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शनिवार, 28 मार्च 2015

देवी का रात्रभ्रमण

एक गाँव मेँ एक देवी को लोग प्रत्यक्ष मानाकरते थे । देवी अपने भक्तोँ को अपनी दिव्य शक्तिओँ का आभास किया करती थी । देवी के पास हर तरह का बलि दिया जाता था , परंतु वर्ष मेँ केवल एक दिन को छोड़कर बाकी दिनोँ मेँ देवी को उनके भक्त बड़े भक्तिभाव से फल और बिभिन्न प्रकार के शाकभाजी आदि को भोग लगाने के लिये अर्पण किया करते थे ।
देखते देखते 20वीँ सदी खत्म हुआ और 21वी सदी के 2005 साल मेँ उसगाँव मेँ देवी नेँ अपना प्रत्यक्ष चमत्कार दिखाना शुरुकरदिया । अब लोगोँ के खेत और बाड़ी से शाकसब्जी अपने आप गायब होनेलगा और हर रोज सुबह देवी मंदिर के निकट सब्जी का बचाहुआ अदरकारी अंश गिराहुआ पायाजाता था ।
रामुकाका जो देवी के बड़े भक्त थे गाँव मेँ इसे देवी का चमत्कार कहते फिर रहे थे ,उन्होने लोगोँ को यकिन दिलादिया था कि यह सब देवी हीँ कर रहीँ है ।
देखते देखते एक वर्ष बीतगया , गाँव मेँ रोज रात को चमत्कार होता था ,ज्यादातर लोग देवी के रात्रभ्रमण करनेवाली बात करने लगे थे । रात 8 बजे के बाद उस छोटे से गाँव मेँ एक अजीब सा सन्नाटा छा जाता था । फिर एक रोज एक अजीब सा घटना घटा, रात का वक्त था ,गर्मीओँ के दिनोँ मेँ भी लोग देवी के डर से घर मेँ सो रहे थे । उसदिन रात को ठिक 1 बजे किसी औरत की और फिर एक मर्द के चिल्लाने कि आवाज आयी । उस छोटे से गाँव मेँ वो आर्त्तनाद किसी भयानक गर्जना कि तरह प्रतीत हो रहा था ,,,कुछ लोग हिम्मत करते हुए आवाज आ रहे दिशा कि और बढ़ने लगे ।
उन्होने देखा कि देव राय काका के घर के पश्चिमी दिशा मेँ लाल रंग कि साड़ी पहनी हुई कोई औरत बुत बनकर खड़ी हुई है ।
इससे पहले कि लोग उस औरत के बारे मेँ अपना राय बनाते ,
उनकी नजर निचे वेहोश हुए एक व्यक्ति पर पड़ा ! हालांकि लोग अब डरे हुए थे , वो उस औरत को देवी मानने लगे थे । तो कोई भी उन दोनोँ के नजदिक जानेँ के लिये तैयार न था !!!
फिर रामसरण काका वहाँ आये, वो बड़े निर्भिक नीडर व्यक्ति थे । उन्होने नजदिक जा कर देखा कि वो औरत कोई और नहीँ देव राय कि पत्नी है और निचे गिरा हुआ व्यक्ति जो उस घर के दिवार के निकट सुरंग बनारहा था ,पड़ोशी गाँव का सुखवंतलाल था ।
देवराय जी के मित्र होने के कारण रामसरण काका नेँ देवरायजी की पत्नी का बचाव करते हुए कहा "गाँववालो
भगवन जो कुछ भी करता है अपने भक्त द्वारा करवाता है । देवीनेँ देखा कि हमलोगोँ ने कई सदी तक उनका सेवा बड़े हर्श उल्लास के साथ किया । अतएब देवी आपको कष्ट न हो इसलिये हर रात आपके बाड़ी से साक सब्जिओँ के ले जाती थी । अब देवी का तो अपना शरीर है नहीँ तो उस ज्योतिर्मयी ने इस पवित्र नारी को अपने पवित्र कर्म के लिये एक जरिया बनाया ।
अब क्या था गाँव के लोग उस देवी की स्तुति गान करने लगे ! धूप नैवेद्य से गगन पवन सुबासित हो गया कल तक जहाँ देव राय लघुशंका करते थे वो रातोँरात एक पवित्र स्थान बनगया ।
दो चार दिन के बाद जब मेँ रामसरण काका से मिला और इस बारे मेँ पुछने पर असल बात पताचला ।
देव राय जी के पूर्वज कभी गाँव के जमिदार हुआ करते थे परंतु अंग्रेजोँ के चलेजाने के पश्चात गरीबी नेँ उनके वंश को निगल लिया । जैसेतैसे करके देव राय नेँ एक सरकारी नौकरी कर ली थी जिसके वजह से गाँव मेँ उनका कुछ इज्जत बचपाया था । अब च्युँकि उन्होने अपने जीवन मेँ गरीबी को नजदिक से देखा था महशुश किया था वो वक्त के साथ साथ थोड़े लालची हो गये थे । मातापिता के स्वर्गवास के बाद वो नित्यान्त अकेले हो गये और घर के कामकाज मेँ उनका मन नहीँ लगता था । ऐसे मेँ पिछले वर्ष उनका विवाह संपन्न हो गया और उस नववधू नेँ शाक सब्जी के लिये 1 वर्षतक देवी का नाटक खेला ।
उस रात को जब देवराय कि पत्नी सब्जी चुराकर लौट रही थी उसने एक आदमी को अपने घर के नजदिक सुरंग खोदते देखा और डरकर वहाँ स्तभ्ध हो खड़ी होकर रहगयी थी ।
उस रात के बाद उस गाँव मेँ
लोगोँ के हावभाव मेँ एक बदलाव देखागया ।।
लोग अब चैन कि निँद शोने लगे
च्युँकि उस कस्बे का सबसे बड़ा चोर जेल मेँ था और गाँव के प्रत्यक्ष देवी नेँ रात्रभ्रमण करना छोड़ दिया था ।

