जापान के Okayama प्रांत के Tsuyama के निकट Kamocho Kurami नामक एक शांत और एकांत गाँव।
उसी कामोचो कुरामी गाँव में Mutsuo Toi नामक एक बालक ने एक संभ्रांत और धनी परिवार में जन्म लिया था। किंतु बचपन से ही उसका भाग्य उसके साथ छल करता रहा। जब वह बहुत छोटा था, तब उसके माता-पिता दोनों की यक्ष्मा (क्षय रोग) से मृत्यु हो गई थी। उस समय यक्ष्मा एक भयंकर तथा असाध्य रोग माना जाता था, और समाज में इसे लेकर अनेक अंधविश्वास और घृणा व्याप्त थी।
माता-पिता की मृत्यु के बाद मुत्सुओ और उसकी बड़ी बहन के पालन-पोषण का दायित्व उनकी दादी ने उठाया। मुत्सुओ पढ़ाई में अत्यंत मेधावी था। शिक्षकों को उससे बहुत आशाएँ थीं। किंतु दादी उसे लेकर अत्यंत सुरक्षात्मक थीं। उन्होंने मुत्सुओ को आगे पढ़ने नहीं दिया और उसे गाँव में ही रखा। मुत्सुओ का मानसिक विकास एक संकुचित परिवेश में होने लगा।
उस समय जापान के ग्रामीण क्षेत्रों में 'Yobai' नामक एक पुरानी प्रथा प्रचलित थी। इस प्रथा के अनुसार, अविवाहित युवक रात्रि में सहमति से युवतियों के घर जा सकते थे। मुत्सुओ भी इस प्रथा में भाग लेता था और गाँव की कुछ महिलाओं के साथ उसका संबंध था।
किंतु १९३७ में सब कुछ बदल गया। मुत्सुओ स्वयं यक्ष्मा रोग से ग्रस्त हो गया। १९३० के दशक के जापान में यक्ष्मा रोगियों को समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता था, क्योंकि यह संक्रामक था और इसका कोई निश्चित उपचार नहीं था। जो गाँव वाले कभी उसका सम्मान करते थे, वे उससे घृणा करने लगे। जिन महिलाओं के साथ उसके संबंध थे, उन्होंने उसे अस्वीकार किया और अपमानित किया।
इस अस्वीकृति ने मुत्सुओ की मानसिक स्थिति को पूरी तरह हिला दिया। उसे लगा कि उसके जीवन का अब कोई मूल्य नहीं रहा, और गाँववासियों के इस अमानवीय व्यवहार ने उसके हृदय में प्रतिशोध की अग्नि जला दी। मुत्सुओ जान चुका था कि वह अधिक दिन जीवित नहीं रहेगा। इसलिए उसने निश्चय किया कि मरने से पहले वह उन सभी लोगों को मार डालेगा जिन्होंने उसे अपमानित किया था। उसने अत्यंत सावधानी से अपनी योजना तैयार की।
मुत्सुओ ने छिपकर हथियार खरीदना शुरू किया। उसने एक ब्राउनिंग शॉटगन, एक जापानी तलवार और दो चाकू जुटाए। इसके लिए उसका बंदूक लाइसेंस भी जब्त कर लिया गया था, किंतु वह अवैध रूप से हथियार इकट्ठा करने में सफल रहा। मुत्सुओ रात में जंगल जाकर पेड़ों पर निशानेबाजी का अभ्यास करता था, जिससे उसकी गोली कभी लक्ष्यभ्रष्ट न हो। उसने एक विस्तृत पत्र लिखा था, जिसमें उसने अपने क्रोध और गाँववासियों के व्यवहार के बारे में वर्णन किया था। मुत्सुओ ने लिखा था कि जिन लोगों ने उसका सम्मान किया, उनका वह कुछ नहीं बिगाड़ेगा।
२० मई की संध्या। मुत्सुओ ने गाँव में आने वाले सभी बिजली के तारों को काट दिया। संपूर्ण कामोचो कुरामी गाँव घने अंधकार में डूब गया। लोगों ने सोचा कि यह एक सामान्य बिजली कटौती है, इसलिए सब सोने चले गए। यहाँ तीस के दशक में जापान के एक गाँव में बिजली होने की बात पढ़कर कुछ लोगों को आश्चर्य हो सकता है, किंतु यह ऐतिहासिक रूप से सत्य है। १९३० के दशक तक जापान विश्व के सबसे तीव्र गति से विद्युतीकृत होने वाले देशों में से एक था। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम भाग से ही जापान ने अपने उद्योग और अवसंरचना का द्रुत विकास किया था। १९३५ तक जापान के लगभग ८९% से ९०% घरों में बिजली का संयोजन पहुँच चुका था। इसमें केवल शहर ही नहीं, बल्कि 'कामोचो कुरामी' जैसे अनेक दुर्गम ग्रामीण क्षेत्र भी शामिल थे।
