मेँ अपने मन का दास कलम का कर्मचारी हुँ जो मन मेँ आया लिखदिया । कोई पागल कहे तो मुझे क्या ? कहता है तो कहने दो ।।
ब्लॉग आर्काइव
सोमवार, 4 जुलाई 2016
सर्वं विष्णुमयं जगत्
ऐसे ही कभी कहीँ एक साधु हुआ करते थे !
वो प्रायः मौन रहते
तब भी जब कोई उनके भेषभुषा को देखके व्यंग्य वाण चलाए
अथवा पागल समझते हुए पत्थर मार उन्हे क्षताक्त करे !
एक दिन वे साधु किसी गाँव मे
भिक्षान्न संग्रह
पूर्वक लौट रहे थे कि
उन्होने देखा कोई कुत्ता
उनके पिछे पिछे चला आ रहा है ।
उन महात्मा ने उस आवारा कुत्ते पर सवार हो साथ लिए एक वरगत के पैड के निचे भिक्षान्न भोजन करना शुरुकरदिया ।
दुपहरिआ मे
धुप से बचने के लिए वहाँ कुछ लोग आराम कर रहे थे
वो लोग इस नज़ारे को देख सहसा ठहाके लगाके हसने लगे....
अब साधु ठहरे मनमौजी राग द्वेष रहित
वे भी हँसने लगे
लोग हैरान !!!
अन्त मे साधु ने कहा
विष्ण्युपरि स्थितो विष्णुः
विष्णु खादति विष्णवे ।।
कथं हससि रे विष्णो ।
सर्वं विष्णुमयं जगत् ।।
पादना ये प्रकृति कि पुकार है
ये प्रकृति कि पुकार है
अब अपानवायु को हम रोक तो नहीँ सकते न
निकल गया सो निकल गया !
हाँ तो एक बार एक ग्रृप मे
मैनेँ मोदी - दिग्गविजय पाद प्रसंग पर एक जोक चैँप दिया था
ओर तब उस सभ्य समाज के
कट्टर मुखिया ने हमे ठेँगा देखाते
हुए
कहा था
खबरदार !!
इहा माताएँ बहनेँ
भी है
ऐसे उलजलुल पोस्टिआने से बचेँ !!
मैँ कंफ्युज हुँ
शायद महिलाएँ
लघुशंका दीर्घशंका
और पर्द्दन आदि नित्यकर्म करती ही नहीँ
उनका इंजन पुरुषोँ से बिलकुल भिन्न होता होगा ।
मुझे पता नहीँ शायद ऐसा ही हो !!
खैर तब
मैने अपनी गलती मान ली
और उन दिग्गजोँ के आगे स्वयं को सरेँडर कर दिया !
जोक ये था
"एकबार मोदीजी पत्रकारोँ से बात कर रहे थे
और किसी ने उनके आगे दिग्गविजय का नाम ले लिया
मोदी ने कुछ कहे बगैर
पाद दिया
अगले दिन देश भर मे पतरकारोँ ने इसे मुख्य मुद्दा बनादिया
कि देखो
मोदी ने दिगविजय के मुँह पर पाद दिया !"
संस्कृत शब्द # पर्द्दनसे हिन्दी बाग्ला मे # पाद
ओड़िआ मे # पाड़
तथा
अंग्रेजी मे # Fartशब्द प्रचलन मे आया ।
वैसे
जानवरोँ मे शियार और गिदड
सबसे उत्कट गंधयुक्त अपानवायु छोड़ने के लिए जाने जाते है ।
बचपन मे 5 बच्चे साथ साथ बैठे हो और उनमे से कोई
पाद दे तो
एक काठी घुमैके
मुहावरा बोलके जिसके पास अन्तिम शब्द खत्म होता था
उसे ही दोषी करार दिया जाता था
पंचम RD Berman
ये "पा" सनातनीओँ का पंचम तान है ।
हमारा सुबह का शुरवात इसी
पंचम तान से होता हे
जब काक पक्षी
'का' 'का' कर के हमेँ निँद से जगाता है ।
_ _
लेकिन सोचो
मैँ आज ये सब क्युँ बता रहा हुँ
च्युँकि आज है
म्युजिक मैस्त्रो पंचम दा
Rahul Dev Burman जी
का Birth Day
संगीतकार
सचीन देव बर्मन ने देखा जब जब उनका बेटा रोता है
पंचम तान मे रोता है
इसलिए आर डी बर्मन जी का नाम पंचम पड़ा !
