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रविवार, 18 अक्टूबर 2026

टॉर्च ने कैसे कुछ ओड़िया शब्दों को जन्म दिया, और उसी टॉर्च के कारण कैसे हमने उन्हें कैसे खो दिया?

होमो सेपियन्स का इतिहास एक तरह से अंधकार के विरुद्ध लंबे संघर्ष का इतिहास है। जीवविज्ञान की दृष्टि से मनुष्य दिन में सक्रिय रहने वाला प्राणी है, और उसकी आँखें सूर्य के प्रकाश में देखने के लिए बनी हैं। प्राचीन काल में रात का अंधेरा हमारे पूर्वजों के लिए भयानक समय था, जब हिंसक जानवर शिकार पर निकलते थे। सैकड़ों हज़ार वर्ष पहले हमारे पूर्वजों ने आग को नियंत्रित करना और अपनी ज़रूरत के हिसाब से उसका उपयोग करना सीखा। इस क्षमता ने उन्हें अनेक जैविक सीमाओं से मुक्त कर दिया।
आग केवल खाना पकाने या गर्मी पाने के लिए नहीं थी। वह रात के अंधेरे पर क़ब्ज़ा करने का मनुष्य का पहला तकनीकी हथियार थी। मशाल, दीपक, मोमबत्ती, डिबिरी और लालटेन, ये सब उसी आग को क़ाबू में रखने के अलग-अलग पुराने तरीक़े थे। पर इन सब साधनों में एक बड़ी कमज़ोरी थी। ये अस्थिर थे, हवा से बुझ जाते थे, इनसे आग लगने का ख़तरा रहता था, और इन्हें लेकर आसानी से दौड़ा भी नहीं जा सकता था। उन्नीसवीं सदी के अंत तक रात पर मनुष्य का राज इसी आग के छोटे-से घेरे में बँधा रहा।
क्रांतिकारी बदलाव तब आया जब मनुष्य ने बिजली को वश में करना सीखा। पर शुरुआती विद्युत प्रणालियाँ विशाल थीं, बड़े-बड़े जनरेटरों और तारों के जाल में बँधी हुई। उन्हें साथ लेकर घूमना या दौड़ना असंभव था। 1880 के दशक के अंत में विकसित हुई शुष्क बैटरी (ड्राई सेल) और छोटे इनकैंडेसेंट बल्ब ने इस दिशा में नई आशा जगाई। सन् 1899 में अमेरिका में रहने वाले एक ब्रिटिश आविष्कारक डेविड मिसेल ने बेलनाकार कागज़ की नली के भीतर तीन D-साइज़ ज़िंक-कार्बन बैटरियाँ, पीतल का एक छोटा परावर्तक (रिफ़्लेक्टर) और एक नन्हा बल्ब जोड़कर एक नया यंत्र बनाया। उसके एक सिरे पर कॉन्टैक्ट स्विच था। मानव इतिहास के हाथ में पकड़े जा सकने वाले शुरुआती प्रकाश-यंत्रों में यह एक था, यानी पहली टॉर्च या फ़्लैशलाइट। मिसेल का पेटेंट कॉनराड ह्यूबर्ट को मिला, जो रूस से आए प्रवासी थे। उनकी कंपनी ने यह यंत्र बेचा, और बाद में उन्होंने प्रसिद्ध एवरेडी कंपनी खड़ी की।
शुरुआत में इस यंत्र का नामकरण उस समय की तकनीक और लोगों की सोच दोनों को दर्शाता था। अमेरिका में इसे "फ़्लैशलाइट" कहा गया। उस समय की ज़िंक-कार्बन बैटरियाँ बहुत कमज़ोर थीं और कार्बन फ़िलामेंट वाला बल्ब बहुत बिजली खींचता था। इसलिए यह रोशनी लगातार देर तक जलाए नहीं रखी जा सकती थी। कुछ सेकंड जलने के बाद बैटरी को "आराम" देना पड़ता था। लोग अंधेरे में बस एक