जम्मु कश्मीर ! नजाने किस मनहुस घडी मेँ भारत मेँ बिलय हुआ था जिसका सजा आज भी भारत भुगत रहा है ! मेँ उन सेकुलार किडोँ को अपने इस लेख द्वारा पुछना चाहुँगा की आप लोगोँ को वावरी कांड तो याद है पर आजादी मेँ तोफे मेँ मिला लाशोँ से भरा ट्रेन क्युँ याद नहीँ, वो 10 लाख औरतोँ का वलात्कार याद नहीँ और हिन्दु पंडितोँ पर हुआ अत्याचार क्युँ याद नहीँ आता ! क्या इस देश मेँ सहन करने का ठेका सिर्फ हिन्दुओँ नेँ ले रखा है ? और मुस्लीम क्युँ की अल्प संख्यक (21 करोड हो कर भी अल्पसंख्यक ?) हर सच्चा हिन्दोस्तानी मुसलमान कीतने इमानदार है ये अछी तरह जानता है । गुरु गोविंद सिंह जी को भी ऐन मौके पर पठान सैनिकोँ नेँ धोका दे कर गद्दार जय सिँह के साथ हो लिये थे । जिन्ना जिसे पाकिस्तानी "कायदे आजम" कहते फिरते सबसे बड़ा धोकेवाज निकला ।और आज अगर भारत मेँ हिन्दुँ मुसलमान आपस मेँ लढ मर रहे है इसका सिर्फ एक ही व्यक्ति जिम्मेदार है और वो है ये जिन्ना । 20वीँ सदी मेँ कौमी हिँसा फैलाने वाले माष्टर माईन्ड कोई और नहीँ यही जिन्ना थे । भारत मेँ हिन्दु वहुमत है इसलिये सेकुलार है नहीँ तो कब का मुस्लीम राष्ट्र बन चुका होता । तो ये सेकुलार और निरपेक्ष होने के ढ़ोगँ छोडो क्युँ की गीता मेँ भगवान श्रीकृष्ण नेँ भी कहा है इस दुनिया मेँ कोई निरपेक्ष नहीँ है । मेँ भी सदा धर्म के पक्ष मेँ रहता हुँ क्युँ की जहाँ धर्म वहाँ सत्य । इसलिये हे अर्जुन तुम धर्म मेँ स्थित हो कर धर्म युद्ध करो मेँ सदा तुम्हारे साथ रहुगां ।। जय हिन्दु जय हिन्दुस्तान ।।
मेँ अपने मन का दास कलम का कर्मचारी हुँ जो मन मेँ आया लिखदिया । कोई पागल कहे तो मुझे क्या ? कहता है तो कहने दो ।।
ब्लॉग आर्काइव
सोमवार, 13 अक्टूबर 2014
दादामुनि कि पहली फिल्म जीवन नैया से जुड़ी कुछ यादेँ.....
दादामुनि के नाम से जानेजानेवाले अशोककुमार जी का पहला फिल्म था "जीवन नैया" ! फिल्म तो रिलिज हो गयी पर इस से उनके जीवन मेँ बहुत बड़ा भुचाल आ गया । उन दिनोँ उनका रिस्ता भागलपुर मेँ बहुत बड़े घराने मेँ होने जा रहा था । लेकिन इस फिल्म को देखने के बाद लड़कीवालोँ ने यह कहकर रिस्ता ठुकरा दिया कि "हम नौटकीँ मेँ काम करनेवाले भाण्डो से अपनी बेटी का रिस्ता नहीँ होने देगेँ ।
इधर अशोककुमार जी के पिता भी वौखलाये हुए थे उन्हे समझाबुझाकर फिल्म दिखाया गया तो वो और भड़कगये । उन्होने पुछा ये क्या तुम पराई औरत (देविकारानी) के साथ नाच गा रहे हो ?
दादामुनी नेँ कहा कि ये सब नाटक है और यह औरत पहले से शादीशुदा है(बिमल रोय से) ।
उनके पिता काफि नाराज हुए और दादामुनि अशोक कुमार चुप रहे ।
उनका अगला फिल्म था अछुत कन्या ! इसमेँ कुछ रोमान्टिक सिन्स सुट होनेवाला था पर अशोक कुमार नेँ इसे सुट करने से मनाकरदिया बाद मेँ उन्हे समझाबुझाकर फिल्म सुट किया गया । अछुत कन्या से अशोक कुमार मशहुर हुए और बाद मेँ उनका रिस्ता एक बहुत घराने मेँ तय किया गया ।
इधर अशोककुमार जी के पिता भी वौखलाये हुए थे उन्हे समझाबुझाकर फिल्म दिखाया गया तो वो और भड़कगये । उन्होने पुछा ये क्या तुम पराई औरत (देविकारानी) के साथ नाच गा रहे हो ?
दादामुनी नेँ कहा कि ये सब नाटक है और यह औरत पहले से शादीशुदा है(बिमल रोय से) ।
उनके पिता काफि नाराज हुए और दादामुनि अशोक कुमार चुप रहे ।
उनका अगला फिल्म था अछुत कन्या ! इसमेँ कुछ रोमान्टिक सिन्स सुट होनेवाला था पर अशोक कुमार नेँ इसे सुट करने से मनाकरदिया बाद मेँ उन्हे समझाबुझाकर फिल्म सुट किया गया । अछुत कन्या से अशोक कुमार मशहुर हुए और बाद मेँ उनका रिस्ता एक बहुत घराने मेँ तय किया गया ।
अंधविश्वास हि धर्म को मार सकता हे.....
