मेँ अपने मन का दास कलम का कर्मचारी हुँ जो मन मेँ आया लिखदिया । कोई पागल कहे तो मुझे क्या ? कहता है तो कहने दो ।।
ब्लॉग आर्काइव
बुधवार, 17 अगस्त 2016
पुर्तगालीओँ का भारत खोज
इन पूर्वी द्वीपोँ से आता था
रुई रेशम चीनी मसाले और बहुत सारी अन्य चीजेँ जिनकी युरोपवासियोँ को बेहद जरुरत होती थी ।
ये सब चीजेँ दूर दराज के देशोँ से जमीन द्वारा युरोप पहँचता था ।
बीच मेँ आनेवाले हरेक देश टैक्स वसुलता था ।
इससे पश्चिम युरोप पहुँचते पहुँचते
यह चीजेँ बहुत मंहगी हो जाती थीँ ।
युरोप का सबसे पश्चिमी देश पर्तुगाल मे ये पूर्व कि सामान आते आते इनकी दाम दुगना हो जाता था ।
1418 मेँ एक पुर्तगाली राजकुमार हेनेरी ने दिमाग दौड़ाया ।
क्युँ न हम समुद्र के रास्ते से भारत जाएं ?
क्युँ न हम अफ्रीका का चक्कर लगाते हुए भारत जाएं ?
अफ्रिका कितनी दूर था और उसका कितना विस्तार था ?
यह किसी को भी नहीँ पता था ।
इसे पता करने का एक ही तरीका था
वहाँ पानी के जाहाज भेजकर !
हेनेरी ने पुर्तगाल के दक्षिण पश्चिमी कोने पर एक जहाज केँन्द खोला । वहाँ से उसने जहाजोँ को भेजना शुरु किया ।
हरेक जहाज पहले की अपेक्षा अफ्रीका के तटीय किनारे पर कुछ और आगे जाता था ।
राजकुमार हेनरी को अब लोग
हेनरी द नैविगेटर के नाम से बुलाने लगे ।
1460 मे उसका देहान्त हो गया ।
पर तब तक पुर्तगाली जहाज अफ्रीका तट के किनारे कई हजार किलोमीटर तक जा चुके थे ।
अछा पहले के जमानेँ मे युरोपियन सोचते थे
भूमध्य रेखा के उसपार जाना
नामुनकीन है ।
च्युँकि वो उत्तर से दक्षिण कि ओर भूमध्य रेखा के जितने करिब जाते
गर्मी उतना बढ़ता चला जाता था ।
पूर्तगालीओँ ने हार नहीँ मानी लेकिन अब भी वो भूमध्य रेखा से काफी दूर थे ।
वो उम्मीद कर रहे थे कि अफ्रिका का विस्तार भूमध्य रेखा तक नहीँ होगा और उन्हेँ अत्यन्त गर्गी का प्रकोप नहीँ सहने होगेँ ।
कुछ समय तक तो अफ्रीकी
तट ने उन्हेँ पूर्व कि ओर सफर करने के लिए मजबुर किया
पर उसके बाद वो जहाजोँ को फिर से दक्षिण की ओर ले जाने मे सफल हुए ।
1482 मेँ पुर्तगाली नाविक
#दियोगो_काओ भूमध्य रेखा को लांघकर उसके आगे आने मे सफल रहे ।
और ऐसा करने वाले वे पहले युरोपिय थे ।
[[ISAAC ASIMOV कि पुस्तक
"हमेँ आंटार्कटिका के बारे मेँ कैसे पता चला ?"
से !!]]
मंगलवार, 16 अगस्त 2016
स्वतंत्रता संग्राम के संकल्प
ये संकल्प लेँ
1.
कभी जातिवाद के जाल मे फँसकर
आपस मे नहीँ झगड़ेगेँ
दलित सवर्ण के झगड़े नहीँ होने देगेँ न ऐसी छोटी सोच को बढ़ावा देगेँ ।
2.
हस्ताक्षर करते समय मातृभाषा तथा राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रयोग करेगेँ
3.
