सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत में कोरिया के जोसोन राजवंश का चीन के मिंग राजवंश के साथ अत्यंत प्रगाढ़ और सुदृढ़ संबंध था। कोरिया स्वयं को मिंग साम्राज्य की सांस्कृतिक और राजनीतिक परंपरा का सच्चा उत्तराधिकारी मानता था, इसलिए मिंग साम्राज्य के प्रति उसकी निष्ठा बहुत गहरी थी। यह निष्ठा केवल राजदरबार या शासक वर्ग तक सीमित नहीं थी, बल्कि सामान्य कोरियाई जनता भी मिंग राजवंश के प्रति गहरा आदर और भावनात्मक लगाव रखती थी। इसी समय पूर्वोत्तर एशिया के मंचूरिया क्षेत्र में होंग ताईजी (Hong Taiji) के कुशल और आक्रामक नेतृत्व में जुरचेन (Jurchen) जनजाति अत्यंत शक्तिशाली होकर उभर रही थी। इन जुरचेन लोगों ने आगे चलकर 'क्विंग' (Qing) राजवंश की स्थापना की और मिंग साम्राज्य के वर्चस्व को समाप्त करने के लिए उसके खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। वर्ष १६२७ में मंचू सेना ने मिंग के साथ कोरिया के संबंधों को तोड़ने और अपनी पीठ सुरक्षित करने के उद्देश्य से पहली बार कोरिया पर आक्रमण किया। इतिहास में इस घटना को 'प्रथम मंचू आक्रमण' या 'जियोंगमायो होरान' (Jeongmyo Horan) कहा जाता है। उस समय कोरिया के सिंहासन पर राजा इनजो (King Injo) विराजमान थे। यह युद्ध बहुत दिनों तक नहीं चला और अंततः दोनों पक्षों के बीच एक अस्थायी संधि हो गई। कोरिया ने ऊपरी तौर पर मंचू शासकों के साथ शांति स्थापित कर ली, लेकिन कोरियाई लोगों के दिलों में मिंग राजवंश के प्रति सच्ची निष्ठा और प्रेम अटूट बना रहा।
अगले कुछ वर्षों में पूर्व एशिया का राजनीतिक वातावरण और अधिक जटिल तथा तनावपूर्ण हो गया। कोरिया गुप्त रूप से मिंग साम्राज्य को सामरिक सहायता और कूटनीतिक समर्थन देता रहा तथा मंचू लोगों को सांस्कृतिक रूप से "बर्बर" और अनपढ़ मानता रहा। कोरिया का यह रवैया और गुप्त सहयोग होंग ताईजी को अत्यधिक असंतुष्ट और क्रुद्ध कर गया। वह चाहते थे कि कोरिया मिंग से अपने सभी संबंध पूरी तरह तोड़ ले और आधिकारिक रूप से क्विंग साम्राज्य की अधीनता स्वीकार करे। इसी के परिणामस्वरूप १६३६ में होंग ताईजी ने एक विशाल, सुसज्जित और अनुशासित सेना के साथ कोरिया पर पुनः आक्रमण कर दिया। यह इतिहास का 'द्वितीय मंचू आक्रमण' या 'ब्योंगजा होरान' (Byeongja Horan) कहलाता है। यह आक्रमण अत्यंत सु नियोजित, तीव्र और विनाशकारी था। क्विंग सेना ने कोरियाई रक्षा पंक्तियों को ध्वस्त करते हुए बहुत तेजी से राजधानी हानसिंग (वर्तमान सियोल) की ओर प्रस्थान किया। परिस्थिति की गंभीरता को देखकर राजा इनजो भयभीत हो गए और उन्होंने अपनी सेना तथा दरबारियों के साथ सुदृढ़ पहाड़ी दुर्ग नामहानसानसोंग (Namhansanseong) में शरण ली। वहाँ क्विंग सेना ने दुर्ग को चारों ओर से घेर लिया और राजा कई सप्ताहों तक कड़े घेराबंदी में फंसे रहे। भीषण शीत ऋतु, जमा देने वाली ठंड, दुर्ग के भीतर भोजन और रसद की भारी कमी तथा कोरियाई सेना की घटती शक्ति के कारण दुर्ग के भीतर की स्थिति अत्यंत दयनीय और हृदय विदारक हो गई थी। अंततः १६३७ में कोई अन्य मार्ग न देखकर राजा इनजो को आत्मसमर्पण करने के लिए विवश होना पड़ा।
