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शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

क्या पहले के लोग आजके लोगों से ज्यादा विद्वान हुआ करते थे ?

प्राचीन ग्रीक सभ्यता के समय, लगभग 2300 वर्ष पूर्व, अलेक्जेंड्रिया (वर्तमान मिस्र) में एराटोस्थेनीज़ नामक एक गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे। उन्होंने एक पुस्तक में पढ़ा कि सायनी (वर्तमान लीबिया में स्थित) नामक शहर में 21 जून को दोपहर 12 बजे, यदि एक लकड़ी का खंभा सीधा जमीन में गाड़ा जाए, तो उसकी छाया नहीं पड़ती। अर्थात्, उस दिन सूर्य सायनी में ठीक सिर के ऊपर (या जेनिथ पर) होता है।
इस तथ्य की सत्यता जानने के लिए एराटोस्थेनीज़ ने एक प्रयोग किया। 21 जून को दोपहर 12 बजे उन्होंने अलेक्जेंड्रिया में एक सीधा लकड़ी का खंभा जमीन में गाड़ा और देखा कि उसकी छाया पड़ रही थी। इसका कारण था कि अलेक्जेंड्रिया में उस दिन सूर्य ठीक सिर के ऊपर नहीं था। इस अवलोकन से उन्होंने समझा कि पृथ्वी समतल नहीं, बल्कि गोलाकार है, क्योंकि एक समतल सतह पर एक ही समय में एक स्थान पर छाया न पड़ना और दूसरे स्थान पर छाया पड़ना असंभव है।

इसके बाद, उन्होंने नाविकों की सहायता से अलेक्जेंड्रिया और सायनी के बीच की दूरी मापी, जो लगभग 5,000 स्टेडिया थी। एक स्टेडियम लगभग 157.5 मीटर होता है, अर्थात् कुल दूरी आधुनिक इकाई में लगभग 800 किलोमीटर थी। अलेक्जेंड्रिया में छाया का कोण 7.2 डिग्री था, जबकि सायनी में सूर्य सिर के ऊपर होने के कारण कोण 0 डिग्री था।

एराटोस्थेनीज़ ने गणना की: यदि 7.2 डिग्री एक इकाई है, तो 360 डिग्री के एक वृत्त में 50 इकाइयाँ (360 ÷ 7.2) होंगी। यदि एक इकाई की दूरी 5,000 स्टेडिया है, तो पृथ्वी की परिधि 5,000 × 50 = 2,50,000 स्टेडिया होगी, जो आधुनिक इकाई में लगभग 40,000 किलोमीटर है। यह आधुनिक माप के साथ अत्यंत समान है। यह गणना उनकी गणितीय और अवलोकन क्षमता को प्रमाणित करती है। इसलिए, पृथ्वी की परिधि को सबसे पहले मापने का श्रेय प्राचीन ग्रीक गणितज्ञ और खगोलशास्त्री एराटोस्थेनीज़ को दिया जाता है। आधुनिक माप में पृथ्वी की परिधि 40,075 किमी है, और एराटोस्थेनीज़ की गणना इसके अत्यंत निकट थी। यह उनके समय में एक असाधारण उपलब्धि थी।

लगभग 800 वर्ष बाद, भारतीय खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने अपने ग्रंथ आर्यभटीयम में पृथ्वी को एक गोलाकार वस्तु के रूप में वर्णित किया और इसके गति तथा अन्य ग्रहों के साथ संबंधों पर चर्चा की। उन्होंने पृथ्वी की परिधि की गणना की, जो लगभग 39,968 किलोमीटर थी। यह आधुनिक माप (40,075 किमी) के बहुत निकट थी। शोधकर्ताओं का मानना है कि आर्यभट्ट की गणना स्वतंत्र थी और ग्रीक गणना से प्रभावित नहीं थी।

निश्चित रूप से, एराटोस्थेनीज़ और आर्यभट्ट अपने समय के श्रेष्ठ शोधकर्ता थे, लेकिन मैं देखता हूँ कि आजकल कुछ अति विद्वान लोग उनके और उनके कार्यों का उदाहरण देकर यह मत रखते हैं कि वर्तमान पीढ़ी की तुलना में उस समय के लोग अधिक बुद्धिमान और विद्वान थे। लेकिन यह पूर्णतः सत्य नहीं है।

आज की युवा पीढ़ी की बुद्धिमत्ता और योग्यता की तुलना पूर्व पीढ़ियों से करने पर यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक काल के लोग कई क्षेत्रों में समान या अधिक दक्ष हैं।

