विज्ञान के आविष्कार और विकासवाद के ज्ञान से पहले प्राचीन मनुष्य अपनी और सम्पूर्ण मानव जाति की उत्पत्ति को लेकर तरह-तरह की पौराणिक, काल्पनिक और आध्यात्मिक मान्यताएँ पाले बैठा था। उस समय न गूगल सर्च था, न डार्विन की किताब, इसलिए लोगों ने अपनी कल्पना-शक्ति का ऐसा अजब इस्तेमाल किया कि आज के फ़िल्म निर्देशक भी देखकर श्रद्धा से सिर झुका लें! कुछ सभ्यताओं में यह मान्यता प्रचलित थी कि किसी दिव्य शक्ति या ईश्वर ने अपने खाली समय में, कुछ और करने को न पाकर, ठीक उसी तरह मनुष्य को गढ़ा जैसे कोई कारीगर मिट्टी से खिलौना बनाता है। पर आज के इंसान की करतूतें देखकर लगता है कि वह कारीगर शायद अपना मॉडल आधा-अधूरा छोड़कर ही भाग खड़ा हुआ था! कहीं-कहीं ग्रीक पुराण-कथाओं की तरह मिट्टी और पानी मिलाकर पहले मनुष्य को कीचड़ से गढ़े जाने की बात कही जाती थी, जिसे पढ़कर लगता है कि हमारे आदिम पूर्वज किसी जेनेटिक लैबोरेटरी से नहीं, बल्कि बरसात के दिन की कीचड़-भरी नाली से जन्मे थे — और शायद इसीलिए आज भी इंसान का मन हमेशा गंदला बना रहता है! आदिम जनजातियाँ तो एक कदम और आगे जाकर यह मानती थीं कि उनके असली पुरखे कोई शेर, बाघ, भालू या फिर एक पेड़ रहे होंगे। कुछ लोग यह भी कहते थे कि चारों ओर बस अनंत जलराशि थी, और उसी समुद्र से अचानक समूचा जीव-जगत और मनुष्य प्रकट हो गया। कुछ और लोग दावा करते थे कि एक विशालकाय ब्रह्मांडीय अंडे या हिरण्यगर्भ से सम्पूर्ण ब्रह्मांड और मानव जाति फूटकर निकली।
प्राचीन मनुष्य यह भी मानता था कि वह बाकी सब जीवों से श्रेष्ठ है, क्योंकि वह बोल सकता है, सोच सकता है, लिख सकता है और अपनी बुद्धि के बल पर कोई भी असंभव कार्य साध सकता है — जबकि अन्य जीव ऐसा नहीं कर सकते। इन्हीं सब गुणों के चलते प्राचीन मनुष्य खुद को कोई पशु नहीं, बल्कि ईश्वर की संतान मानता था।
विज्ञान के आविष्कार और विकासवाद का ज्ञान मिलने से पहले प्राचीन मनुष्य अपनी और सम्पूर्ण मानव जाति की सृष्टि को लेकर इसी तरह की विभिन्न पौराणिक, काल्पनिक और आध्यात्मिक मान्यताएँ पाले हुए था। फिर आज से महज़ दो सदी पहले अचानक नाक पर चश्मा चढ़ाए, ज़िद्दी वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन जैसे लोग आ पहुँचे और सबके हाथों से काल्पनिक कहानियों की किताब छीनकर बोले — "अरे भाइयो, तुम किसी दिव्य अंडे या मिट्टी से पैदा नहीं हुए, बल्कि एक प्राचीन प्राइमेट (Primates) के आधुनिक वंशज हो!"
