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शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

•राजा बरबास की लोककथा•

एक समय की बात है, एक राजा थे जिनका नाम था बरबास। राजा बरबास को फलों से बहुत प्रेम था। आम, कटहल, अंगूर, नाशपाती, अनार, लीची, बेर और पीच जैसे दुनिया भर के फल उन्हें बेहद पसंद थे। वह हर तरह के फल खाते और उनके स्वाद में खो जाते। फलों के प्रति उनकी दीवानगी इतनी थी कि वह हर मौसम में नए-नए फल ढूंढकर खाते।

एक दिन जब राजा बरबास फल खा रहे थे, तभी एक वृद्ध महिला उनके पास आई और भूख से व्याकुल होकर उनसे खाने के लिए कुछ मांगने लगी। राजा को उस समय गुस्सा आ गया और उन्होंने तीखे स्वर में कहा, "क्या तुम नहीं देख रही कि मैं फल खा रहा हूँ? बाद में आना, जो मांगोगी, दे दूंगा।" वृद्धा ने फिर विनती की, "मुझे बहुत भूख लगी है, बस एक फल दे दीजिए, यह मेरे लिए बहुत बड़ी मदद होगी।" लेकिन राजा बरबास, जो फलों के प्रति लालची थे, ने कोई फल देने से मना कर दिया। उन्होंने अपने सैनिकों को बुलाकर वृद्धा को वहां से हटाने का आदेश दिया।

जाते-जाते वृद्धा ने गुस्से में राजा को श्राप दे दिया। उसका श्राप फलित हुआ और कुछ ही दिनों में राजा का शरीर फल की तरह फूलने लगा। उनका शरीर इतना भारी हो गया कि वह चलने-फिरने में असमर्थ हो गए। उनकी शारीरिक शक्ति धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी और उनका मन भी दुर्बल हो गया। कुछ ही समय बाद राजा बरबास की मृत्यु हो गई।

जब राजा को दफनाया गया, तो उस स्थान पर एक अजीब सा पेड़ उगा। इस पेड़ के फल अनोखे थे, जिनके सिरे पर राजमुकुट जैसी आकृति दिखाई देती थी। ये फल कच्चे होने पर कसैले और पकने पर अमृत जैसे मीठे होते थे। लोग इसे "पिजुली" कहने लगे। इस फल का नाम राजा बरबास के नाम पर रखा गया और इसे "बयाबास" (bayabas) कहा जाने लगा। यह लोककथा दक्षिण-पूर्व एशिया में विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
पर अमरुद कि Bayabas नाम का वास्तविक व्युत्पत्ति (Etymology) इतिहास भिन्न है । लोककथा में बयाबास का नाम राजा बरबास से जोड़ा गया है, लेकिन वास्तव में "बयाबास" शब्द की उत्पत्ति टैगालॉग और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई भाषाओं में प्रचलित है। यह शब्द स्पेनिश भाषा के "guayaba" से लिया गया है, जो अमरूद (guava) को दर्शाता है। स्पेनिश शब्द "guayaba" की उत्पत्ति प्राचीन अमेरिकी भाषा ताइनो (Taíno) के शब्द "wayaba" से हुई है, जो कैरिबियाई क्षेत्र के स्वदेशी लोगों की भाषा थी। ताइनो भाषा में "wayaba" का अर्थ था अमरूद का पेड़। 

स्पेनिश उपनिवेशकों ने इस शब्द को अपनाया और इसे "guayaba" के रूप में प्रयोग किया, जो बाद में दक्षिण-पूर्व एशियाई भाषाओं जैसे टैगालॉग में "bayabas" के रूप में प्रचलित हुआ। इस प्रकार, "बयाबास" शब्द का संबंध राजा बरबास की लोककथा से नहीं, बल्कि ताइनो भाषा के "wayaba" से है, जो स्पेनिश "guayaba" के माध्यम से विभिन्न भाषाओं में फैला । 

बुधवार, 16 जुलाई 2025

•अंतरिक्ष की यात्रा: क्या ISS वास्तव में अंतरिक्ष में है?•

क्या आपने कभी सोचा कि अंतरिक्ष कहाँ से शुरू होता है? क्या अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS), जो पृथ्वी से लगभग 400 किलोमीटर की ऊँचाई पर चक्कर लगाता है, वास्तव में अंतरिक्ष में है? आइए, इस सवाल का जवाब एक सरल और रोचक तरीके से तलाशते हैं, जिसमें हम पृथ्वी की वक्रता, होराइजन, और अंतरिक्ष की वैज्ञानिक परिभाषा को समझेंगे।

जब आप पृथ्वी की सतह पर खड़े होते हैं, मान लीजिए 6 फीट की ऊँचाई पर, तो आप किसी भी दिशा में लगभग 4.8 किलोमीटर दूर तक देख सकते हैं। इसे आपका "होराइजन" कहते हैं। 360 डिग्री घूमकर आप पृथ्वी का लगभग 73 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र देख पाते हैं। यह गणना पृथ्वी की गोलाकार संरचना पर आधारित है।

अब, अगर हम आपको 555 मीटर ऊँचाई पर, जैसे कि दुबई के बुर्ज खलीफा के अवलोकन डेक पर ले जाएँ, तो आपका होराइजन बढ़कर 84 किलोमीटर हो जाता है, और आप 22,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र देख सकते हैं। अगर आप माउंट एवरेस्ट की चोटी (8.8 किमी) पर खड़े हों, तो आपका होराइजन 336 किलोमीटर तक फैल जाता है, और आप 3.5 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र देख पाते हैं।

अब कल्पना करें कि आप ISS पर हैं, जो पृथ्वी से 400 किलोमीटर ऊपर है। इस ऊँचाई से आपका होराइजन 2,257 किलोमीटर तक फैल जाता है, और आप पृथ्वी का लगभग 1.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र देख सकते हैं। यह पृथ्वी की सतह का लगभग 12-15% हिस्सा है, जो इतना बड़ा है कि पृथ्वी आपको एक नीले-सफेद गोले की तरह दिखने लगती है। लेकिन क्या यह वास्तव में अंतरिक्ष है? आइए, इसे और गहराई से समझें।

400 किलोमीटर की ऊँचाई पर वायुमंडल इतना पतला हो जाता है कि प्रकाश का प्रकीर्णन (scattering) लगभग रुक जाता है। यही कारण है कि पृथ्वी की सतह पर नीला दिखने वाला आसमान यहाँ काला दिखता है, भले ही सूरज चमक रहा हो। यह काला आसमान अंतरिक्ष का एक स्पष्ट संकेत है, क्योंकि यह दर्शाता है कि आप पृथ्वी के घने वायुमंडल से बाहर हैं।

इसके अलावा, ISS पर अंतरिक्ष यात्री "भारहीनता" का अनुभव करते हैं। यह भारहीनता अंतरिक्ष का गुण नहीं, बल्कि "फ्री-फॉल" का परिणाम है। ISS और इसके यात्री पृथ्वी की ओर लगातार गिर रहे हैं, लेकिन उनकी कक्षीय गति (लगभग 27,600 किमी/घंटा) उन्हें पृथ्वी से टकराने से रोकती है। इस माइक्रोग्रैविटी की स्थिति में अंतरिक्ष यात्री तैरते हुए प्रतीत होते हैं, जो अंतरिक्ष यात्रा का एक अनूठा अनुभव है।

कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि 400 किलोमीटर की ऊँचाई पृथ्वी के आकार की तुलना में बहुत कम है। अगर पृथ्वी को एक क्लासरूम ग्लोब की तरह छोटा कर दें, तो यह दूरी एक बाल की मोटाई जितनी हो सकती है। लेकिन अंतरिक्ष की परिभाषा दूरी की सापेक्षता पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक मापदंडों पर आधारित है।

वैज्ञानिक रूप से, अंतरिक्ष की शुरुआत कार्मन रेखा (Kármán line) से मानी जाती है, जो समुद्र तल से 100 किलोमीटर की ऊँचाई पर है। इस रेखा पर वायुमंडल इतना पतला हो जाता है कि पारंपरिक विमान उड़ान नहीं भर सकते, और कक्षीय गति की आवश्यकता होती है। ISS 400 किलोमीटर की ऊँचाई पर है, जो कार्मन रेखा से चार गुना ऊपर है। इसलिए, यह निश्चित रूप से अंतरिक्ष में है।

ISS से पृथ्वी का जो गोलाकार दृश्य दिखता है, वह पूरी पृथ्वी नहीं, बल्कि उसका एक बड़ा हिस्सा है। यह दृश्य इतना प्रभावशाली होता है कि यह पृथ्वी की गोलाई को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। इसे "भ्रम" कहना गलत होगा, क्योंकि यह पृथ्वी की गोलाकार प्रकृति का वास्तविक प्रमाण है। जैसे-जैसे ISS पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है, अंतरिक्ष यात्री इसके विभिन्न हिस्सों को देख सकते हैं, जो इस अनुभव को और भी रोमांचक बनाता है।

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर अब तक 634 लोग जा चुके हैं, और वे सभी निस्संदेह अंतरिक्ष में गए हैं। 400 किलोमीटर की ऊँचाई पर काला आसमान, माइक्रोग्रैविटी, और पृथ्वी का गोलाकार दृश्य अंतरिक्ष के स्पष्ट लक्षण हैं। यह सही है कि ISS पृथ्वी के बहुत करीब है, और यह चंद्रमा या मंगल जैसी गहरे अंतरिक्ष की यात्रा नहीं है, लेकिन यह निम्न पृथ्वी कक्षा (Low Earth Orbit) में है, जो वैज्ञानिक रूप से अंतरिक्ष का हिस्सा है।

अंतरिक्ष यात्रा केवल दूरी की बात नहीं, बल्कि एक नया परिप्रेक्ष्य और वैज्ञानिक खोज का प्रतीक है। ISS पर काम करने वाले अंतरिक्ष यात्री न केवल पृथ्वी की सुंदरता को देखते हैं, बल्कि मानवता के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान और अंतरिक्ष अन्वेषण के नए द्वार खोलते हैं। तो अगली बार जब आप ISS के बारे में सुनें, तो याद रखें: यह न केवल अंतरिक्ष में है, बल्कि यह मानव की जिज्ञासा और साहस का प्रतीक है !
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•गिलगमेश का महाकाव्य (Epic of Gilgamesh)•

प्राचीन मेसोपोटामिया के धूल भरे मैदानों में सूर्य अपनी सुनहरी किरणों से धरती को प्रकाशित कर रहा था। वहाँ एक सुंदर और भव्य नगरी उभर रही थी, जिसे लोग उरुक नगरी के नाम से जानते थे। इस महान नगरी की ऊँची प्राचीरें स्वर्ग तक फैली हुई थीं। उरुक का राजा था गिलगमेश। वह एक दैवी पुरुष था, जिसके शरीर में दो-तिहाई दैवी रक्त और एक-तिहाई मानवीय आत्मा प्रवाहित थी। उसकी ऊँचाई वृक्ष-सी, शक्ति तूफान-सी, और सौंदर्य सुबह के आकाश-सा था। लेकिन उसके हृदय में अहंकार एक काले पहाड़ की तरह जमा था। वह अपनी प्रजा पर कठोर शासन करता, युवकों को युद्ध में भेजता, और अपनी इच्छा से सबके जीवन को नियंत्रित करता।

प्रजा का आक्रोश देवताओं के कानों तक पहुँचा। आकाश में विराजमान देवी अरुरु ने यह शिकायत सुनी और गिलगमेश को नियंत्रित करने का निश्चय किया। अरुरु ने मिट्टी और हवा से एक नए प्राणी का सृजन किया, जिसका नाम रखा गया एंकिदु। एंकिदु जंगल का पुत्र था, उसका शरीर पशुओं की तरह रोमश था और मन निर्मल व मुक्त। वह जंगल में हिरनों और शेरों के साथ दौड़ता था, लेकिन एक युवती, शामहत, ने उसे मानव सभ्यता के पाठ सिखाए और उरुक नगरी ले आई।

उरुक की सड़कों पर गिलगमेश और एंकिदु आमने-सामने हुए। एक भयंकर युद्ध शुरू हुआ—पत्थर चूर-चूर हुए, धूल उड़ी, और नगरी काँप उठी। लेकिन अंत में, जब दोनों थक गए, तो उन्होंने एक-दूसरे की शक्ति देखकर हँस दिया। उस क्षण से वे अटूट मित्र बन गए, जैसे मेसोपोटामिया में टिगरिस और यूफ्रेट्स नदियाँ मिलकर एक हो जाती हैं।

गिलगमेश के मन में एक नई महत्वाकांक्षा जगी—वह अपने नाम को अमर करना चाहता था। उसने अपने मित्र एंकिदु से कहा, “आओ, हम देवदार के जंगल जाएँ, जहाँ राक्षस हम्बाबा रहता है। उसे मारकर हम विश्व में नाम कमाएँगे।” एंकिदु सहमत हुआ, और दोनों निकल पड़े। जंगल में हम्बाबा की गर्जना पहाड़ों को हिला देती थी, उसकी अग्निमय साँसें वृक्षों को जला देती थीं। लेकिन गिलगमेश की तलवार और एंकिदु के साहस के सामने हम्बाबा ढेर हो गया। वे विजयी होकर लौटे, लेकिन देवता बहुत नाराज़ हुए।