कुछ लोगोँ के हिसाब से
R.D Burman के बालपन मे एकबार सचीन दा के घर
दादामुनी अशोक कुमार गये हुए
थे
अशोक दा ने देखा
आर डी बर्मन वहाँ पा पा पा
कर रहे थे
और इसलिए अशोक दा ने उनका निक् नेम पंचम रखा ।
पंचम दा जब 13 के थे
एक बार
लताजी उनके यहाँ आई हुई थी
पंचम दा ने जैसे ही जाना वह लताजी है
दौडे अटोग्राफ के लिए
पंचम दा ने लताजी से कहा
क्या आप मुझे अपना अटोग्राफ देगी ?
लताजी ने तब पंचम को जो आशिर्वाद दिया
आगे चल के वे इत्ते बड़े कंपोजर बने
आज दुनिया जानता है ।
ऐसे
बहुत कम मिशालेँ है
कि बाप भी ग्रेट , बेटा भी ग्रेट
हो
राहुल देव बर्मन दुनिया के ऐसे अकेले इकलौते कंपोजर है
जिनके कंपोजिसन मे
उनके पिता यानी सचीन देव बर्मन ने एक गाना गाया था !
युँ तो
Bollywood मे कंपोजर अनेकोँ हुए है
लेकिन उनके तरह म्युजिकाल एक्सपेरिमेँट
करनेवाला न हुआ न है ।
ये ग्रामी आवार्डवालोँ कि बद् किस्मती है कि
उन्होने R.D Burman के प्रतिभा को नजर अंदाज करदिया !
"मेरे सामने वाले खिडकी मेँ"
से
"एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा" तक
उनके ज्यादातर गानेँ
आज भी उतनी ही लोकप्रिय जितने कल थे ।
बंगाल कि रानी रासमणी
कोलकत्ता के प्रशिद्ध दक्षिणेश्वर काली मंदिर से आप सभी परिचित होगेँ
लेकिन क्या आप जानते
है ......
इसकी प्रतिष्ठात्री एक नारी थी ।
स्वर्गीया रानी रासमणी माडे
ने यह मंदिर बनवाया था !
अति दरिद्र कैवर्त परवार मे इनका जन्म हुआ
ये अपनी युवाकाल मे परम रुपवती थीँ !
कोलकत्ता के ही एक अमीर युवक रामचंद्र माडे का
दिल इन पर आ गया !
दोनोँ ने
उस समय कि कट्टरवादी समाज से लड़ झगड़ के व्याह रचाया
कुछ काल तक उनका
दाम्पत्य जीवन सुखमय रहा
लेकिन 1836 साल मे रामचंद्र जी इन्हे और दुनिया को छोड़ गए ।
साधारण स्त्री होती तो इतने सारे विपत्तिओँ के आगे दाम तोड़ देती
लेकिन विचक्षण बुद्धि
संपन्न रासमणी खुद झुकी
न किसी को झुकने दिया !
बाल्यकाल गरीबी मे बिता था
इसलिये इन्हे गरीबोँ का दुःख दर्द का एहसास था
अतः धर्मपरायणा तेजस्वनी
गरीबोँ के उपकार व्रत मे दीक्षिता हो गई !
कुछ वर्षोँ मे देवी रासमणी माडे कोलकत्ता सहर मे इतनी प्रसिद्ध
हो गई कि
साधारण जनता उन्हे रानी माँ
पुकारने लगे ।
राजपरिवार कि न होकर भी
इनकी परोपकारिता दानशीलता
से प्रभावित हो
लोग
उनको रानी उपाधी
प्रदान किए थे !
