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गुरुवार, 13 नवंबर 2014

अंत मेँ जीत सत्य और न्याय कि होती है

भारत पर हमलाकरनेवाले जातिओँ मेँ ज्यादातर या तो लुप्त हो गया दुर्वल होकर विखर गये ।
सबसे पहला उदाहरण ग्रीक् है
आज कहनेभर को ग्रीस और उसकी संस्कृति जीवित है ।
ज्यादातर ग्रीसवासी अब रोमान कैथोलिक है और ख्रीस्ट धर्म के अनुयायी रहगये हे ।
हुण ,कुशाण और सातवाहन भारतीय बनकर यहीँ के हो गये ।
फिर आये तुर्क इनका एक बडा तवक्का आज भी दुनिया मेँ अपने धाक जमाने के चक्कर मेँ लगा हुआ है जबकि तुर्कलोगोँ का देश तुर्कि इन सब लफडोँ से दुर चैन ओ अमन कि बात करता है । तो इनमेँ आपसी मतभेद हे और ये कुछ दिनोँतक ऐसे ही लढ़ते रहेगेँ ।

भारत मेँ मंगोल और मोगलोँ नेँ भी हमाला किया और अपने अपने परंपरा और संस्कृति को भारत मेँ छोडगये ।
मोगलोँ नेँ भारत मेँ ही अपना अंतिम शाँस लिया और आज इनके वारिस खुद को बादशाह और साहिव आदि कहकर घुमते फिरते मिलजाते है ।
17वीं शताब्दी के मध्यकाल में पुर्तगाल, डच, फ्रांस, ब्रिटेनसहित अनेकों युरोपीय देशों, जो कि भारत से व्यापार करने के इच्छुक थे, उन्होनें देश में स्थापित शासित प्रदेश, जो कि आपस में युद्ध करने में व्यस्त थे, का लाभ प्राप्त किया । अंग्रेज दुसरे देशों से व्यापार के इच्छुक लोगों को रोकने में सफल रहे और 1840 ई तक लगभग संपूर्ण देश पर शासन करने में सफल हुए । परंतु इन हारामखोर अंग्रेजोँ कि दुर्दशा देखिये ,,व्रिटेन तथा दुसरे युरोपीय देशोँ के लोगोँ से बना कॉकटेल कलचराल कंट्री ("cultural Cocktail country america" ) :-D :-D :-D

अमरिका नेँ अंग्रेज व अन्य युरोपीय देशोँ को न्युवर्लड से खदेड कर ही दमलिया । अब भारत व दुसरे एसिआन और अफ्रिकी देशोँ मेँ इनको मार भगाया । भारत मेँ तो 1945 के बाद के हालात से डर कर अंग्रेज भाग खडे हुए । आज अंग्रेज और अंग्रेजी जिँदा तो है पर अंग्रेज अपने छोटे से देश मेँ और अंग्रेजी अपनी औकात मेँ रहकर छटपटा रहे है बस । कभी सूर्यास्त न होनेवाला साम्राज्य अब अपने ही देश मेँ अलगाव का वोझ लेते फिरता है । भारत पर बुरे आँख रखनेवाले काल के आगे बरबाद हो गये उन्हे होना ही था । क्युँकि आखरी मेँ जीत सत्य व न्याय कि होती है ।

