मानव इतिहास का एक विस्मयकारी पहलू हमारी भाषा और कल्पनाशक्ति है। होमो सेपियंस को अन्य प्राणियों से जो अलग करता है, वह है ऐसी चीज़ों पर विश्वास करने की अद्भुत क्षमता, जिनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं होता। नदी, पर्वत, वृक्ष और जीव-जंतु वास्तविक होते हैं, परंतु कोई 'देश' या उसका 'नाम' केवल हमारे मस्तिष्क में बसी एक सामूहिक कल्पना अथवा कल्पित यथार्थ है। लाखों वर्षों तक जब आदिमानव शिकारी-संग्राहक के रूप में पृथ्वी पर घूमता था, तब भूमि का कोई नाम नहीं था और न ही पृथ्वी पर कोई सीमा-रेखा थी। परंतु कृषि-क्रांति के बाद जब मनुष्य ने स्थायी बस्तियाँ बसाईं और साम्राज्य बनाने आरंभ किए, तब राष्ट्र की धारणा का जन्म हुआ। किसी विशाल भूखंड को एक नाम देना केवल भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि यह मानवीय अहंकार, सांस्कृतिक गर्व और सामूहिक पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक है। आज हम जिस देश को 'चीन' नाम से जानते हैं, उसके नामकरण का इतिहास केवल कुछ शब्दों की उत्पत्ति नहीं, बल्कि विभिन्न सभ्यताओं के बीच संबंध, वाणिज्य और मानवीय अवधारणा की एक अत्यंत रोमांचक कहानी है।
एशिया महाद्वीप के पूर्वी छोर पर दृष्टि डालें तो हम देखते हैं कि पीत नदी (Yellow River) और यांगत्से नदी की उर्वर घाटियों में एक विशाल तथा जटिल सभ्यता का विकास हुआ था। हज़ारों वर्ष पूर्व इस क्षेत्र में रहने वाले लोग पृथ्वी के अन्य भागों से पूर्णतः विच्छिन्न थे। प्रकृति ने उनके लिए एक अभेद्य दुर्ग बना रखा था — उत्तर में भयंकर गोबी मरुस्थल और शीतल स्टेप्स, पूर्व में अथाह प्रशांत महासागर, दक्षिण में घने और भयानक जंगल, तथा पश्चिम एवं दक्षिण-पश्चिम में विश्व की सर्वोच्च हिमालय पर्वतमाला और तिब्बत का पठार एक विशाल प्राचीर की तरह खड़े थे। इस भौगोलिक एकाकीपन ने वहाँ के निवासियों के मन में एक स्वतंत्र और आत्मकेंद्रित मानसिकता उत्पन्न की, जिसने उनके वैश्विक दृष्टिकोण और नामकरण-प्रक्रिया को गहराई से प्रभावित किया।
प्राचीन काल में वहाँ के लोग अपने देश को कभी 'चीन' नहीं कहते थे, न ही स्वयं को 'चाइनीज़' मानते थे। वास्तव में, 'देश' या राष्ट्र की आधुनिक धारणा उनके पास थी ही नहीं। वे मुख्यतः सत्तासीन राजवंश के नाम से अपने राज्य को पहचानते थे — जैसे शिया राजवंश, शांग राजवंश अथवा झोउ राजवंश। फिर भी, भौगोलिक और राजनीतिक स्तर पर समूचे क्षेत्र को दर्शाने के लिए वे एक व्यापक शब्द का प्रयोग करते थे — 'तियानशिया' (Tianxia)। इस शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'स्वर्ग के नीचे की समस्त वस्तुएँ' अथवा 'आकाश के नीचे की संपूर्ण दुनिया'। उनकी ब्रह्मांड-संबंधी धारणा के अनुसार आकाश गोलाकार और पृथ्वी वर्गाकार थी। इस आकाश और पृथ्वी के मिलन-स्थल पर एक पवित्र शासन-व्यवस्था थी, जिसे वे समस्त मानव जाति की सर्वोच्च और एकमात्र वैध व्यवस्था मानते थे।
