इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के मध्य का समय था। आधुनिक युग का वह किसान का लड़का गाँव के खेतों के बीच बनी एक झोंपड़ी में बैठा हनुमान बंदरों, हाथियों, जंगली सूअरों और आवारा पशुओं से फसल की रखवाली कर रहा था।
बाहर ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन मोबाइल की स्क्रीन से निकलने वाले शब्द काफी गर्म थे। बाहर रिमझिम बारिश हो रही थी, मानो किसी अनकही कहानी के लिए पृष्ठभूमि तैयार कर रही हो।
दूसरी ओर से दोस्तों के मिलन यानी 'रियूनियन' के लिए बार-बार मैसेज आ रहे थे। वह मुस्कुराया—वही पुरानी मुस्कान, जिसमें थोड़ा कटाक्ष और बहुत सारे अनुभव घुले हुए थे। उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड पर थिरकने लगीं।
"नमक-मिर्च और सत्तू-अचार खाकर बड़े हुए बच्चे दावतों के पीछे पागल नहीं होते। जिसकी नीयत ही हर वक्त 'पाँच सेर' अनाज उड़ाने की हो, वही हर समय दावत-दावत रटता फिरता है।"
यह केवल शब्द नहीं थे; यह मिट्टी की सोंधी खुशबू और आत्मसम्मान की एक पुकार थी। जिसने अपनी गाँव की माटी और घर के सादे भोजन का स्वाद चखा हो, उसके लिए इन बनावटी दावतों की चकाचौंध फीकी थी।
उधर से जवाब आया, "भाई, तुम्हारी मेंटालिटी ही वैसी है, बस!"
उसके भीतर छिपा सत्यवादी इंसान थोड़ा उत्तेजित हो उठा। वह इस 'मेंटालिटी' के पीछे का असली चेहरा जानता था। उसने फिर टाइप किया:
"दावत के नाम पर लाखों का चंदा वसूलकर, उसमें से केवल तीस हजार खर्च करना और बाकी साठ हजार डकार जाना—यह जिनका पेशा हो, वे हमें क्या मेंटालिटी सिखाएंगे? दावत के नाम पर भ्रष्टाचार कैसे चलता है, यह मुझे बखूबी पता है।"
उसकी आँखों के सामने उस तथाकथित मिलन का दृश्य नाच उठा। वहाँ खाने से ज्यादा 'दिखावे' की होड़ मची होती है। कौन सी गाड़ी से आया है, किसकी पत्नी ने कितना सोना पहना है, बच्चा किस बड़े स्कूल में पढ़ रहा है, यहाँ तक कि अपने पालतू कुत्ते-बिल्ली को लेकर भी बड़प्पन की नुमाइश। वहाँ सब एक-एक मुखौटा पहने घूमते हैं।
अंत में संक्षिप्त उत्तर आया, "तुझे जो समझना है समझ, ओके।"
उसने एक लंबी सांस ली। इस बार उसकी मुस्कान और गहरी थी। उसने आखिरी बार लिखा:
"सब समझ रहा हूँ! दुनिया जैसे एक कीचड़ भरा तालाब है, जहाँ हर कोई अपने स्वार्थ में डूबा है। यह रियूनियन तो बस एक बहाना है; असली मकसद तो भ्रष्टाचार की कमाई और झूठी शान-शौकत का प्रदर्शन है।"
इसके बाद मोबाइल की स्क्रीन शांत हो गई। उधर से फिर कोई शब्द नहीं आया। शायद उसने जो कड़वा सच कह दिया था, उसने सामने वाले की शौकीन दुनिया के आईने को चकनाचूर कर दिया था।
उसने मोबाइल किनारे रख दिया। बाहर बारिश अब थम चुकी थी, लेकिन उसके मन में अपने घर के उस सादे भोजन और अपनी जड़ों से जुड़े होने की तृप्ति फैल रही थी। दुनिया चाहे जितना दिखावा करे, वह अपनी वास्तविक पहचान और अस्तित्व में ही खुश था।