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सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

बंगाली साहित्यकार बुद्धीजीवीओं ओडिआ भाषा को मार देने का षडयन्त्र रचा था..........

1866 अकाल तथा अंग्रेजी आक्रोश को झेल रहे ओडिआ लोगों के खिलाफ उनके अपने ही पडोशी भाईओं ने षडयन्त्र रचे थे....

Odia भाषा का कत्ल करदेना ...
यही उनका असली मकसद था....

कान्तिलाल भटाचार्य ने इसकी नींव
यह कहते हुए रख दिया....

"ओडिआ ऐक् स्वतंत्रो भाषा नोय्,
इटा बांग्लादेर एकटा उपभाषा"

इसी विषय पर एक किताब भी छपा
Archive .com मे एक किताब इसी नामसे बंगाली मे उपलब्ध है....

राजेन्द्र लाल मित्र ....
पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ओडिशा के प्रत्नतत्व पर गहन शोध किया और इसपर अपना किताब भी लिखडाला....

उन्होने
एकबार कहा था....

"जबतक ओडिआ भाषा विलुप्त नहीं हो जाती ओडिआओं का विकाश असम्भव है"

उमाचरण हलदार बाबु को बंगाल ओडिशा एकत्रीकरण मे खास रुची थी
वह चाहते थे इस एकता हेतु उत्कलीय-ओडिआ लिपि कि बली चढादिया जाय.....

उनका बयान था
ओडिआ को बंगाली लिपि मे लिखा जाय.....
ज्ञात रहे बंगालीओं का बर्तमान लिपि কখগঘঙচছ मात्र 200 साल पुराना है....
इन लोगों ने उत्कलीय-ओडिआ लिपि से काफी हदतक मिलता जुलता अपना प्राचीन लिपि त्याग दिया था....
अब वो चाहते थे हम भी वैसा करें.....

राजाकृष्ण मुखोपाध्याय....महाराज ने तो यहाँ तक कहदिया था कि
समुचे बंगाल मे बंगाली को ही केवल मात्र शिक्षा क्षेत्र मे अग्राधिकार मिले
और बाकी ओडिआ विहारी भाषाएं जाएं तेल लेने.......

20 फरवरी 2014 मे ଓଡିଆ ओडिआ भाषा को शास्त्रीय मान्यता साबित करता है....
यह
सच्चाई....
1.*बंगाली खुद कई उपभाषाओं को इकट्ठा करके बनाया गया एक भाषा है
ओडिआ इसके उपरी भाषाओं मे से एक है.....
2.*ओडिआ आर्य भाषाओं मे संस्कृत के बाद सबसे अधिक शास्त्रीय तथा 6 भारतीय मौलिक भाषाओं मे से एक है...

3.*इस भाषा को राष्ट्रिय स्तर के शिक्षण संस्थानो़ मे भी पढाया जाय....
इसको सभी सरकारी कार्यालयों मे लागु किया जाय......

(डॉ. देवाशीश जेठी जी के वाल से.....)

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

दारुल ईस्लाम कि सच्चाई

-क्या कोई मुस्लिम जिसनें दारुल इस्लाम के लिए लाखों हिंदुओ का क़त्ल किया हो, क्या वो मरने के बाद हिंदुओ की मन्नतें पूरी करेगा"

सैयद सालार गाज़ी की क़ब्र के सामने हिंदुओ का माथा टेकना उन लाखों हिन्दू वीर योद्धाओं के साथ धौखा होगा जिन्होंने उस गाज़ी से लड़ते हुए अपने प्राण त्याग दिए,

आज के हिंदुओं का गाज़ी के सामने सर झुकाना उन लाखों माँओं के साथ विश्वासघात होगा जिन माँओं ने गाज़ी को रोकने के लिए अपने लाल खोए, उन अर्धांगिनियों के साथ विश्वासघात होगा जिन्होंने उस गाज़ी से लड़ने के लिये अपना सिंदूर उजाड़ा ।

लाखों हिंदुओ को मारने वाले गाज़ी के सामने सर झुकाने से बेहतर, मैं शमसान घाट की उन आत्मा के सामने सर झुकाना बेहतर समझूँगा जिसनें अपने जीवन में किसी का क़त्ल नही किया हो,

