पाण्डवोँ कि अज्ञातवासको विफल करनेके लिये दूर्योधन
मामाशकुनीसे विचारविमर्श करते और उनके कहे अनुसार
पुरोचनपुत्र गौरमुखको पाण्डवोँको खोजने के लिये नियुक्त करते है ....
जाने से पूर्व गौरमुख को मामाशकुनी कह रहे है.....
कि...
जो भी व्यक्तिविशेष तुम्हारे द्वारा माँग करने पर आश्वीन्माह मे आम्रफलला देगेँ उन्हे तुम पाण्डवही समझना !
चारमाह तक खोजने पर अन्ततः गौरमुख को पाण्डव अस्कन्दवनमे मिलजाते और वो उनके अतिथि बनते है !!!
अतिथि ब्राह्मण वेशधारी गौरमुख युधिष्ठिरको परिपक्व आम्र फल माँगते है
ये सुनकर युधिष्ठिर चिन्तित हो जाते ....
ये जानते हुए भी कि असमयमे आम्रफल नहीँ मिलेगा ,जैष्ठ पण्डुपुत्र उनके सभी अनुज भ्राताओँ को आम लाने के लिये भेजदेते है !
हालाँकि लाख प्रयत्न करने पर भी अनुजोँ को आम्रफल नहीँ मिलपाता केबल मात्र एक
गुठली ही मिलता है ....
अन्त मे युधिष्ठिर समेत पँचपाण्डव श्रीकृष्णको स्मरण करते और उन्हे साक्षात मानकर सत्य करते है !!!
उनके सत्य करने पर वो गुठली से पौधा और पौधे से वृक्ष मे रुपान्तरित होता है..,
और
देखते ही देखते वो वृक्ष कच्चे आम्रफलोँ से लद जाता है ....
फिर देवीदौपदी सत्य करती है....
उनके सत्य करते ही आम्रफल परिपक्व हो जाते....
युधिष्ठिर आम्रफल ब्राह्मणवेशधारीगौरमुख को प्रदान करते है
तब छद्म ब्राह्मण कहते है कि वे स्नान पश्चात इसे भक्षण करेगेँ और मौका देखकर वाहाँ से निकल लेते है ।
अब कृष्ण तो कृष्ण है.....
उनके नज़र से कौन बचपाया है.... !!!
रस्ते मे मायावी अपने माया के बल पर गौरमुख को मोह मे ड़ाल देते और उससे आम्रफल को चुरा ले जाते...
Source-Sarla Mahabharat
[[ओड़िआ भाषा के आदिकवि सारलादासजी ने पंद्रहवी सदी मे ओड़िआ महाभारत लिखा था....ओड़िआ महाभारत व्यास रचित महाभारत का कार्बन कॉपि नहीँ है....इस ग्रंथ मे कवि ने कई उत्कलीय कथा कहानीओँ को भी सामिल किया है...]]
मेँ अपने मन का दास कलम का कर्मचारी हुँ जो मन मेँ आया लिखदिया । कोई पागल कहे तो मुझे क्या ? कहता है तो कहने दो ।।
ब्लॉग आर्काइव
मंगलवार, 22 दिसंबर 2015
शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015
क्षमा अवतार महर्षि पराशर
त्रेतायुग मे राजा त्रिशंकु के यज्ञ मंडप पर राजर्षी विश्वामित्र व महर्षि वशिष्ट पुत्र #शक्ति मे आपसी कलह हो जाता है ।
इससे क्रोधावेश मेँ आकर ऋषि विश्वामित्र बशिष्ट पुत्र नाश का भयानक श्राप दे देते है ।
श्राप के प्रभाव के चलते शक्ति समस्त वशिष्ट पुत्र दैत्योँ के हातोँ मारे जाते ।
ऐसी ही दुःखद परिस्तीति मे शक्ति कि पत्नी को एक पुत्ररत्न कि प्राप्ति होता है ।
महर्षि वशिष्ट उनका नाम #पराशर रखते है ।
बड़े होने पर एक दिन पराशर को यह पुरानी बात ज्ञात हो जाता है ।
लक्षप्राप्ति के लिये पराशर सदाशिव कि घोर तपस्या करते है और सिद्धि लाभ करलेने के पश्चात् वो विश्व विनाश कि तैयारीओँ मे लगजाते !
परंतु महर्षि वशिष्ट उन्हे ऐसा करने से रोकते है वो पराशर जी को जीव कल्याण माधव कल्याण का सुउपदेश देते हे ।
हालाँकि पराशर राक्षस सत्र यज्ञ आयोजन करते है इससे एक एक करके राक्षसोँ का यज्ञ मे मौत हेने लगता है ।
महर्षी वशिष्ट को जब इसबात का पताचलता है वे यज्ञस्थली मे आकर के अपने पौत्र को क्षमावान होने का उपदेश देते है । इससे महर्षी पराशर राक्षस सत्र यज्ञ को रोकते हुए दैत्योँ को क्षमा करदेते है !
तभी वहाँ राक्षस कुल के परम प्रशिद्ध मुनि पुस्य का आगमन होता है ।
वे महर्षी पराशर कि क्षमाशीलता से खुश हो उन्हे विष्णुभक्त होने का आशिर्वाद देते है ।
आगे चलकर विशिष्ट पौत्र महर्षि पराशर विष्णुपुराण कि रचना करते है ।
इससे क्रोधावेश मेँ आकर ऋषि विश्वामित्र बशिष्ट पुत्र नाश का भयानक श्राप दे देते है ।
श्राप के प्रभाव के चलते शक्ति समस्त वशिष्ट पुत्र दैत्योँ के हातोँ मारे जाते ।
ऐसी ही दुःखद परिस्तीति मे शक्ति कि पत्नी को एक पुत्ररत्न कि प्राप्ति होता है ।
महर्षि वशिष्ट उनका नाम #पराशर रखते है ।
बड़े होने पर एक दिन पराशर को यह पुरानी बात ज्ञात हो जाता है ।
लक्षप्राप्ति के लिये पराशर सदाशिव कि घोर तपस्या करते है और सिद्धि लाभ करलेने के पश्चात् वो विश्व विनाश कि तैयारीओँ मे लगजाते !
परंतु महर्षि वशिष्ट उन्हे ऐसा करने से रोकते है वो पराशर जी को जीव कल्याण माधव कल्याण का सुउपदेश देते हे ।
हालाँकि पराशर राक्षस सत्र यज्ञ आयोजन करते है इससे एक एक करके राक्षसोँ का यज्ञ मे मौत हेने लगता है ।
महर्षी वशिष्ट को जब इसबात का पताचलता है वे यज्ञस्थली मे आकर के अपने पौत्र को क्षमावान होने का उपदेश देते है । इससे महर्षी पराशर राक्षस सत्र यज्ञ को रोकते हुए दैत्योँ को क्षमा करदेते है !
तभी वहाँ राक्षस कुल के परम प्रशिद्ध मुनि पुस्य का आगमन होता है ।
वे महर्षी पराशर कि क्षमाशीलता से खुश हो उन्हे विष्णुभक्त होने का आशिर्वाद देते है ।
आगे चलकर विशिष्ट पौत्र महर्षि पराशर विष्णुपुराण कि रचना करते है ।
गुरुवार, 26 नवंबर 2015
लोरी.....
रात का वक्त है नयी नयी माँ बनी गाँव कि कन्याएँ बहनेँ माताओँ का फिक्र तबतक कम नहीँ होता जबतक उसका राजा बैटा चैन कि नीँद सो नहीँ जाता ।
और बचेँ भी बड़े प्यारे होते है
तब तक रोते रहेगेँ जबतक माँ लोरी न सुना देँ
अब
बच्चा जब रोता हे माँ उसे # लोरीसुनाती और बच्चे शान्त हो जाते । लोरी
संस्कृत भाषा कि लोळ (लोल) शब्द का परिवर्तित रुप है । ज्यादातर भाषाविद मानते कि लोल से लोली हुआ और फिर लोरी हुआ होगा !
लोरी को
अंग्रेजी मे Nursery rhyme कहाजाता है ।
रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस तरह के गीतोँ को
"छेले भुलानो छड़ा" कहा
वहीँ सम्बलपुरी या कोशली भाषा मे इसे "छुआ भुरुआ गीत" कहाजाता है ।
ऐसा नहीँ है कि
Nursery rhyme शब्द का ओड़िआ समकक्ष शब्द नहीँ था...
था परंतु ज्यादातर स्थानीय लोग इन गीतोँ को शिशु गीत या बाल गीत कहाकरते थे । आज 100 से 150 साल पहले ओड़िआ
पल्लीकवि नन्दकिशोर वल ने इन गीतोँ को # नानावाया_गीतकहा जो ओड़िशा मे अब सर्वाधिक प्रचलित शब्द बनाहुआ है ।
लोल शब्द का संस्कृत अर्थ बच्चोँ को झुलाना नचाना आदि है
वैसे हिन्दीभाषी लोग लोरी को पालने के गीत भी कहते है ।
असाम मे इसे नीचुकानि गीत व धावर काम कहाजाता है ।
और बचेँ भी बड़े प्यारे होते है
तब तक रोते रहेगेँ जबतक माँ लोरी न सुना देँ
अब
बच्चा जब रोता हे माँ उसे # लोरीसुनाती और बच्चे शान्त हो जाते । लोरी
संस्कृत भाषा कि लोळ (लोल) शब्द का परिवर्तित रुप है । ज्यादातर भाषाविद मानते कि लोल से लोली हुआ और फिर लोरी हुआ होगा !
लोरी को
अंग्रेजी मे Nursery rhyme कहाजाता है ।
रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस तरह के गीतोँ को
"छेले भुलानो छड़ा" कहा
वहीँ सम्बलपुरी या कोशली भाषा मे इसे "छुआ भुरुआ गीत" कहाजाता है ।
ऐसा नहीँ है कि
Nursery rhyme शब्द का ओड़िआ समकक्ष शब्द नहीँ था...
