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सोमवार, 20 जुलाई 2015

तुलसी एक विचार

#ओड़िआ कवि गोलक दास जी ने एक स्तूति काव्य मेँ #तुलसी वृक्ष के बारे मेँ एक पंक्ति लिखा है

Maa Goo Tulasi devi ,
Mule Tora #Ganga
Daale Tora #Bishnu
patre Devatanka Baasa
Se Patra Padile Manohi huaie Kahaie Golaka dasha !

कवि ने यहाँ पवित्र तुलसी वृक्ष की औषधीय गुणोँ को कुछ इस प्रकार कहा है !
"हे देवी तुलसी तुम्हारे जड़ोँ मेँ #गंगा अर्थात् अति पवित्र औषधीय तत्व है जो हर रोग को नाश करने मे सक्षम है ।
शाखाओँ मेँ #विष्णु ,पत्र मेँ देवता वास करते है । तेरे सभी अवयवोँ को साथ मिलाकर भी महोषधी बनाया जा सकता हे ।"

तुलसी जैसी पवित्र वृक्ष की रोपण पूजन तथा नित्य जलदान करके पत्र सेवन करना चाहिये इससे एक तो आपका मन शुद्ध होगा वहीँ स्वास्थ मेँ भी सुधार होगी ।
हाईस्कुल मेँ पढ़ते समय मेँ रोज दोपहर को स्कूल मेँ टिफिन करने के बाद 4 या 5 तुलसी पत्र खाया करता था...
मुझे उन तिन वर्षोँ मेँ कोई बड़ी विमारी जैसे सर्दी बुखार नहीँ हुआ था .....
#हिन्दु संस्कृति मेँ तुलसी पूजन एक अनुठा संस्कार है । गाँव देहात मेँ आज भी चवुतरा मेँ दिखजाती तुलसी का पौधा ! सहरोँ कि बात कर शायद ही इक्के दुक्के घरोँ मे गमला मेँ दिखजाय तो ठिक वरना




बजरंगी भाईजान....तुम महान हो

बजरंगी भाईजान तुम महान हो
तुम्हारी महानता किसी #बाहुबली से कम नहीँ ।
तुमने #Pakistan मेँ बिना पासपोर्ट वीजा मेँ घुसकर दिखादिया कि तुममेँ कितना दम है ।
6 साल कि एक लड़की के लिये मसजीद मेँ चलेगये.....शुद्ध शाकाहारी होकर भी चिकेन खाने, खिलाने लगे
और #पाकिस्तान जाते ही तुम्हारा तो धर्म ही भ्रष्ट हो गया दुआ सलाम करने लगे !!!

लानत है तुम्हे ! पाकीओँ के संगत ने तुम्हे भी सेकुलार बनादिया ......

फिल्म की आखरी सीन मेँ कबीर खान ने एक मूक लड़की को एकाएक बोलते हुए दिखाया
और तो और पाकिस्तान मेँ फसे #बजरंगी को भारत भेजने के लिये पाकिस्तानीओँ को लढ़ते दिखाया !

क्या हो गया है तुम्हे कबीर ?
क्या तुम #LOC को जर्मनी का दिवार समझते हो ?

तुमने ये कैसे सोचलिया कि वर्षोँ से खीँच दि गई नफरत कि ये दिवार युँ हटजायेगा ?

#BajrangiBhaijaan पाकिस्थान जायेगा और भारी लोकप्रियता के साथ पाकिस्तानीओँ के मदद से भारत लौट आयेगा ?

क्या तुम जानते नहीँ की एक बार ये दिवार हटादिया जाय तो दोनोँ तरफ कितने लोग मरेगेँ , मारदिएजायेगेँ ?

क्या तुम्हे ये भी इल्म नहीँ की भारत व पाक मेँ लोग एक रोज खाना न खाये चलजायेगा परंतु आपसी नफरत के बिना एक पल भी गवारा नहीँ !....
आप सब कट्टरवादी मित्रोँ से अनुरोध है ये फिल्म न देखेँ ये आपको सौहार्द्य व भाईचारा का विष पिलाकर कमजोर बनादेगा ।
दोनोँ मुल्कोँ मेँ आपसी नफरत कायम रहे ,हैवानियत के मामले मे हम दुनियामेँ टप पर रहेँ ....बस यही दुआ करता हुँ प्राथना करता हुँ....

रविवार, 5 जुलाई 2015

गुड़्ड़ु रंगिला .....सामाजिक मुद्दोँ पर बनी कॉमेड़ी फिल्म

भैया लागत है फिल्म इंडस्ट्रीवालन लोग खाप पँचायतोँ के पिछे हात धो के पड़गयो हे.....

कल गुड़्डु रंगिला देखने गये थे....

