फुटबॉल विश्व कप में भारत का न होना देखकर करोड़ों भारतीयों का दिल दुःखी हो जाता है। कुछ भारतीय निश्चित रूप से मजाकिया अंदाज में कहते हैं कि चूंकि फुटबॉल विश्व कप में पाकिस्तान नहीं है, इसलिए भारतीय भी कभी उसमें भाग लेने के लिए उत्साहित नहीं हुए हैं। हालांकि, भारतीय समाज का एक बड़ा वर्ग फुटबॉल विश्व कप में भारत के न होने का दोष क्रिकेट और बीसीसीआई (BCCI) पर मढ़ देता है।
अधिकांश लोग यही एक वाक्य कहते हैं कि "क्रिकेट के कारण भारत में अन्य खेल डूब गए।" आलोचक बहुत आसानी से सारा दोष भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) और देश के क्रिकेट पागलपन के सिर मढ़ देते हैं। आरोप लगाया जाता है कि क्रिकेट सारा फंड, प्रचार और विस्तार निगल गया है, जिसके परिणामस्वरूप फुटबॉल, हॉकी या एथलेटिक्स जैसे खेल उपेक्षित होकर रह गए। लेकिन यह तर्क कितना सच है? यदि हम भारत के खेल इतिहास, सामाजिक संरचना और पिछले दशकों की आर्थिक स्थिति का गहराई से अध्ययन करें, तो पता चलेगा कि यह आरोप पूरी तरह निराधार है। वास्तविक कारण क्रिकेट की सफलता नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक मानसिकता, भौगोलिक सीमाएं और गरीबी की पृष्ठभूमि है, जिसने भारतीय जनमानस को क्रिकेट की ओर अपने आप आकर्षित किया था।
आज बीसीसीआई को विश्व का सबसे अमीर और शक्तिशाली खेल संगठन देखकर कई लोग सोचते हैं कि यह हमेशा से ऐसा ही था। लेकिन इतिहास गवाह है, 1983 में जब कपिल देव के नेतृत्व में भारतीय टीम ने पहली बार विश्व कप जीतकर देश को गौरवान्वित किया था, तब उन विश्वविजेता खिलाड़ियों को पुरस्कार राशि और उचित पारिश्रमिक देने के लिए भी बीसीसीआई के पास पर्याप्त पैसा नहीं था। उस समय लता मंगेशकर का एक संगीत कार्यक्रम (कंसर्ट) आयोजित करके खिलाड़ियों के लिए फंड इकट्ठा करना पड़ा था।
1983 या उससे पहले जब बीसीसीआई का कोई वर्चस्व नहीं था, कोई वित्तीय ताकत नहीं थी, तब भारत अन्य खेलों में कितना आगे था?
तब हम ओलंपिक में व्यक्तिगत स्वर्ण पदकों की बाढ़ क्यों नहीं ला पा रहे थे? उस समय भारत वॉलीबॉल, बेसबॉल, बास्केटबॉल, रग्बी और फुटबॉल आदि खेलों में वैश्विक प्रगति क्यों नहीं कर सका?
हॉकी में भी भारत ने आखिरी बार ओलंपिक स्वर्ण 1980 में और विश्व कप 1975 में जीता था। इसके बाद हॉकी में भारत ने कभी कोई बड़ी जीत हासिल नहीं की। नब्बे के दशक की शुरुआत तक बीसीसीआई बिल्कुल भी अमीर नहीं था। यहां तक कि भारत में मैचों का प्रसारण करने के लिए बीसीसीआई को दूरदर्शन (Doordarshan) को उलटा पैसा देना पड़ता था। नब्बे के दशक के अंत तक (1999 के आसपास) बीसीसीआई आर्थिक रूप से एक आत्मनिर्भर और लाभदायक संस्था बन चुका था, लेकिन वह आज की तरह 'महाशक्ति' या अत्यधिक अमीर खेल संगठन नहीं था। 2006 के बाद ही बीसीसीआई एक अमीर खेल संगठन बनने लगा। तो फिर 1980 से 2006 तक हॉकी में भारत एक भी ओलंपिक स्वर्ण पदक या हॉकी विश्व कप क्यों नहीं जीत सका? क्या इसके लिए भी बीसीसीआई को जिम्मेदार ठहराया जाएगा?