था परंतु ज्यादातर स्थानीय लोग इन गीतोँ को शिशु गीत या बाल गीत कहाकरते थे । आज 100 से 150 साल पहले ओड़िआ
पल्लीकवि नन्दकिशोर वल ने इन गीतोँ को # नानावाया_गीतकहा जो ओड़िशा मे अब सर्वाधिक प्रचलित शब्द बनाहुआ है ।
लोल शब्द का संस्कृत अर्थ बच्चोँ को झुलाना नचाना आदि है
वैसे हिन्दीभाषी लोग लोरी को पालने के गीत भी कहते है ।
असाम मे इसे नीचुकानि गीत व धावर काम कहाजाता है ।
दास्तान ए रघुनाथ दास
ओड़िशा मेँ एक कवि हुए है श्री रघुनाथ दास जी ! ये बड़े मजाकिआ शख्सियत वाले व्यक्ति मानेजाते है ।
1938 के दिनो मे रेवेन्सा कलेजिएट स्कुल मेँ पढ़ते समय
कवि महोदय अपने कौतकप्रिय कारनामोँ के लिये पुरे छात्रावास मेँ फैमस हो गये थे ।
उनका एक सहपाठी हुआ करता था सोमनाथ ! उसका नया नया रेवेन्सा मेँ दाखिला हुआ ! उस विचारे कि बकरी टाईप दाढ़ी थी इसलिये उन्हे छात्रावास मेँ बकरीमानव उपनाम दिया गया ! चंद दिनोँ मे ये उपनाम बदलकर सोमु बकरी हो गया ।
छात्रोँ के चिढ़ाने से सोमनाथ काफी परेशान हो गया था । राहुल गांधी कि भाँति रोज नये नये उपनाम बनाया जा रहा था । अब तो सोमनाथ बकरी नाम से ही चिढ़ने लगा था ।
अंततः उसे पताचला कि इन सबके पिछे रघुनाथ दास का दिमाग है ।
एक दिन रघुनाथ से हार कर उनसे संद्धि के लिये विवश हुए सोमनाथ बाबु ।
मध्यस्त बने वृन्दावन आचार्य मृत्युजंय पण्डा व अन्य साथी ।
तय हुआ सोमनाथ पुरे छात्रवास को उनके मनमाफिक रसगुला खिलाएगा बदले मेँ छात्रवास के छात्र उसे बकरी कहकर चिढ़ाना बंद करेगेँ ।
अब रसगोला खा के छात्रावास के लोँडे वापस लौट रहे थे संयोगवश तभी एक बकरी छात्रावास कि दिवार चढ़ने कि कोशिश करती पायी गयी ।
रघुनाथ को मजाक सुझा
वे सोमनाथ को बकरी दिखा कर कहने लगे
देखो सोमु मैँ वचनवद्ध हुँ अतः बकरी नहीँ कहुगाँ
अफ इस दाढ़ीवाले जीव को तुम वाघ समझो
इस बात से पुरा छात्रावास ठहाका मारकर हँसने लगा
इस बात से सोमनाथ फिर चिढ़गया !
वर्षोँ वाद रघुनाथ व सोमनाथ वकालत करने लगे । एक केस मे उनका आमना सामना हुआ ।
रघुनाथ का आदमी निर्दोष था वहीँ सोमनाथ सरकारी वकील ।
केस मे सोमनाथ का पलड़ा भारी था ।
किन्तु रघुनाथ भी कम चालाक नहीँ थे उन्हे सोमनाथ कि बकरीवाली कमजोरी याद थीँ ।
उन्होने साक्ष को कहा जब सरकारी वकील पुछेगा ‘ कहाँ गया था ’ कहना ‘गरीब आदमी हुँ साव, बकरी चराने गया था ।’ । कोर्ट मेँ सोमनाथ ने साक्ष से पुछताछ कि तो उसने बकरी चराने जाने कि बात कह दी !
बकरी का नाम सुनते ही सोमनाथ आग वबुला हो गये
और साक्ष को देने लगे गाली !
वेचारा जर्ज भी हैरान आखिर ये माजरा क्या है ।
सिर्फ क्रोध के कारण जीता हुआ केस हारना पड़ा था सोमनाथ को । क्रोध व आवेश मेँ आकर वे सटिक तर्क नहीँ कर सके और रघुनाथ जी से केस हार गये थे ।
रघुनाथजी ने अपने जीवनकाल मे वकालात करने के अलावा कई सर्ट स्टोरी ,कविता व प्रबन्ध लिखे है और मुझे उनके द्वारा लिखागया August pandara
दिर्घ कविता तथा Kaha re gacha kahinki malu सर्ट स्टोरी पसंद है ।
कम्युनिष्ट विचारधारावाले इस कवि ने हर मतवाद का समर्थन किया व भागलिया वे भूदान आन्दोलन
तथा छात्र जीवन मे स्वतंत्रता संग्राम से भी जुडे थे ।
1938 के दिनो मे रेवेन्सा कलेजिएट स्कुल मेँ पढ़ते समय
कवि महोदय अपने कौतकप्रिय कारनामोँ के लिये पुरे छात्रावास मेँ फैमस हो गये थे ।
उनका एक सहपाठी हुआ करता था सोमनाथ ! उसका नया नया रेवेन्सा मेँ दाखिला हुआ ! उस विचारे कि बकरी टाईप दाढ़ी थी इसलिये उन्हे छात्रावास मेँ बकरीमानव उपनाम दिया गया ! चंद दिनोँ मे ये उपनाम बदलकर सोमु बकरी हो गया ।
छात्रोँ के चिढ़ाने से सोमनाथ काफी परेशान हो गया था । राहुल गांधी कि भाँति रोज नये नये उपनाम बनाया जा रहा था । अब तो सोमनाथ बकरी नाम से ही चिढ़ने लगा था ।
अंततः उसे पताचला कि इन सबके पिछे रघुनाथ दास का दिमाग है ।
एक दिन रघुनाथ से हार कर उनसे संद्धि के लिये विवश हुए सोमनाथ बाबु ।
मध्यस्त बने वृन्दावन आचार्य मृत्युजंय पण्डा व अन्य साथी ।
तय हुआ सोमनाथ पुरे छात्रवास को उनके मनमाफिक रसगुला खिलाएगा बदले मेँ छात्रवास के छात्र उसे बकरी कहकर चिढ़ाना बंद करेगेँ ।
अब रसगोला खा के छात्रावास के लोँडे वापस लौट रहे थे संयोगवश तभी एक बकरी छात्रावास कि दिवार चढ़ने कि कोशिश करती पायी गयी ।
रघुनाथ को मजाक सुझा
वे सोमनाथ को बकरी दिखा कर कहने लगे
देखो सोमु मैँ वचनवद्ध हुँ अतः बकरी नहीँ कहुगाँ
अफ इस दाढ़ीवाले जीव को तुम वाघ समझो
इस बात से पुरा छात्रावास ठहाका मारकर हँसने लगा
इस बात से सोमनाथ फिर चिढ़गया !
वर्षोँ वाद रघुनाथ व सोमनाथ वकालत करने लगे । एक केस मे उनका आमना सामना हुआ ।
रघुनाथ का आदमी निर्दोष था वहीँ सोमनाथ सरकारी वकील ।
केस मे सोमनाथ का पलड़ा भारी था ।
किन्तु रघुनाथ भी कम चालाक नहीँ थे उन्हे सोमनाथ कि बकरीवाली कमजोरी याद थीँ ।
उन्होने साक्ष को कहा जब सरकारी वकील पुछेगा ‘ कहाँ गया था ’ कहना ‘गरीब आदमी हुँ साव, बकरी चराने गया था ।’ । कोर्ट मेँ सोमनाथ ने साक्ष से पुछताछ कि तो उसने बकरी चराने जाने कि बात कह दी !
बकरी का नाम सुनते ही सोमनाथ आग वबुला हो गये
और साक्ष को देने लगे गाली !
वेचारा जर्ज भी हैरान आखिर ये माजरा क्या है ।
सिर्फ क्रोध के कारण जीता हुआ केस हारना पड़ा था सोमनाथ को । क्रोध व आवेश मेँ आकर वे सटिक तर्क नहीँ कर सके और रघुनाथ जी से केस हार गये थे ।
रघुनाथजी ने अपने जीवनकाल मे वकालात करने के अलावा कई सर्ट स्टोरी ,कविता व प्रबन्ध लिखे है और मुझे उनके द्वारा लिखागया August pandara
दिर्घ कविता तथा Kaha re gacha kahinki malu सर्ट स्टोरी पसंद है ।
कम्युनिष्ट विचारधारावाले इस कवि ने हर मतवाद का समर्थन किया व भागलिया वे भूदान आन्दोलन
तथा छात्र जीवन मे स्वतंत्रता संग्राम से भी जुडे थे ।
दक्षिण भारतीय वीरा जिसने अंग्रेजो मुँह कि खाने को मजबुर करदिया था....
दक्षिण भारत मे जन्मे स्वतंत्रता सेनानीओँ मेँ वीरा मंगाई भेलुनाचैयार Veera_Mangai_Ve lunachiyar देवी का नाम आदर सहित लिया जाता है ! 18वी सदी मे इस नारी नेत्री ने अंग्रेजोँ के खिलाफ विद्रोह किया था !