परवर्त्तीकाल मे अनेकानेक लोगोँ को ख्रिस्तियन होते देख
रानी रासमणी माडे ने हिन्दु धर्म परम हित साधनार्थे
कई छोटे बड़े मंदिरो का निर्माण करवाया
जिसमे दक्षिणेश्वर काली मंदिर अन्यतम है ।
ध्यान रहे यह वही मंदिर है
जहाँ श्री रामकृष्ण परमहंस जी
पूजक होने के साथ साथ उद्योगी
बालकोँ को सनातन धर्म के विषय मे शिक्षा भी देते थे !
आगे चलकर इन्ही श्रीरामकृष्ण परमहंस जी के पाद पद्म मे ज्ञान आहरण कर
बिबेकानन्द विश्व प्रसिद्ध हुए !
बुधवार, 10 फ़रवरी 2016
***पारलाखेमुण्डि मे उपनिवेशवाद के खिलाफ सशस्त्र संग्राम्
अंग्रेजोँ ने 1767-68 मे दक्षिण ओड़िशा
के पारलाखेमुण्डि
(बर्तमान के गंजाम गजपति जिल्ला )
राज्य पर हमला करदिया
हमले के जवाब मे स्थानीय राजा
# जगन्नाथ_नारायण_देव तथा उनके अधिनस्त जमिदार तथा # विशोइ # दोरा
# दोरत्नम् सर्द्दारोँ ने अंग्रेजोँ का प्रतिरोध किया ।
परंतु पारलाखेमुण्डि राजा
1768 मे अंग्रेज # कर्णेल_पिच् के हातोँ
# जेलमुर मे परास्त हुए ।
उन्होने अंग्रेजोँ के खिलाफ
कटक के तत्कालिन # मराठा सरकार से सहायता माँगा था
लेकिन मराठीओ ने सामरिक सहायता देने से साफ मना करदिया था
च्युँकि उन्हे युद्ध न करने के लिये अंग्रेजोँ से तगड़ा रकम् मिले थे ।
युद्ध मे हारने के बाद अंग्रेज राजा जगन्नाथ नारायण को मारनेवाले थे के
तभी उनके कुछ आदवासी विशोइ सर्द्दारोँ ने उन्हे सकुशल बचालिया....
अब राजा और उनके समर्थक अनुचर वागी बनेँ
1768 से 1770 तक राजा जगन्नाथ नारायण ने
अंग्रेजोँ को उनके पारलाखेमुण्डि राज्य मे खजाना वसुलने नहीँ दिया
इससे व्रिटिश इष्ट इंडिया के आला अधिकारी वेहद खफ़ा हो गये और विद्रोह कुचलने के लिये अपने सबसे ताकतवर रेजिमेँट भेजदिया था
