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शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

गुप्तधन

१९४६ की बात है। दिल्ली से कुछ कोस दूर दक्षिण-पश्चिम की ओर एक छोटा सा गाँव था महीपालपुर। उस गाँव में रघु चौधरी नाम का एक वृद्ध किसान कष्टपूर्वक जीवन यापन कर रहा था। गरीबी के बावजूद उसके जीवन में एक सहारा था - उसका इकलौता बेटा मोहन।

मोहन केवल सुंदर ही नहीं था, वह बुद्धिमान और परोपकारी था। गाँव के सभी लोग उसकी प्रशंसा करते थे। "यह लड़का बहुत उपकारी है," लोग कहते थे, "यह सबकी सहायता करता है।" लेकिन मोहन के जीवन का एक गुप्त पहलू भी था - दिन में वह गाँव वालों की मदद करता था, और रात में स्वतंत्रता सेनानियों के साथ उठना-बैठना करता था। अंग्रेज़ शासन से वह मन ही मन घृणा करता था।

उसी वर्ष अगस्त महीने में कलकत्ता शहर में भीषण साम्प्रदायिक दंगा हुआ। हिन्दू-मुसलमानों के बीच रक्तपात हुआ। पास के गाँव के सबसे धनी साहूकार लालचंद सेठ ने यह खबर बीबीसी रेडियो स्टेशन से सुनकर बहुत क्रोधित हो गए। वे पठानों को भला-बुरा कहने लगे, मुसलमानों के विरुद्ध विषैली टिप्पणियाँ करने लगे।

पड़ोसी घर का एक युवक मोइन अली चौधरी यह बात सुनकर बहुत क्रुद्ध हुआ। लालचंद सेठ के विरुद्ध उसके मन में प्रतिशोध की आग जल उठी। उसने तय किया, "इस आदमी को उचित सबक सिखाना होगा।"

कुछ दिन बाद गाँव में सुना गया कि - लालचंद सेठ के घर से एक रात ढेर सारे पैसे और सोने-चाँदी के गहने आदि किसी ने संदूक खोलकर चुरा लिए हैं। सुबह उठकर सेठ ने देखा, संदूक खाली है, सोना-चाँदी के गहने या पैसे कुछ भी नहीं है। वे सीधे थाने की ओर दौड़े।

थाने का दरोगा था श्याम वर्मा - अंग्रेज़ सरकार का विश्वस्त आदमी। चमकीली वर्दी, हाथ में डंडा, चेहरे पर घमंड। जो भी उसे देखता, डर जाता। श्याम वर्मा ने जाँच शुरू की। गाँववासियों से पूछताछ हुई, तलाशी चली। लेकिन कुछ दिनों तक पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला।

अंत में मोइन अली चौधरी पर संदेह किया गया। लोगों ने कहा, "उस दिन सेठ के घर के पास मोइन चौधरी को देखा था।" पुलिस उसे पकड़ने आ रही है, यह खबर पाकर मोइन अली महीपालपुर में अपने रिश्तेदार के घर छिप गया।

दो सिपाही महीपालपुर में उसे खोजने आए। लेकिन यहाँ एक बड़ी गलती हो गई। वे सिपाही नए और अनुभवहीन थे। उन्होंने कागज में लिखे "मोइन चौधरी" नाम को "मोहन चौधरी" समझ लिया और उस नाम के व्यक्ति को खोजने लगे। और निर्दोष मोहन चौधरी को पकड़कर जेल में बंद कर दिया।

अंग्रेज़ सिपाहियों की गलत नाम लिखने की वजह से मोहन चौधरी फँस गया। असली चोर आज़ाद, और निर्दोष जेल में।

मोहन को जेल हो गई। कुछ महीने बीत गए। गर्मियों का मौसम आया। खेती का मौसम शुरू होने वाला है। घर में वृद्ध रघु चौधरी आँखें पोंछते हुए सोच रहे हैं - "यह बड़ी ज़मीन, यह बड़ा दुःख! अब जोतेगा कौन? हाथ में ताकत नहीं, पीठ टूट रही है, हल पकड़ने की शक्ति न{हीं।"