आज कहीँ वक्तव्य देने हो तो
भारतीय भाषाओँ मे ही भाषण देगेँ
4.
जाहाँतक हो सके भारतीय संस्कृति परंपराओँ का सम्मान करेगेँ ।
5.
किसी प्रान्त या क्षेत्र विशेष ,भाषा व वोलीओँ का मजाक नहीँ उड़ाएगेँ ।
किसीको चिँकि ,भैया ,मालिया,कालिया नहीँ कहेगेँ ।
6.
भारत कि अखण्डता बनाए रखेगेँ,
विहारी हो गुजराती हो या पंजाबी सभी का सम्मान व आदर करेगेँ !
7
.न भ्रष्ट होगेँ न भ्रष्टाचार होने देगेँ ।
घुस देगेँ न घुस खाएगेँ
8.
अंधे सेकुलारी नहीँ बनेगेँ
सच्चे सेकुलारी बनेगेँ
आजम, औविसी जैसे मूर्ख राजनेताओँ का विरोध भी करेगेँ
कलाम जैसे सच्चे राष्ट्रभक्तोँ का
आदर व सहायता भी करेगेँ ।
मैँ नहीँ कहुगाँ तुम प्याँट सार्ट उतारके
धोती पहन लो या तिरंगा लैके गाँव गाँव सहर सहर घुमते फिरो
लेकिन यदि तुमने इतना भर कर लिया
तुम आजाद हो !
आजाद मुल्क मे
आजादी के जश्न मे 100% हिस्सा ले रहे हो ।
~वाघा जतिन कि बलिदान~
दे दिया था अंग्रेज के हातोँ पकड़े जाने पर भी
अंग्रेज नहीँ दे पाए उन्हे यातनाएँ
या फाँसी !!
वालेश्वर जिल्ला चषाखंड गाँव मे
युवकोँ का एक टोली अंग्रेजी फौज के उस ओर के रस्तोँ से गुजरने के इंतेजार मे था
कुछ घँटो
बाद
अंग्रेज आए
तो गुफा मे छिपे
युवकोँ ने
बंदे मातरम कि गुंज के साथ उनपै टुट पड़े और अंधाधुन गोलीवारी कर दी
पहले पहल अंग्रेज तितर वितर हो गये
लेकिन जतिन और उनके साथीओँ के पास सीमित
गोली थी
धीरे धीरे इनकी गोली खत्म हो रही थी वहीँ अंग्रेज सैनिकोँ ने भी काउँटर आटाक् शुरुकरदिया ।
और फिर
कुछ मिनट तक गोलीवारी के बाद
एक गोली चित्तप्रिय को लगा
वो गिर पड़ा
वहीँ विरेन्द्र , जौतिष तथा 2 अन्य युवक घायल हुए ।
जतिन्द्र यानी बाघा जतिन
के कंधो पर गोली लगी
दायेँ हाथ मे गोली लगी
एक गोली से बचने के चक्कर मे वो उछले
चट्टान मे टक्कर के वजह से उनके माथे मे से खुन निकलने लगा
फिर भी वो गोली दागे या रहे थे
दागे या रहे थे
अन्ततः ये वीर युवक चारोँ तरफ से घेर लिए गये
एस पि रेगार्ट ने उन्हे धरलिया
वालेश्वर हसपताल मे बाघाजतिन घटोँ वेहोश पड़े रहे
उनके कंधा हात से गोली निकाल लिया गया था
कई जगह क्षताक्त हुए थे
उनपै पट्टी बाधां गया था
बाघा जतिन को होश आया
वो सब समझ गये
उन्होने अट्टहास किया
और सारी पट्टिआँ खोल दी
वो हँसते रहे
उधर उनके अंगो से खुन बहता गया बहता गया
और इस तरह
कभी बचपन मे जंगल मे वाघ को चित् करदेनेवाले
यतिन्द्र नाथ ने स्वयं कि बलिदान देकर के अंग्रेजोँ के जीत को हार मे बदल दिया था !
