1965 के आरंभ में पाकिस्तान के भाग्यविधाता, फ़ौजी वर्दी में तने हुए जनरल अयूब ख़ान आईने के सामने खड़े होकर अपनी गंभीर मुद्रा निहार रहे थे। उधर भारतीय सीमा उन्हें एक ऐसा मैदान लग रही थी जहाँ खेल पहले से तय हो — बस जाकर जीत का झंडा गाड़ना बाकी हो। उनकी नज़र में भारत के नए प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री बस एक छोटे-क़द के, धोती पहने, शाकाहारी सज्जन थे, जिन्हें फ़ौजी बूटों की धमक भर से डराया जा सकता था। शास्त्रीजी की सादगी और विनम्रता को पाकिस्तानी हुक्मरानों ने अपनी दूरदर्शिता से नहीं, अपनी हेकड़ी से भारत की कमज़ोरी मान लिया — मानो सज्जनता कोई सैन्य दुर्बलता हो, और शराफ़त का मतलब बंदूक चलाना भूल जाना।
इस झूठे गुरूर को हवा देने अटलांटिक पार से आया अमेरिका का महंगा तोहफ़ा — "पैटन टैंक"। शीतयुद्ध के शतरंज में पाकिस्तान को अपना विश्वस्त मोहरा मानकर अमेरिका ने उसे यह अत्याधुनिक लोहे का दानव थमा दिया था — कंप्यूटरीकृत रेंजफ़ाइंडर, स्वचालित निशानेबाज़ी, नाइट-विज़न, और इतना मोटा कवच कि दावा था कोई भारतीय गोला उसे छू भी नहीं सकता। दिलचस्प यह कि यही पैटन टैंक कोरियाई युद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के दौर की अमेरिकी सेना की भी रीढ़ रह चुका था — यानी पाकिस्तानी जनरलों की गोद में बैठा यह "अजेय योद्धा" असल में अमेरिका के पुराने खिलौनों में से एक था, बस उस पर पॉलिश नई थी। पर पॉलिश देखकर जनरलों का सीना ऐसे फूल गया मानो एशिया की तक़दीर अब उनकी मुट्ठी में हो, और भारत के द्वितीय-विश्वयुद्धकालीन शरमन टैंक बस दिखावे के डिब्बे रह गए हों।
रावलपिंडी के वातानुकूलित मुख्यालय में बैठकर फ़ौजी रणनीतिकारों ने जो नक़्शा खींचा, वह युद्ध-योजना कम, राजसी बारात का कार्यक्रम-पत्र ज़्यादा लगता था — मानो पंजाब की सीमा पर नहीं, किसी विवाह-यात्रा पर निकल रहे हों। हिसाब पक्का था: 8 सितंबर को पहली आर्म्ड डिवीज़न सीमा पार करेगी, शाम तक ब्यास नदी लांघ जाएगी, जीटी रोड पर कब्ज़ा जमाएगी, और अगले दिन शाम तक लाल क़िले पर पाकिस्तानी झंडा फहराकर जनरल साहब वहीं बैठकर विजय की चाय की चुस्कियाँ लेंगे। मानो युद्ध जीतने के लिए बस टैंक की चमक, इंजन का हॉर्सपावर, और विदेशी अख़बारों की सुर्खियाँ काफ़ी हों — और अमेरिकी कंप्यूटर के आगे किसी इंसानी हिम्मत की औक़ात ही क्या!
इसी घमंड और झूठे भरोसे के अंधेरे में लिपटकर, 8 सितंबर के सूरज उगने से पहले ही, पाकिस्तानी फ़ौज अपनी पहली आर्म्ड डिवीज़न और सैकड़ों पैटन टैंकों के साथ पंजाब के खेमकरण सेक्टर के एक शांत-से गाँव "असल उत्तर" की ओर बढ़ चली। योजना सीधी थी, आत्मविश्वास से लबालब — और पूरी तरह घमंडी। सोच यह थी कि लोहे के इन गरजते राक्षसों की धमक सुनते ही भारतीय सेना मोर्चा छोड़कर भाग खड़ी होगी। पर भारतीय सेनापति गर्जन से ज़्यादा माटी को पहचानते थे। वे जानते थे कि काग़ज़ी शेर हो या अमेरिका-निर्मित लोहे का असुर, धरती की कशिश और कीचड़-पानी के मेल के आगे सब बराबर हैं। भारतीय सेनापतियों ने कोई ऊँचे-ऊँचे दावे नहीं ठोंके, न अपनी आधुनिकता का ढिंढोरा पीटा। उन्होंने बस अपनी अक़्ल लगाई और एक ख़ामोश जाल बिछा दिया — जो आगे चलकर सैन्य-इतिहास में हास्य और रणनीति का ऐसा दुर्लभ संगम बना कि सैन्य अकादमियाँ आज भी इसे केस-स्टडी की तरह पढ़ाती हैं।
असल उत्तर गाँव के चारों ओर लहलहाते गन्ने के खेत बने रंगमंच। भारतीय जवानों ने पास की नहर और रोही नाले के बाँध काट दिए और पूरे गन्ने के खेतों व मैदानों को पानी से लबालब भर दिया। देखते-ही-देखते वह सूखी-सुथरी खेती की ज़मीन एक नरम, गहरे और चिपचिपे दलदल में बदल गई। ऊपर से देखने पर लगता — बस लंबे-लंबे गन्ने के पौधे हरे पत्ते हिलाकर मेहमानों का स्वागत कर रहे हों, पर नीचे छिपा था कीचड़ का वह जाल, जो अहंकारी लोहे की मशीनों को निगलने के लिए बिछाया जा चुका था।