एक दिन उन्होंने गाँव के एक पढ़े-लिखे आदमी को बुलाकर पत्र लिखवाया:

"बेटे मोहन,
इस साल मैं आलू और सरसों नहीं लगा पाऊँगा। हाथ-पाँव नहीं चल रहे, ज़मीन जोतने वाला कोई नहीं है। तुम अगर घर पर होते, शायद पहले ही जोत देते। खैर, सब ईश्वर की इच्छा।"

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जेल के अंदर मोहन ने पत्र पढ़ा। आँखें नम हो गईं। बैठे-बैठे सोचने लगा... सोचता रहा... और सोचता रहा। बाप की मदद कैसे करे? जेल से क्या किया जा सकता है?

अचानक उसके मन में एक उपाय आया। अंग्रेज़ सरकार का लालच, उनकी संदेहप्रवृत्ति - यह सब वह जानता था। उसने अपने पिता को जवाब लिखा:

"बापू, एक बात याद रखना - ज़मीन में हल मत चलाना। उस ज़मीन में हाथ मत लगाना। उस मिट्टी में सोना है। एक साल प्रतीक्षा करो, उसके बाद उस मिट्टी से खुद सोना निकलेगा।"

अंग्रेज़ी शासन में सभी कैदियों की चिट्ठियाँ पढ़ी जाती थीं। मोहन की चिट्ठी पढ़ते ही पुलिस को संदेह हुआ। "शायद मोहन ने उस ज़मीन में चोरी का सोना, चाँदी, सिक्के, आभूषण गाड़े हैं!"

तुरंत पुलिस का दल रघु चौधरी के दरवाज़े पर हाज़िर। साथ में आठ-दस सिपाही, फावड़े, कुदाल के साथ उपस्थित।

"चलो खोदो! इधर खोदो, उधर खोदो, बीच में खोदो, कोने में खोदो - पूरी ज़मीन उलट-पलट कर दो! कोई भी जगह मत छोड़ो।" दरोगा श्याम वर्मा हुक्म दे रहे थे।

ख़ूब पसीना बह रहा था, मिट्टी उड़ रही थी, जबरदस्त धूल हो रही थी। खोदो, खोदो, खोदो। सिपाहियों ने पूरी ज़मीन उलट-पलट कर दी।

पैसे... सोना? कौड़ी भर भी नहीं मिला। हाँ, कुछ मध्ययुगीन मिट्टी के बर्तन मिले, उन्हें लेकर लौट गए।

सिपाही कुछ भी कीमती चीज़ न पाकर लौट गए, लेकिन मोहन का उद्देश्य सफल हो गया। सरकारी सिपाहियों ने खुद मोहन के बाप की ज़मीन खेती योग्य बना दी!

कुछ दिन बाद रघु चौधरी ने अपने बेटे को एक और पत्र भेजा:

"बेटे मोहन,
मैं नहीं जानता क्या हुआ, लेकिन एक दिन सुबह दरोगा श्याम वर्मा खुद आठ सिपाही लेकर हमारी ज़मीन पूरी खोद गए - बिना एक पैसे मज़दूरी के! ब्रिटिश सरकार के सिपाहियों ने हमारी खेती की ज़मीन खेती योग्य बना दी! आलू और सरसों बो दिया। फसल उठने पर फिर एक चिट्ठी आएगी। भगवान तेरा भला करे।"
और मोइन अली? वह महीपालपुर में छिपा हुआ था। पुलिस दो-तीन बार वहाँ आने से उसका डर बढ़ गया था। उसने सोचा, "मुझे खोजने के लिए शायद बार-बार आ रहे हैं! नहीं, यह जगह अब सुरक्षित नहीं है, दूसरी जगह जाना होगा!"

