग हुई । वो चिल्लाने लगे ....
लो जी हमें तो बताए ही नहीं ........
#छतिशगड बेवफा है 😂😂😂😂😂
इटिसी......

छतिसगड ने वाकायदा एक विदेशी संस्था #प्राइस वाटर हाउस को द्वारा पहले तो सर्वे किया फिर चतुरता के साथ बडे बांध के वजाय छोटे व मध्यम प्रकल्प लगाया लेकिन ये सब चोरीछिपे नहीं हुआ था । इसका कोई सबुत नहीं कि छतिसगड ने बांध बनवाके #सर्जिकल_स्ट्राइक करदिया हो ओर किसीको पता न चला.......
15 साल पहले प्रारम्भ किएगये तथा
90% काम पुरा हो चुके जलपरियोजनाओं पर #अंतिम अवस्था मे चिल्लाने से #छतिसगड CM का #पुतला जलाने से अब कछ्छु होनेवाला है नहीं........

#ओडिशावालों के पास 2 रास्ते है ....महानदी को बचने के लिये #फ्रिडेलकास्त्रो ......#चे_गुवारा टाइप #विद्रोह करो .........अपना दुजों का घर जलाओ ...... #उत्तरभारतीयों को ढुंढ के भगा भगा के मारो ..... #भारत से अलग हो जाओ

या ,,,,,,,

महानदी के शव को #दानामाझीं के तरह अपने #कन्धों पर ढोने को तैयार हो जाओ........

मुझे पता है ...

पहलावाला अप्सन तुमसे होने से रहा ,,,,,,

तो महानदी के #शवयात्रा में सामिल होने को तैयार रहो........

क्षेत्रवादी कौन ?

#क्षेत्रवादी हमेशा #northeast #eastindian #southindia के लोग ही क्युँ होते है ?.....

क्या सिर्फ उत्तरभारतीय ही सच्चे देशभक्त तथा असली भारतीय है ?

1.
एक पढेलिखे उत्तरभारतीय को भी इन तिनों क्षेत्र के बारे में कम ही पता होता है.....

जबकी किसी तामिलभाषी..बंगाली या.ओडिआ को पुछकर देखिए उत्तरभारत के बारे मे उनसे ज्यादे ही बता देगें ...कमसे कम हमें पता होता है lakhnow युपी का विहार का पटना,भोपाल एम्पी की राजधानी है ......उत्तरभारतीयों को पुछलिजिए ओडिशा कहाँ है जी कहेगें उ केरल कै पास न भैया ...हम गये थे भैया घुमने बहुतै नारियल का पैड होता है उहाँ 😁😁😁

2.
उत्तर भारतीय हमारे भाषाओं को नहीं सिखते उन्हें ऐसी वाहियात भाषाओं को वोलते हुए भी कोई मिलगया न अपने 36 दान्त दिखाने से खुदको रोक नहीं पाते......
इधर हमारे यहाँ के देशद्रोही लोग उनके भाषाओं को भी समझलेते है और ना सिर्फ समझते है वल्की उनके भाषाको वोलकै गर्व भी अनुभव करते है (जैसे हिन्हीभाषी अंग्रेजी बोलकै स्टाईल मारते है 😂😂) ।.

3.
उत्तरभारतीओं द्वारा लिखेगये पुराणों में
दक्षिणभारतीय राक्षस,
पूर्वभारतीय उत्तरपूर्व के लोग म्लैछ यवन आदिवासी असुर आदि बताए गये है ......
हमने फिर भी उनके पुराणों,तौहार धर्म को अपनाया और यहाँतक कि समुचे विश्व में फैलाया लेकिन उन्हें ये भी नागवार गुजरा उन्होने इसका श्रेय आगस्त्य ऋषि को दे दिया ......