(अब अंग्रेज उनको ठिक होने के बाद फाँसी ही देनेवाली थी लेकिन स्वाभिमानी यतिन्द्र नाथ को ये मंजुर न था)
बुधवार, 20 जुलाई 2016
रसगुल्ला वार :- लगभग ओड़िशा कि जीत पक्की
कट्टपा ने बाहुवली को क्युँ मारा ।
और रसगुल्ला किसका ?
खैर 2015 के मध्यभागसे ही बंगाल Vs ओड़िशा वार छिडा हुआ है ।
जहाँ बांग्लाभाषी तरह तरह कि फिजुल बातेँ करते हुए रसगुल्ला को अपना बता रहे है
वहीँ ओड़िआओँ ने तथ्यात्मक प्रमाण देकर सबको चौका दिया है ।
द्वितीय चंद्रगुप्त विक्रमादित्य
के समय अमरसिँह द्वारा लिखेगये अमरकोष मे छेना को अमिक्ष कहागया है
और इस बारे मे सम्यक जानकारी भी है
परंतु कम् पढ़े लिखे तथाकथित
बंगाली ऐतिहासिकोँ ने
इसे नोटिस नहीँ किया !
कहने लगे
पुर्तगालीओँ ने बंगालीओँ को छेना बनाना सिखाया ! रसगुल्ला को
स्वयं का बताने के लिये ये लोग कितने निचे जा सकते है
सारा भारत ने देखलिया है ।
फिलहाल
बिजेडी सरकार के हातोँ बड़े सबुत लगे है !
रिसर्चर ऐतिहासिक असित महान्ति के प्रतिनिधित्व मे
कई अन्य ऐतिहासिकोँ ने सरकार समक्ष 159 पृष्ठ वाले एक रिपोर्टफाइल पैश किया !
15वीँ से 16वीँ सदी के समयकाल को ओड़िआ साहित्य का पँचसखा युग कहाजाता है
जगन्नाथ दास ,बलराम दास ,अच्युतानंद आदि पाँच कविओँ ने इस युगमे
जगन्नाथ संस्कृति को अपने लेखनी के बल पर और समृद्ध किया था ।
बलराम दास महापात्र महोदय पंचसखा युग के अन्यतम कालजयी कवि है ।
बलराम दास ने कई संस्कृत काव्योँ का ओड़िआ भावानुवाद किया
जिसमेँ उनकी "दण्डि रामायण" सर्व परिचित कृति बतायी जाती
है ।
अब ऐतिहासिकोँ ने दावा किया है कि दण्डि रामायण के पृष्ठ नं 74,75,76,और 77 मे विभिन्न भारतीय पकवानोँ के बारे मे बताया गया है
और इसमे खीरमोहन अर्थात् रसगोला बनाने कि विधि भी वर्णित् है ।
दण्डि रामायण मे कथा हे कि भरद्वाज आश्रम मे भरत को अभ्यर्थना देने के लिए ये सभी पकवान परोसे गए थे ।
अब ये नये तथ्य चौकानेवाले है
और इससे कुछ बंगाली ऐतिहासिक मानने लगे है कि शायद Rasagola or rasgulla पुरी जगन्नाथ जी के रषोईघर मे
ही जन्मा हो ! खैर आम बंगाली के लिए ये
मा माटि मानुष वाली बात है
कुछ लोगोँ को हजम नहीँ हो रही !
उधर ओड़िआओँ ने 21वीँ सदीमे भी अभूतपूर्व एकता दिखा कै साबित कर दिया है
कि वह आगे भी अजेय रहेगेँ
रसगोला वार मे उत्साहित एक ओड़िआ कि ये ट्विट इतनी उत्साह वर्धक है
पढ़कर जान जाएगेँ
"Togather we stand in Puri,
Divided we all fall in the bay."
सोमवार, 4 जुलाई 2016
सर्वं विष्णुमयं जगत्
ऐसे ही कभी कहीँ एक साधु हुआ करते थे !
वो प्रायः मौन रहते
तब भी जब कोई उनके भेषभुषा को देखके व्यंग्य वाण चलाए
अथवा पागल समझते हुए पत्थर मार उन्हे क्षताक्त करे !