फिल्म कि कहानी जहाँ एक तरफ पंजाब कि खापपँचायतोँ के उलजलुल हरकतोँ पर उँगली उठाता है , वहीँ एक सीन मेँ तो पुलिसवाली किरदार के मुँह से पुलिस को ही बुराभला कहलवाया गया है ।

फिल्म कि कहानी दो दोस्तोँ से शुरुहोती है जो पंजाब के गाँवो मेँ होनेवाले फंगसन्स मे परफमेँस करते और साथ ही साथ उन परिवारोँ के बारे मेँ इंफरमेसन लुटेरोँ के दे देते ।
ऐसे ही एक केस मेँ कानुनी सिकंजे मे फसने पर #बंगाली नामक व्यक्ति के कहने से एक लड़की का अपहरण कर लेते है । बाद मेँ पताचलता हे कि कन्या ने खुदे अपना अपहरण करवाया था !!!

यहाँतक फिल्म ठिकठाक है
मने इसके बाद फिल्म कि स्टोरीलाईन बारबार घिसापिटे स्क्रिप्ट के पटरी आ जाती.....

बेवी [अदिती] के जिजा...बिल्लु राजनेता व कट्टर सोच रखनेवाले व्यक्ति हे बेबी ने अपने बहन कि मौत का बदला लेने के लिये ये सब खेल रचाया है ।
यहाँ से कहानी मे कई उतारचढ़ाव देखने को मिलते इसे यहाँ लिखने से अछा आपको फिल्म देखने पर मजा आयेगा....
फिल्म मे कई वन लाईनर आपको हसाएगेँ

एक सिन मेँ

"बिल्लु खुदको शेर का बच्चा कहता है
तो रंगिला कहता है
बता तेरी माँ जंगल गयी थी
या शेर घर आया था" :-D :-D :-D

यहाँ फिल्म निर्देशक सुभाष कपुर कि चतुराई का तारिफ करना होगा ! उन्होने फिल्म मेँ वही बात उसी अंदाज मेँ अलग तरिके से कही है !

अपने दुसरे फिल्मोँ से अलग 'गुड्डू रंगीला' में अदिति का काम आपको अलग लगेगा । फिल्म की कथन व किरदार अच्छे हैं । अरशद के क़िरदार में नयापन नहीं, लेकिन उन्होने अभिनय पूरी ईमानदारी से किया । वे पंजाबी मेँ डायलग बोलते हुए अछे लगे ।
अमित साद और बाकी किरदार भी ठीकठाक हैं, पर बाज़ी मारी रोनित रॉय ने जिनका क़िरदार बेहद संजीदा हे । रोनित ने घमंडी रुढिवादी व्यक्ति के किरदार को वखुबी निभाया ।

ये बात भी काफि हदतक ठिक ही हे कि कहानी में नयापन नहीं है । फिल्म को एक कॉमेडी फिल्म की तरह प्रमोट किया गया, जबकी ये सामाजिक मुद्दोँ को और संजिद्दगी के साथ पर्दे पर उठा सकता था ।

डायरेक्टर सुभाष कपूर ने 'बॉम्बे टाइम्स' से बातचीत करते हुए बताया था कि उनकी फिल्म गुड़्डु रंगिला
2009 के 'मनोज-बबली ऑनर किलिंग केस' से प्रेरित है । सुभाष कहते हैं, 'बबली और मनोज की शादी 2007 में हुयी थी और 2009 में उनकी ऑनर किलिंग कर दी गई थी । खाप पंचायत के अनुसार उन दोनों का एक दूसरे के साथ शादी करना गलत था क्योंकि दोनों एक ही बिरादरी के थे । मनोज और बबली ने आर्य समाज मंदिर में शादी की थी । इस फिल्म के माध्यम से सुभाष ने 'ऑनर किलिंग' जैसे एक अहम मुद्दे की तरफ सबका ध्यान उठाया है ।
मिस टनकपुर हाजिर हो के बाद खापपंचायतोँ के खिलाफ बलिवुड़ का ये एक और एटक था ।
जाहिर हे च्युँकि ये फिल्म विवादित विषय पर था कुछलोग फिल्म के ट्रेलर रिलिज पर हिन्दुधर्म के नाम पर चिल्लाये थे....
तब 'माता का ई मेल'वाली गाना व बाबाओँ को फुटवॉले खेलते दिखाने पर फिल्म विवाद मेँ आ गया था !
जबकि फिल्म ने उत्तरभारत कि एक अहम समस्या को सामाज के आगे दर्शकोँको हसाते हसाते
चिँतन मनने हेतु पैश किया है इसपर किसीका ध्यान नहीँ ।
डायरेक्टर सुभाष कपूर ने इससे पहले नेशनल अवार्ड विनिंग फिल्म जॉली एलएलबी व फंस गए रे ओबामा जैसी फिल्में भी बनाई हैं और हरबार कि तरह इस बार भी उनका फिल्म समाज को दर्शकोँ को कुछ कहता हे ।

फिल्म कि एक और गीत "सुईँया सुईयाँ सी " इन दिनोँ एफ एम रेड़िओ पर खुब बजता है ।

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

उत्कल गौरव मधुसुदन दास संक्षिप्त परिचय

अंग्रेजी वर्ष 1933 फरवारी 12....,
सभागृह श्रोताओँ से भरापड़ा था ....
उन्होनो बोलना शुरुकिया

