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मंगलवार, 27 जून 2017

जन्मदिवस विशेष आर डी बर्मन

'सा, रे, गा, मा, पा,धा,नी'

ये "पा" सनातनीओँ का पंचम तान है ।

हमारा सुबह का शुरवात इसी
पंचम तान से होता हे
जब काक पक्षी
'का' 'का' कर के हमेँ निँद से जगाता है ।

_ _

लेकिन सोचो
मैँ आज ये सब क्युँ बता रहा हुँ
च्युँकि आज है
म्युजिक मैस्त्रो पंचम दा
Rahul Dev Burman जी
का Birth Day

संगीतकार
सचीन देव बर्मन ने  देखा जब जब उनका बेटा रोता है
पंचम तान मे रोता है
इसलिए आर डी बर्मन जी का नाम पंचम पड़ा !

कुछ लोगोँ के हिसाब से
R.D Burman के बालपन मे एकबार सचीन दा के घर
दादामुनी अशोक कुमार गये हुए
थे
अशोक दा ने देखा
आर डी बर्मन वहाँ  पा पा पा
कर रहे थे

और इसलिए अशोक दा ने उनका निक् नेम पंचम रखा ।

पंचम दा जब 13 के थे
एक बार
लताजी उनके यहाँ आई हुई थी

पंचम दा ने जैसे ही जाना वह लताजी है
दौडे अटोग्राफ के लिए

पंचम दा ने लताजी से कहा
क्या आप मुझे अपना अटोग्राफ देगी ?

लताजी ने तब पंचम को जो आशिर्वाद दिया
आगे चल के वे इत्ते बड़े  कंपोजर बने
आज दुनिया जानता है ।

ऐसे
बहुत कम मिशालेँ है
कि बाप भी ग्रेट , बेटा भी ग्रेट
हो

राहुल देव बर्मन दुनिया के ऐसे अकेले इकलौते कंपोजर है
जिनके कंपोजिसन मे
उनके पिता यानी सचीन देव बर्मन ने एक गाना गाया था !

युँ तो
Bollywood मे कंपोजर अनेकोँ हुए है
लेकिन उनके तरह म्युजिकाल एक्सपेरिमेँट
करनेवाला न हुआ न है ।
ये ग्रामी आवार्डवालोँ कि बद् किस्मती है कि
उन्होने R.D Burman के प्रतिभा को नजर अंदाज करदिया !

"मेरे सामने वाले खिडकी मेँ"
से
"एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा" तक
उनके ज्यादातर गानेँ
आज भी उतनी ही लोकप्रिय जितने कल थे ।
R.D बर्मन साब को कभी National Award नहीँ मिला !
हाँ उनके वजह से कईओँ को जरुर मिला !

अमरप्रेम जैसे कई फिल्मोँ मे बहतरीन म्युजिक दे चुके
R.D बर्मन को
12 नोमिनेसन के बाद
सनम तेरी कसम के लिए
फिल्म फेयर आवार्ड मिला था

इसे सफलता प्रधान समाज का विफलता ही कहा जाएगा....

रविवार, 4 जून 2017

क्या मांस मछली खाना गलत है ??????

अकसर देखागया है जब #विधर्मी लोग किसी #सनातनी से #कुतर्क करके भी हार जाते

तब
वह एक ही बात दोहराने लगते है ।

"क्या #हिन्दु हिन्दु कर रहे हो ? अरे
जाओ देखो तुम्हारे यहाँ के
#ब्राह्मण भी
#चिकेन #मटन #अंडा खाते है कि नहीँ ?"

सनातन धर्म ने कभी कहीँ किसी ग्रंथ मे #फतवा जारी नहीँ कि है कि
आप मांस मछली चिकन खा ही नहीँ सकते

अपितु शास्त्र तो मुक्त कण्ठ से कहता है

"न मांसभक्षणे दोषाः न मदै न च मैथुने !
प्रवृत्तरेषा भुतानां निवृत्तस्तु महाफळाः !!"

अर्थात् न ही मांस मछली खाने से #दोषी होगेँ
न #मद्यपान अथवा #कामनाओँ से
परंतु #जीवोँ के लिए  इस #संसार सागर मे #प्रवृत्त यानी डुब जाने से अच्छा है #निबृत रहना यानी किचड़ मे होकै भी पद्म समान उससे विरक्त रहना !

#चीन जैसे देशोँ के लोग नाममात्र #बौद्धिस्ट है
ये लोग तो घर के #ककरोच #चिपकली तक को गटक् जाते है ।

वहीँ #भारत मे मटन चिकेन खानेवाले भी मानते है
न खाएं तो बहतर होगा ।

सनातन हिन्दु धर्म अपने अनुयायीओँ की #पराधीनता  पर यकिन नहीँ रखता

इसीलिए केवल एक हिन्दु हीँ मानव #जीवनमूल्योँ का सही खयाल रख सकता है ।

मंगलवार, 2 मई 2017

----------माता--------

भारतीय सभ्यता के वह शब्द
जिन्हें आज भी 700 करोड लोग अपनी माताको संबोधित करने को पुकारने को इस्तेमाल कररहे है.......

