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शुक्रवार, 2 मई 2025

घोड़े का अंडा

हरिहर एक बहुत ही सीधा-सादा और भोला व्यक्ति था। एक दिन वह पास के गाँव में होने वाले अस्थाई सब्जी बाजार में सब्जियाँ खरीदने गया। उस समय नई-नई भारत में अमेरिका से कुमड़ा (Cucurbita maxima) आया था। उस समय गाँव के लोग पेठख ( Benincasa hispida) को ही कर्कारु कहते थे । 

अब चूँकि कुमड़ा नया था तो लोग इसे ज्यादा खरीदते नहीं थे। कई लोगों से बेचने की कोशिश करने के बाद कुमड़े का व्यापारी निराश हो चुका था। तभी उसने हरिहर को उधर से गुजरते देखा और उसे पास बुलाया। हरिहर से कुछ देर बात करने के बाद व्यापारी समझ गया कि यह व्यक्ति बहुत सीधा और भोला है। इसलिए उसने उसे एक कुमड़ा देते हुए कहा, "देखो, यह घोड़े का अंडा है। इसे खाने से शरीर में बहुत ताकत आती है।"

हरिहर भोला था, लेकिन वह व्यापारी की बात पर इतनी आसानी से विश्वास नहीं कर पा रहा था। व्यापारी ने उसका मनोभाव समझ लिया और फिर कहा, "यह अंडा साधारण घोड़े का नहीं, पक्षीराज घोड़े का अंडा है। पक्षीराज घोड़ा आकाश में उड़ता है और बहुत तेज दौड़ता है।" हरिहर का सीधा था इसलिए उसके बातों में आ गया। वह सब्जियाँ खरीदना भूलकर उस कुमड़े को पक्षीराज घोड़े का अंडा समझकर सब्जी बाजार से खरीद लाया और घर की ओर चल पड़ा।

इधर जंगल में राजा के लोग शेर का शिकार कर रहे थे। आज केवल गुजरात के गिर अभयारण्य में ही 600 से 1000 के बीच शेर बचे हैं, लेकिन सिर्फ 500 साल पहले पूरे भारत में शेर हर जगह पाए जाते थे। राजा के लोगों के शिकार से डरकर एक शेर झाड़ी में छिपा हुआ था। पाँच दिन से शिकारी उस शेर को मारने की कोशिश में थे, लेकिन शेर अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर छिप रहा था। बेचारा शेर अपनी जिंदगी की सारी उम्मीद छोड़ चुका था, फिर भी वह छिपता रहा।


वहां सांज का वक्त था । हरिहर उसी रास्ते से घोड़े के अंडे के रूप में कुमड़ा लिए खुशी-खुशी घर जा रहा था कि अचानक ठोकर लगने से उसके हाथ से कुमड़ा छिटककर उस झाड़ी में जा गिरा, जहाँ शेर छिपा था।

शेर तो शिकारियों के डर से झाड़ी में छिपा था। जैसे ही कुमड़ा उस झाड़ी में गिरा, वह बरगद के पत्ते की तरह काँपने लगा।


हरिहर ने झाड़ी में घोड़े का अंडा ढूँढते-ढूँढते वहाँ छिपे शेर की गर्दन पकड़ ली। हरिहर ने सोचा कि शायद पक्षीराज घोड़े का अंडा नीचे गिरकर फट गया होगा और पक्षीराज घोड़ा उसमें से निकल आया होगा। संध्या के समय झाड़ी वाली जगह पर कुछ ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था। इधर शिकारियों के डर से शेर का तो पहले ही पीलिया हो चुका था। जैसे ही हरिहर ने उसे जोर से पकड़ा, वह बुरी तरह से डरगया और आँखें मूँदकर वह जान बचाने के लिए दौड़ पड़ा। हरिहर भी किसी तरह शेर की पीठ पर बैठ गया।


दौड़ते-दौड़ते शेर ने कई रास्ते पार कर लिए। हरिहर का गाँव-गली पीछे छूट गया, लेकिन उसे कुछ पता नहीं चला। हरिहर शेर की पीठ पर बैठकर सोच रहा था कि वह पक्षीराज घोड़े पर बैठकर आकाश में उड़ रहा है।

जंगल के रास्ते में शेर दौड़ रहा था, इसलिए हरिहर को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन जैसे ही शेर जंगल छोड़कर खुले मैदान में दौड़ने लगा, उसे देखकर हरिहर का हलक सूख गया। शेर दौड़ रहा था और हरिहर किसी तरह एक डार पकड़कर अपनी जान बचा पाया।

बुधवार, 30 अप्रैल 2025

लिटिलहैम्पटन के रहस्यमय पत्र

इंग्लैंड के दक्षिणी तट पर बसा एक छोटा सा गांव, लिटिलहैम्पटन, जहां 1920 में एक सच्ची घटना घटी। समुद्र तट पर स्थित इस गांव में जीवन शांत और साधारण था। लेकिन यह शांति 1920 में टूट गई। एक रहस्यमय घटना ने गांव को हिलाकर रख दिया, जिसे बाद में "लिटिलहैम्पटन लेटर्स" या "लिटिलहैम्पटन लिबल्स" के नाम से जाना गया।