1730 AD मे उनका जन्म रमनांड [Ramnad] राज्य मे हुआ था । उनके पिता थे महाराजा मन्नार सेल्लामुथ्थु सेथ्थुपाथ्थी व माता रानी सकन्दिमुथ्थाल ! च्युँकि राज दंपति कि वो इकल्लौति कन्या थी राजघराने द्वारा उन्हे नमनाँड क्षेत्र का युवराज्ञी अभिषिक्त किया गया । भल्लारी युद्ध कला मे निपुण राजकन्या को तीरदांजी घोड़ सबारी के साथ साथ विदेशी भाषाओँ का भी ज्ञान था । युवाकाल मे उनका विवाह Sivagangai Mannar Muthuvaduganathar के साथ करदिया गया । इसबीच जैसे तैसे उनका जीवन सुखमय बीत रहा था । 1772 मे उनके राज्य पर अँग्रेज आक्रमण हुआ । L.t Col. Bon jour के सेनापतित्व मे अंग्रेजोँ ने Kalaiyar koil war छेड़ दिया । इस युद्ध मे उनके पति Raja Muthu Vaduganathar व कन्या राजकुमारी Gowri Nachiyar वीरगति को प्राप्त हुए । यह युद्ध कलैयार कोली राजप्रासाद सन्निकट हुआ था । . इस लढ़ाई मे रानी सुरक्षित बच निकली वहीँ उनके दोनोँ भाई लहुलुहान हुए । राजघराने के बचे सदस्योँ ने कसम खाया कि वो अंग्रेजोँ को उचित शिक्षा देने के साथ साथ अपने राज्य पर पुनः प्रभुत्व स्थापित करेगे । रानी को उनके विश्वासी भरोसेमंद महामंत्री Dalavay Thandavaraya Pillai जी ने सुरक्षा दृष्टि से वो स्थान छोड़ ने को . वहीँ महामंत्री ने Sultan Hyder Ali से रानी Velu Nachiyar कि सुरक्षा हेतु 5000 सैन माँगा था हैदर अली ने सहायता तो भेजदिया परंतु वे उनके साथ मिलकर अंग्रेजोँ के फिलाफ लढ़नहीँ पाए बुढ़ापे के कारण सुलतान हैदर अली चल वसे । हालाँकि बाद मे रानी को हैदर अली के पुत्र द्वारा हरसंभव सहायता मिला । हैदर अली ने पहले ही Syed Karki को Dindigul fort मेँ रानी कि मदद के लिये भेजदिया था । हैदर अलि के पुत्र व मराथु भाईओँ के मदद से रानी ने Sivaganga प्रदेश पर हमला कर दिया । अंग्रेजोँ द्वारा गद्दि पर बिठाये गये अरकट के नवाव रानी भेलु से हार गये और अपने राज्य को पुनः प्राप्त करने के वजह से रानी को Sivagangai seemai की उपाधी मिली ! रानी. Velu Nachiyar प्रथम भारतीय शासिका थी जिन्होने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह किया था और उन्हे जीत भी मिली थी ! Prof.Sanjeevi जी ने अपने ऐतिहासिक किताब Maruthiruvar’ मे लिखा है
रानी Velu Nachiyar ने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ रानी लक्ष्मीवाई से 85 वर्ष पूर्व जंग लढ़ी थी और उन्हे इसमे अभुत पूर्व सफलता भी हासिल हुआ था । वहीँ इतिहासकार Venkatam नेँ रानी Velu Nachiyar कि प्रंशसा करते हुए उन्हे भारत कि Joan of Arc. तक कहा है ।
ऐसे वीरागंनाओँ को मेरा सत् सत् नमन.....
जय माँ भारती
एक भारत समृद्ध भारत
1730 AD मे उनका जन्म रमनांड [Ramnad] राज्य मे हुआ था । उनके पिता थे महाराजा मन्नार सेल्लामुथ्थु सेथ्थुपाथ्थी व माता रानी सकन्दिमुथ्थाल ! च्युँकि राज दंपति कि वो इकल्लौति कन्या थी राजघराने द्वारा उन्हे नमनाँड क्षेत्र का युवराज्ञी अभिषिक्त किया गया । भल्लारी युद्ध कला मे निपुण राजकन्या को तीरदांजी घोड़ सबारी के साथ साथ विदेशी भाषाओँ का भी ज्ञान था । युवाकाल मे उनका विवाह Sivagangai Mannar Muthuvaduganathar के साथ करदिया गया । इसबीच जैसे तैसे उनका जीवन सुखमय बीत रहा था । 1772 मे उनके राज्य पर अँग्रेज आक्रमण हुआ । L.t Col. Bon jour के सेनापतित्व मे अंग्रेजोँ ने Kalaiyar koil war छेड़ दिया । इस युद्ध मे उनके पति Raja Muthu Vaduganathar व कन्या राजकुमारी Gowri Nachiyar वीरगति को प्राप्त हुए । यह युद्ध कलैयार कोली राजप्रासाद सन्निकट हुआ था । . इस लढ़ाई मे रानी सुरक्षित बच निकली वहीँ उनके दोनोँ भाई लहुलुहान हुए । राजघराने के बचे सदस्योँ ने कसम खाया कि वो अंग्रेजोँ को उचित शिक्षा देने के साथ साथ अपने राज्य पर पुनः प्रभुत्व स्थापित करेगे । रानी को उनके विश्वासी भरोसेमंद महामंत्री Dalavay Thandavaraya Pillai जी ने सुरक्षा दृष्टि से वो स्थान छोड़ ने को . वहीँ महामंत्री ने Sultan Hyder Ali से रानी Velu Nachiyar कि सुरक्षा हेतु 5000 सैन माँगा था हैदर अली ने सहायता तो भेजदिया परंतु वे उनके साथ मिलकर अंग्रेजोँ के फिलाफ लढ़नहीँ पाए बुढ़ापे के कारण सुलतान हैदर अली चल वसे । हालाँकि बाद मे रानी को हैदर अली के पुत्र द्वारा हरसंभव सहायता मिला । हैदर अली ने पहले ही Syed Karki को Dindigul fort मेँ रानी कि मदद के लिये भेजदिया था । हैदर अलि के पुत्र व मराथु भाईओँ के मदद से रानी ने Sivaganga प्रदेश पर हमला कर दिया । अंग्रेजोँ द्वारा गद्दि पर बिठाये गये अरकट के नवाव रानी भेलु से हार गये और अपने राज्य को पुनः प्राप्त करने के वजह से रानी को Sivagangai seemai की उपाधी मिली ! रानी. Velu Nachiyar प्रथम भारतीय शासिका थी जिन्होने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह किया था और उन्हे जीत भी मिली थी ! Prof.Sanjeevi जी ने अपने ऐतिहासिक किताब Maruthiruvar’ मे लिखा है
रानी Velu Nachiyar ने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ रानी लक्ष्मीवाई से 85 वर्ष पूर्व जंग लढ़ी थी और उन्हे इसमे अभुत पूर्व सफलता भी हासिल हुआ था । वहीँ इतिहासकार Venkatam नेँ रानी Velu Nachiyar कि प्रंशसा करते हुए उन्हे भारत कि Joan of Arc. तक कहा है ।
ऐसे वीरागंनाओँ को मेरा सत् सत् नमन.....
जय माँ भारती
एक भारत समृद्ध भारत
गोपाल कि दीर्घशंका थिओरी
आज से कुछ चारसौ पाँचसौ साल पहले पूर्वोत्तरभारत मे गोपाल नामधेय एक चतुर व्यक्ति का जन्म हुआ था ।
वो बड़े चालक चतुर व्यक्तिओँ मे से एक थे
और अपने इसी चालाकी के चलते गोपाल को राजा कृष्णचंद्र देव ने राजसभा का विदूषक नियुक्त किया था ।
एक दिन सभा कार्य चल रहा था
तभी राजा के मनमे एकाएक एक प्रश्न उदय हुआ....
"मानव को सबसे अधिक खुसी कब होती है ?"
काफी तर्क वितर्क के बाद भी कोई निष्कर्ष नहीँ निकल पाया...
उसदिन गोपाल राजसभा मे अनुपस्थित याने आपसेँट थे....
अगले दिन गोपाल राजसभा मे राजाजी से मिलने आये तो
राजाने ये प्रश्न पुछ ही लिया....
गोपाल ने प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा
" दीर्घशंका कर लेने के पश्चात् सबसे अधिक खुशी का अनुभव होता है "
राजा का चेहरा गुस्से से लाल हो गया
भला इस आदमी को खाने और छोड़ने के अलावा कोई काम नहीँ सुझता क्या ?
राजा वौखलाये गोपाल को बुराभला कहा और वहाँ से उठकर चलेगये
गोपाल ने राजाजी का मुडअफ् देख माफी माँग ली
व आप चिन्तित मन घर लौटे....
आखिर ऐसा क्या किया जाय....?
कि राजा को ये बात समझ आये.....
बहुत सोचविचार बाद गोपाल को एक ब्रिलिएंट आइडिया आया
एकदिन राजा जी को जैसे तैसे बातोँ मे फँसा कर विदूषक गोपाल चित्रोत्पला नदी मे जलविहार करने ले गये !
राजा जी को भरपेट खिलाया जाय इसका प्रवन्ध किया गया था ।
अब जलविहार करते करते राजा को बीच मझधार मेँ ही तेज 2 नं लगगया
नौका मेँ एकतरफ राजा झटपटा रहे है वहीँ गोपाल जानबुझकर नाव को किनारे तक जाने नहीँ दे रहे थे ।
अन्ततः गोपाल ने नाव किनारे पर लगा लिया
और राजा औन्धे मुँह झाडिओँ मे चलेगये
दिर्घशंका के पश्चात् राजा बड़े
हर्षित् हो लौट रहे थे तभी
गोपाल उनके पास पहचँकर कहने लगा
राजाजी अब आपको कितना खुसी महशुश हो रहा है ????
राजा गोपाल का आशय समझ जाते है और उन्हे प्रशंसाओँ के साथ स्वर्णमूद्राओँ से भरा थैली देते है !!!
[ये प्रसंग 'गोपालिआ भांड कथा' पुस्तक से लिया गया है !!