1.मा~माँ~माता

हमारे वैदिक भाषा में प्रचलित #मा धातु
से हमें माता शब्द प्राप्त हुआ है....
मा धातु के कई अर्थ हें
जैसे पालनकरना,सम्भालना,रखरखाव करना,
नाँपना,निर्माण करना,प्रस्तुत करना,बांटना,दिखाना,शब्दकरना आदि....

मा या मां/माँ शब्द इतना प्रभावशाली था /है कि भारत से निकलकर सारे संसार में फैलगया........

लाटिन में माता शब्द से Mater शब्द बना और ग्रीक् में μητέρα(मितेरा)...
अन्यभाषाओं में माता शब्द बदलकर कुछ युं बना......
.........
अंग्रेजी Mom/mother,
स्पेनिश - madre,
अफ्रिकान्-moeder,
डच् - moeder,
आइरिस-máthair,
इटालियन-madre,
रुषी भाषा में мать(mat')
चीनीभाषा में मुकिन् 母親 ,
डेनिस-Mor,
फ्रेंच-mère,
पुर्तगाली-mãe,
जर्मनभाषा में Mutter,
जुलुभाषामें-umama,
भिएतनामी-mẹ,
अरवी -   al'umm (الأم ),
Chichewa-amayi,
हिव्रु- अमा,इम्मा ama,imma(אמא),
युक्रेनीआन् -мати माति,
लिथुआनिआन्-motina,
Czech-matka,
खमेर-   मतै (mteay) (ម្តាយ),
पर्सियन-مادر मद्र,
आर्मेनियान् ~मैर (մայր)
लाटभिआन्-माते māte,
आइसलैंडिक् -móðir,
थाईलैंड कि थाई भाषा में माइ (แม่),
बर्मीभाषा में मिआकांई (မိခင်),
सिंहली भाषा में माभा -මව,
फ्रिसिआन frisian में -mem मेम,
Catalan भाषा में mare,

तो जैसा कि आपने देखा विश्व कि समस्त प्रमुख भाषाओं में मा धातु से जन्में शब्द प्रचलित है
लेकिन कैसे ?
क्या सभी विश्व प्राचीनकाल में भारतका अनुकरण करता था या सारे विश्व में भारत से निकलकर जा बसे थे....

मुझे लगता है
मा शब्द गाय नें इंसान को दिया था.....

प्राचीनकाल में
भारतीयों ने शायद कुत्तों के बाद गायों का पालन करना सिखा होगा .....
उन्होनें देखा
गायों का राँभना  सबसे अलग और मनोहारी है ।
शायद वह प्राचीनलोग
संभवतः पहले #शब्दकरने के अर्थ में
मा शब्द का प्रोयोग करते रहे होगें
जैसा कि गाय करती है हम्मा हम्मा.....

फिर वही शब्द माताओं के लिए भी प्रयोग हुआ होगा
च्युंकि प्राचीनकाल से ही भारतीयों के लिए गाय एक पवित्र जीव रही हें और तो क्या भारतीय प्राचीन ग्रंथ भी गाभी को नव माताओं मे से एक बताता है ।
भारतीयों के देखादेखी बादमें सारे विश्व ने गोपालन करना सिखा होगा.....
अथवा भारतीय ही भारत से निकलकर
अन्य भूभागों में जा बसे थे.....
मा शब्द कि तरह चार  ओर भारतीय शब्द है
जो विदेशों में माता को पुकारने के लिये इस्तेमाल किये जाते है....

2.नना

ऋकवेद में नना शब्द माता के अर्थ में प्रयोग हुआ है ....
कई संस्कृत पंडितों का मत है कि यह नना शब्द
नृ धातु कि प्रथमा विभक्ति प्रथम शब्दरुप ना होता है । उसी ना के साथ न जोडकर नना शब्द बना ....
नः ना यानी जो मानव नहीं/जो नर नहीं वह देवता है नना है.....
नना शब्द ओडिआभाषा में ननी हुआ जिसका अर्थ कन्या होता है
ओडिशा में कहीं कहीं नना बडे भाईको तो कहीं पिता को भी नना कहाजाता है....
इसी नना शब्द से ओडिआ शब्द नानी बना
बडी बहनों को तथा बुआ को ओडिशा में नानी कहते है ।
हिन्दी में वही नना शब्द नाना, नानी बनगयी हें....
जहाँ तक बात विश्व कि है
यहां आज भी ऐसे कई भाषाएँ है जिन्हे बोलनेवाले लोग
अपनी माता को नना शब्द से मिलतेजुलते
शब्दों से पुकारते है....