सैमजोंडो (Samjeondo) नामक स्थान पर राजा इनजो को कड़ाके की ठंड में बर्फ पर घुटने टेककर होंग ताईजी के समक्ष तीन बार माथा टेकने और नौ बार भूमि को चूमने का अपमानजनक अनुष्ठान ('त्रि-जानु नव-प्रणाम') करना पड़ा। यह कोरियाई इतिहास की सबसे दर्दनाक और अपमानजनक घटनाओं में से एक थी, जिसे 'सैमजोंडो का आत्मसमर्पण' (Samjeondo Submission) कहा जाता है। बाद में क्विंग साम्राज्य ने अपनी विजय और शक्ति के प्रतीक के रूप में उसी स्थान पर 'सैमजोंडो स्मारक' (Samjeondo Monument) का निर्माण करवाया, जिस पर चीनी, मंचू और मंगोल भाषाओं में क्विंग की महानता और कोरिया के समर्पण का वृत्तांत उकेरा गया। इस ऐतिहासिक मोड़ के बाद कोरिया आधिकारिक रूप से क्विंग साम्राज्य का एक करद राज्य (tributary state) बन गया। राजा के पुत्रों, जिनमें राजकुमार सोह्योन और राजकुमार ब्योंग्लिम शामिल थे, को बंदी बनाकर बंधक के रूप में मंचूरिया ले जाया गया। केवल राज परिवार ही नहीं, बल्कि लाखों की संख्या में सामान्य कोरियाई नागरिकों को बंदी बनाकर चीन भेज दिया गया। हजारों कोरियाई महिलाएं क्विंग सैनिकों की बर्बरता, बलात्कार और दासता का शिकार हुईं। वर्षों तक गांवों में सन्नाटा छाया रहा, लोग भय के मारे जंगलों और दूरदराज के पहाड़ों में छिपे रहे और कृषि कार्य पूरी तरह ठप हो गया।
युद्ध के समाप्त होने के कई वर्षों बाद तक भी निर्दोष ग्रामीण महिलाओं, युवाओं और कारीगरों को बंधक बनाकर क्विंग साम्राज्य में दास के रूप में बेचा जाता रहा। विजयी क्विंग सेना ने वर्षों तक कोरिया की संपत्ति और संसाधनों की लूटपाट की। महिलाएं, बच्चे और किशोर इस अत्याचार के सबसे बड़े शिकार बने। जो कोरियाई महिलाएं किसी प्रकार चीन के बंदीगृहों से छूटकर या भागकर वापस अपने देश लौटीं, उन्हें समाज ने सहर्ष स्वीकार नहीं किया। समाज ने अत्याचार सह चुकी इन निष्पाप महिलाओं को 'ह्वानह्यांगन्यो' (वापस लौटी महिलाएं) कहकर बहिष्कृत कर दिया, जो कोरियाई समाज के नैतिक पतन और गहरे सामाजिक आघात को दर्शाता था। दूसरी ओर, जो कोरियाई पुरुष दास बनाए गए थे, यदि वे भागने का प्रयास करते हुए पकड़े जाते तो सजा के तौर पर उनके पैर की एड़ी की नस (Achilles tendon) काट दी जाती थी ताकि वे जीवन भर लंगड़ाते रहें और दोबारा भाग न सकें। अनेक कोरियाई बंदी पुरुषों को क्विंग शासकों ने अन्य राज्यों के विरुद्ध अपने युद्धों में आगे की पंक्तियों में चारे की तरह इस्तेमाल किया।
इस पराजय ने कोरियाई राष्ट्रीय स्वाभिमान को चूर-चूर कर दिया और उनकी सैन्य तथा प्रशासनिक व्यवस्था की खोखली नींव को उजागर कर दिया। फिर भी, कोरियाई समाज ने एक अद्भुत मनोवैज्ञानिक मार्ग अपनाया। बाह्य रूप से उन्होंने क्विंग राजवंश को अपना स्वामी स्वीकार कर लिया, लेकिन अपने मन और सांस्कृतिक चेतना में वे हमेशा मिंग राजवंश के प्रति वफादार रहे। इतिहास में इस अनोखी स्थिति को 'द्वि-निष्ठा' (dual loyalty) या 'छद्म अधीनता' कहा जाता है। जोसोन पर क्विंग का यह आक्रमण केवल