कश्यपनारद जन्मकथा

हरिवंशपुराण मेँ नारदजी की उत्पत्तिकथा वर्णित है । उस कथा का सारांश यह है कि सृष्टि के आरम्भ मेँ ब्रह्माजी के सात मानस पुत्रोँ मेँ एक देवर्षि नारद थे , जो बडे भगवद भक्त थे । जिस समय आदि प्रजापति दक्ष ने मैथुनी सृष्टि रची और वीरणा नामक प्रजापति की आसिक्री नामी कन्याके गर्भ से पाँच सहस्र पुत्र, जो हर्यश्व कहलाते है , उत्पन्न किये एवं उनको सृष्टि बढ़ाने की आज्ञा दी , उस समय उन हर्यश्वोँ को देवर्षि नारद ने गर्भवास के दुःखोँ का वर्णन करते हुए सृष्टि कि बृद्धि होने से रोक दिया । फिर दक्षप्रजापति नेँ सवलाक्षोँ को सृष्टि कर इस कार्य के लिये प्रेरित किया । परंतु इन्हे भी देवर्षि नारद द्वारा परमाधाम की ज्ञानपोदेश प्राप्त हुआ और वे सभी परमगति प्राप्त हो गये । तब दक्षप्रजापति क्रोधित हो गये और नारदजी को श्राप दे दिया कि वे तत् क्षणात् भश्म हो जाय । नारदजी ने उन्हे अज मुख लाभ का श्राप देकर अभिशाप के आग मेँ जलगये ।
अब देवलोक मेँ हलचल मचगयी च्युँकि नारदजी के बिना देवोँ के प्राथना पर परमपिता ब्रह्मा नेँ दक्षप्रजापति को समझाते हुए कहा "हे प्रजापते ! आप नारद को जीवित किजिये । क्युँकि बिना नारद के सृष्टि का काम नहीँ चल सकता ।'
इसपर दक्षप्रजापतिने कहा-- नारद भश्म हुए शरीर से तो जी नहीँ सकता ,क्युँकि हमारा श्राप अन्यथा नहीँ होगा ,परंत्नु हम आपकी आज्ञा का उलंघन भी नहीँ कर सकता ! अतएब इस विषय पर दुसरे उपाय करता हुँ । यह कहकर दक्षप्रजापति नेँ अपनी एक कन्या ब्रह्माजी को दी और कि इसीके गर्भ से नारद का जन्म होगा । ब्रह्माजी नेँ उस कन्या को कश्यप को दे दिया । उसी कन्या के गर्भ से नारद का जन्म हुआ व वे आगे चलकर कश्यपनारद के नाम से जानेगये । कश्यप नारद कि यह कथा नारद पुराण मेँ नारद जी को ब्रह्माजी के मुख से सुनाया गया है ।