यह सुनते ही तत्कालीन समाज के घर-घर के ठाकुर-घरों से लेकर सभ्यता के शिखर पर बैठे विद्वानों तक, सबका बदन जल-भुन उठा। धार्मिक गुरुओं ने आगबबूला होकर कहा — "अरे, हम तो ईश्वर की सुपर-स्पेशल कृति हैं, और ये वैज्ञानिक हमें सीधे पेड़ों पर उछल-कूद करने वाला बंदर साबित किए दे रहे हैं!" लोगों ने पहले तो इसे मानने से साफ़ इनकार कर दिया और डार्विन को पागल कहकर उन्हें कोसा।
पर सच कभी किसी के डर से छिपा रहता है क्या? वैज्ञानिकों ने मिट्टी खोद-खोदकर जीवाश्म निकाले और सबकी नाक के आगे प्रमाण लाकर रख दिए। और आख़िरकार समाज को मजबूरन मानना ही पड़ा — "ठीक है भाई, अगर प्राइमेट ही हमारे पूर्वज थे, तो यही सही होगा!" धीरे-धीरे समाज ने इस विकासवाद को अपना लिया और जान पाया कि हमारा इतिहास वास्तव में कैसा रहा है...
आज से क़रीब छह करोड़ छाछठ लाख वर्ष पहले अंतरिक्ष से एक ख़ूँख़ार दैत्य जैसा उल्कापिंड दाँत पीसता हुआ पृथ्वी की ओर दौड़ा चला आ रहा था, पर डायनासोर तो निरक्षर थे, इसलिए सैटेलाइट नहीं बना पाए थे और नतीजतन इस बारे में उन्हें कानोंकान ख़बर तक न लगी। मेक्सिको के चिक्सुलब (Chicxulub) क्षेत्र में जैसे ही यह क्षुद्रग्रह आ गिरा, डायनासोरों का वंश हमेशा के लिए मिट गया। रह गए बस डायनासोरों के कुछ जीवाश्म, जिनके सहारे आज के शोधकर्ता अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन करते हैं। पर डायनासोरों के विनाश के साथ ही एक नई प्रजाति की कहानी का सूत्रपात हुआ। बाद में इन्हीं का एक बहुत-बहुत-बहुत अर्वाचीन वंशज "प्राइमेट्स" (primates) के नाम से जाना गया। ये प्राइमेट्स लगभग साढ़े छह से साढ़े पाँच करोड़ वर्ष पूर्व क्रीटेशियस-पैलियोजीन (Cretaceous-Paleogene) काल में विकसित हुए और संभवतः प्लेसिएडेपिफ़ॉर्म्स (plesiadapiforms) नामक छोटे स्तनधारी जीवों से उपजे थे।
प्लेसिएडेपिफ़ॉर्म्स डायनासोरों जैसे विशालकाय नहीं थे, बल्कि गिलहरी जैसे नन्हे-मुन्ने थे, और चूँकि दिन में किसी शिकारी जीव का ग्रास बन जाने का डर था, इसलिए वे रात के अँधेरे में ही पेड़ों पर फुदक-फुदककर कीड़े-मकोड़े खाया करते थे। आधुनिक ट्रीश्रू (treeshrews) और कोलुगो (colugos) जीवों में प्लेसिएडेपिफ़ॉर्म्स के गुण और रूप आज भी कुछ हद तक ज़िंदा हैं। हाँ, यही प्लेसिएडेपिफ़ॉर्म्स आज के लट्ठमार होमो सेपियन्स (Homo sapiens) के सबसे पुराने पूर्वज थे।
पहले प्राइमेट्स के विकसित होने के बाद वे अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में फैल गए। बंदर से लेकर मनुष्य तक, सब प्राइमेट्स भले और कुछ न जानें, पर इधर-उधर फैलकर ढेर सारे बच्चे पैदा करना बख़ूबी जानते हैं। शुरुआती प्राइमेट्स ने भी यही किया।
उस दौर में महाद्वीपों की स्थिति आज से भिन्न थी और उत्तर अमेरिका, यूरोप तथा एशिया आपस में जुड़े हुए थे, जिसकी वजह से शुरुआती प्राइमेट्स को एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप जाने में मदद मिली। हाँ, कूद-फाँदकर हमारे प्राइमेट पूर्वजों को कौन रोक सकता था! वे धरती-भर फैल गए और जहाँ भी गए, ढेरों बच्चे जनकर अपना वंश बढ़ा दिया।