एक क्षेत्रीय युद्ध नहीं था, बल्कि इसने सम्पूर्ण पूर्व एशिया के शक्ति संतुलन को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। इसके बाद क्विंग राजवंश ने मिंगों को परास्त कर पूरे चीन पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। कोरिया के लिए यह घटना राजनीतिक यथार्थवाद और विदेशी संबंधों में अत्यधिक सावधानी बरतने का एक कठोर पाठ बनी। इस युद्ध ने कोरिया को राजनीतिक रूप से भले ही कमजोर और नम्र कर दिया हो, लेकिन सांस्कृतिक रूप से उसने उनकी राष्ट्रीय पहचान और आत्मसम्मान को और अधिक दृढ़ बना दिया। इस ऐतिहासिक त्रासदी की गूंज आज भी कोरियाई साहित्य, सिनेमा और 'माई डिएरेस्ट' (My Dearest) तथा 'द फोर्ट्रेस' (The Fortress) जैसी प्रसिद्ध रचनाओं व धारावाहिकों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
अब मन में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या जोसोन साम्राज्य ने क्विंग के इस भीषण अपमान और अत्याचार का कभी कोई सैन्य प्रतिशोध लिया? इसका सीधा और स्पष्ट उत्तर "नहीं" है, फिर भी यह उत्तर पूरा सच नहीं दर्शाता। सत्रहवीं शताब्दी के उस विनाशकारी युद्ध के बाद कोरिया की आर्थिक, सैन्य और सामाजिक स्थिति अत्यंत जर्जर हो चुकी थी। उनकी सैन्य शक्ति नष्ट हो चुकी थी, खजाना खाली था और जनता का मनोबल पूरी तरह टूट चुका था। इसके विपरीत, क्विंग राजवंश दिन-प्रतिदिन अपनी शक्ति के चरम पर पहुँच रहा था और सम्पूर्ण चीनी महाद्वीप का निर्विवाद स्वामी बन चुका था। ऐसी स्थिति में प्रत्यक्ष सैन्य आक्रमण करके प्रतिशोध लेना आत्महत्या के समान था, इसलिए कोरियाई राज्य ने कभी ऐसा प्रत्यक्ष सैन्य दुस्साहस नहीं किया।
इसके बावजूद, प्रतिशोध की ज्वाला कोरियाई लोगों के हृदयों में पूरी तरह बुझी नहीं थी। विशेष रूप से राजा ह्योजोंग (King Hyojong), जिन्होंने स्वयं अपने युवाकाल में क्विंग दरबार में एक बंदी के रूप में वर्षों तक अपमान और निर्वासन का जीवन जिया था, के मन में प्रतिशोध की तीव्र भावना जल रही थी। राजा बनने के बाद उन्होंने 'बुकबियोल' (Bukbeol) अर्थात 'उत्तरी अभियान' नाम से एक अत्यंत गुप्त और महत्वाकांक्षी योजना बनाई। इस योजना का मुख्य उद्देश्य गुप्त रूप से सेना का पुनर्गठन करना, आधुनिक हथियारों का निर्माण करना, किलों को मजबूत करना और सही समय आने पर क्विंग साम्राज्य पर हमला करके मिंगों के पतन का बदला लेना और कोरिया के अपमान को धोना था। राजा ह्योजोंग ने इस उद्देश्य के लिए अपने योग्य मंत्रियों के साथ मिलकर रात-दिन मेहनत की। लेकिन परिस्थितियां कभी उनके अनुकूल नहीं हो सकीं। क्विंग साम्राज्य उस समय अपने उत्कर्ष पर था और कोरिया कभी भी इतनी सैन्य क्षमता जुटा ही नहीं सका कि वह इतने बड़े साम्राज्य को चुनौती दे सके। राजा ह्योजोंग की अकाल मृत्यु के साथ ही यह योजना केवल कागजों और विचारों तक सीमित रह गई और कभी व्यावहारिक धरातल पर नहीं उतर सकी।