एक दिन वे साधु किसी गाँव मे
भिक्षान्न संग्रह
पूर्वक लौट रहे थे कि
उन्होने देखा कोई कुत्ता
उनके पिछे पिछे चला आ रहा है ।
उन महात्मा ने उस आवारा कुत्ते पर सवार हो साथ लिए एक वरगत के पैड के निचे भिक्षान्न भोजन करना शुरुकरदिया ।
दुपहरिआ मे
धुप से बचने के लिए वहाँ कुछ लोग आराम कर रहे थे
वो लोग इस नज़ारे को देख सहसा ठहाके लगाके हसने लगे....
अब साधु ठहरे मनमौजी राग द्वेष रहित
वे भी हँसने लगे
लोग हैरान !!!
अन्त मे साधु ने कहा
विष्ण्युपरि स्थितो विष्णुः
विष्णु खादति विष्णवे ।।
कथं हससि रे विष्णो ।
सर्वं विष्णुमयं जगत् ।।
पादना ये प्रकृति कि पुकार है
ये प्रकृति कि पुकार है
अब अपानवायु को हम रोक तो नहीँ सकते न
निकल गया सो निकल गया !
हाँ तो एक बार एक ग्रृप मे
मैनेँ मोदी - दिग्गविजय पाद प्रसंग पर एक जोक चैँप दिया था
ओर तब उस सभ्य समाज के
कट्टर मुखिया ने हमे ठेँगा देखाते
हुए
कहा था
खबरदार !!
इहा माताएँ बहनेँ
भी है
ऐसे उलजलुल पोस्टिआने से बचेँ !!
मैँ कंफ्युज हुँ
शायद महिलाएँ
लघुशंका दीर्घशंका
और पर्द्दन आदि नित्यकर्म करती ही नहीँ
उनका इंजन पुरुषोँ से बिलकुल भिन्न होता होगा ।
मुझे पता नहीँ शायद ऐसा ही हो !!
खैर तब
मैने अपनी गलती मान ली
और उन दिग्गजोँ के आगे स्वयं को सरेँडर कर दिया !
जोक ये था
"एकबार मोदीजी पत्रकारोँ से बात कर रहे थे
और किसी ने उनके आगे दिग्गविजय का नाम ले लिया
मोदी ने कुछ कहे बगैर
पाद दिया
अगले दिन देश भर मे पतरकारोँ ने इसे मुख्य मुद्दा बनादिया
कि देखो
मोदी ने दिगविजय के मुँह पर पाद दिया !"
संस्कृत शब्द # पर्द्दनसे हिन्दी बाग्ला मे # पाद
ओड़िआ मे # पाड़
तथा
अंग्रेजी मे # Fartशब्द प्रचलन मे आया ।
वैसे
जानवरोँ मे शियार और गिदड
सबसे उत्कट गंधयुक्त अपानवायु छोड़ने के लिए जाने जाते है ।
बचपन मे 5 बच्चे साथ साथ बैठे हो और उनमे से कोई
पाद दे तो
एक काठी घुमैके
मुहावरा बोलके जिसके पास अन्तिम शब्द खत्म होता था
उसे ही दोषी करार दिया जाता था
पंचम RD Berman
ये "पा" सनातनीओँ का पंचम तान है ।
हमारा सुबह का शुरवात इसी
पंचम तान से होता हे
जब काक पक्षी
'का' 'का' कर के हमेँ निँद से जगाता है ।
_ _
लेकिन सोचो
मैँ आज ये सब क्युँ बता रहा हुँ
च्युँकि आज है
म्युजिक मैस्त्रो पंचम दा
Rahul Dev Burman जी
का Birth Day
संगीतकार
सचीन देव बर्मन ने देखा जब जब उनका बेटा रोता है
पंचम तान मे रोता है
इसलिए आर डी बर्मन जी का नाम पंचम पड़ा !