एक दिन, सौंदर्य और युद्ध की देवी इश्तार ने गिलगमेश को देखकर मोहित हो गई। उसने गिलगमेश से प्रेम प्रस्ताव रखा, लेकिन गिलगमेश ने उसके अतीत को याद करते हुए कहा, “तुमने अपने प्रेमियों को धोखा दिया है, मैं कैसे भरोसा करूँ कि तुम मुझे धोखा नहीं दोगी?” क्रोध में इश्तार स्वर्ग गई और देवता अनु से स्वर्ग के भयानक सांड, गुगलन्ना, को धरती पर भेजने को कहा। वह सांड उरुक में आया और घर-मकानों को तहस-नहस कर दिया, लेकिन गिलगमेश और एंकिदु ने मिलकर उसे मार डाला। जनता ने उत्सव मनाया, लेकिन देवताओं के मन में क्रोध दोगुना हो गया।


देवताओं ने सभा बुलाई और निर्णय लिया—एंकिदु को मरना होगा। दैवी कोप से एंकिदु को एक रोग ने जकड़ लिया। दिन बीतते गए, एंकिदु कमज़ोर पड़ गया, और गिलगमेश उसके पास बैठकर आँसू बहाने लगा। “मेरे भाई, तुम मुझे छोड़कर क्यों जा रहे हो?” वह चिल्लाकर बोला, जब एंकिदु की आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं। गिलगमेश का हृदय टुकड़े-टुकड़े हो गया, और उसके मन में एक नया भय जन्मा—मृत्यु का भय।

गिलगमेश ने अमरता का रहस्य जानने की ठानी और जंगल, पहाड़, और समुद्र पार करके उत्नपिश्तिम नामक एक वृद्ध की खोज में निकल पड़ा। उत्नपिश्तिम एकमात्र मानव थे, जिन्हें महाप्रलय से बचने के बाद देवताओं ने अमरता दी थी।
 
उत्नपिश्तिम शुरुन्ना नगरी के निवासी थे, एक साधारण मानव, जिनका जीवन मिट्टी में काम करने, परिवार पालने, और देवताओं की प्रार्थना में बीतता था। लेकिन उनका साधारण जीवन एक महान घटना का साक्षी बनने वाला था, जिसने उन्हें अमरता के पथ पर ले गया।

एक दिन, दैवी संदेश से आकाश काले मेघों से ढक गया। अनु और एनलिल जैसे देवता मानवों के कोलाहल और अहंकार से क्षुब्ध होकर एक भयानक निर्णय ले चुके थे—वे पृथ्वी को महाप्रलय में नष्ट कर देंगे। लेकिन जल के देवता एआ ने मानवों पर दया दिखाई। उन्होंने उत्नपिश्तिम को स्वप्न में दर्शन देकर कहा, “हे उत्नपिश्तिम, तुम्हारी नगरी जल्द ही जल में डूब जाएगी। एक बड़ी नौका बनाओ, अपने परिवार और सभी जीव-जंतुओं को लेकर जीवन की रक्षा करो।”

उत्नपिश्तिम आश्चर्यचकित रह गए, लेकिन उन्होंने देवताओं का आदेश माना। उन्होंने दिन-रात मेहनत कर एक विशाल नौका बनाई—एक चौकोर आकार का जहाज़, जिसकी ऊँचाई और चौड़ाई एक छोटे पहाड़ जैसी थी। उन्होंने नौका में कई कोठरियाँ बनाईं और उसे राल और तेल से जलरोधी कर दिया। नगरी के लोग उन्हें पागल समझकर हँसे और ताने मारे, लेकिन उत्नपिश्तिम चुपचाप अपना काम करते रहे। अंत में, उन्होंने अपनी पत्नी, पुत्र, पुत्री, और सभी जीव-जंतुओं—हिरन, शेर, पक्षी, और कीट-पतंगों को नौका में चढ़ाया। जैसे ही द्वार बंद हुआ, आकाश फट पड़ा।

वर्षा शुरू हुई—एक अंधेरी, भयावह वर्षा, जिसने दिन और रात को एक कर दिया। नदियाँ उफन पड़ीं, पहाड़ डूब गए, और शुरुन्ना नगरी जल में बह गई। छह दिन और छह रात तक जल ने पृथ्वी को निगल लिया। उत्नपिश्तिम नौका में बैठे सुनते रहे—बाहर लोगों की चीखें, घर टूटने की आवाज़ें, और हवा की गर्जना। सातवें दिन सब शांत हो गया। उन्होंने द्वार खोला और देखा—चारों ओर केवल जल ही जल था, जीवन का कोई चिह्न नहीं।

दिन बीतते गए। उत्नपिश्तिम ने स्थल की खोज में एक कबूतर छोड़ा, लेकिन वह लौट आया। फिर एक कौआ छोड़ा, वह भी लौट आया। अंत में, एक छोटा पक्षी छोड़ा, जो वापस नहीं लौटा। उत्नपिश्तिम समझ गए कि कहीं न कहीं स्थल ज़रूर है। कई दिनों बाद, उनकी नौका निसिर पर्वत के शिखर पर अटक गई। उत्नपिश्तिम नौका से उतरे, गीली मिट्टी पर पैर रखा, और देवताओं को धन्यवाद देने के लिए एक वेदी बनाई। उन्होंने अग्नि जलाई और धूप चढ़ाई, जिसकी सुगंध आकाश तक गई।

देवता यह देखकर आए। एनलिल पहले क्रोधित हुए, क्योंकि वे मानव वंश को नष्ट करना चाहते थे। लेकिन एआ ने उन्हें शांत किया और कहा, “इस मनुष्य ने तुम्हारी इच्छा मानकर जीवन के बीज की रक्षा की है।” एनलिल ने उत्नपिश्तिम को देखा—उनकी शांत आँखें, काँपते हाथ, और नम्र चेहरा। वे दया से भर गए। उन्होंने उत्नपिश्तिम और उनकी पत्नी को आशीर्वाद देते हुए कहा, “तुम दोनों अब अमर हो। तुम एक दूरस्थ द्वीप पर रहोगे, जहाँ सामान्य मनुष्य कभी नहीं पहुँच सकते।”

उत्नपिश्तिम और उनकी पत्नी उस द्वीप पर चले गए। वह द्वीप एक शांत, सुंदर स्थान था, जहाँ समुद्र की लहरें और आकाश का नीला रंग एक-दूसरे में मिलते थे। वहाँ उन्होंने जीवन की स्मृतियों और महाप्रलय की कहानी के साथ कई दिन बिताए। कई शताब्दियों बाद, जब गिलगमेश अमरता की खोज में उनके द्वार पर आए, उत्नपिश्तिम ने उनका सामना किया। उनके चेहरे पर समय की रेखाएँ नहीं थीं, लेकिन आँखों में गहरा दुख और ज्ञान छिपा था।

गिलगमेश को देखकर उत्नपिश्तिम बोले, “मेरी अमरता एक उपहार है, जो देवताओं ने स्वेच्छा से मुझे दिया। मैंने कभी अमरता नहीं माँगी। मैंने अपने सभी मित्रों, परिजनों, और अपनी मातृभूमि शुरुन्ना के विनाश को देखा है। मैं जीवित हूँ, लेकिन अकेला। तुम जीवन को स्वीकार करो, क्योंकि इसकी सीमा (मृत्यु) ही इसे मूल्यवान बनाती है।” उनकी आवाज़ में एक कोमल दुख था, जैसे वे स्वयं इस अमरता का बोझ महसूस कर रहे हों। उत्नपिश्तिम ने फिर कहा, “अमरता तुम्हारे लिए नहीं है। मनुष्य का जीवन एक नदी की तरह है—यह बहता है और एक निश्चित स्थान पर समुद्र में मिल जाता है।” लेकिन गिलगमेश की ज़िद देखकर उन्होंने एक रास्ता दिखाया—समुद्र तल में एक पौधा है, जो यौवन लौटा सकता है।

गिलगमेश ने समुद्र में गोता लगाकर वह पौधा हासिल किया। उनके मन में आशा की किरण जली। लेकिन लौटते समय, एक रात जब वे एक नदी किनारे विश्राम कर रहे थे, एक साँप ने चुपके से वह पौधा चुराकर खा लिया। साँप ने अपनी केंचुली उतारी और नया हो गया, और गिलगमेश निराश रह गए। उन्होंने आकाश की ओर देखकर रोया, लेकिन उनके मन में एक नई चेतना जगी।

अंत में, वे उरुक नगरी लौटे। नगरी की प्राचीरों को देखकर उन्होंने समझा—अमरता शरीर में नहीं, कर्मों और स्मृतियों में छिपी है। उन्होंने अपने जीवन को स्वीकार किया, और उनका नाम इतिहास के पत्थरों पर अंकित हो गया।
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यह थी गिलगमेश की कहानी—मेसोपोटामिया के एक महान राजा की, जिसने मृत्यु को जीतने की चाह में जीवन का मर्म खोज लिया।


एपिक ऑफ गिलगमेश एक सुमेरी पुराण-कथा है, जो प्राचीन मेसोपोटामिया (आधुनिक इराक) की संस्कृति का हिस्सा है।

- गिलगमेश : उरुक नगरी का महान राजा, जो दो-तिहाई दैवी और एक-तिहाई मानवीय गुणों का स्वामी था। वह शक्तिशाली और सुंदर, लेकिन शुरू में अहंकारी और कठोर शासक था। एंकिदु के साथ दोस्ती और मृत्यु का भय उसे जीवन का मर्म सिखाता है। गिलगमेश नाम का एक वास्तविक राजा मेसोपोटामिया में 2900 से 2700 ईसा पूर्व के बीच रहा होगा, ऐसा शोधकर्ता अनुमान लगाते हैं। संभवतः इस वास्तविक राजा के नाम पर यह महाकाव्य रचा गया, हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है।

-एंकिदु: देवी अरुरु द्वारा मिट्टी और हवा से बनाया गया एक जंगली मनुष्य। वह शक्तिशाली, निर्मल मन का स्वामी था और गिलगमेश का अटूट मित्र बनकर उसे मानवीय गुण सिखाता है। देवताओं के शाप से उसकी मृत्यु होती है।

-अरुरु: सुमेरी सृजन देवी, जिसने गिलगमेश को नियंत्रित करने के लिए एंकिदु का सृजन किया।

- शामहत: एक मंदिर की पुजारिन, जिसने एंकिदु को सभ्य बनाकर मानव सभ्यता से परिचित कराया।

-उरुक: प्राचीन मेसोपोटामिया का एक प्रमुख सुमेरी नगर-राज्य, जो गिलगमेश की राजधानी थी। यह अपनी ऊँची प्राचीरों, मंदिरों, और सभ्यता के केंद्र के रूप में प्रसिद्ध था। वर्तमान में यह दक्षिणी इराक में वारका (Warka) के नाम से एक पुरातात्विक स्थल है।

-देवदार का जंगल (Cedar Forest)**: एक पौराणिक जंगल, जहाँ गिलगमेश और एंकिदु राक्षस हम्बाबा को मारने गए। यह सुमेरी कहानियों में एक रहस्यमय और पवित्र स्थान के रूप में वर्णित है। यह एक पौराणिक स्थान है, इसलिए इसका आधुनिक भौगोलिक स्थान निश्चित नहीं है। कुछ शोधकर्ता इसे लेबनान के देवदार जंगलों से जोड़ते हैं।

-शुरुन्ना: उत्नपिश्तिम की नगरी, जहाँ वे महाप्रलय से पहले रहते थे। यह मेसोपोटामिया का एक प्राचीन सुमेरी नगर था। वर्तमान में यह दक्षिणी इराक में टेल फारा (Tell Fara) के नाम से एक पुरातात्विक स्थल है।

-निसिर पर्वत: महाप्रलय के बाद उत्नपिश्तिम की नौका जिस पर्वत पर अटकी थी। यह कहानी में एक पौराणिक स्थान के रूप में उल्लिखित है। इसका निश्चित भौगोलिक स्थान अस्पष्ट है। कुछ शोधकर्ता इसे इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र में पिरामाग्रुन पर्वत से जोड़ते हैं, लेकिन यह निश्चित नहीं है।

-दूरस्थ द्वीप: वह स्थान, जहाँ उत्नपिश्तिम और उनकी पत्नी को देवताओं ने अमरता देकर भेजा। यह एक पौराणिक और रहस्यमय स्थान के रूप में वर्णित है। यह एक काल्पनिक स्थान है, इसलिए इसका आधुनिक भौगोलिक स्थान स्पष्ट नहीं है। कुछ शोधकर्ता इसे फारस की खाड़ी में बहरीन या दिलमुन द्वीप से जोड़ते हैं, लेकिन यह अनिश्चित है।

(महाकाव्य में कुछ छोटी-मोटी घटनाएँ हैं, जिन्हें कहानी को संक्षिप्त रखने के लिए छोड़ दिया गया है।)

सोमवार, 14 जुलाई 2025

ओड़िआ भाषा आंदोलन क्या भारत भारत विरोधी आंदोलन थी ?