इस कहानी की मुख्य पात्र थीं गांव की एक सम्मानित महिला, एडिथ स्वान। एडिथ स्थानीय समाज में एक धार्मिक, शांत और आदर्श महिला के रूप में जानी जाती थीं। उनका जीवन पूरी तरह नियमबद्ध और समयनिष्ठ था। चर्च जाना, परिवार की देखभाल करना और गांव के सामाजिक कार्यों में हिस्सा लेना उन्हें पसंद था। लेकिन एक दिन कुछ अप्रत्याशित हुआ। एडिथ के पास एक अनजान पत्र आया। पत्र खोलते ही एडिथ का चेहरा शर्म से लाल हो गया। पत्र में अश्लील और अपमानजनक भाषा थी, जो उनके चरित्र को बदनाम कर रही थी।

पहले तो एडिथ ने इसे गलती समझा। लेकिन एक दिन, दो दिन, तीन दिन... ऐसे कई पत्र आते रहे। न केवल एडिथ, बल्कि गांव के कुछ अन्य लोग भी ऐसे पत्र पाने लगे। पत्रों की भाषा इतनी अभद्र थी कि गांव वालों में डर और असंतोष फैल गया। ये पत्र कौन लिख रहा है? ऐसा क्यों कर रहा है? हर किसी के मन में सवाल उठ रहे थे।

एडिथ स्वान इन पत्रों से इतनी परेशान हुईं कि उन्होंने पुलिस की शरण ली। उन्होंने सीधे अपनी पड़ोसी रोज़ गुडिंग के खिलाफ शिकायत दर्ज की। रोज़ गुडिंग एडिथ के ठीक विपरीत थीं। वह एक आज़ाद ख्याल, स्वतंत्र सोच वाली महिला थीं। उनकी जीवनशैली गांव के रूढ़िवादी समाज के लिए असामान्य थी। रोज़ गुडिंग विवाहेतर संबंध में रहती थीं और उनकी एक बेटी थी। वह गांव के रीति-रिवाजों को खुलेआम नज़रअंदाज़ करती थीं, जिससे कई लोग नाराज़ रहते थे।

एडिथ ने दावा किया कि रोज़ के साथ उनका पहले कुछ विवाद हुआ था, इसलिए ये पत्र रोज़ का बदला लेने का तरीका हैं। गांव वालों में भी रोज़ के चरित्र को लेकर गपशप थी, जिसने एडिथ की शिकायत को और मज़बूत किया। पुलिस ने जांच शुरू की और रोज़ को गिरफ्तार कर लिया।

रोज़ के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा चला। एडिथ की गवाही और गांव की रूढ़िवादी मानसिकता रोज़ के खिलाफ गई। पत्रों में मौजूद हस्तलेख और भाषा को लेकर कुछ संदेह था, लेकिन कोई ठोस सबूत नहीं था कि रोज़ निर्दोष हैं। दूसरी ओर, एडिथ का सम्मानित चरित्र उन्हें संदेह से ऊपर रखता था। अदालत ने रोज़ को दोषी ठहराया और उन्हें जेल की सजा सुनाई।

जेल में होने के बावजूद रोज़ अपनी निर्दोषता पर अड़ी रहीं। उन्होंने कहा, "मैंने ऐसा नीच काम नहीं किया। जो यह कर रहा है, उसे ढूंढ निकालिए।" लेकिन उनकी बात को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया।

हैरानी की बात यह थी कि रोज़ के जेल में होने के बाद भी अश्लील पत्र आना बंद नहीं हुआ। एडिथ और अन्य लोग अब भी ऐसे पत्र पा रहे थे। इस नई घटना ने पुलिस और गांव वालों के मन में संदेह पैदा किया। अगर रोज़ जेल में हैं, तो ये पत्र कौन लिख रहा है? इस नई स्थिति ने पुलिस को मामले की दोबारा जांच करने के लिए मजबूर किया।

पुलिस ने इस बार और गंभीरता से गहरी जांच शुरू की। पत्रों की हस्तलेख, भाषा और पत्र भेजने की प्रक्रिया को बारीकी से जांचा गया। लंबी जांच के बाद एक चौंकाने वाला सच सामने आया। सबूत मिले कि ये अश्लील पत्र खुद एडिथ स्वान ही लिख रही थीं। उन्होंने खुद को और दूसरों को पत्र लिखे और रोज़ को फंसाने के लिए साज़िश रची।

एडिथ के इस कृत्य का कारण स्पष्ट नहीं था। कुछ लोगों का मानना था कि एडिथ और रोज़ के बीच पुराना विवाद था, इसलिए एडिथ ने रोज़ को सामाजिक रूप से अपमानित करना चाहा। कुछ ने एडिथ की मानसिक स्थिति को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया। जो भी हो, इस खुलासे ने गांव वालों को स्तब्ध कर दिया। जिस एडिथ को सभी "नीतिवान" महिला मानते थे, वह इतने नीच काम में शामिल थीं, यह कई लोग आसानी से विश्वास नहीं कर पाए।

एडिथ का अपराध साबित होने के बाद, रोज़ गुडिंग को जेल से रिहा कर दिया गया। उनके नाम से लगा कलंक हटा, लेकिन इस घटना ने उनके जीवन पर गहरा आघात छोड़ा। एडिथ स्वान के खिलाफ मुकदमा चला, और उन्हें कानून के अनुसार सजा दी गई। यह घटना लिटिलहैम्पटन में एक बड़े कांड के रूप में कुख्यात हुई, जिसकी चर्चा राष्ट्रीय मीडिया में भी हुई।