गोपाल किरदार दरसल तेनालीरामन् का ओड़िआ वर्जन है , "गोपाल" किरदार # उत्कलीयकथा # साहित्यका सर्वत्र परिचित प्रशिद्ध काल्पनीक चरित्रोँ मे से एक है]
वो बड़े चालक चतुर व्यक्तिओँ मे से एक थे
और अपने इसी चालाकी के चलते गोपाल को राजा कृष्णचंद्र देव ने राजसभा का विदूषक नियुक्त किया था ।
एक दिन सभा कार्य चल रहा था
तभी राजा के मनमे एकाएक एक प्रश्न उदय हुआ....
"मानव को सबसे अधिक खुसी कब होती है ?"
काफी तर्क वितर्क के बाद भी कोई निष्कर्ष नहीँ निकल पाया...
उसदिन गोपाल राजसभा मे अनुपस्थित याने आपसेँट थे....
अगले दिन गोपाल राजसभा मे राजाजी से मिलने आये तो
राजाने ये प्रश्न पुछ ही लिया....
गोपाल ने प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा
" दीर्घशंका कर लेने के पश्चात् सबसे अधिक खुशी का अनुभव होता है "
राजा का चेहरा गुस्से से लाल हो गया
भला इस आदमी को खाने और छोड़ने के अलावा कोई काम नहीँ सुझता क्या ?
राजा वौखलाये गोपाल को बुराभला कहा और वहाँ से उठकर चलेगये
गोपाल ने राजाजी का मुडअफ् देख माफी माँग ली
व आप चिन्तित मन घर लौटे....
आखिर ऐसा क्या किया जाय....?
कि राजा को ये बात समझ आये.....
बहुत सोचविचार बाद गोपाल को एक ब्रिलिएंट आइडिया आया
एकदिन राजा जी को जैसे तैसे बातोँ मे फँसा कर विदूषक गोपाल चित्रोत्पला नदी मे जलविहार करने ले गये !
राजा जी को भरपेट खिलाया जाय इसका प्रवन्ध किया गया था ।
अब जलविहार करते करते राजा को बीच मझधार मेँ ही तेज 2 नं लगगया
नौका मेँ एकतरफ राजा झटपटा रहे है वहीँ गोपाल जानबुझकर नाव को किनारे तक जाने नहीँ दे रहे थे ।
अन्ततः गोपाल ने नाव किनारे पर लगा लिया
और राजा औन्धे मुँह झाडिओँ मे चलेगये
दिर्घशंका के पश्चात् राजा बड़े
हर्षित् हो लौट रहे थे तभी
गोपाल उनके पास पहचँकर कहने लगा
राजाजी अब आपको कितना खुसी महशुश हो रहा है ????
राजा गोपाल का आशय समझ जाते है और उन्हे प्रशंसाओँ के साथ स्वर्णमूद्राओँ से भरा थैली देते है !!!
[ये प्रसंग 'गोपालिआ भांड कथा' पुस्तक से लिया गया है !!
गोपाल किरदार दरसल तेनालीरामन् का ओड़िआ वर्जन है , "गोपाल" किरदार # उत्कलीयकथा # साहित्यका सर्वत्र परिचित प्रशिद्ध काल्पनीक चरित्रोँ मे से एक है]
ओड़िशा के दशरथ
विहारके दशरथ_माँझीने कड़ी महनत और लगन के बलपर उनके गाँव सन्निकट पर्वत खोद कर रस्ता निकाल दिया था...
मिलिये ओड़िशाके दशरथ_पट्टनायकजी से.....
ओड़िशा_पाठागार_आ ंदोलन
के प्रवर्त्तक , प्रवाद पुरुष . प्रख्यात् संग्राहक व सारस्वत साधक श्री दशरथ पट्टनायक जी का जन्म नयागड़ जिल्ला पर 1907 को एक साधारण परिवार मे हुआ था !
ओड़िआलोग उन्हे प्यार से दाशिआ_अजा
[ओड़िआ शब्द अजा का अर्थ नानाजी है]
कह कर पुकारते है ।
वे ओड़िशा मे उनदिनोँ इतने प्रसिद्ध हुए कि उनके नामसे कहावत तक बन गया था !
"Dasa paisa ra raja dasiaa ajaa" [दश पैसे का राजा दाशिआ अजा या नानाजी]
वे सिर्फ 4थी कक्षा तक पढ़पाए थे । अंग्रेजीराज के समय उन्होने कई सरकारी नौकरी भी कि परंतु दशरथ नानाजी का मन नौकरी मेँ सन्तुष्ट न था !!
अन्ततः एक दिन वे सबकुछ छोड़छाड़कर अपने पाहाड़ी अनुर्वर गाँव लौट आये और खेतिबाड़ी आदि करते हुए साधारण किसान का जीवन बिताने लगे ।
उनदिनोँ दशरथ नानाजी को दोपहर मेँ किताबेँ पढ़ने शौक चढ़ा था ! इसी
किताब पढ़ने कि शौक से जन्म हुआ पुस्तक_भिक्षाका ओड़िशा यात्रा !
अर्धवस्त्रधारी रुप ,एक आँख खो चुके ,हाथ मेँ लाठी कन्धे पे झोला और आँखो मेँ सपने लिये
ओड़िशा के गाँव देहात सहर नगर का भ्रमण करते हुए नये पुरातन पुस्तक संग्रह करना उनका अब जीवन व्रत बनगया था । वे
जीवन के अवसर समय मेँ सारस्वत साधक बनगये थे ऐसा आजतक बहुत कम लोग करपाए है ।
रोज बड़े बड़े कवि लेखकोँ चिट्ठी पत्री लिखके उन्हे पुस्तक संग्रह_आंदोलन मे सामिल करने मे सफल हो पाए थे दशरथ नानाजी ।
उन्ही के प्रयाश से उदयपुर ,नयागड़ मे जातीय पाठागार ,संग्रहालय ,साहित्य संसद तथा गवेषणाकेन्द्र कि स्थापना हुई थी ।
उदयपुर स्थित जातीय पाठागार मे इस समय 1 लाख से अधिक नये पुरातन पुस्तकोँ के साथ साथ 42 विभागोँ मे शताधिक ताड़पत्र पोथी आदि संग्रृहित है ।
जाते जाते वे "दीपक ट्रष्ट" कि स्थापना कर 1997 मे दुनिया छोड़ गये थे ।
बर्तमान नयागड़ जिल्लापाल दशरथ नाना के सुयोग्य नाती इस ट्रष्ट के अध्यक्ष है । पुस्तक संग्रह इस ट्रष्ट का परम उद्देश्य है । —
मिलिये ओड़िशाके दशरथ_पट्टनायकजी से.....
ओड़िशा_पाठागार_आ ंदोलन
के प्रवर्त्तक , प्रवाद पुरुष . प्रख्यात् संग्राहक व सारस्वत साधक श्री दशरथ पट्टनायक जी का जन्म नयागड़ जिल्ला पर 1907 को एक साधारण परिवार मे हुआ था !
ओड़िआलोग उन्हे प्यार से दाशिआ_अजा
[ओड़िआ शब्द अजा का अर्थ नानाजी है]
कह कर पुकारते है ।
वे ओड़िशा मे उनदिनोँ इतने प्रसिद्ध हुए कि उनके नामसे कहावत तक बन गया था !
"Dasa paisa ra raja dasiaa ajaa" [दश पैसे का राजा दाशिआ अजा या नानाजी]
वे सिर्फ 4थी कक्षा तक पढ़पाए थे । अंग्रेजीराज के समय उन्होने कई सरकारी नौकरी भी कि परंतु दशरथ नानाजी का मन नौकरी मेँ सन्तुष्ट न था !!
अन्ततः एक दिन वे सबकुछ छोड़छाड़कर अपने पाहाड़ी अनुर्वर गाँव लौट आये और खेतिबाड़ी आदि करते हुए साधारण किसान का जीवन बिताने लगे ।
उनदिनोँ दशरथ नानाजी को दोपहर मेँ किताबेँ पढ़ने शौक चढ़ा था ! इसी
किताब पढ़ने कि शौक से जन्म हुआ पुस्तक_भिक्षाका ओड़िशा यात्रा !