आभार :- गीताप्रेस गोरखपुर

रविवार, 9 नवंबर 2014

युरोपिआन पाइन मार्टेन

युरोपिआन पाइन मार्टेन ‪ [TheEuropeanpine marten]‬
या "Martes martes" को युरोप के कुछ क्षेत्रोँ मेँ "थेपाइन मार्टेनिन" , "अस्पाइनेन्टेन", बाउम मार्टेन और स्विट मार्टेन भी कहा जाता है . यह प्राणी मुलतः युरोय और तुर्की तथा रसिया के कुछ हिस्सोँ मेँ पाया जाता है । अमरिका और न्युफाउलैँड मेँ भी पाइन मार्टेन देखेजाते हे और स्तानिय नाम के साथ इनका साधारण नामकरण किया जाता है जैसे अमेरिकन पाइन मार्टिन , न्युफाउलैँड पाइन मार्टेन आदि । यह प्राणी एक तरह का नेवला है और ये चुहोँ कि तरह दिखते है जबकी इनकी आकार बिल्लीओँ सा होता है । युरोपियन पाइन मार्टेन की शरीरिक लंबाई 53 सेमी (21) तक हो सकता हे और जंगली पूंछ 25 सेमी (10 में) होता है. पुरुष पाइन मार्टेन मादाओँ की तुलना में थोड़ा बड़ा कदकाठि के होते हे; औसत पर एक नेवला लगभग 1.5 किलोग्राम (3.3 पौंड) वजन का होता है. उनकी खाल गहरे भूरे रंग का होता हे और सर्दियों के महीनों के दौरान उनका लोम बढ़जाता हे । यह प्राणी आमतौर पर घने जंगलोँ मेँ निवाश करता है . यूरोपीय पाइन मार्टेन खोखले पेड़ों या उँचे वृक्षोँ पर अपनी मांद बनाते हैं. वे जमीन पर अपेक्षाकृत जल्दी से दौड़ते हैं, हालांकि ऐसे चढ़ाई या पेड़ की शाखाओं पर चलाने के रूप में अधिक वृक्षवासी जीवन शैली, नेतृत्व करने के लिए उन्हें सक्षम बनाता है । वे रात और गोधूलि बेला में मुख्य रूप से सक्रिय होते है । उनके छोटे स्तनधारी, पक्षी, कीड़े, मेंढ़क, और सड़ा खाने के लिए छोटे गोल, अत्यधिक संवेदनशील कान और तेज दाँत है तथा वे जामुन, पक्षी के अंडे, मांस, नट और शहद खाने के लिए जाने जाते हैं । यूरोपीय पाइन मार्टेन मल जमा करके अपनी सीमा को चिह्नित करता है और इसे Scat कहाजाता है । यूरोपीय पाइन मार्टेन पालतु होने पर 18 साल तक जीँई सकता हे लेकिन जंगल में आठ से दस साल ही जीवित रहपाता है । वे उम्र के दो या तीन साल में यौन परिपक्वता लाभ कर लेते है । पाइन मार्टेन का शिकार ज्यादातर लाल लोमड़िया और इगल के द्वारा होता हे वहीँ मनुष्य Martens पाइन के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं. वे मनुष्यों के साथ जीवनसंघर्ष मेँ कमजोर पड रहे हैं । अन्य प्रजातियों के लिए शिकारी नियंत्रण से उत्पन्न होने वाली, या पशुओं के शिकार और Denning के लिए बसे हुए इमारतों के उपयोग के बाद. Martens भी वुडलैंड नुकसान से प्रभावित हो सकता है । अवैध विषाक्तता और शूटिंग से, निवास स्थान के नुकसान , मानव द्वारा अप्राकृतिक विकास आदि कारणो से पाइन नेवला जनसंख्या में काफी गिरावट आया है . उन्हो उनके वेस किमती फर के लिये माराजाता है । यूनाइटेड किंगडम में, 1981and पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1990 के तहत यूरोपीय पाइन Martens और वन्यजीवोँ पूरी सुरक्षा देने की पेशकश कर रहे हैं । वहीँ अमरिकन देशोँ मेँ हाल ही मेँ कडे कानुन व्यवस्था और लोकजागृति से इनके आवादी मेँ आ रहे गिरावट को रोकने मेँ सफलता हात लगा है ।

सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

तु क्युँ सेकुलार बना फिरता है ? हर सेकुलार एक दिन भुला दिआ जाता है !!

जम्मु कश्मीर ! नजाने किस मनहुस घडी मेँ भारत मेँ बिलय हुआ था जिसका सजा आज भी भारत भुगत रहा है ! मेँ उन सेकुलार किडोँ को अपने इस लेख द्वारा पुछना चाहुँगा की आप लोगोँ को वावरी कांड तो याद है पर आजादी मेँ तोफे मेँ मिला लाशोँ से भरा ट्रेन क्युँ याद नहीँ, वो 10 लाख औरतोँ का वलात्कार याद नहीँ और हिन्दु पंडितोँ पर हुआ अत्याचार क्युँ याद नहीँ आता ! क्या इस देश मेँ सहन करने का ठेका सिर्फ हिन्दुओँ नेँ ले रखा है ? और मुस्लीम क्युँ की अल्प संख्यक (21 करोड हो कर भी अल्पसंख्यक ?) हर सच्चा हिन्दोस्तानी मुसलमान कीतने इमानदार है ये अछी तरह जानता है । गुरु गोविंद सिंह जी को भी ऐन मौके पर पठान सैनिकोँ नेँ धोका दे कर गद्दार जय सिँह के साथ हो लिये थे । जिन्ना जिसे पाकिस्तानी "कायदे आजम" कहते फिरते सबसे बड़ा धोकेवाज निकला ।और आज अगर भारत मेँ हिन्दुँ मुसलमान आपस मेँ लढ मर रहे है इसका सिर्फ एक ही व्यक्ति जिम्मेदार है और वो है ये जिन्ना । 20वीँ सदी मेँ कौमी हिँसा फैलाने वाले माष्टर माईन्ड कोई और नहीँ यही जिन्ना थे । भारत मेँ हिन्दु वहुमत है इसलिये सेकुलार है नहीँ तो कब का मुस्लीम राष्ट्र बन चुका होता । तो ये सेकुलार और निरपेक्ष होने के ढ़ोगँ छोडो क्युँ की गीता मेँ भगवान श्रीकृष्ण नेँ भी कहा है इस दुनिया मेँ कोई निरपेक्ष नहीँ है । मेँ भी सदा धर्म के पक्ष मेँ रहता हुँ क्युँ की जहाँ धर्म वहाँ सत्य । इसलिये हे अर्जुन तुम धर्म मेँ स्थित हो कर धर्म युद्ध करो मेँ सदा तुम्हारे साथ रहुगां ।। जय हिन्दु जय हिन्दुस्तान ।।

