अफ्रीका महाद्वीप के दक्षिणी भाग में, उपजाऊ हरे मैदानों और विशाल पहाड़ियों से घिरे क्षेत्र में, अठारहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में एक नए रक्तरंजित इतिहास की नींव पड़ी। उस समय एक छोटे-से ज़ुलू कबीले के मुखिया थे सेंज़ांगाखोना। एक दिन यात्रा के दौरान उनकी भेंट पड़ोसी लांगेनी कबीले की एक अत्यंत सुंदर और साहसी युवती 'नांडी' से हुई। दोनों के बीच पनपे संबंध के कारण नांडी अविवाहित अवस्था में ही गर्भवती हो गईं। उन दिनों ज़ुलू और लांगेनी, दोनों समाजों में विवाह से पहले संतान धारण करना महापाप और घोर अपमान की बात मानी जाती थी। जब लांगेनी कबीले के बुज़ुर्गों ने यह समाचार ज़ुलू मुखिया तक पहुँचाया, तो सेंज़ांगाखोना ने अपना दोष छिपाने के लिए बड़ी ढिठाई से कह दिया कि नांडी गर्भवती नहीं हैं, बल्कि उनके पेट में एक प्रकार का रोग या कीड़ा है, जिसे उनकी भाषा में 'इ-शाका' (I-Shaka) कहा जाता है। परंतु प्रकृति के नियम को भला कौन छिपा सका है! समय बीतने पर जब सच सामने आया और नांडी ने एक स्वस्थ पुत्र को जन्म दिया, तो उस नवजात का नाम 'शाका' रखा गया, मानो वह जीवन भर उसी अपमान और कलंक का बोझ ढोता रहे। इस तरह अफ्रीका के इतिहास के सबसे शक्तिशाली योद्धा और राजा का जन्म एक अभिशाप और अपमान से शुरू हुआ। विवश होकर सेंज़ांगाखोना ने नांडी को अपनी तीसरी पत्नी के रूप में स्वीकार तो कर लिया, किंतु उन्हें कभी मुख्य पत्नी का सम्मान नहीं दिया और शाका को भी कभी अपना वास्तविक उत्तराधिकारी नहीं माना।
राजमहल के षड्यंत्रों और पिता की उपेक्षा के बीच शाका के शुरुआती छह वर्ष बीते। अंततः सेंज़ांगाखोना की अन्य पत्नियों की ईर्ष्या, अहंकार और लगातार रची जाने वाली साज़िशों के कारण नांडी और नन्हे शाका को ज़ुलू गाँव से बड़े अपमान के साथ निकाल दिया गया। बेसहारा नांडी अपने छोटे बेटे को लेकर कुछ आशाओं के साथ अपने मायके, यानी लांगेनी कबीले में लौट आईं। लेकिन वहाँ उनके लिए न शांति थी, न आश्रय। लांगेनी इलाके में शाका और नांडी का जीवन जीता-जागता नरक बन गया। एक पितृहीन, अवैध संतान के रूप में शाका को रोज़ समाज की फटकार, घृणा और क्रूरता झेलनी पड़ती थी। लांगेनी गाँव के दूसरे बच्चे उसे घेरकर पत्थर फेंकते, मारते-पीटते और अत्यंत गंदी भाषा में गालियाँ देते थे। उसे कायर और कमज़ोर कहकर उसका उपहास किया जाता था, और कोई उसके साथ न उठता-बैठता था, न खेलता था।
भोजन के अभाव में माँ-बेटे को कई-कई दिन भूखा रहना पड़ता था, फिर भी लांगेनी के लोग अपनी आँखों के सामने उनकी यह दुर्दशा देखकर आनंद लेते थे। सबसे पीड़ादायक बात थी माँ नांडी का निरंतर होता अपमान। लांगेनी के बड़े-बूढ़े नांडी को चरित्रहीन और व्यभिचारिणी कहकर ताने मारते थे। शाका के किशोर मन पर इन सारी निर्मम घटनाओं ने गहरा घाव कर दिया। वह रोज़ अपनी माँ के आँसू देखकर रोता था, पर वही आँसू धीरे-धीरे एक भयानक आग और क्रोध में बदलते जा रहे थे। बहुत छोटी उम्र में ही वह समझ गया