फ्लिन प्रभाव (Flynn Effect) इसका समर्थन करता है। न्यूजीलैंड के मनोवैज्ञानिक जेम्स फ्लिन के शोध के अनुसार, 20वीं शताब्दी में औसत मानव IQ में प्रत्येक दशक में लगभग 3 अंक की वृद्धि हुई है। इसके कई कारण हैं। आधुनिक शिक्षा प्रणाली अधिक विस्तृत और सुलभ हो गई है, जिसने युवा पीढ़ी को जटिल समस्याओं के समाधान में दक्ष बनाया है। बेहतर स्वास्थ्य और पोषण ने मानव मस्तिष्क के विकास में सहायता की है। इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों ने युवा पीढ़ी को ज्ञान तक व्यापक पहुँच प्रदान की है, जिससे उनकी बौद्धिक क्षमता बढ़ी है। यह प्रभाव दर्शाता है कि आज की पीढ़ी का औसत IQ पूर्व पीढ़ियों से अधिक है। आज की युवा पीढ़ी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), कोडिंग, डेटा विश्लेषण, और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में अग्रणी है। उदाहरण के लिए, इसरो के चंद्रयान और नासा के मंगल मिशन में युवा वैज्ञानिकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पूर्व पीढ़ी प्राकृतिक अवलोकन और सरल गणित पर निर्भर थी, जबकि आज की युवा पीढ़ी जटिल एल्गोरिदम और सुपरकंप्यूटर का उपयोग कर अधिक सटीक और तेज गणना करती है।

इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म के कारण आज की युवा पीढ़ी के पास विज्ञान, इतिहास, और खगोलविज्ञान से संबंधित सूचनाओं का अपार भंडार है। सोशल मीडिया के माध्यम से युवा पीढ़ी विज्ञान और खगोलविज्ञान से संबंधित चर्चाओं में भाग ले रही है, जो पूर्व पीढ़ी के लिए असंभव था। पूर्व पीढ़ी कृषि, पंचांग, और प्राकृतिक चक्रों से संबंधित समस्याओं का समाधान करती थी। आज की पीढ़ी जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा, और वैश्वीकरण जैसी जटिल समस्याओं का समाधान कर रही है। आधुनिक मनुष्य नवीकरणीय ऊर्जा, बायोटेक्नोलॉजी, और अंतरिक्ष अन्वेषण में नए आविष्कार कर रहे हैं, जो पूर्व पीढ़ियों के समय में अकल्पनीय था। आज के लोग सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण, और वैश्विक समस्याओं के प्रति अधिक जागरूक हैं। वे वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग कर रहे हैं, जो पूर्व पीढ़ी के स्थानीय दृष्टिकोण से भिन्न है।

पूर्व पीढ़ी के मनीषियों ने अपने समय में असाधारण कार्य किए, लेकिन आज की पीढ़ी भी अपने समय की चुनौतियों के अनुसार समान या अधिक दक्षता प्रदर्शित कर रही है। फ्लिन प्रभाव और अन्य वैज्ञानिक शोध दर्शाते हैं कि आज की पीढ़ी का IQ और बौद्धिक क्षमता पूर्व पीढ़ियों से कम नहीं है। वे नई प्रौद्योगिकी, ज्ञान की सुलभता, और वैश्विक सहयोग के माध्यम से कई क्षेत्रों में प्रगति कर रहे हैं। प्राचीन काल में यदि एराटोस्थेनीज़ और आर्यभट्ट थे, तो आधुनिक युग में भी अल्बर्ट आइंस्टीन, वर्नर हाइजेनबर्ग, स्टीफन हॉकिंग, एडवर्ड विटेन, लिसा रैंडल, जेनिफर डाउडना, डेमिस हसाबिस, रोजर पेनरोज, और ग्रेगरी पर्लमैन जैसे अनगिनत विद्वान प्रत्येक क्षेत्र में हुए हैं ।

डेमोक्रिटस, एराटोस्थेनीज़, या आर्यभट्ट के समय में सभी लोग विद्वान नहीं थे, और न ही इस युग में सभी लोग विद्वान हैं। चार अंगुलियाँ कभी समान नहीं होतीं। इसलिए, आज की पीढ़ी को “कम बुद्धिमान” या “अक्षम” कहना अनुचित और आधारहीन है।