हमेँ उन मान्यताओँ को मानना चाहिये जो विज्ञान सम्मत हो जैसे देवी काम क्रोध मोह माश्चर्य और अहंकार का बलि चाहति हे और यह सब दुर्गुण आ जाने पर इंसान पशु बन जाता हे । लेकिन बाद मेँ लोगोँ नेँ श्लोक और धर्मवाक्योँ का गलत मतलब निकालकर स्वार्थ साधन मेँ लग गये जिससे पृथ्वी मेँ अधर्म बढ़गया और आज से करिबन 3600 साल पहले महाभारतकाल मेँ पृथ्वी 3 डिग्री उत्तर कि और ढ़लगया जिससे अरव और उत्तर अफ्रिका मेँ साहारा मरुस्तल बनगया ।(अरव मेँ पहले अरवी घोडे मिलते थे जो काफी मजवुत और ताकतवर होते थे....शोधकर्ताओँ को मध्यप्राच्य से कई जीवोँ के अवशेष मिलेँ जो साबित करता हे कि कभी अरव और साहारा मरुस्थल हराभरा था )बाद मेँ अरव मेँ बचेहुए लोगोँ मेँ 1000 वर्षखंड मेँ अंधविश्वास इतना फैला कि लोग धीरे धीरे जोराष्टर धर्म (संभवत: यह धर्म राक्षसोँ का होगा क्युँ कि पुराने लेखोँ मेँ राक्षस वेद के वारे मेँ वताया गया हे और जोराष्टर धर्म ग्रथों मेँ ज्यादातर भुत प्रेत और राक्षसी विद्याओँ का वर्नन हे ...आगे चलकर इस धर्म से इहुदी और इस्लाम धर्म बना और इहुदी धर्म से ईसाई धर्म ) को छोडकर नये धर्म बनाने लगे । अंधविश्वास हि धर्म को मार देता हे और आज जोराष्टर धर्म लुप्त हो गया हे और इससे प्ररित 3 नये धर्म आ गये । असल मेँ सारे धर्मोँ मेँ तत्व एक हे परंतु अलग अलगा भाषा , प्रांत और अलगाववाद के वजह से हमेँ वो दिखनहीँ पाता ।
शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014
गजानन माधव मुक्तिवोध..... एक परिचय !
13 नवेम्बर 1917 मेँ मध्यप्रदेश के ग्वालियर सहर नजदिक जन्मेँ गजानन माधव मुक्तिवोध जी सिर्फ 46 वर्षोँ तक जीँदा रहे पर इन 46 वर्षोँ मेँ उन्होने आधुनिक हिँदी साहित्य को एक नया मोड़ दिया । उनके पिता पोलिस विभाग मेँ इंस्पेक्टर थे और उनकी बारबार बदली से मुक्तिवोध जी को काफि परेशानीओँ का सामना करना पड़ा । 1930 मेँ उजैन से मीडल कि परीक्षा दिया पर विफल हुए । उनकी प्रख्यात कविता "अंधेरे मेँ" को आधुनिक हिँदी कविता मेँ माष्टरपिस कहाजाता है । 1957 मेँ उन्होने यह काव्य लिखना शुरुकिया और 1964 मेँ उनके मृत्यु पश्चात यह प्रकाश मेँ आया । आज भी इस ग्रंथ पर प्रगतिशील कवि समाज मेँ मतान्तर देखने को मिलता है । कई प्रकार के भावनाओँ से वहति इस कविता मेँ मुक्तिवोध जी नेँ आजादी बाद नया सपनाओँ के बीच ब्याप्त अराजकता और अंधकार कि बात करते है । अंधेरे मेँ कि तरह उनका ब्रह्मराक्षस नामक कविता भी काफि लोकप्रिय हुआ एबं इस कविता का नाट्यरुपान्तरण भी किया गया था । कहाजाता हे कि मुक्तिवोध पर दोस्तोयेवेस्की ,लियो टॉल्सटोय और मेक्सिम् गोर्की आदिओँ का बौधिक प्रभाव पड़ा था और शायद इसलिये उनके साहित्य रचनाओँ मेँ समाजवाद दिखजाता है ।
उन्होने स्वयं दो पुस्तकोँ का प्रकाशन किया था 1.कामायनी एक पुर्नविचार और 2.भारतीय इतिहास एबं संस्कृति विषय पर एक पाठ्य पुस्तक ।
वे अचेतन अवस्था मेँ लकवाग्रस्त हो गये थे तभी उनका एक पुस्तक प्रकाशित हुआ "एक साहित्य कि डायरी" । "अंधेरे मेँ" और "चाँद का मुँह तेढ़ा" आदि कुछ कविता उनके मृत्यु के पश्चात प्रकाशित हुआ था । उनकी अन्य एक काव्य संग्रह "भुरी भुरी खाक धुल" भी लोगोँ के द्वारा आदृत हुआ । उनकी तमाम सर्जन मुक्तिवोध रचनावली के नाम से 6 खंड़ोँ मेँ प्रकाशित हुआ है । कविता उपराँत उनके द्वारा रचित विवेचन लेख भी जनादृत हुआ जैसे कविता का आत्मसंघर्ष , नये साहित्य का सौँदर्यशास्त्र,समीक्षा कि समस्याएँ आदि । उन्होने काठ का सपना , विपात्र एवं सतह से उठता आदमी नाम से काहानी भी लिखा है । 1981 मेँ मणि कौल नेँ उनकि कहानी सतह से उठता आदमी पर एक फिल्म बनाया था जिसे कान फिल्म फेस्टिवाल मेँ दिखायागया था । 11 सेप्टेम्बर 1964 मेँ सिर्फ 46 वर्ष जिँदा रहनेवाले इस साहित्य साधक नेँ दुनिया को अलविदा कहदिया ।
उन्होने स्वयं दो पुस्तकोँ का प्रकाशन किया था 1.कामायनी एक पुर्नविचार और 2.भारतीय इतिहास एबं संस्कृति विषय पर एक पाठ्य पुस्तक ।
वे अचेतन अवस्था मेँ लकवाग्रस्त हो गये थे तभी उनका एक पुस्तक प्रकाशित हुआ "एक साहित्य कि डायरी" । "अंधेरे मेँ" और "चाँद का मुँह तेढ़ा" आदि कुछ कविता उनके मृत्यु के पश्चात प्रकाशित हुआ था । उनकी अन्य एक काव्य संग्रह "भुरी भुरी खाक धुल" भी लोगोँ के द्वारा आदृत हुआ । उनकी तमाम सर्जन मुक्तिवोध रचनावली के नाम से 6 खंड़ोँ मेँ प्रकाशित हुआ है । कविता उपराँत उनके द्वारा रचित विवेचन लेख भी जनादृत हुआ जैसे कविता का आत्मसंघर्ष , नये साहित्य का सौँदर्यशास्त्र,समीक्षा कि समस्याएँ आदि । उन्होने काठ का सपना , विपात्र एवं सतह से उठता आदमी नाम से काहानी भी लिखा है । 1981 मेँ मणि कौल नेँ उनकि कहानी सतह से उठता आदमी पर एक फिल्म बनाया था जिसे कान फिल्म फेस्टिवाल मेँ दिखायागया था । 11 सेप्टेम्बर 1964 मेँ सिर्फ 46 वर्ष जिँदा रहनेवाले इस साहित्य साधक नेँ दुनिया को अलविदा कहदिया ।
सोमवार, 15 सितंबर 2014
आखरी सुबह