ईओसीन (Eocene) युग में, यानी साढ़े पाँच से साढ़े तीन करोड़ वर्ष पूर्व, प्राइमेट्स उत्तर अमेरिका और यूरोप में फैल गए। इसी क्षेत्र में एडापिफ़ॉर्म्स (Adapiformes) और ओमोमिइफ़ॉर्म्स (Omomyiformes) जैसे शुरुआती प्राइमेट्स के जीवाश्म मिले हैं। पर कुछ प्राइमेट्स कुछ ज़्यादा ही उत्साह में आ गए और अफ़्रीका तथा दक्षिण अमेरिका जैसे महाद्वीपों के बीच समुद्र होते हुए भी "राफ़्टिंग" प्रक्रिया के ज़रिए वहाँ तक जा पहुँचे। आज उनके दूर के रिश्तेदार होमो सेपियन्स गर्व से कहते हैं कि शायद वे शुरुआती प्राइमेट्स तैरते हुए पेड़ों या वनस्पति के टुकड़ों पर सवार होकर समुद्र पार कर दूसरे महाद्वीप तक पहुँचे थे।
प्लैटीराइनी (Platyrrhini), यानी "नई दुनिया के बंदर", लगभग चार से साढ़े तीन करोड़ वर्ष पहले इसी प्रक्रिया से अफ़्रीका से दक्षिण अमेरिका जा पहुँचे। प्राइमेट्स जंगल, सवाना और पहाड़ जैसे विभिन्न परिवेशों में ढलने में सक्षम थे, और उनकी खान-पान की आदतें — जैसे फल, पत्ते, कीड़े खाना, पेड़ों पर जीवन बिताना और सामाजिक बनावट — उन्हें अलग-अलग इलाकों में टिके रहने में मददगार साबित हुईं। सर्वभक्षी होना हमारे प्राइमेट पूर्वजों के लिए बहुत फ़ायदेमंद रहा। यह पढ़कर असली, नक़ली और आधे-अधूरे तमाम तथाकथित शाकाहारियों का ख़ून खौल सकता है, पर उनके वे परम आदिम पूर्वज तो जो मिला वही चट कर जाते थे — फल-मूल, अंडे, यहाँ तक कि छोटे-मोटे जीव भी।
टेक्टोनिक प्लेटों (tectonic plates) की हलचल ने भी प्राइमेट्स के विस्तार में भूमिका निभाई। जब महाद्वीप एक-दूसरे से अलग होते गए, तब प्राइमेट्स अपने-अपने इलाके में विकसित होकर भिन्न-भिन्न प्रजातियों में बदल गए। कैटैराइनी (Catarrhini), यानी "पुरानी दुनिया के बंदर", अफ़्रीका और एशिया में रहते रहे, जबकि प्लैटीराइनी दक्षिण अमेरिका में विकसित हुए।
अठारहवीं सदी के वैज्ञानिकों के पास शायद इतने बड़े-बड़े काम नहीं थे, इसलिए नाक देखकर ही उन्होंने कैटैराइनी और प्लैटीराइनी के नाम रख दिए! जिनकी नाक थोड़ी चौड़ी थी और नथुने दोनों तरफ़ खुले हुए थे, उन्हें कहा गया प्लैटीराइनी — यानी "चौड़ी नाक वाले"। और जिनकी नाक पतली थी और नथुने नीचे की ओर मुड़े हुए थे, उन्हें कहा गया कैटैराइनी — यानी "नीचे-मुँहे नाक वाले"। इन दोनों भाइयों में एक और फ़र्क़ था। प्लैटीराइनी भाइयों की पूँछ बड़े काम की चीज़ थी। कई की पूँछ एक हाथ की तरह काम करती — डाल पर लटककर फल खाना, बच्चे को थामना, आराम से जीवन बिताना। दूसरी तरफ़ कैटैराइनी भाइयों ने सोचा, "इतनी लंबी पूँछ ढोकर क्या फ़ायदा?" नतीजतन इनके वंश से बाद में विकास के फलस्वरूप जन्मे ग्रेट एप्स (Great Apes) यानी महावानरों की पूँछ बेकार होने के कारण पूरी तरह ग़ायब हो गई!
उसी कैटैराइनी वंश-परंपरा के लंबे विकास-इतिहास की सबसे आख़िरी शाखाओं में से एक है होमो सेपियन्स। यानी जो प्राणी खुद को धरती का सबसे बुद्धिमान जीव घोषित करता है, वह असल में एक "पूँछ खो चुका कैटैराइनी" के सिवा और कुछ नहीं है!