वर्तमान पीढ़ी को पूर्व पीढ़ियों से कम बुद्धिमान मानने का दावा मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से कुछ पक्षपातों (biases) और भ्रांत धारणाओं से उत्पन्न होता है। कुछ लोग नॉस्टैल्जिया बायस के कारण अतीत को आदर्श मानते हैं और वर्तमान को कमतर चित्रित करते हैं। ऐसे लोग अतीत की सफलताओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं और वर्तमान की जटिलताओं और प्रगति को अनदेखा करते हैं। इसके साथ ही, “पतनवाद” (declinism) नामक एक मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति भी कुछ लोगों के मन को प्रभावित करती है। पतनवाद से प्रभावित लोग मानते हैं कि समय के साथ समाज या बुद्धिमत्ता में ह्रास हो रहा है। यह दृष्टिकोण अक्सर अपर्याप्त तथ्यों या भ्रांत धारणाओं पर आधारित होता है।

इसके अतिरिक्त, अतिसाधारणीकरण (overgeneralization) और “रूढ़िबद्धता” (stereotyping) जैसे संज्ञानात्मक पक्षपात (cognitive biases) भी इस दावे में परिलक्षित होते हैं। एक संपूर्ण पीढ़ी को बिना प्रमाण के नकारात्मक रूप से चित्रित करना एक सरलीकृत और गलत निष्कर्ष है। 

इसके अलावा, इसे “प्रसंगबद्धता” (framing) के रूप में भी देखा जा सकता है, जहाँ सूचना को एक विशिष्ट दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर पाठकों के मन में नकारात्मक भावना जगाई जाती है। यह अक्सर भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करने या प्रेरणा देने के लिए किया जा सकता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, IQ एक जटिल मापक है जो पर्यावरण, शिक्षा, और सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। फ्लिन प्रभाव दर्शाता है कि आधुनिक युग में औसत IQ में वृद्धि हुई है, जो बेहतर शिक्षा, पोषण, और प्रौद्योगिकी की सुलभता के कारण संभव हुआ है। इसलिए, वर्तमान पीढ़ी को कम बुद्धिमान मानना मिथ्यासूचना पक्षपात (misinformation bias) का एक उदाहरण है, जो तथ्यात्मक रूप से गलत और मनोवैज्ञानिक पक्षपातों से उत्पन्न है।

संक्षेप में, वर्तमान पीढ़ी की बौद्धिक क्षमता को कम आंकना एक अनुचित और भ्रांत धारणा है, जो मनोविज्ञान में नॉस्टैल्जिया, पतनवाद, और रूढ़िबद्धता जैसे पक्षपातों से प्रभावित है। आज की युवा पीढ़ी अपने समय की चुनौतियों का सामना अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और वैश्विक ज्ञान की सहायता से कर रही है। यह पीढ़ी अतीत की सफलताओं का सम्मान करते हुए अपनी स्वतंत्र योगदान को प्रमाणित कर रही है।

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2025

Closed-Mindedness क्या है ? ये कितनी प्रकार कि होती है ?

एक विद्वान ने राजदरबार में तीन खोपड़ी लाकर उनके माध्यम से तार की परीक्षा की। पहले खोपड़ी में तार एक कान से प्रवेश करके दूसरे कान से निकल गया। दूसरे खोपड़ी में तार एक कान से प्रवेश करके मुंह की ओर निकल गया। तीसरे खोपड़ी में तार एक ओर के कान से प्रवेश किया, लेकिन किसी भी रास्ते से बाहर नहीं निकला। विद्वान ने इसका अर्थ समझाने के लिए पंडित मंडली से अनुरोध किया। सभी पंडित असफल होने पर कालिदास ने कहा, "पहला खोपड़ी अधम, दूसरा मध्यम, और तीसरा उत्तम व्यक्ति का है।" राजा ने इसका कारण पूछा। कालिदास ने समझाया: अधम खोपड़ी जिस व्यक्ति का था, वह अपने कान से ज्ञान सुनता था, लेकिन उसे ग्रहण न करके भूल जाता था। मध्यम खोपड़ी जिस व्यक्ति का था, वह ज्ञान सुनता और ग्रहण करता था, लेकिन उसे आत्मसात न करके केवल दूसरों को बता देता और भूल जाता था। उत्तम खोपड़ी जिस व्यक्ति का था, वह ज्ञान ग्रहण करके आत्मसात करता था और जीवन में उसका उपयोग भी करता था।
परंतु मैं कहता हूँ कि कालिदास के युग में उस विद्वान को चौथा प्रकार का खोपड़ी मिला ही नहीं था। इस प्रकार का खोपड़ी उन दिनों बहुत दुर्लभ था और इस तरह के खोपड़ी के कान का छेद ही नहीं होता है। यदि छेद होता, तो खोपड़ी में तार डाला जा सकता था! यह खोपड़ी जिसका है, वह अधम से भी हीन है, क्योंकि वह ज्ञान प्राप्त करने या नई बातें जानने से घृणा करता है। ऐसे व्यक्ति ज्ञान या विज्ञान की बात सुनने को बिल्कुल तैयार नहीं होते, पूरी तरह अज्ञानी और मूर्ख रहते है। आज के समय में ऐसे खोपड़ीवले लोगों कि भरमार है समाज में पर कालिदास के समय यह दुर्लभ हुआ करते थे । 