कई लोग जब ओड़िआ भाषा आंदोलन का नाम सुनते हैं तो सोचते हैं कि शायद यह आंदोलन भारत विरोधी रही होगी पर ऐसा नहीं है । ओड़िआ भाषा आंदोलन कभी भारत विरोधी नहीं था। यह आंदोलन 19वीं शताब्दी में शुरू हुआ और इसका मुख्य उद्देश्य ओड़िया भाषा और संस्कृति की रक्षा करना तथा बिखरे हुए ओड़िशा को एक प्रशासनिक इकाई के रूप में एकजुट करना था। इस दौरान ओड़िया लोगों ने बंगाली, हिंदी, और तेलुगु भाषाओं के प्रभाव के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें उठाईं, बिना किसी हिंसा या अन्य समुदायों के खिलाफ वैमनस्य के।

भारत के इतिहास में भाषा आंदोलन एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं, जो विभिन्न समुदायों की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए लड़े गए। इनमें से एक सबसे प्रारंभिक और शांतिपूर्ण आंदोलन था ओड़िआ भाषा और संस्कृति को बचाने का आंदोलन, जो 19वीं शताब्दी में शुरू हुआ। यह आंदोलन न केवल ओड़िआ भाषा की रक्षा के लिए था, बल्कि ओड़िशा के एकीकरण और इसकी सांस्कृतिक पहचान को स्थापित करने के लिए भी था। 

1866 के आसपास, जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, ओड़िशा की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान पर संकट मंडरा रहा था। उस समय ओड़िशा प्रशासनिक रूप से तीन हिस्सों में बंटा हुआ था: कुछ हिस्से बंगाल प्रेसीडेंसी, कुछ मद्रास प्रेसीडेंसी, और कुछ सेंट्रल प्रोविंस के अधीन थे। इस विभाजन के कारण ओड़िआ भाषा और संस्कृति पर बंगाली, हिंदी, और तेलुगु भाषाओं का प्रभाव बढ़ रहा था। विशेष रूप से, बंगाली भाषा को स्कूलों और प्रशासन में थोपा जा रहा था, जिससे ओड़िया भाषा की उपेक्षा हो रही थी। दक्षिण ओड़िशा में तेलुगू और पश्चिम ओडिशा में हिन्दी थोपा जा रहा था । 

इसके जवाब में, ओड़िआ बुद्धिजीवियों, जैसे मधुसूदन दास, गोपबन्धु दास,फकीर मोहन सेनापति, गौरीशंकर राय, और राधानाथ राय जैसे साहित्यकारों और समाज सुधारकों ने ओड़िआ भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए एक शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू किया। यह आंदोलन न केवल भाषा की रक्षा के लिए था, बल्कि बिखरे हुए ओड़िशा को एक प्रशासनिक इकाई के रूप में एकजुट करने का भी लक्ष्य रखता था। 

ओड़िआ भाषा आंदोलन की सबसे उल्लेखनीय विशेषता इसकी शांतिपूर्ण प्रकृति थी। ओड़िआ लोगों ने कभी भी हिंसा, उत्पीड़न, या अन्य समुदायों के खिलाफ वैमनस्य का सहारा नहीं लिया। इसके बजाय, उन्होंने साहित्य, पत्रकारिता, और संगठित बैठकों के माध्यम से अपनी मांगें रखीं। उदाहरण के लिए:

1903 में स्थापित 'उत्कल सम्मिलनी' संगठन ने ओड़िआ भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए एक मंच प्रदान किया। इसने विभिन्न क्षेत्रों में बिखरे ओड़िया लोगों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

फकीर मोहन सेनापति जैसे लेखकों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से ओड़िआ भाषा को समृद्ध किया और इसे एक सशक्त साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित किया।

 ओड़िआ बुद्धिजीवियों ने स्कूलों में ओड़िआ भाषा को लागू करने और स्थानीय प्रशासन में इसका उपयोग बढ़ाने की मांग की।

इस आंदोलन का परिणाम 1936 में हुआ, जब ओड़िशा को एक अलग प्रांत के रूप में मान्यता दी गई। यह भारत में भाषाई आधार पर गठित पहला प्रांत था, जो ओड़िआ लोगों के दशकों के शांतिपूर्ण संघर्ष का परिणाम था।

1935 में, साइमन कमीशन ने ओड़िशा के नेताओं को एक अलग देश 'कलिंग' बनाने का प्रस्ताव दिया था। यह प्रस्ताव उस समय के ऐतिहासिक और भौगोलिक संदर्भ में महत्वपूर्ण था, क्योंकि प्राचीन कलिंग साम्राज्य (जो आधुनिक ओड़िशा और इसके आसपास के क्षेत्रों को शामिल करता था) का प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैला हुआ था। प्राचीन कलिंग के उपनिवेश, जैसे बर्मा, मलेशिया, फिलीपींस, मालदीव, और श्रीलंका, इसकी समृद्ध सांस्कृतिक और व्यापारिक विरासत के प्रमाण थे। 

हालांकि, ओड़िआ नेताओं ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उनके लिए भारत के साथ एकता और राष्ट्रीय एकीकरण सर्वोपरि था। यह निर्णय उनकी गहरी देशभक्ति को दर्शाता है। इस निर्णय के कारण, हालांकि आधा कलिंग क्षेत्र विभिन्न राज्यों में बंट गया, फिर भी ओड़िया लोगों ने भारत विरोधी भावना नहीं अपनाई। इसके बजाय, उन्होंने भारत के भीतर अपनी पहचान को मजबूत करने का प्रयास किया।

दक्षिण भारत में, विशेष रूप से तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, और कर्नाटक जैसे राज्यों में, भाषा आंदोलनों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि, इन आंदोलनों में कई बार हिंसा, विरोध प्रदर्शन, और विभाजनकारी राजनीति देखी गई। 

1960 के दशक में तमिलनाडु में हिंदी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में लागू करने के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जिनमें हिंसा और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी शामिल थीं। भाषाई आधार पर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के गठन में भी क्षेत्रीय अस्मिता और अलगाववादी भावनाएं सामने आईं।

इनके विपरीत, ओड़िआ आंदोलन में हिंसा या अन्य समुदायों के खिलाफ वैमनस्य का अभाव था। ओड़िआ लोगों ने अपनी मांगों को शांतिपूर्ण और रचनात्मक तरीके से रखा, जो उनकी देशभक्ति और समावेशी दृष्टिकोण को दर्शाता है।

ओड़िआ लोगों की देशभक्ति का एक प्रमुख उदाहरण यह है कि उन्होंने भारत के साथ एकता को प्राथमिकता दी, भले ही इसके परिणामस्वरूप उनकी कुछ क्षेत्रीय और सांस्कृतिक हानि हुई। आधुनिक ओड़िशा के गठन के बाद भी, जिन क्षेत्रों में ओड़िआ भाषी लोग रहते हैं, वे विभिन्न राज्यों (जैसे झारखंड, पश्चिम बंगाल, और आंध्र प्रदेश) में बंट गए। फिर भी, ओड़िआ लोगों ने भारत विरोधी रवैया नहीं अपनाया। 

यह देशभक्ति न केवल उनके ऐतिहासिक निर्णयों में, बल्कि उनके सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों में भी झलकती है। ओड़िशा के लोग अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, जैसे जगन्नाथ संस्कृति, को भारत की एकता और विविधता के प्रतीक के रूप में देखते हैं।

ओड़िआ भाषा आंदोलन भारत के इतिहास में एक अनूठा उदाहरण है, जो शांतिपूर्ण संघर्ष और देशभक्ति का प्रतीक है। इस आंदोलन ने न केवल ओड़िआ भाषा और संस्कृति को बचाया, बल्कि भारत के भीतर एक एकजुट ओड़िशा की नींव रखी। साइमन कमीशन के 'कलिंग' प्रस्ताव को ठुकराकर, ओड़िया नेताओं ने भारत के साथ अपनी एकता को प्राथमिकता दी, जो उनकी गहरी देशभक्ति को दर्शाता है। 

दक्षिण भारत के कुछ भाषा आंदोलनों के विपरीत, जहां विभाजनकारी राजनीति और हिंसा देखी गई, ओड़िआ आंदोलन ने रचनात्मक और शांतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया। इसे ओड़िआ लोगों की कमजोरी के रूप में देखा जाए या उनकी ताकत के रूप में, यह निश्चित है कि ओड़िशा के लोग अपने देश भारत से गहरे प्रेम करते हैं। यह प्रेम और एकता आज भी ओड़िशा की संस्कृति और समाज में जीवंत है।

रविवार, 13 जुलाई 2025

Dancing Mania: मध्ययुगीन यूरोप का रहस्यमयी मृत्यु नृत्य

मध्ययुगीन यूरोप में जब प्लेग का प्रकोप और धार्मिक उन्माद लोगों के मन को आतंकित कर रहा था, तब एक अज्ञात और रहस्यमयी घटना ने समाज को और भी भयभीत कर दिया। यह थी Dancing mania (नृत्य उन्माद), एक कुख्यात और अविश्वसनीय सामाजिक घटना, जिसमें सैकड़ों लोग अनियंत्रित रूप से नाचते थे, थककर बेहोश होने या मृत्यु तक। डांसिंग मैनिया का नृत्य आज के क्लब या उत्सव के नृत्य जैसा नहीं था। यह एक विक्षिप्त, मृत्यु से पहले का नृत्य था, लेकिन यह नृत्य क्यों और कैसे हो रहा था, यह उस समय कोई नहीं समझ पाया।


मध्ययुगीन यूरोप के विभिन्न देशों में अलग-अलग समय पर डांसिंग मैनिया देखी गई। सन् 1374 में जर्मनी के आखेन शहर में एक अज्ञात शक्ति ने लोगों को अपने कब्जे में ले लिया। एक व्यक्ति ने सड़क पर अचानक नाचना शुरू किया, और कुछ ही समय में अन्य लोग उसके साथ शामिल हो गए। यह नृत्य किसी संगीत या उत्सव का हिस्सा नहीं था; यह एक अनियंत्रित, अव्यवस्थित, ताल-लयहीन मृत्यु का नृत्य था। यह लोगों की इच्छा से नहीं हो रहा था। किसी अज्ञात शक्ति के प्रभाव में लोग नाचते-नाचते रोते, चीखते, और कुछ क्षणों बाद बेहोश होकर गिर जाते या मर जाते। यह घटना राइन नदी के क्षेत्र से फैलकर फ्रांस, इटली और नीदरलैंड तक पहुंच गई।

Dancing Maniaकी सबसे प्रसिद्ध घटना 1518 में स्ट्रासबर्ग में हुई। उस वर्ष जुलाई में, स्ट्रासबर्ग की एक महिला, फ्राउ ट्रोफिया, ने सड़क पर नाचना शुरू किया। उनके नृत्य को देखकर अन्य लोग भी शामिल हो गए, और एक दिन के भीतर सैकड़ों लोग एक अज्ञात उन्माद में नाच रहे थे। यह घटना दो महीने तक चली, और कई लोग थकान, पक्षाघात, या दिल का दौरा पड़ने से मर गए। समकालीन विवरणों के अनुसार, डांसिंग मैनिया के शिकार लोगों में से प्रतिदिन 15 लोग तक मर रहे थे। स्ट्रासबर्ग की घटना से पहले भी, 1237 में बच्चों के बीच और 1347 में इटली में ऐसी ही घटनाएं देखी गई थीं। इटली में इसे टारेंटिज्म कहा जाता था, जिसे टारेंटुला मकड़ी के काटने से जोड़ा गया था।

मध्ययुगीन यूरोपवासियों ने इसे दैवीय अभिशाप या संत विटस के श्राप के रूप में देखा। कुछ ने इसे भूत-प्रेत या जादू-टोना से जोड़ा। लेकिन आधुनिक विज्ञान के आधार पर Dancing mania के कारणों के बारे में कई सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं।

मास साइकोजेनिक इलनेस (MPI) सबसे स्वीकार्य सिद्धांतों में से एक है। मध्ययुगीन यूरोप उस समय अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। ब्लैक डेथ (प्लेग) ने लाखों लोगों की जान ले ली थी, गरीबी और अकाल व्यापक था, और धार्मिक उन्माद ने लोगों के मन में भय और अनिश्चितता पैदा कर दी थी। इस मानसिक तनाव ने एक सामूहिक मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया पैदा की हो सकती है, जिसमें एक व्यक्ति का व्यवहार दूसरों को प्रभावित करता था। यह एक सामाजिक "महामारी" थी, जिसमें मानसिक संक्रामकता शारीरिक रोगों से भी अधिक शक्तिशाली थी।

एर्गट पॉइजनिंग सिद्धांत के अनुसार, एक फंगस जिसे एर्गट कहा जाता है, और जो Rye (Secale cereale) अनाज में उगता है, इसका कारण हो सकता है। एर्गट फंगस में LSD जैसे हैलुसिनोजेनिक रसायन होते हैं, जो भोजन के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर मरोड़, भ्रम, और अनियंत्रित व्यवहार पैदा कर सकते हैं। चूंकि डांसिंग मैनिया की घटनाएं अनाज-निर्भर क्षेत्रों में अधिक देखी गई थीं, इसलिए कुछ लोग मानते हैं कि यह इसका कारण हो सकता है।