आप सभी क्या जानते हो "सैयद सालार गाज़ी" के बारे में कौन था वो, तो सुनों मैं आपको उसकी सच्चाई बताता हूँ

"आप सभी महमूद गज़नवी (गज़नी) के बारे में तो जानते ही होंगे, वही मुस्लिम आक्रांता जिसने सोमनाथ पर 17 बार हमला किया और भारी मात्रा में सोना हीरे-जवाहरात आदि लूट कर ले गया था।

महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर आखिरी बार सन् 1024 में हमला किया था तथा उसने व्यक्तिगत रूप से सामने खड़े होकर शिवलिंग के टुकड़े-टुकड़े किये और उन टुकड़ों को अफ़गानिस्तान के गज़नी शहर की जामा मस्जिद की सीढ़ियों में सन् 1026 में भी लगवाया।

उसी लुटेरे महमूद गजनवी का ही भांजा था सैयद सालार मसूद उर्फ़ आपका गाज़ी बाबा,
यह बड़ी भारी सेना लेकर सन् 1031 में भारत आया। सैयद सालार मसूद उर्फ़ गाज़ी बाबा एक सनकी किस्म का धर्मान्ध इस्लामिक आक्रान्ता था।

महमूद गजनवी तो सिर्फ़ लूटने के लिये भारत आता था,
लेकिन सैयद सालार मसूद उर्फ़ गाज़ी बाबा भारत में विशाल सेना लेकर आया था उसका मक़सद भारतभूमि को “दारुल-इस्लाम” बनाकर रहना था, और इस्लाम का प्रचार पूरे भारत में करना था जाहिर है कि तलवार के बल पर।

सैयद सालार मसूद अपनी सेना को लेकर “हिन्दुकुश” पर्वतमाला को पार करके पाकिस्तान (आज के) के पंजाब में पहुँचा, जहाँ उसे पहले हिन्दू राजा आनन्द पाल शाही का सामना करना पड़ा, जिसका उसने आसानी से सफ़ाया कर दिया।

मसूद के बढ़ते कदमों को रोकने के लिये सियालकोट के राजा अर्जुन सिंह ने भी आनन्द पाल की मदद की लेकिन इतनी विशाल सेना के आगे वे बेबस रहे। मसूद धीरे-धीरे आगे बढ़ते-बढ़ते राजपूताना और मालवा प्रांत में पहुँचा, जहाँ राजा महिपाल तोमर से उसका मुकाबला हुआ, और उसे भी मसूद ने अपनी सैनिक ताकत से हराया। एक तरह से यह भारत के विरुद्ध पहला जेहाद ही युद्ध था जो भारत को इस्लामिक मुल्क़ बनाने के लिए हुआ था। सैयद सालार मसूद सिर्फ़ लूटने की नीयत से भारत नही आया था बल्कि बसने राज्य करने और इस्लाम को फ़ैलाने का उद्देश्य लेकर भारत आया था।

पंजाब से लेकर उत्तरप्रदेश के गांगेय इलाके को रौंदते, लूटते, हत्यायें-बलात्कार करते सैयद सालार मसूद अयोध्या के नज़दीक स्थित बहराइच पहुँचा, जहाँ उसका इरादा एक सेना की छावनी और राजधानी बनाने का था। इस दौरान इस्लाम के प्रति उसकी सेवाओं को देखते हुए उसे “गाज़ी बाबा” की उपाधि दी गई।

इस मोड़ पर आकर भारत के इतिहास में एक विलक्षण घटना घटित हुई, ज़ाहिर है कि इतिहास की पुस्तकों में जिसका कहीं जिक्र नहीं किया गया है।

इस्लामी खतरे को देखते हुए पहली बार भारत के उत्तरी इलाके के हिन्दू राजाओं ने एक विशाल गठबन्धन बनाया, जिसमें लगभग 20 राजा अपनी सेना सहित शामिल हुए और उनकी संगठित संख्या सैयद सालार मसूद की विशाल सेना से भी ज्यादा हो गई।