ये लाइमलाइट क्या है ?

सामान्यतः कोई अगर लगातर काम करते रहता है या चर्चा मेँ रहता हो तो कहाजाता है कि आजकल यह व्यक्ति बड़े लाईमलाईट/LIMELIGHT मेँ है ! अब लाइम या नीम्बु और लाईट यानी रोशनी का भला आपस मेँ क्या लेनादेना ? क्युँ न इसे ओरेजंलाइट या ऐपललाइट न कहजाय !!लेकिन अगर आप लाइमलाइट के बदले ऑरेँजलाईट और ऐपललाईट बोलेगेँ तो ग्रीस के राजा व थियटरका खोज करनेवालोँ को बुरा लगजायेगा । ये उनका अपमान करने जैसा होगा परंतु क्युँ ?
लाईमलाईट शब्द 1825मेँ ग्रीस मेँ खोजा गया था या युँ कहे प्रचलन मेँ लाया गया था । अब उन दिनोँ हर रोज शाम को मनोरंजन के लिये नाटक का आयोजन कियाजाता था और रात होने से पहले पहल नाटक खत्म करदियाजाता था । 1825 मेँ चुना कि सिलिण्डर से आग और आग से प्रकाश उत्पन करने कि कोशिश कियागया । ये प्रकाश स्टेज पर गिरया जाता था और इसे काफि लोगोँ ने पसंद किया । इसे लोगोँ ने लाईम लाईट नाम दिया !
इस लाइमलाइट इफेक्ट को 1820 मेँ Goldsworth y Gurney नेँ खोजा था ।
सामान्य रूप से रॉबर्ट हरे को भी इसे खोजने का क्रेडिट दियाजाता है खासकर उनके "ऑक्सी हाइड्रोजन नाल," के साथ अपने काम के आधार पर।
1825 में, एक Scottishengineer, थॉमस ड्रमंड (1797-1840), माइकल फैराडे द्वारा इस आशय का एक प्रदर्शन को देखा और उन्होने इसे अधिक खोज के लिये उत्कृष्ट पाया । Drummond नेँ इसमेँ एक उपयोगी और महत्वपूर्ण बदलाव 1826 मेँ किया और इस वजह से कभी कभी इसे Drummond Light भी कहाजाता है । जनसाधारणोँ के बीच इसका सर्ब प्रथम उपयोग
Herne Bay Pier, Kent पर 3 October 1836 रात को किया गया था । उसदिन इसे magician Ching Lau Lauro द्वारा मैजिक दिखाने के लिये उपयोग किया गया था ।

मुस्लिम लीग भारत के लिये आस्तिन का साँप था......