मध्ययुगीन यूरोप में आज की तरह वैज्ञानिक विश्वास के बजाय धार्मिक विश्वास अधिक प्रबल थे। भारत में भी हम कभी-कभी कुछ ईसाई संस्थानों द्वारा धर्म के नाम पर लोगों को नचाते हुए देखते हैं। उस समय भी यूरोप के ईसाइयों में इस तरह का धार्मिक उन्माद और अंधविश्वास प्रबल था। तत्कालीन यूरोपवासी मानते थे कि नृत्य के माध्यम से वे दैवीय शक्ति से जुड़ रहे हैं या अभिशाप से मुक्ति पा रहे हैं। इटली में टारेंटिज्म इसी तरह के लोकविश्वास से उत्पन्न हुआ था। उस समय इटली के ईसाई मानते थे कि टारेंटुला मकड़ी के जहर को नृत्य के माध्यम से निकाला जा सकता है। यह विश्वास एक सांस्कृतिक रीति में बदल गया, जिसमें टारेंटेला नामक नृत्य इसका हिस्सा बन गया। इस सिद्धांत को मानने वाले लोग कहते हैं कि Dancing mania जैसी घटनाएं तत्कालीन ईसाई समाज में व्याप्त अंधविश्वास के कारण हुईं।

कुछ शोधकर्ताओं ने इसे मिर्गी या अन्य न्यूरोलॉजिकल अवस्थाओं से जोड़ा है। लेकिन चूंकि Dancing mania एक सामूहिक घटना थी, इसलिए केवल न्यूरोलॉजिकल कारणों की तुलना में सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण अधिक प्रभावशाली होने की संभावना है।

मध्ययुगीन यूरोप में Dancing mania के परिणाम भयावह थे। स्ट्रासबर्ग में थकान, दिल का दौरा, या अन्य शारीरिक कारणों से सैकड़ों लोग मरे। तत्कालीन अधिकारियों ने इसे नियंत्रित करने के लिए अज्ञात उपाय अपनाए। कुछ स्थानों पर नृत्य को प्रोत्साहित किया गया, क्योंकि लोग मानते थे कि यह दैवीय अभिशाप से मुक्ति दिलाएगा। अन्य स्थानों पर नृत्य पर प्रतिबंध लगाया गया, लेकिन इससे और अधिक उन्माद बढ़ा। धार्मिक नेताओं ने मंत्र और प्रार्थनाओं के माध्यम से इसे नियंत्रित करने की कोशिश की, लेकिन ज्यादातर मामलों में यह असफल रहा।

इस घटना ने समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ा। इसने धार्मिक और सामाजिक सुधारों के लिए दबाव पैदा किया और लोगों में भय और अंधविश्वास को और बढ़ाया। दीर्घकालिक दृष्टिकोण से, डांसिंग मैनिया मनोविज्ञान और सामूहिक व्यवहार पर शोध का एक प्रमुख विषय बन गया।

आधुनिक युग में, डांसिंग मैनिया एक रहस्यमयी ऐतिहासिक घटना के रूप में साहित्य, सिनेमा और कला में स्थान पा चुका है। 1832 में जस्टस हेकेर की पुस्तक "The Dancing Mania" में इस विषय पर पहली विस्तृत जानकारी प्रकाशित हुई, जिसने शोधकर्ताओं को इसके मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारणों की खोज करने के लिए प्रेरित किया। मध्ययुगीन चित्रकला में, इस घटना को असहाय और उन्मादग्रस्त लोगों के चित्रों के माध्यम से दर्शाया गया है।

आधुनिक सिनेमा और वृत्तचित्रों में, स्ट्रासबर्ग की घटना को एक अज्ञात महामारी के रूप में चित्रित किया गया है। इसे आधुनिक सामूहिक हिस्टीरिया की घटनाओं, जैसे कि 2011 में न्यूयॉर्क के "ले रॉय हाईस्कूल" में अचानक देखे गए "टिक डिसऑर्डर" से तुलना की जाती है।

डांसिंग मैनिया की घटनाओं के इतिहास से पता चलता है कि मध्ययुगीन यूरोपवासी कितने धार्मिक अंधविश्वासी थे। लेकिन इस धार्मिक अंधविश्वास के दुष्प्रभाव को महसूस कर यूरोपीय समाज के बुद्धिजीवियों ने 15वीं शताब्दी से इसे समाज से मुक्त करने के लिए कार्य शुरू किया। यूरोप में 15वीं शताब्दी के पुनर्जागरण (Renaissance) और 16वीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति के कारण यूरोपीय समाज बड़े कष्टों के बाद धार्मिक अंधविश्वास से मुक्त हो सका। यदि उस समय यूरोप में कई शताब्दियों तक फैली सांस्कृतिक, धार्मिक और वैज्ञानिक क्रांति नहीं हुई होती, तो आज भी यूरोप के ईसाई डांसिंग मैनिया के शिकार होकर सड़कों पर नाच रहे होते।
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शुक्रवार, 11 जुलाई 2025

रोम नगर कैसे बसाया गया था ?

कई शताब्दियाँ पहले, इटली के एक प्राचीन नगर अल्बा लॉन्गा में राजा नुमिटर का शासन था। उनकी एक सुंदर पुत्री थी, जिसका नाम रिया सिल्विया था। लेकिन नुमिटर का भाई अमूलियस अत्यंत लोभी और सत्तालोलुप था। उसने नुमिटर को सिंहासन से हटाकर स्वयं राजा बन गया। अपने शासन को सुरक्षित रखने के लिए अमूलियस ने अपनी भतीजी रिया सिल्विया को वेस्टाल वर्जिन बनने के लिए बाध्य किया, जिसके कारण वह विवाह और संतान उत्पन्न करने से वंचित रहती थी। वेस्टाल वर्जिन रोम के समाज में अत्यंत सम्मानित थीं और उनका मुख्य कार्य देवी वेस्टा के मंदिर में पवित्र अग्नि को जलाए रखना था, जो रोम की समृद्धि और सुरक्षा का प्रतीक थी। वेस्टाल वर्जिन 30 वर्षों तक कुंवारी रहने की शपथ लेती थीं। उन्हें विवाह और संतान उत्पन्न करना निषिद्ध था। सामान्यतः 6 से 10 वर्ष की आयु में उच्च कुल की कन्याओं को वेस्टाल वर्जिन के रूप में चुना जाता था। उनकी संख्या सामान्यतः 6 होती थी, जिन्हें रोम के प्रधान पुरोहित (पॉन्टिफेक्स मैक्सिमस) चुनते थे।

वेस्टाल वर्जिन के रूप में रिया सिल्विया देवी वेस्टा के मंदिर में निष्ठा के साथ सेवा करती थीं, लेकिन एक रात एक अलौकिक घटना घटी। युद्ध और शक्ति के देवता मार्स रिया सिल्विया की सुंदरता पर मोहित हो गए। दैवीय रूप में उनके पास आकर मार्स ने रिया को गर्भवती कर दिया। इस अलौकिक संबंध से रिया ने जुड़वां बच्चों, रोमुलस और रेमुस, को जन्म दिया। लेकिन यह बात किसी तरह अमूलियस को पता चल गई। अमूलियस ने इन बच्चों को अपने सिंहासन के लिए खतरा मानकर एक क्रूर निर्णय लिया। उसने रिया सिल्विया को दंडित किया और आदेश दिया कि दोनों बच्चों को एक टोकरी में रखकर टाइबर नदी में बहा दिया जाए।

नदी का प्रवाह बच्चों को दूर ले गया, लेकिन भाग्य ने उनका साथ दिया। टोकरी नदी के किनारे, पालाटाइन पहाड़ी के पास, एक वृक्ष की जड़ में अटक गई। वहाँ एक मादा भेड़िया, जो अपने बच्चों को पाल रही थी, ने इन बच्चों को देखा। मातृभाव से प्रेरित होकर भेड़िया ने रोमुलस और रेमुस को अपना दूध पिलाकर पालना शुरू किया। कई दिनों बाद, फाउस्तुलस नामक एक दयालु चरवाहे ने इन बच्चों को खोज लिया। उसने और उसकी पत्नी लारेन्सिया ने इन बच्चों को अपने संतानों की तरह पाला।


रोमुलस और रेमुस युवावस्था तक फाउस्तुलस और उनकी पत्नी लारेन्सिया द्वारा चरवाहों के रूप में पाले गए। वे शक्तिशाली, साहसी और नेतृत्व गुणों से परिपूर्ण थे, जो उन्हें अन्य चरवाहों से अलग बनाता था। तारों के बीच रोमुलस और रेमुस सूर्य और चंद्रमा की तरह चमकते थे। उनके असाधारण गुणों और चेहरों ने फाउस्तुलस के मन में संदेह पैदा किया कि ये बच्चे साधारण नहीं हैं।

एक दिन रेमुस अल्बा लॉन्गा के राजा अमूलियस के चरवाहों के साथ एक विवाद में उलझ गया, जिसके फलस्वरूप उसे बंदी बना लिया गया। रोमुलस अपने भाई को मुक्त कराने के लिए आगे आया।

फाउस्तुलस ने अल्बा लॉन्गा में रिया सिल्विया के गर्भवती होने और बच्चों को नदी में बहाए जाने की खबर सुनी थी। वह यह भी जानता था कि रिया सिल्विया राजा नुमिटर की पुत्री थीं और बच्चे उनके पुत्र हो सकते हैं। इसलिए, उसने रोमुलस और रेमुस की वास्तविक पहचान के बारे में पहले से अनुमान लगा लिया था या आंशिक रूप से जानता था। जब फाउस्तुलस ने अपने पालित पुत्रों को संकट में देखा, तो उसने निर्णय लिया कि अब सत्य प्रकट करने का समय आ गया है। उसने रोमुलस और रेमुस को बताया कि वे रिया सिल्विया के पुत्र हैं, जो राजा नुमिटर की पुत्री थीं और मंगल देवता मार्स द्वारा उनकी उत्पत्ति हुई थी। उसने यह भी खुलासा किया कि अमूलियस ने उन्हें शिशु अवस्था में टाइबर नदी में बहा दिया था, लेकिन एक मादा भेड़िया ने उन्हें अपने बच्चों की तरह पाला था।

सब कुछ जानकर रोमुलस और रेमुस के मन में प्रतिशोध की ज्वाला भड़क उठी। वे अल्बा लॉन्गा लौटे, अमूलियस को परास्त और मार डाला, और अपने दादा नुमिटर को सिंहासन वापस दिला दिया।

लेकिन रोमुलस और रेमुस के मन में एक नया शहर स्थापित करने का सपना था। उन्होंने टाइबर नदी के तट पर, जहाँ भेड़िया ने उन्हें पाला था, उस स्थान को चुना। लेकिन यह तय करने में कि शहर किस पहाड़ी पर बने और इसका नेतृत्व कौन करे, दोनों भाइयों के बीच विवाद हो गया। रोमुलस ने पालाटाइन पहाड़ी को चुना, जबकि रेमुस अवेंटाइन पहाड़ी चाहता था।

इस विवाद का समाधान करने के लिए उन्होंने देवताओं के संकेत खोजने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने अगुरी प्रथा का पालन किया। प्राचीन रोम में, “अगुरी” (augury) नामक एक धार्मिक प्रथा थी, जिसमें पक्षियों के उड़ान, व्यवहार या संख्या के आधार पर देवताओं की इच्छा या भविष्यवाणी का आकलन किया जाता था। इन संकेतों की व्याख्या अगुर (augurs) नामक धार्मिक विशेषज्ञ करते थे। अगुरी प्रथा के अनुसार, रेमुस ने पहले छह गिद्ध देखे, लेकिन रोमुलस ने बारह गिद्ध देखकर स्वयं को विजेता घोषित किया।

रोमुलस ने पालाटाइन पहाड़ी पर शहर का निर्माण शुरू किया और एक प्राचीर बनवाने लगा। रेमुस, निराश और क्रोधित होकर, रोमुलस की प्राचीर को अवहेलना में लांघ गया। इससे रोमुलस इतना क्रुद्ध हुआ कि उसने रेमुस की हत्या कर दी। लेकिन बाद में दुख में डूबकर, रोमुलस ने अपने नाम पर शहर का नाम “रोम” रखा और इसका पहला राजा बना। लेकिन अपने भाई को क्रोध में मार देने के कारण रोमुलस ने जीवनभर मानसिक यंत्रणा भोगी। कहा जाता है कि लगभग 753 ईसा पूर्व में “रोम” नगर की स्थापना हुई थी।

रोम को शक्तिशाली बनाने के लिए रोमुलस ने एक आश्रय स्थल (Asylum) की घोषणा की, जहाँ भगोड़े, दुखी, गरीब और अपराधी आकर नया जीवन शुरू कर सकते थे। इससे रोम की जनसंख्या बढ़ी। लेकिन उस समय रोम में महिलाओं की कमी थी। इसका समाधान करने के लिए रोमुलस ने पड़ोसी सैबाइन जनजाति की महिलाओं का अपहरण करने का आदेश दिया। इससे सैबाइनों के साथ युद्ध हुआ, लेकिन बाद में रोमियों और सैबाइनों के बीच संधि हो गई। रोमुलस रोम का पहला राजा बना और एक सेना, सीनेट (Senate) और धार्मिक व्यवस्था की स्थापना की। उसने रोम समाज को “पैट्रिशियन” (उच्च वर्ग) और “प्लेबियन” (सामान्य जनता) में विभाजित किया। रोमुलस ने विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और मंदिरों की स्थापना कर रोम को एक धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित किया।