राजा जगन्नाथ नारायण देव
मरते दमतक अंग्रेजोँ से लढ़ते रहे
और अंततः वीरगति को प्राप्त हुए ।
~~~उनके मृत्यु पश्चात
अंग्रेजोँ ने राजपुत्र
# गजपति_देव को पारलाखेमुण्डी का नूतनराजा के रुपमे स्वीकृति दिया !
हालाँकि गजपति देव स्वयं को
स्वतंत्र समझते थे
परंतु अंग्रेजो ने जब उनके राजकार्य मे अपना हस्तक्षेप किया
दोनो पक्षोँ मे संबन्ध तिक्त हुए ।
1773 मे जगन्नाथ नारायण देव के पुत्र गजपति देव ने अंग्रेजोँ के खिलाफ अपने समर्थकोँ के साथ मिलकर विद्रोह किया
था परंतु हारकर अंग्रेजोँ के हातोँ 1774 मे वंदी बने ।
गजपति देव को अंग्रेजोँ ने विशाखापट्टनम् मे वंदी बनाए
रखा ।
अगले 6 वर्षोँ मे
यानी 1774 से 1780 तक
समुचे दक्षिण ओड़िशा क्षेत्रमे
विशोइ और दोरा आदिवासी संप्रदाय के सर्द्दारोँ ने अंग्रेजोँ का
निन्द हराम करदिया था
अंततः 1780 मे अंग्रेजोँ को मजबुरन गजपति देव को कारागार से मुक्त करना पड़ा था
और इसतरह से गजपतिदेव को पुनः पारलाखेमुण्डि की राजगदी हासिल हुई थी ।
हालाकिँ अंग्रेजोँ के खिलाफ
आदवासीओँ ने विद्रोह जारी रखा
1799 मे अंग्रेजोँ ने एक आदिवासी नेता को मारदिया
जिससे समुचे क्षेत्र मे विद्रोह हुए ।
राजा गजपतिदेव ने भी विद्रोहीओँ का साथ दिया
जिससे अंग्रेजोँ ने गजपति देव और उनके पुत्रोँ को # मुसलिपट्टनम् मे पुनः वंदी बना दिया था !
1800 से 1803 तक पारलाखेमुण्डि मे अंग्रेजोँ ने इतना खुन वाहाए कि मिट्टी बंजर हो गयी
और
लगातार तिन वर्षोँतक आए अकाल से स्थानीय प्रजा देश छोड़ जाती रही
और उधर राजपरिवार निश्वः हो गया.....
इसतरह से एक लम्बी उतारचढ़ाव वाले नाटकीय घटनाक्रम से गुजरते हुए
अंग्रेज
पारलाखेमुण्डि का विद्रोह दमन
कर पाए थे ।
आगे चलकर
1830 मे इस क्षेत्रमे पुनः विद्रोह हुए
इसबार विद्रोहीओँ के शिकार बने कंपानी मेनेजर जमिदार पद्मनाभ देव !
पद्मनाभ देव अंग्रेजोँ के हातोँ बिकचुका था
उसने इस क्षेत्र के प्रजाओँ पर वर्षोँ अत्याचार किया
पर वो कहते है न
एक दिन पाप का घड़ा भर ही जाता है
1830 मे विद्रोहीओँ ने जमिदार के घर व कचेरी को आग के हवाले करदिया
1832 तक विद्रोही अंग्रेजोँ को मुँहतोड़ जवाब देते रहे
उसी साल मद्रास सरकार द्वारा जर्ज एडवार्ड रसेल को
विद्रोह दमन के लिये भेजागया !
Edward Russel ने अपने सेना को अर्डर दे रखा था
जहाँ भी हतियारधारी योद्धा दिखे जान से मार दो !
कोई दया नहीँ कोई क्षमा नहीँ ।
पहले पहल वो नाकाम् रहा
और तब उसने अपना गुस्सा आमजनता पर उतारा....
हजारोँ लोग कत्लेआम् हुए
लाखोँ वेघर हुए
इससे कुछ एक विशोइ दोरा सर्द्दारोँ ने आत्म समर्पण करदिया व ज्यादातर विद्रोही उत्तरओड़िशा चलेगए !!
अंग्रेजोँ को लगा उन्होने विद्रोह दमन करलिया
अनगिनत लाशोँ के एवज् पर ही सही ।
1856-57 मे सिपाही विद्रोह के समर्थनमे यहाँ पुनः विद्रोह हुए
इस विद्रोह के कर्णधार रहे राधाकृष्ण दण्डसेना
विद्रोहीओँ ने अंग्रेजोँ को सहायता करनेवाले
देशद्रोही जातिद्रोहीओँ के घर जलादिए और लुटपाट मचाया ।
तब इस विद्रोह को दमन करने के लिये Captain wilson ने शवरोँ के परिवारोँ को निशाना बनाया
अनेकानेक शवर गाँव जलादिए गये
अपने ही लोगोँ पर हो रहे
बलात्कार हत्या और अत्याचार का विभत्स रुप
देख विद्रोह और भड़का
इसबार विद्रोहीओँ ने अंग्रेजोँ का सिधा मुकावला किया
लेकिन हारगये ।
राधाकृष्ण दण्डसेना और उनके कुछ विद्रोही साथी को अंग्रेजोँ ने फाँसी पर चढ़ा दिआ था .....