दादामुनि कि पहली फिल्म जीवन नैया से जुड़ी कुछ यादेँ.....

दादामुनि के नाम से जानेजानेवाले अशोककुमार जी का पहला फिल्म था "जीवन नैया" ! फिल्म तो रिलिज हो गयी पर इस से उनके जीवन मेँ बहुत बड़ा भुचाल आ गया । उन दिनोँ उनका रिस्ता भागलपुर मेँ बहुत बड़े घराने मेँ होने जा रहा था । लेकिन इस फिल्म को देखने के बाद लड़कीवालोँ ने यह कहकर रिस्ता ठुकरा दिया कि "हम नौटकीँ मेँ काम करनेवाले भाण्डो से अपनी बेटी का रिस्ता नहीँ होने देगेँ ।

इधर अशोककुमार जी के पिता भी वौखलाये हुए थे उन्हे समझाबुझाकर फिल्म दिखाया गया तो वो और भड़कगये । उन्होने पुछा ये क्या तुम पराई औरत (देविकारानी) के साथ नाच गा रहे हो ?

दादामुनी नेँ कहा कि ये सब नाटक है और यह औरत पहले से शादीशुदा है(बिमल रोय से) ।

उनके पिता काफि नाराज हुए और दादामुनि अशोक कुमार चुप रहे ।

उनका अगला फिल्म था अछुत कन्या ! इसमेँ कुछ रोमान्टिक सिन्स सुट होनेवाला था पर अशोक कुमार नेँ इसे सुट करने से मनाकरदिया बाद मेँ उन्हे समझाबुझाकर फिल्म सुट किया गया । अछुत कन्या से अशोक कुमार मशहुर हुए और बाद मेँ उनका रिस्ता एक बहुत घराने मेँ तय किया गया ।

अंधविश्वास हि धर्म को मार सकता हे.....

हमेँ उन मान्यताओँ को मानना चाहिये जो विज्ञान सम्मत हो जैसे देवी काम क्रोध मोह माश्चर्य और अहंकार का बलि चाहति हे और यह सब दुर्गुण आ जाने पर इंसान पशु बन जाता हे । लेकिन बाद मेँ लोगोँ नेँ श्लोक और धर्मवाक्योँ का गलत मतलब निकालकर स्वार्थ साधन मेँ लग गये जिससे पृथ्वी मेँ अधर्म बढ़गया और आज से करिबन 3600 साल पहले महाभारतकाल मेँ पृथ्वी 3 डिग्री उत्तर कि और ढ़लगया जिससे अरव और उत्तर अफ्रिका मेँ साहारा मरुस्तल बनगया ।(अरव मेँ पहले अरवी घोडे मिलते थे जो काफी मजवुत और ताकतवर होते थे....शोधकर्ताओँ को मध्यप्राच्य से कई जीवोँ के अवशेष मिलेँ जो साबित करता हे कि कभी अरव और साहारा मरुस्थल हराभरा था )बाद मेँ अरव मेँ बचेहुए लोगोँ मेँ 1000 वर्षखंड मेँ अंधविश्वास इतना फैला कि लोग धीरे धीरे जोराष्टर धर्म (संभवत: यह धर्म राक्षसोँ का होगा क्युँ कि पुराने लेखोँ मेँ राक्षस वेद के वारे मेँ वताया गया हे और जोराष्टर धर्म ग्रथों मेँ ज्यादातर भुत प्रेत और राक्षसी विद्याओँ का वर्नन हे ...आगे चलकर इस धर्म से इहुदी और इस्लाम धर्म बना और इहुदी धर्म से ईसाई धर्म ) को छोडकर नये धर्म बनाने लगे । अंधविश्वास हि धर्म को मार देता हे और आज जोराष्टर धर्म लुप्त हो गया हे और इससे प्ररित 3 नये धर्म आ गये । असल मेँ सारे धर्मोँ मेँ तत्व एक हे परंतु अलग अलगा भाषा , प्रांत और अलगाववाद के वजह से हमेँ वो दिखनहीँ पाता ।