यदि क्रिकेट ही अन्य खेलों के लिए बाधा होता, तो क्रिकेट की गरीबी के समय अन्य खेलों को शीर्ष पर होना चाहिए था। लेकिन वास्तविकता बिल्कुल अलग थी। इससे स्पष्ट होता है कि समस्या क्रिकेट के भीतर नहीं है, समस्या हमारी व्यवस्था, बुनियादी ढांचे और सामूहिक रुचि के भीतर ही है।
भारतीय खेल समीक्षक अक्सर एक बात भूल जाते हैं कि नब्बे के दशक तक फुटबॉल और हॉकी जैसे खेल भारत के ग्रामीण इलाकों के लिए पहुंच से बाहर और एक तरह से महंगे थे। इन खेलों के लिए विशिष्ट उपकरणों की आवश्यकता होती थी। एक अच्छी गुणवत्ता वाला फुटबॉल, जिसमें हवा भरकर खेला जा सके, या एक आधुनिक हॉकी स्टिक और कठोर कॉर्क बॉल खरीदना ग्रामीण इलाकों के सामान्य परिवारों या बच्चों के लिए बिल्कुल भी आसान नहीं था।
पहली बात तो यह है कि ये खेल सामग्रियां स्थानीय बाजार में आसानी से नहीं मिलती थीं। यदि कभी छोटे और मध्यम श्रेणी के शहरों में मिलती भी थीं, तो उनकी कीमत इतनी अधिक होती थी कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था उसे स्वीकार नहीं कर पाती थी। ग्रामीण इलाकों के लोग नब्बे के दशक से पहले बड़े शहरों में अक्सर नहीं जाते थे, और यदि जाते भी थे, तो उनके पास सीमित धन होने के कारण वे खेल की इन महंगी वस्तुओं को नहीं खरीद पाते थे।
हॉकी के लिए समतल और सुंदर मैदान या बाद के समय में एस्ट्रोटर्फ (Astroturf) की आवश्यकता पड़ी, जो केवल शहरी खेल संघों या बड़े क्लबों तक ही सीमित रह गया। फुटबॉल के लिए भी एक बड़े, विशाल और समतल घास के मैदान की आवश्यकता होती है। परिणामस्वरूप, ये खेल केवल कुछ विशिष्ट अमीर व्यक्तियों, शहरी शिक्षण संस्थानों या धनी परिवारों के खेल के रूप में सीमित रह गए। ग्रामीण इलाकों की आम जनता इसे सामूहिक रूप से नहीं अपना सकी।
इसके ठीक विपरीत क्रिकेट खेल का चरित्र था। क्रिकेट दिखने में भले ही एक विदेशी और साहबी खेल जैसा लगता था, लेकिन भारतीयों ने इसे बहुत आसानी से 'स्वदेशी' या अपना बना लिया। क्रिकेट खेलने के लिए ग्रामीण बच्चों के लिए किसी विशिष्ट, महंगे उपकरण की सख्त आवश्यकता नहीं थी। भारतीयों के भीतर मौजूद 'जुगाड़' बुद्धि क्रिकेट को हर गली और मैदान तक ले गई।
बल्ले या गेंद के लिए दुकान पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था। यदि बल्ला चाहिए, तो गांव के किसी बढ़ई से या खुद लकड़ी के फट्टे या पेड़ की लकड़ी को काटकर सुंदर बल्ला बना लिया जाता था। अस्सी से नब्बे के दशक तक ओडिशा के ग्रामीण इलाकों में मिट्टी के घर बहुत थे और फूस की छतें बनाई जाती थीं। फूस की छतों के लिए पुआल और ताड़ के पत्ते के डंठल का उपयोग किया जाता था। ताड़ के डंठल से ताड़ की रस्सी निकाली जाती थी और उसे ओड़िशा में 'कुरुत' या 'कोरट' और 'ताळदाढ़ि' आदि कहा जाता था, जो फूस की छतों के लिए उपयोग होती थी। तो उसी ताड़ के डंठल के आकार को देखकर बच्चे उसे काटकर उससे क्रिकेट खेलने के लिए बल्ला बना लेते थे। ताड़ के डंठल से ग्रामीण बेसबॉल के लिए अपेक्षाकृत छोटे आकार का बल्ला भी बनाया जाता था। फिर छोटे बच्चों के लिए ताड़ के डंठल से 'ताळफोटका' बाजा भी बनाया जाता था। गांवों के बच्चे ताड़ के पत्तों से गेंद (पेंडू) बनाते थे। कुछ लोग ताड़ की गेंद बनाकर उसके ऊपर साइकिल ट्यूब का रबर लपेटकर उससे क्रिकेट की गेंद बना लेते थे।