जैसी कि हिन्दुओ की परम्परा रही है, सभी राजाओं के इस गठबन्धन ने सालार मसूद के पास संदेश भिजवाया कि यह पवित्र धरती हमारी है और वह अपनी सेना के साथ चुपचाप भारत छोड़कर निकल जाये लेकिन सालार मसूद ने माँग ठुकरा दी उसके बाद ऐतिहासिक बहराइच का युद्ध हुआ, जिसमें संगठित हिन्दुओं की सेना ने सैयद मसूद की सेना को धूल चटा दी।

इस भयानक युद्ध के बारे में इस्लामी विद्वान शेख अब्दुर रहमान चिश्ती की पुस्तक मीर-उल-मसूरी में विस्तार से वर्णन किया गया है। उन्होंने लिखा है कि मसूद सन् 1033 में बहराइच पहुँचा, तब तक हिन्दू राजा संगठित होना शुरु हो चुके थे।

यह भीषण रक्तपात वाला युद्ध मई-जून 1033 में लड़ा गया। युद्ध इतना भीषण था कि सैयद सालार मसूद के किसी भी सैनिक को जीवित नहीं जाने दिया गया, यहाँ तक कि युद्ध बंदियों को भी मार डाला गया… मसूद का समूचे भारत को इस्लामी रंग में रंगने का सपना अधूरा ही रह गया।

बहराइच का यह युद्ध 14 जून 1033 को समाप्त हुआ।

जब फ़िरोज़शाह तुगलक बहराइच आया और मसूद के बारे में जानकारी पाकर वह बहुत प्रभावित हुआ और उसने उसकी कब्र को एक विशाल दरगाह और गुम्बज का रूप देकर सैयद सालार मसूद को “एक धर्मात्मा” के रूप में प्रचारित करना शुरु किया, एक ऐसा इस्लामी धर्मात्मा जो भारत में इस्लाम का प्रचार करने आया था।

मेरे हिन्दु भाईओं
इस इस्लामिक आक्रांता के आगे आप सभी माथा टेकते हो, जिसने अपने जीवित रहते हुए लाखों हिंदुओ को मारा हो क्या वो मरने के बाद हिन्दुओँ की मनोकामनाएं पूरी करेगा,
किसी के सामने सर झुकाने से पहले उसके इतिहास और चरित्र को तो जान लो फिर उसे सम्मान दो, जो भारतभूमि में भारत को सम्मान नही देता और हिन्दू धर्म को सम्मान नही देता, मैं उनके सामने अपना सर नही झुकाता।
ऐसे पापी अधमों के आगे आप भी माथा न झुकाओ अन्यथा अपने पूर्वजों का अनजाने में हीं अपमान कर बैठेगें ।