जब सैन्य प्रतिशोध असंभव सिद्ध हुआ, तो कोरियाई विचारकों और विद्वानों ने एक भिन्न और अधिक सूक्ष्म मार्ग चुना, जो था सांस्कृतिक प्रतिरोध और वैचारिक श्रेष्ठता का मार्ग। कोरिया के नव-कन्फ्यूशियस विद्वानों और शासकों ने स्वयं को "सच्ची चीनी सभ्यता और कन्फ्यूशियस मूल्यों का एकमात्र संरक्षक" घोषित कर दिया। इस विचारधारा को 'सोझुंगवा' (Sojunghwa) अर्थात 'लघु चीन' की अवधारणा कहा जाता है। कोरियाई लोगों का मानना था कि मिंग राजवंश के पतन के साथ ही असली चीनी सभ्यता समाप्त हो गई है और चूंकि क्विंग शासक मंचू जाति के "बर्बर" लोग हैं, इसलिए वे सांस्कृतिक रूप से नीच हैं। इस प्रकार कोरियाई लोगों ने बाहर से क्विंग सम्राटों को नजराना और औपचारिक सम्मान दिया, लेकिन अपने भीतर उनके प्रति अगाध घृणा, उपेक्षा और सांस्कृतिक श्रेष्ठता का भाव बनाए रखा।
यह मनोभाव मिंग राजवंश के प्रति उनकी अटूट निष्ठा से सिद्ध होता है। मिंगों के पतन के सदियों बाद भी कोरियाई विद्वान अपने निजी पत्रों, वंशवृक्षों और धार्मिक अनुष्ठानों में मिंग साम्राज्य के कैलेंडर (मिंग पंचांग) का उपयोग करते रहे, मिंग कालीन पारंपरिक पोशाकें पहनते रहे और मिंग सम्राटों की याद में गुप्त रूप से वेदियां बनाकर पूजा-अर्चना करते रहे। यह कोरियाई लोगों का एक प्रकार का सांस्कृतिक प्रतिशोध था, जिसके माध्यम से उन्होंने क्विंग के सांस्कृतिक प्रभाव को अपने मन से कभी स्वीकार ही नहीं किया। इस व्यावहारिक और चतुर नीति को 'द्वि-स्तरीय नीति' कहा जाता है, जिसने कोरिया को उस कठिन कालखंड में अपनी सांस्कृतिक पहचान और अस्तित्व को बचाए रखने में सहायता की।
कोरियाई जनता पर अत्याचार करने वाले क्विंग साम्राज्य का अंत भी अंततः पतन के रूप में हुआ। जिस क्विंग साम्राज्य ने सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में सैन्य और राजनीतिक मोर्चे पर अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की थी, अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से उसके भीतर भ्रष्टाचार, प्रशासनिक शिथिलता और पतन के कीड़े लगने लगे। उन्नीसवीं शताब्दी तक आते-आते क्विंग साम्राज्य आंतरिक और बाह्य संकटों के जाल में पूरी तरह उलझ गया। आंतरिक रूप से अधिकारियों का भ्रष्टाचार चरम पर था, करों के बोझ से किसान परेशान थे और अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि के कारण संसाधन कम पड़ गए थे। इसके परिणामस्वरूप चीन में 'ताइपिंग विद्रोह' और 'बॉक्सर विद्रोह' जैसे भीषण और रक्तरंजित जनांदोलन हुए, जिन्होंने क्विंग साम्राज्य की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी।
बाहरी मोर्चे पर पश्चिमी औपनिवेशिक शक्तियों, विशेषकर ब्रिटेन और फ्रांस ने 'प्रथम और द्वितीय अफीम युद्धों' के माध्यम से चीन को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया और उस पर कई अपमानजनक असमान संधियां थोप दीं। इसके बाद सबसे बड़ा आघात 'प्रथम चीन-जापान युद्ध' (1894-1895) के रूप में आया, जिसमें छोटे से आधुनिक देश जापान ने विशाल क्विंग साम्राज्य की सेना को शर्मनाक तरीके से पराजित कर दिया। इस पराजय ने सम्पूर्ण विश्व के सामने यह उजागर कर दिया कि क्विंग साम्राज्य अब केवल एक कागजी शेर बनकर रह गया है।