गांधीजी नेँ देश को आजाद करने के लिये कई जात धर्म मेँ बँटा भारत को एक होने का आह्वान किया था । इसलिये सरदार पटेल जवाहरलाल मौलाना आजाद जैसे नेता उनके साथ थे सुभाषजी नेँ आजीवन (?) उनको अपना प्रेरणा माना । उनदिनोँ देश मेँ एक वर्ग ऐसा भी था जिसे गांधीजी द्वारा कियागया निर्णय भाता न था । वे लोग हिँसा के बलपर स्वतंत्रता लाना चाहते थे पर फिर भी गांधीजी कि हत्या कर दिया जायेगा कोई सोच ही नहीँ सकता था । देश स्वतंत्र होने के बाद पूना सहर मेँ सर्वसाधारण सभा मेँ मराठा ब्राम्हण समाज नेँ गाधीँजी पर गम्भीर आरोप लगाया जा रहा था क्युँ की गांधीजी दलित और मुसलमानोँ के लिये कुछ ज्यादा ही प्रयत्न कर रहे थे । उन्ही दिनोँ एक कार्यक्रम के दौरान गाधीँजी पुने आ रहे थे , वहीँ उने मारने की एक योजना बनाया गया था पर ये आयोजन असफल रहा , यह शुरवात था अंत अभी बाकी था । आजादी के बाद गांधीजी द्वारा पाकिस्तान को 54 करोड़ देने को लेकर हुए विवाद से देशभर के युवा दंग थे । वही सरदार सहित ज्यादातर राष्ट्रवादी नेता पाकिस्तान को पाठ पढ़ाने के मुड़ मेँ थे परंतु गांधीजी के कारण उन्हे मजबुर होकर 56 करोड़ लौटाना पड़ा था । उनदिनोँ गाँधीजी नेँ यहाँतक कहदिया था कि वे पाकिस्तान जाकर अपना बाकी जीवन बितादेगेँ ।
नथुराम गोड़से जैसे युवा गांधीजी जी के आचरण देखकर तैश मेँ आ गये थे । कोई करे न करे हमेँ गांधी हत्या करना है इस लक्ष को हासिल करने के लिये नाथुराम गोड़से और नारायण आप्टे के साथ मुस्लीम अन्याय सहन करनेवाले मदनलाळ पहावा,विष्णु करकरे एवं गोपल गड़से नेँ भी साथ दिया था । ये लोग मूर्ख न थे इन्होने काफी स्टड़ी करने के बाद इसे अंजाम दिया । .
૩૦ जानुआरी कि वह आया । शायद गांधीजी को अपने मौत का एहसास हो गया था । उस दिन ओल इंड़िया रेडियो के कर्मचारी गांधीजी के प्राथनासभा कि रेकर्डिगं के लिये पहचंगये थे । सुबह के साढ़े तीन बजे उठे गाधीँजी का दिन मेँ 14-15 घंटे बितने के बाद सरदार उनसे मिलने आये । सरदार जी से मिलने के बाद गांधीजी प्राथनासभा कि और लौट रहे थे । मनु और आभा के साहारे वे आगे बढ़ रहे थे कि एक युवक सामने आया उसने गांधीजी के चरणस्पर्श किया मानोँ अर्जुन भीष्म को शरशया देनेँ से पहले अपने सफल होनेँ का बरदान माँग रहा हो । आभा नेँ आगे आ कर उस युवक को कहा भाई बापु का विलम्भ हो रहा है । उसी वक्त नाथुराम नेँ मनु को धक्का देकर तीन गोली छोड़ दिया । आखरी शब्द "हे राम" के बाद दीप बुझगया । लोग दौड़नेलगे सभी नेताओँ के आंख भीगगये । कहाजाता है गांधीजी के शव यात्रा मे 20 लाख लोग सामिल हुए थे और वे लोग गांधीजी के मौत के बाद भी अन्हे जीँदा देखने की इछा रखते थे ।
नथुराम गोड़से जैसे युवा गांधीजी जी के आचरण देखकर तैश मेँ आ गये थे । कोई करे न करे हमेँ गांधी हत्या करना है इस लक्ष को हासिल करने के लिये नाथुराम गोड़से और नारायण आप्टे के साथ मुस्लीम अन्याय सहन करनेवाले मदनलाळ पहावा,विष्णु करकरे एवं गोपल गड़से नेँ भी साथ दिया था । ये लोग मूर्ख न थे इन्होने काफी स्टड़ी करने के बाद इसे अंजाम दिया । .
૩૦ जानुआरी कि वह आया । शायद गांधीजी को अपने मौत का एहसास हो गया था । उस दिन ओल इंड़िया रेडियो के कर्मचारी गांधीजी के प्राथनासभा कि रेकर्डिगं के लिये पहचंगये थे । सुबह के साढ़े तीन बजे उठे गाधीँजी का दिन मेँ 14-15 घंटे बितने के बाद सरदार उनसे मिलने आये । सरदार जी से मिलने के बाद गांधीजी प्राथनासभा कि और लौट रहे थे । मनु और आभा के साहारे वे आगे बढ़ रहे थे कि एक युवक सामने आया उसने गांधीजी के चरणस्पर्श किया मानोँ अर्जुन भीष्म को शरशया देनेँ से पहले अपने सफल होनेँ का बरदान माँग रहा हो । आभा नेँ आगे आ कर उस युवक को कहा भाई बापु का विलम्भ हो रहा है । उसी वक्त नाथुराम नेँ मनु को धक्का देकर तीन गोली छोड़ दिया । आखरी शब्द "हे राम" के बाद दीप बुझगया । लोग दौड़नेलगे सभी नेताओँ के आंख भीगगये । कहाजाता है गांधीजी के शव यात्रा मे 20 लाख लोग सामिल हुए थे और वे लोग गांधीजी के मौत के बाद भी अन्हे जीँदा देखने की इछा रखते थे ।
रविवार, 10 अगस्त 2014
श्रावण पूर्णिमा विशेष
🙏 👏 आज श्रावण पूर्णिमा है ! देश में हर प्रांत में अलग-अलग रूपों में इसे हर्सोउल्हास के साथ मनायी जाती है ।
1.संपूर्ण भारत मेँ आज रक्षाबंधन का तौहार मनाया जाता है । बहनेँ अपने भाईओँ को राक्षी बांधकर लम्बेँ उम्र कि कामना के साथ अपने रक्षा का वचन भी लेती है ।
2.आज भगवती गायत्री जयंती" भी है। यूं तो श्रावण पूर्णिमा पर ही भगवती गायत्री जी की जयंती कही गयी है, पर गंगा दशहरा के दिन भी इनकी जयंती बतलाई गई है।
3.आज देववाणी संस्कृत दिवस भी है। ऐसी मान्यता है कि देववाणी संस्कृत की उत्पत्ति श्रावणी पूर्णिमा को हुई थी। अतः श्रावण मास की पूर्णिमा को 1969 से संस्कृत दिवस की शुरुआत हुई। इस दिन को इसीलिए चुना गया था कि इसी दिन प्राचीन भारत में शिक्षण सत्र शुरू होता था।
4.श्रावणी पूर्णिमा के दिन बाबा अमरनाथ के दर्शन की भी बडी महिमा है। श्रावण मास का अंतिम दिन है और बाबा बर्फानी के दर्शन हो जाएँ इससे बड़ा सौभाग्य और क्या होगा?