इस विशाल वर्गाकार पृथ्वी के ठीक केंद्रबिंदु में एक पवित्र और उन्नत स्थान होने की उन्होंने कल्पना की थी, जिसे उन्होंने नाम दिया 'झोंगगुओ' (Zhongguo)। मंदारिन भाषा में 'झोंग' का अर्थ है 'मध्य' या 'केंद्र' और 'गुओ' का अर्थ है 'राज्य' या 'राष्ट्र'। अतः 'झोंगगुओ' का पूरा अर्थ हुआ 'मध्यवर्ती राष्ट्र', जिसे अंग्रेज़ी में हम मिडिल किंगडम (Middle Kingdom) कहते हैं। आरंभ में यह शब्द केवल राजधानी या राजा के निवास-स्थान को दर्शाता था। ईसा-पूर्व प्रथम सहस्राब्दी तक, पश्चिम झोउ राजवंश के समय, एक कांस्य पात्र पर खुदी हुई प्राचीन लिपि से पहली बार ऐतिहासिक स्तर पर 'झोंगगुओ' शब्द का प्रमाण मिलता है। उस समय यह एक सीमित भौगोलिक शब्द था जो पीत नदी के केंद्रीय मैदानी क्षेत्र को दर्शाता था, जो तब उन्नत कृषि-प्रणाली और राजनीतिक सभ्यता का केंद्रबिंदु था।
धीरे-धीरे यह 'झोंगगुओ' शब्द केवल भौगोलिक पहचान न रहकर एक गहरा मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक अर्थ ग्रहण कर गया। होमो सेपियंस सदैव स्वयं को समूहों में विभाजित करना पसंद करते हैं, जहाँ मूल मंत्र होता है 'हम' और 'वे'। प्राचीन चीन के इन निवासियों का मानना था कि वे ही पृथ्वी के एकमात्र सभ्य मनुष्य हैं और उनका विशाल साम्राज्य ही संपूर्ण विश्व का केंद्रबिंदु है। उनके सम्राट को कहा जाता था 'तियानज़ी' (Tianzi), जिसका अर्थ है 'स्वर्ग का पुत्र'। उनका दृढ़ विश्वास था कि स्वर्ग के पुत्र के पास 'Mandate of Heaven' अर्थात स्वर्गीय आदेश है, जिसके बल पर वह केवल अपने राज्य पर नहीं, बल्कि संपूर्ण दुनिया अथवा 'तियानशिया' पर शासन करने का न्यायसंगत अधिकार रखता है। चूँकि वे शताब्दियों तक अपने आसपास किसी समान स्तर की उन्नत सभ्यता के विशेष संपर्क में नहीं आए, इसलिए उनका यह कल्पित यथार्थ अटूट बना रहा कि मानव जाति का सर्वश्रेष्ठ और एकमात्र उन्नत समाज केवल उनके ही राष्ट्र में विद्यमान है।
इसी श्रेष्ठता की मानसिकता से जन्म लिया एक विशेष सांस्कृतिक विभाजन ने, जिसे इतिहासकार 'Hua-Yi' भेदभाव कहते हैं। 'हुआ' अथवा 'श्या' शब्द का अर्थ था सभ्य और परिष्कृत व्यक्ति — अर्थात जो झोंगगुओ में निवास करते थे, उन्नत भाषा बोलते थे, सुंदर रेशमी वस्त्र पहनते थे, उन्नत कृषि करते थे और विशेष सामाजिक रीति-रिवाजों का पालन करते थे। इसके विपरीत था 'यी' शब्द, जिसका अर्थ था असभ्य या बर्बर। केंद्रीय राष्ट्र के चतुर्दिक निवास करने वाले विभिन्न प्रांतीय और घुमंतू लोगों को वे निम्न स्तर का मनुष्य मानते थे। संपूर्ण विश्व उनके लिए मात्र दो भागों में विभाजित था — एक केंद्र में स्थित प्रकाशित और सभ्य राष्ट्र, और दूसरा उसके चारों ओर घिरा असभ्य बर्बरों का अंधकारमय संसार।
जब कोई साम्राज्य स्वयं को संपूर्ण विश्व का एकमात्र केंद्र मान लेता है, तब उसे अपना कोई विशेष नाम रखने की आवश्यकता नहीं रहती। उदाहरण स्वरूप, आज यदि हम मानें कि पृथ्वी के अतिरिक्त ब्रह्मांड में किसी अन्य ग्रह पर जीव नहीं हैं, तो ब्रह्मांडीय स्तर पर स्वयं को पृथ्वीवासी कहकर बार-बार परिचय देने की कोई आवश्यकता नहीं होती। ठीक इसी प्रकार प्राचीन चीन के लोगों के लिए उनका साम्राज्य ही एकमात्र सभ्य दुनिया थी। उन्हें अन्य देशों से स्वयं की तुलना करने अथवा किसी वैश्विक समाज में स्वयं को अलग सिद्ध करने के लिए आज के 'चीन' जैसे किसी विशिष्ट राष्ट्रीय नाम की आवश्यकता ही नहीं थी। इस आत्मकेंद्रित विश्व-विश्वास ने हज़ारों वर्षों तक उनकी राजनीति, कला और समाज को नियंत्रित रखा।