रोमुलस ने लगभग 37 वर्षों तक शासन किया। एक दिन, एक रहस्यमय घटना में, एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान के दौरान, कैम्पस मार्सियस नामक स्थान पर वह लुप्त हो गया। कहा जाता है कि मार्स देवता उसे स्वर्ग ले गए, और वह “क्विरिनस” नामक देवता के रूप में पूजा जाने लगा।

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रोमुलस और रेमुस की यह कहानी मुख्य रूप से लिवी के रोमन इतिहास ग्रंथ “एब उर्बे कोंडिता” (Ab Urbe Condita, अर्थात “नगरी की स्थापना से”) में उल्लिखित है। यह रोम के पौराणिक संस्थापक रोमुलस और उनके भाई रेमुस की कहानी का वर्णन करती है। यह कहानी अन्य रोमन लेखकों, जैसे प्लूटार्क के “लाइव्स ऑफ रोमुलस” और ओविड के “फास्टी” में भी आंशिक रूप से उल्लिखित है।

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श्रीकृष्ण-बलराम के साथ समानता और अंतर~

रोम की स्थापना की यह कहानी श्रीकृष्ण और बलराम की कथा के साथ कुछ समानताएँ और कई अंतर रखती है। इटली के अल्बा लॉन्गा में नुमिटर शासन करते थे, जिन्हें उनके भाई अमूलियस ने गद्दी से हटा दिया था। ठीक उसी तरह, मथुरा के शासक उग्रसेन को उनके पुत्र कंस ने गद्दी से हटाया था। नुमिटर की पुत्री रिया सिल्विया के बच्चों को उनके दादा अमूलियस ने अल्बा लॉन्गा के पास बहने वाली टाइबर नदी में बहाने का आदेश दिया था। श्रीकृष्ण की जीवन गाथा में वह नदी यमुना थी, जिसे वसुदेव ने पार कर श्रीकृष्ण को नंदपुर ले जाकर छोड़ा था।

रिया सिल्विया के पुत्र रोमुलस और रेमुस युवावस्था तक फाउस्तुलस और उनकी पत्नी लारेन्सिया द्वारा चरवाहों के रूप में पाले गए। ठीक उसी तरह, श्रीकृष्ण को नंदराज और यशोदा ने गौड़ घर में कई वर्षों तक पाला था। अपनी वास्तविक पहचान जानने के बाद रोमुलस और रेमुस टाइबर नदी के पास अल्बा लॉन्गा लौटे और अमूलियस को परास्त व मारकर अपने दादा नुमिटर को सिंहासन सौंप दिया। श्रीकृष्ण और बलराम ने भी मथुरा जाकर कंस का गर्व तोड़ा, जिसके भय से कंस की मृत्यु हुई। बाद में श्रीकृष्ण ने अपने दादा उग्रसेन को मथुरा का सिंहासन सौंप दिया।

रोमुलस और रेमुस ने टाइबर नदी के तट पर एक नया नगर स्थापित करने की कोशिश की, ठीक उसी तरह श्रीकृष्ण और बलराम के प्रयास से समुद्र के बीच द्वारका नगरी स्थापित हुई। कुछ संस्करणों में रिया सिल्विया को उनके पुत्रों के जन्म के कारण अमूलियस द्वारा कारागार में बंद करने या मृत्युदंड देने की बात कही गई है। उसी तरह, श्रीकृष्ण और बलराम की गाथा में देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद किया गया था।

इसके अतिरिक्त, श्रीकृष्ण और बलराम की गाथा और रोमुलस और रेमुस की गाथा में कई अंतर भी हैं, जो कहानी में पहले वर्णित किए जा चुके हैं।

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स्थान संबंधी जानकारी~

अल्बा लॉन्गा : इसका आधुनिक नाम अल्बानो लाज़ियाले है, और यह अल्बान हिल्स क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता है। यह इटली के रोम शहर से लगभग 20-30 किमी दक्षिण-पूर्व में स्थित है। यह एक प्राचीन शहर था, जिसके अवशेष अब भी अल्बान हिल्स में देखे जा सकते हैं।

टाइबर नदी: इटली के मध्य भाग से बहने वाली एक प्रमुख नदी, जो रोम शहर से होकर गुजरती है।

पालाटाइन पहाड़ी : रोम की सात पहाड़ियों में से एक, जो आधुनिक रोम के केंद्रीय क्षेत्र में स्थित है। यह प्राचीन रोमन महलों और मंदिरों के अवशेषों के लिए प्रसिद्ध है।

अवेंटाइन पहाड़ी: रोम की सात पहाड़ियों में से एक, जो टाइबर नदी के निकट स्थित है। यह वर्तमान में एक शांत आवासीय क्षेत्र और ऐतिहासिक स्थल के रूप में जाना जाता है।

कैम्पस मार्सियस: इसका वर्तमान नाम कैंपो मार्ज़ियो है, जहाँ रोमुलस लुप्त हो गए थे। यह स्थान रोम में टाइबर नदी के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में स्थित है। प्राचीन काल में इसे सैन्य और धार्मिक कार्यों के लिए उपयोग किया जाता था; वर्तमान में यह रोम का एक लोकप्रिय ऐतिहासिक क्षेत्र है। 
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गुरुवार, 10 जुलाई 2025

ताड़पत्र चित्रकला: ओडिशा की एक पारंपरिक कला

ताड़पत्र चित्रकला, जिसे ताड़पत्र पट्टचित्र या तलपत्रचित्र के नाम से भी जाना जाता है, ओडिशा व भारत की एक प्राचीन और अनूठी कला शैली है। यह कला रूप सूखे ताड़ के पत्तों पर नक्काशी करके बनाई जाती है, जिसमें जटिल और बारीक डिजाइनों के माध्यम से हिंदू पौराणिक कथाओं और लोककथाओं के दृश्यों को चित्रित किया जाता है। यह कला न केवल ओडिशा की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है, बल्कि यह कारीगरों की निपुणता और धैर्य का भी प्रतीक है। इस निबंध में, हम ताड़पत्र चित्रकला की उत्पत्ति, निर्माण प्रक्रिया, विशेषताओं और इसके सांस्कृतिक महत्व पर चर्चा करेंगे।

(रविन्द्र बेहरा जी के द्वारा बनाया गया ताड़ पत्र पट्टचित्र)

ताड़पत्र चित्रकला की उत्पत्ति प्राचीन काल के ओडिशा में हुई थी, जब ताड़ के पत्तों का उपयोग लिखित पांडुलिपियों और चित्रों के लिए किया जाता था। ओडिशा में यह कला विशेष रूप से प्रसिद्ध हुई, जहां इसे धार्मिक और सांस्कृतिक कहानियों को संरक्षित करने के लिए उपयोग किया गया। प्राचीन समय में, ताड़ के पत्तों पर नक्काशी करके ग्रंथों, जैसे पुराण, रामायण, महाभारत और अन्य धार्मिक कथाओं को चित्रित किया जाता था। यह कला न केवल सौंदर्यपूर्ण थी, बल्कि यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान और परंपराओं को हस्तांतरित करने का माध्यम भी थी।

ताड़पत्र चित्रकला की निर्माण प्रक्रिया अत्यंत श्रमसाध्य और समय लेने वाली है। सबसे पहले, ताड़ के पत्तों को सावधानीपूर्वक एकत्र किया जाता है। इन पत्तों को सुखाया जाता है और उनकी सतह को चिकना करने के लिए विशेष उपचार किया जाता है, ताकि वे लंबे समय तक टिक सकें। इसके बाद, कारीगर एक तेज लोहे की सुई (स्टाइलस) का उपयोग करके पत्तों पर बारीक नक्काशी करते हैं। इस प्रक्रिया में अत्यंत सटीकता और धैर्य की आवश्यकता होती है, क्योंकि एक छोटी सी गलती पूरे डिजाइन को खराब कर सकती है। 

नक्काशी के बाद, पत्तों पर प्राकृतिक स्याही या कालिख लगाई जाती है, जो नक्काशी को उभारती है और डिजाइनों को और अधिक स्पष्ट बनाती है। कई बार, पत्तों को एक साथ सिलकर या चिपकाकर लंबी पट्टियों में बदला जाता है, जिससे विस्तृत कहानियों को चित्रित करने के लिए अधिक स्थान उपलब्ध हो। इस प्रक्रिया में कारीगरों की कुशलता और रचनात्मकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

ताड़पत्र चित्रकला की सबसे प्रमुख विशेषता इसकी जटिल और बारीक डिज़ाइन है। इसमें आमतौर पर हिंदू पौराणिक कथाओं के दृश्य, जैसे भगवान जगन्नाथ, श्रीकृष्ण, राम-सीता, गणेश, और अन्य देवी-देवताओं के चित्र शामिल होते हैं। इसके अलावा, इस कला में ओडिशा की लोककथाएँ और प्रकृति से प्रेरित चित्र भी बनाए जाते हैं। डिजाइनों में ज्यामितीय पैटर्न, पुष्प आकृतियाँ, और पशु-पक्षियों के चित्र भी शामिल होते हैं, जो इसे और अधिक आकर्षक बनाते हैं। 

इस कला की एक और खासियत यह है कि यह पूरी तरह से हस्तनिर्मित होती है, और प्रत्येक चित्र में कारीगर की व्यक्तिगत छाप देखी जा सकती है। ताड़पत्र चित्रकला की रंग योजना आमतौर पर सीमित होती है, क्योंकि यह मुख्य रूप से काले और भूरे रंग की स्याही पर निर्भर करती है, लेकिन इसकी बारीकी और विवरण इसे जीवंत बनाते हैं। 

ताड़पत्र चित्रकला केवल एक कला रूप नहीं है, बल्कि यह ओडिशा की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह कला भगवान जगन्नाथ की पूजा और ओडिशा के मंदिरों से गहराई से जुड़ी हुई है। इसके अलावा, यह कला ग्रामीण समुदायों के लिए आजीविका का स्रोत भी रही है। कई कारीगर परिवार पीढ़ियों से इस कला को संरक्षित और प्रचारित कर रहे हैं। 

आधुनिक समय में, ताड़पत्र चित्रकला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है। इसे सजावटी वस्तुओं, जैसे दीवार सज्जा, किताबों के कवर, और उपहार सामग्री के रूप में उपयोग किया जाता है। यह कला पर्यटकों और कला प्रेमियों के बीच भी बहुत लोकप्रिय है। हालांकि, आधुनिक तकनीकों और डिजिटल कला के बढ़ते प्रभाव के कारण, इस पारंपरिक कला को जीवित रखने के लिए विशेष प्रयासों की आवश्यकता है।

ताड़पत्र चित्रकला ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक अनमोल रत्न है। इसकी जटिल नक्काशी, प्राकृतिक सामग्री का उपयोग, और धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व इसे एक अनूठी कला शैली बनाते हैं। यह कला न केवल कारीगरों की रचनात्मकता और कौशल को दर्शाती है, बल्कि यह भारतीय परंपराओं और कहानियों को जीवित रखने का एक शक्तिशाली माध्यम भी है। इस कला को संरक्षित करने और इसे नई पीढ़ियों तक पहुँचाने के लिए सरकार, कला संगठनों और समाज के सहयोग से निरंतर प्रयास किए जाने चाहिए। ताड़पत्र चित्रकला न केवल ओडिशा की, बल्कि पूरे भारत की सांस्कृतिक धरोहर का गौरव है। 

रविवार, 29 जून 2025

दो सहस्र वर्षों से अधिक समय तक यहूदियों पर हुए अत्याचारों का इतिहास

बाइबल के ओल्ड टेस्टामेंट और कुरान के अनुसार, जिस क्षेत्र में आज आधुनिक इज़राइल स्थित है, वह पहले कनान (Canaan) के नाम से जाना जाता था। बाइबल में इस क्षेत्र को "दूध और शहद की धरती" के रूप में वर्णित किया गया है: "I have come down to deliver them out of the hand of the Egyptians, and to bring them up from that land to a good and large land, to a land flowing with milk and honey" (Exodus 3:8)।

कुरान में भी इसे "पवित्र भूमि" के रूप में उल्लेखित किया गया है: "O my people, enter the Holy Land which Allah has assigned to you" (Surah Al-Ma’idah 5:21)।

समय के साथ पर्यावरणीय परिवर्तन, युद्ध और अन्य कारणों से इस क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा मरुस्थल में बदल गया। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, "फिलिस्तीन" नाम दूसरी शताब्दी ईस्वी में रोमन साम्राज्य द्वारा "सीरिया पालेस्तिना" नामकरण के बाद प्रचलित हुआ, जो फिलिस्तीन (Philistines) जाति से संबंधित था। अब्राहम और याकूब के समय (2000-1200 ईसा पूर्व) यह क्षेत्र "कनान" के नाम से जाना जाता था।