मुत्सुओ तोई अत्यंत चालाक था। वह जानता था कि केवल एक गोली की आवाज सुनते ही गाँव वाले तुरंत अपने घरों की बत्ती जला देंगे और या तो उसे पहचान लेंगे या फिर हमले से बचने के लिए छिप जाएँगे। इसलिए उसने गाँव में जाने वाली मुख्य बिजली लाइन काट दी थी, जिससे संपूर्ण क्षेत्र अंधकारमय हो गया।
रात लगभग १:३०। मुत्सुओ ने एक भयंकर वेश धारण किया। उसने काले रंग की शर्ट और पैंट पहनी। अंधेरे में देखने के लिए उसने अपने सिर पर दो टॉर्च (Flashlight) बाँधीं, जिससे वह एक जापानी दानव (Oni) जैसा दिखने लगा। छाती पर एक साइकिल लैंप लटकाया, हाथ में ब्राउनिंग गन तथा कमर में तलवार और चाकू रखे।
बिजली काटने के बाद गाँव में जो घना अंधकार छा गया, उसमें केवल मुत्सुओ के पास ही रोशनी थी। वह अपने सिर पर बँधी दो टॉर्च के कारण अपने शिकार को स्पष्ट देख पा रहा था, किंतु नींद से जागे भयभीत गाँववासी अंधेरे में कुछ समझ नहीं पा रहे थे और न ही उन्हें रास्ता सूझ रहा था।
सबसे आश्चर्यजनक और विचलित करने वाला तथ्य यह है कि उसका पहला शिकार उसकी ७६ वर्षीया दादी थीं। मुत्सुओ ने सोई हुई अवस्था में अपनी दादी का सिर काट दिया। सुसाइड नोट के अनुसार, मुत्सुओ ने यह इसलिए किया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि एक 'हत्यारे की दादी' के रूप में वह समाज में जीवित रहकर लोगों की घृणा और लांछना सहें। उसकी दृष्टि में यह एक "निष्ठुर दया" थी।
दादी की हत्या करने के बाद मुत्सुओ घर से बाहर निकला। उस घने अंधकार भरी रात में, सिर पर दो रोशनी जलाकर वह एक के बाद एक घर में घुसने लगा। उसका लक्ष्य पूर्णतः स्पष्ट था — उसने केवल उन्हीं घरों को निशाना बनाया जिन्होंने उसे अपमानित किया था या अस्वीकार किया था।
डेढ़ घंटे तक गाँव में मृत्यु का तांडव चलता रहा। नींद में सोए लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले ही मुत्सुओ की गोली और तलवार के वार से गिरते जा रहे थे। मुत्सुओ कुल ११ घरों में घुसा था। कुछ को उसने शॉटगन से गोली मारकर मार डाला, तो कुछ को तलवार से अत्यंत निर्दयता के साथ काट डाला।
एक घर में उसने एक वृद्ध व्यक्ति को छोड़ दिया क्योंकि उस वृद्ध ने कभी उससे बुरी बात नहीं कही थी। मुत्सुओ उनके सामने खड़ा होकर बोला, "तुमने मुझे कभी कष्ट नहीं दिया, इसलिए तुम जीवित रहोगे।" यह घटना सिद्ध करती है कि वह पागल नहीं था, बल्कि पूरी चेतना और हिसाब के साथ हत्याएँ कर रहा था।
मात्र ९० मिनट के भीतर उसने २७ लोगों की घटनास्थल पर ही हत्या कर दी और अन्य ३ लोग गंभीर रूप से घायल होकर बाद में मृत्यु को प्राप्त हुए। मृतकों में छोटे बच्चों से लेकर वृद्ध तक सभी शामिल थे। इस भयंकर नरसंहार में संपूर्ण गाँव की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा समाप्त हो गया था।
इस हत्याकांड के दौरान मुत्सुओ तोई ने कुल ११ घरों में प्रवेश कर वहाँ के लोगों पर हमला किया था। उस समय उस छोटे से गाँव में कुल २२ से २३ परिवार रहते थे, जिनमें से लगभग आधे यानी ११ परिवारों के लोग इस जघन्य कांड का शिकार हुए थे।
हत्याकांड समाप्त होने के बाद, सुबह होने लगी थी। मुत्सुओ तोई अपने घर वापस नहीं लौटा। वह रक्त से लथपथ अवस्था में पास की एक पहाड़ी पर चढ़ गया। वहाँ वह शांत भाव से बैठ गया।
उसने अपने अंतिम पत्र के रूप में अपना Suicide Note निकाला और उसमें कुछ और पंक्तियाँ जोड़ीं। उसने लिखा:
"मैंने जो करना चाहा था, वह कर चुका हूँ। अब मेरे मरने का समय आ गया है। मुझे पता है मैंने बड़ा पाप किया है, किंतु वे भी निर्दोष नहीं थे। मेरा एकमात्र दुख यह है कि कुछ लोगों को मैं मार नहीं सका क्योंकि वे आज गाँव में नहीं थे।"