ईसा-पूर्व तृतीय शताब्दी तक पीत नदी की घाटी में एक युगांतकारी घटना घटी, जिसने मानव इतिहास की गति को गहराई से प्रभावित किया। होमो सेपियंस के इतिहास में साम्राज्य केवल तलवार और युद्ध से नहीं बनते, बल्कि वे एक सामूहिक कल्पना और प्रशासनिक अनुशासन के माध्यम से टिके रहते हैं। लंबे समय से आपस में रक्तरंजित संघर्ष करने वाले छोटे-छोटे राज्यों को एकत्र कर एक अत्यंत पराक्रमी शासक ने समूचे भूखंड को एक विशाल साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया। उसका नाम था चिन शी हुआंग (Qin Shi Huang), और उसके नवगठित राजवंश का नाम था 'चिन' (Qin), जिसका उच्चारण प्रायः 'चिन्' जैसा किया जाता था।
इस चिन राजवंश का शासनकाल इतिहास के पन्नों पर बहुत कम समय के लिए रहा — मात्र पंद्रह वर्ष। परंतु इस अल्प समय में उन्होंने मानव समाज के प्रबंधन के लिए एक अभूतपूर्व नींव रखी। उन्होंने एक प्रबल शक्तिशाली केंद्रीय प्रशासन गठित किया, समूचे साम्राज्य में समान मुद्रा प्रचलित की, समान लिपि लागू की और एक विशाल सेना तैयार की। उत्तर दिशा से आक्रमण करने वाले घुमंतू जनजातियों को रोकने के लिए उन्होंने एक विशाल प्राचीर का निर्माण आरंभ किया, जो बाद में विश्वप्रसिद्ध 'Great Wall of China' नाम से जानी गई। यद्यपि चिन राजवंश शीघ्र ही पतन की ओर बढ़ गया, तथापि उन कुछ ही वर्षों के शक्ति-प्रदर्शन की प्रतिध्वनि इतनी शक्तिशाली थी कि इसकी ख्याति एशिया महाद्वीप के विशाल मरुस्थल और अभेद्य पर्वतमालाओं को लांघकर पश्चिम और दक्षिण दिशा में फैलने लगी।
ठीक उसी समय हिमालय के दक्षिणी छोर पर प्राचीन भारतीय सभ्यता बौद्धिक, दार्शनिक और वाणिज्यिक क्षेत्र में उत्कर्ष के शिखर पर पहुँच चुकी थी। मनुष्य की कल्पनाशक्ति केवल धर्म, देवता अथवा सामाजिक नियमों तक सीमित नहीं रहती, यह व्यापार, संपदा और अर्थव्यवस्था को भी नियंत्रित करती है। उस समय प्राचीन भारतीय व्यवसायी उत्तरपथ और रेशम मार्ग के माध्यम से मध्य एशिया होकर आने-जाने वाले विदेशी वणिकों के संपर्क में आने लगे थे। वे घुमंतू वणिक अपने साथ एक ऐसा वस्त्र लाते थे जिसकी चमक, कोमलता और गुणवत्ता भारतीयों को चकित कर देती थी। वह था रेशम अथवा Silk। प्राचीन काल में रेशम केवल एक कपड़ा नहीं था, यह सत्ता और सामाजिक प्रतिष्ठा का एक शक्तिशाली प्रतीक था। जब यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि यह अनुपम तथा बहुमूल्य वस्त्र कहाँ से आता है, वणिकों ने उत्तर दिया कि यह पूर्व दिशा के एक अत्यंत विशाल साम्राज्य से आता है, जिसपर 'चिन' (Qin) राजवंश शासन करता है।
