ब्लॉग आर्काइव

अमरआत्मा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अमरआत्मा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 28 जून 2017

•••Jhon Lennon second gandhi••••

Once a time Jhon Lennon had said on behalf of "The Beatles" that
The Beatles is more freshener and famus than Cris ...

The Christian fanatics got so much mental stress that they had cremated the album of The Bittels in many Western countries ...

This was followed by John Lelan later American President Nixon .....

Lennon and his wife Yuko launched an antiwar movement around the world ....

This was the period when the Nixon government was entangled in Vietnam and
there were candle marches against that government across the country.

Various violent non-violent processions were being removed ....

John Lennon said 'War is Over If you want'
This poster in the whole world ....

The American government started scared, it lobbied against Lennon
Where were Lennon supposedly
They fight against the Bhatnam war
Left his hair long and named its Hair Peace
He went to Manchastar to accompany with his wife, Yuko, to honeymoon. He gave a special interview with  wife on the bed and they named​ it bed peace.

The American government wanted to implicate Lennen in the matter of visa but they failed
Lennon eventually won.

John Lennon gives world
2 best songs.....
"Give Peace a Chance" (1969)
And
Imagine

In the decade of seventies, the eternal anthom was made of the untainted murmant.
And song 'imagine', however, we will called it an international anthology​ that's not be wrong ...

After all, once again the violence and the ego lost.....

In 1973, in view of the increasing unrest in the country, Nixon had to resign.

John Lenin considered Mahatma Gandhi as his ideal and did not even believe in him, he had done what Gandhi said in his life ....

But we always seen that
Peace kills the people who talk about it ....
Gandhi was shot in 1948

Years later, in 1980, a Gandhilover gandhian was shot in the same way ....

He was just trying to teach love to the world ....
But maybe the world does not like love ...

मंगलवार, 27 जून 2017

जन्मदिवस विशेष आर डी बर्मन

'सा, रे, गा, मा, पा,धा,नी'

ये "पा" सनातनीओँ का पंचम तान है ।

हमारा सुबह का शुरवात इसी
पंचम तान से होता हे
जब काक पक्षी
'का' 'का' कर के हमेँ निँद से जगाता है ।

_ _

लेकिन सोचो
मैँ आज ये सब क्युँ बता रहा हुँ
च्युँकि आज है
म्युजिक मैस्त्रो पंचम दा
Rahul Dev Burman जी
का Birth Day

संगीतकार
सचीन देव बर्मन ने  देखा जब जब उनका बेटा रोता है
पंचम तान मे रोता है
इसलिए आर डी बर्मन जी का नाम पंचम पड़ा !

कुछ लोगोँ के हिसाब से
R.D Burman के बालपन मे एकबार सचीन दा के घर
दादामुनी अशोक कुमार गये हुए
थे
अशोक दा ने देखा
आर डी बर्मन वहाँ  पा पा पा
कर रहे थे

और इसलिए अशोक दा ने उनका निक् नेम पंचम रखा ।

पंचम दा जब 13 के थे
एक बार
लताजी उनके यहाँ आई हुई थी

पंचम दा ने जैसे ही जाना वह लताजी है
दौडे अटोग्राफ के लिए

पंचम दा ने लताजी से कहा
क्या आप मुझे अपना अटोग्राफ देगी ?

लताजी ने तब पंचम को जो आशिर्वाद दिया
आगे चल के वे इत्ते बड़े  कंपोजर बने
आज दुनिया जानता है ।

ऐसे
बहुत कम मिशालेँ है
कि बाप भी ग्रेट , बेटा भी ग्रेट
हो

राहुल देव बर्मन दुनिया के ऐसे अकेले इकलौते कंपोजर है
जिनके कंपोजिसन मे
उनके पिता यानी सचीन देव बर्मन ने एक गाना गाया था !

युँ तो
Bollywood मे कंपोजर अनेकोँ हुए है
लेकिन उनके तरह म्युजिकाल एक्सपेरिमेँट
करनेवाला न हुआ न है ।
ये ग्रामी आवार्डवालोँ कि बद् किस्मती है कि
उन्होने R.D Burman के प्रतिभा को नजर अंदाज करदिया !

"मेरे सामने वाले खिडकी मेँ"
से
"एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा" तक
उनके ज्यादातर गानेँ
आज भी उतनी ही लोकप्रिय जितने कल थे ।
R.D बर्मन साब को कभी National Award नहीँ मिला !
हाँ उनके वजह से कईओँ को जरुर मिला !

अमरप्रेम जैसे कई फिल्मोँ मे बहतरीन म्युजिक दे चुके
R.D बर्मन को
12 नोमिनेसन के बाद
सनम तेरी कसम के लिए
फिल्म फेयर आवार्ड मिला था

इसे सफलता प्रधान समाज का विफलता ही कहा जाएगा....

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

मार्गारेट थार्चर

अपने सोच सम्भालो वो लव्स बनजाएगें......
अपने लव्सों को सम्भालो वो कर्म बनजाएगें......
अपने कर्मों को सम्भालो वो आदत बनजाएगी.....
आदतें सम्भालो वो तुम्हारा चरित्र बनजाएगा......
और चरित्र को सम्भालो क्युँकि ये तुम्हारी तकदीर बनजाएगी.........
हम जो अर्न्तमन से सोचते है बनजाते है.......

●मार्गारेट थ्राचर●

1982 में लातिन अमरिकी
देश अर्जेण्टीना ने #folkland पर अपना कब्जा करलिया....यह प्राय 200 द्वीपों से बना एक ब्रितानी क्षेत्र है । इसके अधिकार को लेकरके ब्रिटेन के साथ आर्जैटिंना का 150 साल से विवाद चल रहा था । दक्षिणी आटलांटिक folkland द्वीप समुहों से ग्रेटब्रिटेन 12000 किलोमिटर दूर है जबकी आर्जेटिंना सिर्फ 500 किमी .....उनदिनों मार्गारेट थार्चर ब्रिटेन कि प्राधानमन्त्री थी .....एक व्यापारी लडकी मार्गेरेट ने युद्ध का राह चुना और आर्जेटिंना अन्ततः हारकर आइलेंड छोडगया ......

मोदी व मार्गेरेट में 2 समानताएँ है

दोनो ही ऐसे ही वक्त पर PM बने जब देश कमजोर हो रहा था....

दोनों ही व्यापारी खानदान से विलोगं करते है
एक दुकानदार कि लडकी
दुजे चायवाला का लडका......