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

गजानन माधव मुक्तिवोध..... एक परिचय !

13 नवेम्बर 1917 मेँ मध्यप्रदेश के ग्वालियर सहर नजदिक जन्मेँ गजानन माधव मुक्तिवोध जी सिर्फ 46 वर्षोँ तक जीँदा रहे पर इन 46 वर्षोँ मेँ उन्होने आधुनिक हिँदी साहित्य को एक नया मोड़ दिया । उनके पिता पोलिस विभाग मेँ इंस्पेक्टर थे और उनकी बारबार बदली से मुक्तिवोध जी को काफि परेशानीओँ का सामना करना पड़ा । 1930 मेँ उजैन से मीडल कि परीक्षा दिया पर विफल हुए । उनकी प्रख्यात कविता "अंधेरे मेँ" को आधुनिक हिँदी कविता मेँ माष्टरपिस कहाजाता है । 1957 मेँ उन्होने यह काव्य लिखना शुरुकिया और 1964 मेँ उनके मृत्यु पश्चात यह प्रकाश मेँ आया । आज भी इस ग्रंथ पर प्रगतिशील कवि समाज मेँ मतान्तर देखने को मिलता है । कई प्रकार के भावनाओँ से वहति इस कविता मेँ मुक्तिवोध जी नेँ आजादी बाद नया सपनाओँ के बीच ब्याप्त अराजकता और अंधकार कि बात करते है । अंधेरे मेँ कि तरह उनका ब्रह्मराक्षस नामक कविता भी काफि लोकप्रिय हुआ एबं इस कविता का नाट्यरुपान्तरण भी किया गया था । कहाजाता हे कि मुक्तिवोध पर दोस्तोयेवेस्की ,लियो टॉल्सटोय और मेक्सिम् गोर्की आदिओँ का बौधिक प्रभाव पड़ा था और शायद इसलिये उनके साहित्य रचनाओँ मेँ समाजवाद दिखजाता है ।
उन्होने स्वयं दो पुस्तकोँ का प्रकाशन किया था 1.कामायनी एक पुर्नविचार और 2.भारतीय इतिहास एबं संस्कृति विषय पर एक पाठ्य पुस्तक ।
वे अचेतन अवस्था मेँ लकवाग्रस्त हो गये थे तभी उनका एक पुस्तक प्रकाशित हुआ "एक साहित्य कि डायरी" । "अंधेरे मेँ" और "चाँद का मुँह तेढ़ा" आदि कुछ कविता उनके मृत्यु के पश्चात प्रकाशित हुआ था । उनकी अन्य एक काव्य संग्रह "भुरी भुरी खाक धुल" भी लोगोँ के द्वारा आदृत हुआ । उनकी तमाम सर्जन मुक्तिवोध रचनावली के नाम से 6 खंड़ोँ मेँ प्रकाशित हुआ है । कविता उपराँत उनके द्वारा रचित विवेचन लेख भी जनादृत हुआ जैसे कविता का आत्मसंघर्ष , नये साहित्य का सौँदर्यशास्त्र,समीक्षा कि समस्याएँ आदि । उन्होने काठ का सपना , विपात्र एवं सतह से उठता आदमी नाम से काहानी भी लिखा है । 1981 मेँ मणि कौल नेँ उनकि कहानी सतह से उठता आदमी पर एक फिल्म बनाया था जिसे कान फिल्म फेस्टिवाल मेँ दिखायागया था । 11 सेप्टेम्बर 1964 मेँ सिर्फ 46 वर्ष जिँदा रहनेवाले इस साहित्य साधक नेँ दुनिया को अलविदा कहदिया ।