यहीं से मानव समाज का भाषागत और मनोवैज्ञानिक खेल आरंभ होता है। भारतीय पंडितों और व्यवसायियों के लिए उस साम्राज्य की आंतरिक राजनीति अथवा वे स्वयं को 'झोंगगुओ' (मध्यवर्ती राष्ट्र) कहते हैं या नहीं, इसका कोई महत्व नहीं था। किसी दूरवर्ती राष्ट्र को पहचानने के लिए होमो सेपियंस सदैव अपने ज्ञात परिवेश में उपस्थित सबसे प्रभावशाली तत्व पर निर्भर करते हैं। भारतीय तो उन लोगों को जानते थे जो शक्तिशाली थे और जिनसे यह बहुमूल्य रेशम आता था। अतः प्राचीन संस्कृत भाषा में 'चिन' शब्द से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न हुए 'चीनक' (Cīnaka) और 'चीन' (Cīna) शब्द। आरंभिक काल में 'चीनक' शब्द मुख्यतः उस विशेष क्षेत्र से आने वाले लोगों को अथवा वहाँ उत्पादित सामग्री को दर्शाने के लिए एक विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता था।
धीरे-धीरे, हमारे मस्तिष्क की उसी अद्भुत सामूहिक कल्पना-प्रक्रिया के माध्यम से, जिससे हम किसी सर्वथा अज्ञात भूखंड को एक शब्द में बाँध देते हैं, वह विशाल पूर्वदेशीय राष्ट्र संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप के लिए 'चीन' देश में परिणत हो गया। यह नामकरण केवल बाज़ार अथवा लोकमुख तक सीमित नहीं रहा। यह इतना व्यापक रूप से स्वीकृत हो गया कि तत्कालीन भारतीय शास्त्र और साहित्य में यह एक सामूहिक सत्य के रूप में अंकित हुआ। प्राचीन भारत के दो महान महाकाव्य 'महाभारत' और 'रामायण' में इस दूरवर्ती राष्ट्र और उसके निवासियों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। उदाहरण स्वरूप, महाभारत के आदि पर्व और सभा पर्व में 'चीन' लोगों को एक विदेशी योद्धा जाति के रूप में वर्णित किया गया है जो भारतवर्ष की उत्तर-पूर्वी सीमा पर निवास करते थे और अक्सर उपहार स्वरूप बहुमूल्य रेशमी वस्त्र लेकर आते थे।
राजनीति और अर्थशास्त्र के प्राचीन श्रेष्ठ ग्रंथ कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में भी वाणिज्यिक सामग्री का विवरण देते समय 'चीनपट्ट' शब्द का उल्लेख मिलता है। संस्कृत में इसका सीधा अर्थ है चीन देश से उत्पन्न पट्टवस्त्र अथवा रेशमी कपड़ा। इस ऐतिहासिक तथ्य से यह पूर्णतः स्पष्ट होता है कि ईसा-पूर्व शताब्दी के अंत तक भारतीय समाज में रेशमी कपड़ा इतना लोकप्रिय हो चुका था कि उसके उत्पत्ति-स्थल का नाम ही उसकी पहचान बन गया। बाद के काल में रचित अनेक संस्कृत काव्यों और नाटकों में 'चीनांशुक' शब्द का प्रयोग देखने को मिलता है, जो चीन देश से आयातित उच्चकोटि के मुलायम वस्त्र को दर्शाता था।
यहाँ हमें इतिहास का एक आश्चर्यजनक और रोचक विरोधाभास देखने को मिलता है। मानव समाज किस प्रकार सामूहिक कल्पना और अज्ञानता पर निर्भर होकर बना है, इसका यह एक जीवंत उदाहरण है। एक ओर पीत नदी की घाटी के निवासी स्वयं को क्रमशः 'हान' (Han), 'तांग' (Tang) अथवा 'मिंग' (Ming) राजवंश की प्रजा मानते रहे। वे अपने राष्ट्र को संपूर्ण दुनिया का केंद्र 'झोंगगुओ' (मिडिल किंगडम) मानते थे और शेष विश्व को असभ्य मानकर तुच्छ समझते थे। उन्हें यह ज़रा भी ज्ञात नहीं