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

~वाघा जतिन कि बलिदान~

बंगाल ,कुष्टिया जिल्ला के वाघा जतीन ने हसपताल मे स्वयं अपना बलीदान
दे दिया था अंग्रेज के हातोँ पकड़े जाने पर भी
अंग्रेज नहीँ दे पाए उन्हे यातनाएँ
या फाँसी !!
वालेश्वर जिल्ला चषाखंड गाँव मे
युवकोँ का एक टोली अंग्रेजी फौज के उस ओर के रस्तोँ से गुजरने के इंतेजार मे था
कुछ घँटो
बाद
अंग्रेज आए
तो गुफा मे छिपे
युवकोँ ने
बंदे मातरम कि गुंज के साथ उनपै टुट पड़े और अंधाधुन गोलीवारी कर दी
पहले पहल अंग्रेज तितर वितर हो गये
लेकिन जतिन और उनके साथीओँ के पास सीमित
गोली थी
धीरे धीरे इनकी गोली खत्म हो रही थी वहीँ अंग्रेज सैनिकोँ ने भी काउँटर आटाक् शुरुकरदिया ।
और फिर
कुछ मिनट तक गोलीवारी के बाद
एक गोली चित्तप्रिय को लगा
वो गिर पड़ा
वहीँ विरेन्द्र , जौतिष तथा 2 अन्य युवक घायल हुए ।
जतिन्द्र यानी बाघा जतिन
के कंधो पर गोली लगी
दायेँ हाथ मे गोली लगी
एक गोली से बचने के चक्कर मे वो उछले
चट्टान मे टक्कर के वजह से उनके माथे मे से खुन निकलने लगा
फिर भी वो गोली दागे या रहे थे
दागे या रहे थे
अन्ततः ये वीर युवक चारोँ तरफ से घेर लिए गये
एस पि रेगार्ट ने उन्हे धरलिया
वालेश्वर हसपताल मे बाघाजतिन घटोँ वेहोश पड़े रहे
उनके कंधा हात से गोली निकाल लिया गया था
कई जगह क्षताक्त हुए थे
उनपै पट्टी बाधां गया था
बाघा जतिन को होश आया
वो सब समझ गये
उन्होने अट्टहास किया
और सारी पट्टिआँ खोल दी
वो हँसते रहे
उधर उनके अंगो से खुन बहता गया बहता गया
और इस तरह
कभी बचपन मे जंगल मे वाघ को चित् करदेनेवाले
यतिन्द्र नाथ ने स्वयं कि बलिदान देकर के अंग्रेजोँ के जीत को हार मे बदल दिया था !
(अब अंग्रेज उनको ठिक होने के बाद फाँसी ही देनेवाली थी लेकिन स्वाभिमानी यतिन्द्र नाथ को ये मंजुर न था)

सोमवार, 4 जुलाई 2016

पंचम RD Berman

'सा, रे, गा, मा, पा,धा,नी'
ये "पा" सनातनीओँ का पंचम तान है ।

हमारा सुबह का शुरवात इसी
पंचम तान से होता हे
जब काक पक्षी
'का' 'का' कर के हमेँ निँद से जगाता है ।
_ _
लेकिन सोचो
मैँ आज ये सब क्युँ बता रहा हुँ

च्युँकि आज है
म्युजिक मैस्त्रो पंचम दा
Rahul Dev Burman जी
का Birth Day
संगीतकार

सचीन देव बर्मन ने देखा जब जब उनका बेटा रोता है
पंचम तान मे रोता है
इसलिए आर डी बर्मन जी का नाम पंचम पड़ा !

कुछ लोगोँ के हिसाब से
R.D Burman के बालपन मे एकबार सचीन दा के घर
दादामुनी अशोक कुमार गये हुए
थे
अशोक दा ने देखा
आर डी बर्मन वहाँ पा पा पा
कर रहे थे
और इसलिए अशोक दा ने उनका निक् नेम पंचम रखा ।


पंचम दा जब 13 के थे
एक बार
लताजी उनके यहाँ आई हुई थी
पंचम दा ने जैसे ही जाना वह लताजी है
दौडे अटोग्राफ के लिए
पंचम दा ने लताजी से कहा
क्या आप मुझे अपना अटोग्राफ देगी ?
लताजी ने तब पंचम को जो आशिर्वाद दिया
आगे चल के वे इत्ते बड़े कंपोजर बने
आज दुनिया जानता है ।
ऐसे
बहुत कम मिशालेँ है
कि बाप भी ग्रेट , बेटा भी ग्रेट
हो
राहुल देव बर्मन दुनिया के ऐसे अकेले इकलौते कंपोजर है
जिनके कंपोजिसन मे
उनके पिता यानी सचीन देव बर्मन ने एक गाना गाया था !
युँ तो
Bollywood मे कंपोजर अनेकोँ हुए है
लेकिन उनके तरह म्युजिकाल एक्सपेरिमेँट
करनेवाला न हुआ न है ।
ये ग्रामी आवार्डवालोँ कि बद् किस्मती है कि
उन्होने R.D Burman के प्रतिभा को नजर अंदाज करदिया !
"मेरे सामने वाले खिडकी मेँ"
से
"एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा" तक
उनके ज्यादातर गानेँ
आज भी उतनी ही लोकप्रिय जितने कल थे ।

बंगाल कि रानी रासमणी


कोलकत्ता के प्रशिद्ध दक्षिणेश्वर काली मंदिर से आप सभी परिचित होगेँ
लेकिन क्या आप जानते
है ......
इसकी प्रतिष्ठात्री एक नारी थी ।
स्वर्गीया रानी रासमणी माडे
ने यह मंदिर बनवाया था !
अति दरिद्र कैवर्त परवार मे इनका जन्म हुआ
ये अपनी युवाकाल मे परम रुपवती थीँ !
कोलकत्ता के ही एक अमीर युवक रामचंद्र माडे का
दिल इन पर आ गया !
दोनोँ ने
उस समय कि कट्टरवादी समाज से लड़ झगड़ के व्याह रचाया
कुछ काल तक उनका
दाम्पत्य जीवन सुखमय रहा
लेकिन 1836 साल मे रामचंद्र जी इन्हे और दुनिया को छोड़ गए ।
साधारण स्त्री होती तो इतने सारे विपत्तिओँ के आगे दाम तोड़ देती
लेकिन विचक्षण बुद्धि
संपन्न रासमणी खुद झुकी
न किसी को झुकने दिया !
बाल्यकाल गरीबी मे बिता था
इसलिये इन्हे गरीबोँ का दुःख दर्द का एहसास था
अतः धर्मपरायणा तेजस्वनी
गरीबोँ के उपकार व्रत मे दीक्षिता हो गई !
कुछ वर्षोँ मे देवी रासमणी माडे कोलकत्ता सहर मे इतनी प्रसिद्ध
हो गई कि
साधारण जनता उन्हे रानी माँ
पुकारने लगे ।
राजपरिवार कि न होकर भी
इनकी परोपकारिता दानशीलता
से प्रभावित हो
लोग
उनको रानी उपाधी
प्रदान किए थे !
परवर्त्तीकाल मे अनेकानेक लोगोँ को ख्रिस्तियन होते देख
रानी रासमणी माडे ने हिन्दु धर्म परम हित साधनार्थे
कई छोटे बड़े मंदिरो का निर्माण करवाया
जिसमे दक्षिणेश्वर काली मंदिर अन्यतम है ।
ध्यान रहे यह वही मंदिर है
जहाँ श्री रामकृष्ण परमहंस जी
पूजक होने के साथ साथ उद्योगी
बालकोँ को सनातन धर्म के विषय मे शिक्षा भी देते थे !
आगे चलकर इन्ही श्रीरामकृष्ण परमहंस जी के पाद पद्म मे ज्ञान आहरण कर
बिबेकानन्द विश्व प्रसिद्ध हुए !

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

वीरा मंगेइ वेलनचेअर

दक्षिण भारत मे जन्मे स्वतंत्रता सेनानीओँ मेँ वीरा मंगाई भेलुनाचैयार‪ Veera_Mangai_Velunachiyar ‬देवी का नाम आदर सहित लिया जाता है !

18वी सदी मे इस नारी नेत्री ने अंग्रेजोँ के खिलाफ विद्रोह किया था !

1730 AD मे उनका जन्म रमनांड [Ramnad] राज्य मे हुआ था ।
उनके पिता थे महाराजा मन्नार सेल्लामुथ्थु सेथ्थुपाथ्थी व माता रानी सकन्दिमुथ्थाल !