सोमवार, 15 सितंबर 2014

आखरी सुबह

गांधीजी नेँ देश को आजाद करने के लिये कई जात धर्म मेँ बँटा भारत को एक होने का आह्वान किया था । इसलिये सरदार पटेल जवाहरलाल मौलाना आजाद जैसे नेता उनके साथ थे सुभाषजी नेँ आजीवन (?) उनको अपना प्रेरणा माना । उनदिनोँ देश मेँ एक वर्ग ऐसा भी था जिसे गांधीजी द्वारा कियागया निर्णय भाता न था । वे लोग हिँसा के बलपर स्वतंत्रता लाना चाहते थे पर फिर भी गांधीजी कि हत्या कर दिया जायेगा कोई सोच ही नहीँ सकता था । देश स्वतंत्र होने के बाद पूना सहर मेँ सर्वसाधारण सभा मेँ मराठा ब्राम्हण समाज नेँ गाधीँजी पर गम्भीर आरोप लगाया जा रहा था क्युँ की गांधीजी दलित और मुसलमानोँ के लिये कुछ ज्यादा ही प्रयत्न कर रहे थे । उन्ही दिनोँ एक कार्यक्रम के दौरान गाधीँजी पुने आ रहे थे , वहीँ उने मारने की एक योजना बनाया गया था पर ये आयोजन असफल रहा , यह शुरवात था अंत अभी बाकी था । आजादी के बाद गांधीजी द्वारा पाकिस्तान को 54 करोड़ देने को लेकर हुए विवाद से देशभर के युवा दंग थे । वही सरदार सहित ज्यादातर राष्ट्रवादी नेता पाकिस्तान को पाठ पढ़ाने के मुड़ मेँ थे परंतु गांधीजी के कारण उन्हे मजबुर होकर 56 करोड़ लौटाना पड़ा था । उनदिनोँ गाँधीजी नेँ यहाँतक कहदिया था कि वे पाकिस्तान जाकर अपना बाकी जीवन बितादेगेँ ।
नथुराम गोड़से जैसे युवा गांधीजी जी के आचरण देखकर तैश मेँ आ गये थे । कोई करे न करे हमेँ गांधी हत्या करना है इस लक्ष को हासिल करने के लिये नाथुराम गोड़से और नारायण आप्टे के साथ मुस्लीम अन्याय सहन करनेवाले मदनलाळ पहावा,विष्णु करकरे एवं गोपल गड़से नेँ भी साथ दिया था । ये लोग मूर्ख न थे इन्होने काफी स्टड़ी करने के बाद इसे अंजाम दिया । .
૩૦ जानुआरी कि वह आया । शायद गांधीजी को अपने मौत का एहसास हो गया था । उस दिन ओल इंड़िया रेडियो के कर्मचारी गांधीजी के प्राथनासभा कि रेकर्डिगं के लिये पहचंगये थे । सुबह के साढ़े तीन बजे उठे गाधीँजी का दिन मेँ 14-15 घंटे बितने के बाद सरदार उनसे मिलने आये । सरदार जी से मिलने के बाद गांधीजी प्राथनासभा कि और लौट रहे थे । मनु और आभा के साहारे वे आगे बढ़ रहे थे कि एक युवक सामने आया उसने गांधीजी के चरणस्पर्श किया मानोँ अर्जुन भीष्म को शरशया देनेँ से पहले अपने सफल होनेँ का बरदान माँग रहा हो । आभा नेँ आगे आ कर उस युवक को कहा भाई बापु का विलम्भ हो रहा है । उसी वक्त नाथुराम नेँ मनु को धक्का देकर तीन गोली छोड़ दिया । आखरी शब्द "हे राम" के बाद दीप बुझगया । लोग दौड़नेलगे सभी नेताओँ के आंख भीगगये । कहाजाता है गांधीजी के शव यात्रा मे 20 लाख लोग सामिल हुए थे और वे लोग गांधीजी के मौत के बाद भी अन्हे जीँदा देखने की इछा रखते थे ।