झलक, एक "फ़्लैश" देखने के लिए इसका इस्तेमाल करते थे, और यही नाम चल पड़ा। बाद के दशकों में टंगस्टन फ़िलामेंट और बेहतर बैटरियाँ आईं और रोशनी लगातार जलने लगी, फिर भी अमेरिकी अंग्रेज़ी में "फ़्लैशलाइट" नाम हमेशा के लिए टिक गया। ब्रिटिश अंग्रेज़ी में इसे "टॉर्च" कहा गया। यह शब्द मध्य-अंग्रेज़ी के torch या torche से आया है, जिसका अर्थ था बड़ी मोमबत्ती, जलती हुई लकड़ी, और लाक्षणिक अर्थ में सूर्य की किरण। इसकी जड़ें पुरानी फ़्रेंच torche या torque में मिलती हैं, यानी मशाल या मरोड़ी हुई घास-पुआल का पूला। उसके आगे की व्युत्पत्ति अनिश्चित है। संभवतः यह लोक-लैटिन (वल्गर लैटिन) के *torca ("मरोड़ी हुई या कुंडलाकार वस्तु") से आया है। संभव है कि ज्वलनशील पदार्थ में डुबोए गए, मरोड़े हुए पौधों के रेशों से बनी मशाल के लिए यह अर्थ रहा हो। Torca लैटिन torqua का रूप है, जो torquis ("मरोड़े हुए धातु का हार या कंगन", जिससे "टॉर्क" शब्द बना) का एक रूप है। Torquis का संबंध लैटिन torqueō ("मरोड़ना, घुमाना") से है। इसलिए भाषाविद् "टॉर्च" शब्द की जड़ प्रोटो-इंडो-यूरोपीय मूल *terkʷ- ("मरोड़ना, घुमाना") तक ले जाते हैं। इस दृष्टि से संस्कृत के तर्क और तर्कु (तकली या स्पिंडल) के साथ "टॉर्च" का सगोत्र संबंध हो सकता है, क्योंकि आधुनिक भाषाविद् इन शब्दों को भी उसी *terkʷ मूल का मानते हैं।
ब्रिटेन में "टॉर्च" पहले जलती हुई मशाल को ही कहते थे। जब बैटरी से चलने वाली, हाथ में पकड़ी जा सकने वाली बिजली की बत्ती आई, तो अंग्रेज़ों ने अपनी पुरानी मशाल का सांस्कृतिक प्रतीक इस नए विद्युत यंत्र पर चढ़ा दिया।
यह यंत्र केवल एक वस्तु नहीं था। यह मनुष्य के मनोविज्ञान और सामाजिक गतिशीलता को बदल देने वाला एक विराट औज़ार था। लालटेन या दीपक का प्रकाश चारों दिशाओं में फैलता है, इसलिए देखने वाला और देखी जाने वाली वस्तु, दोनों रोशन होते हैं। पर टॉर्च की रोशनी एकतरफ़ा और तीखी थी। जो इसे पकड़ता, वह अंधेरे में छिपा रहकर सामने के व्यक्ति या वस्तु पर रोशनी डाल सकता था। यह नियंत्रण और सत्ता का एक शक्तिशाली माध्यम बन गया। प्रथम विश्वयुद्ध में खाइयों (ट्रेंच) के भीतर लड़ते सैनिकों के लिए यह एक अनिवार्य साधन बन गया। पुलिस, रात के पहरेदारों और आम लोगों के लिए इसने रात को डर से मुक्त समय में बदल दिया। होमो सेपियन्स अब आग का ग़ुलाम नहीं रहा। वह सूर्य का एक छोटा-सा अंश अपनी जेब में लेकर घूमने में सक्षम हो गया।