5.श्रावणी पूर्णिमा के दिन श्रवण कुमार का भी पूजन और स्मरण किया जाता है ।
6.आज लव-कुश जयंती भी है। श्रावण पूर्णिमा को ही श्रीरामचंद्र जी व सीता माता के वीर जुड़वां पुत्रों लव और कुश का जन्म हुआ था। उनका जन्म तथा पालन महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में हुआ था। प्रथम बार रामलीला का वाचन इन दोनों के द्वारा ही किया गया था ।
7. आज ही के दिन भगवन विष्णु हयग्रीव के रुप मेँ प्रकट हुए थे ।
8.तमिलनाडु, केरल, उड़ीसा और महाराष्ट्र में यजुर्वेद पढ़ने वाले ब्राह्मण इस दिन को अवनी अवित्तम के रूप में मनाते हैं। इस दिन पुराने पापों से छुटकारे के लिए महासंकल्प लिया जाता है। ब्राह्मण स्नान करने के बाद नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं ।
9. ओड़िशा मेँ आज बलराम जी विशेष पूजा किया जाता है । श्रीमंदिर मेँ भी आज खास पूजाओँ का आयोजन किया जाता है । ओड़िशा मेँ श्रावण पूर्णिमा को गन्हा पूर्णिमा कहा जाता है । जिन बहनोँ कि कोई भाई नहीँ होते वे आज बलराम जी को राक्षी भेँट करती है । आज गोमाता को भी पूजा किया जाता है और चावल के आटे से बना पिठा खिलाते है ।
10.गुजरात में शिव भगवान की उपासना बड़े जोर-शोर से होती है। पूरे साल लोग शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। श्रावण पूर्णिमा जल चढ़ाने का अंतिम दिन होता है। इस दिन शिव जी का पूजन भी होता है। पवित्रोपना के तहत रूई की बत्तियाँ पंचग्वया (गाय के घी, दुध, दही आदि) में डुबाकर शिव को अर्पित की जाती हैं ।
11.श्रावण पूर्णिमा को दक्षिणभारत मेँ नारियली पूर्णिमा के रुप मेँ मनाया जाता है । पश्चिमी घाट पर रहने वाले लोगों का एकमात्र आधार समुद्र ही है। समुद्री सामग्री पर जीवन निर्वाह करने वाले लोग इस दिन समुद्र के देवता वरुण की पूजा करते हैं । मछुआरे अपनी-अपनी नावों को सजाकर समुद्र के किनारे लाते हैं। नाचते गाते हैं और वरुण देवता को नारियल अर्पित कर प्रार्थना करते हैं कि उनका जीवन निर्वाह अच्छे से हो ।
12. आज हि के दिन को मध्यभारत मेँ कजरी पूर्णिमा के तौर पर मनाया जाता है । यह त्योहार भी श्रावण पूर्णिमा के दिन ही पड़ता है। कजरी पूर्णिमा को मध्य भारत में खासकर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में मनाया जाता है । (source ..INTERNET)
1.संपूर्ण भारत मेँ आज रक्षाबंधन का तौहार मनाया जाता है । बहनेँ अपने भाईओँ को राक्षी बांधकर लम्बेँ उम्र कि कामना के साथ अपने रक्षा का वचन भी लेती है ।
2.आज भगवती गायत्री जयंती" भी है। यूं तो श्रावण पूर्णिमा पर ही भगवती गायत्री जी की जयंती कही गयी है, पर गंगा दशहरा के दिन भी इनकी जयंती बतलाई गई है।
3.आज देववाणी संस्कृत दिवस भी है। ऐसी मान्यता है कि देववाणी संस्कृत की उत्पत्ति श्रावणी पूर्णिमा को हुई थी। अतः श्रावण मास की पूर्णिमा को 1969 से संस्कृत दिवस की शुरुआत हुई। इस दिन को इसीलिए चुना गया था कि इसी दिन प्राचीन भारत में शिक्षण सत्र शुरू होता था।
4.श्रावणी पूर्णिमा के दिन बाबा अमरनाथ के दर्शन की भी बडी महिमा है। श्रावण मास का अंतिम दिन है और बाबा बर्फानी के दर्शन हो जाएँ इससे बड़ा सौभाग्य और क्या होगा?