कुछ लोगोँ के हिसाब से
R.D Burman के बालपन मे एकबार सचीन दा के घर
दादामुनी अशोक कुमार गये हुए
थे
अशोक दा ने देखा
आर डी बर्मन वहाँ पा पा पा
कर रहे थे
और इसलिए अशोक दा ने उनका निक् नेम पंचम रखा ।
पंचम दा जब 13 के थे
एक बार
लताजी उनके यहाँ आई हुई थी
पंचम दा ने जैसे ही जाना वह लताजी है
दौडे अटोग्राफ के लिए
पंचम दा ने लताजी से कहा
क्या आप मुझे अपना अटोग्राफ देगी ?
लताजी ने तब पंचम को जो आशिर्वाद दिया
आगे चल के वे इत्ते बड़े कंपोजर बने
आज दुनिया जानता है ।
ऐसे
बहुत कम मिशालेँ है
कि बाप भी ग्रेट , बेटा भी ग्रेट
हो
राहुल देव बर्मन दुनिया के ऐसे अकेले इकलौते कंपोजर है
जिनके कंपोजिसन मे
उनके पिता यानी सचीन देव बर्मन ने एक गाना गाया था !
युँ तो
Bollywood मे कंपोजर अनेकोँ हुए है
लेकिन उनके तरह म्युजिकाल एक्सपेरिमेँट
करनेवाला न हुआ न है ।
ये ग्रामी आवार्डवालोँ कि बद् किस्मती है कि
उन्होने R.D Burman के प्रतिभा को नजर अंदाज करदिया !
"मेरे सामने वाले खिडकी मेँ"
से
"एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा" तक
उनके ज्यादातर गानेँ
आज भी उतनी ही लोकप्रिय जितने कल थे ।
बंगाल कि रानी रासमणी
कोलकत्ता के प्रशिद्ध दक्षिणेश्वर काली मंदिर से आप सभी परिचित होगेँ
लेकिन क्या आप जानते
है ......
इसकी प्रतिष्ठात्री एक नारी थी ।
स्वर्गीया रानी रासमणी माडे
ने यह मंदिर बनवाया था !
अति दरिद्र कैवर्त परवार मे इनका जन्म हुआ
ये अपनी युवाकाल मे परम रुपवती थीँ !
कोलकत्ता के ही एक अमीर युवक रामचंद्र माडे का
दिल इन पर आ गया !
दोनोँ ने
उस समय कि कट्टरवादी समाज से लड़ झगड़ के व्याह रचाया
कुछ काल तक उनका
दाम्पत्य जीवन सुखमय रहा
लेकिन 1836 साल मे रामचंद्र जी इन्हे और दुनिया को छोड़ गए ।
साधारण स्त्री होती तो इतने सारे विपत्तिओँ के आगे दाम तोड़ देती
लेकिन विचक्षण बुद्धि
संपन्न रासमणी खुद झुकी
न किसी को झुकने दिया !
बाल्यकाल गरीबी मे बिता था
इसलिये इन्हे गरीबोँ का दुःख दर्द का एहसास था
अतः धर्मपरायणा तेजस्वनी
गरीबोँ के उपकार व्रत मे दीक्षिता हो गई !
कुछ वर्षोँ मे देवी रासमणी माडे कोलकत्ता सहर मे इतनी प्रसिद्ध
हो गई कि
साधारण जनता उन्हे रानी माँ
पुकारने लगे ।
राजपरिवार कि न होकर भी
इनकी परोपकारिता दानशीलता
से प्रभावित हो
लोग
उनको रानी उपाधी
प्रदान किए थे !
परवर्त्तीकाल मे अनेकानेक लोगोँ को ख्रिस्तियन होते देख
रानी रासमणी माडे ने हिन्दु धर्म परम हित साधनार्थे
कई छोटे बड़े मंदिरो का निर्माण करवाया
जिसमे दक्षिणेश्वर काली मंदिर अन्यतम है ।
ध्यान रहे यह वही मंदिर है
जहाँ श्री रामकृष्ण परमहंस जी
पूजक होने के साथ साथ उद्योगी
बालकोँ को सनातन धर्म के विषय मे शिक्षा भी देते थे !