फिर क़रीब साढ़े तीन से तीन करोड़ वर्ष पहले ओलिगोसीन (Oligocene) युग में अफ़्रीका में विकसित हुए कैटैराइनी प्राइमेट्स की क़िस्मत खुल गई। वहाँ के गर्म जंगल, भरपूर फल और अनुकूल परिवेश देखकर उन्होंने उसे अपना स्थायी ठिकाना बना लिया। लाखों वर्षों में बदलते-बदलते वे ईजिप्टोपिथेकस (Aegyptopithecus) प्रजाति में तब्दील हो गए। नाम जितना कठिन, काम उतना ही बड़ा। प्रकृति ने इनके मस्तिष्क को थोड़ा बड़ा किया, आँखों की दृष्टि को तेज़ किया और डाल-से-डाल फाँदने की कला में इन्हें पीएचडी करा दी।
फिर आज से लगभग ढाई से तेईस लाख वर्ष पहले आया मायोसीन (Miocene) युग।
कैटैराइनी वंश-परंपरा से दो बड़ी शाखाएँ अलग हुईं — एक तरफ़ पुरानी दुनिया के बंदर (Old World Monkeys), और दूसरी तरफ़ होमिनोइडिया (Hominoidea) यानी वानरों का महापरिवार या सुपरफ़ैमिली। इस नए होमिनोइडिया परिवार का पहला चर्चित सदस्य था प्रोकॉन्सुल (Proconsul)।
बेचारे की पूँछ तो पहले ही इतिहास बन चुकी थी। उसने पूँछ के बिना डाल पर चलना सीखा, फल खाए, और शायद कभी-कभार सोचता भी होगा — "अगर यह पूँछ रखी होती तो थोड़ी सुविधा न हो जाती?"
प्रोकॉन्सुल से जन्मे एफ़्रोपिथेकस (Afropithecus)। इनका वंश बढ़ा तो एक और प्रजाति सामने आई — केन्याफ़िथेकस (Kenyapithecus)। आज से क़रीब दो करोड़ से डेढ़ करोड़ वर्ष पहले, जब भूमि-संयोग फिर से बना, तो अफ़्रीका के जंगलों से केन्याफ़िथेकस और कई अन्य वानर वंशों के सदस्य यूरोप और एशिया की ओर प्रवास पर निकल पड़े। हाँ, मानो उनके पासपोर्ट पर "अनलिमिटेड वर्ल्ड टूर" का वीज़ा लगा हो, इसलिए जिधर मन ललचाया उधर उछल-कूद और झूलते-झामते वे जा पहुँचते थे! यूरोप में ड्रायोपिथेकस (Dryopithecus), ऊरानोपिथेकस (Ouranopithecus) और ग्रिफ़ोपिथेकस (Griphopithecus), और एशिया में शिवापिथेकस (Sivapithecus) जैसे पूँछविहीन वानरों ने ख़ूब नाम कमाया। शिवापिथेकस की खोपड़ी देखकर वैज्ञानिक आज भी हँसकर कहते हैं — "अरे! यह तो ओरांगउटान परिवार के पुराने फ़ैमिली एल्बम से निकलकर आया है!"
पर यूरोप और एशिया गए बहुत-से वानर बाद के दौर में जलवायु-परिवर्तन के चलते विलुप्त हो गए। दूसरी ओर अफ़्रीका में रह गई होमिनोइडिया शाखा सुरक्षित बनी रही। वहाँ लाखों वर्षों तक इनका विकास-क्रम चलता रहा। क़रीब एक करोड़ वर्ष पहले इनमें से गोरिल्ला का वंश अलग हो गया। आख़िरकार क़रीब सत्तर से साठ लाख वर्ष पूर्व वह ऐतिहासिक क्षण आया। अफ़्रीका के एक वंश ने कहा — "चलो, हम चिंपैंज़ी बन जाते हैं।" और दूसरे वंश ने कहा — "नहीं, हम कुछ अलग राह पकड़ते हैं।" वह दूसरा वंश ही होमिनिनी (Hominini) है, और यही मनुष्य के पूर्वज थे।
ठीक उसी समय अफ़्रीका की जलवायु शुष्क होने लगी। घने जंगलों की जगह धीरे-धीरे सवाना घास के मैदान फैलने लगे। पेड़ से पेड़ पर फाँदने के मौक़े कम हो गए, इसलिए पेड़ से नीचे उतरने के अलावा कोई चारा न रहा। प्रकृति मानो कह रही थी — "भाई लोगो, बहुत दिन पेड़ों पर खेल लिए। अब थोड़ा नीचे उतरकर देखो, धरती कैसी दिखती है!"