च्युँकि राज दंपति कि वो इकल्लौति कन्या थी राजघराने द्वारा उन्हे नमनाँड क्षेत्र का युवराज्ञी अभिषिक्त किया गया ।

भल्लारी युद्ध कला मे निपुण राजकन्या को तीरदांजी घोड़ सबारी के साथ साथ विदेशी भाषाओँ का भी ज्ञान था ।
युवाकाल मे उनका विवाह Sivagangai Mannar Muthuvaduganathar के साथ करदिया गया ।

इसबीच जैसे तैसे उनका जीवन सुखमय बीत रहा था ।
1772 मे उनके राज्य पर अँग्रेज आक्रमण हुआ । L.t Col. Bon jour के सेनापतित्व मे अंग्रेजोँ ने Kalaiyar koil war छेड़ दिया ।

इस युद्ध मे उनके पति Raja Muthu Vaduganathar व कन्या राजकुमारी Gowri Nachiyarवीरगति को प्राप्त हुए ।

यह युद्ध कलैयार कोली राजप्रासाद सन्निकट हुआ था । .

इस लढ़ाई मे रानी सुरक्षित बच निकली वहीँ उनके दोनोँ भाई लहुलुहान हुए ।

राजघराने के बचे सदस्योँ ने कसम खाया कि वो अंग्रेजोँ को उचित शिक्षा देने के साथ साथ अपने राज्य पर पुनः प्रभुत्वस्थापित करेगे ।

रानी को उनके विश्वासी भरोसेमंद महामंत्री Dalavay Thandavaraya Pillai जी ने सुरक्षा दृष्टि से वो स्थान छोड़ ने

को
वहीँ महामंत्री ने Sultan Hyder Ali से रानी Velu Nachiyar कि सुरक्षा हेतु 5000 सैन माँगा था हैदर अली ने सहायता तो भेजदिया परंतु वे उनके साथ मिलकर अंग्रेजोँ के फिलाफ लढ़नहीँ पाए बुढ़ापे के कारण सुलतान हैदर अली चल वसे ।
हालाँकि बाद मे रानी को हैदर अली के पुत्र द्वारा हरसंभव सहायता मिला ।

हैदर अली ने पहले ही Syed Karki को Dindigul fort मेँ रानी कि मदद के लिये भेजदिया था । हैदर अलि के पुत्र व मराथु भाईओँ के मदद से रानी ने Sivaganga प्रदेश पर हमला कर दिया । अंग्रेजोँ द्वारा गद्दि पर बिठाये गये अरकट के नवाव रानी भेलु से हार गये और अपने राज्य को पुनः प्राप्त करने के वजह से रानी को Sivagangai seemai की उपाधी मिली ! रानी. Velu Nachiyar प्रथम भारतीय शासिका थी जिन्होने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह किया था और उन्हे जीत भी मिली थी !

Prof.Sanjeevi जी ने अपने ऐतिहासिक किताब Maruthiruvar’ मे लिखा हैरानी Velu Nachiyar ने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ रानी लक्ष्मीवाई से 85 वर्ष पूर्व जंग लढ़ी थी और उन्हे इसमे अभुत पूर्व सफलता भी हासिल हुआ था । वहीँ इतिहासकार Venkatam नेँ रानी Velu Nachiyar कि प्रंशसा करते हुए उन्हे भारत कि Joan of Arc. तक कहा है ।

ऐसे वीरागंनाओँ को मेरा सत् सत् नमन.....

जय माँ भारती
एक भारत समृद्ध भारत

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

दास्तान ए रघुनाथ दास

ओड़िशा मेँ एक कवि हुए है श्री रघुनाथ दास जी ! ये बड़े मजाकिआ शख्सियत वाले व्यक्ति मानेजाते है ।
1938 के दिनो मे रेवेन्सा कलेजिएट स्कुल मेँ पढ़ते समय
कवि महोदय अपने कौतकप्रिय कारनामोँ के लिये पुरे छात्रावास मेँ फैमस हो गये थे ।
उनका एक सहपाठी हुआ करता था सोमनाथ ! उसका नया नया रेवेन्सा मेँ दाखिला हुआ ! उस विचारे कि बकरी टाईप दाढ़ी थी इसलिये उन्हे छात्रावास मेँ बकरीमानव उपनाम दिया गया ! चंद दिनोँ मे ये उपनाम बदलकर सोमु बकरी हो गया ।
छात्रोँ के चिढ़ाने से सोमनाथ काफी परेशान हो गया था । राहुल गांधी कि भाँति रोज नये नये उपनाम बनाया जा रहा था । अब तो सोमनाथ बकरी नाम से ही चिढ़ने लगा था ।
अंततः उसे पताचला कि इन सबके पिछे रघुनाथ दास का दिमाग है ।
एक दिन रघुनाथ से हार कर उनसे संद्धि के लिये विवश हुए सोमनाथ बाबु ।
मध्यस्त बने वृन्दावन आचार्य मृत्युजंय पण्डा व अन्य साथी ।
तय हुआ सोमनाथ पुरे छात्रवास को उनके मनमाफिक रसगुला खिलाएगा बदले मेँ छात्रवास के छात्र उसे बकरी कहकर चिढ़ाना बंद करेगेँ ।
अब रसगोला खा के छात्रावास के लोँडे वापस लौट रहे थे संयोगवश तभी एक बकरी छात्रावास कि दिवार चढ़ने कि कोशिश करती पायी गयी ।
रघुनाथ को मजाक सुझा
वे सोमनाथ को बकरी दिखा कर कहने लगे
देखो सोमु मैँ वचनवद्ध हुँ अतः बकरी नहीँ कहुगाँ
अफ इस दाढ़ीवाले जीव को तुम वाघ समझो
इस बात से पुरा छात्रावास ठहाका मारकर हँसने लगा
इस बात से सोमनाथ फिर चिढ़गया !
वर्षोँ वाद रघुनाथ व सोमनाथ वकालत करने लगे । एक केस मे उनका आमना सामना हुआ ।
रघुनाथ का आदमी निर्दोष था वहीँ सोमनाथ सरकारी वकील ।
केस मे सोमनाथ का पलड़ा भारी था ।
किन्तु रघुनाथ भी कम चालाक नहीँ थे उन्हे सोमनाथ कि बकरीवाली कमजोरी याद थीँ ।
उन्होने साक्ष को कहा जब सरकारी वकील पुछेगा ‘ कहाँ गया था ’ कहना ‘गरीब आदमी हुँ साव, बकरी चराने गया था ।’ । कोर्ट मेँ सोमनाथ ने साक्ष से पुछताछ कि तो उसने बकरी चराने जाने कि बात कह दी !
बकरी का नाम सुनते ही सोमनाथ आग वबुला हो गये
और साक्ष को देने लगे गाली !
वेचारा जर्ज भी हैरान आखिर ये माजरा क्या है ।
सिर्फ क्रोध के कारण जीता हुआ केस हारना पड़ा था सोमनाथ को । क्रोध व आवेश मेँ आकर वे सटिक तर्क नहीँ कर सके और रघुनाथ जी से केस हार गये थे ।
रघुनाथजी ने अपने जीवनकाल मे वकालात करने के अलावा कई सर्ट स्टोरी ,कविता व प्रबन्ध लिखे है और मुझे उनके द्वारा लिखागया August pandara
दिर्घ कविता तथा Kaha re gacha kahinki malu सर्ट स्टोरी पसंद है ।
कम्युनिष्ट विचारधारावाले इस कवि ने हर मतवाद का समर्थन किया व भागलिया वे भूदान आन्दोलन
तथा छात्र जीवन मे स्वतंत्रता संग्राम से भी जुडे थे ।

दक्षिण भारतीय वीरा जिसने अंग्रेजो मुँह कि खाने को मजबुर करदिया था....