4
हिन्दीभाषीओं के स्कुली किताबों में ओडिशा दक्षिणभारत नर्थ इस्ट का इतिहास व जननायकों पर तथ्य नहीं होते ।
नहीं होता उनके किताबों में सुरेन्द्र साए,वक्सी जगबन्धु के बारे में एक लाइन ......
लेकिन हमें पढने को बाध्य किया जाता है रानी लक्ष्मीवाई से लैके चन्द्रगुप्त तक का इतिहास ......

ऐसे सोचने पर कई पोएटं ओर मिलेगें ये प्रुफ करने में कि उत्तरभारतीय ही सच्चे भारतीय है शेष भारत के लोग क्षेत्रवादी जातिवादी विदेशी अनार्य देशद्रोही फलाना ढिमकाना 😏..............

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

स्वतंत्रता संग्राम के संकल्प

आओ स्वतंत्रता दिवस मे
ये संकल्प लेँ
1.
कभी जातिवाद के जाल मे फँसकर
आपस मे नहीँ झगड़ेगेँ
दलित सवर्ण के झगड़े नहीँ होने देगेँ न ऐसी छोटी सोच को बढ़ावा देगेँ ।
2.
हस्ताक्षर करते समय मातृभाषा तथा राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रयोग करेगेँ
3.
आज कहीँ वक्तव्य देने हो तो
भारतीय भाषाओँ मे ही भाषण देगेँ
4.
जाहाँतक हो सके भारतीय संस्कृति परंपराओँ का सम्मान करेगेँ ।
5.
किसी प्रान्त या क्षेत्र विशेष ,भाषा व वोलीओँ का मजाक नहीँ उड़ाएगेँ ।
किसीको चिँकि ,भैया ,मालिया,कालिया नहीँ कहेगेँ ।
6.
भारत कि अखण्डता बनाए रखेगेँ,
विहारी हो गुजराती हो या पंजाबी सभी का सम्मान व आदर करेगेँ !
7
.न भ्रष्ट होगेँ न भ्रष्टाचार होने देगेँ ।
घुस देगेँ न घुस खाएगेँ
8.
अंधे सेकुलारी नहीँ बनेगेँ
सच्चे सेकुलारी बनेगेँ
आजम, औविसी जैसे मूर्ख राजनेताओँ का विरोध भी करेगेँ
कलाम जैसे सच्चे राष्ट्रभक्तोँ का
आदर व सहायता भी करेगेँ ।
मैँ नहीँ कहुगाँ तुम प्याँट सार्ट उतारके
धोती पहन लो या तिरंगा लैके गाँव गाँव सहर सहर घुमते फिरो
लेकिन यदि तुमने इतना भर कर लिया
तुम आजाद हो !
आजाद मुल्क मे
आजादी के जश्न मे 100% हिस्सा ले रहे हो ।

सोमवार, 4 जुलाई 2016

पादना ये प्रकृति कि पुकार है

पादना
ये प्रकृति कि पुकार है
अब अपानवायु को हम रोक तो नहीँ सकते न
निकल गया सो निकल गया !
हाँ तो एक बार एक ग्रृप मे
मैनेँ मोदी - दिग्गविजय पाद प्रसंग पर एक जोक चैँप दिया था
ओर तब उस सभ्य समाज के
कट्टर मुखिया ने हमे ठेँगा देखाते
हुए
कहा था
खबरदार !!
इहा माताएँ बहनेँ
भी है
ऐसे उलजलुल पोस्टिआने से बचेँ !!
मैँ कंफ्युज हुँ
शायद महिलाएँ
लघुशंका दीर्घशंका
और पर्द्दन आदि नित्यकर्म करती ही नहीँ
उनका इंजन पुरुषोँ से बिलकुल भिन्न होता होगा ।
मुझे पता नहीँ शायद ऐसा ही हो !!
खैर तब
मैने अपनी गलती मान ली
और उन दिग्गजोँ के आगे स्वयं को सरेँडर कर दिया !
जोक ये था
"एकबार मोदीजी पत्रकारोँ से बात कर रहे थे
और किसी ने उनके आगे दिग्गविजय का नाम ले लिया
मोदी ने कुछ कहे बगैर
पाद दिया
अगले दिन देश भर मे पतरकारोँ ने इसे मुख्य मुद्दा बनादिया
कि देखो
मोदी ने दिगविजय के मुँह पर पाद दिया !"
संस्कृत शब्द ‪#‎ पर्द्दन‬से हिन्दी बाग्ला मे ‪#‎ पाद‬
ओड़िआ मे ‪#‎ पाड़‬
तथा
अंग्रेजी मे ‪#‎ Fart‬शब्द प्रचलन मे आया ।
वैसे
जानवरोँ मे शियार और गिदड
सबसे उत्कट गंधयुक्त अपानवायु छोड़ने के लिए जाने जाते है ।
बचपन मे 5 बच्चे साथ साथ बैठे हो और उनमे से कोई
पाद दे तो
एक काठी घुमैके
मुहावरा बोलके जिसके पास अन्तिम शब्द खत्म होता था
उसे ही दोषी करार दिया जाता था