5.श्रावणी पूर्णिमा के दिन श्रवण कुमार का भी पूजन और स्मरण किया जाता है ।
6.आज लव-कुश जयंती भी है। श्रावण पूर्णिमा को ही श्रीरामचंद्र जी व सीता माता के वीर जुड़वां पुत्रों लव और कुश का जन्म हुआ था। उनका जन्म तथा पालन महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में हुआ था। प्रथम बार रामलीला का वाचन इन दोनों के द्वारा ही किया गया था ।
7. आज ही के दिन भगवन विष्णु हयग्रीव के रुप मेँ प्रकट हुए थे ।
8.तमिलनाडु, केरल, उड़ीसा और महाराष्ट्र में यजुर्वेद पढ़ने वाले ब्राह्मण इस दिन को अवनी अवित्तम के रूप में मनाते हैं। इस दिन पुराने पापों से छुटकारे के लिए महासंकल्प लिया जाता है। ब्राह्मण स्नान करने के बाद नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं ।
9. ओड़िशा मेँ आज बलराम जी विशेष पूजा किया जाता है । श्रीमंदिर मेँ भी आज खास पूजाओँ का आयोजन किया जाता है । ओड़िशा मेँ श्रावण पूर्णिमा को गन्हा पूर्णिमा कहा जाता है । जिन बहनोँ कि कोई भाई नहीँ होते वे आज बलराम जी को राक्षी भेँट करती है । आज गोमाता को भी पूजा किया जाता है और चावल के आटे से बना पिठा खिलाते है ।
10.गुजरात में शिव भगवान की उपासना बड़े जोर-शोर से होती है। पूरे साल लोग शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। श्रावण पूर्णिमा जल चढ़ाने का अंतिम दिन होता है। इस दिन शिव जी का पूजन भी होता है। पवित्रोपना के तहत रूई की बत्तियाँ पंचग्वया (गाय के घी, दुध, दही आदि) में डुबाकर शिव को अर्पित की जाती हैं ।
11.श्रावण पूर्णिमा को दक्षिणभारत मेँ नारियली पूर्णिमा के रुप मेँ मनाया जाता है । पश्चिमी घाट पर रहने वाले लोगों का एकमात्र आधार समुद्र ही है। समुद्री सामग्री पर जीवन निर्वाह करने वाले लोग इस दिन समुद्र के देवता वरुण की पूजा करते हैं । मछुआरे अपनी-अपनी नावों को सजाकर समुद्र के किनारे लाते हैं। नाचते गाते हैं और वरुण देवता को नारियल अर्पित कर प्रार्थना करते हैं कि उनका जीवन निर्वाह अच्छे से हो ।
12. आज हि के दिन को मध्यभारत मेँ कजरी पूर्णिमा के तौर पर मनाया जाता है । यह त्योहार भी श्रावण पूर्णिमा के दिन ही पड़ता है। कजरी पूर्णिमा को मध्य भारत में खासकर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में मनाया जाता है । (source ..INTERNET)
फिल्मीँ रक्षाबंधन
"filmy rakshabandhan"
~~~¤~~~ -----(¤)-----
आज भले Bollywood कि इस्लामीकरण हो गया है लेकिन 90 के दशक तक रक्षाबंधन पर कई गानेँ बने जो आज भी अपने लोकप्रियता के लिये जानीँ जाती है.......यहाँ कुछ गानोँ का जिक्र करुगाँ यह गीत अकसर मन मेँ मेरी बहन कि याद दिलातीँ है
1. अब के बरस भेजो भैया को बाबुल......Bandini
नुतनजी पर फिल्माया गया यह गीत आशा ताई नेँ गाया था । इस गानेँ के बारे मेँ आशा ताई नेँ विविधभारती मेँ अपने यादेँ शयर किया था । दरअसल आशाताई जी कि शादी के बाद उनके शशुराल और मायकेवालोँ के बीच किसी बात पर रिस्ता टुटगया था । उन्हे मायके जाने व भाई बहनोँ से मिलने कि अनुमति न थी । संजोग देखिये 10 साल के बाद उन्हे यह गाना गाने को मिला बाद मेँ उन्होने आर ड़ी बर्मन से शादि कर लिया था.....
फुलोँ का तारोँ का सबका कहना है - (Hare Rama Hare Krishna)
Dev Anand और Zeenat Aman जी पर फिल्माया गया गाना जब भी बजता था मेरी मा इस गाने को दिखा कर मुझे और मेरी बहन को झगड़ा न करने कि सलाह देती थी ! :-D :-D :-D :-D :-D
3.मेरे भैया मेरे चंदा (Kajaal)
मेँ जब भी यह गाना देखता था मेरी बहन से 3/4 दिनतक नहीँ झगड़ता था ।
4.मेरी राक्षी का मतलब है प्यार भैया.... -( Tiranga)
Varsha Usgaonkar अपने तिन भाईओँ को राक्षी बांध रही है । यहाँ गौर करनेवाली बात यह है कि राक्षी न बंधे भाई कि मौत गाने के अंत मेँ गोली लगने से है ।
रंग विरंगी राक्षी लेकर (Anpadh)
हम बहनोँ के लिये.... (Mere Bhaiya Anjaana)
यह राक्षी बंधन है ऐसा... (Beimaan)
चंदा रे मेरे भैया (Chambal Ki Kasam)
भैया मेरे राक्षी के बंधन.... (Choti Behan)
झुला वाहोँJ का.... (Doli Sajake Rakhna)
मेरे भैया मेरे चंदा (Kajal)
बहना ने भाई कि कलाई से .... (Resham Ki Dori)
गुड़िआ जैसी बहना मेरी...(Adalat)
छोटे छोटे भाईओँ के बड़े भैया (Hum Saath Saath Hai)
मेरी प्यारी बहनीयाँ बनेगी.... (Sachha Jhutha) बाबुल छुट चला तेरा अंगना (Rakhi1962)
मेरी राक्षि की रखियो.... (Naya Kanoon)
भाई बहन का प्यार (Farishtay)
मेरी छोटी सी बहन....( Toofan Aur Deeya)
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आज भले Bollywood कि इस्लामीकरण हो गया है लेकिन 90 के दशक तक रक्षाबंधन पर कई गानेँ बने जो आज भी अपने लोकप्रियता के लिये जानीँ जाती है.......यहाँ कुछ गानोँ का जिक्र करुगाँ यह गीत अकसर मन मेँ मेरी बहन कि याद दिलातीँ है
1. अब के बरस भेजो भैया को बाबुल......Bandini
नुतनजी पर फिल्माया गया यह गीत आशा ताई नेँ गाया था । इस गानेँ के बारे मेँ आशा ताई नेँ विविधभारती मेँ अपने यादेँ शयर किया था । दरअसल आशाताई जी कि शादी के बाद उनके शशुराल और मायकेवालोँ के बीच किसी बात पर रिस्ता टुटगया था । उन्हे मायके जाने व भाई बहनोँ से मिलने कि अनुमति न थी । संजोग देखिये 10 साल के बाद उन्हे यह गाना गाने को मिला बाद मेँ उन्होने आर ड़ी बर्मन से शादि कर लिया था.....