विकेट के लिए बांस या दुसरे पेड़ों कि लकड़ियां, दीवार पर कोयले से खींची गई तीन लाइनें या सिर्फ दो ईंटें ही काफी थीं। इस आसान उपलब्धता के कारण क्रिकेट भारत के गरीब वर्ग के बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गया। एक गरीब देश की विशाल आबादी ने उसी खेल को चुना जो उनकी जेब के अनुकूल था और जिसमें आनंद असीमित था। क्रिकेट वास्तव में भारतीय गरीबों का खेल बन गया।
बीसवीं सदी के अंत तक भारत एक गरीब और सीमित संसाधनों वाला देश था। एक विशाल आबादी अपनी दैनिक आजीविका चलाने के लिए संघर्ष कर रही थी। ऐसी स्थिति में कोई भी समाज उस खेल को बढ़ावा देता है जो न्यूनतम संसाधनों में और अधिकतम लोगों की भागीदारी के साथ खेला जा सके। इसीलिए भारत के लोगों ने कबड्डी और क्रिकेट को बिना किसी संकोच के अपना प्यार दिया।
कबड्डी के लिए तो किसी उपकरण की आवश्यकता ही नहीं थी। कबड्डी के लिए केवल मिट्टी का मैदान और शरीर की शक्ति ही पर्याप्त थी। इसी तरह क्रिकेट भी कम जगह में, गलियों में, फसल कटने के बाद खाली पड़े धान के खेतों में बहुत आसानी से खेला जा सकता था। एक बल्ले और एक गेंद से पूरे गांव के 20-30 बच्चे मिलकर दिनभर खेल सकते थे। कम बच्चों में भी क्रिकेट खेला जा सकता है। केवल दो-तीन लोग भी क्रिकेट खेल सकते थे। यहां तक कि एक अकेला व्यक्ति भी एक दीवार पर गेंद मारकर फील्डिंग, बैटिंग और बॉलिंग करके क्रिकेट खेल सकता था। दूसरी ओर, फुटबॉल के लिए प्रत्येक खिलाड़ी के पास अच्छे जूते होना आवश्यक है, क्योंकि नंगे पैर कठोर चमड़े की गेंद को किक मारने पर चोट लगने का डर रहता है। इन सभी आर्थिक और भौतिक कारणों से क्रिकेट हर भारतीय की मानसिकता से जुड़ गया।
अब कुछ लोग यह सवाल कर सकते हैं कि ब्राजील भी तो एक गरीब देश था, फिर भी ब्राजील के लोगों ने क्रिकेट नहीं बल्कि फुटबॉल को क्यों अपनाया।
वास्तव में ब्राजील में बच्चे गलियों में खेलने के लिए किसी जूते या असली फुटबॉल का इंतजार नहीं करते थे। वे पुराने कपड़ों को लपेटकर, मोजों के अंदर भरकर या प्लास्टिक की बोतलों को मरोड़कर गोल गेंद बना लेते थे और नंगे पैर ही खेलते थे। उनके लिए फुटबॉल केवल एक खेल नहीं था, वह उनके नृत्य (Samba) और जीवनशैली का एक हिस्सा था। भारत के बच्चों ने भी ठीक वैसे ही गरीबी के बीच जुगाड़ किया, लेकिन उन्होंने ऐसा बहुत बाद में अस्सी-नब्बे के दशक के दौरान बेसबॉल और क्रिकेट के लिए किया। पेड़ की टहनी या लकड़ी के फट्टे को बल्ला और टेनिस या प्लास्टिक की गेंद से उन्होंने क्रिकेट खेला। ब्राजील के बच्चों को जो सहजता फुटबॉल में मिली, भारतीय बच्चों को वही सहजता क्रिकेट में मिली।
भारत लंबे समय तक ब्रिटिश शासन के अधीन था। अंग्रेज भारत में क्रिकेट का खेल लेकर आए थे। हमारी सामाजिक संरचना ऐसी हो गई कि अंग्रेजों को क्रिकेट में हराना स्वाभिमान का विषय बन गया। राजा-महाराजाओं ने भी क्रिकेट को बढ़ावा दिया। इसलिए स्वतंत्रता से पहले ही क्रिकेट के प्रति एक संस्थागत आकर्षण बन चुका था। हालांकि, भारत में अस्सी के दशक तक क्रिकेट केवल शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित था। भारत के गांवों में अस्सी के दशक में क्रिकेट की लोकप्रियता बढ़ी।