आगे चलकर इन्ही श्रीरामकृष्ण परमहंस जी के पाद पद्म मे ज्ञान आहरण कर
बिबेकानन्द विश्व प्रसिद्ध हुए !
बुधवार, 10 फ़रवरी 2016
***पारलाखेमुण्डि मे उपनिवेशवाद के खिलाफ सशस्त्र संग्राम्
अंग्रेजोँ ने 1767-68 मे दक्षिण ओड़िशा
के पारलाखेमुण्डि
(बर्तमान के गंजाम गजपति जिल्ला )
राज्य पर हमला करदिया
हमले के जवाब मे स्थानीय राजा
# जगन्नाथ_नारायण_देव तथा उनके अधिनस्त जमिदार तथा # विशोइ # दोरा
# दोरत्नम् सर्द्दारोँ ने अंग्रेजोँ का प्रतिरोध किया ।
परंतु पारलाखेमुण्डि राजा
1768 मे अंग्रेज # कर्णेल_पिच् के हातोँ
# जेलमुर मे परास्त हुए ।
उन्होने अंग्रेजोँ के खिलाफ
कटक के तत्कालिन # मराठा सरकार से सहायता माँगा था
लेकिन मराठीओ ने सामरिक सहायता देने से साफ मना करदिया था
च्युँकि उन्हे युद्ध न करने के लिये अंग्रेजोँ से तगड़ा रकम् मिले थे ।
युद्ध मे हारने के बाद अंग्रेज राजा जगन्नाथ नारायण को मारनेवाले थे के
तभी उनके कुछ आदवासी विशोइ सर्द्दारोँ ने उन्हे सकुशल बचालिया....
अब राजा और उनके समर्थक अनुचर वागी बनेँ
1768 से 1770 तक राजा जगन्नाथ नारायण ने
अंग्रेजोँ को उनके पारलाखेमुण्डि राज्य मे खजाना वसुलने नहीँ दिया
इससे व्रिटिश इष्ट इंडिया के आला अधिकारी वेहद खफ़ा हो गये और विद्रोह कुचलने के लिये अपने सबसे ताकतवर रेजिमेँट भेजदिया था
राजा जगन्नाथ नारायण देव
मरते दमतक अंग्रेजोँ से लढ़ते रहे
और अंततः वीरगति को प्राप्त हुए ।
~~~उनके मृत्यु पश्चात
अंग्रेजोँ ने राजपुत्र
# गजपति_देव को पारलाखेमुण्डी का नूतनराजा के रुपमे स्वीकृति दिया !
हालाँकि गजपति देव स्वयं को
स्वतंत्र समझते थे
परंतु अंग्रेजो ने जब उनके राजकार्य मे अपना हस्तक्षेप किया
दोनो पक्षोँ मे संबन्ध तिक्त हुए ।
1773 मे जगन्नाथ नारायण देव के पुत्र गजपति देव ने अंग्रेजोँ के खिलाफ अपने समर्थकोँ के साथ मिलकर विद्रोह किया
था परंतु हारकर अंग्रेजोँ के हातोँ 1774 मे वंदी बने ।
गजपति देव को अंग्रेजोँ ने विशाखापट्टनम् मे वंदी बनाए
रखा ।
अगले 6 वर्षोँ मे
यानी 1774 से 1780 तक
समुचे दक्षिण ओड़िशा क्षेत्रमे
विशोइ और दोरा आदिवासी संप्रदाय के सर्द्दारोँ ने अंग्रेजोँ का
निन्द हराम करदिया था
अंततः 1780 मे अंग्रेजोँ को मजबुरन गजपति देव को कारागार से मुक्त करना पड़ा था
और इसतरह से गजपतिदेव को पुनः पारलाखेमुण्डि की राजगदी हासिल हुई थी ।
हालाकिँ अंग्रेजोँ के खिलाफ
आदवासीओँ ने विद्रोह जारी रखा
1799 मे अंग्रेजोँ ने एक आदिवासी नेता को मारदिया
जिससे समुचे क्षेत्र मे विद्रोह हुए ।
राजा गजपतिदेव ने भी विद्रोहीओँ का साथ दिया
जिससे अंग्रेजोँ ने गजपति देव और उनके पुत्रोँ को # मुसलिपट्टनम् मे पुनः वंदी बना दिया था !