पराधीन भारत मेँ मुस्लिम लिग भारत के लिये आस्तिन के साँप जैसा था । कट्टरवादी मुस्लिम इस संस्था या दल को अपने हितैशी समझने लगे च्युँकि ये लोग हमेशा से हिन्दु स्वार्थ के खिलाफ बोलते थे ।
इसी क्रम मेँ मुस्लिम लीग नेँ हिन्दीभाषा पर अंकुश लगाना शुरुकरदिया । लीग हिन्दी को हिन्दु आधिपत्य का प्रतिक मानने लगी । लीग ने यहाँतक कहदिया कि अगर कंग्रेस उर्दु को राष्ट्रभाषा के तौर पर मान्यता देगा तो हम कंग्रेस को साहयता करेगेँ । सभी कट्टरवादी नेताओँ नेँ उर्दु के सम्मान मेँ नया कहावत या मुहावरा बना लिया था "ये उर्दु का जनाजा है जरा शान से निकालेँ" । हिँदी के विरोध मेँ ये लोग उर्दु के नामपर समाजिक दिवार खड़ाकरने कि कोशिश करने मेँ लगगये थे । जबकि हकीकत यह था कि उर्दु फार्सी भाषा से प्रभावित हिन्दी थी , उर्दु हिन्दु या मुसलमानोँ कि अधिकार कि चीज नहीँ है । उर्दु शायरोँ कि नजाकत एबं नफासत भरी शैली को पल्लवित और पुष्पित करने के लिये हिन्दु विद्वानोँ नेँ खुब खुब सहयोग दिया था । वहीँ कई मुस्लिम लेखकोँने अपने कृतिओँ मेँ संस्कृत निष्ठ
हिन्दी का उपयोग किया था । इस भाषाई लढ़ाई मेँ एकबार फिर कंग्रेस को झुकना पड़ा । समझौता हुआ हिन्दी एबं उर्दु के शब्द भंडार को मिलाकर हिन्दोस्तानी नामक एक नयी दोगली खिचड़ी माषा का प्रस्ताव रखागया और कंग्रेस नेँ इसे स्वीकार करलिया ।
माध्यम गर वर्णसंकर बनजाय तो फिर इस माध्यम के द्वारा दियाजानेवाला निज संस्कृति का परिचय भी दूषित हो जाता है ।
बालकोँ के लिये नवकल्पित
हिन्दोस्तानी पाठ्यपुस्तकोँ मेँ श्रीराम ,वादशाह राम बनगये और सीताजी वेगम सीता कहलायी । लक्षण शाहजादा लक्षण एबं मुनि वसिष्ठ मौलाना वसिष्ठ बनादिये गये । हिन्दी को विकलांग बनाने कि कोशिश मेँ लीग लगभग सफल हो गया पर ऐसा करते हुए उसने अनजाने मेँ RSS नामक राष्ट्रवादी संघ के जन्म का कारक बना । वो बच्चे जो इन पाठ्यपुस्तकोँ के बदलने पर परेशान थे आगे चलकर उनसभी नेँ मिलकर राष्ट्रिय स्वयं सहायक संघ बनाया और आजतक इन दोगले लोगोँ के फिलाफ लढ़ रहे है ।

बिच्छुओँ पर कुछ रोचक तथ्य

==> विश्वभर मेँ बिच्छुओँ का लगभग 1570 प्रजाति पायी जाती हे और उन मेँ से केवल 25 प्रकार के बिच्छु हि जहरीले होते है । अबतक 11 प्रजातिओँ का जीवास्म भी मिला है जो लुप्त हो चुके है ।
==> ज्यादातर जहरीले बिच्छु मेक्सिको ,ब्राजिल ,उत्तर अफ्रिका , भारत जैसे वर्षावन एबं उष्ण कटिवंधीय क्षेत्रोँ मेँ पाये जाते है ।
==> बिन-जेहरी बिछुओँ के काटने से मधुमक्षी के ड़ंक से कम पीड़ा होता है ।बिच्छु के जहर मेँ पायाजानेवाला रसायन
को आजकल कैँसर के दवाओँ मेँ इस्तेमाल किया जा रहा है ।
==> Antarctica ,ocenia , और न्युजिलैँड के अलवा यह दुनिया के हर कोने मेँ पायेजाने लगे है । मध्ययुग तक इंलण्ड मेँ भी बिच्छु नहीँ थे ,
==> बिच्छुओँ का सर्वपुरातन जीवास्म 430 Million वर्ष पूर्व Silurian era का है बताया जाता हे ।
==> आम तौर पर बिच्छु गर्म तापमान मेँ रहना पसंद करते है पर इन्हे साईवेरिया और कैनेडा मेँ भी देखा गया है ।
==> एक मादा बिछु एक बार मेँ 30 से 100 बच्चोँ तक को जन्म दे सकती है । माँ के पिठ मेँ एक माह तक घुमने के बाद चलने लायक हो जाते है ।

पश्चिम कि मशहुर लवष्टोरी

पश्चीम की मशहुर लवष्टोरी !!

==> 1936 मेँ इंलण्ड के राजा एडवर्ड 8 नेँ राजगद्दी छोड़ते हुए कहा था "मेँ ये राजगद्दी छोड़रहा हुँ क्युँकि मेँ जानता हुँ जिस स्री से प्रेम कर रहा हुँ उससे मेरी शादी होनेवाला है और ये दोनोँ बात एक साथ इंलण्ड मेँ होना संभव नहीँ । राजा एडवर्ड 8 कि प्रेमिका अमेरिकन महिला वेलिस सिम्पसन थी और उनका इससे पहले दो बार तलाख हो चुका था । ये प्रेम प्रकरण की चर्चा उन दिनोँ पुरे युरोप और अमरिका मेँ छाया हुआ था । 1972 मेँ एड़वर्ड की मौत होने तक इस प्रेमीयुगल नेँ फ्राँस मेँ वक्त गुजारा था ।

==> रोमन साम्राज्य का सेनापति एन्टोनी एबं इजिप्त की महारानी क्लियोपेट्रा के बीच युद्ध हुआ था । परंतु सिजर के मृत्यु पश्चात उन दोनोँ के बीच प्यार हो गया था । उनदोनोँ ने साथ अत्महत्या की और उनके इस दर्द भरी गाथा से प्रेरणा लेकर सेक्सपियर नेँ करुण नाटक लिखा ।