रविवार, 10 अगस्त 2014

श्रावण पूर्णिमा विशेष

🙏 👏 आज श्रावण पूर्णिमा है ! देश में हर प्रांत में अलग-अलग रूपों में इसे हर्सोउल्हास के साथ मनायी जाती है ।
1.संपूर्ण भारत मेँ आज रक्षाबंधन का तौहार मनाया जाता है । बहनेँ अपने भाईओँ को राक्षी बांधकर लम्बेँ उम्र कि कामना के साथ अपने रक्षा का वचन भी लेती है ।
2.आज भगवती गायत्री जयंती" भी है। यूं तो श्रावण पूर्णिमा पर ही भगवती गायत्री जी की जयंती कही गयी है, पर गंगा दशहरा के दिन भी इनकी जयंती बतलाई गई है।
3.आज देववाणी संस्कृत दिवस भी है। ऐसी मान्यता है कि देववाणी संस्कृत की उत्पत्ति श्रावणी पूर्णिमा को हुई थी। अतः श्रावण मास की पूर्णिमा को 1969 से संस्कृत दिवस की शुरुआत हुई। इस दिन को इसीलिए चुना गया था कि इसी दिन प्राचीन भारत में शिक्षण सत्र शुरू होता था।
4.श्रावणी पूर्णिमा के दिन बाबा अमरनाथ के दर्शन की भी बडी महिमा है। श्रावण मास का अंतिम दिन है और बाबा बर्फानी के दर्शन हो जाएँ इससे बड़ा सौभाग्य और क्या होगा?
5.श्रावणी पूर्णिमा के दिन श्रवण कुमार का भी पूजन और स्मरण किया जाता है ।
6.आज लव-कुश जयंती भी है। श्रावण पूर्णिमा को ही श्रीरामचंद्र जी व सीता माता के वीर जुड़वां पुत्रों लव और कुश का जन्म हुआ था। उनका जन्म तथा पालन महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में हुआ था। प्रथम बार रामलीला का वाचन इन दोनों के द्वारा ही किया गया था ।
7. आज ही के दिन भगवन विष्णु हयग्रीव के रुप मेँ प्रकट हुए थे ।
8.तमिलनाडु, केरल, उड़ीसा और महाराष्ट्र में यजुर्वेद पढ़ने वाले ब्राह्मण इस दिन को अवनी अवित्तम के रूप में मनाते हैं। इस दिन पुराने पापों से छुटकारे के लिए महासंकल्प लिया जाता है। ब्राह्मण स्नान करने के बाद नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं ।
9. ओड़िशा मेँ आज बलराम जी विशेष पूजा किया जाता है । श्रीमंदिर मेँ भी आज खास पूजाओँ का आयोजन किया जाता है । ओड़िशा मेँ श्रावण पूर्णिमा को गन्हा पूर्णिमा कहा जाता है । जिन बहनोँ कि कोई भाई नहीँ होते वे आज बलराम जी को राक्षी भेँट करती है । आज गोमाता को भी पूजा किया जाता है और चावल के आटे से बना पिठा खिलाते है ।
10.गुजरात में शिव भगवान की उपासना बड़े जोर-शोर से होती है। पूरे साल लोग शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। श्रावण पूर्णिमा जल चढ़ाने का अंतिम दिन होता है। इस दिन शिव जी का पूजन भी होता है। पवित्रोपना के तहत रूई की बत्तियाँ पंचग्वया (गाय के घी, दुध, दही आदि) में डुबाकर शिव को अर्पित की जाती हैं ।
11.श्रावण पूर्णिमा को दक्षिणभारत मेँ नारियली पूर्णिमा के रुप मेँ मनाया जाता है । पश्चिमी घाट पर रहने वाले लोगों का एकमात्र आधार समुद्र ही है। समुद्री सामग्री पर जीवन निर्वाह करने वाले लोग इस दिन समुद्र के देवता वरुण की पूजा करते हैं । मछुआरे अपनी-अपनी नावों को सजाकर समुद्र के किनारे लाते हैं। नाचते गाते हैं और वरुण देवता को नारियल अर्पित कर प्रार्थना करते हैं कि उनका जीवन निर्वाह अच्छे से हो ।
12. आज हि के दिन को मध्यभारत मेँ कजरी पूर्णिमा के तौर पर मनाया जाता है । यह त्योहार भी श्रावण पूर्णिमा के दिन ही पड़ता है। कजरी पूर्णिमा को मध्य भारत में खासकर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में मनाया जाता है । (source ..INTERNET)