"मेँ जब आंदोलन करने के लिये उठखड़ा हुआ मैने इस रणभूमि मेँ खुदको अकेला पाया । मैने देखा चारोँतरफ लाशेँ हीँ लाशे थी । हड्डीओँ के ढ़ेर व उन मृत लाशोँ मेँ जान फुँकने के लिये मुझे काफी महनत करना पड़ा । जो भी हो मेरे जाति को लढ़ने के लिये युद्धास्त्र से सजाने हेतु मैने प्रयाश किया व करता रहुगाँ ।"
🌻~~~मधुसुदन दास~~~🌻
उत्कल गौरव उपनाम से विख्यात मधुसुदन दास ओड़िशा के प्रशिद्ध लोगोँ मे से एक है ।
कटक सहर मे जन्मे इस नेता का यह आखरी भाषण था

मधुबाबू का जन्म ओड़िशा के कटक जिला के सत्यभामापुर गांव में 28 अप्रैल 1848 को हुआ था। उनके पिता रघुनाथ दास चौधरी और माता पार्वती देवी थी । ओड़िआ लोग उन्हे प्यार से मधुवावु , उत्कल गौरव,मधुबारिष्टर भी कहते है ।
ओड़िशा मेँ वे इतने लोकप्रिय हुए कि उनके नाम पर लोगगीत व मुहावरे बनने लगे
जैसे
Kalia ghoda re chadhibi
madhubabu sange ladhibi"[[काला घोडा मे चढ़ुगाँ मधुबाबु संग लढ़ुगाँ]]

उन्होने ओड़िआ भाषा व संस्कृति को बचाने के लिये 1903 मे जब उत्कल सम्मिलनी स्थापना कि थी तब ओड़िशा ,बंगाल का एक डिवीजन मात्र था ।
तब ओड़िशा यानी अविभक्त कटक ,पुरी ,बालेश्वर जिल्ला क्षेत्र को समझा जाता था ।
1903 मे कांग्रेस छोड़ कर वे ओड़िआ आंदोलन में और सक्रिय हुए । मधुबाबु स्वाभिमान एवं आत्ममर्यादा को विशेष प्राधान्य देते थे । धीरे धीरे उनके जैसे ओर लोग इस संगठन से जुड़नेलगे । मधुबाबु ने अपने कविता ,लेख के बलपर लोगोँ को जगाने कि कोशिश कि
उनके द्वारा लिखागया UTHA UTHA AARE UTKAL SANTAAN UTHIBU TU AAO KETE DINE
आज भी प्रसिद्ध ओड़िआ कविताओँ मे से एक है ! !
उनकी महनत रंगलाया 1936 अप्रेल 1 को ओड़िशा भाषा आधार पर पहला राज्य बना ।


उनकी पढ़ाई गाँव कि पारंपरिक स्कुल से हुई थी । फिर वे कटक गये व अंग्रेजी विद्यालय मेँ नाम लिखाया । 1864 मे मधुसुदन जी ने अन्य चार सहपाठीओँ के साथ एण्ट्रान्स [द्वितीय श्रेणी]] मे पास हुए । इसे आजकल हाईस्कुल सार्टिफिकेट एगजाम् कहाजाता है । इसके बाद उन्हे पढ़ाई के लिये धन जुटाने हेतु बालेश्वर जिल्ला मेँ किरानी [कायस्त] नौकरी करना पड़ा था । कुछ पैसे बचाकर उच्चशिक्षा हेतु वे चांदवाली वंदरगाह देते हुए स्ट्रिम इंजन जलजाहज मेँ कलकत्ता सहर पहँचे ।
1870 मे वे B.A. परिक्षा मेँ पास हुए । कलकत्ता कि पढ़ाई खत्म करके वे लंदन लॉ पढ़ने गये । ग्राजुएट होनेपर वे भारत लौटे व कटक मेँ बतौर वकिल कैरियर कि शुरुवात कि !

उनके नाम कई कीर्तिमान है जैसे
वे
*प्रथम ओड़िआ B.A पास
*प्रथम ओड़िआ M.A पास
*प्रथम ओड़िआ वकिल
*प्रथम ओड़िआ उद्योगपति
*युरोप मे जानेवाले प्रथम ओड़िआ व्यक्ति
*प्रादेश भाइसराल सभा का
*प्रथम ओड़िआ सदस्य
*प्रथम ओड़िआ मन्त्री
*मन्त्रीत्व त्यागनेवाले प्रथम भारतीय नेता
*उत्कल सम्मिलनी का आद्य उद्घोषक
*ओड़िशा मेँ प्रथम वालिका विद्यालय का प्रतिष्ठाता
थे
*प्रथम ओड़िआ जुता कारखाना बनानेवाले

उनके जन्मतिथि 28 अप्रेल को ओड़िशा मेँ वकिल दिवस व स्वाभिमान दिवस के रुप मेँ मनाया जाता है ।