मेरी आत्मकथा-पुष्प कि आत्मकथा

जी हाँ, मैं पुष्प हूँ -पुष्प! प्रकृति माँ का सब से सुकुमार, कोमल, भावुक और सुन्दर बेटा- पुष्प! उपवन मेरा घर है । हवा मेरी सहचर है । मेरी सुगंध का अदृश्य, कोमल, विस्तृत चारों ओर फैला हुआ मेरा संसार है । ऐसा संसार, जिस में आकर कोई भी मनुष्य भाव से भर कर आनन्द से मस्त हुए बिना नहीं रह पाता । यह कहे बिना भी नहीं रह पाता कि बड़े सुगन्धित पुष्प खिले हैं यहाँ! जी हाँ, ऐसा ही महक और मादकता भरा है मुझ पुष्प का संसार । उतना ‘ ही सुन्दर और .मुक्त भी'। मैं सुन्दरता का साकार रूप हूँ । अपनी सुन्दरता से सारे वातावरण को तो सुन्दर बना ही देता हूँ उसकी चर्चा भी दूर-दूर तक फैला दिया करता हूँ! जी हाँ, मुझे छू कर मेरी सुगंध को अपने अदृश्य पंखों में भर कर यह छलिया पवन दूर-दूर तक मेरी सुन्दरता और सुगंध का ढिंढोरा पीट आया करता है तब लोग मेरी तरफ भागे आते हैं । मुझे तोड़ कर ले जाते हैं । कोई गुलदस्ते में सजा कर अपने घर की शोभा बढ़ाता है, तो कोई हार में पिरो कर मुझे अपने गले का हार बना लिया करता है । कभी मैं गजरा बन कर किसी सुन्दरी के जूड़े पर धर कर उसकी सुन्दरता में चान्दनी भर देता हूँ तो कभी अकेला ही बालों में टाँगा जा कर सभी का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच लिया करता हूँ । कई बार सुन्दरियों के कानों में झूलकर उन के गोरे कोमल गालों को चूम लेने का सौभाग्य भी पा लिया करता हूँ । भगवान् के भक्त और पुजारी मुझे भगवान् के चरणों पर चढ़ा कर आनन्द पाते हैं, तो निराश प्रेमी अपनी प्रेमी- प्रेमिकाओं के मजासे पर अर्पित कर एक तरह की शान्ति प्राप्त करते हैं । कई बार मुझे गुलदस्ते या हार के रूप में विशिष्ट लोगों को भेंट में भी दिया जाता है । अरे हाँ, मुझे ‘एक भारतीय आत्मा’ नामक क्रान्तिकारी कवि की वे पंक्तियाँ आज तक याद हैं, कि जो मुझे देखकर, मेरी भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए उसके होंठों पर मचल उठी थीं; ''मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर तुम देना फेंक; मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक !''लेकिन ऐसा मान-सम्मान और प्रशंसा-गान मुझे ऐसे ही प्राप्त नहीं हो गया । इसके लिए मुझे बीज के रूप में कई दिनों तक धरती माँ की माटी भरी गोद में घुटती साँसों के साथ बन्द रहना पड़ा है । आप अनुमान नहीं लगा सकते, उस पल अपने साँसों को घुटते और तन को गलते-सड़ते देखकर तब मेरे मन पर क्या बीता करती थी । उस पर सूर्य की किरणें जब ऊपर से धरती को गर्मा और झुलसा दिया करतीं, तब धरती के भीतर भी कई बार पसीने से तर होकर दम और भी घुटने लगता । तब अचानक. कहीं से पानी की कोई धार आकर उस गर्मी से तो राहत पहुँचाती; पर सड-गल रहे तन की रक्षा उस से भी न हो पाती । कई बार किसी खाद के कडुवे-कसैले स्वाद भी चखने पडते, कई बार कड़बी-तीखी दवाइयाँ निगलकर मितली-सी भी आने लगती । कई बार ऐसा भी हुआ, माली या किसान की गुड़ाई ने मिट्टी के साथ-साथ मेरे तन-मन को भी उलट-पलट कर रख दिया । इस प्रकार की स्थितियों का सामना करते समय मन में क्या गुजरती है न तो वह सब बता पाना ही सभव है और न उस सब का आप अनुमान ही लगा सकते हैं । लेकिन यह क्या? एक दिन मैंने अपने -सडगल चुके शरीर में धरती माँ के आशीर्वाद से एक नया जोश, नया उत्साह अंगड़ाईयाँ लेते हुए अनुभव किया । मुझे लगा कि मैं अपने अंगों का विस्तार-फैलाव करते हुए धरती माँ से उछलकर उसकी गोद में आ रहा हूँ । मैंने माली से लगने वाले आदमी को किसी से कहते हुए सुना-बड़े सुन्दर अंकुर फूट रहे हैं इस बार तो । तो मुझे समझ आया कि जैसे मेरा नाम ‘अंकुर’ है । वह एक जन्म-नाम हुआ करता है न, वैसा ही कुछ मेरा भी था । कुछ दिन और बीतने पर उस आदमी के मुँह से फिर सुनाई पड़ा-'कितना बढ़िया है यह पौधा ।'बस, मैंने समझा कि मैं अंकुर नहीं, पौधा हूँ -पौधा । अब वह आदमी मेरा बडे ध्यान रखने लगा । ठीक समय पर पानी तो पिलाता ही, कुछ खाद-सी भी दो-एक बार डाल गया । बड़े ध्यान और सावधानी से निराई-गुड़ाई कर के उग आई फालतू घास, खरपतवार आदि को निकाल देता । इस प्रकार पौधे के रूप में लगातार बड़ा होता गया । एक दिन मैंने अपने ऊपरी पोरों में कुछ गाँठें-सी पड़ने का अनुभव किया । बस, चिन्ता में पड़ गया कि यह नई मुसीबत कौन-सी आने वाली है? अपने इस प्रश्न का उत्तर अभी प्राप्त भी नहीं कर पाया था कि एक बार मैंने उन गाँठों के धीरे-धीरे चटकने की आवाजें सुनी । 'हाय राम! यह क्या होने जा रहा है?'मैं चौक गया; लेकिन किसी के आने की आहट पा कर कुछ बोला नहीं, बस चुपचाप देखने लगा । देखा कुछ क्षण बाद वह आहट मेरे पास आकर रुक गई है । आने वाला मेरा रखवाला माली ही था । वह मेरी दशा देख कर मुस्करा उठा और लगातार मुस्कराता गया । फिर होंठों- हीं-होंठों में बोला-'सुबह तक ये कलियाँ (गाँठें) अवश्य ही खिल कर मुस्कराता फूल बन जाएँगी । 'फूल!'एक बार मैं फिर चौंक पड़ा । पहले बीज, फिर अंकुर उसके बाद पौधा, फिर वे गाँठें- सी चटकती हुईं और अब फूल? पता नहीं क्या-क्या बनना है अभी मुझे? लेकिन तब तक रात ढल आई थी, सो वह माली चला गया । मेरी चिन्ता कम नहीं हुई । रात भर चिन्ता में डूबा रहा । जैसे ही प्रभात काल की मन्द पवन का झोंका आया, उसका मधुर-कोमल स्पर्श पाकर मैं पूरी तरह से खिलकर जैसे अपनी ही सुगन्ध से नहा उठा । पवन के और झोंके आकर मुझे लोरियाँ देने लगे-देते रहे लगातार । जी हाँ , अब मैं खिलकर पुष्प जो बन चुका था । जी, बस इतनी सी ही है मेरी आत्म-कथा!