अजरवैजानी भाषी अपनी मां को ana
कहके पुकारते.....
●Cebuano लोग inahan, Nanay कहते है
●तूर्क लोग मां को anne संबोधित करते है ....
●Igbuभाषा में मां के लिए nne शब्द है
●samoan-tinā
●Galician-nai
●हंगेरभाषी-anya
●Azeri (Latin Script)Ana
●Albanian ~ Nënë
●Chechenजाति के लोग ~Nana
●Ilongo~ Nanay, Nay
●Mapunzugunभाषा में Ñuke, Ñuque

3.आई
मराठी लोग आमतौर पर अपनी माताको आई कहके पुकारते है...
आई शब्द संस्कृत आर्या शब्द का बदला हुआ रुप है...
अतिप्राचीन काल में भारतीय लोग अपनी माताको आर्या पिताको आर्य कहते थे
पितामाता सभ्य होते थे इसलिए
वह आर्य आर्या कहलाते थे....
आर्या शब्द बदलकर अज/अजा बना
वहीं आर्या बना आई ......
ओडिशामें मातमह व मातामहीको क्रमानुसार हम
अजा आई कहते है.....
प्राचीन हिन्दीमें भी आजो शब्द प्रचलन में था....
आई शब्द से मिलतेजुलते
शब्द आज भी विश्व के कई भाषाओं में प्रचलित है ।
Marathi=>आई
Odia,bengali=>ଆଈ(नानी),আঈ
Assamese=aai
Yoruba= iya
Finnish= Äiti
Frisian=Kantaäiti, Äiti
आदि
4.आष्ट्रो एसिआटिक भाषापरिवार से जन्मा
शब्द
बोउ भारत से निकलकर एक तरफ भिएतनाम् तथा कुछ चीनी क्षेत्र में प्रचलित हुआ
वहीं पूर्वभारतीय द्वीपसमूह देशों में भी बोला जाता है....
द्राविड शब्द तिल्ली,तिलैया से मिलतेजुलते शब्द कई अफ्रिकी देशों के भाषा में प्रचलित है
वह भी माता अर्थ में....

ऐसा लगता है एक समय भारतीयों ने समग्र विश्व को एक करदिया था..
तभी तो बोल पाये
वसुधैव कुटुम्बकम्
कोई ओर सभ्यता ऐसा क्यों न कह सका....

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

प्यारे पापा

((अमरीका मैं एक निहायत ही बिगडैल लडका अपने पिता को एक चिट्ठी लिखता है.....))

प्यारे पापा,

मैं बहुत ही अफसोस और दुख के साथ आपको खत लिख रहा हूं ।
मुझे अपनी नई प्रेमिका के साथ भागना पड़ा, क्योंकि मैं माँ ओर आपके साथ वहश से बचना चाहता था .....
अब
मैं स्टेसी के साथ जीवन कि असली जुनून
का अनीभव कर रहा हूं,
और वह बहुत अच्छी है हालांकि, मुझे पता था कि आप उसके रंगढंग, टैटू व तंग मोटरसाइकिल कपड़े की वजह से उसे पसंद नहीं करेंगे ।
इसके अलावा भी, वह मेरे से बहुत बडी उम्र कि है.....

लेकिन पिताजी !!! आपको मैं बता दुँ
यह मेरा केवल जुनून नहीं है ।
वह गर्भवती है !!!!!!!!
स्टेसी ने कहा कि हम बहुत खुश होंगे !!!!
वह जंगल में एक ट्रेलर का मालिक है और शर्दीओं के छुट्टी को हम वहीं साथ बिताएगें....

आजकल हम दोनों
कई बच्चों के होने का एक सपना भी देख रहे है....

स्टेसी ने मेरी आँखें खोल दी है कि मारिजुआना वास्तव में किसी को चोट नहीं पहुँचाता है हम इसे खुद के लिए ओर बढा़ रहे है.....
पिछले दिनों हमने कोकेन का लत लगाया है
इससे हमारी इच्छाओं को नयी उडान मिलती है....

इस बीच, हम प्रार्थना करेंगे कि विज्ञान एड्स के लिए इलाज ढुंढ लें,
च्युंकि विचारी  स्टेसी को मैं खोना नहीं चाहता....
च्यूंकि इससे भी बेहतर हो सकता है हम ऐसे यकीन रखने के  हकदार है !

चिंता मत किजिएगा  पिताजी मैं 15 साल का हूँ, और मुझे अपना खखाल रखना आता है ।
किसी दिन, मुझे यकीन है कि हम वापस जाएँगे, ताकि आप अपने कई नाती-पोतों को जान सकें......

स्नेह.....
यहोशू

Ps. - पिताजी, उपरोक्त में से कोई भी बात सत्य नहीं है। मैं जेसन के घर पर हूँ मैं आपको याद दिलाना चाहता था कि रसोई की मेज पर स्कूल की रिपोर्ट की तुलना में जीवन में और भी बदतर चीजें हैं ।
आपको जब ठिक लगे कॉल किजिएगा मैं घर लौट आउगाँ.....

😀😀😀😁😂😂😂😂😂😀😀😁😂😂😂

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

●●●●खुनी शनिवार~संघाई बेबी●●●●

शीर्षक: खूनी शनिवार, शंघाई, चीन, 1937

यह चित्र सबसे प्रभावशाली तस्वीरों में से एक है ।
1935 के बाद से ही
जापान ,चीन ओर अन्य एसिआई देशों में खुलेआम बमबारी और अपना धाक मजबुत करने में जुटा हुआ था....