8 सितंबर की सुबह जब पाकिस्तानी पैटन टैंक पूरे रोब़ से गरजते हुए भारतीय सीमा में घुसे, उनके चालक ख़ुद को किसी अजेय देवता से कम नहीं समझ रहे थे। उन्होंने अपने भारी-भरकम पहिए गन्ने के खेतों में उतार दिए। लेकिन कुछ ही दूर चलने के बाद, एक-एक कर टैंक कीचड़ में धँसने लगे। सैकड़ों टन वज़नी वे लोहे के दानव, जो दुनिया जीतने का दावा करते थे, उस दिन मिट्टी और पानी के एक साधारण घोल में जड़वत हो गए। जितनी तेज़ी से पहिए घूमते, उतनी ही गहराई तक कीचड़ उन्हें निगलता जाता — मानो टैंक ख़ुद अपनी क़ब्र खोद रहे हों।
नज़ारा अजीब और हास्यास्पद दोनों था। अमेरिकी इंजीनियरिंग के ये बेहतरीन नमूने कीचड़ में फँसे कछुओं जैसे छटपटा रहे थे। पैटन टैंकों का गोला-बारूद, फ़ायर-कंट्रोल सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण — सब कुछ उस देसी कीचड़ के आगे बेकार साबित हुआ। न आगे बढ़ पाए, न पीछे हट सके। वे लोहे के असुर अपने ही वज़न के बंदी बन गए — जैसे कोई मोटा आदमी कुर्सी में इस क़दर फँस जाए कि उठने की कोशिश ही उसे और गहरा धँसा दे।
इसी बीच गन्ने के खेतों की आड़ में और कीचड़ से बची ऊँची जगहों पर छिपे भारतीय जवानों ने अपना काम शुरू किया। परमवीर चक्र विजेता कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद जैसे योद्धा अपनी मामूली मगर बेहद कारगर रिकॉइललेस गन (RCL) को जीप पर लादे मोर्चे पर निकल पड़े। जिन टैंकों को कोई भेद नहीं सकता था — ऐसा पाकिस्तानियों का दावा था — उन्हीं जड़ हो चुके टैंकों को भारतीय जवानों ने एक-एक कर पहचाना और भस्म करना शुरू कर दिया। अब्दुल हमीद ने अकेले अपनी सूझबूझ और साहस से कई पैटन टैंक जला डाले — और अंततः 10 सितंबर को इसी लड़ाई में शहीद होकर मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित हुए।
पाकिस्तानी सैनिकों और चालकों का गुरूर पल भर में डर और हताशा में बदल गया। वे समझ ही नहीं पाए कि उनकी करोड़ों की अत्याधुनिक "युद्धपोत" जैसी मशीनें सिर्फ़ पानी-मिट्टी के घोल के सामने इस क़दर लाचार कैसे हो गईं। कई पाकिस्तानी सैनिकों ने जान बचाने के लिए टैंकों को पूरी तरह चालू हालत में कीचड़ में ही छोड़कर भाग जाना ही बेहतर समझा — हथियार, गोला-बारूद और क़ीमती उपकरण वहीं छोड़कर, मानो युद्धक्षेत्र नहीं कोई पिकनिक स्पॉट हो जिसे जल्दी में छोड़ना पड़ा हो।
8 से 10 सितंबर तक चली इस "असल उत्तर की लड़ाई" के अंत में जो नज़ारा सामने आया, उसने विश्व सैन्य-इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया। सौ से अधिक पाकिस्तानी टैंक या तो पूरी तरह नष्ट हो चुके थे, या भारतीय सेना ने उन्हें सही-सलामत क़ब्ज़े में ले लिया — इतिहास के किसी भी युद्ध में टैंकों की इतनी बड़ी तादाद एक साथ हार जाना दुर्लभ था। युद्ध के बाद जहाँ टैंक फँसे थे, उस इलाक़े में बस ध्वस्त और कीचड़ में धँसे पैटन टैंकों की क़तारें ही दिखाई देती थीं।
भारतीय सेना ने इन क़ब्ज़े में लिए और तबाह टैंकों को इकट्ठा कर एक विशाल प्रदर्शनी-सी जगह पर खड़ा कर दिया, जिसे बाद में "पैटन नगर" नाम दिया गया। जिस पैटन टैंक का नाम सुनकर दुश्मन का सीना गर्व से फूलता था, उसी नाम पर एक "नगरी" बस गई — पर यह गौरव की नगरी नहीं थी, बल्कि अमेरिकी तकनीक और पाकिस्तानी घमंड की एक मज़ेदार समाधि-स्थली थी, जहाँ सैलानी और पत्रकार दूर-दूर से आकर तस्वीरें खिंचवाते थे, मानो किसी अजायबघर में आए हों।
सभी प्रामाणिक दस्तावेज़ और युद्ध-इतिहास यही स्वीकार करते हैं कि असल उत्तर की लड़ाई केवल हथियारों की लड़ाई नहीं थी — यह कौशल बनाम यांत्रिक घमंड की एक निर्णायक परीक्षा थी। पैटन नगर का वह दृश्य देखने देश-विदेश के कई पत्रकार पहुँचे थे। वे यह देखकर हैरान रह गए कि कैसे मिट्टी और पानी की एक साधारी-सी साज़िश के आगे दुनिया के सबसे महंगे युद्धपोत घुटने टेककर बैठ गए — और अयूब ख़ान का आईने वाला रोब़, ब्यास नदी तक पहुँचने से पहले ही, पंजाब के एक गन्ने के खेत में दफ़्न हो गया।