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

*महानदी जलविवाद*

#महानदी का #जन्म छतिशगड मे मगर #यौवन व #महासंगम ओडिशा में हुआ है । कभी #चित्रोत्पला के नामसे विख्यात रही यह नदी  लगभग 851 कि.मी लम्बा है जिसमें से केवल 286 km. छतिशगड में आता है ।

ओडिशा के पास ओर भी नदीआँ है लेकिन छतिसगड के पास सिर्फ महानदी ।
छतिसगड के 58.48% जलश्रोत महानदी ओर उसकी शाखा नदीओं के जल ही है ! 1948 में हिराकुद जैसे विशाल #डैम (25√किमी.) बनते समय #मध्यप्रदेश के हजारों लोग जो कि #ओडिआ ही थे को अपना भूमि गवाँना पडा था । आज हिराकुद के 87% हिस्सा छतिशगड में है बाकी ओडिशा में .........

#मध्यप्रदेश छतिसगड सरकार ने कई
बार #हिराकुद से लाभ लेना चाहा लेकिन ओडिशा सरकार ने होने नहीं दिया ......। ज्यादातर लाभ ओडिआओं को ही मिलता रहा ....छतिसगड का पानी ओडिआ लोग पिइते नहाते इंडस्ट्रिल युज करते रहे.......
छतिसगड बेचार ठगा सा वर्षौं मूकदर्शक बनारहा .....

छतिशगड नें महानदी व उसके शाखा नदीओं पर जब बांध बनाने लगा तब #bjd के #कुम्भकर्ण नेताओं कि #निद्रा भंग हुई । वो चिल्लाने लगे ....
लो जी हमें तो बताए ही नहीं ........
#छतिशगड बेवफा है 😂😂😂😂😂
इटिसी......

