मेँ अपने मन का दास कलम का कर्मचारी हुँ जो मन मेँ आया लिखदिया । कोई पागल कहे तो मुझे क्या ? कहता है तो कहने दो ।।
ब्लॉग आर्काइव
शनिवार, 15 अगस्त 2015
अमरुद और मेरी उलझन.....
फिर अचानक मनमे क्या ख्याल आया.,. अमरुद के बारे मेँ गुगल पर रिसर्च करने बैठगया ।
17वीँ सदी मेँ मार्टेल प्रजाति कि
ये मिठा स्वादिष्ठ फल युरोपियन व्यापारीओँ के साथ भारत आया !
विदेशी आये और चले भी गये परंतु ये (Guava) वृक्ष करीब करीब 300 वर्षोँ से समुचे भारत के जमीनोँ पर कब्जा कर बैठा है ।
पतानहीँ क्युँ पर इस वृक्ष के खिलाफ आजतक #कट्टर
#स्वदेशी
#समर्थक #आन्दोलनकारीओ ने कोई विरोध नहीँ कि न इसपर संसदमे #कंग्रेसी ओ ने कभी हल्ला गुल्ला मचाया है ।
अब मैँ समझचुका था कि
मैने अमरुद का पौधा लगाकर बहत बड़ी गलती कर दी है......
ये बिलकुल ऐसा ही है
कि जैसे आप फेसबुक पर
#राजीव_दिक्षित जी के कट्टर समर्थक हो और बिना जानकारी आपने एक विदेशी द्रव्य को स्वदेशी समझकर इस्तेमाल कर लिया !!!
मेरे दिल को इस नयी जानकारी से गहरा धक्का तो लगा ही था और बचाकुचा जो अमरुद के लिये थोड़ी बहत ललक् बची हुई थी
उसे हमारे प्यारे चाचाजी के बातोँ ने पूर्णतः निर्मूलन् करदिया !!!
उन्होने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ एक अवैज्ञानिक(?) बात कहीँ
कि
"जिस तरह विदेशी संस्कृति
भारतीय समाज के लिये ज़हर साबित हुई है
उसी प्रकार ये विदेशी वृक्षोँ के द्वारा अत्सर्जरित Oxygen मे तथा उनके फलोँ मे मौजुद जहरीले तत्व (पोषक तत्व ) हमेँ पीढ़ी दर पिढ़ी कमजोर बना रहे है ।
'असल बात तो दरसल ये हे कि अंग्रेजोँ को इस वृक्ष कि बुराईओँ के बारे मे पता था परंतु ये चालक व्यापारी लोग जानवुझकर इसे भारतीयोँ को कमजोर बनाने के लिये छोड़गये है ताकि बाद मेँ फिर आ कर हम पर राज करसके ।"
फिर चाचाजी ने इस वृक्ष से जुड़ी एक सामाजिक मुद्दे कि और मुझे ध्यान दिलाते हुए
बताया
"देखो मनुआ
ए जो तुम आज इत्ते अमरुद के पौधे पोत रहे हो का सोचे हो कल को इस से अछा दिन आ जावेगा :]] अरे बचुआ तनिक समझदार बनो '
कलको तोहरे बच्चे होवेगेँ
हमरी तो तिन लौँडे हे ही....
कल को इन अमरुद के वृक्षोँ को लेकर के वो आपसमेँ महाभारत कर गये तो
का करपाओगे ? बचाने जाओगे तो उलटे तुमपर पड़ने का डर है मुझे ...."