==> हलिवुड़ हास्यकलाकार ज्योर्ज र्न्स और ग्रेसी एलेन 1922 मेँ एक दूसरे से मिले ,1926 मेँ शादी की और 40 वर्षतक साथ रहे । इस हास्यकलाकार जोड़ी नेँ रेडिओ टेलिविजन , फिल्मोँ मेँ कामकिया और करोड़ो लोगोँ को हसाया । 1964 मेँ गंभीर विमारी होने के चलते ग्रेसी की मौत हो गई । ग्रेसी के जाने के बाद ज्योर्ज रोज उसके कबर पर जाते उससे बाते करते पायेजाते थे । उन्होने फिर शादी नहीँ की 100 वर्षतक जीवित रहनेवाले ज्योर्ज नेँ आखरीकार दुनिया को अलबिदा कहदिया ।

==> आमेरिका के द्वितीय प्रमुख ज्योन एड्म्स और उनकी पत्नी एबिगैल के बीच गाढ़ प्रेम जीवन पर्यन्त रहा था । 54 वर्ष की वैवाहिक जीवन मेँ कईबार उन्हे एक दुसरे से दूर होना होता था । बिछड़न के इन दिनोँ मेँ लिखेगये खतोँ पर अध्ययन करने पर पताचलता है की वे दोनोँ एक दुसरे को खुब चाहते थे ।
==> पियरी और मेरी क्युरी प्रसिद्ध वैज्ञानिक है इस दंपति ने साथ मिलकर X ROY कि खोज कि थी । विज्ञान के वजह से वो दोनोँ एक दुसरे के नजदिक आये और शादी कर लिया था । जब पियरी ने मेरी को प्रपोज किया तो मेरी नेँ इसे नकार दिया था । क्युँकि मेरी को उनके मूल वतन पोलांड जाना था ,पियरी नेँ मेरी को समझाया की वो भी उनके साथ पोलंड जायेगेँ भले इसके लिये उन्हे विज्ञान छोड़ना पड़े । इसके वाद मेरी नेँ शादी के लिये हाँ करदिया । इसके बाद मेरी क्युरी और पियरी क्युरी नेँ साथ मिलकर भौतिक शास्त्र व रसायन शास्त्र मेँ साथ मिलकर काम किया और नोवेल प्राईज भी जीता ।

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

सोलंकी राकेश वी "शब्द" जी कि गुजराती कविता "જિંદેગી તું પક્કી વેપારી નીકળી" का हिँदी भावानुवाद

जीँदेगी तु पक्की व्यापारी निकली
हमारे खाते मेँ मुश्किलोँ कि उधारी निकली
भरपाई करते रहे हम तकलिफोँ कि
हमारी दिल कि ऐसी खुद्दारी नीकली ।
देता रहा मुसीबतोँ को जब जब जीँदेगी हमेँ
नसीब कि तबतब नादारी निकली
अकेला असहाय महशुश कि खुद को जब
परछाई कि तब गद्दारी निकली
आश था खुदा कि खुदाई पर हमेँ
खुदा कि भी लाचारी निकली
बुझाना चाहते थे तकलीफरुपी आग को मगर
हर क्षण एक चिँगारी निकली
निरर्थक जीँदेगी का अर्थ हमने तब समझा दोस्त
जब दुनिया हमारे मौत का जनाजा सजा के निकली
(सोलंकी राकेश वी "शब्द"
जी कि गुजराती कविता "જિંદેગી તું પક્કી વેપારી નીકળી" का हिँदी भावानुवाद)

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

कोलेस्ट्रोल

अठारवीँ सदी के शुरवात मेँ माइकेल शेवरीअल नामके एक फ्रेँच वैज्ञानिक नेँ पित्ताशय #LIVER मेँ बननेवाला एक पथरी पर परिक्षण करते समय एक विशिष्ट पदार्थ कि खोज कि ! इसे बाद मेँ #CHOLESTEROL कोलेस्ट्रोल नाम दियागया ।
कोलेस्ट्रोल दो ग्रीक शब्दोँ को मिलाकर बना है ,ग्रीक मेँ कोले CHOLE अर्थात् पित्त और स्टोरियस STERIUS का अर्थ सख्त या कठिन !
कुछ वर्षोँवाद अन्य वैज्ञानिकोँ द्वारा कोलेस्ट्रोल के कारण हमारे शरीर पर हो रहे असर पर विस्तृत विवरण भी आनेलगा ।

19वीँ सदी मेँ एडोल्फ विन्डाउस नामक वैज्ञानिक ने कोलेस्ट्रोल की रासायनिक फोर्म्युला C27H450H कि खोज कि !
समय के साथ साथ इसके बारे मेँ ज्यादा से ज्यादा वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हासिल हुई परंतु साथ साथ मानव समाज मेँ कोलेस्ट्रोल बृद्धि के मामले भी पायेजाने लगे ।

कोलेस्ट्रोल आखिर है क्या ?