था कि विशाल पर्वतमाला के उस पार एक अत्यंत उन्नत सभ्यता उनकी अनजाने में ही उन्हें एक सर्वथा भिन्न नाम दे चुकी है। जो चिन राजवंश मात्र पंद्रह वर्ष शासन कर विलुप्त हो गया था, उस राजवंश के पतन के सैकड़ों वर्ष बाद भी भारतीय उस विशाल देश को 'चीन' नाम से ही जानते रहे। क्योंकि मनुष्य का मस्तिष्क एक बार किसी नाम को अपने भाषागत और सांस्कृतिक ढाँचे में यथार्थ के रूप में ग्रहण कर लेने पर उसे सरलता से नहीं बदलता। आंतरिक राजनैतिक यथार्थ चाहे जो भी रहा हो, भारतीयों के लिए पूर्व दिशा के उस रहस्यमय देश की एकमात्र स्थायी पहचान 'चीन' ही बनी रही।
समय के साथ दोनों महान सभ्यताओं के बीच संबंध अधिक घनिष्ठ हुए। बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के फलस्वरूप अनेक भारतीय भिक्षु और पंडित दुर्गम पर्वतीय मार्गों से तथा कलिंग देश से समुद्री यात्रा कर इस चीन देश गए, और वहाँ के अनेक जिज्ञासु परिव्राजक और श्रमण सत्य की खोज में भारत आए। इस निरंतर धार्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से 'चीन' शब्द भारतीय मानस-पटल पर अधिकाधिक सुदृढ़ होता गया।
होमो सेपियंस कभी भी किसी एक स्थान अथवा किसी एक सीमा-रेखा के भीतर बंधकर नहीं रह सकते। हमारे मस्तिष्क में निहित अंतहीन जिज्ञासा और सामग्री पाने की लालसा ने हमें संपूर्ण पृथ्वी पर भ्रमण करने के लिए बाध्य किया है। हज़ारों वर्षों तक मनुष्य के इस अन्वेषण ने एक विश्वव्यापी नेटवर्क का निर्माण किया। प्राचीन काल का वह प्रसिद्ध रेशम मार्ग और हिंद महासागर के दुर्गम समुद्री पथ केवल वस्तुओं के परिवहन का माध्यम नहीं थे, बल्कि वे आज के आधुनिक इंटरनेट की भाँति कार्य करते थे। इस मार्ग से केवल रेशम, मसाले अथवा सोना-चाँदी ही एक स्थान से दूसरे स्थान नहीं जाते थे, बल्कि इसके साथ यात्रा करते थे मनुष्य के विचार, कहानियाँ, धर्म और सबसे बढ़कर नए शब्द। प्राचीन भारतीयों ने अपने सांस्कृतिक और वाणिज्यिक प्रयोजन के लिए पूर्व दिशा के उस विशाल तथा रहस्यमय साम्राज्य को जो 'चीन' अथवा 'चीनक' नाम दिया था, वह अब अपनी जन्मभूमि छोड़कर एक सुदीर्घ विश्वव्यापी यात्रा आरंभ करने को तैयार हो रहा था।
प्राचीन और मध्ययुगीन भारत के बाज़ारों में अरब और फारस देश के वणिकों की प्रबल भीड़ जुटती थी। वे समुद्र और मरुस्थल पार कर भारत से मसाले, सुगंधित द्रव्य और उन्नत सूती वस्त्र एकत्र करने आते थे। उन बाज़ारों में उन्होंने पहली बार पूर्व दिशा से आए उस चमत्कारी, मुलायम और बहुमूल्य रेशमी वस्त्र को देखा। जब उन विदेशी वणिकों ने इस अनुपम वस्त्र के स्रोत के बारे में भारतीय व्यवसायियों से प्रश्न किया, तब भारतीयों ने उन्हें उस 'चीन' देश की बात बताई। इस प्रकार प्राचीन संस्कृत शब्द मध्यपूर्व की भाषाओं में प्रवेश कर गया। फारसी भाषा में यह रूपांतरित हुआ 'चीन्' (Chin) में और अरबी भाषा में यह बन गया 'अस्-सीन' (as-Sin)। अरब के नाविक और मरुस्थल के वणिक जब अपने ऊँटों की पीठ पर तथा जहाज़ों में यह बहुमूल्य सामग्री लादकर अपने देश लौटे, तब वे अपने साथ केवल भौतिक संपदा नहीं, बल्कि एक दूरवर्ती भूखंड की नई पहचान भी लेकर गए। इस्लामी स्वर्ण युग के प्रसिद्ध विद्वानों, भूगोलविदों और इतिहासकारों ने अपने मानचित्रों तथा ग्रंथों में इस विशाल पूर्वी साम्राज्य को उसी नाम से अंकित करना आरंभ किया।