दक्षिण भारत मे जन्मे स्वतंत्रता सेनानीओँ मेँ वीरा मंगाई भेलुनाचैयार ‪ Veera_Mangai_Ve lunachiyar ‬देवी का नाम आदर सहित लिया जाता है ! 18वी सदी मे इस नारी नेत्री ने अंग्रेजोँ के खिलाफ विद्रोह किया था !
1730 AD मे उनका जन्म रमनांड [Ramnad] राज्य मे हुआ था । उनके पिता थे महाराजा मन्नार सेल्लामुथ्थु सेथ्थुपाथ्थी व माता रानी सकन्दिमुथ्थाल ! च्युँकि राज दंपति कि वो इकल्लौति कन्या थी राजघराने द्वारा उन्हे नमनाँड क्षेत्र का युवराज्ञी अभिषिक्त किया गया । भल्लारी युद्ध कला मे निपुण राजकन्या को तीरदांजी घोड़ सबारी के साथ साथ विदेशी भाषाओँ का भी ज्ञान था । युवाकाल मे उनका विवाह Sivagangai Mannar Muthuvaduganathar के साथ करदिया गया । इसबीच जैसे तैसे उनका जीवन सुखमय बीत रहा था । 1772 मे उनके राज्य पर अँग्रेज आक्रमण हुआ । L.t Col. Bon jour के सेनापतित्व मे अंग्रेजोँ ने Kalaiyar koil war छेड़ दिया । इस युद्ध मे उनके पति Raja Muthu Vaduganathar व कन्या राजकुमारी Gowri Nachiyar वीरगति को प्राप्त हुए । यह युद्ध कलैयार कोली राजप्रासाद सन्निकट हुआ था । . इस लढ़ाई मे रानी सुरक्षित बच निकली वहीँ उनके दोनोँ भाई लहुलुहान हुए । राजघराने के बचे सदस्योँ ने कसम खाया कि वो अंग्रेजोँ को उचित शिक्षा देने के साथ साथ अपने राज्य पर पुनः प्रभुत्व स्थापित करेगे । रानी को उनके विश्वासी भरोसेमंद महामंत्री Dalavay Thandavaraya Pillai जी ने सुरक्षा दृष्टि से वो स्थान छोड़ ने को . वहीँ महामंत्री ने Sultan Hyder Ali से रानी Velu Nachiyar कि सुरक्षा हेतु 5000 सैन माँगा था हैदर अली ने सहायता तो भेजदिया परंतु वे उनके साथ मिलकर अंग्रेजोँ के फिलाफ लढ़नहीँ पाए बुढ़ापे के कारण सुलतान हैदर अली चल वसे । हालाँकि बाद मे रानी को हैदर अली के पुत्र द्वारा हरसंभव सहायता मिला । हैदर अली ने पहले ही Syed Karki को Dindigul fort मेँ रानी कि मदद के लिये भेजदिया था । हैदर अलि के पुत्र व मराथु भाईओँ के मदद से रानी ने Sivaganga प्रदेश पर हमला कर दिया । अंग्रेजोँ द्वारा गद्दि पर बिठाये गये अरकट के नवाव रानी भेलु से हार गये और अपने राज्य को पुनः प्राप्त करने के वजह से रानी को Sivagangai seemai की उपाधी मिली ! रानी. Velu Nachiyar प्रथम भारतीय शासिका थी जिन्होने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह किया था और उन्हे जीत भी मिली थी ! Prof.Sanjeevi जी ने अपने ऐतिहासिक किताब Maruthiruvar’ मे लिखा है
रानी Velu Nachiyar ने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ रानी लक्ष्मीवाई से 85 वर्ष पूर्व जंग लढ़ी थी और उन्हे इसमे अभुत पूर्व सफलता भी हासिल हुआ था । वहीँ इतिहासकार Venkatam नेँ रानी Velu Nachiyar कि प्रंशसा करते हुए उन्हे भारत कि Joan of Arc. तक कहा है ।
ऐसे वीरागंनाओँ को मेरा सत् सत् नमन.....
जय माँ भारती
एक भारत समृद्ध भारत

ओड़िशा के दशरथ

‪विहार‬के ‪ दशरथ_माँझी‬ने कड़ी महनत और लगन के बलपर उनके गाँव सन्निकट पर्वत खोद कर रस्ता निकाल दिया था...
मिलिये ‪ ओड़िशा‬के ‪ दशरथ_पट्टनायक‬जी से.....
‪ ओड़िशा_पाठागार_आ ंदोलन‬
के प्रवर्त्तक , प्रवाद पुरुष . प्रख्यात् संग्राहक व सारस्वत साधक श्री दशरथ पट्टनायक जी का जन्म ‪ नयागड़ ‬जिल्ला पर 1907 को एक साधारण परिवार मे हुआ था !
‪ओड़िआ‬लोग उन्हे प्यार से ‪ दाशिआ_अजा‬
[ओड़िआ शब्द अजा का अर्थ नानाजी है]
कह कर पुकारते है ।
वे ओड़िशा मे उनदिनोँ इतने प्रसिद्ध हुए कि उनके नामसे कहावत तक बन गया था !
"Dasa paisa ra raja dasiaa ajaa" [दश पैसे का राजा दाशिआ अजा या नानाजी]
वे सिर्फ 4थी कक्षा तक पढ़पाए थे । अंग्रेजीराज के समय उन्होने कई सरकारी नौकरी भी कि परंतु दशरथ नानाजी का मन नौकरी मेँ सन्तुष्ट न था !!
अन्ततः एक दिन वे सबकुछ छोड़छाड़कर अपने पाहाड़ी अनुर्वर गाँव लौट आये और खेतिबाड़ी आदि करते हुए साधारण किसान का जीवन बिताने लगे ।
उनदिनोँ दशरथ नानाजी को दोपहर मेँ किताबेँ पढ़ने शौक चढ़ा था ! इसी
किताब पढ़ने कि शौक से जन्म हुआ‪ पुस्तक_भिक्षा‬का ओड़िशा यात्रा !
अर्धवस्त्रधारी रुप ,एक आँख खो चुके ,हाथ मेँ लाठी कन्धे पे झोला और आँखो मेँ सपने लिये
ओड़िशा के गाँव देहात सहर नगर का भ्रमण करते हुए नये पुरातन पुस्तक संग्रह करना उनका अब जीवन व्रत बनगया था । वे
जीवन के अवसर समय मेँ सारस्वत साधक बनगये थे ऐसा आजतक बहुत कम लोग करपाए है ।
रोज बड़े बड़े कवि लेखकोँ चिट्ठी पत्री लिखके उन्हे ‪ पुस्तक संग्रह_आंदोलन ‬मे सामिल करने मे सफल हो पाए थे दशरथ नानाजी ।
उन्ही के प्रयाश से उदयपुर ,नयागड़ मे जातीय पाठागार ,संग्रहालय ,साहित्य संसद तथा गवेषणाकेन्द्र कि स्थापना हुई थी ।
उदयपुर स्थित जातीय पाठागार मे इस समय 1 लाख से अधिक नये पुरातन पुस्तकोँ के साथ साथ 42 विभागोँ मे शताधिक ताड़पत्र पोथी आदि संग्रृहित है ।
जाते जाते वे "दीपक ट्रष्ट" कि स्थापना कर 1997 मे दुनिया छोड़ गये थे ।
बर्तमान नयागड़ जिल्लापाल दशरथ नाना के सुयोग्य नाती इस ट्रष्ट के अध्यक्ष है । पुस्तक संग्रह इस ट्रष्ट का परम उद्देश्य है । —

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

भूपेन्द्र सिँह एक परिचय

भूपेन्द्र सिँह का जन्म 4 फरवरी 1940 को अमृतसर मेँ हुआ था उनके पिता अम्रृतसर मेँ म्युजिक के प्रोफेसर थे तो छोटी सी उर्म मे ही वे अपने पिता के साथ आ गये दिल्ली ! जाहिर है उन्हे संगीत कि तालिम पिता द्वारा प्राप्त हुआ । दिल्ली मेँ पढ़ाई खत्म करके वे अल इंडिया रेड़िओ से जुड़े और वतौर म्युजिसन और सिँगर काम करने लगे ।
अल इंडिया रेड़िओ ने वाहदुर शाह जाफर पर जब एक कार्यक्रम बनाया उसमेँ भूपेन्द्र सिँह ने वहादुर शाह जफर कि एक गजल रेकोर्ड कि जो दिल्ली वालोँ ने खुब पसंद किया । ये गज़ल थी

"लगता नहीँ है दिल मेरा उजड़े दयार मेँ" !