यह एक तरह का चिकना पदार्थ है ,शरीर कि लगभग सभी जीवकोष मेँ इसका अल्प या अधिक परिमाण पायाजासकता है । मस्तिस्क , मेरुदंड . एड्रिनल ग्लेन्ड और लिवर मेँ यह विशेष रुप मेँ पायाजाता हे । स्वाद और गंध रहित यह स्पटिकरुप पदार्थ 149 डिग्री C उच्चतम तापमान मेँ पिघलता है तथा पानी तेजाव जैसे पदार्थ

मेँ न घुलपाने के कारण शरीर मेँ जमा होता रहता हे । यह प्रोटिन के साथ संयोजित हो लीपोप्रोटीन रुप मेँ पायाजाता हे ।
लीपोप्रोटीन मुख्यतः तिन प्रकार होता है

हाई डेन्सीटी लीपोप्रोटीन या H.D.L,
लो डेन्सीटी लीपोप्रोटीन
L.D.L
भेरी लो डोन्सीटी लीपोप्रोटीन
V.L.D.L

मानव शरीर के लिये H.D.L या हाई डेन्सीटी लीपोप्रोटीन उपयोगी या अछा है जबकि बाकी L.D.L व V.L.D.L लीपोप्रोटीन रोगबर्धक होता है । अछा कोलेस्ट्रोल शरीर के लिये खुब उपयोगी है ! जीवकोषोँ की वाह्य दिवार बनाना , एन्ड्रिनल ग्लेन्ड कि होर्मोन , मस्तिस्क और ज्ञानतंतु की मेम्बेन बनाने के लिये तथा चर्बी को पचाने के लिये पित्त या #BILE कि निर्माण के लिये भी मानव शरीर को इसकी जरुरत होती है ।
खराब कॉलेस्टेरोल कि आधिक्यता से शरीर के खुन सप्लाई मेँ वाधा अपजता है । खुन के धमनीओँ के जाम होने से एथरोस्कलेरोसीस कि स्थिति पैदा होता है व हाई ब्लॉडप्रेसर के साथ साथ हृदय संबन्धी रोग जैसे मायोकार्डिअल .इस्केमीया , हार्टेटक , तथा मस्तिस्क संबन्धि रोग पेरेलिसीस और ब्रेन स्ट्रोक आदि रोगोँ से पिडित हो सकता है ।

शरीर मेँ कोलेस्ट्रोल बढ़ने के मुख्य कारण इस प्रकार है

i वारसागत या आनुंवशिक कारणो से

ii कीडनी के रोगोँ के कारण

iii डायवेटिस

iii थाइराईड कि विफलाओँ के कराण

iv गाउट

v प्राणीज चर्बी जिसमे सेच्युरेटेड फैट कि मात्रा अधिक होनेवाले खाद्यपदार्थ जैसे माखन ,घी ,क्री8 चीज तथा अंडा मटनरेलो ,मछली कोडलीष ओइल कि अत्यधिक सेवन से

vi वनस्पती घी और नारियल तेल कि अत्यधिक उपयोग के कारण

vi फास्टफ्रुड़ और ड्रिँकस कि अधिक इस्तेमाल से

vii आलस्य पसंद लोगोँ का भी कोलोस्ट्रल मेँ लगातर बृद्धि होती रहती है ।

सोमवार, 5 जनवरी 2015

मोनालिसा पैटिगँ चोरी 20वीँ सदी कि सबसे बड़ी चोरी

21 अगष्ट 1911

पैरिस सहर मेँ सूर्योदय होना बाकि था !

पेरिस कि सेन्ट्रल पार्क मेँ स्थित लुब्र म्युजियम से एक व्यक्ति निकला ! उसने 21 Inch मोटा व 30 Inch लम्बा कोई पार्सल पकड़ रखा था ।

वो उस सामान के साथ सुबह के 7:47 मिनट मेँ नजदिक रेलवे स्टेसन से ट्रेन मेँ चढ़गया और मंजिल कि और बढ़गया !


22 अगष्ट 1911

आज रविवार था
पर्यटकोँ के लिये म्युजियम बंद था पर कुछ तकनीकि खामिओँ को ठिक करने के लिये मजदुर और गार्ड का ड्युटि चलरहा था ।
इरानी चित्रकार लुइस व्रोड़ उसदिन उस म्युजियम मेँ फोटो गैलेरीओँ को देखने आये तो लयोडानो दाभीन्चि कि "Mona lisa" पैँटिगं गायब पायागया ! गार्ड से पुछताछ करने पर पताचला कि कुछ महत्वपूर्ण फोटोग्रेफी के लिये यह पैँटिगं उपरवाले फोटो स्टुडिओ हॉल मेँ भेजा गया है । ब्रोड़ अपने कामेँ मेँ लगगये परंतु दिन के 12 बजने पर भी पैँटिगँ वापस न आने पर ब्रोड़ नेँ फिर सुरक्षा कर्मचारीओँ को पुछा कब आयेगा पैँटिगं ?

गार्ड का भी धैर्य टुटगया था सो उपर जा कर स्टुडिओ हॉल मेँ खोजविन कि पर मोनालिसा पैटिगं नहीँ मिला !!!!