ना...ये मेरे बच्चे ही कौरव है मे जानता हुँ
इसलिये कहरहा था
जो भी करो सोच समझकर करो"
तिन दिन पूर्व मैने दो अमरुद के पैड़ लगाएँ फिर अचानक मनमे क्या ख्याल आया.,. अमरुद के बारे मेँ गुगल पर रिसर्च करने बैठगया । 17वीँ सदी मेँ मार्टेल प्रजाति कि ये मिठा स्वादिष्ठ फल युरोपियन व्यापारीओँ के साथ भारत आया ! विदेशी आये और चले भी गये परंतु ये (Guava) वृक्ष करीब करीब 300 वर्षोँ से समुचे भारत के जमीनोँ पर कब्जा कर बैठा है । पतानहीँ क्युँ पर इस वृक्ष के खिलाफ आजतक #कट्टर #स्वदेशी #समर्थक #आन्दोलनकारीओ ने कोई विरोध नहीँ कि न इसपर संसदमे #कंग्रेसी ओ ने कभी हल्ला गुल्ला मचाया है । अब मैँ समझचुका था कि मैने अमरुद का पौधा लगाकर बहत बड़ी गलती कर दी है...... ये बिलकुल ऐसा ही है कि जैसे आप फेसबुक पर #राजीव_दिक्षित जी के कट्टर समर्थक हो और बिना जानकारी आपने एक विदेशी द्रव्य को स्वदेशी समझकर इस्तेमाल कर लिया !!! मेरे दिल को इस नयी जानकारी से गहरा धक्का तो लगा ही था और बचाकुचा जो अमरुद के लिये थोड़ी बहत ललक् बची हुई थी उसे हमारे प्यारे चाचाजी के बातोँ ने पूर्णतः निर्मूलन् करदिया !!! उन्होने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ एक अवैज्ञानिक(?) बात कहीँ कि "जिस तरह विदेशी संस्कृति भारतीय समाज के लिये ज़हर साबित हुई है उसी प्रकार ये विदेशी वृक्षोँ के द्वारा अत्सर्जरित Oxygen मे तथा उनके फलोँ मे मौजुद जहरीले तत्व (पोषक तत्व ) हमेँ पीढ़ी दर पिढ़ी कमजोर बना रहे है । 'असल बात तो दरसल ये हे कि अंग्रेजोँ को इस वृक्ष कि बुराईओँ के बारे मे पता था परंतु ये चालक व्यापारी लोग जानवुझकर इसे भारतीयोँ को कमजोर बनाने के लिये छोड़गये है ताकि बाद मेँ फिर आ कर हम पर राज करसके ।" फिर चाचाजी ने इस वृक्ष से जुड़ी एक सामाजिक मुद्दे कि और मुझे ध्यान दिलाते हुए बताया "देखो मनुआ ए जो तुम आज इत्ते अमरुद के पौधे पोत रहे हो का सोचे हो कल को इस से अछा दिन आ जावेगा :]] अरे बचुआ तनिक समझदार बनो ' कलको तोहरे बच्चे होवेगेँ हमरी तो तिन लौँडे हे ही.... कल को इन अमरुद के वृक्षोँ को लेकर के वो आपसमेँ महाभारत कर गये तो का करपाओगे ? बचाने जाओगे तो उलटे तुमपर पड़ने का डर है मुझे ...." ना...ये मेरे बच्चे ही कौरव है मे जानता हुँ इसलिये कहरहा था जो भी करो सोच समझकर करो"
सोमवार, 10 अगस्त 2015
कवीरदास जी की टंक तोराणी
भारत मेँ एक प्रसिद्ध साधु हुए हेँ मुलक दास जी , वे प्रयाग नजदिक #कड़ागाँव मे जन्मे थे । एक दिन नियति ने उनसे उनकी पत्नी व पुत्री को छीन लिया । मृत्यु पश्चात् उनका परिवार कहाँगया अर्थात् उनकी गति ब्रह्मलोक मेँ हुआ अथवा अन्य लोकोँ मे ये जानने कि जिज्ञासा ने मुलकदास जी को साधु बनादिया ।
उनके गुरु श्रीरामानन्दचार्य
जी व गुरुभाई है श्री तुलसी दास जी !
मुलक दास जी ने मन की जिज्ञासा हल करने हेतु समुचे भारत का भ्रमण कर लिया ।
अन्त मेँ वे जगन्नाथ पुरी आये ,जगन्नाथजी कि दर्शन करते ही उनका मन शान्त हो गया और वे यहाँ पुरीधाम कि प्रशिद्ध श्मशाँनस्वर्गदार निकट आस्रम बनाकर रहने लगे । धीरे धीरे उनके यहाँ भी गुरुशिष्य परंपरा चलपड़ा । मुलकदास जी पर भगवत् भक्ति का रंग कुछ युँ चढ़ा कि वे प्रत्यह खिचड़ी बनाकर भगवनजी को भोगलगाने लगे । उनके
शिष्य इस भाव से सर्वथा
अनजान ही रहे !!!
मलुकदास जी ने ही अपने गुरुभाई संत कवीर दासजी को जगन्नाथपुरी आमन्त्रण किया था । अब कवीरदास थे मूर्तिपूजा की घोर विरोधी कैसे भी समझा बुझाकर मलुकदासजी ने उन्हे श्रीजगन्नाथ दर्शन हेतु राजी कर लिया ।
कबीरदास ने जब भगवनजी का दर्शन किया उनके मनमेँ परिबर्तन आ गया । उनके मुख से एकाएक निकलगया
"ठाकुर भले विराजो जी" ।
फिर उन्होने उसदिन यह भजन गाया और इसे सुनकर मलुक दास जी भी प्रभुचिन्तन मेँ निमग्न हो गये ।
कवीर दास जी अब रोज श्रीविग्रह दर्शन करने लगे । उन्होने
श्रीमंदिर मेँ बननेवाली महाप्रसाद को भी ग्रहण कर लिया । एक दिन कवीर दास जी ने सोचा क्युँ न इस महाप्रसाद मेँ जल मिलाकर इसे भक्तोँ को पिलाया जाय !!!!