उन्ही दिनोँ रेडिओ प्रड्युसर सतीश भाटिया के पार्टी मेँ भूपेन्द्र जी और उनके हुनर से मदन मोहन रुबरु हुए ।
इससे भूपेन्द्रजी को फिल्म हकीकत मेँ मदनमोहन ने पहला ब्रेक दिया ।
इस फिल्म मेँ महम्मद रफी ,तलत् महम्मुद और मन्ना डे के साथ उन्होने अपना पहला गीत रेकोर्ड किया । ये गीत था

"हो के मजबुर उसने मुझे भुलाया होगा ज़हर चुपके से दवा जानके खाया होगा"

इत्तेफाक से ये गाना उन्ही पर फिल्माया गया था ।

"ऋत जबाँ जबाँ

इसके बाद भूपेन्द्र सिँह आरडी बर्मन के साथ बतौर गिटारिस्ट जुड़े !

दम मारो दम गाने मेँ बजे गिटार
उन्ही के द्वारा बजाया गया था ।

इसके बाद तो उन्होने अन्य म्युजिसन के साथ भी काम किया । आरडी बर्मन के साथ दोस्ती के कारण उन्हे
फिल्म "परिचय" मेँ
लता जी के साथ
डुएट गाने का मौका मिला । गीत के वोल थे
"बीते न बिताये रैना"

भूपेन्द्र को पहला सोलो संग गाने का मौका खैयाम ने दिया था ।
फिल्म थी आखरी खत
ओर गीत था
"ऋत ऋत जबाँ जबाँ रात महरबाँ"

भुपेन्द्र सिँह जी द्वारा गाये गये ज्यादातर यादगार गीत गुलज़ार के कलम से निकले है जैसे

दिल ढ़ुँढ़ता है फुरसत के रात दिन

नाम गुम् जायेगा चेहरा ये याद आयेगा ,

एक अकेला इस सहर मेँ

कभी किसी को मुक्कमल जाहाँ नहीँ मिलता" आदि ।

मिड 80के दशक मेँ भूपेन्द्र ने बंगाली सिँगर मिताली मुखर्जी से शादी कर ली और इन दिनोँ
वे साथ साथ स्टेज सो करते व आलबम् निकालते है ।
भूपेन्द्र जी की लम्बी उम्र कि कामना करते है






बुधवार, 29 जुलाई 2015

बामण्डा राजा सार् वासुदेव सुढ़लदेव एक संक्षिप्त परिचय प्रथम भाग

ये बर्तमान सम्बलपुर जिल्ला की बामण्डा क्षेत्र मेँ बासुदेवपुर गाँव कि बात है ।
1890 अंग्रेजी साल मेँ 80 वर्ष का एक बृद्ध ,
कन्या पक्ष को 250 रु की लालच देकर के अपना व्याह रचाने जा रहा था ।
जिस कन्या के साथ वो शादी करनेवाला था उसका उम्र केवल मात्र 8 वर्ष था ।
किसी तरह ये बात बामण्डा राजा सार् वासुदेव सुढ़लदेव जी को पताचला ।
वे तुरंत वहाँ पहँचे और उस शादी पर रोक लगाया । यहाँतक कि उस बृद्ध व्यक्ति द्वारा उत्कोच दियेगये धन को कन्यापक्ष को देते हुए
बृद्ध व्यक्ति पर व्यग्यं के बाण चलाते हुए बामण्डा राजा ने कहा

"ये अपने बृद्धावस्ता मेँ शादी का यह मुकुट पहनकर क्या आप निकट भविष्य मेँ आनेवाली उस भयंकर मृत्यु को टाल जायेगेँ ? आप तो महायात्रा के यात्री है फिर ये क्षणीक मोह मेँ भला क्युँ घिरगये ???"
बृद्ध ये सुनकर निर्वाक हो गये लज्जित हो गये ! फिर
1893 मेँ बामण्डा (Sambalpur) राजा सार् बासुदेव सुढ़लदेव जी ने
अपने राज्य मेँ बृद्ध विवाह प्रथा निषिध कि थी !
1903 मेँ एक विज्ञप्ति के जरीये कन्या का सर्वनिम्न 12 वर्ष व वर का 14/15 वर्ष वाली कानुनी घोषणा किया गया था ।

अपने #चिलिका खण्डकाव्य मेँ ओड़िआ कवि राधानाथ राय जी नेँ वासुदेव सुढ़लदेवजी कि प्रशंसा करते हुए लिखते है

"Pahilani ghora taamsi jaamini
phutiba utkal bhasa kamalini
a ghora jamini abasaan sansi
kabyatara rupe bira
gangabansi
udile prathame
bamanda raajana
basudeb biswa kalyanbhajana "

वे एक परोपकारी राजा तथा ओड़िआ भाषा को अन्धकार से उजाले कि और ले जानेवाले प्रभावशाली कवि थे !
उन्होने हीँ परवर्ती साहित्य साधकोँ के लिये सारस्वत साधना हेतु प्रेरित किया था ।
नशीले द्रव्योँ पर उन्होने संबलपुर क्षेत्रमेँ निषेधाज्ञा लगया था । कम्भु खाँ नामसे एक कनेष्टस ने राज आदेश अवज्ञा की तो कार्य से निलम्बित किया गया तथा उसके खिलाफ संबलपुर हितैषिणी मेँ खास लेख छपाया गया था ।
ये संबादपत्र को कुछ आलोचक राजा जी का मानस पुत्र बताते है समाज को चीरजाग्रत करना था इसका परमोद्देश्य ।
सतीदाह प्रथा , कुलिप्रथा या दासत्वप्रथा , छृआँछुँत व जातपात जैसे सामाजिक व्याधी उन्मुलन के लिये बामण्डा राजा ने प्रयत्न किया था ।
उन दिनोँ दासत्वप्रथा के चपेट मेँ फाँसकर लोगोँ को सुदूर आसाम भेजदियाजाता था । सुढ़ळदेव वासुदेव जी ने पल्टिकाल एजेँटोँ से दासत्व प्रथा बंद कराने के लिये मजबुर करदिया ।
ख्रीस्तियन धर्मप्रचारक P.E. Heberlet का हिन्दुधर्म के प्रति भ्रान्त धारणाओँ का तिव्र समालोचना व खण्डन करते हुए उनकी सोच बदलने मेँ कामियाब हुए थे । उनदिनोँ उत्कल दिपिका पत्रिका मेँ ये लेख अंग्रेजी व ओड़िआ मेँ छपा था ।
बाद मेँ हेवर्लेट ने क्षमा याचना कि तो राजा ने उन्हे माफ करदिया था ।
मरहट्ट व अंग्रेजी राज काल मे संबलपुर क्षेत्र ओड़िआ माषा कम हिन्दी भाषा पर ज्यादा निर्भर करने लगा ।
वासुदेव सुढ़लदेव जी के चैष्टा के वजह से संबलपुर प्रान्त मेँ आज कुछ लोगोँ छोड़दिया जाय तो अधिकाँश लोग ओड़िआ भाषा समझते है ।

1872 मेँ राजा ने बामण्डा मेँ पहला विद्यालय कि स्थापना की थी और 1894 तक यहाँ 13 विद्यालय खुलचुके थे ।
1895 संबलपुर मेँ हिन्दी के बदले ओड़िआ को राजभाषा का दर्जा मिला तब मध्य ओड़िशा मेँ हर राजकाज अंग्रेजी हिन्दी मे हो रहा था ।

व्यासकवि फकीर मोहन सेनापति जी ने वासुदेव सुढ़ल देव जी के प्रंशसा मेँ "Abasara baasare" काव्य मेँ लिखा है

Bhasa joge chinna chinna thila ae utkal
bandhila aekata sutre tume hin kebal
kalpalata sammilani utkal desha re
prathama re uptabija tumbha hrudaya re
tumhara patrika labhiachi
uchastana
tumbhe aeka karijaan kabi nku sammana !