चीन के इस पतन का सीधा और गहरा प्रभाव जोसोन राजवंश पर पड़ा। जोसोन लंबे समय से बाहरी दुनिया से अलग-थलग रहकर एक 'एकांतवासी राज्य' (Hermit Kingdom) के रूप में जी रहा था। लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में पश्चिमी शक्तियों और जापान ने कोरिया पर अपने बंदरगाह खोलने और व्यापारिक संधियां करने का भारी दबाव बनाया। जब क्विंग साम्राज्य स्वयं कमजोर हो गया, तो कोरिया ने अपना वह पारंपरिक रक्षक भी खो दिया जिसके साए में वह सदियों से सांस ले रहा था। प्रथम चीन-जापान युद्ध में चीन की हार के बाद कोरिया पर क्विंग का सदियों पुराना प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो गया, लेकिन इसके बदले जापान ने कोरिया को अपने शिकंजे में कसना शुरू कर दिया। इसका अंतिम और अत्यंत दुखद परिणाम यह हुआ कि १९१० में जापान ने कोरिया को पूरी तरह हड़प लिया और अपने साम्राज्य में मिला लिया। इसके साथ ही ५०० वर्षों से अधिक पुराने जोसोन राजवंश का अंत हो गया और कोरियाई जनता जापानी औपनिवेशिक क्रूरता के अधीन हो गई।
यद्यपि १९४५ में द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की पराजय के साथ कोरिया को जापानी गुलामी से मुक्ति मिली, लेकिन शीत युद्ध की वैश्विक राजनीति के कारण ३८वें अक्षांश रेखा पर कोरिया को दो भागों में विभाजित कर दिया गया, जिसका उत्तरी भाग सोवियत संघ के प्रभाव में और दक्षिणी भाग अमेरिका के प्रभाव में चला गया। फिर भी, लगभग तीन सौ से अधिक वर्ष बीत जाने के बाद भी, आज उत्तर और दक्षिण दोनों कोरिया के लोग क्विंग और जापानी आक्रांताओं को अपने इतिहास के सबसे क्रूर दुश्मनों के रूप में याद रखते हैं। विशेष रूप से दक्षिण कोरिया ने आधुनिक साहित्य, सिनेमा और टेलीविजन धारावाहिकों के माध्यम से इन ऐतिहासिक त्रासदियों को जीवंत रखा है ताकि नई पीढ़ी अपने पूर्वजों के संघर्षों और बलिदानों को कभी न भूले। कोरियाई समाज में जापानी शासन और क्विंग आक्रमणकारियों के प्रति ऐतिहासिक रोष आज भी उनकी राष्ट्रीय चेतना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अब यदि हम पूर्व एशिया के इस कोरियाई इतिहास की तुलना भारतीय उपमहाद्वीप में ओडिशा के इतिहास से करें, तो हमें जोसोन पर क्विंग और जापानी आक्रमणों तथा ओडिशा पर मुगल, पठान और बर्गी मराठा आक्रमणों के बीच एक आश्चर्यजनक और दुखद समानता दिखाई देती है। जिस प्रकार क्विंग और जापानी आक्रमणों के दौरान कोरियाई जनता को अकथनीय शारीरिक, मानसिक और सामाजिक यातनाएं सहनी पड़ी थीं, ठीक उसी प्रकार ओडिशा के इतिहास में भी मुगल और मराठा आक्रमणों का कालखंड अत्यंत काले और खूनी अध्यायों के रूप में दर्ज है। सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ओडिशा के अंतिम स्वाधीन हिंदू सम्राट गजपति मुकुंद देव के पतन के बाद मुगल और बंगाली पठानों ने ओडिशा पर बारंबार आक्रमण किए। इन आक्रांताओं ने ओडिशा की धन-संपदा को लूटा, स्थापत्य कला के बेजोड़ उदाहरण रहे अनेक प्राचीन मंदिरों को ध्वस्त किया, मूर्तियों को खंडित किया और स्थानीय महिलाओं के साथ भारी बर्बरता की। उन्होंने ओडिशा की उपजाऊ भूमियों पर अधिकार करके अपने सैन्य ठिकाने और पठान बस्तियां स्थापित कर लीं।