लिटिलहैम्पटन के इन रहस्यमय पत्रों ने शांत गांव में तूफान ला दिया था। यह घटना सामाजिक पूर्वाग्रहों और चरित्र को लेकर गलत धारणाओं के खतरों को उजागर करती है। रोज़ गुडिंग निर्दोष थीं, लेकिन उनकी जीवनशैली ने उन्हें आसानी से अपराधी के रूप में चित्रित कर दिया। दूसरी ओर, एडिथ का बाहरी सम्मान उनके अपराध को छिपाए रखा। इस घटना ने लिटिलहैम्पटन के निवासियों को सबक दिया कि सत्य जानने से पहले किसी को दोषी ठहराना कितना गलत हो सकता है।

इस ऐतिहासिक घटना पर आधारित 2023 में *Wicked Little Letters* नाम से एक फिल्म रिलीज़ हुई। इस फिल्म में हास्य के साथ एडिथ स्वान और रोज़ गुडिंग के चरित्रों को दर्शाया गया है।

मंगलवार, 29 अप्रैल 2025

क्यों कहा जाता है कई देशी और विदेशी पेड़ों को पारिजात?


भारत में कई देशी और विदेशी पेड़ों को "पारिजात" के नाम से जाना जाता है। उदाहरण के लिए, ओडिशा में लोग अमेरिकी चंपा पेड़ (Magnolia grandiflora) के फूलों को पारिजात फूल कहते हैं (चित्र 1)। लेकिन वास्तव में यह पेड़ अमेरिका महादेश से भारत लाया गया है।


दूसरी ओर, मूल रूप से मेडागास्कर और अन्य अफ्रीकी देशों में पाए जाने वाले *Adansonia* प्रजाति के पेड़, विशेष रूप से *Adansonia digitata* (बाओबाब), को उत्तर भारत, खासकर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार में पारिजात कहा जाता है (चित्र 2)।


प्रश्न यह है कि विदेशी पेड़ होने के बावजूद *Magnolia grandiflora* को ओडिशा में और *Adansonia digitata* को उत्तर भारत में पारिजात क्यों कहा जाता है?

पूर्णचंद्र भाषाकोश के अनुसार, पालधुआ पेड़ (*Erythrina stricta*) का संस्कृत नाम पारिजात है (चित्र 3)। 



इसके अलावा, कोबिदर या बड़ा कंचन (*Bauhinia variegata*) को भी भाषाकोश में पारिजात कहा गया है (चित्र 4)।


 ओडिशा के संबलपुर क्षेत्र में लगभग 100 वर्ष पहले एक प्रकार के पांच पंखुड़ियों वाले मंदार फूल को पारिजात कहा जाता था। इस फूल में एक लंबा गर्भकेसर बाहर निकलता है। इसे वास्तव में *Hibiscus × rosa-sinensis* नामक एक संकर मंदार प्रजाति का पेड़ माना जाता है (चित्र 5)। 



कुछ संस्कृत कोशों में गंगशिउली, शेफाली, या सिंगड़ाहार (*Nyctanthes arbor-tristis*) को भी पारिजात कहा गया है (चित्र 6)।


हालांकि, ये सभी पेड़ पुराणों में वर्णित देवतरु पारिजात नहीं हैं। श्रीमद्भागवत पुराण के आठवें स्कंध, आठवें अध्याय में समुद्र मंथन से पारिजात वृक्ष के उत्पन्न होने का उल्लेख है:

**ततोऽभवत् पारिजातः सुरलोकविभूषणम्। पूरयत्यर्थिनो योऽर्थेः शश्वद् भुवि यथा भवान्॥६॥**

अर्थ: "पारिजात वृक्ष, जो सुरलोक की शोभा बढ़ाता है, समुद्र मंथन से उत्पन्न हुआ। यह मनुष्यों की इच्छाएं पूरी करता है, जैसे राजा अपनी प्रजा को समृद्ध करते हैं।"


विष्णु पुराण के पांचवें भाग के 30वें और 31वें अध्याय में श्रीकृष्ण द्वारा स्वर्ग से पारिजात अपहरण की कथा है। संक्षेप में वह कथा इस प्रकार है :

स्वर्ग में श्रीकृष्ण और उनकी पत्नी सत्यभामा देवराज इंद्र के आतिथ्य में थे। इंद्र ने श्रीकृष्ण को नंदनवन दिखाया, जहां सत्यभामा की नजर पारिजात वृक्ष पर पड़ी। यह वृक्ष समुद्र मंथन से उत्पन्न हुआ था, जिसके फूलों में मनमोहक सुगंध और नए पत्तों में अपूर्व सौंदर्य था। सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से कहा, “यह सुंदर वृक्ष द्वारका में क्यों नहीं है? इसे मुझे चाहिए।” श्रीकृष्ण ने उनकी इच्छा पूरी करने के लिए वृक्ष को गरुड़ पर ले जाने की तैयारी की। लेकिन स्वर्ग के वनरक्षकों ने रोककर कहा, “यह शची के अधीन है। इंद्र इसका प्रतिशोध लेंगे।”


सत्यभामा क्रोधित होकर बोलीं, “शची कौन? इंद्र कौन? यह पारिजात सबके लिए है, केवल इंद्र की संपत्ति नहीं।” उन्होंने शची को चुनौती दी कि यदि वे इंद्र को रोक सकें, तो श्रीकृष्ण को रोककर दिखाएं।