-Extra shot-
च्युँकि जगन्नाथ नारायण देव के पुत्र गजपति देव ने अंग्रेजोँ के खिलाफ लम्बी लढ़ाई लढ़ी थी
अविभक्त गंजाम जिल्ला से अलग होने पर इस पारलाखेमुण्डि क्षेत्र अंतर्गत
भूमिखंड का नाम गजपति रखा गया......
सोमवार, 1 फ़रवरी 2016
वीरा मंगेइ वेलनचेअर
दक्षिण भारत मे जन्मे स्वतंत्रता सेनानीओँ मेँ वीरा मंगाई भेलुनाचैयार Veera_Mangai_Velunachiyar देवी का नाम आदर सहित लिया जाता है !
18वी सदी मे इस नारी नेत्री ने अंग्रेजोँ के खिलाफ विद्रोह किया था !
1730 AD मे उनका जन्म रमनांड [Ramnad] राज्य मे हुआ था ।
उनके पिता थे महाराजा मन्नार सेल्लामुथ्थु सेथ्थुपाथ्थी व माता रानी सकन्दिमुथ्थाल !
च्युँकि राज दंपति कि वो इकल्लौति कन्या थी राजघराने द्वारा उन्हे नमनाँड क्षेत्र का युवराज्ञी अभिषिक्त किया गया ।
भल्लारी युद्ध कला मे निपुण राजकन्या को तीरदांजी घोड़ सबारी के साथ साथ विदेशी भाषाओँ का भी ज्ञान था ।
युवाकाल मे उनका विवाह Sivagangai Mannar Muthuvaduganathar के साथ करदिया गया ।
इसबीच जैसे तैसे उनका जीवन सुखमय बीत रहा था ।
1772 मे उनके राज्य पर अँग्रेज आक्रमण हुआ । L.t Col. Bon jour के सेनापतित्व मे अंग्रेजोँ ने Kalaiyar koil war छेड़ दिया ।
इस युद्ध मे उनके पति Raja Muthu Vaduganathar व कन्या राजकुमारी Gowri Nachiyarवीरगति को प्राप्त हुए ।
यह युद्ध कलैयार कोली राजप्रासाद सन्निकट हुआ था । .
इस लढ़ाई मे रानी सुरक्षित बच निकली वहीँ उनके दोनोँ भाई लहुलुहान हुए ।
राजघराने के बचे सदस्योँ ने कसम खाया कि वो अंग्रेजोँ को उचित शिक्षा देने के साथ साथ अपने राज्य पर पुनः प्रभुत्वस्थापित करेगे ।
रानी को उनके विश्वासी भरोसेमंद महामंत्री Dalavay Thandavaraya Pillai जी ने सुरक्षा दृष्टि से वो स्थान छोड़ ने
को
वहीँ महामंत्री ने Sultan Hyder Ali से रानी Velu Nachiyar कि सुरक्षा हेतु 5000 सैन माँगा था हैदर अली ने सहायता तो भेजदिया परंतु वे उनके साथ मिलकर अंग्रेजोँ के फिलाफ लढ़नहीँ पाए बुढ़ापे के कारण सुलतान हैदर अली चल वसे ।
हालाँकि बाद मे रानी को हैदर अली के पुत्र द्वारा हरसंभव सहायता मिला ।
हैदर अली ने पहले ही Syed Karki को Dindigul fort मेँ रानी कि मदद के लिये भेजदिया था । हैदर अलि के पुत्र व मराथु भाईओँ के मदद से रानी ने Sivaganga प्रदेश पर हमला कर दिया । अंग्रेजोँ द्वारा गद्दि पर बिठाये गये अरकट के नवाव रानी भेलु से हार गये और अपने राज्य को पुनः प्राप्त करने के वजह से रानी को Sivagangai seemai की उपाधी मिली ! रानी. Velu Nachiyar प्रथम भारतीय शासिका थी जिन्होने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह किया था और उन्हे जीत भी मिली थी !