अर्धवस्त्रधारी रुप ,एक आँख खो चुके ,हाथ मेँ लाठी कन्धे पे झोला और आँखो मेँ सपने लिये
ओड़िशा के गाँव देहात सहर नगर का भ्रमण करते हुए नये पुरातन पुस्तक संग्रह करना उनका अब जीवन व्रत बनगया था । वे
जीवन के अवसर समय मेँ सारस्वत साधक बनगये थे ऐसा आजतक बहुत कम लोग करपाए है ।
रोज बड़े बड़े कवि लेखकोँ चिट्ठी पत्री लिखके उन्हे पुस्तक संग्रह_आंदोलन मे सामिल करने मे सफल हो पाए थे दशरथ नानाजी ।
उन्ही के प्रयाश से उदयपुर ,नयागड़ मे जातीय पाठागार ,संग्रहालय ,साहित्य संसद तथा गवेषणाकेन्द्र कि स्थापना हुई थी ।
उदयपुर स्थित जातीय पाठागार मे इस समय 1 लाख से अधिक नये पुरातन पुस्तकोँ के साथ साथ 42 विभागोँ मे शताधिक ताड़पत्र पोथी आदि संग्रृहित है ।
जाते जाते वे "दीपक ट्रष्ट" कि स्थापना कर 1997 मे दुनिया छोड़ गये थे ।
बर्तमान नयागड़ जिल्लापाल दशरथ नाना के सुयोग्य नाती इस ट्रष्ट के अध्यक्ष है । पुस्तक संग्रह इस ट्रष्ट का परम उद्देश्य है । —
शनिवार, 22 अगस्त 2015
कथा पांवटा साहिब की....भाग-2
16वीँ सदी मेँ भौगलिक परिस्थितियाँ ऐसी थीँ कि विलासपुर से श्रीनगर(गढ़वाल) जाने के लिये यमुना नदी पार करना होता था और पांवटा बीच मेँ पड़ता था ।
राजा भीमचंद को बारात लेकर इसी रस्ते से गुजरना था । बारत मेँ अस्त्र शस्त्रोँ से सज्जित हजारोँ सैनिकोँ को देखकर गुरु गोविँद सिँह का माथ ठनका ।
वो समझगये राजा भीमचंद के इरादे नैक नहीँ अतः सरक्षात्मक नजरिया अपनाते हुए राजा भीमचंद ,उनके पुत्र और चंद वरिष्ठ अधिकारीओँ को पावंट के निकट नाव से यमुना पार करने कि इजाजत तो दे दी ,लेकिन राजा भीमचंद की असली बारत यानी सैनिकोँ को एक घुमावदार लंबे रस्ते से गढ़वाल जाना पड़ा । इस घटना से युद्ध कि संभावनाएँ और बढ़गई ।
विवाह स्थल पर पहँचते ही भीमचंद ने पांवटा मेँ घटित घटना से राजा फतेहशाह को अवगत कराया । उसने कहा कि वह इस गुस्ताखी का बदला लेकर रहेगा । अपधे समधी की बात सुनकर फतेहशाह के माथे पर भी आक्रोश की लकीरेँ खिँच आई ।
विवाह स्थल पर अनेक पाहाड़ी राजा उपस्थित थे । रस्मेँ पुरी होते ही राजाओँ ने नवदंपति को तोहफे भेँट करना शुरु किए ।
जब दीवान नंदचंद जी , गुरु गोविँद सिँह द्वारा भेँट किया गया "ताम्बोल" फतेहशाह को देनेगये तो भीमचंद ने चेताया समधी जी इस उपहार को लेगेँ तो अछा नहीँ होगा ।
वक्त के नजाकत को देखकर फतेहशाह ने वह उपहार लौटादिया ।
पहाड़ीराजाओँ को ये माजरा समझनहीँ आ रही थी ! भीमचंद ने सबकी जिज्ञासाओँ को सुलझाते हुए उन्हे यह कहकर भड़काया कि गोविँद सिँह सभी क्षेत्रिय राजाओँ पर एकछत्रराज स्थापित करना चाहते है ।
भीमचंद पाहाड़ीराजाओँ को भड़काने मेँ सफल हो गया ।
शादी मेँ सामिल सभी राजाओँ ने एक संयुक्त प्रस्ताव पारित किया कि अब उनकी संयुक्त सेनाएँ गुरु गोविँद सिँह पर एक साथ हमला बोलेँगी ।
इस विवाहोत्सव मेँ किन्ही कारणवस नाहन के राजा मेदनी प्रसाद सामिल नहीँ हुए थे ।
नंदचंद ने पांवटा पहँचकर गुरुजी को शादी मेँ पारित प्रस्ताव का ब्यौरा दिया परंतु गुरु गोविँद सिँह जी को इससे कोई आचंबा नहीँ हुआ वे युद्ध के तैयारीओँ भेँ लगगये ।
उनदिनोँ गुरुजी के सेनामेँ 5000 से अधिक योद्धा थे जिनमेँ जीतमल ,संगेशाह ,गोपालचंद ,माहरीचंद ,गंगाराम ,किरपालचंद ,नंदचंद ,पुरोहित दयाराम तथा साहिब चंद अपनी वीरता के लिये विख्यात थे ।
कुछ पठान भी गुरु गोविँद सिँह के साथ थे ।
उधर पाहाड़ी राजाओँ की संयुक्त सेनाओँ मेँ कटोच के किरपाल ,गुलेर के गोपाल ,हिँदुर के हरिचंद ,चंदुल के गाजीचंद ,दाढवार व जसवाल के राजा ,गढ़वाल के राजा फतेहशाह व विलासपुर नरेश भीमचंद ने मिलकर युद्ध के लिये पांवटा कुच किया ।
अभी युद्ध होने ही वाला था कि गोविँद सिँह जी के सेनामेँ सामिल पठान सैनिक एकाएक पैँतरा बदलकर दुशमन से जा मिले ।
हारामखोर पठानोँ ने पहाड़ीराजाओँ के ये पट्टी पढ़ाया कि गोविँद सिँह का असली ताकत हम पठान थे अब उन्हे हराने मेँ कोई मुस्किल नहीँ है ।
पठान सैनिकोँ द्वारा ऐन वक्त पर विश्वासघात करने से गोविँद सिँह को दुःख हुआ परंतु इसी बीच उन्हे 700 छापामार युद्ध मे माहिर पठान सैनिक मिलगये । इससे गुरुजी के सेना का मनोबल दुना हो गया ।
6 अप्रेल 1687 को पांवटा साहिब के निकट भंगाणी के मैदान मेँ पहाड़ी राजाओँ की सेनाओँ और गुरु गोविँद जी के सेना मेँ युद्ध छिड़गयी ।
घमासान युद्ध हुआ ,
गुरु ने पहला हमला उन विश्वासघाती पठानोँ पर किया ।
युद्ध मेँ एकवार ऐसा लगा कि पहाड़ी सेना कि जीत हो जायेगी । च्युँकि हिँदुर नरेश हरिचंद आक्रमक बने हुए थे परंतु उनके साथीदार राजाओँ को हार ही नसीब हुआ ।
जसवाल व दाढ़वार के राजा रणक्षेत्र से भाग खड़े हुए । चंदेल के राजा ने भी हार मान लिया और तभी गुरु गोविँद सिँहजी के एक तीर ने हरिचंद को मोत की गोद मेँ सुला दिया ।
इससे भीमचंद व फतेहशाह युद्ध क्षेत्र से पलायन कर गये
ओर इस प्रकार गुरु गोविँद सिँह व उनके सेना ने भंगाणी के मैदान मेँ सबके छक्के छुड़ादिये ।
भंगाणी के जिस मैदान मेँ यह युद्ध हुआ था वहाँ आज भंगाणी साहिब के नामसे भव्य गुरुद्वारा बना हुआ है ।
इस गुरुद्वारा का निर्माण 1825 मेँ बसवा सिँह नामक एक श्रधालु द्वारा बनवाया गया है ।
कहाजाता है कि भंगाणी युद्ध मेँ विजयोल्लास स्वरुप गुरुजी ने एक उत्सव आयोजन करवाया था जिसमेँ नाहन के राजा मेदनी प्रसाद भी सामिल हुए थे ।
इस उत्सव को आज भी प्रतिवर्ष फाल्गुन पुर्णिमा को होल्ला महोल्ला के रुप मे मनाया जाता है । उत्सव मेँ गुरु ग्रंथ साहिब की शोभ यात्रा पांवटा साहिब के विभिन्न क्षेत्रोँ से निकाली जाती है ।
गुरुद्वारा साहिब मेँ निशान साहिब पर नया वस्त्र पहनाया जाता है । गतकाबाजी इस उत्सव का मुख्य आकर्षक होता हे,जिसमेँ कुशल योध्या अस्त्र शस्त्र विद्या का प्रदर्शन करते है । इस उत्सव मेँ शहरी व ग्रामीण लोक जीवन की मिली जुरी झाँकी देखने को मिलती है ।
***** #उत्तरप्रदेश और #हरियाणा की सीमाओँ से सटा #पांवटासाहिब का यह गौरवमय इतिहास सभी #हिन्दु याद रखेँ हृदयगंम करेँ .इससे सीख लेँ
और मिलजुलकर रहेँ ****
राजा भीमचंद को बारात लेकर इसी रस्ते से गुजरना था । बारत मेँ अस्त्र शस्त्रोँ से सज्जित हजारोँ सैनिकोँ को देखकर गुरु गोविँद सिँह का माथ ठनका ।
वो समझगये राजा भीमचंद के इरादे नैक नहीँ अतः सरक्षात्मक नजरिया अपनाते हुए राजा भीमचंद ,उनके पुत्र और चंद वरिष्ठ अधिकारीओँ को पावंट के निकट नाव से यमुना पार करने कि इजाजत तो दे दी ,लेकिन राजा भीमचंद की असली बारत यानी सैनिकोँ को एक घुमावदार लंबे रस्ते से गढ़वाल जाना पड़ा । इस घटना से युद्ध कि संभावनाएँ और बढ़गई ।
विवाह स्थल पर पहँचते ही भीमचंद ने पांवटा मेँ घटित घटना से राजा फतेहशाह को अवगत कराया । उसने कहा कि वह इस गुस्ताखी का बदला लेकर रहेगा । अपधे समधी की बात सुनकर फतेहशाह के माथे पर भी आक्रोश की लकीरेँ खिँच आई ।
विवाह स्थल पर अनेक पाहाड़ी राजा उपस्थित थे । रस्मेँ पुरी होते ही राजाओँ ने नवदंपति को तोहफे भेँट करना शुरु किए ।
जब दीवान नंदचंद जी , गुरु गोविँद सिँह द्वारा भेँट किया गया "ताम्बोल" फतेहशाह को देनेगये तो भीमचंद ने चेताया समधी जी इस उपहार को लेगेँ तो अछा नहीँ होगा ।
वक्त के नजाकत को देखकर फतेहशाह ने वह उपहार लौटादिया ।
पहाड़ीराजाओँ को ये माजरा समझनहीँ आ रही थी ! भीमचंद ने सबकी जिज्ञासाओँ को सुलझाते हुए उन्हे यह कहकर भड़काया कि गोविँद सिँह सभी क्षेत्रिय राजाओँ पर एकछत्रराज स्थापित करना चाहते है ।
भीमचंद पाहाड़ीराजाओँ को भड़काने मेँ सफल हो गया ।
शादी मेँ सामिल सभी राजाओँ ने एक संयुक्त प्रस्ताव पारित किया कि अब उनकी संयुक्त सेनाएँ गुरु गोविँद सिँह पर एक साथ हमला बोलेँगी ।