समस्या थी - चोरी का वह विपुल धन। सोना, चाँदी, सिक्के, आभूषण - सब कुछ उसके पास। इन सबको अभी लेकर भागना खतरनाक था।

इसलिए उसने क्या किया? एक रात महीपालपुर में मोहन चौधरी की ज़मीन से सटे बरगद के पेड़ की जड़ में गहरा गड्ढा खोदकर सारी धन-संपत्ति गाड़ दी। उसके ऊपर तीन-चार बड़े-बड़े पत्थर रखकर निशान लगा दिया। उसने सोचा, हिन्दू बरगद के पेड़ को काटते नहीं हैं और न ही उसकी जड़ में खुदाई करते हैं, इसलिए यहाँ मेरा धन सुरक्षित रहेगा। कुछ महीने बाद सब शांत हो जाने पर आकर खोद लूँगा। मन में यह विचार कर वह दिल्ली के दूसरे इलाके में भाग गया।

महीने बीते। देश की राजनीतिक स्थिति बदल रही थी। १९४७ के जून महीने में "माउंटबेटन योजना" की घोषणा हुई और यह भारत विभाजन का आधिकारिक प्रस्ताव था। शहरों में इसके बारे में जल्दी सबको पता चल गया, लेकिन गाँवों में इस बारे में जानकारी पहुँचने में समय लगा।

जुलाई-अगस्त में देश विभाजन की खबर धीरे-धीरे गाँवों में पहुँची। "देश दो भागों में बँटेगा," "हिन्दू-मुसलमान अलग होंगे" - ऐसी अस्पष्ट खबरें उस समय मिल रही थीं। १४-१५ अगस्त १९४७ - स्वतंत्रता और विभाजन आधिकारिक रूप से हुआ। नेहरू का "ट्रिस्ट विद डेस्टिनी" भाषण रेडियो पर प्रसारित हुआ। लेकिन अधिकांश गाँवों में यह तुरंत नहीं पहुँचा। अगस्त के अंत और सितंबर में विभाजन का असली अर्थ स्पष्ट हुआ।

करोड़ों से अधिक शरणार्थी दिल्ली आदि बड़े शहरों की ओर आने लगे। उस समय का दृश्य अत्यंत दयनीय था। लाखों लोग ट्रेन, गाड़ी, पैदल यात्रा करके सीमा पार कर रहे थे। ट्रेनें भीड़ से भरी थीं, कई बार हमलों में मारे गए थे। पाकिस्तान से आईं कई ट्रेनों में हत्याकांड के शिकार मृत लोगों के शव भी आए थे। शहर और गाँव की सड़कों पर बेघर लोग भूख-प्यास से भटक रहे थे। हिंसा, लूटपाट, बलात्कार और हत्याकांड आम हो गए थे। दिल्ली तथा अन्य शहरों में कई शिविर बनाए गए, लेकिन वहाँ भी बीमारी और भूख के कारण कई शरणार्थी मौत के मुँह में चले गए। हज़ारों की संख्या में शरणार्थी परिवार बिखर गए थे, बच्चे अनाथ हो गए थे।

स्थानीय हिन्दुओं का खून खौल उठा। शरणार्थी भी पाकिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा के शिकार होकर लौटे थे, इसलिए वे भी आक्रोश के शिकार हो गए। फलतः दिल्ली और आसपास के इलाकों में भयंकर हिंसा हुई। जो पठान भारत में रह गए थे, उन्हें भारत छोड़ने को मजबूर होना पड़ा। रक्तपात, लूट, आगजनी - चारों ओर विभीषिका का तांडव दिखाई दिया।

उस समय कई मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान भाग गए। उनमें मोइन अली चौधरी का परिवार भी था। जान बचाने के लिए उन्होंने सब कुछ छोड़कर भाग गए। मोइन अली ने सोचा, "बाद में आकर वह धन ले लूँगा।" लेकिन विधि का विधान कुछ और था।

स्वतंत्रता के बाद कई राजनीतिक कैदियों को मुक्त किया गया। मोहन चोरी के मामले में जेल में था, लेकिन चूँकि वह स्वतंत्रता सेनानियों से जुड़ा था, इसे झूठा मामला मानकर एक साल बाद जेल से मुक्त कर दिया गया। गाँव लौटकर मोहन चौधरी की शादी हुई। उसके बच्चे हुए। जीवन सामान्य गति से चल रहा था। कुछ वर्षों बाद अधिक खेती के लिए उसने अपनी ज़मीन से लगे बरगद के पेड़ की जड़ के पास की खाली ज़मीन को भी जोतने का निश्चय किया।

