मानव जाति के इतिहास को अगर आप थोड़ी दूर से, आँखें सिकोड़कर देखें, तो एक बात बिल्कुल साफ नजर आती है: अपनी सभ्यता या तथाकथित 'तरक्की' के अहंकार में डूबे हमलावरों को हमेशा यही गलतफहमी रही कि तलवार की नोक पर किसी महल को हथिया लेने का मतलब पूरी तरह से जीत जाना होता है। पागलपन की हद तक उतावली विदेशी सेनाएं जब किले के बाहर डेरा डाले, अपनी आने वाली लूट-खसोट और पाशविक जश्न का हिसाब-किताब लगा रही होती थीं, तब वे बड़े आराम से उम्मीद कर रही होती थीं कि एक 'विजेता' के तौर पर जब किले के दरवाजे खुलेंगे, तो उन्हें बेशुमार दौलत और दासियों के रूप में बंदी महिलाओं का तोहफा मिलेगा। लेकिन उन्हें क्या पता था कि राजपूताना की मिट्टी में विजेताओं की ये घटिया फैंटेसी जल-भुनकर राख होने वाली थी।
जरा उस पिशाच अलाउद्दीन खिलजी को ही ले लीजिए। वह डकैत चित्तौड़गढ़ किले के बाहर महीनों तक तंबू गाड़कर बैठा रहा, दिमाग में बस एक ही खुजली—रूपसी रानी पद्मिनी को बंदी बनाकर अपनी जीत की ट्रॉफी बनाना है। लेकिन जब किले के दरवाजे खुले, तो इस महान 'विजेता' को मिला क्या? बस एक विशाल अग्निकुंड का ठंडा होता धुआं और मुट्ठी भर राख। जिस साम्राज्यवादी अहंकार को लगता था कि किसी औरत के शरीर और सम्मान को तलवार के दम पर छीना जा सकता है, उसके मुंह पर जौहर की धधकती आग ने एक करारा तमाचा जड़ दिया था। संस्कृत के 'जतुगृह' (यानी बहुत जल्दी आग पकड़ने वाला लाख का घर) से भाषा के सफर में 'जौहर' शब्द बना। यह परंपरा आत्महत्या जैसी कोई कायरता या कमजोरी नहीं थी; यह उन हमलावरों के मुंह पर जड़ा गया आखिरी, सबसे जोरदार थप्पड़ था।
आज की 21वीं सदी के आरामदायक सोफे में धंसकर, हाथ में अपनी फैंसी चाय का प्याला पकड़े, इतिहास का चीरहरण करने वाले हमारे आधुनिक 'मानव-प्रेमी' और आलोचक इस विषय पर बड़े-बड़े ज्ञान बघारते हैं। हमारी शानदार, त्रुटिपूर्ण शिक्षा प्रणाली और दरबारी इतिहासकारों का पाखंड भी इस मॉडर्न अज्ञानता का बहुत बड़ा कारण है। जिन्होंने अपनी कलम से इतिहास गढ़ा, उन्होंने मानो कोई पीआर एजेंसी खोल रखी थी—मध्य-एशिया से आए उन खूंखार लुटेरों को 'दर्द भरा प्रेमी', 'कला का पारखी' और 'बेहतरीन एडमिनिस्ट्रेटर' बनाकर पेश किया गया। पाठ्यपुस्तकों में बच्चों के दिमाग में बड़ी चालाकी से यह भर दिया गया कि ये हमलावर तो हमें 'सभ्यता' सिखाने आए थे! लेकिन उन विशाल ऐतिहासिक इमारतों की नींव के नीचे कितने बेगुनाहों का खून और कितनी सतियों के आंसू दबे हैं, इसे बड़ी सफाई से कालीन के नीचे सरका दिया गया।
इन 'सोफा-समीक्षकों' के हिसाब से, राजपूत महिलाओं को हमलावरों के साथ बस थोड़ा 'कॉम्प्रोमाइज' कर लेना चाहिए था। अपने आत्मसम्मान को कौड़ियों के भाव बेचकर जिंदगी बचा लेना शायद उनके लिए ज्यादा "स्मार्ट" कदम होता! कोई इन ज्ञानियों से पूछे—भाई साहब, किले के बाहर नंगी तलवारें लेकर खड़े वे विदेशी सेनापति कोई मानवाधिकार आयोग के डेलिगेट नहीं थे, न ही वे वहां कोई 'सांस्कृतिक विमर्श' करने आए थे। वे ऐसे क्रूर दरिंदे थे जिनके लिए हारे हुए देश की औरतों को दासी बनाकर बेचना और उन पर पाशविक अत्याचार करना ही असली जीत थी। ऐसे खौफनाक हालात में, जहां जिंदगी भर की गुलामी और संपूर्ण अपमान सौ प्रतिशत पक्का था, वहां अपनी मर्जी से आग को अपना रक्षक बना लेना कोई हार नहीं, बल्कि अपनी आत्मा की स्वतंत्रता की सबसे बड़ी, अल्टीमेट घोषणा थी।