था कि इस संसार में कमज़ोर होने का अर्थ है विनाश। उसके भीतर प्रतिशोध का एक दुर्दम्य तूफ़ान उठने लगा। उसने मन ही मन प्रण किया कि जिन लोगों ने आज उसकी माँ की आँखों में आँसू भरे हैं और उन्हें एक तुच्छ कीड़े के समान ठहराया है, एक दिन वे उसके पैरों में गिरकर खून की उल्टियाँ करते हुए प्राणों की भीख माँगेंगे। लांगेनी गाँव की धूल-मिट्टी पर अपने खून और आँसुओं से शाका एक निर्दय भविष्य का नक्शा खींच रहा था।
समय के साथ लांगेनी लोगों के अत्याचार असहनीय होते गए और अकाल तथा उत्पीड़न का भय भी बढ़ता गया। ऐसी स्थिति में अपने और अपने पुत्र शाका के प्राण बचाने के लिए नांडी ने एक बार फिर पलायन का रास्ता चुना। माँ-बेटे अपनी पहचान छिपाकर लंबा सफ़र तय करते हुए अंततः मथेथ्वा राज्य (आज के क्वाज़ुलू-नेटाल क्षेत्र) के अधीन 'एम्डलेत्शेनी' समुदाय के पास पहुँचे। वहाँ उन्हें आश्रय मिला और नए वातावरण में शाका का जीवन धीरे-धीरे एक नई दिशा में बढ़ने लगा।
उस समय विशाल और प्रभावशाली मथेथ्वा राज्य के सर्वोच्च शासक प्रसिद्ध राजा डिंगिस्वायो थे। मथेथ्वा समाज में अपनी जगह बनाने के साथ-साथ शाका ने आगे चलकर मथेथ्वा सेना में भर्ती ले ली। उनका असाधारण साहस, शारीरिक क्षमता और युद्ध-कौशल धीरे-धीरे सबका ध्यान खींचने लगा। यही सैन्य अनुभव शाका के जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ और आगे चलकर उन्हें एक असाधारण योद्धा और सैन्य नेता के रूप में गढ़ गया।
लगभग 1812 ई. में युवा शाका 'इज़िस्वे' नामक वयस्क-सैनिक रेजिमेंट में शामिल हुए। पहले युद्ध में उनके प्रदर्शन की अच्छी रिपोर्ट मिलने पर रेजिमेंट के नायक भूज़ा उन्हें डिंगिस्वायो के सामने ले गए। डिंगिस्वायो ने उनसे कुछ प्रश्न पूछे और उनके नेतृत्व-गुण तथा बुद्धिमत्ता को पहचान लिया।
बचपन का वह कमज़ोर और प्रताड़ित बालक अब छह फुट तीन इंच लंबे, बलिष्ठ और निडर युवक में बदल चुका था। शाका केवल एक योद्धा नहीं थे, वे युद्धक्षेत्र के एक प्रचंड प्रतिभाशाली वैज्ञानिक भी थे। उन्होंने अफ्रीकी युद्ध-कौशल में क्रांतिकारी परिवर्तन किए। पहले योद्धा दूर से लंबे भाले फेंकते थे और ढाल के पीछे छिपकर लड़ते थे, जो शाका को अत्यंत कायरतापूर्ण और समय की बर्बादी लगता था। उन्होंने 'इक्ल्वा' नामक एक छोटा, चौड़े फलक वाला भयानक भाला ईजाद किया, जिससे शत्रु के बिल्कुल निकट जाकर उसका पेट चीरकर उसे मारा जा सकता था। जब यह हथियार शत्रु के शरीर से बाहर खींचा जाता, तो उससे एक भयावह आवाज़ निकलती थी, और इसी कारण इसका नाम इक्ल्वा पड़ा। साथ ही उन्होंने गाय की खाल से बनी बड़ी ढालों का उपयोग शुरू किया और प्रसिद्ध 'बैल-सींग' व्यूह की शुरुआत की, जिसमें सेना तीन भागों में बँटकर शत्रु को चारों ओर से घेरती और उसका पूरा सफ़ाया कर देती थी। शाका अपने सैनिकों से नंगे पाँव काँटों और पत्थरों पर दौड़ने का अभ्यास करवाते थे, जिससे वे किसी भी परिस्थिति के लिए कठोर बन गए।