चौथे प्रकार के खोपड़ीवाले व्यक्ति की मानसिक अवस्था "Closed-Mindedness" जैसी होती है। यह मानसिक अवस्था नए दृष्टिकोण या ज्ञान को ग्रहण करने की अनिच्छा पैदा करती है, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति ज्ञान-विज्ञान की बात सुनने को बिल्कुल तैयार नहीं होता और अज्ञानी रह जाता है। यह अधम प्रकार से भी हीन है क्योंकि इस अवस्था में व्यक्ति नए ज्ञान के सभी प्रवेश पथ (लाक्षणिक अर्थ में: कान) ही बंद कर देता है।

Closed-Mindedness मन की ऐसी अवस्था है जिसमें प्रभावित व्यक्ति नई बातें, विचार, मत या ज्ञान को सुनने या ग्रहण करने को बिल्कुल तैयार नहीं होता। वह अपनी पुरानी मान्यताओं, आदतों या विचारधारा में इतना अटल रहता है कि किसी भी नए परिवर्तन का विरोध करता है। सरल भाषा में कहें तो यह बंद मन की मानसिक अवस्था है, जिसमें नई बातें प्रवेश करने का कोई रास्ता ही नहीं होता। फलस्वरूप, ऐसे लोग अज्ञानी रह जाते हैं और जीवन में उनकी बौद्धिक प्रगति अपेक्षानुरूप नहीं हो पाती। यह बुद्धिजीविता विरोध का एक प्रमुख रूप है, जिसमें ज्ञान प्राप्त करने की संभावना ही बंद हो जाती है।

मान लीजिए, एक बुजुर्ग व्यक्ति स्मार्टफोन का उपयोग करने को बिल्कुल सहमत नहीं होता। वह कहता है, "पुराना फोन ही अच्छा है, नई चीजें सीखने की क्या जरूरत?" उसके परिवार वाले उसे मोबाइल रखने के फायदे कई बार समझाते हैं, लेकिन वह सुनने की कोशिश ही नहीं करता, बल्कि कभी-कभी क्रोधित हो जाता है। यह Closed-Mindedness का एक सरल उदाहरण है – नए ज्ञान का द्वार बंद रहने से वह पीछे रह जाता है। Closed-Mindedness के विभिन्न प्रकार हैं।

Religious Closed-Mindedness से प्रभावित व्यक्ति अपनी धार्मिक मान्यताओं में इतना अटल रहता है कि अन्य धर्मों या दृष्टिकोण को सुनने या समझने को तैयार नहीं होता। वह अपने धर्म को एकमात्र सत्य मानता है। पठान और ख्रिश्चन लोग अक्सर इस मानसिक अवस्था से प्रभावित होते हैं।

एक व्यक्ति अपनी राजनीतिक पार्टी की मान्यताओं में इतना अटल है कि विपक्षी पक्ष की कोई भी अच्छी बात सुनने को तैयार नहीं होता। उदाहरण के लिए, वह कहता है, "मैं उनकी बात कभी नहीं सुनूंगा, वे सब गलत हैं।" इसके फलस्वरूप, वह नए दृष्टिकोण को ग्रहण नहीं कर पाता और सत्य के पथ पर नहीं चल पाता। भारत में वर्तमान में विपक्षी दलों के नेता और सदस्य अक्सर इस मानसिक अवस्था से प्रभावित हैं। इसे Political Closed-Mindedness कहा जाता है।

Scientific Closed-Mindedness से भी कई लोग प्रभावित हैं। इस मानसिक अवस्था में प्रभावित व्यक्ति वैज्ञानिक प्रमाण या नए आविष्कार को अस्वीकार करता है क्योंकि यह उसकी पूर्व मान्यताओं या आदतों के विरुद्ध होता है। ये लोग वैज्ञानिक तथ्यों पर अविश्वास करते हैं। जब टेलीफोन का आविष्कार हुआ, तो उस समय के पठानों ने इसे शैतान की आवाज कहकर विरोध किया था। आज भारत जैसे सहिष्णु हिंदुओं के देश में दिन में पांच बार नमाज की अजान लाउडस्पीकर से बजती है। जीवाश्म विज्ञान हो या विकासवाद विज्ञान, लाखों लोग ऐसे हैं जो आधुनिक युग में इतने वैज्ञानिक शोधों के बाद भी इन्हें स्वीकार नहीं करते। Flat Earther हों या सात दिन में ब्रह्मांड की सृष्टि की बात करने वाले धार्मिक अंधविश्वासी, विज्ञान को न मानने वाले Scientific Closed-Mindedness के शिकार लाखों लोग मिल जाएंगे।