जापान के हमलावरों ने शनिवार, 28 अगस्त, 1 9 37 को दिन के बीच में शंघाई पर हमला करने के बाद यह तस्वीर ली गई थी ।

बम एक रेलवे स्टेशन पर गिराए गए थे जहां जापानी शरणार्थी ठहरे हुए थे ।

तस्वीर को बम गिरने के कुछ मिनट बाद लिया गया ।
चीनी फोटोग्राफर एच.एस. वोंग ने यह फोटो लिया था ।
उन्होंने एकबार उस दिन के घटना को याद करते हुए
कहा था
"वह बडे भयानक दिन थे ।
हमसब डरे हुए थे
इंसान जैसे लाश बनगये थे
हमें खुदको बचाने के लिए लाशों को लांघकर भी जाना होता था....उस दिन मेरे जूते खून से भिगो गए थे।"

वोंग ने अकेले बच्चे को अकेले में मृत मां  के साथ रेल पटरियों पर देखा उसने बच्चे को मदद करने के लिए जाने से पहले तस्वीरें लीं, जो जल्द ही उनके पिता ने ले लिया था ।

चीनी प्रेस से जारी की गई इस तरह के कई तस्वीरों ने विदेशों में नाजीवाद कि बर्बरता को जगजाहिर करदिया था.....

द ब्लडी सटरडे(शंघाई बेबी) फोटो ने लोगों में  सहानुभूति और और नाजीवाद फासीवाद के खिलाफ उनके रुख बदले....क्योंकि यह हर प्रमुख समाचार स्थल पर जारी किया गया था और भी जनजागरण बढा था ।

शंघाई बच्चे ने देश को चौंका दिया, और युद्ध की निंदा जापान पर टूट गई ।

यह तस्वीर तबाही, मौत और दुःख को दिखाता है कि युद्ध कितना भयावह होता है .....

शनिवार, 4 मार्च 2017

निशाचर जिंदावाद

संस्कृत में एक कहावत है

"या निशा सर्वभूतानाम्
तस्मात् जाग्रति संयमीः ।"

प्राचीनकाल मे अपने परिवार तथा जनवस्ती को हिंस्रजन्तुओं से रक्षा करनेवालों के लिए.....
घर के पालतू कुत्तों के लिए
तथा निरंतर तप करनेवाले मुनि ऋषिओं के लिए संभवतः ऐसे कहावत प्रचलन मे आया हो ...

आजकल इंटरनेट के जमाने मे यह कहावत काफी हद् तक अर्थहीन हो गया है
परंतु आज भी इस कहावत को जीवित रखने को कुछ लोग व जीव यत्नवान है....

कुत्ते तो पिछले ७०००० साल से इंसानो के साथ है ही
उल्लु व चमकादड भी रात्रीको ही खाद्य अन्वेषण मे लगे रहते है । उनके लिए
दिन के अपेक्षा रात कहीं अधिक
सुरक्षित होता है ।

मानवों में गरीब मजदुर लोग नाइट सिफ्ट करते समय सयंम बरतते है
निद्रा के लिए मशीन तोड फोड नहीं देते.....
इसलिए #निशाचर प्राणिओं का सत्कार होना चाहिए
च्युंकि इन्होने जीवों कि उस आदिम संस्कृति को आज भी जीवित रखा हुआ है
है कि नहीं 😂😂😂😂😂
जय निशाचर जय हो 😉😉

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

सुवर्णरेखा नदी उत्पति जनसृति

अयोध्या के सूर्यवंशी राजा इक्ष्वाकु के एक पुत्र निमि ने विदेह/मिथिला जनपद मे अपना राज्य स्थापित किया,इसकी राजधानी तब जयन्तनगर हुआ करता था ।
निमि कि उपाधी विदेह थी इसलिए इस क्षेत्र का नाम कालान्तर मे विदेह रखागया ।
परवर्त्तीकाल मे इसी वंश मे मिथि नामक शक्तिशाली राजपुरुष का आविर्भाव हुआ । वह इतने दयालु प्रजापालक राजा थे कि जनता  उन्हे जनक,बापु पिता मानने लगी....
इससे विदेह नरेश को नुतन उपनाम प्राप्त हुआ #जनक तथा यह क्षेत्र मिथिला भी कहलाया.....
आनेवाले कई पीढीओं ने इसी जनक उपनाम को ही स्वयं का उपाधी बनाए रखा.....
विदेह के जनकों मे कुछ बडे प्रतापी
और यशस्वी हुए ।
त्रेतया युग मे श्रीराम के समय विदेह में #सीरध्वज जनक का राज था...
माता श्रीलक्ष्मी ने इन्ही के यहाँ देवी सीताजी के रुप मे जन्म लिया था...