और सुनिए, यह महान बलिदान सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं था। जब किले के अंदर से जौहर का धुआं आसमान चूमता, तो बाहर खड़े योद्धाओं को स्पष्ट सिग्नल मिल जाता कि 'अब खोने को कुछ नहीं बचा है'। तब वे सिर पर केसरिया पगड़ी और शरीर पर केसरिया वस्त्र पहनकर 'केसरिया व्रत' धारण करते थे। किले के दरवाजे पूरी तरह खोल दिए जाते थे। जीत की किसी भी फालतू उम्मीद को दरकिनार कर, केवल दुश्मनों को ज्यादा से ज्यादा संख्या में काटकर खुद की बलि चढ़ाने का यह युद्ध इतना खौफनाक होता था जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। 'जौहर' और 'केसरिया' के इस प्राणलेवा कॉम्बो पैक को इतिहास में 'साका' कहा गया। मतलब, साका में सिर्फ औरतें ही नहीं, पुरुष भी अपने प्राणों की आहुति देते थे।
1301 ईस्वी में रणथंभौर के पहले साका के दौरान, राजा हम्मीर देव ने शरणागत धर्म निभाते हुए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। वहां अग्नि जौहर के साथ रानी रंगादेवी के नेतृत्व में 'जल जौहर' का एक बेहद खास दृश्य देखने को मिला था—औरतों ने कमल के तालाब के बंद पानी में कूदकर जान दे दी, लेकिन दुश्मनों के आगे सिर नहीं झुकाया।
चित्तौड़गढ़ किला तो ऐसे तीन ब्लॉकबस्टर 'साका' का गवाह रहा। 1303 में अलाउद्दीन खिलजी के खिलाफ रानी पद्मिनी के नेतृत्व में पहला जौहर, 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के हमले के वक्त रानी कर्णावती के नेतृत्व में दूसरा, और 1568 में मुगल सम्राट अकबर के हमले के समय जयमल और पत्ता सिसोदिया की वीरता के साथ भारी संख्या में महिलाओं द्वारा किया गया तीसरा जौहर।
वैसे, यह सिर्फ राजस्थान का कॉपीराइट नहीं था। भारत और दुनिया के कई हिस्सों में मुस्लिम हमलावरों के अत्याचार से बचने के लिए औरतों ने सामूहिक आत्मदाह किया है।
712 ईस्वी में अरब सेनापति मुहम्मद बिन कासिम के हमले में जब राजा दाहिर की मौत हो गई, तो हार तय मानकर रानी और किले की बाकी औरतों ने खुद को आग के हवाले कर दिया ताकि वे बंदिनी न बनें।
1327 ईस्वी में मुहम्मद बिन तुगलक की सेना ने जब कांपिली (कर्नाटक) पर कब्जा किया, तो ऐतिहासिक किताबों के मुताबिक, किले के पतन से ठीक पहले महिलाओं ने सामूहिक आत्मदाह किया।
1528 ईस्वी में मुगल हमलावर बाबर ने चंदेरी पर हमला किया। हार पक्की होने पर राजपूत महिलाओं ने जौहर किया। खुद बाबर ने अपनी ऑटोबायोग्राफी 'बाबरनामा' में इस खौफनाक प्रतिरोध का जिक्र किया है। इन नीच लोगों को इसमें बड़ा मजा आता था; कितने हिंदू मारे, इसका हिसाब लिखने में इन्हें बड़ी किक मिलती थी।
ग्रीस भी पीछे नहीं था। 1803 ईस्वी में ओटोमन शासक अली पाशा की सेना के हमले के समय, सूलीओट (Souliote) समुदाय की औरतों और बच्चों ने सामूहिक जान दी। बचने का कोई रास्ता न देख, वे हाथ में हाथ डालकर, गीत गाते हुए पहाड़ी से कूद गईं। भारतीय संदर्भ में इसे बिल्कुल 'जौहर जैसा' ही माना जाएगा।
1822 ईस्वी में ग्रीक स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब ओटोमन सेना ने नौसा (Naousa) शहर को बर्बाद किया, तो कई औरतों ने दुश्मन के हाथ लगने से बेहतर अपने बच्चों के साथ अरापित्सा (Arapitsa) झरने में कूदना सही समझा।