बुधवार, 1 जुलाई 2015

1 जुलाई डॉक्टर डे विशेष

भारत मेँ आज 1 जुलाई डॉक्टरोँ का खास दिन राष्ट्रिय चिकित्सक दिवस यानी की ‪#‎ National_Doocto rs_Day‬हे । India that is भारत देश मेँ इसकी शुरुवात
भारत सरकार द्वारा 1991 मे किया गया था ।
1 जुलाई 1882 को पटना, बिहार मेँ प्रसिद्ध भारतीय चिकत्सक Dr B.C ROY [Bidhan Chandra Roy] का जन्म हुआ था और एक जुलाई को ही 80 वर्ष के उर्म मेँ 1962 को इंतकाल हो गया था !
चिकत्सा क्षेत्र मेँ उनके वहुमूल्य योगदान के लिये भारत सरकार ने उनके जन्म व मृत्युदिवस को National Docters Day का दर्जा दिलाया ।
विधान चंद्र रॉय ने कोलकत्ता मेँ अपनी मेडिकाल ग्रेजुएसन पुरा किया था और लंदन से वे 1911 को MRCP और FRCS डिग्री लेकर के भारत मेँ मेडिकल प्रक्टिस के लिये लौटे !
उसी वर्ष वे कोलकत्ता मेडिकल कॉलेज से मेडिकल शिक्षक के तौर पर जुडे और बादमेँ Campbell Medical School व Carmichael Medical College मेँ भी कुछदिनोँ के लिये कार्यरत थे ।
इस बिच महात्मा गांधी के नेतृत्वमे हो रहे अहिँसक आंदोलन मेँ भी उन्होने भागलिया ।
स्वतंत्रता के पश्चात वे कंग्रेस लिडर बने और पश्चिम बंगाल के द्वितीय मुख्यमंत्री भी !
भारत सरकार ने उनको 4 फरवरी 1961 मे भारतरन्त पुरस्कार से सन्मानित किया था
और
1976 से हरवर्ष उत्कृष्ट डक्टरोँ को चिकित्सा के क्षेत्र मेँ उनके अछे काम के लिये Dr. B. C. Roy National Award दिया जा रहा है ।
वहीँ विश्व मेँ सबसे पहले डॉक्टर डे Doctors’ Day 30 March, 1933, विन्डर [Winder] जर्जिआ मे मनाया गया था ।
इसे मनाने कि Idea Dr. Charles B Almond कि पत्नी Eudora Brown Almond को सबसे पहले आयी थी ।
उन्होने सुझाव दिया कि प्रथम सफल साधारण anesthesiain surgery च्युँकि March 30, 1842, को Jefferson , Ga. Dr. Crawford Longused etherto ने किया था इसी दिन को डॉक्टर डे के रुप मेँ मनाया जाय । उसी वर्ष जर्जिआ मेँ कुछ डॉक्टरोँ ने मिलकर डॉक्टर डे मनाया ।
October 30, 1990 को US पार्लामेँट ने कानुन पारित कर 30 मार्च को United nation का National Doctor's Day के रुप मेँ दर्जा दिया था ।
ड़ॉक्टर डे मेँ डॉक्टरोँ को समाज के सेवाहेतु नूतन उर्जा मिलता है ।
भारतीय डॉक्टरोँ से अनुरोध हे कि वे अपनी सेवा सिर्फ गाँव तक सीमित न रखते हुए गाँव के दूर्गम क्षेत्रोँ मेँ भी चिकित्सा सेवा मुहैया कराएँ तभी ‪#‎ DOCTERSDAY‬मनाये जाने के पिछे का उद्देश्य सफल होगा ।

शनिवार, 13 जून 2015

सत्सगं का लाभ

दशार्ण देश मेँ एक राजा हुए थे वज्रबाहु । वज्रबाहु की पत्नी सुमति अपने नवजात शिशु के साथ किसी असाध्य रोगसे ग्रस्त हो गयी । यह देख दुष्टबुद्धि राजाने उसे वनमेँ त्याग दिया । अनेक प्रकारके कष्ट भोगती हुई वह आगे बढ़ी । बहुत दूर जानेपर उसे एक नगर मिला । उस नगरका रक्षक पद्माकर नामका एक महाजन था । उसकी दासी ने रानी पर दया की और उसे अपने स्वामी के यहाँ आश्रय दिलाया । पद्माकर रानीको माता के समान आदर के दृष्टि से देखता था ,उसने दोनोँ मा बेटे को स्वस्थ करने हेतु बड़े वैद्योँ को नियुक्त किया परंतु पुत्र बच न सका मर ही गया ।
पुत्र के मृत्यु पश्चात् रानी चिँतित व्यथित रहने लगी ।
एक दिन उस और प्रशिद्ध शिवयोगी ऋषभ जी का आना हुआ । रानी को विलाप करती देख उन्होने उसे समझाया हे पुत्री !
तुम इतना क्योँ रो रही हो ? फेन के समान इस शरीरकी मृत्यु होने पर विदुषी कन्याएँ शोक नहीँ करती !
जीव अव्यक्त से उत्पन होता है और अव्यक्तमेँ लीन हो जाता है केवल मध्य मे बुलबुले की भाँति व्यक्त सा प्रतीत होता है ।