मुगलों के पतन के बाद अठारहवीं शताब्दी के मध्य में ओडिशा में मराठा शासन का आगमन हुआ। मराठा सरदारों ने ओडिशा से राजस्व वसूलने और बंगाल पर दबाव बनाने के लिए 'बर्गी' नाम से प्रसिद्ध अपनी अनियंत्रित और आक्रामक घुड़सवार सेना को ओडिशा के गांवों में भेज दिया। इन बर्गी लुटेरों का अत्याचार इतना भयानक और निर्दयी था कि वे गरीब ग्रामीणों के घरों से तांबे और पीतल के बर्तन तक छीन लेते थे। बर्गी सैनिकों के भय से ओडिशा के साधारण लोग अपने पक्के मकान बनाने से डरने लगे और स्वयं को निर्धन दिखाने के लिए कच्चे घास-फूस के छप्परों में रहने लगे। जब भी बर्गी सेना के आने की सूचना मिलती, पूरे के पूरे गांव खाली हो जाते थे, किसान अपनी खड़ी फसलें छोड़कर घने जंगलों में भाग जाते थे, जिससे कृषि पूरी तरह नष्ट हो गई और ओडिशा की समृद्ध अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई।
मराठा शासकों ने पुरी के प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर में आने वाले तीर्थयात्रियों पर भारी 'यात्री कर' लगा दिया, जिससे दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं का शोषण हुआ। इसके अतिरिक्त, ओडिशा के स्थानीय राजाओं और गढ़जात (पहाड़ी रियासतों) के सामंतों से जबरन दो से तीन गुना अधिक 'चौथ' और 'सरदेशमुखी' कर वसूला जाता था। कर न देने पर मराठा सैनिक राजाओं को बंदी बना लेते थे और उनकी प्रजा पर अत्याचार करते थे। विशेष रूप से गढ़जात क्षेत्रों में बर्गी लुटेरों का आतंक इतना अधिक था कि आज भी ओडिशा के लोक साहित्य और बच्चों की लोरियों में बर्गी अत्याचारों की भयावह यादें सुरक्षित हैं।
यदि हम सूक्ष्मता से देखें तो ओडिशा और कोरिया की इन त्रासदियों में गहरे साम्य बिंदु मिलते हैं। दोनों ही क्षेत्रों में युद्ध और आक्रमण का सबसे बड़ा नुकसान वहां की आम निर्दोष जनता को उठाना पड़ा। महिलाएं, बच्चे, वृद्ध और कृषक वर्ग लूटपाट, यौन उत्पीड़न, भुखमरी और बंदी बनाए जाने के सबसे बड़े शिकार बने। दोनों ही देशों के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को इन बाहरी हमलों ने छिन्न-भिन्न कर दिया और कई दशकों तक सामान्य जीवन पटरी पर नहीं आ सका। दोनों ही समाजों के अवचेतन मन में भय, अपमान और आक्रोश की एक गहरी परत जमा हो गई।
तथापि, इन दोनों ऐतिहासिक घटनाओं के बीच कुछ बुनियादी और महत्वपूर्ण अंतर भी थे। कोरिया भले ही क्विंग साम्राज्य का एक करद राज्य बन गया था, लेकिन क्विंग शासकों ने कोरिया के आंतरिक प्रशासन में सीधा हस्तक्षेप नहीं किया। जोसोन के राजा अपने देश के भीतर शासन चलाते रहे, अपनी न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र को बनाए रखा, जिससे कोरिया को एक सीमित स्वायत्तता प्राप्त थी। इसके विपरीत, ओडिशा में मुगल शासन और उसके बाद मराठा शासन पूरी तरह से प्रत्यक्ष और औपनिवेशिक प्रकृति का था। ओडिशा के स्थानीय राजाओं की शक्ति छीन ली गई थी और वे केवल नाममात्र के शासक रह गए थे। ओडिशा में राजनीतिक अस्थिरता, प्रशासनिक अराजकता और बाहरी सूबेदारों का शोषण कोरिया की तुलना में कहीं अधिक प्रत्यक्ष और विनाशकारी था।