Prof.Sanjeevi जी ने अपने ऐतिहासिक किताब Maruthiruvar’ मे लिखा हैरानी Velu Nachiyar ने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ रानी लक्ष्मीवाई से 85 वर्ष पूर्व जंग लढ़ी थी और उन्हे इसमे अभुत पूर्व सफलता भी हासिल हुआ था । वहीँ इतिहासकार Venkatam नेँ रानी Velu Nachiyar कि प्रंशसा करते हुए उन्हे भारत कि Joan of Arc. तक कहा है ।
ऐसे वीरागंनाओँ को मेरा सत् सत् नमन.....
जय माँ भारती
एक भारत समृद्ध भारत
शनिवार, 16 जनवरी 2016
भोजनप्रिय भीम
मत्स्य देश के राजरसौया बने थे....
सारला_महाभारत मे भीम कैसे अछे रसौया बने इसपर एक मजेदार कथा है जो इसप्रकार है....
श्रीकृष्ण के तरह भीम भी बचपनमे बड़े नटखट शरारती व
भोजनप्रिय हुआ करते थे !
खाने को लेकर के उनका आग्रह व आशक्ति दिनप्रतिदिन बढ़ता चलागया ...
और इसके चलते रसोइ_घर से खाना भी चोरी होने लगा !!
पण्डु सोचते थे यथासंभव
रसोईया ही चोरी छिपे खाद्य लेता होगा च्युँकि वो पेटु था !
एकदिन उसे रंगे हातोँ पकड़ने के लिये रसोई घर मे पण्डु छिपगये !
निश्चित समय पर छिपते छिपाते रसोईघरमे
भीम आये और देखते ही देखते
सारे #पकवान चटकरगये !!
पण्डु को आ गया गुस्सा
इतनेमे पिता को छिपा हुआ देख भीम् वहाँ से लगे भागने
पण्डु भी उनके पिछे दौड़ने लगे
अब पवनपुत्र इतना तेज् दौड़े कि
पण्डु के हात न आये
भीम को धर न पाने के कारण
पण्डु का क्रोधावेग और बढ़ा
तब उन्हे शान्त करने हेतु
अग्नीदेव वहाँ आये
और
भीम् को तब उनसे ये वर मिला कि
वो तीनप्रकार के पकवान
गौरी ,शौरी व नलविधी के ज्ञाता होगेँ
तथा नित्य नूतन पकवान बनासकेगेँ !
भीम् के हात लगते ही घटिया से घटिया पकवान भी रसमय , स्वादयुक्त हो जायेगा !
विश्व मे भोजन ,रुप ,तथा वीरता मे भीम का कोई सानी नहीँ !
[Sarlamahabharat : page -252]
*****[[ विप्रश्री सारला दास द्वारा लिखागया [ओड़िआ] सारला महाभारत
मूल महाभारत से भिन्न स्वतंत्र कथाओँ के लिये जानाजाता है ।
सारलादास ओड़िआभाषा के आदिकवि है ! उन्होने महाभारत अतिरिक्त देवी भागवत तथा
विलंका रामायण भी लिखा है ]]----
रविवार, 27 दिसंबर 2015
युट्रेक्ट - नैदरलैँड का सांस्कृतिक सहर
2014 जनगणना के मुताबिक सहर मे प्राय़ः 330,772 लोग रहते है ।
युट्रेक्ट , युरोप कि पुरातन सहरोँ मे से एक है
यहाँ आज भी आपको आधुनक मध्ययुगीय बिल्डिंग्स देखने को मिलजायेगेँ !
आठवीँ सदी से ही युट्रेक्ट को इसाई लोग धार्मिक स्थल मानते आ रहे है ।
डच लोगोँ के स्वर्ण युग Dutch Golden Age मे इस सहर को काफि महत्वपूर्ण माना जाता था लेकिन बाद मे जब Amsterdam को राजधानी बनया गया इस सहर की प्रशिद्धि घटने लगी !