21 अगष्ट को सवेरे होने से पहले म्युजियम से निकलकर वाहार आनेवाला व्यक्ति ही चोर था । उसका नाम था विन्सेन्चो पिऊजिया और वो इसी म्युजियम मेँ कार्यरत था !

चोरी कि पुछताछ पर वो पोलिस को यकिन दिलाने मेँ सफल हो गया कि इसमेँ उसका हात नहीँ है ।

पिछले 400 वर्षोँ मेँ मोनालिसा उतना फैमस नहीँ हुई थी चोरी के बाद तो जैसे सारा विश्व मेँ उसका ही चर्चा आम रहा
न्युर्क टाईमस सहित अन्य संवादपत्रोँ मेँ रोज इसके बारे मेँ छपाकरता था ।

फ्रान्स सरकार शर्म से पानी पानी हो गई थी । कहते है इस केस मेँ 60 डिटेक्टिव को लगाया गया था परंतु अतंतः 2 वर्षोँ तक कोई हल नहीँ निकला !

दो वर्षवाद विन्सेन्यो मामला थंडा पड़गया सोचकर उस पेटिँग को बेचने के इरादे से इटली लेकर आया !

उसने आलफ्रेड़ो गेरी नामक एक एजेँट से बात कि और गेरी पैटिँग खरिदने के लिये राजी हो गया । लेकिन कुछदिनोँ के अतंराल मेँ आलफ्रेडो का मकशद बदला और उसने वेन्सेन्यो को पोलिस के हातोँ पकड़ादिया ।

अब च्युँकि इटली से पैरिस गया मोनालिसा वापस इटली मेँ आ चुका था विन्सेन्यो को कुछवर्षोँ के जेलवास के बाद छोड़दिया गया । जेल से छुटने पर उसने इटालियन नौकादल मेँ भी काम किया परंतु दुनिया मेँ वो मोनालिसा पैटिँग कि चोर के हिसाब से ही जानागया !

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

एक अनुठे मुसलिम श्रीकृष्णभक्त मोहम्मद याकुब सनम साहब

भारत मेँ रहीम ,रसखान ,ताज बेगम और ओडिशा मेँ भक्तकवी सालवेग जैसे मुस्लिम श्रीकृष्ण भक्तोँ का जन्म हुआ । ऐसे हि एक और संत हुए हे जनाव मोहम्मद याकुब खाँ उर्फ सनम साहब ! आजमेरवासी सनम साहबने सन् 1920 ईँ. से लेकर सन 1944 ईँ. तक देशभरमेँ कृष्णभक्ति का प्रचार प्रसार किया तथा अंत मेँ सन् 1945 ईँ मेँ एक दिन अपने इष्टदेव भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाभूमि व्रजकी पावन मिट्टीमेँ अपना शरीर समर्पण कर दिया ! सनम साहबने संस्कृत ,हिँदी और उर्दु मेँ प्रकाशित कृष्णभक्ति साहित्य का गहन अध्ययन किया । इन भाषाओँ के अतिरिक्त वे फारसी के भी प्रकाण्ड विद्वान थे । उन्होँने कृष्णभक्ति सम्बन्धी लगभग 1200 पुस्तकेँ संगृहित कीँ तथा अजमेर मेँ श्रीकृष्ण लाइब्रेरी की स्थापना की । सनम साहबने बहुत कालतक व्रजभूमिमेँ रहकर श्रीकृष्णकी उपासना की । अपनी भक्ति के उद्देश्यसे वे कृष्णभक्त बने और तपस्वी गुरुके अन्वेषणमेँ लग गये । अन्तमेँ व्रजभूमिके संत श्रीसरसमाधुरी शरणजीको उन्होँने अपना गुरु बनालिया । गुरुजी के प्रेरणा से उन्होँने समुचे भारत मेँ श्रीकृष्ण भक्ति का प्रचार कि संकल्प लिया ! वे प्रभावशाली वक्ता तथा भावुक भक्त थे , अतः कुछ ही समय मेँ देशभर मेँ उनके प्रवचनोँकी धूम भच गयी । सनम साहबने अपने प्रवचनोँमेँ कहा था श्रीकृष्णके दो रुप हैँ निराकर और साकार । निराकर जो गोलोकधाम मेँ विराजमान है ,उसका तीन रुपसे अनुभव होता है -प्रेम,जीवन तथा अनन्द ! प्रेम ही जीवनविधान है ,जीवन ही सत्यता का आधार है और जीवनका मुख्य उद्देश्य आनन्द है । इस कारण ये तीनोँ ही श्रीकृष्णकी निराकार विभूतियाँ हैँ ,सृष्टिमात्रमेँ व्याप्त हैँ । एक सुशिक्षित मुसलमानको श्रीकृष्णभक्ति मेँ तल्लीन देखकर संकीर्णमना लोगोँ मेँ तहलका सा मचगया था । कुछने अजमेर पहुँचकर उन्हेँ समझा बुझाकर कृष्णभक्तिके पथसे डिगानेका भारी प्रयास किया ,किन्तु उनके तर्कोँके आगे वे वापस लौट जाते थे ।इसके पश्चात उन्हेँ जानसे मार डालनेकी बी धमकी दी गयी . काफिरतक कहागया ,किँन्तु सनम साहबने स्पष्ट कहदिया कि मेँ अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण की भक्ति के लिये पैदा हुआ हुँ ,जिसदिन उन्हे , मुझे अपने लोकमेँ बुलाना होगा , मेँ पहुँचा दिया जाऊँगा । अजमेरमेँ उनपर आक्रमणका प्रयास भी किया गया । इसपर उन्होँने प्रतिक्रिया स्वरुप लिखा "अभी मुझसे भगवान् श्रीकृष्णो और काम लेना है, इसीलिये उन्होँने रक्षा की है ।