शिवयोगीके तत्वभरे उपदेशोँ को सुनकर रानी ने कहा भगवन् ! जिसका एकमात्र पुत्र मरगया हो जिसे प्रिय बन्धीओँने त्याग दिया हो और जो महान रोग से अत्यन्त पीड़ित हो ऐसी मुझ अभागिन के लिये मृत्यु के अतिरिक्त और कौन गति है ? इसलिये मेँ इस शिशु के साथ ही प्राण त्याग देना चाहती हुँ ! मृत्यु के समय जो आपका दर्शन हो गया .मेँ इतने से ही कृतार्थ हो गयी !

रानी की बात सुनकर दयानिधान शिवयोगी शिवमन्त्रसे अभिमन्त्रित भस्म लेकर बालकके पास गये और उसे उन्होनेँ उसके मुँहमेँ ड़ाल दिया । विभूति के पड़ते ही वह मराहुआ बालक जीवत हो उठा ।
भस्म के प्रभाव से माँ पुत्रोँ का देह भी दिव्य हो गये उनके सारे रोग मिटगये ।

ऋषभने रानी से कहा बेटी जबतक तुम इस संसार मेँ जीवित रहोगी वृद्धावस्था तुम्हारा स्पर्श नहीँ करेगी । तुम दोनोँ दीर्घकालतक जीवित रहो । तुम्हारा यह पुत्र भद्रायु नामसे विख्यात होगा और अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लेगा ।

ऋषभ देव प्रस्थान कर गये

भद्रायु उसी वैश्यराजके घर मेँ बढ़ने लगा । वैश्या का भी एक पुत्र था उसका नाम पद्मकार वैश्य ने सुनय रखा था ।
दोनोँ कुमारोँ मेँ बड़ा स्नेह हो गया था । जब राजकुमार का सोलहवाँ वर्ष पुरा हुआ , तब ऋषभ मुनि पुनः वहाँ पधारे ।

इधर वज्रबाहु के दशार्ण राज्य मेँ शत्रुओँ ने लुटपाट करना चालुकरदिया । यहाँतक कि सुंदर महल से रानीओँ का हरण कर राजा को बंदी बनालिया गया ।

जब राजपुत्र को यह बात ज्ञात हुआ उसने सदलबल दशार्ण देश कि और कुच कर दिया ।
शत्रृओँ के विनाश व पिता को मुक्त करके वे दशार्ण राज्य के राजा बने

और परवर्ती काल मेँ वे भद्रायु के नामसे समग्र भारतवर्ष के चक्रवर्ती सम्राट बने ....

{{स्कन्दपुराण}}

मंगलवार, 2 जून 2015

पिँजौर ....

शिवालिक पर्वतमाला अंचल मेँ स्थित पंजपुरा क्षेत्र को अज्ञातवास हेतु पांडव बंधुओँ द्वारा चयन किया गया था । पंजपुरा उन दिनोँ मत्स्य देश के अंतर्गत पड़ता था .यहाँ राजा विराट का राज चलता था ।
पांडवोँ ने पंजपुरा को अज्ञातवास के लिये चयन तो कर लिया परंतु दुविधा ये थी कि 1 वर्षतक दूर्योधन के गुप्तचरोँ से कैसे छुपाजाय किसी को उनपर संदेह न हो । अंत मेँ युद्धिष्ठिर नेँ छद्म रुप से नाम व भेष बदलकर विराट नगर मेँ एक वर्ष का समय व्यतित करने का सुझाव दिया । सभी नेँ इसपर मोहर लगा दी और इसतरह पांडव विराट नगर मेँ अज्ञातवास का 1 वर्ष बिताने लगे ।

महाभारत का यही पंजपुरा कालान्तर मेँ पंचपुरा बना और फिर अपभ्रंष हो कर के पिँजौर Pinjore बनगया । बर्तमान भारत मेँ पिँजौर हरियाणा राज्य कि पंचकुला जिल्ला मेँ आता है ।
पांडवो द्वारा प्रायः 300 से भी अधिक बावड़ीयोँ का निर्माण किया गया था । जनश्रुति है कि पांडव बंधु प्रतिदिन एक बावड़ी का निर्माण करते थे, यहाँ आप भीम द्वारा बड़े बड़े पत्थरोँ को रखा हुआ देख सकते है ।

पिँजौर मेँ मंदिरोँ के अलावा एक मस्जिद और गुरुद्वारा भी है ।
पिँजौर गुरुद्वारा का निर्माण महाराजा रणजीत सिँह ने करवाया था ।