फुलोँ का तारोँ का सबका कहना है - (Hare Rama Hare Krishna)
Dev Anand और Zeenat Aman जी पर फिल्माया गया गाना जब भी बजता था मेरी मा इस गाने को दिखा कर मुझे और मेरी बहन को झगड़ा न करने कि सलाह देती थी ! :-D :-D :-D :-D :-D
3.मेरे भैया मेरे चंदा (Kajaal)
मेँ जब भी यह गाना देखता था मेरी बहन से 3/4 दिनतक नहीँ झगड़ता था ।
4.मेरी राक्षी का मतलब है प्यार भैया.... -( Tiranga)
Varsha Usgaonkar अपने तिन भाईओँ को राक्षी बांध रही है । यहाँ गौर करनेवाली बात यह है कि राक्षी न बंधे भाई कि मौत गाने के अंत मेँ गोली लगने से है ।
रंग विरंगी राक्षी लेकर (Anpadh)
हम बहनोँ के लिये.... (Mere Bhaiya Anjaana)
यह राक्षी बंधन है ऐसा... (Beimaan)
चंदा रे मेरे भैया (Chambal Ki Kasam)
भैया मेरे राक्षी के बंधन.... (Choti Behan)
झुला वाहोँJ का.... (Doli Sajake Rakhna)
मेरे भैया मेरे चंदा (Kajal)
बहना ने भाई कि कलाई से .... (Resham Ki Dori)
गुड़िआ जैसी बहना मेरी...(Adalat)
छोटे छोटे भाईओँ के बड़े भैया (Hum Saath Saath Hai)
मेरी प्यारी बहनीयाँ बनेगी.... (Sachha Jhutha) बाबुल छुट चला तेरा अंगना (Rakhi1962)
मेरी राक्षि की रखियो.... (Naya Kanoon)
भाई बहन का प्यार (Farishtay)
मेरी छोटी सी बहन....( Toofan Aur Deeya)
शुक्रवार, 8 अगस्त 2014
संस्कृत सप्ताह विशेष
7 अगष्ट से 13 अगष्ट तक के इन 7 दिन को संस्कृत सप्ताह के रुप मेँ हर साल मनाया जाता है । लोग आते भाषण देते सुनते और घर चले जाते ! बच्चोँ को अंग्रेजी स्कुलोँ मेँ पढ़ाते ताकि आगे चलकर मोटे अंक कि कमाई हो ! ठिक भी है दुनिया पैसा और पैसेवालोँ का है भले देश बिकजाय इन्हे क्या इनके पॉकेट तो गरम है । अरे इस देश में तो आजकल इंग्लिश बोलना शान की बात मानी जाती है । इंग्लिश नहीं आने पर लोग आत्मग्लानि अनुभव करते हैं (ENGLISH VINGLISH देखा है ? ) ! खैर छोड़िए अंग्रेजी कि बात लुटेरोँ का भाषा है इसकी यही औकात है । हाँ तो हम बात कर रहे थे संस्कृत भाषा के बारे मेँ , यह भाषा किसी देश या धर्म की भाषा नहीं हे । यह अपौरूष भाषा है , क्योंकि इसकी उत्पत्ति और विकास ब्रह्मांड की ध्वनियों को सुन-जानकर हुआ। यह आम लोगों द्वारा बोली गई ध्वनियां नहीं हैं । संस्कृत ऐसी भाषा नहीं है जिसकी रचना की गई हो। निःसंदेह रुषिमुनिओँ के द्वारा इस भाषा की खोज की गई है । भारत में आज जितनी भी भाषाएं बोली जाती है वे सभी संस्कृत से जन्मी हैं जिनका इतिहास मात्र 1500 से 2000 वर्ष पुराना है। उन सभी से पहले संस्कृत, प्राकृत, पाली, अर्धमागधि आदि भाषाओं का प्रचलन था । यह बात सर्व मान्य हे कि संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है । 'संस्कृत' का शाब्दिक अर्थ है परिपूर्ण भाषा तथा सुचरित्रवान सुशिक्षित समाज । संस्कृत पूर्णतया वैज्ञानिक तथा सक्षम भाषा है। संस्कृत भाषा के व्याकरण में विश्वभर के भाषा विशेषज्ञों का ध्यानाकर्षण किया है। उसके व्याकरण को देखकर ही अन्य भाषाओं के व्याकरण विकसित हुए है । इस भाषा के समस्त वर्णो के उद्भव संधर्व मेँ संस्कृत विद्वानों का मानना हे कि सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से 9 रश्मियां निकलती हैं और ये चारों ओर से अलग-अलग निकलती हैं। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गईं। इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बने। इस तरह सूर्य की जब 9 रश्मियां पृथ्वी पर आती हैं तो उनकी पृथ्वी के 8 वसुओं से टक्कर होती है। सूर्य की 9 रश्मियां और पृथ्वी के 8 वसुओं के आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुईं, वे संस्कृत के 72 व्यंजन बन गईं। इस प्रकार ब्रह्मांड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियां पर संस्कृत की वर्ण माला आधारित हैं । इसके अलावा संस्कृत दुनिया अकेला इकलौता भाषा है जिसमेँ अभद्र शब्द नहीँ है और मानव गुप्तागोँ का भी आदर सहित वर्णन किया जाता है । कहा जाता है किसी देश की जाति, संस्कृति, धर्म और इतिहास को नष्ट करना है तो उसकी भाषा को सबसे पहले नष्ट किया जाए। मात्र 3,000 वर्ष पूर्व तक भारत में संस्कृत बोली जाती थी ।
1100ईसवीं तक संस्कृत समस्त भारत की राजभाषा के रूप सें जोड़ने की प्रमुख कड़ी थी। अरबों और अंग्रेजों ने सबसे पहले ही इस भाषा को खत्म किया और भारत पर अरबी और रोमन लिपि और भाषाको लादा गया। भारत की कई भाषाओं की लिपि देवनागरी थी लेकिन उसे बदलकर अरबी कर दिया गया,तो कुछ को नष्ट ही कर दिया गया। वर्तमान में हिन्दी की लिपि को रोमन में बदलने का छद्म कार्य शुरू हो चला है । संस्कृत को राजनीति से भी काफी नुकसान पहुँचा है और इसे ब्राह्मणों की भाषा के ठप्पे का भी सामना करना पड़ा है लेकिन संस्कृत एक उदार भाषा है जिसे कोई भी पढ़ सकता है और जो भी संस्कृत पढ़ेगा, उसके जीवन में सरलता आएगी । हालाकी भारत मेँ संस्कृत का भविष्य बहुत अच्छा नहीं दिखाई देता क्योंकि आज के युवा की रुचि मात्र फ़र्जी डिग्री लेने में है । कुछ युवाओं में व्यवसायिकता का असर हुआ है जिससे वो संस्कृत से दूर हुए हैं लेकिन भाषा की समृद्धता के कारण एक वर्ग संस्कृत से जुड़ा भी है । आज विदेशोँ मेँ संस्कृत पढ़ाया जा रहा है हमारे ग्रंथो से तथ्य निकालकर वे अपने नामपर पेटेटँ बना रहे है और हम उनके गरीब भाषा को आँख मुँद कर पढ़ रहे है ।