दूसरी ओर ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे देशों में यूरोपीय प्रवासियों और स्थानीय लोगों ने फुटबॉल को बहुत जल्दी एक सामूहिक खेल के रूप में स्वीकार कर लिया था। वहां क्रिकेट का कोई प्रभाव नहीं था।
फुटबॉल एक अत्यंत कठिन, शारीरिक संघर्ष (कॉन्टैक्ट स्पोर्ट) और निरंतर दौड़ने का खेल है। इसके लिए उच्च प्रोटीन युक्त भोजन और शारीरिक शक्ति की अधिक आवश्यकता होती है। लैटिन अमेरिकी देशों के खान-पान में मांस (मीट) की मात्रा अधिक होती है, जो गरीब लोगों को भी एक प्रकार की शारीरिक क्षमता प्रदान करती है।
इस तरफ भारत के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी के कारण कुपोषण एक बड़ी समस्या थी। कार्बोहाइड्रेट प्रधान चावल और रोटी जैसे भोजन के कारण 90 मिनट तक लगातार स्प्रिंट (तेज दौड़) मारने जैसी सहनशक्ति (स्टैमिना) जमीनी स्तर पर तैयार होना कठिन था। क्रिकेट एक 'दक्षता-भित्तिक' (कौशल-आधारित या Skill-based) खेल है और इस खेल में यदि कोई खिलाड़ी शारीरिक रूप से बहुत शक्तिशाली न भी हो, तो भी केवल तकनीक और बुद्धि के बल पर सचिन तेंदुलकर की तरह विश्व का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बन सकता है।
1958 में मात्र 17 वर्ष की आयु में पेले ने ब्राजील को विश्व कप जिताया। उसके बाद 1962 और 1970 में भी जीता। ब्राजील के हर गरीब बच्चे ने देखा कि फुटबॉल खेलने से गरीबी से मुक्ति मिल सकती है और दुनिया में नाम हो सकता है।
भारत में वही काम हॉकी में 1980 तक हुआ, लेकिन हॉकी केवल अमीर लोगों और शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित रही। भारत के बहुसंख्यक ग्रामीण लोग किसी एक खेल को उस तरह पागलों की तरह प्यार नहीं कर रहे थे जैसे ब्राजील में पचास-साठ के दशक से था।
हालांकि, 1983 में जब कपिल देव ने क्रिकेट विश्व कप जीता, तो वह गांवों और शहरों में हर तरफ चर्चा का विषय बन गया। लोग क्रिकेट की ओर आकर्षित हुए। 1989 के बाद सचिन तेंदुलकर का विस्फोटक खेल हर भारतीय बच्चे के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया। यदि भारत ने 1950 या 60 के दशक में फुटबॉल में कोई बड़ी अंतर्राष्ट्रीय सफलता हासिल की होती, तो आज तस्वीर कुछ और होती।
ब्राजील के अधिकांश शहर समुद्र के किनारे या समतल क्षेत्रों में स्थित हैं जहां खुले मैदान या समुद्र तट (बीच) आसानी से उपलब्ध हैं। भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां जमीन का उपयोग खेती के लिए किया जाता है। ग्रामीण इलाकों में खेलने के लिए बड़े खुले मैदानों की तुलना में छोटी जगह या गलियां अधिक मिलती हैं, जो गली-क्रिकेट के लिए अधिक उपयुक्त हैं।
गरीबी भारत और ब्राजील दोनों देशों में थी। लेकिन ब्राजील ने अपनी गरीबी को फुटबॉल के माध्यम से व्यक्त किया और भारत ने अपनी गरीबी और सीमित संसाधनों को क्रिकेट के माध्यम से प्रकट किया। इसलिए ब्राजील की सफलता यह साबित नहीं करती कि भारत में फुटबॉल न होने के लिए क्रिकेट दोषी है, बल्कि यह दर्शाती है कि हर देश का जनमानस अपनी परिस्थितियों के अनुसार अपना पसंदीदा खेल चुन लेता है।