फिल्मीँ रक्षाबंधन

"filmy rakshabandhan"

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आज भले Bollywood कि इस्लामीकरण हो गया है लेकिन 90 के दशक तक रक्षाबंधन पर कई गानेँ बने जो आज भी अपने लोकप्रियता के लिये जानीँ जाती है.......यहाँ कुछ गानोँ का जिक्र करुगाँ यह गीत अकसर मन मेँ मेरी बहन कि याद दिलातीँ है

1. अब के बरस भेजो भैया को बाबुल......Bandini
नुतनजी पर फिल्माया गया यह गीत आशा ताई नेँ गाया था । इस गानेँ के बारे मेँ आशा ताई नेँ विविधभारती मेँ अपने यादेँ शयर किया था । दरअसल आशाताई जी कि शादी के बाद उनके शशुराल और मायकेवालोँ के बीच किसी बात पर रिस्ता टुटगया था । उन्हे मायके जाने व भाई बहनोँ से मिलने कि अनुमति न थी । संजोग देखिये 10 साल के बाद उन्हे यह गाना गाने को मिला बाद मेँ उन्होने आर ड़ी बर्मन से शादि कर लिया था.....

फुलोँ का तारोँ का सबका कहना है - (Hare Rama Hare Krishna)
Dev Anand और Zeenat Aman जी पर फिल्माया गया गाना जब भी बजता था मेरी मा इस गाने को दिखा कर मुझे और मेरी बहन को झगड़ा न करने कि सलाह देती थी ! :-D :-D :-D :-D :-D

3.मेरे भैया मेरे चंदा (Kajaal)
मेँ जब भी यह गाना देखता था मेरी बहन से 3/4 दिनतक नहीँ झगड़ता था ।

4.मेरी राक्षी का मतलब है प्यार भैया.... -( Tiranga)
Varsha Usgaonkar अपने तिन भाईओँ को राक्षी बांध रही है । यहाँ गौर करनेवाली बात यह है कि राक्षी न बंधे भाई कि मौत गाने के अंत मेँ गोली लगने से है ।

रंग विरंगी राक्षी लेकर (Anpadh)
हम बहनोँ के लिये.... (Mere Bhaiya Anjaana)
यह राक्षी बंधन है ऐसा... (Beimaan)
चंदा रे मेरे भैया (Chambal Ki Kasam)
भैया मेरे राक्षी के बंधन.... (Choti Behan)
झुला वाहोँJ का.... (Doli Sajake Rakhna)
मेरे भैया मेरे चंदा (Kajal)
बहना ने भाई कि कलाई से .... (Resham Ki Dori)
गुड़िआ जैसी बहना मेरी...(Adalat)
छोटे छोटे भाईओँ के बड़े भैया (Hum Saath Saath Hai)
मेरी प्यारी बहनीयाँ बनेगी.... (Sachha Jhutha) बाबुल छुट चला तेरा अंगना (Rakhi1962)
मेरी राक्षि की रखियो.... (Naya Kanoon)
भाई बहन का प्यार (Farishtay)
मेरी छोटी सी बहन....( Toofan Aur Deeya)