शाका की इस नई युद्ध-नीति और उनके असाधारण, निर्मम साहस ने उन्हें डिंगिस्वायो का सबसे विश्वसनीय और श्रेष्ठ सेनापति बना दिया। जब उनके पिता और ज़ुलू मुखिया सेंज़ांगाखोना की मृत्यु हुई, तो डिंगिस्वायो की सहायता और अपनी सेना के बल पर शाका ने अपने सौतेले भाई की हत्या कर ज़ुलू सिंहासन पर अधिकार कर लिया। जिन ज़ुलू लोगों ने कभी उन्हें गाँव से खदेड़ा था, वही अब उनके चरणों में सिर नवाने लगे। आगे चलकर एक युद्ध में डिंगिस्वायो की मृत्यु के बाद शाका ने मथेथ्वा साम्राज्य को भी अपने नियंत्रण में ले लिया और आसपास के सभी कबीलों को अपने अधीन करके एक विशाल ज़ुलू साम्राज्य की स्थापना की। अब शाका किसी छोटे-से गाँव के मुखिया नहीं रहे थे, वे एक विशाल साम्राज्य के अखंड और निर्दय शासक थे। उनका नाम सुनते ही शत्रुओं के हृदय भय से काँप उठते थे और आसपास के राजा उनके सामने आत्मसमर्पण करने में ही अपनी भलाई समझते थे। फिर भी इतनी शक्ति, संपत्ति और सम्मान पाने के बाद भी उनके मन से बचपन का वह दाग़ नहीं मिटा था। लांगेनी लोगों का वह घिनौना उपहास, पत्थरों की मार और माँ नांडी के असहाय आँसू उन्हें रात को सोने नहीं देते थे। उस पुराने हिसाब को चुकता करने का, प्रतिशोध की आग में उस गाँव को जलाकर राख कर देने का समय आ गया था। शक्ति और सत्ता के शिखर पर पहुँचकर एक दिन शाका ने अपनी दुर्दम्य और रक्तपिपासु सेना को लांगेनी क्षेत्र की ओर कूच करने का आदेश दिया। ज़ुलू सेना के क़दमों की धमक से पूरी धरती काँप उठी। यह ख़बर पाकर लांगेनी के लोग भय से आतंकित हो गए। वे जानते थे कि जो शाका कभी एक असहाय बालक था, वह आज दक्षिण अफ्रीका का सबसे क्रूर सम्राट है और क्षमा क्या होती है, यह वह जानता ही नहीं। जब शाका की विशाल सेना ने लांगेनी गाँव को चारों ओर से घेर लिया, तो वहाँ मृत्यु जैसा भयावह सन्नाटा छा गया। किसी के मुँह से एक शब्द नहीं निकल रहा था। शाका अपनी विशेष राजसी वेशभूषा धारण कर, अपना प्रिय हथियार थामे, एक ऊँचे स्थान पर खड़े हुए। उनकी आँखों में प्रतिशोध की रक्तिम ज्वाला थी। उन्होंने आदेश दिया कि लांगेनी के सभी निवासी, बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष, बिना किसी हथियार के उनके सामने इकट्ठा हों। सब सिर झुकाए, भय से थरथराते हुए आकर जमा हो गए। फिर शाका ने अपनी गरजती आवाज़ में एक लंबा भाषण देना शुरू किया। उन्होंने उन बीते दिनों को याद किया जब उनके पास खाने को मुट्ठी भर अनाज नहीं था और किसी ने भी उनकी माँ को आश्रय नहीं दिया था। उन्होंने एक-एक करके उन घटनाओं का वर्णन किया जब उन्हें 'कायर', 'अनाथ', 'कुत्ता' और 'बिना बाप का बच्चा' कहकर उन पर थूका गया था। उन्होंने गरजकर कहा कि आज वही शाका यहाँ खड़ा है, जिसे वे अपने पैरों की धूल से भी तुच्छ समझते थे। शाका ने कहा कि आज उनकी छाया मृत्युदूत की तरह उन सब पर मंडरा रही है और आज लांगेनी के पापों का घड़ा भर चुका है।