महामना मदनमोहन मालवीयने सन 1939 ईँ मेँ सनम साहबको काशी बुलाकर उनसे श्रीकृष्ण भक्ति के विषयमेँ विचार विनिमय किया और बड़े प्रभावित हुए ।

काशी से व्रजभूमि लौटने पर सनम साहबने अपने इष्टदेव भगवन् श्रीकृष्णकी लीलाभूमि 'व्रज'- सेवनका संकल्प किया । वे हर समय यमुना स्नान एवं श्रीकृष्णके ध्यानमेँ लीन रहने लगे । रुखा सुखा सात्त्विक भोजन प्रसादरुप मेँ ग्रहणकर लेना तथा बाकी समय संत महात्माओँकी सेवा एवं संकीर्तनमेँ व्यतीत करना यही उनकी दिनचर्या थी । वे अपनेको "ब्रजराजकिशोरदास" नामसे सम्बोधित करने लगे थे । एक दिन उन्होँने वृन्दावन मेँ ही रासलीला का रसास्वादन करते समय अपने प्राण त्याग दिये ।

[गीताप्रेस खोरखपुर प्रकाशन कि सत्य एवं प्रेरक घटनाएँ पुस्तक से यह प्रकाशित लेख लियागया हे ]

रविवार, 14 दिसंबर 2014

बर्लिन की दीवार: इतिहास, पतन और पूर्वी-पश्चिमी जर्मनी की असमानता

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व का भू-राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। जर्मनी, जो युद्ध में पराजित हुआ, चार हिस्सों में बँट गया—अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और सोवियत संघ के नियंत्रण में। बाद में, 1949 में, जर्मनी दो देशों में विभाजित हो गया: पश्चिमी जर्मनी (फेडरल रिपब्लिक ऑफ जर्मनी) और पूर्वी जर्मनी (जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक)। पश्चिमी जर्मनी ने लोकतांत्रिक मूल्यों को अपनाकर अमेरिका और मित्र राष्ट्रों की सहायता से आर्थिक समृद्धि की राह पकड़ी, जबकि पूर्वी जर्मनी सोवियत प्रभाव में साम्यवादी विचारधारा के साथ आगे बढ़ा। इस विभाजन ने न केवल जर्मनी को, बल्कि बर्लिन शहर को भी दो हिस्सों में बाँट दिया। इस विभाजन को और सुदृढ़ करने के लिए 1961 में पूर्वी जर्मनी ने बर्लिन की दीवार का निर्माण किया। यह दीवार न केवल एक भौतिक अवरोध थी, बल्कि विचारधाराओं, संस्कृतियों और आर्थिक व्यवस्थाओं के बीच की खाई का प्रतीक भी थी। इस निबंध में बर्लिन की दीवार के निर्माण, इसके पतन और इसके बाद जर्मनी की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का विश्लेषण किया जाएगा।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, पश्चिमी जर्मनी में आर्थिक समृद्धि और स्वतंत्रता ने पूर्वी जर्मनी के लोगों को आकर्षित किया। 1949 से 1961 के बीच, लाखों पूर्वी जर्मन नागरिक—विशेष रूप से युवा और शिक्षित लोग—बर्लिन के रास्ते पश्चिम की ओर पलायन कर रहे थे। इस "ब्रेन ड्रेन" को रोकने के लिए, पूर्वी जर्मनी ने 13 अगस्त 1961 को बर्लिन की दीवार का निर्माण शुरू किया। यह दीवार बर्लिन शहर को दो हिस्सों में बाँटने वाली एक कंक्रीट की संरचना थी, जिसे कांटेदार तारों, सशस्त्र गार्डों और निगरानी टावरों से और मजबूत किया गया था। दीवार का उद्देश्य पूर्वी जर्मन नागरिकों को पश्चिम की ओर जाने से रोकना था, लेकिन यह परिवारों, दोस्तों और एक संस्कृति को भी विभाजित कर रही थी।