शुभकार्य मेँ देरी किसबात कि !
यही हुआ कवीर दास जी का वह "महाप्रसाद जल" आगे चलकर श्रीक्षेत्र पुरी मेँ "टंक तोराणी" के नामसे प्रसिद्ध हुआ । जगन्नाथ पुरी मेँ
मलुक दास जी कि आश्रम निकट कवीरजी का ध्यान समाधी है । वहाँ उनके दो शिष्य रैदास व अमिमाता का भी समाधी हे ।
उनके नाम से प्रचलित कवीरचौरा मठ कि और से भक्तोँ को आज भी टंक तोराणी/महाप्रसाद जल पिलाया जाता है ।।
शनिवार, 8 अगस्त 2015
जनसृतिओँ मेँ गंजाम जिल्ला की मालतीगड़
और उनके कनिष्ठ पुत्र के बीच किसीबात पर परस्पर मनोमालिन्य और फिर झगड़ा हो गया ।
इससे व्यथित हो राजपुत्र ने कुछ मित्रोँ को साथ लेकर घुमुसुर राज्य मेँ प्रवेश किया ।
अपना अलग राजनवर बनाने के लिये राजपुत्र ने निकटस्थ मालती पर्वत के निकट राजप्रासाद का निर्माण करवाया और इस क्षेत्र का नाम रखा मालतीगढ़ !
छोटो बड़े कुछ गाँव पर अधिकार करके वो राज करने लगा ।
इसी मालतीगढ़ के पूर्वीदिशा मेँ एक और राज्य था उसका नाम था जउगड़ !
कुछवर्षोँ बात जउगड़ के साथ सीमाविवाद हुआ और समाधान न मिलनेपर युद्ध छिड़गया ।
मालतीगड़ के राजा ने अपने कन्ध व सउरा जैसे आदिवासी सैन्योँ को साथ लेकर युद्ध के लिये जउगड़ कि और रवाना हो गये पर
"जाने से पहले महारानी को उन्होने पथ्थर से बना बड़ा दीप मेँ अग्नी प्रज्वलीत करते हुए कहा ये दीप जबतक जलता रहेगा तुम मेरी विजय कि उम्मिद रखना । यदि ये दीप बुझगया तो तुम इसमेँ कुदकर अपना सतीत्व रक्षा करना ।
राजा ने उस वृहद दीप कि रक्षा हेतु दो विश्वासी पाइक सैनिक नियुक्त किया ।
अब राजा युद्धभूमि कि और कुच कर गये !
अनेक दिनोँ तक युद्ध चला परंतु जउगड़ को जीत पाने मेँ मालतीगड़ के राजा विफल हुए ।
च्युँकि जउगड़ की द्वार जउ नामकी एक खास पदार्थ के आवरण से ढ़का था इसलिये इसपर किसी अस्त्र व गोलाबारुद का कोइ असर नहीँ हो पाता था ।
एक दिन मालतीगड़ राजा रात को जउगड़ मेँ भेस बदलकर घुसगये
हर जगह युद्ध कि बातेँ हो रही थी....
राजा ने सुना एक व्यक्ति कहरहा था
जउगड़ कि दिवार तोड़ना तबतक मुस्किल है जबतब उसमेँ जउ नामका द्रव्य लगा हुआ है
यदि इस द्रव्य को हटादिया जाय तबजाकरके मालतीगढ़ राजा इस राज्य को जीत पाएगेँ ।
राजा ने वैसा ही किया
और
दिवार तोड़ कर नवर मेँ प्रवेश कर गये ।
उधर जउगड़ के राजा ने देखा विपत्ति सम्मुख है
हार निश्चित है परंतु तबतक जउगड़ राजा ने मालतीगड़ को बरबाद करने की तैयारी कर ली थी !