लोककथाओं के अनुसार इसके बाद शाका ने अपने सैनिकों को आदेश देकर लांगेनी के लोगों को दो भागों में बाँट दिया। जिन थोड़े-से लोगों ने बचपन में उनके या उनकी माँ के प्रति थोड़ी भी सहानुभूति दिखाई थी, या कम से कम उन्हें सताया नहीं था, उन्हें एक सुरक्षित पक्ष में रखा गया। उदाहरण के लिए, एक ग़रीब वृद्ध ने कभी भूखे बालक शाका को उबले मांस का एक टुकड़ा खाने को दिया था और एक अन्य व्यक्ति ने उन्हें पीने को पानी दिया था। शाका ने उन्हें पहचान लिया और क़ीमती गाय-बैल देकर उन्हें पुरस्कृत किया। लेकिन दूसरे पक्ष में वे असंख्य लोग थे जिन्होंने उन्हें शारीरिक और मानसिक यातनाएँ दी थीं, उनकी माँ के चरित्र की हत्या की थी और उन्हें गाँव से निकालने में मुख्य भूमिका निभाई थी। शाका की स्मरण-शक्ति इतनी तेज़ थी कि उन्होंने भीड़ में से एक-एक करके अपने उत्पीड़कों को पहचान लिया। दशकों बीत जाने पर भी वे किसी का चेहरा नहीं भूले थे। जब उन अपराधियों को अलग किया गया, तो वे समझ चुके थे कि आज उनका अंतिम दिन है।
इसके बाद अफ्रीकी इतिहास के सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाले, निर्मम और बर्बर प्रतिशोध की शुरुआत हुई। शाका अपने इन पुराने शत्रुओं को कोई साधारण मृत्युदंड नहीं देना चाहते थे, जिसमें एक ही वार में जीवन समाप्त हो जाए। वे चाहते थे कि वे बूँद-बूँद करके उसी तरह कष्ट पाएँ जैसे उन्होंने अपने बचपन में पाया था। उन्होंने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि दोषी ठहराए गए हर व्यक्ति को जीवित ही शूली पर चढ़ा दिया जाए। उस दिन लांगेनी की भूमि शवों और रक्त से रंग गई। अत्यंत नुकीली, लंबी लकड़ी की शूलियाँ तैयार की गईं। फिर एक के बाद एक लोगों को निर्वस्त्र करके, उनके हाथ-पाँव बाँधकर उन तीखी शूलियों पर बैठा दिया गया। शरीर के भार और गुरुत्वाकर्षण के कारण वह लकड़ी की शूली गुदा मार्ग से शरीर के भीतर घुसती जाती और धीरे-धीरे भीतरी अंगों को चीरती हुई छाती या गर्दन के पास से बाहर निकल आती। यह पीड़ा इतनी अकथनीय और भयानक थी कि मनुष्य तुरंत नहीं मरता था, बल्कि अपनी अंतड़ियों के फटने की यातना झेलते हुए घंटों, और कभी-कभी दो-तीन दिनों तक, कड़ी धूप में तड़पता रहता, खून की उल्टियाँ करता और अंत में प्राण त्याग देता था। पूरे इलाके में चारों ओर केवल चीख़ें, भयानक रुदन और प्राणों की भीख माँगती प्रार्थनाएँ सुनाई दे रही थीं। शाका एक विशाल पत्थर के आसन पर बैठे, मृत्यु के इस तांडव को बड़े इत्मीनान से अपनी आँखों के सामने देख रहे थे। उनके चेहरे पर न कोई दया थी, न विचलन, न पश्चात्ताप का कोई चिह्न। जब कोई व्यक्ति पीड़ा से बहुत ज़ोर से चीख़ता, तो शाका मुस्कुराते हुए उसे वे दिन याद दिला देते जब वह एक छोटे बच्चे को लात मारकर उसकी तकलीफ़ देखकर उल्लास मनाया करता था। लांगेनी गाँव का नीला आकाश मांसभक्षी पक्षियों और गिद्धों के शोर से काला पड़ गया था। जिस गाँव ने कभी नांडी और शाका को एक रात का आश्रय देने से भी इनकार कर दिया था, आज वही गाँव एक विशाल खुले श्मशान में बदल गया था। शाका ने सिद्ध कर दिया था कि