1800 से 1803 तक पारलाखेमुण्डि मे अंग्रेजोँ ने इतना खुन वाहाए कि मिट्टी बंजर हो गयी
और
लगातार तिन वर्षोँतक आए अकाल से स्थानीय प्रजा देश छोड़ जाती रही
और उधर राजपरिवार निश्वः हो गया.....
इसतरह से एक लम्बी उतारचढ़ाव वाले नाटकीय घटनाक्रम से गुजरते हुए
अंग्रेज
पारलाखेमुण्डि का विद्रोह दमन
कर पाए थे ।
आगे चलकर
1830 मे इस क्षेत्रमे पुनः विद्रोह हुए
इसबार विद्रोहीओँ के शिकार बने कंपानी मेनेजर जमिदार पद्मनाभ देव !
पद्मनाभ देव अंग्रेजोँ के हातोँ बिकचुका था
उसने इस क्षेत्र के प्रजाओँ पर वर्षोँ अत्याचार किया
पर वो कहते है न
एक दिन पाप का घड़ा भर ही जाता है
1830 मे विद्रोहीओँ ने जमिदार के घर व कचेरी को आग के हवाले करदिया
1832 तक विद्रोही अंग्रेजोँ को मुँहतोड़ जवाब देते रहे
उसी साल मद्रास सरकार द्वारा जर्ज एडवार्ड रसेल को
विद्रोह दमन के लिये भेजागया !
Edward Russel ने अपने सेना को अर्डर दे रखा था
जहाँ भी हतियारधारी योद्धा दिखे जान से मार दो !
कोई दया नहीँ कोई क्षमा नहीँ ।
पहले पहल वो नाकाम् रहा
और तब उसने अपना गुस्सा आमजनता पर उतारा....
हजारोँ लोग कत्लेआम् हुए
लाखोँ वेघर हुए
इससे कुछ एक विशोइ दोरा सर्द्दारोँ ने आत्म समर्पण करदिया व ज्यादातर विद्रोही उत्तरओड़िशा चलेगए !!
अंग्रेजोँ को लगा उन्होने विद्रोह दमन करलिया
अनगिनत लाशोँ के एवज् पर ही सही ।
1856-57 मे सिपाही विद्रोह के समर्थनमे यहाँ पुनः विद्रोह हुए
इस विद्रोह के कर्णधार रहे राधाकृष्ण दण्डसेना
विद्रोहीओँ ने अंग्रेजोँ को सहायता करनेवाले
देशद्रोही जातिद्रोहीओँ के घर जलादिए और लुटपाट मचाया ।
तब इस विद्रोह को दमन करने के लिये Captain wilson ने शवरोँ के परिवारोँ को निशाना बनाया
अनेकानेक शवर गाँव जलादिए गये
अपने ही लोगोँ पर हो रहे
बलात्कार हत्या और अत्याचार का विभत्स रुप
देख विद्रोह और भड़का
इसबार विद्रोहीओँ ने अंग्रेजोँ का सिधा मुकावला किया
लेकिन हारगये ।
राधाकृष्ण दण्डसेना और उनके कुछ विद्रोही साथी को अंग्रेजोँ ने फाँसी पर चढ़ा दिआ था .....
-Extra shot-
च्युँकि जगन्नाथ नारायण देव के पुत्र गजपति देव ने अंग्रेजोँ के खिलाफ लम्बी लढ़ाई लढ़ी थी
अविभक्त गंजाम जिल्ला से अलग होने पर इस पारलाखेमुण्डि क्षेत्र अंतर्गत
भूमिखंड का नाम गजपति रखा गया......
सोमवार, 1 फ़रवरी 2016
वीरा मंगेइ वेलनचेअर
दक्षिण भारत मे जन्मे स्वतंत्रता सेनानीओँ मेँ वीरा मंगाई भेलुनाचैयार Veera_Mangai_Velunachiyar देवी का नाम आदर सहित लिया जाता है !