जउगड़ हार भी जायेगा तब भी मालतीगड़ का अन्त निश्चित था । युद्ध के प्रारम्भिक दिनोँ मेँ ही
जउगड़ के राजा ने लोग भेजकर मालतीगड़ की लगातार जलरही दीप को बुझादिया था ।
अब रानी भी दुःखी हो सती हो गयी । युद्ध मेँ
मालतीगड़ का विजय हुआ ,राजा नवर लौटे तो देखा उनका सबकुछ लुट चुका है ।
प्रियतमा पत्नी की वियोग से वो नित्यान्त व्यथित हुए और निश्चय कर लिया च्युँकि उनके लिये रानी ने आत्मदाह किया वो भी उसी पथ्थर दीप मेँ कुदकर प्राणत्याग करेगेँ ।
राजकर्मचारीओँ ने बहुत समझाया पर राजा अटल रहे और वही किया ।
मालतीगड़ अब अराजक हो गया था ।
ये जानकर घुमुसुर के भंज राजा ने सैसन्य आ कर के मालतीगड़ अधिकार कर लिया ।
मालतीगड़ कि अधिष्ठात्री व्याघ्रदेवी को ले जा कर के कुलाड़गड़ मे पुनः स्थापना किया गया । मालतीगड़ के और एक मंदिर से विरंञ्जी नारयण कि मूर्ति को बुगुड़ा नामक क्षुद्र नगर के मंदिर मेँ पूजा गया ।
=>>
मालतीगड़ को पुराणोँ मेँ खासकर जैनग्रंथोँ मेँ कोटितिर्थ कहागया है
जो आधुनिक गंजाम निकटस्थ आसिका नगर मेँ स्थित है ।
शुक्रवार, 7 अगस्त 2015
भूपेन्द्र सिँह एक परिचय
अल इंडिया रेड़िओ ने वाहदुर शाह जाफर पर जब एक कार्यक्रम बनाया उसमेँ भूपेन्द्र सिँह ने वहादुर शाह जफर कि एक गजल रेकोर्ड कि जो दिल्ली वालोँ ने खुब पसंद किया । ये गज़ल थी
"लगता नहीँ है दिल मेरा उजड़े दयार मेँ" !
उन्ही दिनोँ रेडिओ प्रड्युसर सतीश भाटिया के पार्टी मेँ भूपेन्द्र जी और उनके हुनर से मदन मोहन रुबरु हुए ।
इससे भूपेन्द्रजी को फिल्म हकीकत मेँ मदनमोहन ने पहला ब्रेक दिया ।
इस फिल्म मेँ महम्मद रफी ,तलत् महम्मुद और मन्ना डे के साथ उन्होने अपना पहला गीत रेकोर्ड किया । ये गीत था
"हो के मजबुर उसने मुझे भुलाया होगा ज़हर चुपके से दवा जानके खाया होगा"
इत्तेफाक से ये गाना उन्ही पर फिल्माया गया था ।
"ऋत जबाँ जबाँ
इसके बाद भूपेन्द्र सिँह आरडी बर्मन के साथ बतौर गिटारिस्ट जुड़े !
दम मारो दम गाने मेँ बजे गिटार
उन्ही के द्वारा बजाया गया था ।
इसके बाद तो उन्होने अन्य म्युजिसन के साथ भी काम किया । आरडी बर्मन के साथ दोस्ती के कारण उन्हे
फिल्म "परिचय" मेँ
लता जी के साथ
डुएट गाने का मौका मिला । गीत के वोल थे
"बीते न बिताये रैना"
भूपेन्द्र को पहला सोलो संग गाने का मौका खैयाम ने दिया था ।
फिल्म थी आखरी खत
ओर गीत था
"ऋत ऋत जबाँ जबाँ रात महरबाँ"
भुपेन्द्र सिँह जी द्वारा गाये गये ज्यादातर यादगार गीत गुलज़ार के कलम से निकले है जैसे
दिल ढ़ुँढ़ता है फुरसत के रात दिन
नाम गुम् जायेगा चेहरा ये याद आयेगा ,
एक अकेला इस सहर मेँ
कभी किसी को मुक्कमल जाहाँ नहीँ मिलता" आदि ।
मिड 80के दशक मेँ भूपेन्द्र ने बंगाली सिँगर मिताली मुखर्जी से शादी कर ली और इन दिनोँ
वे साथ साथ स्टेज सो करते व आलबम् निकालते है ।
भूपेन्द्र जी की लम्बी उम्र कि कामना करते है
हिन्दी व गान्धी
1917 साल द्वितीय गुजराट शिक्षा सम्मिलनी मेँ उन्होने घोषणा किया कि हिन्दी को भारत मे राजभाषा का व आचँलिक भाषाओँ को राज्य भाषा का दर्जा मिले ।
इतना कहकर वे चुप नहीँ बैठे
उन्होने 1918 प्रयाग हिन्दी साहित्य सम्मिलनी मेँ ये बात फिर उठाया ।
उन्होने कहा "अब ये सम्मिलनी हिन्दी प्रचार के लिये भी कार्य करे"
ये कहने के साथ साथ उन्हे पता था व्रिटिस चाटुकार दिल्ली मेँ बैठे है जातीयतावादी बात सुनते ही मुसलमानोँ को उर्दु के नाम पर भड़काएगेँ !
फिर महात्मा ने दुसरा पदजोड़ा
"हिन्दी व उर्दु दो परस्पर विरोधी भाषा नहीँ अपितु प्रयाग गंगा जमुना रुपी दो नदी है" !!