परंतु भारत में इस आधुनिक यंत्र का प्रवेश कोई स्वाभाविक व्यापारिक प्रक्रिया नहीं था। यह साम्राज्यवादी सत्ता के एक प्रतीक के रूप में आया। बीसवीं सदी के आरंभ में भारत ब्रिटिश शासन के अधीन एक कृषि-प्रधान और अपेक्षाकृत अँधेरा भूभाग था। कलकत्ता और बंबई जैसे कुछ बड़े शहरों को छोड़कर पूरा भारत रात होते ही केरोसिन की लालटेन, डिबिरी और मिट्टी के दीयों पर निर्भर रहता था। शाम होते ही हिंसक जानवरों के डर से लोग घर से नहीं निकलते थे, और अगर निकलना बहुत ज़रूरी होता, तो लालटेन या निआँहुला (जलती हुई पुआल का गुच्छा) या मशाल लेकर जाते थे। पर बारिश और हवा में मशाल और लालटेन के बुझने का डर रहता था, और आग लगने का ख़तरा भी। लोग ऐसी सुरक्षित व्यवस्था ढूँढ रहे थे जिसमें ये दोनों समस्याएँ न हों, फिर भी रोशनी मिल सके।
उसी समय ब्रिटिश अधिकारी, पुलिस प्रशासक और धनी ज़मींदार विदेश से मँगाई गई, हाथ में पकड़ी जाने वाली टॉर्च का उपयोग करने लगे। भारत के ग़रीब, अँधेरे में जीने वाले ग्रामीण लोगों के लिए यह यंत्र जादू और सत्ता का प्रतीक था। न बाती, न तेल, बस एक लोहे की नली के भीतर से आँखें चौंधिया देने वाली रोशनी निकलना, आधुनिक विज्ञान का सबसे आश्चर्यजनक प्रदर्शन था।
1920 के दशक तक नेशनल कार्बन कंपनी (जो तब तक यूनियन कार्बाइड का हिस्सा बन चुकी थी, एवरेडी ब्रांड की निर्माता) ने भारत में अपना व्यावसायिक अड्डा जमा लिया। शुरू में वे अमेरिका और ब्रिटेन से बैटरियाँ और टॉर्च मँगाकर बेचते थे। पर भारतीय बाज़ार की विशाल संभावना को देखकर 1939 में कलकत्ता में पहला बैटरी कारख़ाना स्थापित हुआ। यह एक बड़े परिवर्तन की शुरुआत थी। जो चीज़ पहले केवल गोरे साहबों और ज़मींदारों की विलासिता थी, वह धीरे-धीरे भारतीय मध्यवर्ग और ग्रामीण समाज के दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बन गई। टॉर्च आने से गाँवों में रात का आना-जाना आसान हुआ, साँपों और हिंसक जानवरों का डर घटा, और किसान रात में भी खेतों में पानी लगाने जाने लगे। टॉर्च केवल एक यंत्र नहीं थी। वह आधुनिकता का प्रतीक थी, जिसने अँधेरे ग्रामीण भारत को दुनिया की औद्योगिक क्रांति से जोड़ा।
इस तकनीकी प्रवेश का सबसे आकर्षक अध्याय ओडिशा के भाषाई और सांस्कृतिक रूपांतरण में छिपा है। जब कोई पूरी तरह अपरिचित, नई तकनीक किसी समाज में आती है, तो उस समाज की सामूहिक चेतना उसे अपने पारंपरिक शब्द-भंडार के ज़रिए समझने की कोशिश करती है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है। वह मनुष्य की सोच और ज्ञान-पद्धति का जीवंत प्रतिबिंब है। जब यह नई हाथ की टॉर्च ओडिशा पहुँची, तो ओड़िया भाषी लोगों ने उसे केवल एक विदेशी शब्द के रूप में नहीं अपनाया। उन्होंने उसके गुण, उपयोग और तकनीक के आधार पर उसे अलग-अलग नाम दिए। ये नाम थे: बिजुली बत्ती, टिपाबत्ती और चोराबत्ती।