छतिसगड ने वाकायदा एक विदेशी संस्था #प्राइस वाटर हाउस को द्वारा पहले तो सर्वे किया फिर चतुरता के साथ बडे बांध के वजाय छोटे व मध्यम प्रकल्प लगाया लेकिन ये सब चोरीछिपे नहीं हुआ था । इसका कोई सबुत नहीं कि छतिसगड ने बांध बनवाके #सर्जिकल_स्ट्राइक करदिया हो ओर किसीको पता न चला.......
15 साल पहले प्रारम्भ किएगये तथा
90% काम पुरा हो चुके जलपरियोजनाओं पर #अंतिम अवस्था मे चिल्लाने से #छतिसगड CM का #पुतला जलाने से अब कछ्छु होनेवाला है नहीं........

#ओडिशावालों के पास 2 रास्ते है ....महानदी को बचने के लिये #फ्रिडेलकास्त्रो ......#चे_गुवारा टाइप #विद्रोह करो .........अपना दुजों का घर जलाओ ...... #उत्तरभारतीयों को ढुंढ के भगा भगा के मारो ..... #भारत से अलग हो जाओ

या ,,,,,,,

महानदी के शव को #दानामाझीं के तरह अपने #कन्धों पर ढोने को तैयार हो जाओ........

मुझे पता है ...

पहलावाला अप्सन तुमसे होने से रहा ,,,,,,

तो महानदी के #शवयात्रा में सामिल होने को तैयार रहो........

क्षेत्रवादी कौन ?

#क्षेत्रवादी हमेशा #northeast #eastindian #southindia के लोग ही क्युँ होते है ?.....

क्या सिर्फ उत्तरभारतीय ही सच्चे देशभक्त तथा असली भारतीय है ?

1.
एक पढेलिखे उत्तरभारतीय को भी इन तिनों क्षेत्र के बारे में कम ही पता होता है.....

जबकी किसी तामिलभाषी..बंगाली या.ओडिआ को पुछकर देखिए उत्तरभारत के बारे मे उनसे ज्यादे ही बता देगें ...कमसे कम हमें पता होता है lakhnow युपी का विहार का पटना,भोपाल एम्पी की राजधानी है ......उत्तरभारतीयों को पुछलिजिए ओडिशा कहाँ है जी कहेगें उ केरल कै पास न भैया ...हम गये थे भैया घुमने बहुतै नारियल का पैड होता है उहाँ 😁😁😁

2.
उत्तर भारतीय हमारे भाषाओं को नहीं सिखते उन्हें ऐसी वाहियात भाषाओं को वोलते हुए भी कोई मिलगया न अपने 36 दान्त दिखाने से खुदको रोक नहीं पाते......
इधर हमारे यहाँ के देशद्रोही लोग उनके भाषाओं को भी समझलेते है और ना सिर्फ समझते है वल्की उनके भाषाको वोलकै गर्व भी अनुभव करते है (जैसे हिन्हीभाषी अंग्रेजी बोलकै स्टाईल मारते है 😂😂) ।.

3.
उत्तरभारतीओं द्वारा लिखेगये पुराणों में
दक्षिणभारतीय राक्षस,
पूर्वभारतीय उत्तरपूर्व के लोग म्लैछ यवन आदिवासी असुर आदि बताए गये है ......
हमने फिर भी उनके पुराणों,तौहार धर्म को अपनाया और यहाँतक कि समुचे विश्व में फैलाया लेकिन उन्हें ये भी नागवार गुजरा उन्होने इसका श्रेय आगस्त्य ऋषि को दे दिया ......


4
हिन्दीभाषीओं के स्कुली किताबों में ओडिशा दक्षिणभारत नर्थ इस्ट का इतिहास व जननायकों पर तथ्य नहीं होते ।
नहीं होता उनके किताबों में सुरेन्द्र साए,वक्सी जगबन्धु के बारे में एक लाइन ......
लेकिन हमें पढने को बाध्य किया जाता है रानी लक्ष्मीवाई से लैके चन्द्रगुप्त तक का इतिहास ......

ऐसे सोचने पर कई पोएटं ओर मिलेगें ये प्रुफ करने में कि उत्तरभारतीय ही सच्चे भारतीय है शेष भारत के लोग क्षेत्रवादी जातिवादी विदेशी अनार्य देशद्रोही फलाना ढिमकाना 😏..............