यहूदी और मुस्लिम दोनों धर्मों के लोग स्वयं को भाई मानते हैं, क्योंकि दोनों का मूल पूर्वज अब्राहम (इब्राहिम) था। अब्राहम का समयकाल 2000-1800 ईसा पूर्व के बीच अनुमानित है। बाइबल में उन्हें "कई राष्ट्रों का पिता" घोषित किया गया है: "I have made you a father of many nations" (Genesis 17:5)। कुरान में उन्हें "एकमात्र ईश्वर का अनुयायी" और "राष्ट्र का नेता" के रूप में वर्णित किया गया है (Surah Al-Baqarah 2:124)। अब्राहम के दो पुत्रों, इसहाक (यहूदियों के पूर्वज) और इस्माइल (अरबों के पूर्वज) के माध्यम से यहूदी और मुस्लिमों के बीच आध्यात्मिक संबंध स्थापित हुआ। अब्राहम के नाम पर यहूदी जाति का एक नाम "हिब्रू" (Hebrew) पड़ा।

अब्राहम के पौत्र याकूब, जिन्हें "इज़राइल" नाम दिया गया था, कनान की 12 जनजातियों (रूबेन, सिमोन, लेवी, यहूदा, दान, नफ्ताली, गाद, आशेर, इस्साकार, ज़बुलुन, मनश्शे, एफ्रायम, बिन्यामिन) को एकजुट करने में सफल रहे। ये जनजातियाँ सामूहिक रूप से "बनी इस्राइल" (Children of Israel) के नाम से जानी गईं। याकूब कहते हैं: "Gather together, that I may tell you what shall befall you in the last days" (Genesis 49:1)। इन जनजातियों में से यहूदा (Judah) जनजाति ने बाद में यहूदियों का नेतृत्व किया। "यहूदा" शब्द से "Jewish" और "यहूदी" शब्द की उत्पत्ति हुई, जो भाषाई परिवर्तन का परिणाम है।

1800 ईसा पूर्व के आसपास, सुमेर के उर नगर और उत्तरी अरब में रहने वाले यहूदियों को अब्राहम ने सबसे पहले कनान क्षेत्र का मार्ग दिखाया। लेकिन बाद में, कुछ यहूदी याकूब के नेतृत्व में मिस्र चले गए और वहाँ 400 वर्षों तक गुलामी का दुख भोगा। 400 वर्ष बाद, अर्थात् 1300 ईसा पूर्व या 1200 ईसा पूर्व के समय में, मूसा (Moses) नामक एक यहूदी नेता ने उन्हें मुक्त करके कनान (इज़राइल) ले गए।

मूसा (Moses) द्वारा प्रतिपादित दस आज्ञाएँ (Ten Commandments) यहूदी धर्म का आधार बनीं: "You shall have no other gods before Me" (Exodus 20:3)। मूसा के नेतृत्व में यहूदी कनान में स्थायी हुए, जो बाद में "इज़राइल" के नाम से जाना गया।

राजा सोलोमन के समय (10वीं शताब्दी ईसा पूर्व) में इज़राइल एक समृद्ध और वैभवशाली देश बन गया। सोलोमन की बुद्धिमत्ता और समृद्धि बाइबल में वर्णित है: "And God gave Solomon wisdom and exceedingly great understanding" (1 Kings 4:29)। सोलोमन के शासनकाल में जेरूसलम में पहला मंदिर बनाया गया, जो यहूदियों का धार्मिक केंद्र बना। लेकिन सोलोमन की मृत्यु (930 ईसा पूर्व) के बाद, जातीय कलह के कारण इज़राइल दो राज्यों में विभाजित हो गया: उत्तरी इज़राइल (10 जनजातियाँ) और दक्षिणी यहूदा (Judah)।

इसका लाभ उठाकर विदेशी शत्रुओं ने इज़राइल पर आक्रमण शुरू किया। 722 ईसा पूर्व में असीरियाई साम्राज्य ने उत्तरी इज़राइल को जीत लिया और 10 जनजातियों को निर्वासित कर दिया, जिन्हें "Lost Tribes of Israel" कहा जाता है। कनान देश की कुल बारह मानव गोतियों में से रूबेन, शिमोन, दान, नफ्ताली, गाद, आशेर, इस्साखार, ज़बुलुन, मनश्शे और एफ्रायम आदि दस गोतियों के लोग शायद असीरियाई साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में निर्वासित होकर स्थानीय लोगों के साथ मिल गए या फिर इराक, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत और जापान जैसे क्षेत्रों में जाकर बस गए। हालांकि, इज़राइल की इन दस गोतियों का इतिहास स्पष्ट नहीं है।

कुछ सौ वर्ष बाद, 578 ईसा पूर्व में बाबिलोनी साम्राज्य ने दक्षिणी यहूदा को जीत लिया और जेरूसलम में स्थित पहले मंदिर को ध्वंस कर दिया। यह बाबिलोनी निर्वासन यहूदियों के लिए एक भयंकर विपदा थी। बाबिलोनी निर्वासन के दौरान यहूदी दुख में टूट गए और बाबिलोन की नदियों के किनारे बैठकर अपनी खोई हुई मातृभूमि सिय्योन (जेरूसलम) के लिए विलाप करते थे।

150 अध्यायों वाले भजन संहिता (Psalm) के 137वें अध्याय के पहले पद में यह बात बहुत मार्मिक ढंग से वर्णित है: "By the rivers of Babylon, there we sat down, yea, we wept when we remembered Zion" (Psalm 137:1)।

कुछ वर्ष बाद, 539 ईसा पूर्व में फारसी राजा साइरस ने बाबिलोन को जीत लिया और यहूदियों को जेरूसलम लौटने की अनुमति दी। इसके बाद दूसरा मंदिर (516 ईसा पूर्व) बनाया गया। राजा हेरोद (37-4 ईसा पूर्व) ने इस मंदिर को और भव्य बनाया। लेकिन यहूदियों के दुख के दिन समाप्त नहीं हुए। कुछ वर्षों की सुख-शांति के बाद फिर से भयानक अत्याचारों ने यहूदी जाति को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त किया।

70 ईस्वी में ईसाई धर्म से दीक्षित रोमन लोगों ने जेरूसलम पर आक्रमण किया और यहूदियों के दूसरे मंदिर को ध्वंस कर दिया। हजारों यहूदी पुरुष, महिलाएँ और बच्चे मारे गए। यहूदी इतिहासकार फ्लावियस जोसेफस की रचना The Jewish War के अनुसार, उस समय 50,000 से 100,000 यहूदी मारे गए। प्रतिदिन 500 तक यहूदी बंदियों को सूली पर चढ़ाया गया और कईयों की नृशंस हत्या की गई। लगभग 97,000 यहूदियों को दास बनाया गया और रोमन साम्राज्य के विभिन्न स्थानों पर बेचा गया। रोमन ईसाइयों ने जेरूसलम को घेरकर भोजन और जल की आपूर्ति बंद कर दी, जिसके परिणामस्वरूप कई यहूदी भुखमरी से मर गए। जेरूसलम को लूट लिया गया और शहर का अधिकांश हिस्सा जला दिया गया। फलस्वरूप, कई यहूदी उत्तरी अफ्रीका, फारस, दक्षिणी यूरोप, चीन, भारत, जापान और अन्य क्षेत्रों में भाग गए।

रोमनों द्वारा दूसरे मंदिर के ध्वंस के बाद, योहानन बेन ज़क्काई के नेतृत्व में रब्बाइनिक यहूदी धर्म का विकास हुआ। सिनागॉग और तोराह नए धार्मिक केंद्र बन गए। जेरूसलम घेरे के दौरान यहूदी समूहों (जैसे ज़ीलोट्स) के बीच आंतरिक विभेद ने जेरूसलम के पतन को और तेज किया। फिर भी, ईश्वर में विश्वास रखने वाले यहूदियों ने इस दुर्दशा को ईश्वरीय दंड मानकर प्रायश्चित किया और जेरूसलम लौटने की आशा में अन्य देशों में भाग गए। निर्वासन के दुख को सहते हुए भी यहूदियों ने अपनी धार्मिक परंपराओं को जीवित रखा । 

यूरोप में ईसाई धर्म के उदय के साथ यहूदी-विरोधी भावना (Anti-Semitism) बढ़ी। यहूदियों को "यीशु के हत्यारे" के रूप में आरोपित किया गया। रोमन सम्राट कॉन्स्टैंटाइन (चौथी शताब्दी) ने ईसाई धर्म को राजधर्म घोषित करके यहूदियों को "राक्षस" और उनके सिनागॉग्स को "वेश्यालय" घोषित किया। कॉन्स्टैंटाइन के कानूनों ने कई यहूदियों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया। यहूदी धर्मावलंबियों को सिनागॉग में पूजा करने पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए। यहूदियों को रोमन प्रशासनिक पदों या उच्च सैन्य पदों पर नियुक्ति नहीं दी जाती थी। छोटे-मोटे अपराधों के लिए, और कभी-कभी बिना अपराध के भी, यहूदियों को पकड़कर दंडित किया जाता था। निकिया सभा (325 ईस्वी) के माध्यम से ईसाई त्योहारों (जैसे ईस्टर) को यहूदी त्योहारों (जैसे पासोवर) से संबंध विच्छेद करने का निर्णय लिया गया, जिसने यहूदियों को ईसाइयों से और अधिक अलग कर दिया। कॉन्स्टैंटाइन ने जेरूसलम को ईसाई तीर्थस्थल के रूप में पुनर्निर्माण किया (उदाहरण: चर्च ऑफ द होली सेपुल्कर)। यहूदियों को जेरूसलम में रहने या मंदिर पुनर्निर्माण करने पर सख्त प्रतिबंध लगाया गया। कॉन्स्टैंटाइन की ईसाई-केंद्रित नीतियों ने यहूदियों को ईसाइयों से सामाजिक रूप से अलग कर दिया। उनके शासनकाल में यहूदी-विरोधी भावना को प्रोत्साहन मिला, जो बाद की शताब्दियों में और तीव्र हुई।

पांचवीं से बारहवीं शताब्दी (401–1200 ईस्वी) के बीच यहूदियों को रोमन साम्राज्य, बाइजेंटाइन साम्राज्य, यूरोपीय राष्ट्रों और मुस्लिम शासित क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के अत्याचारों और भेदभाव का सामना करना पड़ा। यह समय मध्यकालीन यूरोप में ईसाई और मुस्लिम प्रभुत्व का दौर था।

सम्राट जस्टिनियन (527–565 ईस्वी) ने अपने जस्टिनियन कोड के माध्यम से यहूदियों को सरकारी पदों से वंचित किया और सिनागॉग निर्माण तथा धार्मिक अनुष्ठानों पर सख्त नियंत्रण लगाया। कुछ क्षेत्रों में यहूदियों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया गया। सम्राट हेराक्लियस (610–641) के समय में ये कानून और सख्ती से लागू किए गए।

छठी और सातवीं शताब्दी में स्पेन में विसिगोथिक राजाओं जैसे रिकारेड प्रथम और सिसेबट ने यहूदियों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए बाध्य किया। अवज्ञा करने वालों को निर्वासन, संपत्ति जब्ती या मृत्युदंड दिया गया।

11वीं शताब्दी में, प्रथम क्रूसेड के दौरान, यूरोप, विशेष रूप से जर्मनी के राइनलैंड क्षेत्र में यहूदियों का व्यापक नरसंहार हुआ। ईसाई क्रूसेडरों ने यहूदियों को "यीशु के शत्रु" घोषित करके माइंज, वर्म्स, स्पेयर जैसे शहरों में हजारों की संख्या में हत्या की। फ्रांस, जर्मनी और इंग्लैंड में यहूदियों को विशिष्ट पेशों (जैसे सूदखोरी) तक सीमित रखा गया और अन्य पेशों से वंचित किया गया। ईसाइयों में यहूदियों के प्रति इतनी घृणा थी कि उन्हें अपने घरों या गाँवों के पास रहने की अनुमति नहीं दी जाती थी। यहूदियों को "घेटो" (पृथक आवास) में रहने के लिए मजबूर किया जाता था। यहूदियों को बदनाम करने के लिए मध्यकालीन यूरोप में "Wandering Jew" जैसी मिथ्या किंवदंतियाँ गढ़ी गईं, जिसने यहूदी-विरोधी हिंसा को और बढ़ाया।

इसी तरह, "ब्लड लिबेल" (Blood Libel) का आरोप भी मध्यकालीन यूरोप में यहूदी समुदाय के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न का एक प्रमुख कारण था। इस मिथ्या आरोप में कहा जाता था कि यहूदी ईसाई बच्चों की हत्या करके उनके रक्त को धार्मिक अनुष्ठानों के लिए उपयोग करते थे। इससे ईसाई समाज में यहूदियों के प्रति भय, घृणा और संदेह पैदा हुआ, जो 20वीं शताब्दी तक यहूदी-विरोधी भावना (antisemitism) को बढ़ाता रहा। इस आरोप के कारण यहूदी सामूहिक हिंसा, नरसंहार (पोग्रोम्स), सामाजिक-आर्थिक अलगाव और निर्वासन का शिकार हुए।