जिसने भी उन्हें और उनकी माँ को चोट पहुँचाई, उसे इस पृथ्वी पर साँस लेने का कोई अधिकार नहीं है। यह भीषण नरसंहार और निर्मम प्रतिशोध केवल लांगेनी लोगों को दंड देने के लिए नहीं था, यह शाका की सत्ता का एक स्पष्ट संदेश भी था। वे पूरे अफ्रीका को बता देना चाहते थे कि ज़ुलू साम्राज्य के सम्राट का विरोध करने या उससे शत्रुता मोल लेने का परिणाम कितना भयावह हो सकता है। इस घटना के बाद शाका की क्रूरता और साम्राज्य-विस्तार की भूख और बढ़ गई। उनकी माँ नांडी ही उनके जीवन की एकमात्र ऐसी व्यक्ति थीं जिन्हें वे बहुत प्रेम करते थे और ईश्वर की तरह पूजते थे। नांडी को हर प्रकार की सुरक्षा देना, उन्हें राजमाता का सर्वोच्च सम्मान प्रदान करना और उनकी हर इच्छा पूरी करना शाका के जीवन का मुख्य उद्देश्य बन गया था।
इतिहासकारों का मत है कि शाका की यह अत्यधिक क्रूरता, रक्तपात और मानसिक अस्थिरता उनके उसी अभिशप्त और प्रताड़ित बचपन का सीधा परिणाम थी। यदि लांगेनी समाज ने उन्हें और उनकी माँ को स्नेह, आश्रय और सम्मान के साथ अपनाया होता, तो शायद दक्षिण अफ्रीका का इतिहास कुछ और ही होता। एक समाज ने अपने अहंकार, परंपरा के गर्व और कुसंस्कारों के वश में होकर एक निष्पाप शिशु के साथ जो अमानवीय व्यवहार किया, उसी ने एक ऐसे भयानक दानव को जन्म दिया जिसने अंत में उसी समाज को निगल लिया। शाका ज़ुलू का यह प्रतिशोध केवल लांगेनी गाँव के लोगों का विनाश नहीं था, यह मानवता के उस अंधकारमय पक्ष का जीता-जागता उदाहरण था जहाँ निरंतर अत्याचार से ही दुनिया के सबसे भयंकर अत्याचारी का जन्म होता है। आगे चलकर उनके विशाल साम्राज्य के विस्तार में हज़ारों निर्दोष लोगों ने जान गँवाई और अनगिनत गाँव नष्ट हो गए, जिसे अफ्रीकी इतिहास में 'म्फेकाने' (Mfecane, यानी महाविपत्ति या विनाश) कहा जाता है। लेकिन उन सभी युद्धों, हाहाकार और रक्तपात का मूल स्रोत लांगेनी गाँव के उन्हीं धूल भरे दिनों में छिपा था, जहाँ एक नन्हे बालक ने अपमान, भूख और अपनी माँ के अनवरत आँसुओं को झेला था।
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(विशेष सूचना: राजा शाका के जन्म के समय उनके पिता द्वारा उन्हें 'इ-शाका' (पेट का रोग या कीड़ा) कहा जाना, लांगेनी गाँववासियों द्वारा बचपन में अत्यधिक अमानुषिक यातनाएँ दिया जाना, और बाद में उसी गाँव के लोगों को इकट्ठा करके जीवित शूली पर चढ़ाकर भयानक प्रतिशोध लेना जैसे कुछ रोंगटे खड़े कर देने वाले वर्णनों को आधुनिक इतिहासकार पूर्णतः सत्य नहीं मानते। कुछ इतिहासकारों के अनुसार, यूरोपीय उपनिवेशकों और परवर्ती काल के लेखकों ने शाका के व्यक्तित्व को अत्यधिक क्रूर, निर्दय और रक्तपिपासु दिखाने के लिए ऐसी अनेक किंवदंतियों और जनश्रुतियों का सहारा लिया था। फिर भी, प्रचलित इतिहास और किंवदंतियों में शाका ज़ुलू के संबंध में जो कथाएँ मिलती हैं, उन सबको एकत्र करके यह निबंध तैयार किया गया है।)
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