उसी बदली हुई दुनिया में नज़र आए साहेलैंथ्रोपस चैडेंसिस (Sahelanthropus tchadensis) — क़रीब सत्तर से साठ लाख वर्ष पूर्व। वे न पूरी तरह आज के इंसान थे, न पूरी तरह वानर; दो पैरों पर थोड़ा-थोड़ा खड़े होकर चलने की पहली साहसिक कोशिश कर रहे थे।
इसके बाद हमारे होमिनिन पूर्वजों के जीवन में शुरू हुआ एक और रोमांचक अध्याय। लगभग साठ से चालीस लाख वर्ष पूर्व ओरोरिन (Orrorin) और अर्डिपिथेकस (Ardipithecus) जैसे महाशय अफ़्रीका के जंगलों में विचरण करते रहे। इन्होंने अब तक पेड़ों से पुराना नाता पूरी तरह नहीं तोड़ा था। डाल पर चढ़ते भी थे, फिर नीचे उतरकर दो पैरों पर थोड़ा-थोड़ा चलने का अभ्यास भी करते थे। ख़ासकर अर्डिपिथेकस रैमिडस (Ardipithecus ramidus) बड़ा चालाक और मज़ाकिया मिज़ाज का था। पेड़ चढ़ना भी पसंद करता था, और ज़मीन पर दो पैरों पर चलने की कोशिश भी करता था। न वह पेड़ को पूरी तरह छोड़ पा रहा था, न ज़मीन को पूरी तरह अपना पा रहा था — पूरी तरह त्रिशंकु जैसी हालत में उसका जीवन कट रहा था!
क़रीब चालीस लाख वर्ष पूर्व मंच पर आया ऑस्ट्रेलोपिथेकस (Australopithecus) वंश।
"लूसी" (Lucy) के कंकाल से मनुष्य को इनकी पहचान मिली। बेचारी लूसी जीवित रहते यह जानती भी न थी कि करोड़ों वर्ष बाद उसकी हड्डियों को लेकर होमो सेपियन्स मोटी-मोटी किताबें लिखेंगे और शोध-पत्र छापेंगे! लूसी दो पैरों पर सीधी खड़ी होकर चलने में काफ़ी माहिर थी, पर मौक़ा मिलते ही पेड़ चढ़ना भी न भूलती थी — आँख मूँदकर पुरानी आदत भला कहाँ जाती है! इसके बाद यही वंश आगे चलकर दो अलग-अलग वंशों में बँट गया। एक तरफ़ पैरैंथ्रोपस (Paranthropus) वंश विकसित हुआ, जिसने अपने विशाल दाँत और मज़बूत जबड़े के बल पर कड़े पत्तों और जड़ों को चबाने की आदत डाल ली। दूसरी तरफ़ हमारे होमो (Homo) वंश ने सोचा — "नहीं, शरीर के बजाय थोड़ा दिमाग़ का इस्तेमाल करना ज़्यादा मुनासिब रहेगा।"
क़रीब चौबीस लाख वर्ष पूर्व अवतरित हुए होमो हैबिलिस (Homo habilis) — जिन्हें वैज्ञानिक "हैंडी मैन" या कर्मकुशल मनुष्य कहते हैं। इनके मस्तिष्क का आकार पहले से काफ़ी बड़ा हो गया। इन्होंने पत्थर के टुकड़े को महज़ ज़मीन पर पड़ी ठोकर की चीज़ न मानकर सोचा, "इस पत्थर को थोड़ा धार दे दें तो अच्छा काटने वाला हथियार बन जाएगा!" और वहीं से शुरू हुई मानव सभ्यता की पहली तकनीक — पत्थर के हथियार! क़रीब बीस लाख वर्ष पहले मंच पर आए होमो इरेक्टस (Homo erectus)। ये थे पूरे दुस्साहसी और घुमक्कड़ स्वभाव के! अफ़्रीका की सीमा लाँघकर ये निकल पड़े — एशिया गए, यूरोप गए। लंबे पैर, सीधा शरीर, मज़बूत काठी और अधिक उन्नत पत्थर की कुल्हाड़ियों ने इन्हें दूर-दूर तक पहुँचा दिया। बाद में आग को वश में करने की कला भी होमो इरेक्टस ने आत्मसात कर ली। प्रकृति शायद उस वक़्त मन-ही-मन कह रही थी — "इस नए मॉडल पर थोड़ा सतर्क नज़र रखनी होगी, ये आग से खेलना सीख गए हैं!"