परंतु, इस पूरे तुलनात्मक अध्ययन का सबसे दुखद और विचारणीय पहलू यह है कि इन दो जातियों ने अपनी ऐतिहासिक त्रासदियों और घावों को अपनी आधुनिक चेतना में किस प्रकार संजो कर रखा है। कोरियाई लोगों ने मंचू और जापानी आक्रमणों के दौरान झेले गए अपने अपमान और दुखों को कभी नहीं भुलाया। उन्होंने अपने इस दर्दनाक अतीत को छिपाने के बजाय उसे अपनी राष्ट्रीय शक्ति और स्वाभिमान का आधार बना लिया। आधुनिक दक्षिण कोरिया ने अपनी इस ऐतिहासिक त्रासदी को कला और मनोरंजन जगत के माध्यम से पूरी दुनिया के सामने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। 'द फोर्ट्रेस' (The Fortress), 'द नाइट आउल' (The Night Owl), 'द स्वॉर्ड्समैन' (The Swordsman), 'मॉन्स्ट्रम' (Monstrum), 'वॉर ऑफ द एरोज' (War of the Arrows), और 'रैम्पेंट' (Rampant) जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर की फिल्मों तथा 'द थ्री मस्कटियर्स' (The Three Musketeers), 'माई डिएरेस्ट' (My Dearest), 'क्रुएल पैलेस: वॉर ऑफ फ्लावर्स', 'स्प्लेंडिड पॉलिटिक्स', 'इल्जीमे', 'द स्लेव हंटर्स' और 'कैप्टिवेटिंग द किंग' जैसे प्रसिद्ध धारावाहिकों में क्विंग आक्रमणों के समय की कोरियाई जनता की पीड़ा, संघर्ष और वीरता को बड़े ही मार्मिक ढंग से फिल्माया गया है। इसके अलावा केबीएस (KBS) जैसे राष्ट्रीय चैनलों के ऐतिहासिक वृत्तचित्रों और विशेष कार्यक्रमों में 'ब्योंगजा होरान' के हर एक पहलू को प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत किया जाता है।
इसके विपरीत, ओडिशा की स्थिति अत्यंत दयनीय और चिंताजनक है। कुछ प्राचीन काव्य ग्रंथों और मुट्ठी भर ऐतिहासिक पुस्तकों को छोड़ दें, तो ओडिशा का समाज मुगल और मराठा बर्गी आक्रमणकारियों के अत्याचारों और अपनी पूर्वजों के संघर्षों को पूरी तरह से भुला चुका है। न तो उड़िया सिनेमा (ऑलीवुड) के बड़े पर्दे पर और न ही टेलीविजन के छोटे पर्दे पर ओडिशा पर हुए मराठा और बर्गी आक्रमणों की क्रूरता और उड़िया जनता के साहसिक प्रतिरोध की गाथाओं को कभी सही ढंग से नाटकीय रूप में प्रस्तुत किया गया। इस घोर बौद्धिक निष्क्रियता और ऐतिहासिक विस्मृति का परिणाम यह हुआ है कि आज ओडिशा का एक सामान्य नागरिक इतिहास के सत्य से पूरी तरह कट चुका है।
आज स्थिति यह है कि अनेक सामान्य उड़िया लोग मराठा बर्गी लुटेरों को इतिहास की सही जानकारी न होने के कारण "हिंदू धर्म का रक्षक" मानने की भूल कर बैठते हैं। कुछ लोगों में यह भ्रांति फैला दी गई है कि बर्गी मराठा सैनिक नहीं बल्कि पठान थे, जबकि ऐतिहासिक सच यह है कि बर्गी मराठा साम्राज्य की ही एक नियमित घुड़सवार टुकड़ी थी जिसने बंगाल और ओडिशा में भारी तबाही मचाई थी। ओडिशा के कुछ तथाकथित अल्पज्ञानी बुद्धिजीवी और इतिहासकार यह तर्क भी देते हैं कि मराठों ने ओडिशा को पठानों से बचाया था और कई जन