इतिहास के इन पन्नों को समझने के लिए आपको आत्मसम्मान की उस गहराई में उतरना होगा जो आजकल मिलती नहीं है। आज के इतिहासकार बड़ी आसानी से मुगल सम्राट अकबर के नाम के आगे "महान" चिपका देते हैं। लेकिन 1568 में चित्तौड़ जीतने के बाद उसी 'महान' अकबर ने 30,000 निहत्थे आम नागरिकों का जो क्रूर नरसंहार करवाया, वह साबित करता है कि राजपूत महिलाओं का जौहर करने का फैसला कितना दूरदर्शी और बिल्कुल प्रैक्टिकल था।
और जब बात सिनेमा जगत की निकली है, तो इनके दोगलेपन की पोल खोलना तो बनता है। परदे पर ये डायरेक्टर हमलावरों को बड़े ही हैंडसम, चार्मिंग और पावरफुल हीरो की तरह दिखाते हैं। खिलजी जैसे पिशाच को एक डार्क, मिस्टीरियस योद्धा बना दिया जाता है, और अकबर को तो किसी 'सॉफ्ट बॉय' प्रेमी की तरह सजाकर हमारे दिमाग में ठूंस दिया जाता है। लेकिन जिन राजपूत योद्धाओं ने अपनी मिट्टी के लिए हंसते-हंसते जान दे दी, उन्हें ये बड़े मजे से कठोर, अंधविश्वासी और बैकवर्ड सोच वाला साबित कर देते हैं। आजकल के कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और फिल्मों में काम करने वाली अभिनेत्रियां जौहर को एक 'अंधविश्वासी कुप्रथा' और उन औरतों को 'डरपोक' बताकर अपने जबरदस्त आईक्यू का प्रदर्शन करती हैं।
शायद वे सोचती हैं कि 16वीं सदी के युद्ध के मैदान में हमलावर सेनापति लाल गुलाब लेकर गले लगाने खड़े थे! वे आलोचक भूल जाते हैं कि जौहर कोई रोजमर्रा का फैशन या रूटीन नहीं था; वह धर्म, सम्मान और आजादी का बिल्कुल अंतिम, नो-फिल्टर प्रतिरोध था। जब मेन्यू कार्ड पर सिर्फ दो ही ऑप्शन थे—गुलामी या मौत, तब राजपूत औरतों ने आग को चुना और हमलावरों के हाथ में एक बड़ा सा 'जीरो' थमा दिया। विदेशियों ने अपनी जीत के झंडे तो गाड़े, लेकिन उन्हें मिला क्या? सिर्फ मलबा।
आज बॉलीवुड के चिलचिलाते एसी वाले कमरों में, हजारों की कॉफी पीते हुए, कैमरे के सामने ग्लिसरीन वाले आंसू बहाने वाली स्वरा भास्कर जैसी कुछ तथाकथित 'प्रोग्रेसिव' महिलाएं जब उन अग्नि-स्नाता देवियों को 'डरपोक' कहती हैं, तो सच में इनकी बौद्धिक कंगाली पर जोर की हंसी छूटती है।
जिनका सोशल मीडिया पर किसी के 'ट्रोल' कर देने भर से डिप्रेशन चालू हो जाता है, वे निकली हैं इतिहास की सबसे खौफनाक अग्निपरीक्षा देने वाली औरतों की बहादुरी का वजन नापने! यह तो बिल्कुल वही बात हो गई कि जिसने कभी साइकिल नहीं चलाई, वह पायलट को लैंडिंग के टिप्स दे रहा हो। अपना स्वाभिमान बाजार में बेच चुकीं, धर्म छोड़कर दूसरों की मानसिक और शारीरिक गुलाम बन चुकीं ये हस्तियां अब हमें 'बलिदान' के सर्टिफिकेट बांट रही हैं।
आज की इन पैकेज्ड फेमिनिस्टों के लिए महिला सशक्तिकरण का मतलब सिर्फ वेस्टर्न कपड़े पहनना, पब्लिक में हंगामा करना या पारिवारिक रिश्तों को तोड़ना रह गया है। 'My Body, My Choice' का खोखला नारा लगाने वाली इन मुखौटा-धारी फेमिनिस्टों को यह समझ नहीं आता कि उस डार्क एज में, किसी जंगली दरिंदे को अपने शरीर और सम्मान पर हक न जताने देना ही सबसे बड़ी 'Choice' थी। जौहर सिर्फ जल जाना नहीं था; वह पितृसत्तात्मक और साम्राज्यवादी अहंकार के मुंह पर एक औरत का सबसे ऊंचा, स्वतंत्र और कभी न हारने वाला फैसला था। जिन्हें लगता है कि शरीर ही सब कुछ है, वे आत्मा की इस विशालता को भला कैसे डिकोड कर पाएंगी?