मार्गारेट थार्चर

अपने सोच सम्भालो वो लव्स बनजाएगें......
अपने लव्सों को सम्भालो वो कर्म बनजाएगें......
अपने कर्मों को सम्भालो वो आदत बनजाएगी.....
आदतें सम्भालो वो तुम्हारा चरित्र बनजाएगा......
और चरित्र को सम्भालो क्युँकि ये तुम्हारी तकदीर बनजाएगी.........
हम जो अर्न्तमन से सोचते है बनजाते है.......

●मार्गारेट थ्राचर●

1982 में लातिन अमरिकी
देश अर्जेण्टीना ने #folkland पर अपना कब्जा करलिया....यह प्राय 200 द्वीपों से बना एक ब्रितानी क्षेत्र है । इसके अधिकार को लेकरके ब्रिटेन के साथ आर्जैटिंना का 150 साल से विवाद चल रहा था । दक्षिणी आटलांटिक folkland द्वीप समुहों से ग्रेटब्रिटेन 12000 किलोमिटर दूर है जबकी आर्जेटिंना सिर्फ 500 किमी .....उनदिनों मार्गारेट थार्चर ब्रिटेन कि प्राधानमन्त्री थी .....एक व्यापारी लडकी मार्गेरेट ने युद्ध का राह चुना और आर्जेटिंना अन्ततः हारकर आइलेंड छोडगया ......

मोदी व मार्गेरेट में 2 समानताएँ है

दोनो ही ऐसे ही वक्त पर PM बने जब देश कमजोर हो रहा था....

दोनों ही व्यापारी खानदान से विलोगं करते है
एक दुकानदार कि लडकी
दुजे चायवाला का लडका......

रविवार, 30 अक्टूबर 2016

युरोप मे भारतीय ग्रन्थ

युरोप मेँ मध्यकालीन भारतीय साहित्य का प्रचार प्रसार 17वीँ सदी मेँ
हुआ माना जाता है ।
उन्ही दिनोँ एक भारतीय विद्वान के मदद से
आव्रहाम लाजर ने भर्तुहरी के काव्य को पूर्तगाल मेँ अनुवाद किया था ।

ख्री. 1699 मेँ जेरुट फादर
जोहान अगष्ट भारत आए
और
संस्कृत व्याकरण का रोमन भाषा मे अनुवाद किया
लेकिन भाद मे
उन्होने
संस्कृत पर 2 शोध ग्रंथ भी लिख डाला । वहीँ
चार्लस् विलिकिन्स ने भगवत गीता तथा अभिज्ञान शकुंतळम् का
अंग्रेजी अनुवाद किया था ।
इतना ही नहीँ
विलिकिन्स ने संस्कृत भाषा को
कई युरोपियन को सिखाया भी !

विलिकिन्स के अनुवाद आधार पर
विलियम जोनस ने अभिज्ञान शंकुतंळम् को अंग्रेजी मेँ नाट्यरुप दिया
1789 मे  !

जर्मन् मेँ जर्ज पाष्टर ने 1791 मेँ शकुंतला नाटक का अनुवाद कराया ।

कालिदास अब मरणोपरनान्त युरोप मे लोकप्रिय हो गये थे ।

1792 मेँ जोनस ने ही ऋतुसंहार का अनुवाद किया

उसके बाद अमरकोष निरुक्त निघण्टु
तथा अन्य वैदिक शास्त्र समेत अष्टाधायी
का भी जर्मन अंग्रेजी मे अनुवाद कराया गया ।

19वीँ सदी मेँ 10 उपनिषद लाटिन अंग्रेजी मे अनुवादित हो लोकप्रिय हुआ ।

माक्समुलर ने 1849 से 1875 के समयकाल मे ऋकवेद का अनुवाद किया था
वहीँ
ओडिशियो प्रिन सेपस नामसे एक विद्वाध ने वैदिक संकलन पुस्तक भी लिखा था ।

फिर
पाश्चात्य विद्वानोँ का ध्यान वेद पर केन्द्रित हो गया ।

Winternitz ,keith ,macdonell
जैसे पाश्चात्य विद्वानोँ ने भारत पर कई उपादेय ग्रंथ लिखे ।