इसके बाद आरंभ हुआ यूरोपीयों के विश्व-अन्वेषण और आविष्कार का युग। पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में जब पुर्तगाली नाविक अफ्रीका महाद्वीप की परिक्रमा कर हिंद महासागर में प्रविष्ट हुए, तब उन्हें एक विशाल और जटिल वाणिज्यिक दुनिया का सामना करना पड़ा। उन्होंने देखा कि भारतीय उपमहाद्वीप और मलय प्रायद्वीप के लोग पूर्व दिशा के उस विशाल साम्राज्य के साथ व्यापक रूप से वाणिज्य कर रहे हैं और वहाँ के सभी स्थानीय लोग उस देश को 'चीन' अथवा 'चिना' नाम से ही पुकारते हैं। मार्को पोलो जैसे आरंभिक यूरोपीय यात्री उत्तरी स्थलमार्ग से गए होने के कारण उस क्षेत्र को 'Cathay' कहते थे, परंतु समुद्री मार्ग से आए नए यूरोपीय अन्वेषकों ने भारतीय सागरीय शब्दावली को ही अपनाया। सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में पुर्तगाली लेखक और अन्वेषक जैसे दुआर्ते बार्बोसा और गार्सिया द ओर्ता ने अपने यात्रा-विवरणों में इस शब्द को रोमन लिपि में 'China' लिखना आरंभ किया। छापाखाने के आविष्कार के साथ ये यात्रा-विवरण और नए मानचित्र समूचे यूरोप में व्यापक रूप से प्रसारित हुए। धीरे-धीरे 'China' शब्द अंग्रेज़ी, स्पेनिश, डच, पुर्तगाली और फ्रांसीसी जैसी प्रमुख यूरोपीय भाषाओं में एक स्वीकृत सत्य बन गया।
इधर पीत नदी के तट पर स्थित वह विशाल साम्राज्य अपनी उसी पुरातन आत्मकेंद्रित कल्पना में जीवित रहा। वे अब भी स्वयं को विश्व का एकमात्र केंद्र 'झोंगगुओ' (मिडिल किंगडम) और अपने सम्राट को 'स्वर्ग का पुत्र' मानते थे। उनकी विश्व-व्यवस्था में कोई अन्य देश उनके समान नहीं था, बल्कि सभी उनके अधीनस्थ अथवा असभ्य बर्बर थे। परंतु उन्नीसवीं शताब्दी तक होमो सेपियंस के इतिहास में एक नई तथा अत्यंत आक्रामक कल्पित यथार्थ का उदय हो चुका था — वह थी आधुनिक यूरोपीय 'राष्ट्र-राज्य' अथवा Nation-State व्यवस्था। यूरोपीयों ने संपूर्ण पृथ्वी को निश्चित भौगोलिक सीमा-रेखा, निश्चित संप्रभुता और निश्चित नाम वाले देशों में विभाजित करना आरंभ कर दिया था, जिसे इतिहासकार Westphalian व्यवस्था कहते हैं। जब यूरोपीय शक्तियाँ अपनी आधुनिक बंदूकें, वाणिज्यिक संधियाँ और औपनिवेशिक आकांक्षाएँ लेकर चीन के तटों पर पहुँचीं, तब इन दो सर्वथा भिन्न सामूहिक कल्पनाओं के बीच एक भयंकर संघर्ष हुआ।