पहला नाम है 'बिजुली बत्ती'। गोपालचंद्र प्रहराज द्वारा संकलित ओड़िया शब्दकोश पूर्णचंद्र भाषाकोश के अनुसार इसका अर्थ है "कृत्रिम उपाय से उत्पन्न विद्युत शक्ति से प्रज्वलित प्रकाशमय दीप", और विशेष रूप से इसे "टॉर्च लाइट" से जोड़ा गया है। इस नाम में एक अद्भुत दार्शनिक समन्वय है। 'बिजुली' शब्द आकाश से गिरने वाली उस प्राकृतिक शक्ति को बताता है जो मनुष्य के लिए भय और विस्मय का कारण थी। और 'बत्ती' (संस्कृत 'वर्त्ति' से, अर्थात् बाती या दीप) एक पारंपरिक, रोज़मर्रा की घरेलू वस्तु को दर्शाती है। इन दो शब्दों को जोड़कर ओड़िया सामूहिक चेतना ने एक नई वास्तविकता को स्वीकार किया कि अब आकाश की भयंकर बिजली को मनुष्य अपनी मुट्ठी में एक बत्ती या दीपक की तरह थाम सकता है। यह शब्द तकनीक के मूल स्रोत, यानी बिजली, को लेकर गढ़ा गया था।
दूसरा नाम था 'टिपाबत्ती'। इस शब्द की उत्पत्ति मनुष्य और मशीन के बीच के भौतिक संबंध से हुई। शब्दकोश में 'टिपा' के अनेक अर्थ दिए गए हैं, जैसे लिखकर रखा गया स्मरण-पत्र, बूँद या धब्बा, सुई से सिलाई का काम आदि। पर यहाँ 'टिपा' मुख्यतः 'टिपिबा' यानी स्विच दबाने की क्रिया से आया है। हज़ारों वर्षों तक मनुष्य रोशनी जलाने के लिए रगड़ता रहा, चकमक पत्थर ठोंकता रहा, या आग सुलगाता रहा। यह शारीरिक श्रम वाली प्रक्रिया थी। पर इस नए यंत्र ने ज्ञान के स्तर पर बड़ा परिवर्तन ला दिया। बस उँगली की नोक से ज़रा-सा दबा देने पर रोशनी जल उठती थी। यह सरल, यांत्रिक प्रक्रिया उस ज़माने के लोगों को इतनी अनूठी और आश्चर्यजनक लगी कि उन्होंने यंत्र का नाम उसके इस्तेमाल के तरीक़े पर रख दिया। जो बत्ती टिपने से जले, वही 'टिपाबत्ती'। यह तकनीकी नियंत्रण का एक सुंदर भाषाई प्रतिबिंब है।
तीसरा और सबसे दिलचस्प नाम है 'चोराबत्ती'। कुछ क्षेत्रों में यह शब्द 'चुराबत्ती' के रूप में भी प्रचलित हो गया। शब्दकोश के अनुसार 'चोरा' का अर्थ है छिपा हुआ, गुप्त, या सबकी नज़र से दूर (जैसे चोरा-प्रीति, यानी छिपा हुआ प्रेम)। इस नामकरण के पीछे केवल यंत्र की बनावट नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक दृष्टि भी छिपी है। प्राचीन काल से मशाल, लालटेन या दीपक एक सामाजिक प्रकाश था। जब कोई रात में मशाल या लालटेन लेकर चलता, तो पूरा गाँव जान जाता था कि कौन आ रहा है, क्योंकि दीप, डिबिरी, निआँहुला, मशाल और लालटेन की रोशनी चारों ओर फैलती थी, और उसे ले जाने वाले व्यक्ति के चेहरे को, या दीप, डिबिरी और निआँहुला के पास बैठे व्यक्ति के चेहरे को भी रोशन करती थी। पर हाथ में पकड़ी जाने वाली टॉर्च की रोशनी अलग थी। उसका प्रकाश एक निश्चित दिशा में सीधी रेखा में जाता था। जो टॉर्च पकड़े होता, वह पूरे अंधकार में छिपा रह सकता था, फिर भी जिस पर रोशनी डाले, उसे