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

लोरी.....

रात का वक्त है नयी नयी माँ बनी गाँव कि कन्याएँ बहनेँ माताओँ का फिक्र तबतक कम नहीँ होता जबतक उसका राजा बैटा चैन कि नीँद सो नहीँ जाता ।
और बचेँ भी बड़े प्यारे होते है
तब तक रोते रहेगेँ जबतक माँ लोरी न सुना देँ
अब
बच्चा जब रोता हे माँ उसे ‪#‎ लोरी‬सुनाती और बच्चे शान्त हो जाते । लोरी
संस्कृत भाषा कि लोळ (लोल) शब्द का परिवर्तित रुप है । ज्यादातर भाषाविद मानते कि लोल से लोली हुआ और फिर लोरी हुआ होगा !
लोरी को
अंग्रेजी मे Nursery rhyme कहाजाता है ।
रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस तरह के गीतोँ को
"छेले भुलानो छड़ा" कहा
वहीँ सम्बलपुरी या कोशली भाषा मे इसे "छुआ भुरुआ गीत" कहाजाता है ।
ऐसा नहीँ है कि
Nursery rhyme शब्द का ओड़िआ समकक्ष शब्द नहीँ था...
था परंतु ज्यादातर स्थानीय लोग इन गीतोँ को शिशु गीत या बाल गीत कहाकरते थे । आज 100 से 150 साल पहले ओड़िआ
पल्लीकवि नन्दकिशोर वल ने इन गीतोँ को ‪#‎ नानावाया_गीत‬कहा जो ओड़िशा मे अब सर्वाधिक प्रचलित शब्द बनाहुआ है ।
लोल शब्द का संस्कृत अर्थ बच्चोँ को झुलाना नचाना आदि है
वैसे हिन्दीभाषी लोग लोरी को पालने के गीत भी कहते है ।
असाम मे इसे नीचुकानि गीत व धावर काम कहाजाता है ।

शनिवार, 15 अगस्त 2015

अमरुद और मेरी उलझन.....

तिन दिन पूर्व मैने दो अमरुद के पैड़ लगाएँ
फिर अचानक मनमे क्या ख्याल आया.,. अमरुद के बारे मेँ गुगल पर रिसर्च करने बैठगया ।

17वीँ सदी मेँ मार्टेल प्रजाति कि
ये मिठा स्वादिष्ठ फल युरोपियन व्यापारीओँ के साथ भारत आया !

विदेशी आये और चले भी गये परंतु ये (Guava) वृक्ष करीब करीब 300 वर्षोँ से समुचे भारत के जमीनोँ पर कब्जा कर बैठा है ।

पतानहीँ क्युँ पर इस वृक्ष के खिलाफ आजतक #कट्टर
#स्वदेशी
#समर्थक #आन्दोलनकारीओ ने कोई विरोध नहीँ कि न इसपर संसदमे #कंग्रेसी ओ ने कभी हल्ला गुल्ला मचाया है ।

अब मैँ समझचुका था कि
मैने अमरुद का पौधा लगाकर बहत बड़ी गलती कर दी है......