एक अन्य मानसिक अवस्था Social Closed-Mindedness है। इसमें प्रभावित व्यक्ति लोग की उम्र, जाति, लिंग, संस्कृति या सामाजिक स्थिति के आधार पर उनकी योग्यता और क्षमता का आकलन करते हैं और उन्हें छोटा मानकर उनके मत को ग्रहण नहीं करते। ये लोग अपनी संस्कृति या समूह को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति गांव से आए लोगों को "अज्ञानी" मानता है और उनकी अनुभव या मत को सुनने में रुचि नहीं लेता। कोई महिला चाहे कितनी कुशल ड्राइवर हो, इस प्रकार के लोग हमेशा संदेह करते हैं कि वह गाड़ी चलाते समय दुर्घटना कर देगी। कम उम्र के व्यक्ति चाहे कितना सच कहें, Social Closed-Mindedness से प्रभावित वयस्क उसकी बात नहीं सुनते।

Personal Closed-Mindedness वाले व्यक्ति भी हैं, जो अपनी व्यक्तिगत आदतों, जीवनशैली या विचारधारा में अटल रहते हैं और नए परिवर्तन को आसानी से स्वीकार नहीं करते। ये अपनी अज्ञानता को अस्वीकार करते हैं। उदाहरण के लिए, इस मानसिक अवस्था वाला व्यक्ति स्मार्टफोन या इंटरनेट को "अनावश्यक" मानता है और पुराने फोन का उपयोग जारी रखता है। नई तकनीक उसका जीवन सरल कर सकती है, लेकिन वह इसमें रुचि नहीं लेता।

Cultural Closed-Mindedness वाले लोग भी हैं, जो अपनी संस्कृति या परंपरा को ही पृथ्वी पर एकमात्र उपयुक्त और सही मानते हैं और अन्य संस्कृतियों के रीति-रिवाजों को समझने की कोशिश नहीं करते, बल्कि आवश्यक होने पर उनका विरोध भी करते हैं। उदाहरण के लिए, अब्राहमिक समुदाय, विशेष रूप से पठान और ख्रिश्चन, अपनी धर्म और संस्कृति को ही सर्वश्रेष्ठ बताकर दूसरों की धर्म और संस्कृति को कमतर या हीन दिखाने की हमेशा कोशिश करते हैं।

Educational Closed-Mindedness से प्रभावित लोग भी देखे जाते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति नई शिक्षण पद्धति, ज्ञान या शिक्षा के स्रोत को ग्रहण नहीं करते। ये अपने पुराने ज्ञान को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। उदाहरण के लिए, आज भी कुछ शिक्षक हैं जो नई डिजिटल शिक्षण पद्धति को "अनुपयोगी" मानते हैं और पुरानी ब्लैकबोर्ड पद्धति से ही पढ़ाना जारी रखते हैं। नई शिक्षण पद्धति छात्रों के लिए अधिक सहायक हो सकती है, लेकिन Educational Closed-Mindedness का शिकार शिक्षक ऐसा होने नहीं देते।

इस प्रकार विभिन्न प्रकार के Closed-Mindedness के शिकार लोग हैं। Closed-Mindedness जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अज्ञानता और विभाजन को बढ़ाता है। यह मानवजाति की प्रगति के मार्ग में कांटे की तरह कार्य करता है। प्राचीन काल से अब तक नया कुछ जानने, नया कुछ करने की निरंतर कोशिश के कारण मानवजाति आज Type I civilization नहीं हुई, तो भी Type 0.7 civilization निश्चित रूप से बन चुकी है। सोचिए, यदि मानवजाति में नई बातें, विचार, मत या ज्ञान को सुनने या ग्रहण करने की इच्छा न रखने वाले Closed-Mindedness वाले लोगों की संख्या बढ़ जाए, तो क्या होगा? मानव समाज फिर से जंगली हो जाएगा और बाघ, भालू, वानरों की तरह असभ्य होकर रह जाएगा। अतः Closed-Mindedness से प्रभावित लोग मानवजाति के लिए आटे में कीड़े के समान हैं। मानव समाज से Closed-Mindedness का विनाश ही मानवजाति का मंगल है!