1852 मे History of indian literature प्रकाशित हुआ ।
इसी क्रम मे
1858 को
माक्समुलर ने अपना सबसे
उपादेय ग्रंथ
History of ancient sanskrit literature लिखा था ।

फिर भी पाश्चात्य जनसमाज मे
भारतीय प्रजा
वर्षोँ सपेरे कहलाए
च्युँकि
वहाँ 19वीँ सदी तक भोगवाद का ही असर छाया रहा आज भी है

लोहार्गल


राजस्थान के झुंझुनु जिल्ला मे
लोहार्गल नामक एक जगह है ।

कहते है
पाण्डव वंधु महाभारत युद्ध के बाद स्वजन हत्या दोष से मुक्ति हेतु श्रीकृष्ण के शरणापन्न हुए

तब श्रीकृष्ण ने उन्हेँ भारतवर्ष मे तीर्थाटन करने को कहा
ओर
ये भी कि जहाँ तुम्हारे अस्त्र अदृश्य हो जाएगेँ
तुम पापमुक्त हो जाओगे ।

पूर्व भारत ,दक्षिण भारत मेँ विभिन्न तीर्थस्थलोँ मे भ्रमण करते हुए
वे जब
राजस्थान के
इसी लोहार्गल मे अपने पूर्वज
तथा हतभ्राताओँ को
तर्पण देने को जल मे उतरे
एक अदभुत घटना घटा !

पांडवोँ के सारे अस्त्र गल गये

तभी
लौह+अर्गल=लौहर्गल
से आधुनिक लोहार्गल शब्द बना हो !

उस प्राचीन घटना को याद करने हेतु आज भी यहाँ के पवित्र
सूर्यकुण्ड ,भीमकुण्ड मे
सूर्यपराग व चन्द्रग्रहण के शुभ अवसर पर मेला लगता है ।

लोक विश्वास है
यहाँ पूर्वजोँ कि अस्थीओँ का विसर्जन करने पर वो गल जाते है
तथा
पितरोँ को परम गति प्राप्त होते है ।

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

दुहिता से Daughter तक

दुहिता -
(दुह् धातु+कर्ता.तृ)
मूल
संस्कृत का ये शब्द
कन्याओँ के लिए प्रयोग किया जाता था ।
च्युँकि प्राचीनकाल के भारत मे गाय दोहने का काम कन्याएँ
करती थी....
जब ये शब्द प्राचीन भारत से
अरब होते हुए
युरोप पहँचा
इसके रुप बदलते गये

फार्सी मेँ - #दख्तर् हुआ
ग्रीक् मे-दाइगेटर
जर्मनी -डवटर्
और
अंग्रेजी मे आते आते
यही दुहिता शब्द
डटर या Daughter हो गया ।

आजकल स्थानीय लोग
दुहिता शब्द
को
"दोनोँ कुल के लिए हिता"
कह कर इस शब्द का अर्थ करते पाये जाते है ।

"Twin city queen ellora"

"Twin city queen ellora "

स्वर्गीय अक्षय महान्ती द्वारा
लिखा ,गाया गया ये
गीत
अपने आप मे 70के दशक कि कहानी वयाँ करता है ।

वे Ollywood के
R.D Burmen है Kishor kumar है ।

श्री अमिताभ जी के तरह
आकाशवाणी (Cuttack) ने उनको भी रिजेक्ट करदिया था
लेकिन बाद मे अक्षय
मशहुर गीतकार ,गायक,संगित निर्देशक कहलाए ।

अच्छा
तो
ये गीत
twin city cuttack-bhubneswer के बारे मे है ।

गायक
बारबार
कटक भूवनेश्वर के बीचमे उन कम विकशित क्षेत्र तथा वहाँ रहनेवाले लोगोँ पर कटाक्ष करते नजर आते है ।

ये जगह FULLNAKHARA के नामसे जाना जाता है ।
यहाँ उनदिनोँ
लुटपाट कि वारदातेँ ज्यादे हुआ करते थे ।

आजकल यहाँ के लोग सुधरगये है और अब इस क्षेत्र मे
तरह तरह के दुकान हो गये है
और उनमे रसगुला के दुकान ज्यादातर पाये जाते है