मुसलमान नागरी मेँ न लिखना चाहेँ तो उर्दु अक्षर मेँ लिखे
तब विरोध कोई कारण नहीँ बचपावेगा !!"
उत्तर भारत से हिन्दी के लिये प्रतिबंधक थे मुसलमान तो दक्षिणभारत मेँ द्राविड़ लोगोँ से भी विरोध कि भारी संभावनाएँ थी ।
तब गाँधीजी ने तय किया कि वे दाक्षिणात्य मेँ हिन्दी कि प्रचार प्रसार हेतु विशेष ध्यान देगेँ ।
गांधीजी के उद्यम से 1918 मेँ मांद्राज मेँ दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा का गठन हुआ व हिन्दी प्रचार शुरुहुआ था ।
1920 मेँ गुजरात मेँ गुजराती जातीय विश्व विद्यालय कि स्थापना हुई और वहाँ हिन्दी भाषा शिक्षा वाध्य किया गया ।
फिर गांधीजी ने देखा हिन्दी भाषा के लिये कंग्रेस का साथ नित्यान्त आवश्यक है अतः उन्होने 1924 वेलगाँव अधिवेशन मेँ हिन्दी को कंग्रेस कार्यक्रमोँ मेँ जोड़दिया ।
वेलगाँव अधिवेशन मेँ सभापतित्व करते हुए गाँधीने हिन्दी पर चमत्कार भाषण दिया । उन्हे इसबात कि यकीन न था कि लोग उनकी बात नसिर्फ सुनेगेँ वरन इसके लिये उद्यमरत्त भी होगेँ ।
1925,कानपुर मेँ हुए अधिवेशन मे कंग्रेस ने एक और पग आगे चलते हुए तय करलिया कि अबसे उसका हर कार्य हिन्दी मेँ होगा ।
गाँधीजी बारबार कहते थे
कंग्रेस को ताकतवर बनाना हे तो हिन्दी भाषा मेँ कार्य करेँ ज्यादा से ज्यादा लोग आपसे जुडेगेँ ।
यदि विदेशी भाषा को प्राधान्य दिया तो अंग्रेजोँ कि भाँति तुम्हारा भी अंग्रेज साहेब कहकर अनादर किया जायेगा ।
गाँधीजी ने हिन्दी के लिये प्रारम्भिक योगदान दिया परंतु बाद मेँ गाँधीजी कि हिन्दोस्तानी पर हिन्दी साहित्य सम्मिलनी के तत्कालीन सभापति पुरुषोत्तम दास टंडन व गाधिँजी के बीच मतान्तर बढ़गया ।
च्युँकि गान्धीजी हिन्दी के बदले हिन्दोस्तानी पर ज्यादा जोर दे रहे थे पुरुषोत्तम जी ने इसका विरोध किया । श्री टंडन का कहना था
"क्युँकि हिन्दोस्तानी के नामसे कोई भाषा नहीँ और गाँधीजी दो भाषाओँ को आपस मेँ अवैज्ञानिक तौर मिलाकर इसे हिन्दोस्तानी का नाम दे रहे हे ये अग्रणयोग्य नहीँ है । इसतरह से ये दो भाषाओँ की खिचड़ी हो जायेगा जैसे "बादशाह राम" और "मल्लिका ए रघुकुल सीता" !!"
ये सुनकर गाँधीजी को भयंकर दुःख हुआ उन्होने साहित्य सम्मिलनीओँ से बराबर दुरी बना लिया ।
1935 के बाद हिन्दी का और प्रचार प्रसार हुआ....और आज भी लगातार जारी है.....
परंतु आज स्वाधीन भारत मेँ कंग्रेसने हिन्दी से दूरी बनालिया है....
*****1 वर्ष पूर्व चुनाव प्रचार मेँ स्टार प्रचारक कंग्रेसी नेता राहुल गांधी अंग्रेजी मेँ भाषण दे रहे थे संभवतः वे और समुचा कंग्रेस पार्टी महात्मा कि ये उक्ति भूलगये थे कि हिन्दी ही जनभाषा है अंग्रेजी मेँ बोलकर आप साधारण जनता कि दिल नहीँ जीतपायेगेँ सिर्फ काले अंग्रेज बनकर रहजायेगेँ ।
लेकिन ये बात याद थी वड़ोदरा मेँ जन्मे नरेन्द्र मोदी जी को
उन्होने प्रायः सभी प्रचार अभियान मे हिन्दी भाषा मेँ चुनाव प्रचार किया और फल आपके सामने है ।
आज नरेद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हे और संभवतः आगे भी रहेगेँ परंतु कंग्रेस को क्या मिला भारतीय भाषा सभ्यता संस्कृति को छोड़कर सिबाय हार के ???