नेदरलैँड्स कि सबसे बड़ी युनिवर्सिटि मानीजानेवाली Utrecht University इसी सहर मेँ आता है । च्युँकि युट्रेक्ट
संयुक्तराज्य नैदरलेँडस् कि मध्यभाग मे आता है इसलिये
इसे देश का सबसे महत्वपूर्ण ट्रान्सपोर्ट हॉव के रुप मे जाना जाता है ।
इस सहर का नाम 2012 मेँ Lonely Planet के top 10 of the world’s unsung places आया था !
रोमन साम्राज्य जब समुचे युरोप मे व्याप्त था
युट्रेक्ट इस साम्रज्य कि उत्तरी सीमा कि प्रमुख सहरोँ मे से एक हुआ करता था !
तब इस सहर को रोमन लोग Traiectum ट्रेईक्टम् कहते थे ! अब Old Dutch भाषा मे कभी कभी T से पहले "uut" U का उच्चारण होता था !
इसलिये U-trecht नाम हुआ होगा । वहीँ 11वीँ सदी मे मिले कुछ सरकारी दस्तावेजोँ मे इसका नाम लाटिन भाषा मे Ultra Traiectum लिखा मिला है । ये भी हो सकता हे कि Ultra शब्द को पुरा न कहकर इस शब्द से सिर्फ U उच्चारण के साथ बाकी नाम लिया जाता था
जो बाद मे युट्रेक्ट हो गया हो !!
रोमन ऐतिहासिकोँ के हिसाब से
सेयुट्रेक्ट सहर को 50 से 56 AD के बीच रोमान लोगोँ ने वसाया था और उसका प्रारम्भिक नाम रखा गया था Traiectum Romanum !!
इस सहर मे 1579 को नैदरलैँडस् कि 7 उत्तरी राज्योँ ने मिलकर "Unie van Utrecht" (Union of Utrecht) का गठन किया था ।
इसी सहर मे स्पैनीश शासकोँ के खिलाफ राष्ट्रवादी डचीओँ ने स्वतंत्रता संग्राम कि घोषणा कि थी !
Dom (toren) Tower के लिये भी ये सहर जाना जाता है ।
डोमटोरेन Dom मीनार को 14वीँ सदी मे बनवाया गया था । 50 Bells के साथ इसकी कुल उँचाई 112 मिटर है । कहते है आसमान साफ होने पर इस मिनार कि उँचाई से आमष्टरडैम सहर को देखा जा सकता है ।
Extrashot:-नैदरलैँड्स गणराज्य को कुछलोग Holland भी कहते है ।
वाकी देशोँ मे ये बात आम है लेकिन नैदरलैँडस् उत्तरी भाग मे जाकर के अगर आप Holland कहेगेँ तो ये बात स्थानीय लोगोँ को बुरी लग सकती है ।
कहते है ये पुरा क्षेत्र कभी सिर्फ हॉलाण्ड के नामसे जाना जाता था
फिर राजनैतिक कारणोँ से North holland व South holland हुआ ।
North holland के लोग धीरे धीरे उस क्षेत्र को नैदरलैँड [nor -land] कहने लगे जबकी South holland का हॉलाण्ड नाम ही बना रहा !!!
मंगलवार, 22 दिसंबर 2015
===सत्य आम्र कथा [ସତ୍ୟ ଆମ୍ବ କଥା]===
मामाशकुनीसे विचारविमर्श करते और उनके कहे अनुसार
पुरोचनपुत्र गौरमुखको पाण्डवोँको खोजने के लिये नियुक्त करते है ....
जाने से पूर्व गौरमुख को मामाशकुनी कह रहे है.....
कि...
जो भी व्यक्तिविशेष तुम्हारे द्वारा माँग करने पर आश्वीन्माह मे आम्रफलला देगेँ उन्हे तुम पाण्डवही समझना !
चारमाह तक खोजने पर अन्ततः गौरमुख को पाण्डव अस्कन्दवनमे मिलजाते और वो उनके अतिथि बनते है !!!