कल्याणकारी कार्य किए थे, जबकि उस काल के समकालीन उड़िया साहित्य (जैसे 'समर तरंग') और अभिलेख स्पष्ट रूप से बर्गी लुटेरों की क्रूरता की गवाही देते हैं। अपने ही इतिहास के प्रति ऐसी भ्रामक धारणाएं और उदासीनता उड़िया जाति के स्वाभिमान और राष्ट्रीय चेतना के लिए एक बहुत बड़ा आघात हैं। इतिहास को भूल जाने के इस दुष्परिणाम स्वरूप ओडिशा आज अपनी वीरता, बलिदान और दुखों की वास्तविक गाथाओं को अपनी ही नई पीढ़ी तक पहुँचाने में पूरी तरह विफल रहा है।
कोरिया अपने अपमान और पराजय के इतिहास को भी अपनी फिल्मों और नाटकों में पूरी नग्नता और सत्यता के साथ दिखाकर आने वाली पीढ़ियों के लिए देशभक्ति और सतर्कता की प्रेरणा प्राप्त कर रहा है, जबकि उड़िया जाति अपने ऐतिहासिक घावों को याद करना तो दूर, अपने ही शोषकों और लुटेरों का महिमामंडन करने में व्यस्त है। कोरिया और ओडिशा के इतिहास के ये दो समानांतर पृष्ठ हमें एक अत्यंत कठोर और महान सत्य सिखाते हैं—"जो जाति अपने इतिहास के घावों, अपने पूर्वजों के बलिदानों और अपने वास्तविक शत्रुओं को पहचानने में विफल रहती है, वह धीरे-धीरे अपनी राष्ट्रीय पहचान और स्वाभिमान खो बैठती है।"
कोरिया ने अपने सांस्कृतिक प्रतिरोध, अडिग वैचारिक निष्ठा और आधुनिक साहित्य व सिनेमा के माध्यम से स्वयं को विश्व मंच पर एक अत्यंत स्वाभिमानी, जागृत और गौरवशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित किया है। उन्होंने अपने दर्दनाक अतीत को भुलाया नहीं, बल्कि उसे अपने आत्मसम्मान की ढाल और भविष्य की सतर्कता का हथियार बना लिया। दूसरी ओर, ओडिशा को आज अपनी गहरी सांस्कृतिक और बौद्धिक निद्रा से जागना होगा। मुगल और मराठा आक्रमणों के इतिहास को केवल पुरानी पांडुलिपियों या इतिहास की धूल भरी किताबों के कुछ पन्नों तक सीमित न रखकर, आधुनिक उड़िया सिनेमा, नाटकों, वृत्तचित्रों, शोध पत्रों और आधुनिक साहित्य के माध्यम से इस सत्य को निर्भीकता से समाज के सामने लाना होगा। बर्गी अत्याचारों की गाथा और जगन्नाथ संस्कृति की रक्षा के लिए उड़िया राजाओं व प्रजा के संघर्ष की कहानी को केवल कुछ संदर्भ ग्रंथों में बंद न रखकर, उड़िया अस्मिता के एक प्रामाणिक और जीवंत दस्तावेज के रूप में जन-जन तक पहुँचाना अनिवार्य है।
यह सच है कि क्विंग और जापानी आक्रमणों ने कोरिया को भौगोलिक और राजनीतिक रूप से भले ही कमजोर कर दिया था, लेकिन उन त्रासदियों ने कोरिया को सांस्कृतिक और मानसिक रूप से सर्वथा अजेय बना दिया। ओडिशा ने भी मुगलों और मराठों के अकथनीय अत्याचारों, मंदिर भंजन और आर्थिक शोषण के बावजूद अपनी महान जगन्नाथ संस्कृति, अपनी समृद्ध भाषा और उड़िया स्वाभिमान की लौ को आज तक बुझने नहीं दिया है। अपने पूर्वजों के इस महान संघर्ष, पीड़ा और विजय की गाथा को बिना किसी हिचकिचाहट के modern माध्यमों द्वारा सही और यथार्थ रूप में दुनिया के सामने प्रस्तुत करना ही हमारे पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी, और यही मार्ग उड़िया राष्ट्रीय स्वाभिमान को पुनः पुनर्जीवित करने का एकमात्र संबल सिद्ध होगा।