बर्लिन की दीवार 28 वर्षों तक खड़ी रही, लेकिन 1989 में एक अप्रत्याशित घटना ने इसे ध्वस्त कर दिया। 9 नवंबर 1989 को, पूर्वी जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य गुँथर शबोव्स्की ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में गलती से घोषणा कर दी कि पूर्वी जर्मन नागरिकों को तत्काल प्रभाव से पश्चिमी जर्मनी जाने की अनुमति होगी। यह बयान अनजाने में दिया गया था, क्योंकि सरकार की योजना धीरे-धीरे सीमा नियंत्रण को शिथिल करने की थी। लेकिन इस घोषणा ने लोगों में उत्साह की लहर दौड़ा दी। हजारों लोग बर्लिन की दीवार पर इकट्ठा हो गए और हथौड़ों, छेनियों से इसे तोड़ने लगे। यह घटना इतिहास में "वॉल वुडपेकर" के नाम से जानी जाती है, क्योंकि लोगों ने दीवार को तोड़ने में पक्षी की तरह चोंच मारने की तुलना की थी। 

इस घटना ने बर्लिन और पूरे जर्मनी में उत्सव का माहौल पैदा कर दिया। लोग सड़कों पर नाचने-गाने लगे, और यह माना जाता है कि यह यूरोपीय इतिहास की सबसे बड़ी "सड़क पार्टी" थी। दीवार के टुकड़े स्मृति चिह्न के रूप में विश्व भर में ले जाए गए—कुछ लास वेगास और वेटिकन के बगीचों में रखे गए, तो कुछ नीलामी में लाखों डॉलर में बिके। 

बर्लिन की दीवार का पतन न केवल जर्मनी के एकीकरण की शुरुआत थी, बल्कि यह शीत युद्ध के अंत और सोवियत प्रभाव के कमजोर होने का प्रतीक भी था। 3 अक्टूबर 1990 को, पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का औपचारिक एकीकरण हुआ, और एक संयुक्त जर्मनी का जन्म हुआ। इसके बाद, 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया, और कई स्वतंत्र राष्ट्रों का उदय हुआ। बर्लिन की दीवार का पतन इस वैश्विक बदलाव का एक महत्वपूर्ण मोड़ था।

हालांकि बर्लिन की दीवार भौतिक रूप से ढह गई, लेकिन पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के बीच सामाजिक और आर्थिक असमानता की दीवार आज भी बरकरार है। एकीकरण के बाद, पश्चिमी जर्मनी की मजबूत अर्थव्यवस्था और औद्योगिक आधार ने उसे पूर्वी जर्मनी पर हावी होने का अवसर दिया। आज, जर्मनी की 76% औद्योगिक गतिविधियाँ पश्चिमी हिस्से में केंद्रित हैं। पूर्वी जर्मनी, जो कभी साम्यवादी व्यवस्था में रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी देता था, अब आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से जूझ रहा है। 

रिपोर्ट्स के अनुसार, पूर्वी जर्मनी की प्रति व्यक्ति आय पश्चिमी जर्मनी की तुलना में लगभग 25% कम है। इसके अलावा, पूर्वी जर्मनी से लगभग 13% आबादी पश्चिम की ओर पलायन कर चुकी है, जिससे पूर्वी क्षेत्र में जनसंख्या और आर्थिक संसाधनों की कमी हो रही है। साम्यवादी युग में, पूर्वी जर्मनी में बेरोजगारी लगभग नगण्य थी, लेकिन एकीकरण के बाद, कई सरकारी उद्यम बंद हो गए, जिससे बेरोजगारी बढ़ी और सामाजिक असंतोष पैदा हुआ। 

वर्तमान में, जर्मनी यूरोप की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। जहाँ यूरोप के कई देश आर्थिक मंदी से जूझ रहे हैं, जर्मनी ने अपनी औद्योगिक शक्ति, नवाचार और निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्था के दम पर स्थिरता बनाए रखी है। हालांकि, पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के बीच की असमानता को कम करने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं, जैसे पूर्वी क्षेत्र में निवेश और बुनियादी ढांचे का विकास। फिर भी, सामाजिक और सांस्कृतिक अंतर अभी भी मौजूद हैं। पूर्वी जर्मनी में कुछ लोग साम्यवादी युग की सामाजिक सुरक्षा को याद करते हैं, जबकि पश्चिमी जर्मनी की समृद्धि और अवसरों ने वहाँ के लोगों को अधिक वैश्विक दृष्टिकोण दिया है।

बर्लिन की दीवार का इतिहास केवल एक भौतिक संरचना के निर्माण और पतन की कहानी नहीं है, बल्कि यह मानव स्वतंत्रता, विचारधाराओं के संघर्ष और एकीकरण की चुनौतियों की कहानी है। दीवार का पतन एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी, जिसने जर्मनी को एकजुट किया और शीत युद्ध के अंत को चिह्नित किया। लेकिन, एकीकरण के 35 वर्ष बाद भी, पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के बीच आर्थिक और सामाजिक असमानता एक ऐसी दीवार है, जिसे तोड़ने में अभी समय लगेगा। जर्मनी की मजबूत अर्थव्यवस्था और एकीकरण के लिए निरंतर प्रयास इस बात का संकेत हैं कि भविष्य में यह असमानता कम हो सकती है, और जर्मनी एक अधिक समान और एकजुट राष्ट्र के रूप में उभर सकता है।