ये बिलकुल ऐसा ही है
कि जैसे आप फेसबुक पर
#राजीव_दिक्षित जी के कट्टर समर्थक हो और बिना जानकारी आपने एक विदेशी द्रव्य को स्वदेशी समझकर इस्तेमाल कर लिया !!!

मेरे दिल को इस नयी जानकारी से गहरा धक्का तो लगा ही था और बचाकुचा जो अमरुद के लिये थोड़ी बहत ललक् बची हुई थी
उसे हमारे प्यारे चाचाजी के बातोँ ने पूर्णतः निर्मूलन् करदिया !!!

उन्होने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ एक अवैज्ञानिक(?) बात कहीँ
कि
"जिस तरह विदेशी संस्कृति
भारतीय समाज के लिये ज़हर साबित हुई है
उसी प्रकार ये विदेशी वृक्षोँ के द्वारा अत्सर्जरित Oxygen मे तथा उनके फलोँ मे मौजुद जहरीले तत्व (पोषक तत्व ) हमेँ पीढ़ी दर पिढ़ी कमजोर बना रहे है ।
'असल बात तो दरसल ये हे कि अंग्रेजोँ को इस वृक्ष कि बुराईओँ के बारे मे पता था परंतु ये चालक व्यापारी लोग जानवुझकर इसे भारतीयोँ को कमजोर बनाने के लिये छोड़गये है ताकि बाद मेँ फिर आ कर हम पर राज करसके ।"

फिर चाचाजी ने इस वृक्ष से जुड़ी एक सामाजिक मुद्दे कि और मुझे ध्यान दिलाते हुए
बताया
"देखो मनुआ
ए जो तुम आज इत्ते अमरुद के पौधे पोत रहे हो का सोचे हो कल को इस से अछा दिन आ जावेगा :]] अरे बचुआ तनिक समझदार बनो '
कलको तोहरे बच्चे होवेगेँ
हमरी तो तिन लौँडे हे ही....
कल को इन अमरुद के वृक्षोँ को लेकर के वो आपसमेँ महाभारत कर गये तो
का करपाओगे ? बचाने जाओगे तो उलटे तुमपर पड़ने का डर है मुझे ...."
ना...ये मेरे बच्चे ही कौरव है मे जानता हुँ
इसलिये कहरहा था
जो भी करो सोच समझकर करो"