1144 में इंग्लैंड के नॉर्विच में एक ईसाई बालक विलियम की हत्या के लिए यहूदियों को जिम्मेदार ठहराया गया। यह यूरोप में पहला "ब्लड लिबेल" आरोप के रूप में चिह्नित हुआ। इस घटना से स्थानीय यहूदी समुदाय पर हिंसा और उत्पीड़न बढ़ा। 1255 में इंग्लैंड के लिंकन में एक ईसाई बालक ह्यू की मृत्यु के लिए यहूदियों को "ब्लड लिबेल" के तहत दोषी ठहराया गया। इस घटना में कई यहूदियों को गिरफ्तार कर मृत्युदंड दिया गया। इससे इंग्लैंड में यहूदी-विरोधी भावना और बढ़ी, जिसने 1290 में यहूदियों के देश से निष्कासन में एक भूमिका निभाई। 1298 में जर्मनी के ब्लूस (Bloos) शहर में एक ईसाई बच्चे की मृत्यु के लिए यहूदियों को जिम्मेदार ठहराया गया। इस "ब्लड लिबेल" के कारण स्थानीय यहूदी समुदाय पर हमला हुआ, जिसमें कई यहूदी मारे गए और उनकी संपत्ति नष्ट की गई। इसने जर्मनी के अन्य क्षेत्रों में भी यहूदी-विरोधी हिंसा को बढ़ावा दिया। 1475 में इटली के ट्रेंट क्षेत्र में एक ईसाई बच्चे साइमन की हत्या के लिए भी यहूदियों पर आरोप लगाया गया। इस मिथ्या आरोप में यहूदी नेताओं और समुदाय के सदस्यों को गिरफ्तार कर यातना दी गई और कुछ को मृत्युदंड दिया गया। इससे इटली और जर्मनी में यहूदी-विरोधी हिंसा और बढ़ी। "ब्लड लिबेल" ने जनता में यहूदियों के प्रति रोष को बढ़ाया, जिसके परिणामस्वरूप सामूहिक हमले, लूटपाट और हत्याएँ हुईं। यहूदियों को इंग्लैंड (1290), फ्रांस (1306) और स्पेन (1492) जैसे देशों से निष्कासित किया गया।

14वीं शताब्दी में, मुख्य रूप से 1346-1353 के बीच, यूरोप, एशिया और अफ्रीका में प्लेग फैला। यह इतिहास की सबसे घातक महामारियों में से एक थी।

नवीं शताब्दी में यूरोपीय घरों में बिल्लियों को पालना शुरू हुआ। दसवीं शताब्दी तक यूरोपीय धनिकों ने बड़े घरों में बिल्लियों को चूहे मारने के लिए रखा। लेकिन 11वीं से 12वीं शताब्दी के बीच यूरोपीय ईसाई समाज में बिल्लियों को शैतान का दूत, जादूगरनी का सहायक या जादूगरनी का छद्म रूप मानकर घृणा की नजर से देखा गया। फलस्वरूप, हजारों बिल्लियों को मार डाला गया। इधर, सिल्क रोड के माध्यम से यूरोप में प्लेग रोग आया। यह मंगोल व्यापारियों और सैनिकों द्वारा फैला, और प्लेग के संचरण में मुख्य खलनायक चूहे थे। चूँकि यूरोपियों ने अंधविश्वास के कारण हजारों बिल्लियों को मार डाला था, इसलिए चूहों की संख्या अनियंत्रित रूप से बढ़ी, जिसके साथ पूरे यूरोप में प्लेग रोग भी फैल गया। इस प्लेग ने इतना भयानक रूप लिया कि इसे "ब्लैक डेथ" नाम दिया गया। प्लेग के कारण तत्कालीन यूरोपीय जनसंख्या का 30% से 60% (लगभग 25 मिलियन से 50 मिलियन) लोग मारे गए।

चूँकि दोषारोपण के लिए बिल्लियाँ नहीं थीं, इसलिए ईसाइयों ने प्लेग के लिए जादूगरों, तांत्रिकों, जादूगरनी विद्या जानने वाली महिलाओं और यहूदियों को जिम्मेदार ठहराया। कई महिलाओं को जादूगरनी के संदेह में मार डाला गया। ईसाइयों ने यहूदियों को प्लेग के लिए जिम्मेदार माना क्योंकि यहूदियों में प्लेग से मृत्युदर सामान्य यूरोपीय जनसंख्या की तुलना में लगभग 20% कम थी। यहूदियों की स्वच्छता प्रथाएँ (जैसे- हाथ धोना, स्वच्छ भोजन, शुद्ध आवास और मृतकों का उचित अंतिम संस्कार) के कारण मृत्युदर कम थी, लेकिन तत्कालीन यूरोपीय ईसाई इसे समझ नहीं पाए। फलस्वरूप, यूरोपीय ईसाइयों ने यहूदियों पर "कुओं में जहर डालने" का अन्यायपूर्ण आरोप लगाया। बारबरा टकमैन के शब्दों में - "The Jews were accused of poisoning wells, spreading the plague, and other heinous crimes" (Barbara Tuchman, A Distant Mirror)।

प्लेग के वाहक और कारण के रूप में यहूदियों को मानकर यूरोपीय ईसाइयों ने हजारों यहूदियों की हत्या की और उनकी संपत्ति लूट ली। टूलोन (1348) में 40 यहूदियों को उनके घरों में क्रूरता से मार डाला गया। स्ट्रासबर्ग (1349) में, जहाँ प्लेग नहीं फैला था, फिर भी हिंसा, घृणा और भय के कारण 2,000 यहूदियों को "वैलेंटाइन डे" नरसंहार में जला दिया गया। माइंज (1349) में 3,000 यहूदी समुदाय नष्ट हो गए। यहूदियों ने पहले आत्मरक्षा की, लेकिन ईसाई हमलावरों ने उन्हें परास्त कर सभी को मार डाला। स्पेयर में यहूदियों के शवों को शराब के पीपों में भरकर राइन नदी में फेंक दिया गया। कोलोन और फ्रैंकफर्ट में एक भी यहूदी नरसंहार से नहीं बच सका। काइबर्ग कास्टेल (1349) में 330 यहूदियों को जिंदा जला दिया गया। 1348-1351 के बीच लगभग 350 बड़े और छोटे नरसंहार हुए, जिनमें 510 यहूदी समुदाय नष्ट हो गए। माइंज में 6,000 और फ्रैंकफर्ट में 19,000 से अधिक यहूदी नष्ट होने का रिकॉर्ड मिलता है। कई स्थानों पर हजारों यहूदियों को मार डाला गया या निर्वासित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप फ्रांस, जर्मनी और इंग्लैंड में यहूदी समुदाय लगभग विलुप्त हो गए। इन अत्याचारों के कारण कई यहूदी पश्चिमी यूरोप से पोलैंड और लिथुआनिया भाग गए, जहाँ पोलैंड के राजा "कासिमिर तृतीय" ने उन्हें आश्रय दिया।

हालांकि, यहूदी जहाँ भी निर्वासन में गए, वहाँ अत्याचारों का शिकार हुए। उदाहरण के लिए, उत्तरी अफ्रीका के मोरक्को में रहने वाले यहूदियों पर 1465 में मुसलमानों ने हमला किया और कई लोगों को मार डाला।

1492 में, स्पैनिश इंक्विजिशन (Spanish Inquisition) के दौरान, राजा फर्डिनांड और रानी इसाबेला के आदेश पर यहूदियों को स्पेन से निर्वासित किया गया। जिन्होंने ईसाई धर्म नहीं अपनाया, उन्हें देश छोड़ने के लिए मजबूर किया गया, अन्यथा यातना या मृत्युदंड दिया जाता था। इस निर्वासन के कारण लाखों यहूदी तुर्की, उत्तरी अफ्रीका और अन्य स्थानों पर भाग गए। 1497 में, पुर्तगाल में भी यहूदियों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया गया, नहीं तो उन्हें निर्वासन या मृत्युदंड दिया जाता था।

यूक्रेन और पोलैंड क्षेत्र में खमेलनित्स्की विद्रोह (1648–1657) के दौरान यहूदी समुदाय पर भयानक अत्याचार हुए। हजारों यहूदियों की हत्या की गई और कई को निर्वासित किया गया।

सत्रहवीं शताब्दी में रूस में यहूदियों को रहने पर प्रतिबंध लगाया गया और उन्हें कई पोग्रोम्स (संगठित हिंसा) का शिकार होना पड़ा।

अठारहवीं शताब्दी में "पेल ऑफ सेटलमेंट" नीति के तहत यहूदियों को रूस के विशिष्ट क्षेत्रों (मुख्यतः पश्चिमी रूस, यूक्रेन और पोलैंड) में रहने के लिए मजबूर किया गया। इन क्षेत्रों में वे आर्थिक और सामाजिक असमानता का शिकार हुए। अठारहवीं शताब्दी के जर्मनी में भी यहूदी अत्याचारों का शिकार हुए। उन्हें सीमित अधिकार दिए जाते थे और विशिष्ट पेशों एवं क्षेत्रों में रहने के लिए बाध्य किया जाता था।

उन्नीसवीं शताब्दी में रूस में पोग्रोम्स और अधिक तीव्र हुए, विशेष रूप से 1881–1884 और 1903–1906 के बीच यहूदियों पर अत्याचार हुए। हजारों यहूदियों की हत्या की गई और कई लोग पश्चिमी यूरोप और अमेरिका की ओर पलायन कर गए।

उन्नीसवीं शताब्दी के फ्रांस में ड्रेफस प्रकरण (1894) में यहूदी सैन्य अधिकारी अल्फ्रेड ड्रेफस को झूठे राजद्रोह के आरोप में दंडित किया गया, जो फ्रांस में यहूदी-विरोधी भावना को दर्शाता था। जर्मनी और ऑस्ट्रिया में उन्नीसवीं शताब्दी में यहूदी-विरोधी भावना बढ़ी, जो अगली शताब्दी में होलोकॉस्ट का मूल कारण बनी।

बीसवीं शताब्दी में होलोकॉस्ट (1933-1945) यहूदी इतिहास का सबसे भयावह अध्याय था। 1933 से 1945 तक नाज़ी जर्मनी और उसके सहयोगियों द्वारा होलोकॉस्ट आयोजित किया गया, जो इतिहास में यहूदियों पर हुआ सबसे भयानक संगठित अत्याचार था। यह नाज़ी नेता एडॉल्फ हिटलर की "फ़ाइनल सॉल्यूशन" नीति का हिस्सा था, जिसका मुख्य लक्ष्य यूरोप से यहूदी जाति को पूरी तरह नष्ट करना था। पहले चरण में यहूदियों को जर्मनी, पोलैंड और अन्य नाज़ी-अधिकृत क्षेत्रों में घेटो व्यवस्था में अत्यंत अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों में रखा गया। इन घेटो में अत्यंत खराब जीवनयापन की स्थिति, कुपोषण और बीमारियाँ आम थीं। यहूदियों को उनके घरों से जबरन बेदखल कर कंसंट्रेशन कैंप्स और डेथ कैंप्स में भेजा गया। यह निर्वासन अधिकांश समय अमानवीय परिवहन साधनों (जैसे पशु वैगनों) के माध्यम से हुआ, जिसके कारण कई लोग भोजन, पानी और ऑक्सीजन की कमी से मर गए।

यहूदियों को श्रम शिविरों (लेबर कैंप्स) में अमानवीय परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर किया गया। कुपोषण, अत्यधिक श्रम और यातनाओं के कारण कई लोग मरे। हजारों यहूदी महिलाएँ बलात्कार का शिकार हुईं। नाज़ियों ने ऑशविट्ज़-बिरकेनाउ, ट्रेबलिंका, सोबिबोर, बेल्ज़ेक, माजदानेक और चेल्मनो जैसे शिविरों में गैस चैंबर्स के माध्यम से लाखों यहूदियों की हत्या की। ज़ायक्लॉन-बी जैसे जहरीली गैस और कार्बन मोनोऑक्साइड का उपयोग कर ईसाई नाज़ियों ने यहूदियों को यातना देकर मारा।

आइन्सात्सग्रुपेन नामक एक विशेष नाज़ी दस्ते ने पूर्वी यूरोप (विशेष रूप से रूस, यूक्रेन और बेलारूस) में गाँवों और शहरों में घूम-घूमकर रोमा जाति, कम्युनिस्टों, मुसलमानों और विशेष रूप से यहूदियों को गोली मारकर हत्या की। इस दस्ते ने गैर-ईसाई महिलाओं का बलात्कार कर उनकी हत्या की। बाबी यार (1941) जैसे नरसंहार में केवल दो दिनों में 33,000 से अधिक यहूदियों को मार डाला गया।

जोसेफ मेंगले जैसे ईसाई नाज़ी डॉक्टरों ने यहूदी बंदियों पर अमानवीय चिकित्सा प्रयोग किए। ये डॉक्टर बिना एनेस्थीसिया के यहूदियों पर यातनापूर्ण प्रयोग करते थे, जिसमें रासायनिक और जैविक परीक्षण शामिल थे।

होलोकॉस्ट के दौरान लगभग 60 लाख (6 मिलियन) यहूदियों को मार डाला गया, जो उस समय यूरोप की यहूदी जनसंख्या का लगभग दो-तिहाई था। ये हत्याएँ विभिन्न देशों और शिविरों में हुईं। पोलैंड होलोकॉस्ट का सबसे बड़ा केंद्र था, जहाँ लगभग 30 लाख यहiatryी मारे गए। आइन्सात्सग्रुपेन दस्ते ने पूर्वी यूरोप में लगभग 10-15 लाख यहूदियों को गोली मारकर मारा। अन्य शिविरों और घेटो में भी कई यहूदी मारे गए। जर्मनी में लगभग 1,65,000 यहूदियों को निर्वासित किया गया, जिनमें से अधिकांश शिविरों में मारे गए। 1944 में, 4,37,000 से अधिक हंगेरियाई यहूदियों को ऑशविट्ज़ भेजा गया, जिनमें से अधिकांश की हत्या की गई। फ्रांस में लगभग 76,000 यहूदी निर्वासित होकर शिविरों में मारे गए। नीदरलैंड में लगभग 1,00,000 यहूदी मारे गए। रोमानिया में लगभग 2,70,000 यहूदी मारे गए। चेकोस्लोवाकिया में 80,000 यहूदी मारे गए। अन्य देशों जैसे इटली, बेल्जियम, ग्रीस आदि में भी हजारों यहूदी मारे गए।

होलोकॉस्ट के बारे में एली वीज़ल ने कहा: "The Holocaust was not only a Jewish tragedy but a human tragedy, a scar on the conscience of the world."