ज़मीन में काम करते समय मोहन बरगद के पेड़ की जड़ में आकर मोइन अली चौधरी द्वारा रखे गए उन पत्थरों पर बैठकर आराम करता था, रोटी खाता था। एक दिन उसने सोचा, "इस छाँव वाली जगह पर हल्दी के पौधे लगाएँ तो अच्छा रहेगा।"

पत्थरों को दूसरी जगह हटाकर उसने उस जगह को जोता। अचानक उस जगह पर हल अटक गया। खोदने पर देखा - मिट्टी के नीचे से सोना, चाँदी, सिक्के, आभूषण निकल रहे हैं!

मोहन चकित रह गया। इतना धन! किसने गाड़ा होगा? क्यों? लेकिन यह सब सोचने का समय नहीं था। उसने सब कुछ इकट्ठा करके सुरक्षित जगह पर रख लिया।

उसकी हालत पूरी तरह बदल गई। कुछ महीनों में उसने एक पक्का मकान बनवाया। बाद में घर को किराए पर देकर खुद दिल्ली शहर में रहने लगा। स्वतंत्रता सेनानी के रूप में पहचाने जाने के कारण कांग्रेस में शामिल हो गया। एक बार चुनाव का टिकट भी मिला, हालाँकि जीत नहीं सका। इस तरह मोहन चौधरी की किस्मत पूरी तरह बदल गई।

और मोइन अली चौधरी? पाकिस्तान में उनका जीवन दुःस्वप्न बन गया। वहाँ सब उसे "मुहाजिर" कहते थे। कोई सम्मान नहीं, काम-धाम नहीं, आश्रय नहीं। जीविका के लिए उसने फिर चोरी की। पकड़े जाने पर पाकिस्तान की जेल में बंद हो गया। जेल में रहते समय उसकी बीवी ने किसी और से निकाह कर लिया। मोइन अली ने सब कुछ खो दिया - परिवार, सम्मान, धन-संपत्ति।

जेल में वह दूसरे कैदियों को अपनी कहानी सुनाता है: "मैंने दिल्ली के पास एक गाँव के बरगद के पेड़ की जड़ में अनगिनत धन-संपत्ति गाड़ी थी। भारत विभाजन के कारण सब कुछ हाथ से निकल गया।"

लेकिन कोई विश्वास नहीं करता। "झूठी कहानी!" लोग उसकी बात सुनकर हँसते हैं।

मोइन अली रोता है, लेकिन कोई नहीं सुनता। वह धन उसका नहीं था, लेकिन वह हानि उसके हृदय को घायल करती है। रात में वह सपने देखता है - वह बरगद का पेड़, वे पत्थर, वह गुप्तधन। लेकिन सुबह उठने पर चारों ओर केवल जेल की दीवारें हीं उसके भाग्य में शेष बची थीं ।

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नोट: कहानी काल्पनिक है, लेकिन इसमें वर्णित ऐतिहासिक तथ्य सत्य हैं और तत्कालीन पुस्तकों और समाचारपत्रों में बहुत बार उल्लिखित हुए हैं। वास्तव में दिल्ली के पास महीपालपुर नाम का एक छोटा गाँव है और यह गाँव इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे तथा महरौली के बीच स्थित है। मूल कहानी विदेशी है, जिसमें एक चोर जेल जाने के बाद अपने बाप की मदद करने के लिए पुलिस के साथ खेल खेलता है। लेकिन उस छोटी सरल कहानी में कई परिवर्तन करके इस कहानी को नई शैली में लिखा गया है। ऐसा लिखने का उद्देश्य उस समय के भारत से लोगों को एक बार फिर परिचित कराना है। आज की पीढ़ी उस समय के भारत को भूल गई है। आज की पीढ़ी को उस समय के भारत से परिचित कराने के लिए यह कहानी लिखी गई है।

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