अतिथि ब्राह्मण वेशधारी गौरमुख युधिष्ठिरको परिपक्व आम्र फल माँगते है
ये सुनकर युधिष्ठिर चिन्तित हो जाते ....
ये जानते हुए भी कि असमयमे आम्रफल नहीँ मिलेगा ,जैष्ठ पण्डुपुत्र उनके सभी अनुज भ्राताओँ को आम लाने के लिये भेजदेते है !
हालाँकि लाख प्रयत्न करने पर भी अनुजोँ को आम्रफल नहीँ मिलपाता केबल मात्र एक
गुठली ही मिलता है ....
अन्त मे युधिष्ठिर समेत पँचपाण्डव श्रीकृष्णको स्मरण करते और उन्हे साक्षात मानकर सत्य करते है !!!
उनके सत्य करने पर वो गुठली से पौधा और पौधे से वृक्ष मे रुपान्तरित होता है..,
और
देखते ही देखते वो वृक्ष कच्चे आम्रफलोँ से लद जाता है ....
फिर देवीदौपदी सत्य करती है....
उनके सत्य करते ही आम्रफल परिपक्व हो जाते....
युधिष्ठिर आम्रफल ब्राह्मणवेशधारीगौरमुख को प्रदान करते है
तब छद्म ब्राह्मण कहते है कि वे स्नान पश्चात इसे भक्षण करेगेँ और मौका देखकर वाहाँ से निकल लेते है ।
अब कृष्ण तो कृष्ण है.....
उनके नज़र से कौन बचपाया है.... !!!
रस्ते मे मायावी अपने माया के बल पर गौरमुख को मोह मे ड़ाल देते और उससे आम्रफल को चुरा ले जाते...
Source-Sarla Mahabharat
[[ओड़िआ भाषा के आदिकवि सारलादासजी ने पंद्रहवी सदी मे ओड़िआ महाभारत लिखा था....ओड़िआ महाभारत व्यास रचित महाभारत का कार्बन कॉपि नहीँ है....इस ग्रंथ मे कवि ने कई उत्कलीय कथा कहानीओँ को भी सामिल किया है...]]
शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015
क्षमा अवतार महर्षि पराशर
इससे क्रोधावेश मेँ आकर ऋषि विश्वामित्र बशिष्ट पुत्र नाश का भयानक श्राप दे देते है ।
श्राप के प्रभाव के चलते शक्ति समस्त वशिष्ट पुत्र दैत्योँ के हातोँ मारे जाते ।
ऐसी ही दुःखद परिस्तीति मे शक्ति कि पत्नी को एक पुत्ररत्न कि प्राप्ति होता है ।
महर्षि वशिष्ट उनका नाम #पराशर रखते है ।
बड़े होने पर एक दिन पराशर को यह पुरानी बात ज्ञात हो जाता है ।
लक्षप्राप्ति के लिये पराशर सदाशिव कि घोर तपस्या करते है और सिद्धि लाभ करलेने के पश्चात् वो विश्व विनाश कि तैयारीओँ मे लगजाते !
परंतु महर्षि वशिष्ट उन्हे ऐसा करने से रोकते है वो पराशर जी को जीव कल्याण माधव कल्याण का सुउपदेश देते हे ।
हालाँकि पराशर राक्षस सत्र यज्ञ आयोजन करते है इससे एक एक करके राक्षसोँ का यज्ञ मे मौत हेने लगता है ।
महर्षी वशिष्ट को जब इसबात का पताचलता है वे यज्ञस्थली मे आकर के अपने पौत्र को क्षमावान होने का उपदेश देते है । इससे महर्षी पराशर राक्षस सत्र यज्ञ को रोकते हुए दैत्योँ को क्षमा करदेते है !
तभी वहाँ राक्षस कुल के परम प्रशिद्ध मुनि पुस्य का आगमन होता है ।
वे महर्षी पराशर कि क्षमाशीलता से खुश हो उन्हे विष्णुभक्त होने का आशिर्वाद देते है ।
आगे चलकर विशिष्ट पौत्र महर्षि पराशर विष्णुपुराण कि रचना करते है ।