इन मॉडर्न समीक्षकों का ऐतिहासिक ज्ञान इतना पैदल है कि इन्हें लगता होगा खिलजी या बहादुर शाह के सैनिक 'जोधा अकबर' के ऋतिक रोशन की तरह सुंदर, सभ्य, न्यायप्रिय और जेंटलमैन थे! इन्हें कौन समझाए कि जो हमलावर हारे हुए सैनिकों के कटे सिरों का पहाड़ बनाने और औरतों को जंजीरों में बांधकर मध्य-एशिया के बाजारों में दो कौड़ी की दासी बनाकर बेचने को 'स्पोर्ट' मानते थे, उनके आगे सरेंडर करना कोई जीनियस आइडिया नहीं था। अगर बेरहमी से रेप का शिकार होकर, दुश्मन के हरम में पूरी जिंदगी एक पालतू जानवर की तरह गुजारने को ये सिनेमाई हीरोइनें 'बहादुरी' मानती हैं, तो धन्य हैं वे राजपूत औरतें जिन्होंने ऐसी 'बहादुर' बनने के बजाय 'डरपोक' बनकर खुद को जिंदा आग में झोंकना ज्यादा कूल समझा।
जरा सोचिए, रसोई में काम करते हुए उंगली में जरा सी आग लग जाए तो हमारी नानी याद आ जाती है। और जो औरतें हंसते-हंसते, अपने छोटे-छोटे बच्चों को सीने से चिपकाकर, अपने भगवान का नाम लेते हुए भयंकर आग के कुंड में कूद जाती थीं, उन्हें 'डरपोक' कहने के लिए इंसान को कितने उच्च स्तर का बेशर्म और बेवकूफ होना चाहिए? कैमरे के सामने अपने शरीर का प्रदर्शन करके उसे 'आजादी' और 'सशक्तिकरण' का नाम देने वाली ये हस्तियां कभी रानी पद्मिनी या रानी कर्णावती के उस त्याग की गहराई को नाप ही नहीं सकतीं। कांच की गुड़ियों की तरह सजी इन फिल्मी तारिकाओं की इतनी औकात ही नहीं कि वे उन आग में नहाने वाली औरतों के पैरों की धूल के बराबर भी हो सकें।
खैर, इतिहास सिर्फ तारीखों का एक्सेल शीट नहीं है, यह किसी कौम के चरित्र का आईना है। हमलावर आए, उन्होंने किले की दीवारें भी तोड़ीं, लेकिन जिस शरीर को जानवरों की तरह नोच खाने की हवस लेकर वे आए थे, वे उसकी परछाईं तक को नहीं छू सके। यही तो सनातन नारी की सबसे बड़ी, अल्टीमेट जीत थी। चित्तौड़ की वह मिट्टी आज भी पवित्र है, जहां उस राख के नीचे आज भी आग की चिंगारियां दबी हैं। आज के इस वैल्यू-लेस समाज में खड़े होकर खुद को प्रासंगिक साबित करने की जद्दोजहद में लगे कुछ अहंकारी पिशाच-पिशाचनियों के बकवास बयान, चित्तौड़ की उस पवित्र राख की इज्जत को कभी रत्ती भर भी कम नहीं कर सकते। आज की पीढ़ी अगर उस राख का एक छोटा सा टीका भी अपने माथे पर लगा ले, तो शायद उन्हें समझ आ जाए कि 'स्वाभिमान' का असली रेट क्या होता है! जौहर कोई एस्केप रूट या पलायन नहीं था; वह धर्मांध दुश्मन के मुंह पर जड़ी गई एक ऐसी धधकती लात थी, जिसकी तपिश आज भी इन नकली बुद्धिजीवियों के चेहरों को लगातार झुलसा रही है और भारतीय संस्कृति के आसमान में हमेशा एक ध्रुवतारे की तरह जलती रहेगी।
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