सीताजी के जन्म को लेकर कथा है कि उन्हे भूमि मे हल जोतकर
जनक सीरध्वज ने एक पेटी मे पाया था । हल को मैथिली मे सीत कहते है इसलिए उनका नाम सीता रखागया.....
इसी कथा के साथ
झाडखंड के
पिसाक नगरी से जन्मीं सूवर्णरेखा नदी कि उत्पति प्रसंग जुडा जाता है...

जनसृति है कि एकबार जब विदेह मगध कोशल अंग आदि भूभागों मे भयानक अकाल पडा....
तब
राजर्षी जनक को उनके कुलगुरु ने एक परिष्कृत भूमि पर हल जोतने को कहा....
वह पिसाक नगरी मे आये उन्होने यहाँ हल चलाया जिससे एक तरफ सीताजी आविर्भूत हुई वहीं दुसरी ओर जल कि एक धार निकला जिससे समुचे क्षेत्र मे अकाल से लोगों को राहत मिला....
सूवर्णरेखा नदी का जन्म च्युंकि श्रीलक्ष्मी के साथ हुआ था इसलिए इसके वालु कणों मे आज भी सोना मिलता है.....
सूवर्णरेखा का एक नाम हिरण्यरेखा भी है...
हिरण्यभूम क्षेत्र मे प्रवाहित होने के कारण ऐसा नामकरण हुआ माना जाता है.....

महानदी तो मरने ही वाली है लेकिन सुवर्णरेखा को इंसानों ने धीरे धीरे मरने के लिए "स्लो पॉएजन" दे दिया है...

मानव एक समय नदीओं को माता कहकर उनकी पूजा किया करते थे
आज वही उनके मौत के मुख्य सुत्रधार बने है.....

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

बंगाली साहित्यकार बुद्धीजीवीओं ओडिआ भाषा को मार देने का षडयन्त्र रचा था..........

1866 अकाल तथा अंग्रेजी आक्रोश को झेल रहे ओडिआ लोगों के खिलाफ उनके अपने ही पडोशी भाईओं ने षडयन्त्र रचे थे....

Odia भाषा का कत्ल करदेना ...
यही उनका असली मसद था....

कान्तिलाल भटाचार्य ने इसकी नींव
यह कहते हुए रख दिया....

"ओडिआ ऐक् स्वतंत्रो भाषा नोय्,
इटा बांग्लादेर एकटा उपभाषा"

इसी विषय पर एक किताब भी छपा
Archive .com मे एक किताब इसी नामसे बंगाली मे उपलब्ध है....

राजेन्द्र लाल मित्र ....
पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ओडिशा के प्रत्नतत्व पर गहन शोध किया और इसपर अपना किताब भी लिखडाला....

उन्होने
एकबार कहा था....

"जबतक ओडिआ भाषा विलुप्त नहीं हो जाती ओडिआओं का विकाश असम्भव है"

उमाचरण हलदार बाबु को बंगाल ओडिशा एकत्रीकरण मे खास रुची थी
वह चाहते थे इस एकता हेतु उत्कलीय-ओडिआ लिपि कि बली चढादिया जाय.....

उनका बयान था
ओडिआ को बंगाली लिपि मे लिखा जाय.....
ज्ञात रहे बंगालीओं का बर्तमान लिपि কখগঘঙচছ मात्र 200 साल पुराना है....
इन लोगों ने उत्कलीय-ओडिआ लिपि से काफी हदतक मिलता जुलता अपना प्राचीन लिपि त्याग दिया था....
अब वो चाहते थे हम भी वैसा करें.....

राजाकृष्ण मुखोपाध्याय....महाराज ने तो यहाँ तक कहदिया था कि
समुचे बंगाल मे बंगाली को ही केवल मात्र शिक्षा क्षेत्र मे अग्राधिकार मिले
और बाकी ओडिआ विहारी भाषाएं जाएं तेल लेने.......

20 फरवरी 2014 मे ଓଡିଆ ओडिआ भाषा को शास्त्रीय मान्यता साबित करता है....
यह
सच्चाई....
1.*बंगाली खुद कई उपभाषाओं को इकट्ठा करके बनाया गया एक भाषा है
ओडिआ इसके उपरी भाषाओं मे से एक है.....
2.*ओडिआ आर्य भाषाओं मे संस्कृत के बाद सबसे अधिक शास्त्रीय तथा 6 भारतीय मौलिक भाषाओं मे से एक है...

3.*इस भाषा को राष्ट्रिय स्तर के शिक्षण संस्थानो़ मे भी पढाया जाय....
इसको सभी सरकारी कार्यालयों मे लागु किया जाय......

(डॉ. देवाशीश जेठी जी के वाल से.....)