शची ने इंद्र को युद्ध के लिए प्रेरित किया। इंद्र ने देवसेना के साथ श्रीकृष्ण के खिलाफ युद्ध शुरू किया। श्रीकृष्ण ने शंखनाद कर युद्ध शुरू किया और देवसेना को हरा दिया। अंत में, इंद्र और श्रीकृष्ण आमने-सामने हुए। श्रीकृष्ण ने इंद्र के वज्र को निष्क्रिय कर दिया, लेकिन सुदर्शन चक्र का उपयोग न करते हुए इंद्र को रुकने को कहा। सत्यभामा ने इंद्र का मजाक उड़ाया, जिसके बाद इंद्र ने विवाद समाप्त करने की विनती की। उन्होंने श्रीकृष्ण की स्तुति की और पारिजात वृक्ष द्वारका ले जाने की अनुमति दी, लेकिन कहा कि यह मर्त्यलोक में स्थायी नहीं रहेगा। श्रीकृष्ण ने ‘तथास्तु’ कहकर वृक्ष को द्वारका ले गए।



विष्णु पुराण के दो श्लोक स्पष्ट करते हैं कि श्रीकृष्ण द्वारा लाया गया पारिजात वृक्ष अस्थायी था। इंद्र ने कहा:

**नीयतां पारिजातोऽयं कृष्ण! द्वारवतीं पुरीम्। मर्त्यलोके त्वया मुक्ते नायं वै स्थास्यते भुवि॥३५॥**

अर्थ: “हे कृष्ण, इस पारिजात को द्वारवती ले जाओ। लेकिन मर्त्यलोक में तुम्हारे देह छोड़ने पर यह पृथ्वी पर स्थायी नहीं रहेगा।”

तत्पश्चात:

**तथेत्युक्त्वा च देवेन्द्रमाजगाम भुवं हरिः। हर्षमुत्पादयामास द्वारकावासिनां द्विज!॥३६॥**

अर्थ: “‘तथास्तु’ कहकर हरि (श्रीकृष्ण) देवेंद्र को विदा देकर पृथ्वी पर लौटे और द्वारकावासियों में आनंद उत्पन्न किया।”

इसलिए, इंद्र के वचन और श्रीकृष्ण की स्वीकृति के अनुसार, श्रीकृष्ण के देहावसान के बाद द्वारका से पारिजात वृक्ष लुप्त हो गया।

फिर क्यों कुछ देशी और विदेशी पेड़ों को पारिजात कहा जाता है?

भारत में लोग अपूर्व सौंदर्य और सुगंध वाले फूलों के पेड़ों को पारिजात कहते हैं। उदाहरण के लिए:
- शेफाली (*Nyctanthes arbor-tristis*) की सुगंध के कारण इसे पारिजात कहा जाता है।
- पालधुआ (*Erythrina stricta*) के लाल फूलों के सौंदर्य के कारण इसे पारिजात नाम मिला।
- चीनी संकर मंदार (*Hibiscus × rosa-sinensis*) को संबलपुर में इसके सौंदर्य के लिए पहले पारिजात कहा जाता था।
- बड़ा कंचन (*Bauhinia variegata*) की सुगंध और सौंदर्य के कारण इसे भी पारिजात कहा जाता है।
- विदेशी बिलाती चंपा (*Magnolia grandiflora*) और अफ्रीकी बाओबाब (*Adansonia digitata*) के फूलों की मनमोहक सुगंध के कारण इन्हें पारिजात कहा जाता है।

इसके अलावा, कुछ अन्य विदेशी पेड़ों को भी पारिजात नाम दिया गया है। इसका मुख्य कारण सौंदर्य और सुगंध है। साथ ही, एक अन्य कारण यह है कि पारिजात का नाम "पारि" (समुद्र) और "जात" (उत्पन्न) से बना है, क्योंकि यह समुद्र मंथन से उत्पन्न हुआ था। इस दृष्टि से, समुद्र पार से भारत लाए गए उत्कृष्ट सौंदर्य और सुगंध वाले फूलों के पेड़ों को पारिजात कहा जाता है।

हालांकि, पौराणिक कथाओं के अनुसार, ये सभी पेड़ मर्त्यलोक के ही हैं। श्रीकृष्ण के समय में पारिजात कुछ समय के लिए मर्त्यलोक में था, लेकिन उनके देहावसान के बाद यह देवतरु लुप्त हो गया। इसलिए, भले ही कई देशी और विदेशी पेड़ों को पारिजात कहा जाता हो, वे वास्तव में पुराणों में वर्णित देवतरु पारिजात नहीं हैं।

बुधवार, 22 फ़रवरी 2023

हंसिबा नाचिबा खेलिबा करोति ध्यानम्

"हंसिबा नाचिबा खेलिबा करोति ध्यानम्"

एकबार ओशो ने यह प्रवचन दिया था । 
मैंने जब इसे पहली बार पढ़ा तो अपने मन हीं मन में सोचने लगा अरे यार 
ये तो आधा ओड़िआ आधा संस्कृत है । 