1100ईसवीं तक संस्कृत समस्त भारत की राजभाषा के रूप सें जोड़ने की प्रमुख कड़ी थी। अरबों और अंग्रेजों ने सबसे पहले ही इस भाषा को खत्म किया और भारत पर अरबी और रोमन लिपि और भाषाको लादा गया। भारत की कई भाषाओं की लिपि देवनागरी थी लेकिन उसे बदलकर अरबी कर दिया गया,तो कुछ को नष्ट ही कर दिया गया। वर्तमान में हिन्दी की लिपि को रोमन में बदलने का छद्म कार्य शुरू हो चला है । संस्कृत को राजनीति से भी काफी नुकसान पहुँचा है और इसे ब्राह्मणों की भाषा के ठप्पे का भी सामना करना पड़ा है लेकिन संस्कृत एक उदार भाषा है जिसे कोई भी पढ़ सकता है और जो भी संस्कृत पढ़ेगा, उसके जीवन में सरलता आएगी । हालाकी भारत मेँ संस्कृत का भविष्य बहुत अच्छा नहीं दिखाई देता क्योंकि आज के युवा की रुचि मात्र फ़र्जी डिग्री लेने में है । कुछ युवाओं में व्यवसायिकता का असर हुआ है जिससे वो संस्कृत से दूर हुए हैं लेकिन भाषा की समृद्धता के कारण एक वर्ग संस्कृत से जुड़ा भी है । आज विदेशोँ मेँ संस्कृत पढ़ाया जा रहा है हमारे ग्रंथो से तथ्य निकालकर वे अपने नामपर पेटेटँ बना रहे है और हम उनके गरीब भाषा को आँख मुँद कर पढ़ रहे है ।
मंगलवार, 22 जुलाई 2014
ये लेख हर बुजुर्ग के लिये
कुछ बुजुर्ग केवल एक लाईन रटन करके अपने काल को महान बताते है कि हमारे काल मेँ कैसे कैसे फिल्मेँ होते थे और आज कैसे फिल्म दिखने को मिलता है । तो चलिये बर्तमान और अतीत को तौल कर देखते है कि फिल्म जगत मेँ क्या बदला और क्या गलत हो रहा है ।
{1}
40 से 80 दशक तक बननेवाले ज्यादतर फिल्मेँ केवल बंबेँ या मुंबई सहर कि कहानी कहता था और आज भारत का हर कोना हिँदी फिल्मोँ मेँ दिख जाता है । कहानी , लुटेरा और बर्फी मेँ बंगाल को दिखाया गया है तो चैन्नई एक्सप्रेस , एक दिवाना था और बॉबी जासुस जैसे फिल्मोँ मेँ दक्षिण भारत को दिखाया गया है ।
{2}
हमारे बुजुर्ग कहते हे कि आपके जमाने मेँ क्या अनाप सनाप गानेँ बन रहा है ? मेँ उन्हे बर्फी के सारे गानेँ , ये दिवानी है जवानी से "रे कबिरा" और लकी कबुत्तर से "हाल दा मरहम" सुनने को अनुरोध करुगाँ ! अजी हमनेँ आपके जमानेँ मेँ बने कई प्लॉप पिक्चर के गानेँ सुनरखा है कोई बताएगा इन गानोँ को हिट क्युँ नहीँ मिली ? क्युँ कि इन गानोँ मेँ महनत कम लगा था । heartless से "मेँ ढ़ुँड़ने जमाने से जब वफा निकला " सुनकर देखिये फिर बोलिये हमारे काल मेँ अछे गाने बनते ही नहीँ ! #Jeb we met फिल्म से "आओगे जब तुम ओ साजना" और "आओ मिलोँ चले" #BADMASH COMPONY से "फकीरा"! #Namastey london फिल्म से "विरानीआँ" , "मेँ जहाँ रहुँ" जैसे गानेँ हमारे दौर के माईलस्टोन Song है !
{3}
कुछ बुजुर्ग कह देते कि हमारे काल के देव आनंद , दिलिप कुमार , गुरु दत्त , सुनील दत्त . राज कपुर जैसे एकटर और मीना कुमारी ,सुरैया , मधुवाला . वैजयतीँ माला , आशा पारेख जैसी अदाकार आज के काल मेँ कहाँ ! अरे ये लोग तो आज के हिरोँ को बंदर तक कह देते ! ! !
आज हमारे फिल्म इंडस्ट्री मेँ फरहान अखतर , साहिद कपुर , इरफान खान, प्रभु देवा , अक्षय कुमार, अमिर खान , रितेश देशमुख जैसे आक्टर्स और प्रियंका चोपरा , दिपिका पाद्युकोन , अनुष्का शर्मा , सोनाक्षी सिन्हा जैसी अदाकरा भी है जो आपके काल के किसी भी आक्टर आक्ट्रेस से बहतर अभिनय क्षमता रखते है । हद कि बात तो यह है कि आप लोग बर्तमान काल मेँ बने एक आद फालतु फिल्म देखकर इस दौर के फिल्मोँ को बेकार करार देते है । राजकपुर , गुरुदत्त ,देवानंद, सुनिल दत्त और अन्य सुपरस्टार की झलक आज के किसी ना किसी हिरो मेँ दिख ही जाता है । मनोज कुमार कि झलक अमिर खान मेँ दिखता है वहीँ राजकपुर के पोते रणवीर अपने दादा जी के तरह अभिनय क्षमता रखते है ।
अंत मेँ इतना कहुगाँ !
बुढ़ा होकर आप सुंदर है और जवान होकर हम बंदर के शक्ल वाले है ? हद है यार इस लिये कहा गया है कि इनके चहरे के साथ साथ दिल भी बुढ़ा हो जाता है ।
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40 से 80 दशक तक बननेवाले ज्यादतर फिल्मेँ केवल बंबेँ या मुंबई सहर कि कहानी कहता था और आज भारत का हर कोना हिँदी फिल्मोँ मेँ दिख जाता है । कहानी , लुटेरा और बर्फी मेँ बंगाल को दिखाया गया है तो चैन्नई एक्सप्रेस , एक दिवाना था और बॉबी जासुस जैसे फिल्मोँ मेँ दक्षिण भारत को दिखाया गया है ।
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हमारे बुजुर्ग कहते हे कि आपके जमाने मेँ क्या अनाप सनाप गानेँ बन रहा है ? मेँ उन्हे बर्फी के सारे गानेँ , ये दिवानी है जवानी से "रे कबिरा" और लकी कबुत्तर से "हाल दा मरहम" सुनने को अनुरोध करुगाँ ! अजी हमनेँ आपके जमानेँ मेँ बने कई प्लॉप पिक्चर के गानेँ सुनरखा है कोई बताएगा इन गानोँ को हिट क्युँ नहीँ मिली ? क्युँ कि इन गानोँ मेँ महनत कम लगा था । heartless से "मेँ ढ़ुँड़ने जमाने से जब वफा निकला " सुनकर देखिये फिर बोलिये हमारे काल मेँ अछे गाने बनते ही नहीँ ! #Jeb we met फिल्म से "आओगे जब तुम ओ साजना" और "आओ मिलोँ चले" #BADMASH COMPONY से "फकीरा"! #Namastey london फिल्म से "विरानीआँ" , "मेँ जहाँ रहुँ" जैसे गानेँ हमारे दौर के माईलस्टोन Song है !