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

दारुल ईस्लाम कि सच्चाई

-क्या कोई मुस्लिम जिसनें दारुल इस्लाम के लिए लाखों हिंदुओ का क़त्ल किया हो, क्या वो मरने के बाद हिंदुओ की मन्नतें पूरी करेगा"

सैयद सालार गाज़ी की क़ब्र के सामने हिंदुओ का माथा टेकना उन लाखों हिन्दू वीर योद्धाओं के साथ धौखा होगा जिन्होंने उस गाज़ी से लड़ते हुए अपने प्राण त्याग दिए,

आज के हिंदुओं का गाज़ी के सामने सर झुकाना उन लाखों माँओं के साथ विश्वासघात होगा जिन माँओं ने गाज़ी को रोकने के लिए अपने लाल खोए, उन अर्धांगिनियों के साथ विश्वासघात होगा जिन्होंने उस गाज़ी से लड़ने के लिये अपना सिंदूर उजाड़ा ।

लाखों हिंदुओ को मारने वाले गाज़ी के सामने सर झुकाने से बेहतर, मैं शमसान घाट की उन आत्मा के सामने सर झुकाना बेहतर समझूँगा जिसनें अपने जीवन में किसी का क़त्ल नही किया हो,

आप सभी क्या जानते हो "सैयद सालार गाज़ी" के बारे में कौन था वो, तो सुनों मैं आपको उसकी सच्चाई बताता हूँ

"आप सभी महमूद गज़नवी (गज़नी) के बारे में तो जानते ही होंगे, वही मुस्लिम आक्रांता जिसने सोमनाथ पर 17 बार हमला किया और भारी मात्रा में सोना हीरे-जवाहरात आदि लूट कर ले गया था।

महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर आखिरी बार सन् 1024 में हमला किया था तथा उसने व्यक्तिगत रूप से सामने खड़े होकर शिवलिंग के टुकड़े-टुकड़े किये और उन टुकड़ों को अफ़गानिस्तान के गज़नी शहर की जामा मस्जिद की सीढ़ियों में सन् 1026 में भी लगवाया।

उसी लुटेरे महमूद गजनवी का ही भांजा था सैयद सालार मसूद उर्फ़ आपका गाज़ी बाबा,
यह बड़ी भारी सेना लेकर सन् 1031 में भारत आया। सैयद सालार मसूद उर्फ़ गाज़ी बाबा एक सनकी किस्म का धर्मान्ध इस्लामिक आक्रान्ता था।

महमूद गजनवी तो सिर्फ़ लूटने के लिये भारत आता था,
लेकिन सैयद सालार मसूद उर्फ़ गाज़ी बाबा भारत में विशाल सेना लेकर आया था उसका मक़सद भारतभूमि को “दारुल-इस्लाम” बनाकर रहना था, और इस्लाम का प्रचार पूरे भारत में करना था जाहिर है कि तलवार के बल पर।

सैयद सालार मसूद अपनी सेना को लेकर “हिन्दुकुश” पर्वतमाला को पार करके पाकिस्तान (आज के) के पंजाब में पहुँचा, जहाँ उसे पहले हिन्दू राजा आनन्द पाल शाही का सामना करना पड़ा, जिसका उसने आसानी से सफ़ाया कर दिया।

मसूद के बढ़ते कदमों को रोकने के लिये सियालकोट के राजा अर्जुन सिंह ने भी आनन्द पाल की मदद की लेकिन इतनी विशाल सेना के आगे वे बेबस रहे। मसूद धीरे-धीरे आगे बढ़ते-बढ़ते राजपूताना और मालवा प्रांत में पहुँचा, जहाँ राजा महिपाल तोमर से उसका मुकाबला हुआ, और उसे भी मसूद ने अपनी सैनिक ताकत से हराया। एक तरह से यह भारत के विरुद्ध पहला जेहाद ही युद्ध था जो भारत को इस्लामिक मुल्क़ बनाने के लिए हुआ था। सैयद सालार मसूद सिर्फ़ लूटने की नीयत से भारत नही आया था बल्कि बसने राज्य करने और इस्लाम को फ़ैलाने का उद्देश्य लेकर भारत आया था।

पंजाब से लेकर उत्तरप्रदेश के गांगेय इलाके को रौंदते, लूटते, हत्यायें-बलात्कार करते सैयद सालार मसूद अयोध्या के नज़दीक स्थित बहराइच पहुँचा, जहाँ उसका इरादा एक सेना की छावनी और राजधानी बनाने का था। इस दौरान इस्लाम के प्रति उसकी सेवाओं को देखते हुए उसे “गाज़ी बाबा” की उपाधि दी गई।

इस मोड़ पर आकर भारत के इतिहास में एक विलक्षण घटना घटित हुई, ज़ाहिर है कि इतिहास की पुस्तकों में जिसका कहीं जिक्र नहीं किया गया है।

इस्लामी खतरे को देखते हुए पहली बार भारत के उत्तरी इलाके के हिन्दू राजाओं ने एक विशाल गठबन्धन बनाया, जिसमें लगभग 20 राजा अपनी सेना सहित शामिल हुए और उनकी संगठित संख्या सैयद सालार मसूद की विशाल सेना से भी ज्यादा हो गई।