ओड़िआ भाषामें 
हसिवा = हसना 
नाचिवा = नाचना
खेळिवा = खेलना 
(ओडिशा के लोग क्रिया प्रत्यय बा को 'वा' उच्चारण करते हैं परंतु लिखने के समय धातुशब्द के साथ 'बा' प्रत्यय लगाते है । ओड़िआ लिपि में पहले ब,व(ବ,ଵ) के लिए एक अक्षर व्यवहार होता था ओड़िआ में 'ବ' )

वहीं ओशो प्रवचन में करोति ध्यानम् संस्कृत है

इससे पता चलता है कि ओशो ओड़िआ भाषा जानते थे च्यूंकि क्रिया प्रत्यय 'वा/बा' भारत में केवल जीवित भाषा ओड़िआ भाषा में प्रचलित है ।

हां कभी ओडिशा में पाली भाषा प्रचलित थीं उसमें भी 'वा' क्रिया प्रत्यय हुआ करता था तथा सिंहली(श्रीलंका की भाषा) में भी 'वा' क्रिया प्रत्यय मिलता है । 

सबसे पहले ओडिशा के राजाओं ने हीं श्रीलंका व मालदीव में मूल भूखंड़ से शासन किया था पहली से पांचवीं शताब्दी तक । 

इसलिए श्रीलंका में पाली भाषा प्रचलित हुआ फिर वह इलु बना और अन्ततः वह इलु भाषा सिंहली व धिवेशी बना । 

पाली भाषा ओड़िआ भाषा की पूर्व प्रशासनिक रुप है । आजसे दो हजार वर्ष पूर्व पाली पूर्व ओडिशा तथा उड्र (उड्रमागधी) पश्चिम ओडिशा में कथित भाषा हुआ करता था । 

बादमें पश्चिमी ओडिशा कि उड्र भाषा ने पाली को अपने में आत्मसात करलिया व आधुनिक ओड़िआ भाषा का जन्म हुआ । ओड़िआ भाषा चारवार मानकीकरण हुआ है । यह दुसरा मानकीकरण था ।


रविवार, 21 अगस्त 2022

धंधे का भेद(चंदामामा)

शिलंगेरी गांव का धर्मानंद अपनी पत्नी और पुत्री के साथ एक विशेष पुण्यस्थली के तीर्थ पर अपने गांव से रवाना हुआ । उस पुण्यस्थली तक पहुंचने के लिए एक नदी को पार करना पड़ता था । नदी के किनारे पहुंचे तो वहां पहले ही कुछ यात्री इंतज़ार में दिखें । उन्हें भी नदी पार जाना था । वहां एक नाव भी थी । नाव का मल्लाह भी वहीं था । धर्मानंद ने उससे पूछा , " भाई , पार ले जाने के कितने पैसे लोगे ? ' " ' एक रुपया , फी यात्री , " मल्लाह ने उत्तर दिया । नदी में पानी काफी था । बल्कि उसका कोई ओर छोर ही दिख नहीं रहा था । धर्मानंद को हैरानी हुई । केवल एक रुपया ! खैर , वह मल्लाह से कुछ नहीं बोला और अपनी पत्नी और बेटी के साथ नाव में जा बैठा । बाकी यात्री भी बैठ गये ।

 नदी पार करने के बाद सब यात्री देव दर्शन के लिए वहां के मंदिर पर पहुंचे और दर्शन करने के बाद वापस नदी किनारे आ गये । दरअसल , उन्हें उसी दिन वापस नदी पार जाना था , क्योंकि मंदिर पर रुकने की कोई व्यवस्था न थी और न ही वहां भोजन की कोई व्यवस्था थी । उधर अंधेरा भी उतरने को और वे अंधेरे में किसी प्रकार का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे । मल्लाह अपनी नाव के साथ वापस जाने को तैयार था , लेकिन अब वह फी यात्री पांच रुपये मांग रहा था । " यह क्या ? " धर्मानंद को फिर हैरानी हुई । " उधर से आये तो केवल एक रुपया फी यात्री मांगा , और अब पांच रुपये फी यात्री मांग रहे हो ! तुम्हारा मतलब है , अब हम तुम्हें तीन रुपये के बजाय पंद्रह रुपये दें ? हद कर रहे हो ! " " ' आप परेशान क्यों होते हैं , हुज़ूर ! आपको भी अब यह इत्ती सी बात बतानी पड़ेगी ? यह तो धंधे का भेद है " उत्तर देते हुए मल्लाह मंद - मंद मुस्करा रहा था । -

(किशन आर्य)

गुरुवार, 18 अगस्त 2022

दायित्व किसे सौंपें ?(रामकृष्ण शास्त्री)


एक गांव में मदनसिंह नाम का एक पहलवान रहता था । उसने अनेक कुश्तियां लड़ीं , अनेक पहलवानों को धूल चटायी और अनेक पुरस्कार प्राप्त किये । यह सब कुछ गांव के मुखिया से छिपा न था । 

इसलिए उसने मदनसिंह के कहने पर फौरन उसे गांव के पंचायत का चौकीदार नियुक्त कर दिया । - मदनसिंह को गांव की तरफ से कर वसूली का काम सौंपा गया , जिसे वह बड़ी ईमानदारी के साथ करता था । लेकिन एक रात चोरों ने मौका पाकर पंचायत घर का ताला तोड़ा और वहां से इकट्ठी का गयी तमाम राशि लेकर चंपत हो गये । मुखिया को जब इसकी खबर मिली तो उसका पारा एकदम चढ़ गया । उसने मदनसिंह को बुलवाया और उससे पूछा , 