{3}
कुछ बुजुर्ग कह देते कि हमारे काल के देव आनंद , दिलिप कुमार , गुरु दत्त , सुनील दत्त . राज कपुर जैसे एकटर और मीना कुमारी ,सुरैया , मधुवाला . वैजयतीँ माला , आशा पारेख जैसी अदाकार आज के काल मेँ कहाँ ! अरे ये लोग तो आज के हिरोँ को बंदर तक कह देते ! ! !
आज हमारे फिल्म इंडस्ट्री मेँ फरहान अखतर , साहिद कपुर , इरफान खान, प्रभु देवा , अक्षय कुमार, अमिर खान , रितेश देशमुख जैसे आक्टर्स और प्रियंका चोपरा , दिपिका पाद्युकोन , अनुष्का शर्मा , सोनाक्षी सिन्हा जैसी अदाकरा भी है जो आपके काल के किसी भी आक्टर आक्ट्रेस से बहतर अभिनय क्षमता रखते है । हद कि बात तो यह है कि आप लोग बर्तमान काल मेँ बने एक आद फालतु फिल्म देखकर इस दौर के फिल्मोँ को बेकार करार देते है । राजकपुर , गुरुदत्त ,देवानंद, सुनिल दत्त और अन्य सुपरस्टार की झलक आज के किसी ना किसी हिरो मेँ दिख ही जाता है । मनोज कुमार कि झलक अमिर खान मेँ दिखता है वहीँ राजकपुर के पोते रणवीर अपने दादा जी के तरह अभिनय क्षमता रखते है ।
अंत मेँ इतना कहुगाँ !
बुढ़ा होकर आप सुंदर है और जवान होकर हम बंदर के शक्ल वाले है ? हद है यार इस लिये कहा गया है कि इनके चहरे के साथ साथ दिल भी बुढ़ा हो जाता है ।
शनिवार, 14 जून 2014
ओड़िशा मेँ रजपर्व
आज से ओड़िशा मेँ रजपर्व ⛅ शुरु हो गया हे हालांकी कल से रज पर्व प्रारम्भ हो चुका हे लेकिन आज से तिन दिन सरकारी छुट्टी मिलता है । ओडिशा एक कृषिप्रधान राज्य होने के साथ-साथ यहां की कला और सांस्कृति समृद्ध है । ⌛ रज उत्सव इस महान सांस्कृति की महत्ता को दर्शाता है। इस पर्व के जरिये धरती माता और नारी जाति के महत्व पता चलता है, जिससे रज उत्सव की प्रासंगिकता आज भी है । यहां के हर घर में आनंद और उल्लास के साथ यह उत्सव मनाया जाता है । पोड़ो पिठा ,मंडा पिठा, आरिसा पिठा , चकुली , काकरा तथा बरा आदि पारम्परीक मिटाई बनाकर लोग इस त्योहार को और दिलचस्प बनादेते। इन तीन दिनोँ मेँ सहर और खासकर गाँव मेँ लोग भिन्न भिन्न स्थानिय खेलभी खेलते और मजा लेते हे । गंजाम मेँ रजपर्व पर लोग जुआ और ताश खेलते हे और कहीँ कहीँ तो ताशके टुर्नामेँट भी होता हे । आजकल ज्यादातर क्रिकेट और ताश के टुर्नामेँट हो रहा हे। पुरातनकाल मेँ रजपर्व पर लोग शतरंग , पाशा और बगुड़ी ( कवड्डी ) खेलते थे ! हम ओड़िआ मानते हे की यह तीन दिन बसुमाता अर्थात पृथ्वी ऋतु स्नानperiodical cycle(Raja Svala) करती हे और यह मान्यता प्राचीन काल से आर्यो मेँ प्रचलित थी आज भी हे । आज भी युपी विहार मेँ इसदिन मिट्टी की खुदाई नहीँ होती न हल चलाये जाते ।ऋकवेद मेँ पृथ्वी को माता तथा नारी कहा गया हे , और वैदिक काल से लोग इसे मानते चलेँ आये हे । ओड़िशा के ग्रामीण इलाकोँमेँ औरते चमड़े से बने चप्पल नहीँ पहनती और ज्यादातर नंगेपाऊँ चलती हे ताकी पृथ्वीमाता को कष्ट न हो ❄ । रजपर्व मेँ लोग पेड़ोँ से पत्ते , पुष्प और फल नहीँ तोड़ते और न तो औरतेँ सब्बजी काटते या मसाला बनाते हे । यह पर्व औरतोँ का पर्व हे, रजपर्व मेँ कई तरह का झुला बनया जाता हे जैसे "पटादोली" ,बाऊँस दोली आदि । रजपर्व मेँ औरतेँ छुला झुलते हुए कई तरह के गानेँ भी गाती हे जैसे.,
"Banaste dakila gaja ,
Barasake thare Asichi Raja
Asichi Raja lo gheni nua Sajabaja." अर्थात् बन मेँ बुलाता गज (हाथी) साल मेँ एक बार आता हे रज ! लेकर नये सजबाज (पुरे तैयारीओँ के साथ ) !
इन गानोँ मेँ वो अपने दुःख दर्द हाल को बता देते है । भारतीय संस्कृति का ये अनोखा तौहार ओड़िशा , बंगाल ,छतिशगड़ ,झाड़खंड़ और आंध्रा मेँ मनाते तथा चौथे दिन इस पर्व के समापन पर खेतोँ से लाये गये मिट्टी को पूजा जाता है ।
"Banaste dakila gaja ,
Barasake thare Asichi Raja
Asichi Raja lo gheni nua Sajabaja." अर्थात् बन मेँ बुलाता गज (हाथी) साल मेँ एक बार आता हे रज ! लेकर नये सजबाज (पुरे तैयारीओँ के साथ ) !
इन गानोँ मेँ वो अपने दुःख दर्द हाल को बता देते है । भारतीय संस्कृति का ये अनोखा तौहार ओड़िशा , बंगाल ,छतिशगड़ ,झाड़खंड़ और आंध्रा मेँ मनाते तथा चौथे दिन इस पर्व के समापन पर खेतोँ से लाये गये मिट्टी को पूजा जाता है ।
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