जैसी कि हिन्दुओ की परम्परा रही है, सभी राजाओं के इस गठबन्धन ने सालार मसूद के पास संदेश भिजवाया कि यह पवित्र धरती हमारी है और वह अपनी सेना के साथ चुपचाप भारत छोड़कर निकल जाये लेकिन सालार मसूद ने माँग ठुकरा दी उसके बाद ऐतिहासिक बहराइच का युद्ध हुआ, जिसमें संगठित हिन्दुओं की सेना ने सैयद मसूद की सेना को धूल चटा दी।

इस भयानक युद्ध के बारे में इस्लामी विद्वान शेख अब्दुर रहमान चिश्ती की पुस्तक मीर-उल-मसूरी में विस्तार से वर्णन किया गया है। उन्होंने लिखा है कि मसूद सन् 1033 में बहराइच पहुँचा, तब तक हिन्दू राजा संगठित होना शुरु हो चुके थे।

यह भीषण रक्तपात वाला युद्ध मई-जून 1033 में लड़ा गया। युद्ध इतना भीषण था कि सैयद सालार मसूद के किसी भी सैनिक को जीवित नहीं जाने दिया गया, यहाँ तक कि युद्ध बंदियों को भी मार डाला गया… मसूद का समूचे भारत को इस्लामी रंग में रंगने का सपना अधूरा ही रह गया।

बहराइच का यह युद्ध 14 जून 1033 को समाप्त हुआ।

जब फ़िरोज़शाह तुगलक बहराइच आया और मसूद के बारे में जानकारी पाकर वह बहुत प्रभावित हुआ और उसने उसकी कब्र को एक विशाल दरगाह और गुम्बज का रूप देकर सैयद सालार मसूद को “एक धर्मात्मा” के रूप में प्रचारित करना शुरु किया, एक ऐसा इस्लामी धर्मात्मा जो भारत में इस्लाम का प्रचार करने आया था।

मेरे हिन्दु भाईओं
इस इस्लामिक आक्रांता के आगे आप सभी माथा टेकते हो, जिसने अपने जीवित रहते हुए लाखों हिंदुओ को मारा हो क्या वो मरने के बाद हिन्दुओँ की मनोकामनाएं पूरी करेगा,
किसी के सामने सर झुकाने से पहले उसके इतिहास और चरित्र को तो जान लो फिर उसे सम्मान दो, जो भारतभूमि में भारत को सम्मान नही देता और हिन्दू धर्म को सम्मान नही देता, मैं उनके सामने अपना सर नही झुकाता।
ऐसे पापी अधमों के आगे आप भी माथा न झुकाओ अन्यथा अपने पूर्वजों का अनजाने में हीं अपमान कर बैठेगें ।