" उन चोरों को तुमने क्यों नहीं पकड़ा ? क्यों नहीं तुमने उनका मुकाबला किया ? आखिर , बात क्या थी ? ” 

इस पर मदनसिंह ने बड़े सहज भाव से कहा , " मालिक , जब मैं कुश्ती लड़ता हूं तो लोग सीटियां बजा बजा कर मेरी हिम्मत बंधाते हैं । वे तालियां पीटते हैं जिससे अपने मुकाबले पर आये दूसरे पहलवान को पटकने के लिए मुझ में तूफानी जोश भर जाता है । रात को चोर जब पंचायत का खज़ाना लूटने लगे , तो उस समय मुझे जोश दिलाने वाला कोई नहीं था । इसीलिए मैंने उनका सामना नहीं किया । मैं क्या करूं , लाचर था । "

 और यह कहकर मदनसिंह अपनी मूंछों पर ताव देने लगा । मदनसिंह की बात सुनकर मुखिया की आँखें खुलीं । उसे पहली बार इस बात का एहसास हुआ कि किसी की शक्ल - सूरत देखकरं ही उसे दायित्व नहीं सौंप देना चाहिए , उसके स्वभाव को जानना भी बहुत ज़रूरी है ।
 
लेखक - रामकृष्ण शास्त्री

मंगलवार, 17 मई 2022

ज्ञानवापी एक संस्कृत शब्द है

ज्ञानवापी एक मुसलिम या आरबी ,पार्सी ,तुर्क शब्द नहीं है ।  ज्ञानवापी शब्द  ज्ञान तथा वापी शब्द से बना है ।

समुचा विश्व यह जानता हीं होगा कि 'ज्ञान' शब्द मूळतः एक संस्कृत शब्द है । परन्तु कई लोग संभवतः वापी शब्दके बारे में नहीं जानते होंगे ‌ । यह शब्द कहां से किस भाषा से आया है और इसका अर्थ क्या है बहुतों को नहीं पता होगा...

हिन्दी शब्दसागर शब्दकोषमें  वापी शब्दका  अर्थ छोटा जळाशय़ व बावली लिखा हुआ है ‌। वापी या बावली सिडीयोंवाली कूंए होती हैं जिसे ओड़िआ भाषा में बाम्फी कहाजाता है ।

हिन्दीकी वापी या बावली तथा ओड़िआ भाषाकी बाम्फी शब्द संस्कृत वापि शब्द के साथ समोद्धृत है  । अद्यपि  संस्कृत भाषामें भी   वापि व वापी दोनों शब्दोंका प्रयोग होता है ‌।  इसलिए स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि वापी शब्द मूलतः एक संस्कृत शब्द है ।

"जळाशय़ोत्सर्गतत्त्वम्" शास्त्रमें वापि या वापीकी लक्षण इसतरह उल्लेख किया गया है...

“नव्यवर्द्धमानधृतो वशिष्ठः ।
शतेन धनुर्भिः पुष्करिणी ।
त्रिभिः शतैर्दीर्घिका । चतुर्भिर्द्रोणः । पञ्चभिस्तडागः । द्रोणाद्दशगुणा वापी । तेन चतुर्द्दिक्षु पञ्चत्रिंशद्धस्तान्यूनतायां द्वादशशतहस्तान्तरान्यूनत्वेन दीर्घिका । चतुर्द्दिक्षु चत्वारिंशद्धस्तान्यूनतायां षोडशशतहस्तान्तरान्यूनत्वेन द्रोणः । चतुर्द्दिक्षु त्रिंशदधिकशतहस्तान्यूनतायां षोडशसहस्रहस्तान्तरान्यूनत्वेन वापी” । (इति जळाशयोत्सर्गतत्त्वम्)

वापि वा वापी खननके फळ विषय पर भी कळ्पतरौ वाय़ुपुराणमें बताया गया है की...

“यो वापीमथवा कूपं देशे वारिविवर्ज्जिते ।
खानयेत् स दिवं याति बिन्दौ बिन्दौ शतं समाः ॥”

वापि या वापीके जल के सम्बन्धमें राजबल्लभ ग्रन्थमें उल्लेख है

“याप्यं गुरु कटु क्षारं पित्तळं कफवातजित् ।”

वापि या वापी खनन के सम्बन्धमें शास्त्रों में दिङ्निषेध विषयक उल्लेख भी है

जैसे,  —
“वापीकूपतडागं वा प्रासादं वा निकेतनम् ।
न कुर्य्याद्वृद्धिकामस्तु अनळानिळनैरृते ॥ आग्नेय्यां मनसस्तापो नैरृते क्रूरकर्म्मकृत् ।
   वायव्यां बळवित्तञ्च पीयमाने जळे प्रिये ॥
      स्थानस्य पावके भागे वापीकूपतड़ागकम् ।
          अग्निदाहं सदा कुर्य्यात् समानुषचतुष्पदाम् ॥
               नैरृते पीयमानन्तु आत्मना दुःखितो भवेत् ।
                     कन्यापि तज्जळं पीत्वा पतिं गृह्णाति कामतः ॥”
                    (इति देवीपुराणे नन्दाकुण्डप्रवेशाध्यायः )

उसी प्रकार धरती पर  वापि या वापी निर्माण द्वारा क्या क्या लाभ होता है उसपर भी अग्निपुराणमें विस्तृत उल्लेख मिलता है ।