तिन दिन पूर्व मैने दो अमरुद के पैड़ लगाएँ फिर अचानक मनमे क्या ख्याल आया.,. अमरुद के बारे मेँ गुगल पर रिसर्च करने बैठगया । 17वीँ सदी मेँ मार्टेल प्रजाति कि ये मिठा स्वादिष्ठ फल युरोपियन व्यापारीओँ के साथ भारत आया ! विदेशी आये और चले भी गये परंतु ये (Guava) वृक्ष करीब करीब 300 वर्षोँ से समुचे भारत के जमीनोँ पर कब्जा कर बैठा है । पतानहीँ क्युँ पर इस वृक्ष के खिलाफ आजतक #कट्टर #स्वदेशी #समर्थक #आन्दोलनकारीओ ने कोई विरोध नहीँ कि न इसपर संसदमे #कंग्रेसी ओ ने कभी हल्ला गुल्ला मचाया है । अब मैँ समझचुका था कि मैने अमरुद का पौधा लगाकर बहत बड़ी गलती कर दी है...... ये बिलकुल ऐसा ही है कि जैसे आप फेसबुक पर #राजीव_दिक्षित जी के कट्टर समर्थक हो और बिना जानकारी आपने एक विदेशी द्रव्य को स्वदेशी समझकर इस्तेमाल कर लिया !!! मेरे दिल को इस नयी जानकारी से गहरा धक्का तो लगा ही था और बचाकुचा जो अमरुद के लिये थोड़ी बहत ललक् बची हुई थी उसे हमारे प्यारे चाचाजी के बातोँ ने पूर्णतः निर्मूलन् करदिया !!! उन्होने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ एक अवैज्ञानिक(?) बात कहीँ कि "जिस तरह विदेशी संस्कृति भारतीय समाज के लिये ज़हर साबित हुई है उसी प्रकार ये विदेशी वृक्षोँ के द्वारा अत्सर्जरित Oxygen मे तथा उनके फलोँ मे मौजुद जहरीले तत्व (पोषक तत्व ) हमेँ पीढ़ी दर पिढ़ी कमजोर बना रहे है । 'असल बात तो दरसल ये हे कि अंग्रेजोँ को इस वृक्ष कि बुराईओँ के बारे मे पता था परंतु ये चालक व्यापारी लोग जानवुझकर इसे भारतीयोँ को कमजोर बनाने के लिये छोड़गये है ताकि बाद मेँ फिर आ कर हम पर राज करसके ।" फिर चाचाजी ने इस वृक्ष से जुड़ी एक सामाजिक मुद्दे कि और मुझे ध्यान दिलाते हुए बताया "देखो मनुआ ए जो तुम आज इत्ते अमरुद के पौधे पोत रहे हो का सोचे हो कल को इस से अछा दिन आ जावेगा :]] अरे बचुआ तनिक समझदार बनो ' कलको तोहरे बच्चे होवेगेँ हमरी तो तिन लौँडे हे ही.... कल को इन अमरुद के वृक्षोँ को लेकर के वो आपसमेँ महाभारत कर गये तो का करपाओगे ? बचाने जाओगे तो उलटे तुमपर पड़ने का डर है मुझे ...." ना...ये मेरे बच्चे ही कौरव है मे जानता हुँ इसलिये कहरहा था जो भी करो सोच समझकर करो"


सोमवार, 20 जुलाई 2015

तुलसी एक विचार

#ओड़िआ कवि गोलक दास जी ने एक स्तूति काव्य मेँ #तुलसी वृक्ष के बारे मेँ एक पंक्ति लिखा है

Maa Goo Tulasi devi ,
Mule Tora #Ganga
Daale Tora #Bishnu
patre Devatanka Baasa
Se Patra Padile Manohi huaie Kahaie Golaka dasha !

कवि ने यहाँ पवित्र तुलसी वृक्ष की औषधीय गुणोँ को कुछ इस प्रकार कहा है !
"हे देवी तुलसी तुम्हारे जड़ोँ मेँ #गंगा अर्थात् अति पवित्र औषधीय तत्व है जो हर रोग को नाश करने मे सक्षम है ।
शाखाओँ मेँ #विष्णु ,पत्र मेँ देवता वास करते है । तेरे सभी अवयवोँ को साथ मिलाकर भी महोषधी बनाया जा सकता हे ।"

तुलसी जैसी पवित्र वृक्ष की रोपण पूजन तथा नित्य जलदान करके पत्र सेवन करना चाहिये इससे एक तो आपका मन शुद्ध होगा वहीँ स्वास्थ मेँ भी सुधार होगी ।
हाईस्कुल मेँ पढ़ते समय मेँ रोज दोपहर को स्कूल मेँ टिफिन करने के बाद 4 या 5 तुलसी पत्र खाया करता था...
मुझे उन तिन वर्षोँ मेँ कोई बड़ी विमारी जैसे सर्दी बुखार नहीँ हुआ था .....
#हिन्दु संस्कृति मेँ तुलसी पूजन एक अनुठा संस्कार है । गाँव देहात मेँ आज भी चवुतरा मेँ दिखजाती तुलसी का पौधा ! सहरोँ कि बात कर शायद ही इक्के दुक्के घरोँ मे गमला मेँ दिखजाय तो ठिक वरना