मेरी आत्मकथा-पुष्प कि आत्मकथा

जी हाँ, मैं पुष्प हूँ -पुष्प! प्रकृति माँ का सब से सुकुमार, कोमल, भावुक और सुन्दर बेटा- पुष्प! उपवन मेरा घर है । हवा मेरी सहचर है । मेरी सुगंध का अदृश्य, कोमल, विस्तृत चारों ओर फैला हुआ मेरा संसार है । ऐसा संसार, जिस में आकर कोई भी मनुष्य भाव से भर कर आनन्द से मस्त हुए बिना नहीं रह पाता । यह कहे बिना भी नहीं रह पाता कि बड़े सुगन्धित पुष्प खिले हैं यहाँ! जी हाँ, ऐसा ही महक और मादकता भरा है मुझ पुष्प का संसार । उतना ‘ ही सुन्दर और .मुक्त भी'। मैं सुन्दरता का साकार रूप हूँ । अपनी सुन्दरता से सारे वातावरण को तो सुन्दर बना ही देता हूँ उसकी चर्चा भी दूर-दूर तक फैला दिया करता हूँ! जी हाँ, मुझे छू कर मेरी सुगंध को अपने अदृश्य पंखों में भर कर यह छलिया पवन दूर-दूर तक मेरी सुन्दरता और सुगंध का ढिंढोरा पीट आया करता है तब लोग मेरी तरफ भागे आते हैं । मुझे तोड़ कर ले जाते हैं । कोई गुलदस्ते में सजा कर अपने घर की शोभा बढ़ाता है, तो कोई हार में पिरो कर मुझे अपने गले का हार बना लिया करता है । कभी मैं गजरा बन कर किसी सुन्दरी के जूड़े पर धर कर उसकी सुन्दरता में चान्दनी भर देता हूँ तो कभी अकेला ही बालों में टाँगा जा कर सभी का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच लिया करता हूँ । कई बार सुन्दरियों के कानों में झूलकर उन के गोरे कोमल गालों को चूम लेने का सौभाग्य भी पा लिया करता हूँ । भगवान् के भक्त और पुजारी मुझे भगवान् के चरणों पर चढ़ा कर आनन्द पाते हैं, तो निराश प्रेमी अपनी प्रेमी- प्रेमिकाओं के मजासे पर अर्पित कर एक तरह की शान्ति प्राप्त करते हैं । कई बार मुझे गुलदस्ते या हार के रूप में विशिष्ट लोगों को भेंट में भी दिया जाता है । अरे हाँ, मुझे ‘एक भारतीय आत्मा’ नामक क्रान्तिकारी कवि की वे पंक्तियाँ आज तक याद हैं, कि जो मुझे देखकर, मेरी भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए उसके होंठों पर मचल उठी थीं; ''मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर तुम देना फेंक; मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक !''लेकिन ऐसा मान-सम्मान और प्रशंसा-गान मुझे ऐसे ही प्राप्त नहीं हो गया । इसके लिए मुझे बीज के रूप में कई दिनों तक धरती माँ की माटी भरी गोद में घुटती साँसों के साथ बन्द रहना पड़ा है । आप अनुमान नहीं लगा सकते, उस पल अपने साँसों को घुटते और तन को गलते-सड़ते देखकर तब मेरे मन पर क्या बीता करती थी । उस पर सूर्य की किरणें जब ऊपर से धरती को गर्मा और झुलसा दिया करतीं, तब धरती के भीतर भी कई बार पसीने से तर होकर दम और भी घुटने लगता । तब अचानक. कहीं से पानी की कोई धार आकर उस गर्मी से तो राहत पहुँचाती; पर सड-गल रहे तन की रक्षा उस से भी न हो पाती । कई बार किसी खाद के कडुवे-कसैले स्वाद भी चखने पडते, कई बार कड़बी-तीखी दवाइयाँ निगलकर मितली-सी भी आने लगती । कई बार ऐसा भी हुआ, माली या किसान की गुड़ाई ने मिट्टी के साथ-साथ मेरे तन-मन को भी उलट-पलट कर रख दिया । इस प्रकार की स्थितियों का सामना करते समय मन में क्या गुजरती है न तो वह सब बता पाना ही सभव है और न उस सब का आप अनुमान ही लगा सकते हैं । लेकिन यह क्या? एक दिन मैंने अपने -सडगल चुके शरीर में धरती माँ के आशीर्वाद से एक नया जोश, नया उत्साह अंगड़ाईयाँ लेते हुए अनुभव किया । मुझे लगा कि मैं अपने अंगों का विस्तार-फैलाव करते हुए धरती माँ से उछलकर उसकी गोद में आ रहा हूँ । मैंने माली से लगने वाले आदमी को किसी से कहते हुए सुना-बड़े सुन्दर अंकुर फूट रहे हैं इस बार तो । तो मुझे समझ आया कि जैसे मेरा नाम ‘अंकुर’ है । वह एक जन्म-नाम हुआ करता है न, वैसा ही कुछ मेरा भी था । कुछ दिन और बीतने पर उस आदमी के मुँह से फिर सुनाई पड़ा-'कितना बढ़िया है यह पौधा ।'बस, मैंने समझा कि मैं अंकुर नहीं, पौधा हूँ -पौधा । अब वह आदमी मेरा बडे ध्यान रखने लगा । ठीक समय पर पानी तो पिलाता ही, कुछ खाद-सी भी दो-एक बार डाल गया । बड़े ध्यान और सावधानी से निराई-गुड़ाई कर के उग आई फालतू घास, खरपतवार आदि को निकाल देता । इस प्रकार पौधे के रूप में लगातार बड़ा होता गया । एक दिन मैंने अपने ऊपरी पोरों में कुछ गाँठें-सी पड़ने का अनुभव किया । बस, चिन्ता में पड़ गया कि यह नई मुसीबत कौन-सी आने वाली है? अपने इस प्रश्न का उत्तर अभी प्राप्त भी नहीं कर पाया था कि एक बार मैंने उन गाँठों के धीरे-धीरे चटकने की आवाजें सुनी । 'हाय राम! यह क्या होने जा रहा है?'मैं चौक गया; लेकिन किसी के आने की आहट पा कर कुछ बोला नहीं, बस चुपचाप देखने लगा । देखा कुछ क्षण बाद वह आहट मेरे पास आकर रुक गई है । आने वाला मेरा रखवाला माली ही था । वह मेरी दशा देख कर मुस्करा उठा और लगातार मुस्कराता गया । फिर होंठों- हीं-होंठों में बोला-'सुबह तक ये कलियाँ (गाँठें) अवश्य ही खिल कर मुस्कराता फूल बन जाएँगी । 'फूल!'एक बार मैं फिर चौंक पड़ा । पहले बीज, फिर अंकुर उसके बाद पौधा, फिर वे गाँठें- सी चटकती हुईं और अब फूल? पता नहीं क्या-क्या बनना है अभी मुझे? लेकिन तब तक रात ढल आई थी, सो वह माली चला गया । मेरी चिन्ता कम नहीं हुई । रात भर चिन्ता में डूबा रहा । जैसे ही प्रभात काल की मन्द पवन का झोंका आया, उसका मधुर-कोमल स्पर्श पाकर मैं पूरी तरह से खिलकर जैसे अपनी ही सुगन्ध से नहा उठा । पवन के और झोंके आकर मुझे लोरियाँ देने लगे-देते रहे लगातार । जी हाँ , अब मैं खिलकर पुष्प जो बन चुका था । जी, बस इतनी सी ही है मेरी आत्म-कथा!