[[भावार्थ]]

भाषा आधार पर खण्ड खण्ड था ये उत्कल
बांधा एकता के सुत्र मेँ तुमने हीँ केवल

कल्पलता सम्मिलनी उत्कल देशे मे
प्रथम अंकुरोद्गम हुआ तुमरे मन मेँ
तुम्हारी पत्रिका को मिला सबसे उँचास्थान
तुम्हे ही जानते हो कैसे होता है कविका सम्मान ।

सम्बलपुर हितैषिणी के सँपादक विद्यारत्न द्वारा गढ़ागया गंजाम सम्मिलनी आगे चलकर उत्कल सम्मिलनी नामधारण पूर्वक ओड़िआ भाषा संस्कार रक्षक बनकर उभरता है ।

क्रमशः.....














गुरुवार, 2 जुलाई 2015

उत्कल गौरव मधुसुदन दास संक्षिप्त परिचय

अंग्रेजी वर्ष 1933 फरवारी 12....,
सभागृह श्रोताओँ से भरापड़ा था ....
उन्होनो बोलना शुरुकिया

"मेँ जब आंदोलन करने के लिये उठखड़ा हुआ मैने इस रणभूमि मेँ खुदको अकेला पाया । मैने देखा चारोँतरफ लाशेँ हीँ लाशे थी । हड्डीओँ के ढ़ेर व उन मृत लाशोँ मेँ जान फुँकने के लिये मुझे काफी महनत करना पड़ा । जो भी हो मेरे जाति को लढ़ने के लिये युद्धास्त्र से सजाने हेतु मैने प्रयाश किया व करता रहुगाँ ।"
🌻~~~मधुसुदन दास~~~🌻
उत्कल गौरव उपनाम से विख्यात मधुसुदन दास ओड़िशा के प्रशिद्ध लोगोँ मे से एक है ।
कटक सहर मे जन्मे इस नेता का यह आखरी भाषण था

मधुबाबू का जन्म ओड़िशा के कटक जिला के सत्यभामापुर गांव में 28 अप्रैल 1848 को हुआ था। उनके पिता रघुनाथ दास चौधरी और माता पार्वती देवी थी । ओड़िआ लोग उन्हे प्यार से मधुवावु , उत्कल गौरव,मधुबारिष्टर भी कहते है ।
ओड़िशा मेँ वे इतने लोकप्रिय हुए कि उनके नाम पर लोगगीत व मुहावरे बनने लगे
जैसे
Kalia ghoda re chadhibi
madhubabu sange ladhibi"[[काला घोडा मे चढ़ुगाँ मधुबाबु संग लढ़ुगाँ]]

उन्होने ओड़िआ भाषा व संस्कृति को बचाने के लिये 1903 मे जब उत्कल सम्मिलनी स्थापना कि थी तब ओड़िशा ,बंगाल का एक डिवीजन मात्र था ।
तब ओड़िशा यानी अविभक्त कटक ,पुरी ,बालेश्वर जिल्ला क्षेत्र को समझा जाता था ।
1903 मे कांग्रेस छोड़ कर वे ओड़िआ आंदोलन में और सक्रिय हुए । मधुबाबु स्वाभिमान एवं आत्ममर्यादा को विशेष प्राधान्य देते थे । धीरे धीरे उनके जैसे ओर लोग इस संगठन से जुड़नेलगे । मधुबाबु ने अपने कविता ,लेख के बलपर लोगोँ को जगाने कि कोशिश कि
उनके द्वारा लिखागया UTHA UTHA AARE UTKAL SANTAAN UTHIBU TU AAO KETE DINE
आज भी प्रसिद्ध ओड़िआ कविताओँ मे से एक है ! !
उनकी महनत रंगलाया 1936 अप्रेल 1 को ओड़िशा भाषा आधार पर पहला राज्य बना ।


उनकी पढ़ाई गाँव कि पारंपरिक स्कुल से हुई थी । फिर वे कटक गये व अंग्रेजी विद्यालय मेँ नाम लिखाया । 1864 मे मधुसुदन जी ने अन्य चार सहपाठीओँ के साथ एण्ट्रान्स [द्वितीय श्रेणी]] मे पास हुए । इसे आजकल हाईस्कुल सार्टिफिकेट एगजाम् कहाजाता है । इसके बाद उन्हे पढ़ाई के लिये धन जुटाने हेतु बालेश्वर जिल्ला मेँ किरानी [कायस्त] नौकरी करना पड़ा था । कुछ पैसे बचाकर उच्चशिक्षा हेतु वे चांदवाली वंदरगाह देते हुए स्ट्रिम इंजन जलजाहज मेँ कलकत्ता सहर पहँचे ।
1870 मे वे B.A. परिक्षा मेँ पास हुए । कलकत्ता कि पढ़ाई खत्म करके वे लंदन लॉ पढ़ने गये । ग्राजुएट होनेपर वे भारत लौटे व कटक मेँ बतौर वकिल कैरियर कि शुरुवात कि !

उनके नाम कई कीर्तिमान है जैसे
वे
*प्रथम ओड़िआ B.A पास
*प्रथम ओड़िआ M.A पास
*प्रथम ओड़िआ वकिल
*प्रथम ओड़िआ उद्योगपति
*युरोप मे जानेवाले प्रथम ओड़िआ व्यक्ति
*प्रादेश भाइसराल सभा का
*प्रथम ओड़िआ सदस्य
*प्रथम ओड़िआ मन्त्री
*मन्त्रीत्व त्यागनेवाले प्रथम भारतीय नेता
*उत्कल सम्मिलनी का आद्य उद्घोषक
*ओड़िशा मेँ प्रथम वालिका विद्यालय का प्रतिष्ठाता
थे
*प्रथम ओड़िआ जुता कारखाना बनानेवाले

उनके जन्मतिथि 28 अप्रेल को ओड़िशा मेँ वकिल दिवस व स्वाभिमान दिवस के रुप मेँ मनाया जाता है ।