होलोकॉस्ट के बाद, सायनवाद (Zionism) के माध्यम से यहूदियों ने अपनी प्राचीन मातृभूमि में लौटने की कोशिश की। 1948 में आधुनिक इज़राइल राष्ट्र की स्थापना हुई। अपनी मूलभूमि में स्वतंत्र देश के गठन के बाद यहूदियों ने मृतप्राय हिब्रू भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाकर इसे पुनर्जनन दिया। केवल छह दशकों में, इज़राइल ने विज्ञान, कृषि और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की। किबुत्ज़ (सामूहिक कृषि समुदाय) और ड्रिप इरिगेशन जैसी नवीन प्रणालियों ने इज़राइल के मरुस्थल को हरा-भरा और सुंदर बनाया। एक समय इसकी कल्पना करते हुए इज़राइल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरियन ने कहा था: "A nation’s strength lies in its unity and pride in its heritage."

आज उनका सपना साकार हो चुका है। हालांकि विपत्तियों का काला बादल पूरी तरह से इज़राइल और यहूदियों से हटा नहीं है, फिर भी इज़राइल आज एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में पूरे मध्य पूर्व में सिर उठाकर खड़ा है। सभी यहूदी-विरोधी ताकतें सौ बार कोशिश करने के बावजूद इज़राइल को हरा नहीं सकीं। केवल छह दशकों में इज़राइल की प्रगति से अन्य मानवजातियों को बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है। विशेष रूप से, जातिवाद,क्षेत्रवाद और भिन्न भिन्न विचारधाराओं में बंटे हिन्दूओं को यह सीखना आवश्यक है कि यदि आज वह अपने लिए, अपने पहचान के लिए नहीं लड़ते तो यहूदियों की तरह अत्याचारित होगें ।‌ अगर हिन्दू आज एक नहीं होते तो यहुदियों कि भांति अपनी माटी और अपनी पहचान खोकर अनंत दुख और यातना सहनी पड़ेगी।

मंगलवार, 24 जून 2025

Convent शब्द का इतिहास क्या है ?

“Convent” शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के “conventus” से हुई है। यह “conventus” शब्द लैटिन क्रिया “conveniō” से निकला है, जिसका अर्थ है “एकत्र होना” या “सम्मेलन होना”। “Conveniō” क्रिया प्रोटो-इटैलिक “komgʷənjō” से आई है, जो दो तत्वों से मिलकर बनी है: “con-” (एक साथ) और “veniō” (आना)। इसका अर्थ लैटिन में एकत्र होना, सम्मेलन करना या मिलना था। बाद में यह शब्द पुरानी फ्रांसीसी भाषा में “covent” के रूप में परिवर्तित हुआ, जो मुख्य रूप से धार्मिक समुदाय के निवास स्थान, विशेषकर ननों के आश्रम को दर्शाता था। पुरानी फ्रांसीसी से यह शब्द मध्यकालीन अंग्रेजी में “covent” के रूप में प्रचलित हुआ और बाद में धार्मिक समुदाय, मठ, या एकत्रीकरण के अर्थ में प्रयोग होने लगा। आधुनिक अंग्रेजी में “convent” शब्द मुख्य रूप से धार्मिक समुदाय (विशेषकर ननों) और उनके निवास स्थान या भारत में शैक्षणिक संस्थानों के अर्थ में उपयोग होता है।

आजकल व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के एक लेख में दावा किया जा रहा है कि 100-150 वर्ष पहले इंग्लैंड में तलाक और विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता दी गई थी, और दूसरे पति द्वारा पहली शादी से हुए बच्चों को स्वीकार न करने के कारण चर्च द्वारा संचालित कॉन्वेंट अनाथ और परित्यक्त बच्चों की शिक्षा और पालन-पोषण करते थे। इन अनाथ बच्चों को गोद लेने के इच्छुक माता-पिता से मिलाने के लिए चर्च द्वारा कॉन्वेंट स्कूलों में मदर्स डे और फादर्स डे जैसे आयोजन शुरू किए गए थे, इत्यादि। लेकिन यह सब प्रचार और ऐतिहासिक तथ्यों की गलत व्याख्या है।

ब्रिटेन में Matrimonial Causes Act, 1857 को पारित किया गया था, लेकिन यह बहुत सख्त और सीमित था। उस समय ब्रिटिश समाज अत्यधिक रूढ़िवादी था, इसलिए तलाक बहुत दुर्लभ था। तलाक को सामाजिक कलंक के साथ जोड़ा जाता था। विधवा पुनर्विवाह सामाजिक रूप से स्वीकार्य था, लेकिन इससे अनाथ बच्चों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई। इस दावे का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है कि तलाक या पुनर्विवाह के कारण कॉन्वेंट अनाथ बच्चों का पालन-पोषण करते थे।

इंग्लैंड में कॉन्वेंट मुख्य रूप से धार्मिक समुदायों (ननों) के निवास स्थान थे। कुछ कॉन्वेंट शिक्षा और दान कार्य करते थे, लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य अनाथ बच्चों का पालन-पोषण नहीं था। अनाथ बच्चों के लिए वर्कहाउस या अनाथालय थे, जो चर्च, अन्य संस्थाओं या व्यक्तियों द्वारा संचालित होते थे।

यह समझना जरूरी है कि भारत में 19वीं शताब्दी में ईसाई मिशनरियों ने कॉन्वेंट स्कूल स्थापित किए। इन कॉन्वेंट स्कूलों की स्थापना का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजी भाषा की शिक्षा और ईसाई धर्म से संबंधित शिक्षा प्रदान करना था। भारत में ही धर्मांतरण के लिए अनाथ हिंदू बच्चों को चर्च द्वारा संचालित कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ाया जाता था। अंग्रेजों ने समझा कि शासन को मजबूत करने के लिए कुछ भारतीयों को अंग्रेजी शिक्षा देकर उनके माध्यम से अपने कार्यों को संपादित करना अधिक तर्कसंगत होगा। उन्होंने सोचा कि भारतीयों को अंग्रेजी शिक्षा देने से वे अपने धर्म और संस्कृति से दूर हो जाएंगे और ईसाई धर्म अपनाएंगे। उस समय कुछ भारतीय धर्मांतरित भी हुए। लेकिन अधिकांश भारतीयों को धर्मांतरित करने के लिए अंग्रेजों ने दस से अधिक कृत्रिम अकाल और कई महामारियां फैलाकर भारतीयों को आर्थिक रूप से गरीब किया। इस तरह भारत में चर्च द्वारा अनाथालयों का संचालन और कॉन्वेंट स्कूलों की स्थापना कर धर्मांतरण किया गया।

यह दावा कि मदर्स डे और फादर्स डे की उत्पत्ति चर्च द्वारा संचालित कॉन्वेंट स्कूलों में गोद लेने के इच्छुक माता-पिता को आकर्षित करने के लिए हुई, पूरी तरह झूठ है।

मदर्स डे की शुरुआत 1908 में अमेरिका में अन्ना जार्विस (Anna Jarvis) नामक एक महिला द्वारा हुई थी। अन्ना ने अपनी मां एन रीव्स जार्विस की स्मृति में इस दिन की शुरुआत की थी, जो एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं और अमेरिकी गृहयुद्ध के दौरान माताओं की सहायता के लिए “मदर्स डे वर्क क्लब” बनाया था। 1908 में अन्ना जार्विस ने अपनी मां की स्मृति में वेस्ट वर्जीनिया के ग्राफ्टन में एक स्मारक समारोह आयोजित किया, जिसे आधुनिक मदर्स डे की शुरुआत माना जाता है। अन्ना के प्रयासों से 1914 में अमेरिकी राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने मदर्स डे को राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया, जो मई के दूसरे रविवार को मनाया जाता है। अन्ना चाहती थीं कि यह दिन भावनात्मक और हार्दिक उत्सव हो, जिसमें बच्चे अपनी मां के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर सकें। हालांकि, बाद में मदर्स डे का व्यावसायीकरण होने से अन्ना इससे असंतुष्ट हो गईं और इसके मूल उद्देश्य को बचाने के लिए संघर्ष किया।

फादर्स डे की शुरुआत 1910 में अमेरिका में सोनोरा स्मार्ट डोड (Sonora Smart Dodd) नामक एक महिला द्वारा प्रस्तावित हुई थी। सोनोरा के पिता विलियम जैक्सन स्मार्ट एक गृहयुद्ध के अनुभवी सैनिक थे, जिन्होंने अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद अकेले छह बच्चों का पालन-पोषण किया था। अपने पिता के त्याग और समर्पण से प्रेरित होकर सोनोरा ने पिताओं को सम्मान देने के लिए एक विशेष दिन मनाने का प्रस्ताव दिया। 19 जून 1910 को वाशिंगटन के स्पोकेन में पहला फादर्स डे मनाया गया।

हालांकि, अमेरिका में फादर्स डे को राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मान्यता देने में अधिक समय लगा। 1966 में राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर मनाने की घोषणा की और 1972 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इसे स्थायी राष्ट्रीय अवकाश के रूप में स्थापित किया। यह जून के तीसरे रविवार को मनाया जाता है।

कुल मिलाकर, कॉन्वेंट स्कूलों की स्थापना का उद्देश्य ब्रिटेन जैसे ईसाई देशों और भारत जैसे तत्कालीन उपनिवेशों में अलग-अलग था। ब्रिटेन में अनाथ बच्चों को पढ़ाने और पालने के लिए कॉन्वेंट स्कूल स्थापित नहीं किए गए थे, लेकिन भारत में भारतीयों का धर्मांतरण करने के लिए अंग्रेजों द्वारा कॉन्वेंट स्कूल स्थापित किए गए थे।

मंगलवार, 27 मई 2025

हाथ से खाना खाना क्या छोटेपन की निशानी है?

भारतीय उपमहाद्वीप, मध्य पूर्व, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के अधिकांश लोग अपने हाथों से भोजन करते हैं। लगभग 120 करोड़ लोग चॉपस्टिक या लकड़ी की दो छड़ियों से भोजन करते हैं। करीब 150 करोड़ लोग चाकू, चम्मच और कांटे का उपयोग भी करते हैं। चीन के लोग चॉपस्टिक से भोजन करते हैं, जिसके लिए हर साल लगभग 3.8 मिलियन पेड़ काटे जाते हैं ताकि 5700 करोड़ चॉपस्टिक जोड़े बनाए जा सकें।

चाकू, कांटा और चम्मच बनाने के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड जैसे प्रदूषक गैसें वायुमंडल में मिलती हैं, जिससे वायु प्रदूषण होता है। अगर इन्हें अच्छे से साफ न किया जाए, तो ये रोगों के वाहक बन सकते हैं।


आजकल प्लास्टिक चम्मच का निर्माण बढ़ गया है। हर साल 4000 करोड़ प्लास्टिक चम्मच, कांटे और चाकू बनाए जाते हैं, जिन्हें एक या दो बार उपयोग के बाद फेंक दिया जाता है। इस तरह का प्लास्टिक आसानी से नष्ट नहीं होता और इसके निर्माण के दौरान भी वायु प्रदूषण होता है। प्लास्टिक चम्मच के कारण लीवर और किडनी संबंधी रोगों की संभावना बढ़ जाती है।

भारत में प्राचीन काल से लोग हाथ से भोजन करते आ रहे हैं। भारतीय शास्त्रों में स्वच्छ हाथों से भोजन करने को महत्व दिया गया है। मां के हाथ से भोजन करना कितना महत्वपूर्ण है, इसका उल्लेख शास्त्रों में है:

“तिलकं विप्र हस्तेन,  
मातृ हस्तेन भोजनम्।  
पिण्डं पुत्र हस्तेन,  
न भविष्यति पुनः पुनः।”

प्राचीन काल से मनुष्य हाथ से भोजन करते आ रहे हैं। यह सबसे पुरानी परंपरा है, और केवल मनुष्य ही नहीं, पृथ्वी के अधिकांश जीव अपने हाथों से ही भोजन करते हैं।

भारत में लोग हाथ से भोजन करके न तो पर्यावरण प्रदूषित करते हैं और न ही इसके कारण हर साल करोड़ों पेड़ कटते हैं। इसलिए, हाथ से भोजन करना गंदा, असभ्य या हल्की बात नहीं है। बल्कि, इससे आप वायु प्रदूषण, मिट्टी प्रदूषण और पेड़ों की कटाई से बचते हैं, साथ ही प्लास्टिक चम्मच का उपयोग करके किडनी और लीवर संबंधी कई रोगों से भी सुरक्षित रहते हैं।