"शर्म्मिळ उवाच ।”

“तडागोदकवापीनां कृतानामिह यत् फळम् । विशेषेण पितृश्रेष्ठ वक्तुमर्हस्यशेषतः ॥”

“यम उवाच ।”

“धर्म्मस्यार्थस्य कामस्य यशसश्च द्बिजोत्तम ।
तड़ागं सुप्रभूताम्बु परमायतनं स्मृतम् ॥
देवताः पितरो नागा गन्धर्व्वा यक्षराक्षसाः ।
पशुपक्षिमनुष्याश्च संश्रयन्ति जळाशयम् ॥
कृत्स्नं तारयते वंशं पश्य खाते जळाशये ।
गावः पिबन्ति पानीयं मनुष्याः पशवस्तथा ॥
शरदृतौ तड़ागेषु सलिळं यस्य तिष्ठति ।
अग्निष्टोमफळं तस्य प्रवदन्ति मनीषिणः ॥
येषां शिशिरकाळे तु पानीयं प्रतितिष्ठति ।
वाजपेयातिसत्राभ्यां फळं बिन्दन्ति मानवाः ॥
वसन्ते चैव ग्रीष्मे तु सलिळं यस्य तिष्ठति ।
राजसूयांश्वमेधाभ्यां स फळं समुपाश्नुते ॥
तड़ागं सर्व्वसत्त्वानां जीवनन्तु दिवानिशम् ।
तस्मात् सर्व्वात्मना वत्स तड़ागमिह कारयेत् ॥
कृत्स्नं हि तारयेद्बंशं पुरुषस्य न संशयः ।
सावतारः कृतः कूपः सम्प्रभूतजळस्तथा ॥
यस्य स्वादुजळं कूपे पिबन्ति सततं जनाः ।
स नरो विरजो लोके देववद्दिवि मोदते ॥
पीत्वैवेक्षुरसं क्षीरं दधि मधु सुरासवम् ।
तावत् पिपासा नापैति यावत्तोयं न पीयते ॥
जीवन्ति चान्नरहिता दिवसानि बहून्यपि । तृषितस्तोयरहितो दिनमेकं न जीवति ॥
तस्माद्ददाति यो नित्यं पानीयं प्राणिनामिह ।
स ददाति नरः प्राणान् माभूत्ते ह्यत्र संशयः ॥
प्राणदानात् परं नाम नान्यद्दानं हि विद्यते ।
तस्माद्वापीश्च कूपांश्च तडागानि च कारयेत् ॥
सवृक्षाणि ह विप्रर्षे यदीच्छेत् श्रियमात्मनः ।
शुष्कं परनिपानन्तु यः कारयति शक्तितः ।
सन्तारयति भूय़ोऽपि द्विगुणं तस्य वै फळम् ॥ ”

(इति वह्निपुराणे तडागवृक्षप्रशंसानामाध्यायः ॥)

अतः विभिन्न शास्त्रों में वापि तथा वापी शब्दके प्रय़ोग से स्पष्ट होता है कि यह एक संस्कृत शब्द है।

कळ्पद्रुम संस्कृत अभिधान के अनुसार
"वापि + कृदिकारादिति ङीष्" = वापी

वहीं वापि शब्दके सम्बन्धमें वहां कहा गया है

"उप्यते पद्मादिकमस्यामिति । वप् + “वसिवपियजिराजिव्रजीति”

ओडि़आ पूर्ण्णचन्द्र भाषाकोषरमें भी वापि शब्दकी इसी निरुक्तिमतको समर्थन किया गया है और उल्लेख किया गया है कि  वप् धातुसे बुनने अर्थमे वापि शब्दको निष्पन्न कियागया है  । पूर्वकालमें जहां पद्मादि पुष्पके वीजों को वपन किया जाता था उसे वापि या वापी कहा जाता था
।

दीर्घिका; पोखर; दीर्घी; चकौरनुमा लम्बी पोखर; जलाशयको वापि/वापी कुहाजाता था और चतुष्कोण प्रस्तर निर्मित बृहत् कूपको भी लोग वापि/वापी कहाकरते थे ।

इसलिए स्पष्ट है कि ज्ञानवापी एक संस्कृत शब्द है । इसका पहले ज्ञानरूपक वापी या कूपके अर्थमें सम्भवतया नामकरण हुआ था ‌ । बहुत सम्भव पहले के ज़माने में ज्ञानवापी मन्दिर ज्ञानका पीठ रहा होगा जिसे सनातन धर्मके नाश करने हेतु बाहर से आनेवाले आक्रान्ताओं ने तोड़कर उसके  उपर मसजिद बना दिया होगा ।  सेंकड़ों वर्षों तक सनातनी हिन्दूओं को यहां मस्जिद बनाकर अंधेरे में रखागया परन्तु अब सच्चाई खुलने लगी है ‌ ।

लेखक —शिशिर साहु मनोज

तथ्य —
©पूर्ण्णचन्द्र भाषाकोष
© हिन्दी शब्दसागर
©संस्कृत कळ्पद्रुम अभिधान

रविवार, 10 सितंबर 2017

●●मन ही मित है तेरा मन ही शत्रु●●

एकबार एक अमेरिकी कैदीके साथ एक परिक्षण किया गया....