आरंभ में चीन के चिंग (Qing) राजवंश के सम्राट यूरोपीय प्रतिनिधियों को केवल समुद्र पार से आए असभ्य बर्बर मानकर अस्वीकार करते रहे। वे चाहते थे कि यूरोपीय 'झोंगगुओ' के सम्राट को विश्व की सर्वोच्च सत्ता के रूप में स्वीकार करें। परंतु उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में हुए अफीम युद्ध (Opium Wars) और उनसे उत्पन्न सैन्य पराजयों ने उनके हज़ारों वर्ष पुराने अहंकार को चूर-चूर कर दिया। यथार्थ के कठोर आघात से उन्होंने समझा कि वे अब संपूर्ण विश्व का केंद्र नहीं रहे, बल्कि एक विशाल पृथ्वी के अनेक संप्रभु देशों में से केवल एक देश मात्र हैं। इस नई पूँजीवादी और औपनिवेशिक विश्व-व्यवस्था में टिके रहने के लिए और अन्य देशों के साथ समान स्तर पर कूटनैतिक संबंध स्थापित करने के लिए उन्हें अपनी एक निश्चित अंतर्राष्ट्रीय राष्ट्रीय पहचान अपनानी ही पड़ी।
तब तक संपूर्ण विश्व उन्हें 'चाइना' (China) कहकर पुकारने लगा था। अंतर्राष्ट्रीय संधियों पर हस्ताक्षर करते समय और पाश्चात्य देशों के साथ पत्राचार करते समय तत्कालीन शासकों को बाध्य होकर बाहरी दुनिया के लिए अपनी पहचान इसी नाम से स्वीकार करनी पड़ी। बाद में, बीसवीं शताब्दी के आरंभ में (1912 में) जब वहाँ हज़ारों वर्ष के साम्राज्यवादी शासन का पतन हुआ और एक आधुनिक गणतंत्र की स्थापना हुई, तब उन्होंने विधिवत रूप से अपने देश का अंग्रेज़ी नाम 'Republic of China' के रूप में अपनाया। इसके बाद 1949 में साम्यवादी क्रांति के पश्चात नई सरकार ने अपना अंतर्राष्ट्रीय नाम 'People's Republic of China' रखा।
आज की दुनिया में 'चीन' अथवा 'China' शब्द इतना स्वाभाविक और सामान्य प्रतीत होता है कि इसके पीछे कितना बड़ा मानवीय नाटक और विकास छिपा है, इसका हमें आभास ही नहीं होता। अपने देश के भीतर, आज भी वहाँ के निवासी मंदारिन भाषा में अपने देश को 'झोंगगुओ' ही कहते हैं और स्वयं को 'झोंगगुओरेन' कहते हैं, परंतु बाहरी दुनिया के लिए, संयुक्त राष्ट्र के लिए और विश्व अर्थव्यवस्था के लिए वे 'चाइनीज़' हैं और उनका देश 'चाइना' है।
यही है होमो सेपियंस की कल्पनाशक्ति और सामूहिक विश्वास का सबसे बड़ा प्रमाण। एक नाम, जो पहले ईसा-पूर्व तृतीय शताब्दी में मात्र पंद्रह वर्ष शासन करने वाले एक राजवंश (चिन) से उत्पन्न हुआ, जिसे प्राचीन भारतीयों ने संस्कृत रूप दिया, जिसे अरबी वणिकों ने मरुस्थल और समुद्र पार कराया, और जिसे यूरोपीय नाविकों ने छापाखाने के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय स्वीकृति प्रदान की — वह अंततः विश्व के सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में से एक विशाल जाति की स्थायी पहचान बन गया। मानव समाज में सत्य अथवा यथार्थ केवल वह नहीं होता जो कोई विशेष समूह अपने बारे में दावा करे, बल्कि वास्तविक यथार्थ वह होता है जिस पर संपूर्ण विश्व सामूहिक रूप से विश्वास करे। जब करोड़ों मनुष्यों ने एक निश्चित भूखंड को 'चीन' मान लिया, तब उस विशाल साम्राज्य को भी अपने प्राचीन आत्मकेंद्रित अहंकार को पीछे छोड़कर इस विश्वव्यापी कल्पित सत्य को अपनी अंतर्राष्ट्रीय पहचान के रूप में स्वीकार करना पड़ा। इतिहास की यह दीर्घ तथा रोमांचक यात्रा प्रमाणित करती है कि हम सब केवल अस्त्र-शस्त्र अथवा वाणिज्य से नहीं, बल्कि शब्द, कहानी और परस्पर विश्वास के एक विशाल अदृश्य जाल से एक-दूसरे के साथ गहराई से बंधे हुए हैं।
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