इस विवाहोत्सव मेँ किन्ही कारणवस नाहन के राजा मेदनी प्रसाद सामिल नहीँ हुए थे ।
नंदचंद ने पांवटा पहँचकर गुरुजी को शादी मेँ पारित प्रस्ताव का ब्यौरा दिया परंतु गुरु गोविँद सिँह जी को इससे कोई आचंबा नहीँ हुआ वे युद्ध के तैयारीओँ भेँ लगगये ।
उनदिनोँ गुरुजी के सेनामेँ 5000 से अधिक योद्धा थे जिनमेँ जीतमल ,संगेशाह ,गोपालचंद ,माहरीचंद ,गंगाराम ,किरपालचंद ,नंदचंद ,पुरोहित दयाराम तथा साहिब चंद अपनी वीरता के लिये विख्यात थे ।
कुछ पठान भी गुरु गोविँद सिँह के साथ थे ।
उधर पाहाड़ी राजाओँ की संयुक्त सेनाओँ मेँ कटोच के किरपाल ,गुलेर के गोपाल ,हिँदुर के हरिचंद ,चंदुल के गाजीचंद ,दाढवार व जसवाल के राजा ,गढ़वाल के राजा फतेहशाह व विलासपुर नरेश भीमचंद ने मिलकर युद्ध के लिये पांवटा कुच किया ।
अभी युद्ध होने ही वाला था कि गोविँद सिँह जी के सेनामेँ सामिल पठान सैनिक एकाएक पैँतरा बदलकर दुशमन से जा मिले ।
हारामखोर पठानोँ ने पहाड़ीराजाओँ के ये पट्टी पढ़ाया कि गोविँद सिँह का असली ताकत हम पठान थे अब उन्हे हराने मेँ कोई मुस्किल नहीँ है ।
पठान सैनिकोँ द्वारा ऐन वक्त पर विश्वासघात करने से गोविँद सिँह को दुःख हुआ परंतु इसी बीच उन्हे 700 छापामार युद्ध मे माहिर पठान सैनिक मिलगये । इससे गुरुजी के सेना का मनोबल दुना हो गया ।
6 अप्रेल 1687 को पांवटा साहिब के निकट भंगाणी के मैदान मेँ पहाड़ी राजाओँ की सेनाओँ और गुरु गोविँद जी के सेना मेँ युद्ध छिड़गयी ।
घमासान युद्ध हुआ ,
गुरु ने पहला हमला उन विश्वासघाती पठानोँ पर किया ।
युद्ध मेँ एकवार ऐसा लगा कि पहाड़ी सेना कि जीत हो जायेगी । च्युँकि हिँदुर नरेश हरिचंद आक्रमक बने हुए थे परंतु उनके साथीदार राजाओँ को हार ही नसीब हुआ ।
जसवाल व दाढ़वार के राजा रणक्षेत्र से भाग खड़े हुए । चंदेल के राजा ने भी हार मान लिया और तभी गुरु गोविँद सिँहजी के एक तीर ने हरिचंद को मोत की गोद मेँ सुला दिया ।
इससे भीमचंद व फतेहशाह युद्ध क्षेत्र से पलायन कर गये
ओर इस प्रकार गुरु गोविँद सिँह व उनके सेना ने भंगाणी के मैदान मेँ सबके छक्के छुड़ादिये ।
भंगाणी के जिस मैदान मेँ यह युद्ध हुआ था वहाँ आज भंगाणी साहिब के नामसे भव्य गुरुद्वारा बना हुआ है ।
इस गुरुद्वारा का निर्माण 1825 मेँ बसवा सिँह नामक एक श्रधालु द्वारा बनवाया गया है ।
कहाजाता है कि भंगाणी युद्ध मेँ विजयोल्लास स्वरुप गुरुजी ने एक उत्सव आयोजन करवाया था जिसमेँ नाहन के राजा मेदनी प्रसाद भी सामिल हुए थे ।
इस उत्सव को आज भी प्रतिवर्ष फाल्गुन पुर्णिमा को होल्ला महोल्ला के रुप मे मनाया जाता है । उत्सव मेँ गुरु ग्रंथ साहिब की शोभ यात्रा पांवटा साहिब के विभिन्न क्षेत्रोँ से निकाली जाती है ।
गुरुद्वारा साहिब मेँ निशान साहिब पर नया वस्त्र पहनाया जाता है । गतकाबाजी इस उत्सव का मुख्य आकर्षक होता हे,जिसमेँ कुशल योध्या अस्त्र शस्त्र विद्या का प्रदर्शन करते है । इस उत्सव मेँ शहरी व ग्रामीण लोक जीवन की मिली जुरी झाँकी देखने को मिलती है ।
***** #उत्तरप्रदेश और #हरियाणा की सीमाओँ से सटा #पांवटासाहिब का यह गौरवमय इतिहास सभी #हिन्दु याद रखेँ हृदयगंम करेँ .इससे सीख लेँ
और मिलजुलकर रहेँ ****
कथा पांवटा साहिब की... भाग 1
आनंदपुर साहिब मेँ एक बार गुरुगोविँद सिँह जी से मिलने तत्कालिन विलाशपुर राजा भीम चंद का आना हुआ ।
भीमचंद का वहाँ भव्य स्वागत हुआ ,
गुरुजी ने उन्हे दुसरे राजाओँ के द्वारा दिए गये नायाब उपहारोँ को दिखाया जिसमेँ #असम राजा द्वारा दिया गया सफेद हाथी "प्रसादी" भी था ।
राजा भीमचंद के मनमे प्रसादी को देखकर लोभ उत्पन हुआ जिसे गोविँद सिँह जी ताड़ गये परंतु अतिथी धर्म निर्वाह हेतु उन्होने कुछ नहीँ कहा !
अनकोँ उपहारोँ समेत भीमचंद जी स्व राज्य लौट तो आये परंतु उनके मन मेँ प्रसादी के पाने को पाने की लालसा बढ़गया था ।
1645 सदी मेँ गुरुगोविँद सिँह जी सिरमौर रियासत के मीरपुर गाँव मेँ ठहरे हुए थे
मीरपुर के शासक उन दिनोँ मेदनी प्रसाद थे , उन्हे पताचला कि गुरुजी उनके राज्य मे आये हुए है । मेदनी प्रसाद ने गोविदँ सिँह जी को अपने मंत्र शोभा राम के हातोँ नाहन आने का निमन्त्रण दिया । गुरुजी ने निमन्त्रण सहर्ष स्वीकार कर लिया ।
17 वैशाख को गोविँद सिँह जी नाहन पहँचे । राजा मेदनी प्रसाद ने उनका स्वागत सत्कार पश्चात झिझकते हुए अपना समस्या प्रकट किया ।
सिरमौर के पूर्व मेँ टिहरी गढ़वाल के राजा फतेहशाह के साथ राजा मेदनी प्रसाद का अनवन चल रहा था ।
तो मेदनी प्रसाद ने गुरुजी से आग्रह किया कि वे नाहन ओर श्रीनगर के सीमा पर एक किला बनवा देँ इससे फतेह शाह के मनमानी पर अंकुश लगसकेगा ।
गुरु गोविँद सिँह ने राजा को कहा जहाँतक हो सके मिलजुल कर रहेँ व मिलकर मोगल सत्ता के खिलाफ लढ़ेँ ।
मेदिनी प्रसाद कि इछाओँ को सम्मान देते हुए सिरमौर रियासत मेँ यमुना किनारे पाहाड़ोँ के बीच सुँदर वृक्षोँ से घिरा एक स्थल उन्हे बहुत पसंद आया । यहीँ वे अपने घोड़े से उतरे और अपने पाँव इस धरती पर टिकाए । गुरु गोविँद सिँह के यहाँ पाँव टिकाने के कारण ही इस क्षेत्र का नाम पाँवटिका पड़ा, जो बाद मेँ अपभ्रंस होकर पाँवटा साहिब पड़ गया !!
मेदनी प्रसाद ने गुरुजी के रहने के लिये यमुना किनारे एक स्थान बनवा दिया । गुरुजी अपने परिवार को भी यहाँ ले आये ।
यहीँ उनके बड़े पुत्र अजीत सिँह का जन्म हुआ ।
पाँवटा साहिब को पौराणिक काल से ही पवित्र माना जाता हे । ऐसी मान्यता है कि सर्वप्रथम कैलास से अवतरित भगवन शिव को यहीँ ज्ञान प्राप्त हुआ था । उसके बाद वह कपालमोचन तीर्थ गे । देवी दुर्गावती भी कैलास पर्वत से उतरकर इसी मार्ग से स्वर्गलोक के राजा इंद्र के सहायतार्थ गई ।
यहीँ परशुराम का भगवन रामचंद्र से मिलन हुआ था । यहाँ से थोड़ी ही दुर ऋषि जमदग्नि की धर्म पत्नी रेणुका का सरोवर है । पावंटा से थोड़ी ही दूरी पर ऋषि मार्कण्डेय व कालपी ऋषि का तपस्थल है ।
स्थानीय लोगोँ मे ऐसी भी मान्यता प्रचलित हे कि यहाँ यमुना मे स्नान करने पर व्यक्ति हर पापोँ से सर्वथा मुक्त हो जाता है ।
बहरहाल गुरु गोविँद सिँह जी ने नाहन और श्रीनगर के बीच पाँवटा मेँ किला बनाया तो ये बात श्रीनगर के राजा फतेह शाह को नागवार गुजरा । वो गोविँद सिँह जी से मिलने पाँवटा आया और गुरुजी के व्यक्तित्व से प्रभावित हो गया ।
कहाँ वह झगड़ा करने आया था और कहाँ दोस्ती के बंधनोँ मेँ बंध गया ।
गुरुगोविँद सिँह ने मेदनी प्रसाद व फतेह शाह के बीच चलरहे मनमुटाव को दूर करते हुए उनमेँ संधि करवा दी । गुरुजी के मध्यस्दा पर फतेह शाह ने सिरमौर रियासत को उसके द्वारा दबाया हुआ भूभाग लौटा दिया ।
कुछ दिन पश्चात श्रीनगर नरेश फतेहशाह कि पुत्री का विवाह राजा भीमचंद के पुत्र के साथ होना निश्चित हुआ ।
ये भीमचंद वही था जिसके मनमेँ गुरुजी के हाथी को देखकर लालच आ गया था ।
फतेह शाह कि कन्या से विवाह तय होते ही उसने एक चाल चला ! अपने कुछ कारिँदे गुरु गोविँद सिँह जी के पास भेजकर उसने शादी के स्वागत समारोह के लिये प्रसादी हाथी को देने का अनुरोध किया ।
गुरु गोविँद सिँह को भीमचंद का युँ प्रसादी माँगना अछा नहीँ लगा सो उन्होने राजा के कारिँदोँ को खाली हाथ लौटा दिया ।
कारिँदो ने भीमचंद को उलटा सिधा कहकर और उकसाया वो यह सुनकर और आगबबुला हो उठा ।
बेटी की शादी का दिन निकट आते ही राजा फतेहशाह ने गुरु गोविँद सिँह को सपरिवार शादी मेँ पधारने का न्योता भेजा ।
उधर गुरुगोविँद सिँह को खबर मिला कि भीमचंद उनसे भीड़ने की तैयारी मेँ जुटा हुआ है ।
कहीँ शादी मेँ उन्हे देख कर राजा भीमचंद कोई बखेड़ा खड़ा न कर दे ,जिससे रंग मेँ भंग पड़ जाए .यह सोचकर गुरु गोविंद सिँह स्वयं शादी मेँ नहीँ गे और अपने दीवान नंदचंद के हाथ बहुमुल्य उपाहारोँ के साथ राज फतेहशाह के यहाँ भेज दिया ....