साफ़ देख सकता था। यह छिपकर, चोरी-छिपे देखने का माध्यम था। चोर अंधेरे में छिपकर रोशनी डालकर चीज़ें खोजने के लिए, या घर के मालिक छिपे हुए चोर को पकड़ने के लिए इसका उपयोग करते थे। इस गुप्त और एक ही दिशा में जाने वाली रोशनी के स्वभाव के कारण लोगों ने इसे 'चोराबत्ती' नाम दे दिया। यह शब्द प्रमाण है कि ओड़िया भाषा किसी तकनीक के सामाजिक प्रभाव को कितनी बारीक़ी से माप सकती थी।
पर समय के साथ ये तीनों अत्यंत अर्थपूर्ण और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध ओड़िया शब्द, बिजुलीबत्ती, टिपाबत्ती और चोराबत्ती, लोगों की ज़बान से लुप्त हो गए और उनकी जगह अंग्रेज़ी शब्द 'टॉर्च' स्थायी रूप से चल पड़ा। यह कैसे और क्यों हुआ, इसका संबंध भाषाविज्ञान से कम और वैश्वीकरण, पूँजीवाद और व्यावसायिक साम्राज्यवाद की कहानी से ज़्यादा है। जब कोई चीज़ औद्योगिक बड़े पैमाने के उत्पादन की प्रक्रिया में प्रवेश करती है, तो उसकी स्थानीय पहचान मिटने लगती है। जब टॉर्च और बैटरियाँ कारख़ानों से पैकेट में बंद होकर ओडिशा के गाँवों की दुकानों तक पहुँचीं, तो उन पैकेटों पर अंग्रेज़ी में बड़े अक्षरों में 'Torch' या 'Flashlight' लिखा था। विज्ञापनों, अख़बारों और कंपनी के एजेंटों ने हमेशा इसे 'टॉर्च' कहकर प्रचारित किया।
इसके अलावा, उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में शिक्षा व्यवस्था के प्रसार के साथ अंग्रेज़ी भाषा सत्ता, आधुनिकता और संभ्रांत वर्ग का प्रतीक बन चुकी थी। आम इंसान का मनोविज्ञान है ताक़तवर की नक़ल करना। बड़े अफ़सर, डॉक्टर और अंग्रेज़ी पढ़े बाबू दुकान पर जाकर 'टॉर्च' माँगते थे, तो साधारण ग्रामीण लोग भी ख़ुद को आधुनिक साबित करने की आशा में अपने देशी शब्द छोड़कर 'टॉर्च' कहना बेहतर समझने लगे। दुकानदारों को भी व्यावसायिक मानकीकरण के कारण एक साझा नाम इस्तेमाल करना आसान लगा। जब भाषा पर बाज़ार का नियंत्रण स्थापित होता है, तब सूक्ष्म दार्शनिक या वर्णनात्मक शब्द मर जाते हैं, और उनकी जगह व्यावसायिक ब्रांड या आसानी से आयात किए गए शब्द जीवित रहते हैं।
आज 'बिजुली बत्ती' शब्द टॉर्च के बजाय साधारण बिजली की रोशनी के लिए इस्तेमाल हो रहा है, और 'चोराबत्ती' तथा 'टिपाबत्ती' शब्द केवल शब्दकोश के पीले पड़ चुके पन्नों में या बुज़ुर्गों की स्मृतियों में सिमटकर रह गए हैं। सेपियन्स ने अपनी सुविधा के लिए केवल आग और अंधकार को वश में नहीं किया। उसने एक ही वैश्विक बाज़ार की सुविधा के लिए अपने बहुरंगी, सांस्कृतिक गहराई वाले अनेक शब्दों की भी बलि दे दी। अंधकार पर विजय की इस यात्रा में ओड़िया भाषा के कुछ सुंदर शब्द इतिहास के गर्भ में हमेशा के लिए अंधेरे में खो गए हैं।