रविवार, 17 मई 2015

ISCKON इस्कॉन कि सच्चाई

इस्कॉन ISCKON या अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ(International Society for Krishna Consciousness.)क्या सही मायने मेँ एक धार्मिक संगठन है या भारतीयोँ के भगवन ,भक्ति और भावनाओँ से करोड़ोँ कमाकर अपना संस्था चलानेवाली अमरीकी कंपनी ?
हम सब जानते हे कि इसे 1933में न्यूयॉर्क पर भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने प्रारंभ किया था । देश-विदेश में इसके अनेको मंदिर और विद्यालय है । शुरवात मेँ इस संस्था कि बागड़ोर एक संथ के हाथ मेँ था अब विदेशीओँ के हाथ मेँ ! भारतीय संत कभी धर्म को लेकर विजनेस नहीँ करते ये तो । इस्कॉन कि उन मंदिरोँ मेँ चढ़ाये जा रहे चंदे और नगदी से यह संगठन दिन व दिन और शक्तिशाली धार्मिक संस्था बनराहा है । Oh my god फिल्म मेँ कथानक के जरिये इस संस्था पर हीँ प्राहार किया गया था । धर्म के नाम पर फ्राँचाईजी बनाना कोई नईबात नहीँ है मध्यप्राच्य और युरोप के पैगम्बरोँ ने 2000वर्ष पूर्व इसकी शुरुवात करदि थी ।
अब सवाल हिँदुओँ का है क्या इस्कॉन उनके लिये लाभकारी है ?
मानसिक लाभ मिलचुके भक्त इसके गुण गाते पायेगये है जबकि भारतीय बुद्धिजीविओँ नेँ इसे संदेहास्पद माना ।
फेसबुक के धर्मधुरंधर कभी मंदिर न जानेवाले भगवा भक्तोँ को यह लेख अनुचित ही लगेगा च्युँकि वे आँख बंदकर अंधे होना का ढ़ोँग करने मेँ माहिर है ।
यहाँ सवाल आस्था का नहीँ है अपितु आस्था के नाम पर लोगोँ के भावनाओँ से खेलकर पैसे कमाये जा रहे हे । आपको मंदिर मेँ जाना हे तो बिना फ्राँचाईजी वाली मंदिर मेँ जायेँ इस्कॉन मेँ जाकर आप अपने ही देश का पैसा बिना किसी लाभ के विदेशीओँ को मुफ्त मेँ दे देते है
भगवन हर जगह है

राहुल गांधीजी का तेवर

इनदिनोँ बुढ़ापे की कगारतक पहचँचुके राहुलजी अपनी बचीकुची जवानी की जोश को बिना होश के बिजेपी पर दिखा रहे है । अब ये सिर्फ भगवनजी जानते होगेँ की राहुलजी का ये तेवर - TEVER Film देखकर बदला या ये बाबा रामदेवजी द्वारा बनायेगये पुत्रजीवक बुटी का Sideefects है ।
राहुल जी नेँ हाल ही मेँ जो All time hit shows का पदर्शन किया वो केजरु सर जी का Hangover भी हो सकता है परंतु हमेँ उससे क्या लेनादेना हम राहुलजी को अध्ययन करने निकले है ।
1 साल मेँ राहुलजी ने बिजेपी के लिये प्रचार किया और आखिरकार बिजेपी को ऐतिहासिक जीत दिलाई
परंतु कुछ अंधभक्तोँ ने इसका श्रेय साहेब को दे दिया ।
नाराज हो राहुलजी कुछ दिन मौन रहे
वो आत्मसमीक्षा करने हेतु भगवनजी का ध्यान करने लगे
तबतक इस मंदबुद्धि बिजेपी सरकार नेँ उनके चरित्र की जासुसी की
राहुलजी फिर भी चुपरहे
कुछ न बोले उधर पार्टीवाले इसबात पर हायतोबा मचारहे थे
इसबीच राहुलजी आत्मचिँतन करने पतानहीँ कहीँ अंतर्ध्यान हो गये या पालनकर्त्ता विष्णु जी से मिलने ब्रह्मलोक गये थे ये बतना मुझ साधारण मानव के लिये नित्यान्त कष्टसाध्य है ।
फिर एकाएक 56 दिन की अज्ञातवास के पश्चात उन्होने आते ही जिसतरह से मोदी सरकार पर वार किया वो काफी सराहनीय है । पंजाब की रेलयात्रा करते हुए उन्होने गांधीजी कि याद दिलाई , GENRAL बोगी मेँ बैठकर उन्होने लालची व गरिबोँ को IMPRESS किया और इसतरह से पार्टीवाले तथा कुछ विरोधीओँ को भी खुस करदिया मनमेँ उम्मिद जगादिया ।
अब सुटबुट पर हालिया टिप्पणी देकर वो देश मेँ पुनः पुरातन पहनावा को अपनाने की
कारगर अभियान चलाने कि कोशिश कर रहे तो अंधभक्त उनपर खफा है ।
पतानहीँ इस देश के लोग कब स्वदेशी द्रव्य व संस्कृति को महत्व देगेँ
स्वदेशी आंधोलन को पुनः जीवित करनेवाले महान आत्मा श्री राहुल गांधी जी को हम दूर से नमन करते हुए इस लेख कि समाप्ति करते है ।