उसे पहले एक जहरीले साप के बारे में जानकारी दियागया फिर एक व्यक्ति उसके सामने उसी नस्ल का एक सांप लेकर आया.....

उसे बताया गया कि
इसी साप के द्वारा उसे कटवाया जाएगा....

फिर उसके
आखों में पट्टी बांधकर उसे
बिठाया गया
ओर उसे एक अन्य बिनजहरीले साप से कटवाया गया....

व्यक्ति मरगया.....
उसके अंगों में जहर फैल गया था
लेकिन ये जहर उस सांप कि नहीं थी....

उस कैदी के मस्तिष्क ने वह जहर बनाया था....
वो भी सिर्फ डर के कारण.....

यानी बात साफ है
हमारा मन ही मित्र है ओर मन ही शत्रु
ओर मन कहाँ है ?
मस्तिष्क में.....

हृदय में बस ब्लड शुद्ध होता है
मानव सभी बिचार कार्य अपने मन में करता है....

सोमवार, 24 जुलाई 2017

नमन

तो चलिए #नमन शब्द का पोस्टमार्टम करते है

नम्  धातु शब्द में भाव अर्थमें अन प्रत्यय लगने से नमन शब्द बना....

नम् धातु शब्द
१.प्रणाम करने
२.नत होना यानी झुकने
३.शब्द करने
तथा
४.नीचे गिरने के लिए प्रयुक्त होता है ।

इस तरह से देखा जाए तो
नमन शब्द के कई अर्थ है

१.झुकना
२.नमस्करण, प्रणाम
३.नरम होना
४.वश होना......

"यानी वो व्यक्ति जो नमन करता है
वह पहले आदर सहित झुकता है
फिर प्रणाम करता है
ओर तब बहुत जरुरी है कि
प्रणाम करनेवाले व्यक्ति का  हृदय नरम हो तथा नमन करनेवाले व्यक्ति के द्वारा उसका हृदय वशीभूत हो....."

😀😀😀😀

खैर आप लोग तो बस हसीं मजाक​में एक दुसरे को "नमन रहेगा" कहरहे हो
लेकिन क्या आपको पता है कि
नमन एक #Palindrome word भी  है !!!!!!!

ओडिआ में हम इसे  #विलोमपद शब्द कहते है
#सरस
#समास
#कटक
जैसे शब्दों से लेकर के लंबे लंबे बाक्य
जैसे
"अजा कटक जाअ"
"बणि टा कुटा कु टाणिब"

इन्हें चाहें
आगे से  बोलो या पिछे से
शब्द तथा वाक्य एक ही रहेगा....

तो पिछले दिनों
इस शब्द नें फेसबुक पर काफ़ी नाम कमाया
हालांकि tolerate /असहिष्णु  /पेटीकोट
जैसे शब्दों जितना फैमस तो नहीं हुआ लेकिन उनसे
कम भी नहीं था.....

खैर तोह  *नमन* शब्द क्यों ख़ास है आप जान ही गये होगें....

रविवार, 2 जुलाई 2017

भारत में इमली

भारत में मिठे से ज्यादा खट्टे फल दिखजाते....
आम को लोग चाहें कितना ही मिठा कह लें है तो वो एक खट्टा फल ही ...
mangifera यानी आम जाति के सभी फलों का जन्म च्युंकि भारत में हुआ
इसलिए इसे राष्ट्रीय फल का दर्जा प्राप्त है
लेकिन अकेला आम ही ऐसा खट्टा फलोंवाला वृक्ष नहीं है जो भारतीय भूभागों का मूलनिवासी रहा हो ।
Tamarindus indica यानी कि इमली भी एक मूल भारतीय वृक्ष है । युरोपिय लोग इसके अरवी नाम #तमार से इसे जानते थे जिसका मतलब होता है इंडियन डेट् ।
संस्कृत में इसके कई नाम मिलजाते है
जैसे #अम्लिका,#चूत्रिका,#चिंचिका,#चिंच,#दन्तशठा तथा #तिन्तिडि.....

संस्कृत के #तिंतिडी शब्दसे odia में #तिन्तिलि व #तिन्तुली शब्द का जन्म हुआ है
वही शब्द बाद में ओर बदलकर #तेन्तुली बनगया....
तेन्तुली से मिलता जुलता शब्द आसामीया भाषामें प्रचलित हे #चेंतुली
लेकिन ओडिआमें इसके अलावा भी इमलीका एक ओर नाम है
#कइँआ #कँया
कहते है इस शब्द का जन्म एक द्रविड़ शब्द
#पुलिकाइ से हुआ है ।
यहां पुलि शब्द लुप्त हो केवल कइ/काइ बचगया ओर बादमें वही कइ/काइ शब्द अपभ्रंश के वजह से बदलकर कइँआ या कँया हुआ ।
इस बात का सबसे बडा सबुत
आज भी तामिलनाडु में लोग इमली को #पुलि
कहते है ।
पुराने हिंदीमें चिंच तथा अम्ली शब्द पहले इमली के लिए प्रचलन में था
बादमें अम्ली शब्द अपभ्रंश होकै इमली शब्द बनगया है ।
चिंच को मराठी लोग बहुतायत में व्यवहार करते है
चिंच से मिलता-जुलता एक शब्द तेलुगु में इमली के लिए है #चिंट
वैसे तेलुगु लोग इमलीको चिंतापांडु भी कहते है 😎