1574 विक्रमी उदासी तिसरी मेँ सिखोँ के पहले गुरु श्रीगुरुनानक देवजी भी पिँजौर आए थे । उस समय यहाँ घनघोर जंगल था । गुरु साहिब ने धारामंडल बैठकर आराधना की थी और गुरु ग्रंथ साहिब के श्लोक लिख लिख पढ़िया तेता काढ़िया का उच्चारण किया था । कहा जाता है कि यहाँ की एक बावड़ी मेँ गुरु साहिब ने राजा भुआणा जिसके जन्म से ही कलाई तक हाथ थे ,को हाथ धोकर आने को कहा था और राजा भिआणा के हाथ भले चंगे हो गे थे ।

पिँजौर मेँ राजस्थानी व मौगली कलाओँ के मिश्रण से बना पिँजौर गार्डेन का मोगल काल के प्रकृतिप्रेमी सरदार फिदेई खाँ द्वारा बनाया गया था ।
हालांकि इसी गार्डेनवाली जगह पर 1030 तक एक उद्यान हुआ करता था जो बादमेँ रखरखाव कि कमीओँ के कारण कदावर दिखने लगा था ।
फिदेई खाँ द्वारा 1672 से 1675 तक इसे नेया रुप दिलवाया गया । इसके अलवा पिँजौर एचएमटि[ the Hindustan Machine Tools]फैक्टरी के लिये भी भारत भर मेँ जाना जाता है ।

रविवार, 31 मई 2015

केरल का वायनड जिल्ला....

वायनाड (Wayanad) केरल का 12 वाँ जिल्ला है इसे 1 नवेम्बर 1980 को जिल्ला के रुप मेँ अधिकार दी गई । केरला के उत्तरपूर्व क्षेत्र मेँ स्थित वायनड़ जिल्ला का Kalpetta कलपेटा सिटी मुख्यालय व सबसे बड़ा सहर है । जिल्ला के मध्यभाग कम उचाँईवाले क्षेत्र है परंतु उत्तरीभाग पर्वत व जंगल से घिरे है , वहीँ पूर्वी भाग खुला व समतलक्षेत्र है । पुराणोँ मेँ इसे मायाक्षेत्र कहागया है (Maya's land) ! भाषावित के हिसाब से मायाक्षेत्र शब्द अपभ्रंस होकर मायानड और मायानड से वायनड़ शब्द बना व प्रचलित हुआ ।
भाषाविदोँ के हिसाब से वयनाड शब्द Vayal धान के खेत( paddy field) और Naad(land) भुमि के संधि से हुआ है और इसका अर्थ है 'The Land of Paddy Fields' धान खेतोँ कि भुमि । यहाँ कई आदिम आदिवासी जनजाति वास करती है और जिल्ला के अर्धाधिक जनसंख्या Tribal या आदिवासीओँ का है । वायनड़ समुद्री जलस्थर से
700 to 2100 m. उचाँई पर स्थित केरल का सबसे कम जनसंख्या वाली जिल्ला है ।
केरल के अन्य जिल्लाओँ कि विपरीत इस जिल्ला मेँ वायनड़ के नामसे कोई गाँव या सहर नहीँ है । वायनड़ केरल का इकलौता जिल्ला है जिसके वोर्डर कर्नाटक व तामिलनाड़ु राज्य से लगेहुए हो । इस जिल्ला के कुरीछाया जाति (The Kurichyas) के लोगोँ ने स्वतंत्रता संग्राम के समय अंग्रेजोँ के खिलाफ पज्हासी राजा (Pazhassi Raja) की सेना के साथ हतियार उठाया था । कुरिछया जाति के लोग अछे तीरंदाज बताये जाते है । कई पुरातन दक्षिणभारतीय काव्य गंथोँ मेँ कुरिच्छाया लोगोँ को उत्कृष्ठ धनुर्धर बताया गया है ।

वीरोँ कि जाति वाघेरजाति.......