रविवार, 19 अप्रैल 2015

श्रीमाता उर्फ मिरा अलफासा

श्रीमाँ फ्रासंसी मूल की भारतीय आध्यात्मिक गुरु थी । हिँदु धर्म लेने से पहलेतक उनका नाम था मीरा अलफासा । उन्हे श्री अरविँद माता कहकर पुकारा करते थे इसलिये उनके दुसरे अनुयायी भी उन्हे श्रीमाँ कहने लगे । मार्च 29 1914 मेँ श्रीमाँ पण्डीचेरी स्थित आश्रम पर श्री अरविँद से मिली थीँ और उन्हे भारतीय गुरुकूल का माहौल अछा लगा था । प्रथम विश्वयुद्ध के समय उन्हे पण्डिचेरी छोड़कर जापान जाना पड़ा था । वहाँ उनसे विश्वकवि रविन्द्रनाथ टैगोर से मिले और उन्हे हिन्दुधर्म की सहजता का एहसास हुआ । 24 नवेम्बर 1926 मेँ मीरा आलफासा पण्डिचेरी लौट कर श्रीअरविँद की शिष्या बनीँ । श्रीमाँ के जीवन की आखरी 30वर्ष का अनुभव एक पुस्तक मेँ लिखा गया है इसका मूल अंग्रेजी नाम है The Agenda । श्री अरविन्द उन्हे दिव्य जननी का अवतार कहा करते थे । उन्हे ऐसे करने का जब कारण पुछागया तो उन्होनेँ इसपर The mother नाम से एक प्रबन्ध लिखा था ।
श्रीमा / मिरा अलफासा का बचपन पैरिस मेँ कटा था ।
1878 मेँ पैरिस मेँ मूल तर्किस् इहुदी पिता मरिस Maurice तथा इजिप्टियन माता माथिलडे के गोद मेँ उनका जन्म हुआ था । माटेओ (Matteo) उनका एक बड़ा भाई भी था । मिरा अलफासा के जन्म से पूर्व उनके पितामाता अपना देश छोड़ कर फ्रासँ चले आये थे । बचपन का आठसाल उन्होने 62 boulevard Haussmann नामक जगह पर बिताया था ।
अपने बाल्यकाल का अनुभव के बारे मेँ मिरा आलफासा नेँ एक किताब मेँ बताया है ।
5 वर्ष के उर्म मेँ वो खुदको दुसरे दुनिया से आयी समझती थीँ
और 13 वर्ष तक आते आते वो तन्त्रमंत्र आदी अदभुत विद्याओँ का अभ्यास करने लगीँ थी ।
14 वर्ष के उम्र मेँ उनका दाखिला एक कला केन्द्र मेँ हुआ ओर एक वर्ष वाद उन्होने एक रहस्यमय पुस्तक लिखा था The Path of Later On (Alfasa ୧୮୯୩). उसी वर्ष वो अपनी माता की साथ इटली गइ । 16 वर्ष की उम्र मेँ मिरा अलफासा नेँ Ecole des Beaux Arts नामका नाटक कंपनी मेँ काम किया । वहाँ उन्हे सभी "the Sphinx") बुलाया करते थे । 1987 मेँ मिरा आलफासा प्रशिद्ध इटालियन कुक् Gustave Moreau के छात्र हेनेरी मोरिसेट से विवाह बंधनोँ मेँ बंधगयी । विवाह पश्चात मिरा और हेनरी 15 Rue Lemersiar मेँ रहने लगे । इस बीच पैरिस कलाकेन्द्र मेँ उन्होने अपना योगदान दिया । युँ देखाजाय तो मिरा अलफासा वेनसेट नेँ 20वर्ष के अपने अपने प्रारम्भिक जीवन मेँ उछ्छतम शीखर पर पहचँगयी थीँ । कुछ दिन के अतंराल मेँ उनको स्वामी विवेकानंद का लिखा एक पुस्तक मिला । यहाँ से उनके मनमेँ भारतीय संस्कृति सभ्यता और धर्म को जानने की उस्छुकत्ता बढ़ा । 2 वर्षवाद उन्होने एक भारतीय और एक फ्राँसीसी को गीता पढ़ने के लिये प्रिरित किया । तब मिरा नेँ गीता का फ्रेँच अनुवाद ही पढ़ा था वो उतना उत्कृष्ट न था पर वो इसका मर्म और उद्देश्य समझगयी थीँ । 1898 मेँ वे आंड्रे नामक पूत्र का माता बनीँ ।
मिरा कहती है की 1904 मेँ एक कृष्णवर्ण एसिआई व्यक्ति का चहरा दिखा उन्होने उन्हे कृष्ण कहा । 1905 मेँ मिरा Max Théon नामक एक साधक से मिलीँ और दुसरीबार मिलने के लिये अपने पति मोरिसेट के साथ Tlemcen, Algeria स्थित उनके वासभवन मेँ गई थीँ । वहाँ उन्होने थिअन और उनकी पत्नी से आध्यात्मिक साधना आदि के वारे मेँ शिक्षा प्राप्त हुआ । आखिरकार 1908 मेँ उन्होने अपने पति मोरिसेट को तलाक दे दिया और नियमित आध्यात्मिक साधनाओँ मेँ रत हो गई ।
[[विकिपिडिया मेँ आज मेरे द्वारा आदित्य महार जी का मिरा अलफासा जी पर ओड़िआ लेख का हिन्दी अनुवाद का योगदान दिया गया ]]

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

एक अनुठे मुसलिम श्रीकृष्णभक्त मोहम्मद याकुब सनम साहब

भारत मेँ रहीम ,रसखान ,ताज बेगम और ओडिशा मेँ भक्तकवी सालवेग जैसे मुस्लिम श्रीकृष्ण भक्तोँ का जन्म हुआ । ऐसे हि एक और संत हुए हे जनाव मोहम्मद याकुब खाँ उर्फ सनम साहब ! आजमेरवासी सनम साहबने सन् 1920 ईँ. से लेकर सन 1944 ईँ. तक देशभरमेँ कृष्णभक्ति का प्रचार प्रसार किया तथा अंत मेँ सन् 1945 ईँ मेँ एक दिन अपने इष्टदेव भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाभूमि व्रजकी पावन मिट्टीमेँ अपना शरीर समर्पण कर दिया ! सनम साहबने संस्कृत ,हिँदी और उर्दु मेँ प्रकाशित कृष्णभक्ति साहित्य का गहन अध्ययन किया । इन भाषाओँ के अतिरिक्त वे फारसी के भी प्रकाण्ड विद्वान थे । उन्होँने कृष्णभक्ति सम्बन्धी लगभग 1200 पुस्तकेँ संगृहित कीँ तथा अजमेर मेँ श्रीकृष्ण लाइब्रेरी की स्थापना की । सनम साहबने बहुत कालतक व्रजभूमिमेँ रहकर श्रीकृष्णकी उपासना की । अपनी भक्ति के उद्देश्यसे वे कृष्णभक्त बने और तपस्वी गुरुके अन्वेषणमेँ लग गये । अन्तमेँ व्रजभूमिके संत श्रीसरसमाधुरी शरणजीको उन्होँने अपना गुरु बनालिया । गुरुजी के प्रेरणा से उन्होँने समुचे भारत मेँ श्रीकृष्ण भक्ति का प्रचार कि संकल्प लिया ! वे प्रभावशाली वक्ता तथा भावुक भक्त थे , अतः कुछ ही समय मेँ देशभर मेँ उनके प्रवचनोँकी धूम भच गयी । सनम साहबने अपने प्रवचनोँमेँ कहा था श्रीकृष्णके दो रुप हैँ निराकर और साकार । निराकर जो गोलोकधाम मेँ विराजमान है ,उसका तीन रुपसे अनुभव होता है -प्रेम,जीवन तथा अनन्द ! प्रेम ही जीवनविधान है ,जीवन ही सत्यता का आधार है और जीवनका मुख्य उद्देश्य आनन्द है । इस कारण ये तीनोँ ही श्रीकृष्णकी निराकार विभूतियाँ हैँ ,सृष्टिमात्रमेँ व्याप्त हैँ । एक सुशिक्षित मुसलमानको श्रीकृष्णभक्ति मेँ तल्लीन देखकर संकीर्णमना लोगोँ मेँ तहलका सा मचगया था । कुछने अजमेर पहुँचकर उन्हेँ समझा बुझाकर कृष्णभक्तिके पथसे डिगानेका भारी प्रयास किया ,किन्तु उनके तर्कोँके आगे वे वापस लौट जाते थे ।इसके पश्चात उन्हेँ जानसे मार डालनेकी बी धमकी दी गयी . काफिरतक कहागया ,किँन्तु सनम साहबने स्पष्ट कहदिया कि मेँ अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण की भक्ति के लिये पैदा हुआ हुँ ,जिसदिन उन्हे , मुझे अपने लोकमेँ बुलाना होगा , मेँ पहुँचा दिया जाऊँगा । अजमेरमेँ उनपर आक्रमणका प्रयास भी किया गया । इसपर उन्होँने प्रतिक्रिया स्वरुप लिखा "अभी मुझसे भगवान् श्रीकृष्णो और काम लेना है, इसीलिये उन्होँने रक्षा की है ।