अभी भी वक्त है कंग्रेसी सुधर जाय तो ठिक वरना लोगोँ को इन्हे सुधारना आता है ।
बुधवार, 29 जुलाई 2015
बामण्डा राजा सार् वासुदेव सुढ़लदेव एक संक्षिप्त परिचय प्रथम भाग
1890 अंग्रेजी साल मेँ 80 वर्ष का एक बृद्ध ,
कन्या पक्ष को 250 रु की लालच देकर के अपना व्याह रचाने जा रहा था ।
जिस कन्या के साथ वो शादी करनेवाला था उसका उम्र केवल मात्र 8 वर्ष था ।
किसी तरह ये बात बामण्डा राजा सार् वासुदेव सुढ़लदेव जी को पताचला ।
वे तुरंत वहाँ पहँचे और उस शादी पर रोक लगाया । यहाँतक कि उस बृद्ध व्यक्ति द्वारा उत्कोच दियेगये धन को कन्यापक्ष को देते हुए
बृद्ध व्यक्ति पर व्यग्यं के बाण चलाते हुए बामण्डा राजा ने कहा
"ये अपने बृद्धावस्ता मेँ शादी का यह मुकुट पहनकर क्या आप निकट भविष्य मेँ आनेवाली उस भयंकर मृत्यु को टाल जायेगेँ ? आप तो महायात्रा के यात्री है फिर ये क्षणीक मोह मेँ भला क्युँ घिरगये ???"
बृद्ध ये सुनकर निर्वाक हो गये लज्जित हो गये ! फिर
1893 मेँ बामण्डा (Sambalpur) राजा सार् बासुदेव सुढ़लदेव जी ने
अपने राज्य मेँ बृद्ध विवाह प्रथा निषिध कि थी !
1903 मेँ एक विज्ञप्ति के जरीये कन्या का सर्वनिम्न 12 वर्ष व वर का 14/15 वर्ष वाली कानुनी घोषणा किया गया था ।
अपने #चिलिका खण्डकाव्य मेँ ओड़िआ कवि राधानाथ राय जी नेँ वासुदेव सुढ़लदेवजी कि प्रशंसा करते हुए लिखते है
"Pahilani ghora taamsi jaamini
phutiba utkal bhasa kamalini
a ghora jamini abasaan sansi
kabyatara rupe bira
gangabansi
udile prathame
bamanda raajana
basudeb biswa kalyanbhajana "
वे एक परोपकारी राजा तथा ओड़िआ भाषा को अन्धकार से उजाले कि और ले जानेवाले प्रभावशाली कवि थे !
उन्होने हीँ परवर्ती साहित्य साधकोँ के लिये सारस्वत साधना हेतु प्रेरित किया था ।
नशीले द्रव्योँ पर उन्होने संबलपुर क्षेत्रमेँ निषेधाज्ञा लगया था । कम्भु खाँ नामसे एक कनेष्टस ने राज आदेश अवज्ञा की तो कार्य से निलम्बित किया गया तथा उसके खिलाफ संबलपुर हितैषिणी मेँ खास लेख छपाया गया था ।
ये संबादपत्र को कुछ आलोचक राजा जी का मानस पुत्र बताते है समाज को चीरजाग्रत करना था इसका परमोद्देश्य ।
सतीदाह प्रथा , कुलिप्रथा या दासत्वप्रथा , छृआँछुँत व जातपात जैसे सामाजिक व्याधी उन्मुलन के लिये बामण्डा राजा ने प्रयत्न किया था ।
उन दिनोँ दासत्वप्रथा के चपेट मेँ फाँसकर लोगोँ को सुदूर आसाम भेजदियाजाता था । सुढ़ळदेव वासुदेव जी ने पल्टिकाल एजेँटोँ से दासत्व प्रथा बंद कराने के लिये मजबुर करदिया ।
ख्रीस्तियन धर्मप्रचारक P.E. Heberlet का हिन्दुधर्म के प्रति भ्रान्त धारणाओँ का तिव्र समालोचना व खण्डन करते हुए उनकी सोच बदलने मेँ कामियाब हुए थे । उनदिनोँ उत्कल दिपिका पत्रिका मेँ ये लेख अंग्रेजी व ओड़िआ मेँ छपा था ।
बाद मेँ हेवर्लेट ने क्षमा याचना कि तो राजा ने उन्हे माफ करदिया था ।
मरहट्ट व अंग्रेजी राज काल मे संबलपुर क्षेत्र ओड़िआ माषा कम हिन्दी भाषा पर ज्यादा निर्भर करने लगा ।
वासुदेव सुढ़लदेव जी के चैष्टा के वजह से संबलपुर प्रान्त मेँ आज कुछ लोगोँ छोड़दिया जाय तो अधिकाँश लोग ओड़िआ भाषा समझते है ।
1872 मेँ राजा ने बामण्डा मेँ पहला विद्यालय कि स्थापना की थी और 1894 तक यहाँ 13 विद्यालय खुलचुके थे ।
1895 संबलपुर मेँ हिन्दी के बदले ओड़िआ को राजभाषा का दर्जा मिला तब मध्य ओड़िशा मेँ हर राजकाज अंग्रेजी हिन्दी मे हो रहा था ।
व्यासकवि फकीर मोहन सेनापति जी ने वासुदेव सुढ़ल देव जी के प्रंशसा मेँ "Abasara baasare" काव्य मेँ लिखा है
Bhasa joge chinna chinna thila ae utkal
bandhila aekata sutre tume hin kebal
kalpalata sammilani utkal desha re
prathama re uptabija tumbha hrudaya re
tumhara patrika labhiachi
uchastana
tumbhe aeka karijaan kabi nku sammana !