समय गुज़रता गया। क़रीब आठ लाख वर्ष पूर्व होमो हाइडलबर्गेंसिस (Homo heidelbergensis) जैसे मनुष्य और भी चतुर हो गए। बड़े-बड़े शिकार करते, दल बनाकर काम करते और हथियारों को और धार देते गए।
आख़िरकार क़रीब तीन लाख वर्ष पूर्व अफ़्रीका में अवतरित हुई हमारी अपनी प्रजाति — होमो सेपियन्स। प्रकृति जिस परीक्षण-निरीक्षण को करोड़ों वर्षों से करती आ रही थी, यह उसका सबसे नया और सबसे उन्नत "श्रेष्ठ संस्करण" था!
प्रकृति ने इन्हें तमाम उन्नत क्षमताओं से लैस करके पृथ्वी पर भेजा था। विशाल मस्तिष्क, जटिल भाषा, भविष्य की योजना बनाने की क्षमता, कला, संगीत और असीम जिज्ञासा — जैसे कई गुण होमो सेपियन्स के पास थे।
पर एक पुरानी बीमारी अब भी नहीं गई थी — घुमक्कड़ी! अपने आदिम प्राइमेट पूर्वजों की तरह होमो सेपियन्स भी एक जगह चैन से बैठ न सका। क़रीब सत्तर से साठ हज़ार वर्ष पूर्व अफ़्रीका छोड़कर ये मध्य-पूर्व की ओर निकल पड़े। वहाँ इनकी मुलाक़ात हुई निएंडरथल (Neanderthal) महाशयों से। कहीं होड़ हुई, कहीं पड़ोसी की तरह साथ-साथ रहना हुआ, और कहीं प्रेम-विवाह भी हो गया! इसीलिए आज यूरोप और एशिया के अधिकांश लोगों के डीएनए में कुछ अंश निएंडरथल मानव का बचा हुआ है।
फिर होमो सेपियन्स के कुछ दल समुद्र किनारे-किनारे चलते हुए दक्षिण एशिया पहुँचे। भारत में तब भरपूर भोजन मिलता था, पर यह भूमि हिंसक जीव-जंतुओं से भी भरी थी। पर होमो सेपियन्स के पास उन्नत हाथ-हथियार थे, आग का इस्तेमाल भी उन्हें आता था, इसलिए वे भारत में टिक गए। सिर्फ़ टिके ही नहीं, वंश भी बढ़ा दिया। भोजन की कोई कमी न थी। मछली, केकड़े, सीप-घोंघे, फल-मूल — जो मिला, चट करते गए और ढेरों बच्चे जनते गए, यहाँ तक कि आबादी इतनी बढ़ गई कि उन्हें फिर से कहीं और जाने के लिए कमर कसनी पड़ी। कुछ दल दक्षिण-पूर्व एशिया गए, और वहाँ से आख़िरकार क़रीब पैंसठ से पचास हज़ार वर्ष पूर्व वे नाव खेते हुए ऑस्ट्रेलिया तक जा पहुँचे। यानी तब तक हमारे होमो सेपियन्स समुद्र पार करने की नौका-कला भी सीख चुके थे। होमो सेपियन्स के कुछ दल भारत से दक्षिण-पूर्व एशिया गए और वहाँ से चीन तथा जापान पहुँचे। भारत से एक और दल तिब्बत और पूर्वी रूस की ओर गया। भारत से एक दल ईरान होते हुए यूरोप और मध्य एशिया भी गया। भारत तब होमो सेपियन्स के वंश-विस्तार का केंद्र बन गया था, इसीलिए भारत को "बीहाइव ऑफ़ ह्यूमनकाइंड" (Beehive of humankind) भी कहा जाता है।