गुजरात राज्य के वीर जाति वाघेराओँ को अंग्रेज सरकार नेँ गुनेगार कौम के मंडलीओँ मे बिठादिया था । जबकी हकीकत ये था वाघेरा जाति के लोग स्वातंत्र्यप्रेमी देशप्रेमी थे । वे अपने जमीन के लिये जाट पाईक गुर्जरोँ कि भाँति लढ़रहे थे । वाघेर जाति के लोग वहुतायत मेँ सौराष्ट्र कि सागरकंठा क्षेत्र स्थित ओखामंडलमेँ वसे हुए है । कहाजाता हे वे 7वीँ सदी से इस क्षेत्र मेँ स्थायी निवास कर रहे है । वाघेर प्रजा कि संस्कृतिमे ग्रीक, आसीरीआ, स्कीधीया, ईरानी और सिंध व भारतीय संस्कृतिका प्रभाव पड़ा हुआ लगता है । वाघेर प्रजाकी अपनी खुदकी कोई धर्म नहीँ ये लोग 16वीँ सदी मेँ भक्तिवादी संतो के कारण वैष्णवोँ के प्रभाव मेँ आये जिससे द्वारिकानाथ इनके परम आराध्य बने और ज्यादातर अब हिँदुधर्म अनुयायी है । माणेकवंशकी पांचसौ छेसौ वर्ष ईतिहासमे कोइ वाघेर सरदार खुदकी ग्राम मेँ मंदिर निर्माण या प्रतिष्ठा कि कोई प्रमाण नहीँ मिलता ये बात ओखामंडलके वाघेराजाति के लेखक कल्याणराय जोशी ने लिखा है । वाघेराओँ के लोकदेवो मेँ वाछरुदादा, खेतरपाळ, आशापुरा, शिकोतर, गात्राळ, शीतळा, आवडय, शूरापुरा और देवी सती आदि प्रमुख है । जनसृतिओँ के हिसाब से वाघेर प्रजा कच्छ से 7वीँ सदी मेँ ओखामंडल पर स्थायी निवास कर रहा है । कुछ एक ऐतिहासिक मानते कि वाघेरोँ का पूर्वज, भुजके राजपूत, जाम हमीरजी जाडेजा द्वारा एक गरासिया कन्या साथे लग्न संपन्न हुआ । इसतरह से इस समुदायमेँ खांटजैसी राजपूत जूथका समावेश हुआ हो माना जाता है । कहाजाता हे कि मूल संस्कृतशब्द वागुरा से वाघेर शब्द आया है । इनकी उत्पत्ति के विषय मेँ एक पौराणिक कथा जोड़ाजाता है वो इस प्रकार है एकबार जब श्रीकृष्ण गोमतीमे जलक्रीडा कररहे थे तब उनपर केशी नामक एक असुर ने हमला करदिया । मल्लयुद्धमेँ श्रीकृष्ण जीते और उसे पाताल कि एक गड्डे फेँकदिया । उसे गड्डे मेँ फेँकने पर उसमेँ से एक पुरुष का उत्पन हुआ उसे वाघेराओँ का आदिपुरुष मानाजाता है । एक और मान्यता अनुसार वाघ को घेरनेवाला, वाघ के शिकारी, ऐसा वाघेर का अर्थ भी कहीँ कहीँ निकालाजाता है . संस्कृत शब्द वागुरा का अर्थ भी ‘जाल, फांस, पास’ आदि के लिये उपयोग मेँ लायाजाता था । यहाँ हम ये मानसकते है कि मुख्यत्वे ये अर्थ समुदाय की शौर्यका घोतक है । ये समुदाय आज भी कच्छी भाषा बोलता है इसमेँ कई कुल या गोत्र पायेजाते मुख्यतः मानेक માણેક, केर કેર, सुमानीया સુમાણીયા,जाम જામ,हाथल હાથલ,भाथड ભાથડ,वथिया બથિયા,गोहिल ગોહિલ,परमार પરમાર,गड ગડ, गिग्गला ગિગ્ગ્લા,मापानीમાપાણી,टिलायत ટિલાયત और भायड ભાયડ । वाघेर जाति के ज्यादातर लोग हिँदु है परंतु कुछ लोग अब मुस्लिम बनजाने के पश्चात् खुदको मुस्लिम वाघेर कहकर अपना परिचय दोते है । 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पश्चिम गुजरात में स्थित भगवान श्रीकृष्ण का देवालय एक प्रमुख केन्द्र बना था । लगातार संघर्ष करते हुए इन लोगों ने समूचा द्वारिकाधीश अंग्रेजों के अधिकार क्षेत्र से मुक्त कराया। तब वडोदरा के गायकवाड़ ने अंग्रेजी सैन्य सहायता से पुन: आक्रमण कर दिया। विक्टोरिया और जे मोबिया जहाजों से ब्रिटिश नौसेना ने समुद्र से तोपों से गोले बरसाने शुरू किये। द्वारिका का गढ़ बहुत मजबूत था। माणेक महिलाओं ने तोपों के गोलों को भीगे हुए गद्दों से शांत कर दिया। लेकिन माणेकों के पास आधुनिक शस्त्र नहीं थे। अंग्रेज सेनापति ने जब इन्हें अधीनता स्वीकार करने का संदेश भेजा तो वाघेरों माणेकों ने आह्वान किया, असां रांडीरांड पुतर वयूं। असां जो बेली द्वारिकाधीश आय। टोपीवारा को ही फरी आय। अर्थात्
हम कोई निराश्रित बच्चे नहीं, हमारा तो द्वारिकाधीश है। इन टोपीवालों अंग्रेजों के दिन समाप्त हुए । 1868 तक इन वीर वाघेरों ने संघर्ष किया। वाघेर समाज के मुलू माणेक, जोधा माणेक, बापू माणेक, भोजा माणेक, देवा छबानी, रणमल माणेक और दीपा माणेक ने अंग्रेजों के विरुद्ध द्वारिका, ओखा और रणछोरराय में संघर्ष किया था । ये भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का यह एक अनूठा अध्याय है ।
द्वारिका में ब्रिटिश सेना के मारे गए अधिकारियों का तो कीर्तिस्तंभ है, पर हमारे वीर बलिदानी क्रांतिकारियों का स्मारक कहांं है]