क्रमशः.....
भीमचंद का वहाँ भव्य स्वागत हुआ ,
गुरुजी ने उन्हे दुसरे राजाओँ के द्वारा दिए गये नायाब उपहारोँ को दिखाया जिसमेँ #असम राजा द्वारा दिया गया सफेद हाथी "प्रसादी" भी था ।
राजा भीमचंद के मनमे प्रसादी को देखकर लोभ उत्पन हुआ जिसे गोविँद सिँह जी ताड़ गये परंतु अतिथी धर्म निर्वाह हेतु उन्होने कुछ नहीँ कहा !
अनकोँ उपहारोँ समेत भीमचंद जी स्व राज्य लौट तो आये परंतु उनके मन मेँ प्रसादी के पाने को पाने की लालसा बढ़गया था ।
1645 सदी मेँ गुरुगोविँद सिँह जी सिरमौर रियासत के मीरपुर गाँव मेँ ठहरे हुए थे
मीरपुर के शासक उन दिनोँ मेदनी प्रसाद थे , उन्हे पताचला कि गुरुजी उनके राज्य मे आये हुए है । मेदनी प्रसाद ने गोविदँ सिँह जी को अपने मंत्र शोभा राम के हातोँ नाहन आने का निमन्त्रण दिया । गुरुजी ने निमन्त्रण सहर्ष स्वीकार कर लिया ।
17 वैशाख को गोविँद सिँह जी नाहन पहँचे । राजा मेदनी प्रसाद ने उनका स्वागत सत्कार पश्चात झिझकते हुए अपना समस्या प्रकट किया ।
सिरमौर के पूर्व मेँ टिहरी गढ़वाल के राजा फतेहशाह के साथ राजा मेदनी प्रसाद का अनवन चल रहा था ।
तो मेदनी प्रसाद ने गुरुजी से आग्रह किया कि वे नाहन ओर श्रीनगर के सीमा पर एक किला बनवा देँ इससे फतेह शाह के मनमानी पर अंकुश लगसकेगा ।
गुरु गोविँद सिँह ने राजा को कहा जहाँतक हो सके मिलजुल कर रहेँ व मिलकर मोगल सत्ता के खिलाफ लढ़ेँ ।
मेदिनी प्रसाद कि इछाओँ को सम्मान देते हुए सिरमौर रियासत मेँ यमुना किनारे पाहाड़ोँ के बीच सुँदर वृक्षोँ से घिरा एक स्थल उन्हे बहुत पसंद आया । यहीँ वे अपने घोड़े से उतरे और अपने पाँव इस धरती पर टिकाए । गुरु गोविँद सिँह के यहाँ पाँव टिकाने के कारण ही इस क्षेत्र का नाम पाँवटिका पड़ा, जो बाद मेँ अपभ्रंस होकर पाँवटा साहिब पड़ गया !!
मेदनी प्रसाद ने गुरुजी के रहने के लिये यमुना किनारे एक स्थान बनवा दिया । गुरुजी अपने परिवार को भी यहाँ ले आये ।
यहीँ उनके बड़े पुत्र अजीत सिँह का जन्म हुआ ।
पाँवटा साहिब को पौराणिक काल से ही पवित्र माना जाता हे । ऐसी मान्यता है कि सर्वप्रथम कैलास से अवतरित भगवन शिव को यहीँ ज्ञान प्राप्त हुआ था । उसके बाद वह कपालमोचन तीर्थ गे । देवी दुर्गावती भी कैलास पर्वत से उतरकर इसी मार्ग से स्वर्गलोक के राजा इंद्र के सहायतार्थ गई ।
यहीँ परशुराम का भगवन रामचंद्र से मिलन हुआ था । यहाँ से थोड़ी ही दुर ऋषि जमदग्नि की धर्म पत्नी रेणुका का सरोवर है । पावंटा से थोड़ी ही दूरी पर ऋषि मार्कण्डेय व कालपी ऋषि का तपस्थल है ।
स्थानीय लोगोँ मे ऐसी भी मान्यता प्रचलित हे कि यहाँ यमुना मे स्नान करने पर व्यक्ति हर पापोँ से सर्वथा मुक्त हो जाता है ।
बहरहाल गुरु गोविँद सिँह जी ने नाहन और श्रीनगर के बीच पाँवटा मेँ किला बनाया तो ये बात श्रीनगर के राजा फतेह शाह को नागवार गुजरा । वो गोविँद सिँह जी से मिलने पाँवटा आया और गुरुजी के व्यक्तित्व से प्रभावित हो गया ।
कहाँ वह झगड़ा करने आया था और कहाँ दोस्ती के बंधनोँ मेँ बंध गया ।
गुरुगोविँद सिँह ने मेदनी प्रसाद व फतेह शाह के बीच चलरहे मनमुटाव को दूर करते हुए उनमेँ संधि करवा दी । गुरुजी के मध्यस्दा पर फतेह शाह ने सिरमौर रियासत को उसके द्वारा दबाया हुआ भूभाग लौटा दिया ।
कुछ दिन पश्चात श्रीनगर नरेश फतेहशाह कि पुत्री का विवाह राजा भीमचंद के पुत्र के साथ होना निश्चित हुआ ।
ये भीमचंद वही था जिसके मनमेँ गुरुजी के हाथी को देखकर लालच आ गया था ।
फतेह शाह कि कन्या से विवाह तय होते ही उसने एक चाल चला ! अपने कुछ कारिँदे गुरु गोविँद सिँह जी के पास भेजकर उसने शादी के स्वागत समारोह के लिये प्रसादी हाथी को देने का अनुरोध किया ।
गुरु गोविँद सिँह को भीमचंद का युँ प्रसादी माँगना अछा नहीँ लगा सो उन्होने राजा के कारिँदोँ को खाली हाथ लौटा दिया ।
कारिँदो ने भीमचंद को उलटा सिधा कहकर और उकसाया वो यह सुनकर और आगबबुला हो उठा ।
बेटी की शादी का दिन निकट आते ही राजा फतेहशाह ने गुरु गोविँद सिँह को सपरिवार शादी मेँ पधारने का न्योता भेजा ।
उधर गुरुगोविँद सिँह को खबर मिला कि भीमचंद उनसे भीड़ने की तैयारी मेँ जुटा हुआ है ।
कहीँ शादी मेँ उन्हे देख कर राजा भीमचंद कोई बखेड़ा खड़ा न कर दे ,जिससे रंग मेँ भंग पड़ जाए .यह सोचकर गुरु गोविंद सिँह स्वयं शादी मेँ नहीँ गे और अपने दीवान नंदचंद के हाथ बहुमुल्य उपाहारोँ के साथ राज फतेहशाह के यहाँ भेज दिया ....
क्रमशः.....
बुधवार, 19 अगस्त 2015
मध्यप्राच्य का प्यारा द्वीप सोकोट्रा ...
सोकोट्रा.....Sokotra......
अमरिकीलोग इसे पृथ्वी पर परग्रह वासीओँ का द्वीप कहते है ।
Asia महादेश का यमन व African देश सोमालिया के मध्य समंदरमेँ आता है ये 4 द्वीपोँ वाला क्षेत्र !
4 द्वीपोँ मेँ सोकोर्टा सबसे बड़ा व मुख्य द्वीप है ।
यहाँ कि जनसंख्या कुल 30,000 के आसपास बताया जाता है ।
इसकी क्षेत्रफल 3796 वर्ग किलोमिटर हे ।
20वीँ सदी के शुरुवात मेँ पश्चिमी सोधकर्ता माना करते थे कि सोकोर्टा नाम संभवतः किसी ग्रीक शब्द का परिवर्तीत रुप होगा । परंतु बाद मेँ प्राच्य विद्वानोँ ने साबित किया कि सोकोर्टा मूल संस्कृत शब्द #सुखाधार का बदला हुआ रूप है । संस्कृत मेँ सुखाधार का अर्थ हे "सभी सुखोँ से लवरेज" !