इसके बाद, उसने अपनी शॉटगन की नली अपनी छाती की ओर की और ट्रिगर दबा दिया। २१ वर्षीय मुत्सुओ तोई की कहानी उस पहाड़ी पर समाप्त हो गई।
सुयामा हत्याकांड जापान के इतिहास में सबसे काले अध्यायों में से एक बनकर रह गया। इस घटना ने उस समय जापान सरकार को हिलाकर रख दिया था। यह केवल एक हत्याकांड नहीं था, बल्कि यह एक मनोवैज्ञानिक दुर्विपाक का परिणाम था।
सामाजिक उपेक्षा, रोग के प्रति लोगों का अंधविश्वास, और किसी व्यक्ति को निरंतर मानसिक स्तर पर प्रताड़ित करने का परिणाम कितना भयानक हो सकता है, यह उसका एक जीवंत तथा रक्तरंजित प्रमाण था। संपूर्ण गाँव की सामाजिक स्थिति इस घटना के बाद ढह गई थी।
आज भी अपराध विज्ञानी और मनोवैज्ञानिक मुत्सुओ तोई के कृत्यों पर शोध करते हैं। एक गाँव के लोगों ने मिलकर एक व्यक्ति को मानसिक स्तर पर मार डाला, और उसी एक व्यक्ति ने शारीरिक स्तर पर संपूर्ण गाँव को मृत्यु का तांडव दिखा दिया। इतिहास की यह सत्य घटना किसी भी काल्पनिक थ्रिलर से भी अधिक भयावह है।
बाद में १९३८ की इस कामोचो कुरामी सामूहिक हत्या (सुयामा हत्याकांड) से गहराई से प्रेरित होकर जापान के प्रसिद्ध रहस्य उपन्यासकार सेइशी योकोमिज़ो ने एक उपन्यास लिखा जिसका नाम "The Village of Eight Graves" (जापानी — Yatsuhaka-mura) था। सुयामा हत्याकांड की कहानी पर आधारित होकर १९८३ में एक प्रसिद्ध जापानी फिल्म का निर्माण किया गया। इस फिल्म का नाम है "Village of Doom" (जापानी — Ushimitsu no mura)। इस फिल्म का निर्देशन प्रसिद्ध जापानी निर्देशक नोबोरु तानाका ने किया था। फिल्म ने मुत्सुओ तोई के जीवन, सामाजिक बहिष्कार, यक्ष्मा रोग के भय और उसके मानसिक पतन के कारण वह किस प्रकार इस जघन्य नरसंहार को अंजाम देने पहुँचा, इसे अत्यंत सूक्ष्म और मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। इस भयावह घटना को लेकर Japan's Darkest Night - Tsuyama Massacre documentary जैसी कुछ वृत्तचित्र भी उपलब्ध हैं।
सुयामा हत्याकांड से कम से कम इतनी शिक्षा अवश्य मिलती है कि किसी एक व्यक्ति के विरुद्ध संपूर्ण समाज की मिली-जुली उपेक्षा, उपहास और प्रताड़ना केवल एक व्यक्तिगत अन्याय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक चेतना का एक गहरा पतन है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होने के कारण उसके अस्तित्व, आत्मसम्मान और मानसिक संतुलन के लिए समाज की सहानुभूति और आश्रय अपरिहार्य है। किंतु जब बहुसंख्यक लोग मिलकर किसी दुर्बल या असहाय व्यक्ति को निरंतर लांछित, अपमानित और प्रताड़ित करते हैं, तब वे अनजाने में हिंसा की ऐसी अग्नि प्रज्वलित कर देते हैं जो अंततः संपूर्ण व्यवस्था को निगल जाती है।
किसी व्यक्ति को मानसिक स्तर पर यातना देकर धीरे-धीरे मार डालना शारीरिक हिंसा से भी अधिक भयंकर है। जब समाज किसी मनुष्य की मानवता को अस्वीकार कर उसे बहिष्कृत करता है, तब उस व्यक्ति के भीतर का सकारात्मक जीवनबोध नष्ट हो जाता है और प्रतिशोध का विकृत विषचक्र उत्पन्न हो जाता है। अतः दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, क्षमा और मानवीय मर्यादा बनाए रखना केवल एक नैतिक कर्तव्य नहीं है, बल्कि अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने का एकमात्र उपाय भी है। किसी को मानसिक स्तर पर प्रताड़ित करना अपने लिए एक विनाशकारी तूफान को आमंत्रित करने के समान है।
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