इसके अलावा हमारे भारतीय समाज में एक सामान्य प्रवृत्ति है कि हम सफलता की पूजा करते हैं। 1983 की विश्व कप विजय के बाद भारतीय मीडिया, विशेषकर तत्कालीन दूरदर्शन ने क्रिकेट को हर घर के बैठक कक्ष (ड्राइंग रूम) तक पहुंचा दिया। जब एक गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चे ने देखा कि क्रिकेट खेलकर कोई देश का हीरो बन सकता है, तो उसका सपना क्रिकेट के इर्द-गिर्द ही घूमने लगा।
सुनील गावस्कर, कपिल देव और बाद में सचिन तेंदुलकर जैसे महानायकों के आगमन ने भारतीय जनमानस में क्रिकेट के स्थान को पूरी तरह बदल दिया। दूसरी ओर, फुटबॉल या अन्य खेलों में हमारे पास वैसी कोई बड़ी अंतर्राष्ट्रीय सफलता नहीं थी जो पूरे देश को एक सूत्र में बांध सके। 1980 के बाद भारत ने हॉकी में कोई बड़ी सफलता हासिल नहीं की थी। लोगों ने सामूहिक रूप से फुटबॉल और हॉकी को कभी उस तरह स्वीकार नहीं किया क्योंकि वे उस खेल में किसी बड़ी भारतीय सफलता के गवाह नहीं बन पाए थे।
यहाँ बीसीसीआई की सफलता के रहस्य को समझना होगा। बीसीसीआई सरकार से कोई वित्तीय अनुदान नहीं लेता है। यह एक स्वायत्त संस्था है। 1980 और 90 के दशक में जब भारतीय अर्थव्यवस्था उदारीकरण की ओर बढ़ी, तब बीसीसीआई ने मार्केटिंग, टेलीविजन ब्रॉडकास्टिंग राइट्स (प्रसारण अधिकार) और स्पॉन्सरशिप का सही इस्तेमाल करके खुद को अमीर बना लिया। बीसीसीआई ने एक ऐसा व्यावसायिक मॉडल तैयार किया जो आज आईपीएल (IPL) जैसे एक विशाल ब्रांड में बदल चुका है।
लेकिन दूसरी ओर, भारतीय फुटबॉल महासंघ (AIFF) या हॉकी इंडिया जैसे संगठन दशकों तक आंतरिक राजनीति, भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के शिकार रहे। वे जमीनी स्तर से प्रतिभाएं नहीं ढूंढ पाए और न ही खेल की मार्केटिंग करके प्रायोजक (Sponsors) ला सके। जब बीसीसीआई अपनी कड़ी मेहनत और व्यावसायिक दूरदर्शिता के कारण आगे बढ़ा, तो उसकी सराहना करने के बजाय अन्य संघों की विफलताओं की आलोचना करना अधिक तर्कसंगत है। आप खुद अक्षम हैं इसलिए दूसरों की सफलता को कोस नहीं सकते।
उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि भारत के फुटबॉल विश्व कप न खेलने के पीछे क्रिकेट के खेल का कोई हाथ नहीं है। दोष हमारी सामाजिक संरचना में है। हमने दशकों तक खेल को एक करियर के रूप में स्वीकार नहीं किया। दोष हमारी गरीबी और बुनियादी ढांचे की कमी में है जिसने गांवों के बच्चों को फुटबॉल या हॉकी स्टिक के बजाय लकड़ी का बल्ला थामने पर मजबूर किया। आज समय बदल रहा है। भारत की आर्थिक स्थिति सुधर रही है। ग्रामीण इलाकों में भी अब फुटबॉल, कबड्डी और अन्य खेलों के लिए रुचि और सुविधाएं पैदा हो रही हैं। इसलिए क्रिकेट को दुश्मन के रूप में न देखकर, क्रिकेट के उस सफल प्रबंधन मॉडल को अन्य खेलों में लागू करने की आवश्यकता है। जिस दिन भारतीय समाज और सरकार फुटबॉल को जमीनी स्तर से उतना ही प्यार और सुविधा देंगे, उस दिन भारत निश्चित रूप से विश्व कप के मंच पर दुनिया को जीत लेगा। क्रिकेट की निंदा करके दूसरे खेल की उन्नति कभी संभव नहीं है।