सदीओँ पहले एसिआ व अफ्रिका व युरोप के बीच अछा व्यापारीक संपर्क हुआ करता था ।
सोकोर्टा का इसमेँ एहम योगदान हुआ करता था च्युँकि सोकोट्रा उन दिनोँ वाणज्यकेन्द बनकर उभरा था ।
गुजराती नौचालक इस द्वीप से आ रहे अजीव गर्जना के कारण इसे "सिकोतरो सिँह" कहते है ।
1967 से ये द्वीप यमन के शासनाधीन हे । इससे पहले लम्बे समयकाल तक यह द्वीप पर्तुगाली फिर अंग्रेजोँ के हातोँ मे आया था ।
सोकोर्टा का सबसे बड़ा सहर हाड़िवो मेँ जनसंख्या 8,000 है ,हालांकि बाकी 3 द्वीपोँ मे
कउतना विकाश नहीँ करपाया ।
यहाँ के लोग खजुर उत्पादन ,मत्स व पशुपालन आदि व्यवसाय के जरीये अपना गुजारा चलाते है ।
च्युँकि यहाँ कोई विद्युत उत्पादन व्यवस्था नही है अतः समूचे द्वीप मेँ मात्र जेनरटरो द्वारा ही विजली कि आपुर्ति कि जाती है !
आप यह जानकर और भी हैरान होगेँ कि यहाँ आज भी ऐसे लोग रहते हे जो रुपिया पैसा देकर नहीँ वरन अपनी मनपसंद चिजोँ के बदले सामान बेचा करते है ।
बैसे आधुनिकता ने यहाँ भी अपना कदम थाम लिया है परंतु लगता हे यहाँ वास्तुवादी विकाश मे अभी और वक्त लगेगा ।
अफ्रिकन आरब व भारतीय प्रजा के रक्तगत समिश्रण से सोकोट्रा प्रजा का सृष्ठि मानाजाता है । कहते है यमन का नाम दुनिया मेँ जनसंख्या के मुकाबले गन रखनेवाले देशोँ मे टप पर आता हे परंतु यमन का हिस्सा होकर भी सोकोर्टा के लोग हतियार नहीँ करते ।
यहाँ के लोगो का परस्पर अभिवादन का अपना एक अलग अनोखी रीत पायीजाती है ।
यहाँ के लोग आपसमेँ मिलते समय दुआ सलाम के बदले परस्पर नाक स्पर्श द्वारा अभिवादन करते है ।
सोकोर्टा मेँ बहत कम लोग अंग्रेजी बोलपाते हे इसलिये पुरे के पुरे द्वीप मेँ अलग अलग स्पेलिंग के साथ लिखा पायाजाता है सोकोर्टा नाम !!
द्वीतीय विश्वयुद्ध के दिनो मेँ नेदरलैँड ने इस द्वीप को कामचलाउ सैन्य कैँप बनाया था
फिर कुछ कालोँ तक यह जमीन सोमालियन लुटेरोँ का चारणभूमि बना परंतु अंत मे यमन ने इसपर अपना अधिकार प्राप्त करने मे सफल हो पाया ।
सोकोर्टा मे सिर्फ इंसान ही नहीँ यहाँ दिखनेवाले जानवर व वृक्षोँ का स्वरूप मूल भंखण्ड से भिन्न पाया गया है ।
***300 वर्षोँतक जीवित पायेजानेवाला #लोवान वृक्ष सोकोट्रा का मुख्य आकर्षण तथा रहस्यमय विषय है ।
इसे अंग्रेजी मे ड्रेगन ब्लॉड़ ट्री कहाजाता है ।
इस वृक्ष कि खासियत इसकी खास आकार व जीवनधारण प्रणाळी हे !
दूर से लोबान वृक्षोँ को देखनेपर लगता है मानो ये वृक्ष नहीँ वरन यहाँ किसीने सजा कर गुलदस्ता रखदिया हो ।
ये चिँताजनक हे कि सोकाट्रा मेँ लोवान वृक्षोँ कि संख्या सीमित व निरंतर घटता जा रहा है जो आनेवाले दिनोँ मेँ सोकोट्रा के जैव विवधता को क्षति पहचाँ सकता है ।
वहीँ सोकोट्रा पर इन दिनोँ ISIS व अलकाएदा का नजर पड़ा है । कुछ दिनोँ पूर्व इंलण्ड कि "द इकोनोमिस्ट" पत्रिका मेँ इस विषय पर खास लेख छपा था ! यदि इन संगठनोँ को इस क्षेत्र मेँ आतंकी गतिविधी बढ़ाने का मौका मिला तो सोकोट्रा को भयावह परस्थितिओँ का सामना करना पड़ सकता है ।
अमरिकीलोग इसे पृथ्वी पर परग्रह वासीओँ का द्वीप कहते है ।
Asia महादेश का यमन व African देश सोमालिया के मध्य समंदरमेँ आता है ये 4 द्वीपोँ वाला क्षेत्र !
4 द्वीपोँ मेँ सोकोर्टा सबसे बड़ा व मुख्य द्वीप है ।
यहाँ कि जनसंख्या कुल 30,000 के आसपास बताया जाता है ।
इसकी क्षेत्रफल 3796 वर्ग किलोमिटर हे ।
20वीँ सदी के शुरुवात मेँ पश्चिमी सोधकर्ता माना करते थे कि सोकोर्टा नाम संभवतः किसी ग्रीक शब्द का परिवर्तीत रुप होगा । परंतु बाद मेँ प्राच्य विद्वानोँ ने साबित किया कि सोकोर्टा मूल संस्कृत शब्द #सुखाधार का बदला हुआ रूप है । संस्कृत मेँ सुखाधार का अर्थ हे "सभी सुखोँ से लवरेज" !
सदीओँ पहले एसिआ व अफ्रिका व युरोप के बीच अछा व्यापारीक संपर्क हुआ करता था ।
सोकोर्टा का इसमेँ एहम योगदान हुआ करता था च्युँकि सोकोट्रा उन दिनोँ वाणज्यकेन्द बनकर उभरा था ।
गुजराती नौचालक इस द्वीप से आ रहे अजीव गर्जना के कारण इसे "सिकोतरो सिँह" कहते है ।
1967 से ये द्वीप यमन के शासनाधीन हे । इससे पहले लम्बे समयकाल तक यह द्वीप पर्तुगाली फिर अंग्रेजोँ के हातोँ मे आया था ।
सोकोर्टा का सबसे बड़ा सहर हाड़िवो मेँ जनसंख्या 8,000 है ,हालांकि बाकी 3 द्वीपोँ मे
कउतना विकाश नहीँ करपाया ।
यहाँ के लोग खजुर उत्पादन ,मत्स व पशुपालन आदि व्यवसाय के जरीये अपना गुजारा चलाते है ।
च्युँकि यहाँ कोई विद्युत उत्पादन व्यवस्था नही है अतः समूचे द्वीप मेँ मात्र जेनरटरो द्वारा ही विजली कि आपुर्ति कि जाती है !
आप यह जानकर और भी हैरान होगेँ कि यहाँ आज भी ऐसे लोग रहते हे जो रुपिया पैसा देकर नहीँ वरन अपनी मनपसंद चिजोँ के बदले सामान बेचा करते है ।
बैसे आधुनिकता ने यहाँ भी अपना कदम थाम लिया है परंतु लगता हे यहाँ वास्तुवादी विकाश मे अभी और वक्त लगेगा ।
अफ्रिकन आरब व भारतीय प्रजा के रक्तगत समिश्रण से सोकोट्रा प्रजा का सृष्ठि मानाजाता है । कहते है यमन का नाम दुनिया मेँ जनसंख्या के मुकाबले गन रखनेवाले देशोँ मे टप पर आता हे परंतु यमन का हिस्सा होकर भी सोकोर्टा के लोग हतियार नहीँ करते ।
यहाँ के लोगो का परस्पर अभिवादन का अपना एक अलग अनोखी रीत पायीजाती है ।
यहाँ के लोग आपसमेँ मिलते समय दुआ सलाम के बदले परस्पर नाक स्पर्श द्वारा अभिवादन करते है ।
सोकोर्टा मेँ बहत कम लोग अंग्रेजी बोलपाते हे इसलिये पुरे के पुरे द्वीप मेँ अलग अलग स्पेलिंग के साथ लिखा पायाजाता है सोकोर्टा नाम !!
द्वीतीय विश्वयुद्ध के दिनो मेँ नेदरलैँड ने इस द्वीप को कामचलाउ सैन्य कैँप बनाया था
फिर कुछ कालोँ तक यह जमीन सोमालियन लुटेरोँ का चारणभूमि बना परंतु अंत मे यमन ने इसपर अपना अधिकार प्राप्त करने मे सफल हो पाया ।
सोकोर्टा मे सिर्फ इंसान ही नहीँ यहाँ दिखनेवाले जानवर व वृक्षोँ का स्वरूप मूल भंखण्ड से भिन्न पाया गया है ।
***300 वर्षोँतक जीवित पायेजानेवाला #लोवान वृक्ष सोकोट्रा का मुख्य आकर्षण तथा रहस्यमय विषय है ।
इसे अंग्रेजी मे ड्रेगन ब्लॉड़ ट्री कहाजाता है ।
इस वृक्ष कि खासियत इसकी खास आकार व जीवनधारण प्रणाळी हे !
दूर से लोबान वृक्षोँ को देखनेपर लगता है मानो ये वृक्ष नहीँ वरन यहाँ किसीने सजा कर गुलदस्ता रखदिया हो ।
ये चिँताजनक हे कि सोकाट्रा मेँ लोवान वृक्षोँ कि संख्या सीमित व निरंतर घटता जा रहा है जो आनेवाले दिनोँ मेँ सोकोट्रा के जैव विवधता को क्षति पहचाँ सकता है ।
वहीँ सोकोट्रा पर इन दिनोँ ISIS व अलकाएदा का नजर पड़ा है । कुछ दिनोँ पूर्व इंलण्ड कि "द इकोनोमिस्ट" पत्रिका मेँ इस विषय पर खास लेख छपा था ! यदि इन संगठनोँ को इस क्षेत्र मेँ आतंकी गतिविधी बढ़ाने का मौका मिला तो सोकोट्रा को भयावह परस्थितिओँ का सामना करना पड़ सकता है ।
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