[[भावार्थ]]
भाषा आधार पर खण्ड खण्ड था ये उत्कल
बांधा एकता के सुत्र मेँ तुमने हीँ केवल
कल्पलता सम्मिलनी उत्कल देशे मे
प्रथम अंकुरोद्गम हुआ तुमरे मन मेँ
तुम्हारी पत्रिका को मिला सबसे उँचास्थान
तुम्हे ही जानते हो कैसे होता है कविका सम्मान ।
सम्बलपुर हितैषिणी के सँपादक विद्यारत्न द्वारा गढ़ागया गंजाम सम्मिलनी आगे चलकर उत्कल सम्मिलनी नामधारण पूर्वक ओड़िआ भाषा संस्कार रक्षक बनकर उभरता है ।
क्रमशः.....
शनिवार, 25 जुलाई 2015
उसने कहा था....
दरसल ये फिल्म इसी नामकी एक सर्ट स्टोरी को आधार बनाकर बनाया गया है जो 1915 मेँ सरस्वती पत्रिका मेँ प्रकाशित हुई थी । इस कृति नाम था "उसने कहा था" । ये कृति लिखी थी चंद्रधर शर्मा गुलेल जी नेँ ! बहुत फैमस हुई थी कहानी !
कहानी इतनी सी है....
एक गाँव है वहाँ नन्दु नामका गरीब लड़का रहता हे अपनी बिधवा माँ के साथ ।
वहीँ कमली रहती है कमली का परिवार किसी वजह से
माइग्रेट हो के अम्बाला चलाजाता हे और कुछ दिनबाद वापस लौटता है । तबतक कमली के लिये सफ्टकर्णर हो जाता है नन्दु के मनमेँ । जब नन्दु की माँ अपने बेटे का रिस्ता माँगने जाती है कमली के घर पे तो उन्हे अपमानित किया जाता है ।
नन्दु का दिल टुटजाता है....
वो इस कुण्ठा व फ्रस्टेसन मेँ आर्मी जोएन कर लेता है और जब लौटता हे तो उसे पताचलता है कि कमली की शादी कहीँ और हो गयी है......
ये निराशा ये दुःख ये पीडा उसके बर्दास्त के वाहर है....
उसी समय जंग छिडजाता है
और नंदु को भी युद्ध भूमि मेँ जाना पड़ता है
जाने से पहले कमली ,नन्दु से एक वादा लेती है ! कमली नन्दु को बताती है की उसका पति भी आर्मी मेँ हे और किसीभी किमत पर उसका जान बचायेँ !
युद्ध मेँ कमली के पति का जान बचाते बचाते नन्दु अपने जान पर खेलजाता है और जब कमली का पति नन्दु को इसका वजह पुछता है तो आखरी साँस लेते हुए नन्दु बस इतना कहता है
"उसने कहा था"...........
1.
इस फिल्म का एक गीत बड़ा मशहुर है इनदिनोँ च्युँकि बरसात का मौसम है रेड़िओ पर खुब बजाया जाता है
ये गीत है.....
"आहा रिम झिम के ये प्यारे प्यारे गीत लिये आयी रात सुहानी देखो प्रीत लिये....."
इस गीत को लिखा था शैलेन्द्र जी ने...,
कंपोज कियागया सलिल चौधरी जी द्वारा !
इस गीत को स्वर दिया था तलत् महम्मुद और लता मंगेश्कर जी ने..,
2.
एक और गीत है इसमेँ "मचलती आरजुँ खडी वाहेँ पसारे"...लता मंगेस्कर जी ने गाया था
3.