18वी सदी मे इस नारी नेत्री ने अंग्रेजोँ के खिलाफ विद्रोह किया था !
1730 AD मे उनका जन्म रमनांड [Ramnad] राज्य मे हुआ था ।
उनके पिता थे महाराजा मन्नार सेल्लामुथ्थु सेथ्थुपाथ्थी व माता रानी सकन्दिमुथ्थाल !
च्युँकि राज दंपति कि वो इकल्लौति कन्या थी राजघराने द्वारा उन्हे नमनाँड क्षेत्र का युवराज्ञी अभिषिक्त किया गया ।
भल्लारी युद्ध कला मे निपुण राजकन्या को तीरदांजी घोड़ सबारी के साथ साथ विदेशी भाषाओँ का भी ज्ञान था ।
युवाकाल मे उनका विवाह Sivagangai Mannar Muthuvaduganathar के साथ करदिया गया ।
इसबीच जैसे तैसे उनका जीवन सुखमय बीत रहा था ।
1772 मे उनके राज्य पर अँग्रेज आक्रमण हुआ । L.t Col. Bon jour के सेनापतित्व मे अंग्रेजोँ ने Kalaiyar koil war छेड़ दिया ।
इस युद्ध मे उनके पति Raja Muthu Vaduganathar व कन्या राजकुमारी Gowri Nachiyarवीरगति को प्राप्त हुए ।
यह युद्ध कलैयार कोली राजप्रासाद सन्निकट हुआ था । .
इस लढ़ाई मे रानी सुरक्षित बच निकली वहीँ उनके दोनोँ भाई लहुलुहान हुए ।
राजघराने के बचे सदस्योँ ने कसम खाया कि वो अंग्रेजोँ को उचित शिक्षा देने के साथ साथ अपने राज्य पर पुनः प्रभुत्वस्थापित करेगे ।
रानी को उनके विश्वासी भरोसेमंद महामंत्री Dalavay Thandavaraya Pillai जी ने सुरक्षा दृष्टि से वो स्थान छोड़ ने
को
वहीँ महामंत्री ने Sultan Hyder Ali से रानी Velu Nachiyar कि सुरक्षा हेतु 5000 सैन माँगा था हैदर अली ने सहायता तो भेजदिया परंतु वे उनके साथ मिलकर अंग्रेजोँ के फिलाफ लढ़नहीँ पाए बुढ़ापे के कारण सुलतान हैदर अली चल वसे ।
हालाँकि बाद मे रानी को हैदर अली के पुत्र द्वारा हरसंभव सहायता मिला ।
हैदर अली ने पहले ही Syed Karki को Dindigul fort मेँ रानी कि मदद के लिये भेजदिया था । हैदर अलि के पुत्र व मराथु भाईओँ के मदद से रानी ने Sivaganga प्रदेश पर हमला कर दिया । अंग्रेजोँ द्वारा गद्दि पर बिठाये गये अरकट के नवाव रानी भेलु से हार गये और अपने राज्य को पुनः प्राप्त करने के वजह से रानी को Sivagangai seemai की उपाधी मिली ! रानी. Velu Nachiyar प्रथम भारतीय शासिका थी जिन्होने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह किया था और उन्हे जीत भी मिली थी !
Prof.Sanjeevi जी ने अपने ऐतिहासिक किताब Maruthiruvar’ मे लिखा हैरानी Velu Nachiyar ने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ रानी लक्ष्मीवाई से 85 वर्ष पूर्व जंग लढ़ी थी और उन्हे इसमे अभुत पूर्व सफलता भी हासिल हुआ था । वहीँ इतिहासकार Venkatam नेँ रानी Velu Nachiyar कि प्रंशसा करते हुए उन्हे भारत कि Joan of Arc. तक कहा है ।
ऐसे वीरागंनाओँ को मेरा सत् सत् नमन.....
जय माँ भारती
एक भारत समृद्ध भारत