महामना मदनमोहन मालवीयने सन 1939 ईँ मेँ सनम साहबको काशी बुलाकर उनसे श्रीकृष्ण भक्ति के विषयमेँ विचार विनिमय किया और बड़े प्रभावित हुए ।

काशी से व्रजभूमि लौटने पर सनम साहबने अपने इष्टदेव भगवन् श्रीकृष्णकी लीलाभूमि 'व्रज'- सेवनका संकल्प किया । वे हर समय यमुना स्नान एवं श्रीकृष्णके ध्यानमेँ लीन रहने लगे । रुखा सुखा सात्त्विक भोजन प्रसादरुप मेँ ग्रहणकर लेना तथा बाकी समय संत महात्माओँकी सेवा एवं संकीर्तनमेँ व्यतीत करना यही उनकी दिनचर्या थी । वे अपनेको "ब्रजराजकिशोरदास" नामसे सम्बोधित करने लगे थे । एक दिन उन्होँने वृन्दावन मेँ ही रासलीला का रसास्वादन करते समय अपने प्राण त्याग दिये ।

[गीताप्रेस खोरखपुर प्रकाशन कि सत्य एवं प्रेरक घटनाएँ पुस्तक से यह प्रकाशित लेख लियागया हे ]

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

मिहिर सेन : - प्रथम भारतीय जिसने इंग्लिस चैनल्स को जीता था पर भ्रष्ट राजनीति से हार गया !!!

दो बंगाली ऐसे हुए है जिन्हे ओडिशा मेँ अपना बचपन व कौशोरावस्था अतिवाहित कर बाद मेँ अंतराष्ट्रिय प्रसिद्धि मिली थीँ । एक हैँ नेताजी सुभाष चंद्र वोष ! उनके भारत को स्वतंत्र करने के अप्राण उद्यमोँ से अंग्रेजोँ कि फटगई थी उनके बारे मेँ आप सब जानते हि होगेँ ! वहीँ
एक और बंगाली मिहिर सेन ने कटक सहर के बुढ़ीठाकुराणी साहि मेँ अपना बचपन बिताया था व प्राथमिक शिक्षा ओडिशा मेँ पुरी कि थी ।

मिहिर सेन जी के नाम आन्तर्जातीय सिद्धि हे कि उन्होने 27 सेप्टेम्बर 1958 को डोभर् से काले तक तैर कर इंग्लिस चैनेल को पारकरनेवाले पहले भारतीय बनगये थे ।
इसके बाद उन्होने कभी पिछे मुडकर देखा हि नहीँ वे आगे बढ़ते चलेगये । 1966 मेँ मिहिर जी ने पाँच पाँच चैनल्स

[[[ पक् चैनेल्स , ष्ट्रेट्स अफ जिव्रालेटर , ष्ट्रेट अफ डार्डानेलिस् , वसफरस् चैनेल्स और पानामा केनाल ]]]
को तैर कर गिनिज वुक अफ रेकर्डस् मेँ मी नाम दर्ज करदिया था !
वे तो लंडन मेँ बारिष्टरी या लो पढ़नेगये थे , उन्होने कभी यह नहीँ सोचा था कि वे एक दिन इंलिश चैनल पार कर लेगेँ !!

लंडन मेँ पढ़ते समय वे काफी दुर्वल स्वास्थ्य हृ करता था और उनदिनोँ वे अपने अतिरिक्त खर्चा निकालने के लिये भारतीय हाईकमिसन मेँ किराणी कि नौकरी किया करते थे । एकबार उनके मन मेँ इंग्लिस चैनल पार करने का खयाल आया और बाद मेँ नशा बनगया । उन्होने अलग अलग क्षेत्रोँ से आठवार प्रयास किया और विफल हुए । परंतु बारबार विफल होनेपर भी उन्होने इसे जारी रखा और आखिरकार वे 4 साल वाद सफल हुए ।
मिहिर को उनकी युरोपीयन पत्नी Bella Weingarten से लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नहरु जी जैसे कई लोगोँ सहयोग मिला जिससे उन्हे यह सिद्धि लाभ हो पाया था । विदेश से लौटने के बाद मिहिर सेन नेँ कलकत्ता हाईकोर्ट मेँ वकिल के तौर पर जुडे और आखिरकार व्यापार मेँ भी हात आजमाया । उन्होने सिल्क रप्तानी हेतु एक उद्योग शुरु किया और देखते हि देखते यह उद्योग भारत द्वितीय वृहत्तम सिल्क रप्तानीकारी उद्योग बनगया तथा इसे भारत सरकार द्वारा पुरस्कारोँ नवाजा भी गया था । एक सफल व्यवसायी के रुप मेँ उनका जीवन ठिकठाक चल हि रहा था कि राजनीति के दलदल ने उनके बर्वादी तय करदिए । 1977 मेँ पश्चिमबंगाल के वामपंथी नेता जौति वसु नेँ उन्हे अपने दल मेँ सामिल होने का न्यौता दे भेजा ! परंतु वामपंथी चिँताधारा के घोरविरोधी मिहिरजी नेँ इसे ठुकरादिया व उपर से जौति वसु के खिलाफ निर्दलीय उम्मिदवार के रुप मेँ चुनाव मेँ खडे हो गये । वे चुनाव मेँ हारगये और वामपंथीओँ कि जीत हुई । फिर क्या था एक के वाद एक हमले होतेरहे मिहिर सेन पर !!! वामपंथीओँ ने उनके उद्योग का काम ठप्प करवादिया वहाँ रोज धर्मघट होनेलगे । विभिन्न तरिकोँ से सरकारी दवाव पडनेलगा उनपर , उनके व्यवसाय को गैरकानुनी ठहराया गया , उनके नाम से कई झुठे केस दायर कियागया , और आखिरकार उनका व्यापार डुबगया । इन सभी घटनाओँ से अवसादग्रस्त हो वे सिर्फ 50 के उम्र मेँ हि वे Alzheimer's और Parkinsons जैसे रोगोँ का शिकार हो गये !! आखरीदिनोँ मेँ वे वहुत अकेले हो गये थे ,अपनोँ ने तो कब का छोड़दिया था ! कोलकात्ता कि सल्टलेक इलाके मेँ आनेवाला आनन्दालोक हसपिटाल मेँ उनका चिकिस्चा चलरहा था !!! दवादारु मेँ रोज कि 3000.00 खर्चा होता था उनका और केन्द्र सरकार से केवल महिने मेँ 1000.00 हि मिलता था उन्हे !!!
देश समाज दोस्त परिवार सभी नेँ उन्हे ठुकरादिया और आखिरकार इंग्लिस चैनेल को तैरकर जीतनेवाला पहला भारतीय अपने हि देश के भ्रष्ट्र राजनीति से वाजी हारकर 1997 जुन 11 को अलविदा कहगया .....