रविवार, 17 मई 2015

योद्धाओँ कि जाति पाइक जाति

पाईक paika ओड़िशा का एक जाति है बर्तमान समय मेँ यह मुख्य रुप से तिन अलग अलग उपजातिओँ मेँ बँटगया है ।
1.खंडायत
2.बेणायत
3.पहरी - काळिँजि
इसके अलावा वाणुआ और ढ़ेँकिया भी पाईक कहलाते है

1.युद्धक्षेत्र मेँ तलवार चलानेवाले सैनिक
2.बेणायत घोड़े व हाथी पर लढ़नेवाले
3.कौतवाल व पहरादेनेवाले पहरी
4. युद्धक्षेत्रोँ मेँ तीरंदाजी करनेवाले बाणुआ कहलाते थे

5.आतर्कित ढ़ाल बर्छे से हामला करने वाले ढ़ेँकिया कहलाते ।
पाईक/Paika शब्द मूलतः संस्कृत से आया है जिसका अर्थ है पदातिक/Padatika meaning [[ the infantry, and hence the name of the dance is battle (paika) dance (nrutya)]] .

ओड़िशा मेँ गंग साम्राज्य Gango empire And gajapati गजपति राजत्व काल को स्वर्णयुग कहाजाता है ।
तब ओड़िशा का विस्तार गंगा से गोदावरी तक था
और साम्राज्य बचाने का जिम्मेदारी पाईकवीरोँ पर होता था । पाईक Paika नियमित योद्धा नहीँ थे परंतु वे नियमित अभ्यास करते थे आज भी गाँव के Paika akhada पाईक आखड़ाओँ मेँ युद्धाभ्यास होता है परंतु आज यह केवल कुछ एक क्षेत्रोँ मेँ देखने को मिलता हे खासकर उनगाँव मेँ जहाँ क्षेत्रिय कूल वहुतायत मेँ पायेजाते हो । पाईक PAIKA शान्तिकाल मेँ राजा द्वारा प्राप्त भूमि पर खेति करते थे और युद्ध कि घोषणा पर युद्धभुमि मेँ जाकर लढ़ते थे
। पाईकोँ नेँ लम्बे समयकाल तक मुगलोँ,तुर्क तथा मराठीओँ से लोहा लिया परंतु 16वीँ सदीके बाद
*श्री चैतन्य आदि द्वारा भक्तिवाद का प्रचार
के वजह से लोग आलसी व अंधभक्त बने
*जलवायु मेँ उतारचढ़ाव से लगातार सुनामी आनेलगा और कलिंगसागर कहलानेवाला जलराशी गहराई खोनेलगा जिससे ओड़िशा मेँ चक्रवात और बाढ़ कि स्थिति उत्पन हो गई । च्युँकि पाईकोँ का गुजारा खेती से चलता था उनको इस प्राकृतिक आपदा से भारी नैराश्य और नुकशान हुआ ।
* पुरी खोर्दा कटक ढ़ेकानाल गंजाम पारलाखेमुंडी अनगुल आदि क्षेत्र के राजघरानोँ मेँ आपसी कलह भी एक पाईकोँ मेँ आपसी मतभेद का मूल कारण है
अठारवीँ सदी तक पाईकोँ का पुरा का पुरा संगठन अलग अलग उपजातिओँ मेँ बँटचुका था परंतु 1803 मेँ अंग्रेजोँ का ओड़िशा पर चढ़ाई से स्वाभिमानी ओड़िआ जाति खासकर पाईकोँ मेँ पुनः एकता आनेलगा । 1803 से 1819 तक ओड़िआ जाति अंग्रेजोँ के खिलाफ लढ़ती रही 1857 से 40साल पूर्व हुए इस विद्रोह को पाईक विद्रोह कहाजाता है ।
यह भारत का सर्ब प्रथम ज्ञात विद्रोह था इसके नेता थे बक्सी जगबंधु ।
वो भारत के पहले ऐसे शहीद है जिन्हे अंग्रेजोँ द्वारा कटक की एक बरगद के वृक्षशाखा मेँ फांसी दिया गया था ।

आज कर्पुर उड़गया है बस महक बचा है
आज भी कटक ,मयुरभंज ,अनगुल ,ढ़ेकानाल ,नयागड़ ,जाजपुर ,पुरी आदि क्षेत्रोँ मेँ आखड़ाघर है लौँड़े समर अभ्यास कम गप्पे मारने जाते है

विभिन्न पुजापर्व मेँ पाईक तलवारकला पदर्शन होता हे
इसे CHAOU नृत्य कहाजाता है । ओड़िशा के अंश रहचुके सरेईकेला खरसुँआ आदि क्षेत्रोँ मेँ भी पाईकोँ का समुह निवाश करता है ये पहरी कूल के पाईक है जिनका कार्य होता था राज्य कि सीमा सुरक्षा करना ।