चलते ही जाना....मन्ना डे,महम्मद रफी
4.जानेवाले सिपाही से पुछो -मन्ना डे ,सविता बनार्जी
5."बल्खाती शर्माती आजा -
महम्मद रफी सविता बनार्जी
"उसने कहा था" फिल्म मेँ मुख्य भूमिका निभाया था
सुनिल दत्त (नन्दु) और नन्दा (कमली) जी ने वहीँ दुर्गा खोटे,
तरुन बोस,असित सेन,लीला मिश्रा,इन्द्रानी मुखर्जी,सरिता देवी,रशीद ख़ान,प्रवीन कौल,
बेबी शोभा
आदि ने भी इसमेँ अभिनय किया था ।
सोमवार, 20 जुलाई 2015
तुलसी एक विचार
Maa Goo Tulasi devi ,
Mule Tora #Ganga
Daale Tora #Bishnu
patre Devatanka Baasa
Se Patra Padile Manohi huaie Kahaie Golaka dasha !
कवि ने यहाँ पवित्र तुलसी वृक्ष की औषधीय गुणोँ को कुछ इस प्रकार कहा है !
"हे देवी तुलसी तुम्हारे जड़ोँ मेँ #गंगा अर्थात् अति पवित्र औषधीय तत्व है जो हर रोग को नाश करने मे सक्षम है ।
शाखाओँ मेँ #विष्णु ,पत्र मेँ देवता वास करते है । तेरे सभी अवयवोँ को साथ मिलाकर भी महोषधी बनाया जा सकता हे ।"
तुलसी जैसी पवित्र वृक्ष की रोपण पूजन तथा नित्य जलदान करके पत्र सेवन करना चाहिये इससे एक तो आपका मन शुद्ध होगा वहीँ स्वास्थ मेँ भी सुधार होगी ।
हाईस्कुल मेँ पढ़ते समय मेँ रोज दोपहर को स्कूल मेँ टिफिन करने के बाद 4 या 5 तुलसी पत्र खाया करता था...
मुझे उन तिन वर्षोँ मेँ कोई बड़ी विमारी जैसे सर्दी बुखार नहीँ हुआ था .....
#हिन्दु संस्कृति मेँ तुलसी पूजन एक अनुठा संस्कार है । गाँव देहात मेँ आज भी चवुतरा मेँ दिखजाती तुलसी का पौधा ! सहरोँ कि बात कर शायद ही इक्के दुक्के घरोँ मे गमला मेँ दिखजाय तो ठिक वरना
बजरंगी भाईजान....तुम महान हो
तुम्हारी महानता किसी #बाहुबली से कम नहीँ ।
तुमने #Pakistan मेँ बिना पासपोर्ट वीजा मेँ घुसकर दिखादिया कि तुममेँ कितना दम है ।
6 साल कि एक लड़की के लिये मसजीद मेँ चलेगये.....शुद्ध शाकाहारी होकर भी चिकेन खाने, खिलाने लगे
और #पाकिस्तान जाते ही तुम्हारा तो धर्म ही भ्रष्ट हो गया दुआ सलाम करने लगे !!!
लानत है तुम्हे ! पाकीओँ के संगत ने तुम्हे भी सेकुलार बनादिया ......
फिल्म की आखरी सीन मेँ कबीर खान ने एक मूक लड़की को एकाएक बोलते हुए दिखाया
और तो और पाकिस्तान मेँ फसे #बजरंगी को भारत भेजने के लिये पाकिस्तानीओँ को लढ़ते दिखाया !
क्या हो गया है तुम्हे कबीर ?
क्या तुम #LOC को जर्मनी का दिवार समझते हो ?
तुमने ये कैसे सोचलिया कि वर्षोँ से खीँच दि गई नफरत कि ये दिवार युँ हटजायेगा ?
#BajrangiBhaijaan पाकिस्थान जायेगा और भारी लोकप्रियता के साथ पाकिस्तानीओँ के मदद से भारत लौट आयेगा ?
क्या तुम जानते नहीँ की एक बार ये दिवार हटादिया जाय तो दोनोँ तरफ कितने लोग मरेगेँ , मारदिएजायेगेँ ?
क्या तुम्हे ये भी इल्म नहीँ की भारत व पाक मेँ लोग एक रोज खाना न खाये चलजायेगा परंतु आपसी नफरत के बिना एक पल भी गवारा नहीँ !....
आप सब कट्टरवादी मित्रोँ से अनुरोध है ये फिल्म न देखेँ ये आपको सौहार्द्य व भाईचारा का विष पिलाकर कमजोर बनादेगा ।
दोनोँ मुल्कोँ मेँ आपसी नफरत कायम रहे ,हैवानियत के मामले मे हम दुनियामेँ टप पर रहेँ ....बस यही दुआ करता हुँ प्राथना करता हुँ....