दूसरी ओर अफ़्रीका से होमो सेपियन्स के कुछ दल उत्तर की ओर निकलकर यूरोप और मध्य एशिया के ठंडे इलाक़ों में जा पहुँचे। वहाँ प्रचंड ठंड, बर्फ़, विशालकाय मृग और मैमथों से जूझना पड़ा। उन्होंने पशु-चर्म के कपड़े सिलकर पहने, तीखे भाले बनाए और गुफ़ाओं की दीवारों पर अद्भुत सुंदर चित्र उकेरे। ऐसा लगता है, मानो मानव जाति की पहली "आर्ट गैलरी" खुल गई हो!
एशिया के बर्फ़ीले इलाक़े में इनकी भेंट हुई एक और रहस्यमय मानव-समूह — होमो डेनिसोवन्स (Homo Denisovans) से। वहाँ भी थोड़े-बहुत "पारिवारिक रिश्ते" बन गए। आज भी तिब्बती, मेलानेशियाई, भारत के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी इलाक़ों के लोगों तथा कुछ एशियाई जनजातियों के डीएनए में डेनिसोवन का आनुवंशिक निशान बचा हुआ है।
आख़िरी हिमयुग (Ice Age) में समुद्र का पानी बर्फ़ बनकर जम जाने से जलस्तर काफ़ी नीचे चला गया। नतीजतन साइबेरिया और अलास्का के बीच "बेरिंग लैंड ब्रिज" (Bering Land Bridge) नाम का एक स्थल-सेतु प्रकट हो गया। मनुष्य ने कहा — "अरे! धरती ने नया रास्ता खोल दिया है, चलो थोड़ा और घूम आते हैं!" क़रीब बीस से सोलह हज़ार वर्ष पूर्व होमो सेपियन्स अमेरिका महाद्वीप पहुँचे और देखते-ही-देखते उत्तर से लेकर दक्षिण अमेरिका तक फैल गए।
इस लंबी, करोड़ों वर्षों की यात्रा में होमो सेपियन्स का सबसे बड़ा हथियार सिर्फ़ पत्थर का भाला या छुरी नहीं था। उनकी असली ताक़त थी — मिल-जुलकर एक साथ काम करना, भाषा के ज़रिए ज्ञान का आदान-प्रदान करना, विपरीत परिस्थितियों को जल्दी अपना लेना और नए-नए आविष्कार करते रहना। यही असाधारण गुण होमो सेपियन्स को पृथ्वी के हर कोने में अपना वर्चस्व फैलाने में मददगार साबित हुआ।
और आख़िरकार, लाखों वर्षों तक पेड़ की डाल पर झूलता रहा, पूँछ खो चुका, डरते-डरते दो पैरों पर चलना सीखा, पत्थर को घिस-घिसकर हथियार बनाने वाला वही प्राइमेट-वंशज आज सूट-बूट पहनकर चाँद पर उतर रहा है, मंगल ग्रह पर जाने के लिए रॉकेट तैयार कर रहा है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता गढ़ रहा है और कंप्यूटर के सामने बैठकर अपने ही परम पुराने पुरखों के बारे में रसीले निबंध लिख रहा है!
प्रकृति शायद यह सब देखकर मन-ही-मन मुस्कराती होगी और कहती होगी — "पेड़ की डाल पर फुदक-फुदककर कीड़े खाने वाले उस छोटे-से गिलहरी जैसे जीव के वंशज एक दिन इतनी दूर पहुँचेंगे, यह तो मैंने भी शायद सपने में नहीं सोचा था!"
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