दिखावा उतना करो जितने की औकात है

मैनेँ अपनी गाँव की एक लड़की का नाम माताजी को मेरी शादि के लिये सुझाया । लड़की एक तो पड़ोशी थी उपर से #खंडायत जाति की तो घरवाले शादि के लिये तैयार हो गये ।
माताजी ने मेरा मन रखने के लिये उसकी माँ से बात की परंतु उस लड़की की माँ ने कहा की मेँ सभी रिस्तेदारोँ से सलाह विचार करके बताती हुँ ।
वक्त बितता गया और इसबीच मेँ
दो महिनोँ बाद गाँव गया तो उस लड़की कि माँ मिलने आयी फिर उसके एक आद रिस्तेदार भी मिले ।
उनके बातोँ से पताचला मानोँ वो मेरा मजाक उड़ा रहे हो और नसिहत्त दे रहे हो अपनी हालात सुधारने के लिये ।

आजकल घर कि मालिहालत उतना ठिक नहीँ ,बहन कि शादि मेँ काफी खर्चा हो गया था । मेरे पिताजी भी डाइवेटिस से पीड़ित है ,मेँ थोड़ा पतला और क्रोधी स्वभाव का हुँ शर्मिला भी ।
अतः हमेँ ये सब झेलना पड़ा


आज के दौरमेँ लौँड़ो के पास गर IPHONE 6 व वैँक एकाऊँटमेँ थोड़े से पैसे है तो आपका कद्र होता हे बाकी लड़का कितना ही गुणवान हो कोई फर्क नही पड़ता ।

कल लड़की की माँ ने मेरी माताजी को चिढ़ाने के लिये कहा मेरी बेटी के लिये #Gurujunga गाँव से शादि का रिस्ता आया है और तो और लड़केवाले उल्टा हमेँ पैसे देगेँ ।



अब मुझे लगता हे ये थोड़ा ज्यादा हो गया :-D :-D :-D
*दशवी फैल
*तंबाकु खानेवाली
*अड़ियल लड़की
के मातापिता भी साधारण कृषक है और लड़की उतनी सुंदर भी नहीँ की लड़केवाले रुपियापैसा देकर शादी करवायेँ

मैँ उसे बचपन से पसंद किया करता था परंतु वक्त के साथ साथ उसने तंबाकु खाना शुरुकरदिया और उसके हालियाँ बर्ताप भी बदलने लगा है । ऐसेमेँ आज माताजी ने आज जब फोन करके यह बात बताया मैँ 10 मिनिटतक हँसने लगा ।
:-D :-D :-D :-D

उस लौड़िँआ कि परिवारजनोँ को फेसबुक के जरिये बताना चाहुगाँ
दिखावा उतना ही करो जितनी कि तुम्हारी औकात है च्युँकि भगवन किसीकि घमंड को नही साहाकरते ।