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शनिवार, 22 अगस्त 2015

कथा पांवटा साहिब की....भाग-2

16वीँ सदी मेँ भौगलिक परिस्थितियाँ ऐसी थीँ कि विलासपुर से श्रीनगर(गढ़वाल) जाने के लिये यमुना नदी पार करना होता था और पांवटा बीच मेँ पड़ता था ।

राजा भीमचंद को बारात लेकर इसी रस्ते से गुजरना था । बारत मेँ अस्त्र शस्त्रोँ से सज्जित हजारोँ सैनिकोँ को देखकर गुरु गोविँद सिँह का माथ ठनका ।
वो समझगये राजा भीमचंद के इरादे नैक नहीँ अतः सरक्षात्मक नजरिया अपनाते हुए राजा भीमचंद ,उनके पुत्र और चंद वरिष्ठ अधिकारीओँ को पावंट के निकट नाव से यमुना पार करने कि इजाजत तो दे दी ,लेकिन राजा भीमचंद की असली बारत यानी सैनिकोँ को एक घुमावदार लंबे रस्ते से गढ़वाल जाना पड़ा । इस घटना से युद्ध कि संभावनाएँ और बढ़गई ।


विवाह स्थल पर पहँचते ही भीमचंद ने पांवटा मेँ घटित घटना से राजा फतेहशाह को अवगत कराया । उसने कहा कि वह इस गुस्ताखी का बदला लेकर रहेगा । अपधे समधी की बात सुनकर फतेहशाह के माथे पर भी आक्रोश की लकीरेँ खिँच आई ।

विवाह स्थल पर अनेक पाहाड़ी राजा उपस्थित थे । रस्मेँ पुरी होते ही राजाओँ ने नवदंपति को तोहफे भेँट करना शुरु किए ।
जब दीवान नंदचंद जी , गुरु गोविँद सिँह द्वारा भेँट किया गया "ताम्बोल" फतेहशाह को देनेगये तो भीमचंद ने चेताया समधी जी इस उपहार को लेगेँ तो अछा नहीँ होगा ।
वक्त के नजाकत को देखकर फतेहशाह ने वह उपहार लौटादिया ।

पहाड़ीराजाओँ को ये माजरा समझनहीँ आ रही थी ! भीमचंद ने सबकी जिज्ञासाओँ को सुलझाते हुए उन्हे यह कहकर भड़काया कि गोविँद सिँह सभी क्षेत्रिय राजाओँ पर एकछत्रराज स्थापित करना चाहते है ।

भीमचंद पाहाड़ीराजाओँ को भड़काने मेँ सफल हो गया ।
शादी मेँ सामिल सभी राजाओँ ने एक संयुक्त प्रस्ताव पारित किया कि अब उनकी संयुक्त सेनाएँ गुरु गोविँद सिँह पर एक साथ हमला बोलेँगी ।
इस विवाहोत्सव मेँ किन्ही कारणवस नाहन के राजा मेदनी प्रसाद सामिल नहीँ हुए थे ।

नंदचंद ने पांवटा पहँचकर गुरुजी को शादी मेँ पारित प्रस्ताव का ब्यौरा दिया परंतु गुरु गोविँद सिँह जी को इससे कोई आचंबा नहीँ हुआ वे युद्ध के तैयारीओँ भेँ लगगये ।
उनदिनोँ गुरुजी के सेनामेँ 5000 से अधिक योद्धा थे जिनमेँ जीतमल ,संगेशाह ,गोपालचंद ,माहरीचंद ,गंगाराम ,किरपालचंद ,नंदचंद ,पुरोहित दयाराम तथा साहिब चंद अपनी वीरता के लिये विख्यात थे ।
कुछ पठान भी गुरु गोविँद सिँह के साथ थे ।

उधर पाहाड़ी राजाओँ की संयुक्त सेनाओँ मेँ कटोच के किरपाल ,गुलेर के गोपाल ,हिँदुर के हरिचंद ,चंदुल के गाजीचंद ,दाढवार व जसवाल के राजा ,गढ़वाल के राजा फतेहशाह व विलासपुर नरेश भीमचंद ने मिलकर युद्ध के लिये पांवटा कुच किया ।
अभी युद्ध होने ही वाला था कि गोविँद सिँह जी के सेनामेँ सामिल पठान सैनिक एकाएक पैँतरा बदलकर दुशमन से जा मिले ।
हारामखोर पठानोँ ने पहाड़ीराजाओँ के ये पट्टी पढ़ाया कि गोविँद सिँह का असली ताकत हम पठान थे अब उन्हे हराने मेँ कोई मुस्किल नहीँ है ।
पठान सैनिकोँ द्वारा ऐन वक्त पर विश्वासघात करने से गोविँद सिँह को दुःख हुआ परंतु इसी बीच उन्हे 700 छापामार युद्ध मे माहिर पठान सैनिक मिलगये । इससे गुरुजी के सेना का मनोबल दुना हो गया ।
6 अप्रेल 1687 को पांवटा साहिब के निकट भंगाणी के मैदान मेँ पहाड़ी राजाओँ की सेनाओँ और गुरु गोविँद जी के सेना मेँ युद्ध छिड़गयी ।

घमासान युद्ध हुआ ,
गुरु ने पहला हमला उन विश्वासघाती पठानोँ पर किया ।
युद्ध मेँ एकवार ऐसा लगा कि पहाड़ी सेना कि जीत हो जायेगी । च्युँकि हिँदुर नरेश हरिचंद आक्रमक बने हुए थे परंतु उनके साथीदार राजाओँ को हार ही नसीब हुआ ।
जसवाल व दाढ़वार के राजा रणक्षेत्र से भाग खड़े हुए । चंदेल के राजा ने भी हार मान लिया और तभी गुरु गोविँद सिँहजी के एक तीर ने हरिचंद को मोत की गोद मेँ सुला दिया ।

इससे भीमचंद व फतेहशाह युद्ध क्षेत्र से पलायन कर गये

ओर इस प्रकार गुरु गोविँद सिँह व उनके सेना ने भंगाणी के मैदान मेँ सबके छक्के छुड़ादिये ।

भंगाणी के जिस मैदान मेँ यह युद्ध हुआ था वहाँ आज भंगाणी साहिब के नामसे भव्य गुरुद्वारा बना हुआ है ।
इस गुरुद्वारा का निर्माण 1825 मेँ बसवा सिँह नामक एक श्रधालु द्वारा बनवाया गया है ।

कहाजाता है कि भंगाणी युद्ध मेँ विजयोल्लास स्वरुप गुरुजी ने एक उत्सव आयोजन करवाया था जिसमेँ नाहन के राजा मेदनी प्रसाद भी सामिल हुए थे ।
इस उत्सव को आज भी प्रतिवर्ष फाल्गुन पुर्णिमा को होल्ला महोल्ला के रुप मे मनाया जाता है । उत्सव मेँ गुरु ग्रंथ साहिब की शोभ यात्रा पांवटा साहिब के विभिन्न क्षेत्रोँ से निकाली जाती है ।
गुरुद्वारा साहिब मेँ निशान साहिब पर नया वस्त्र पहनाया जाता है । गतकाबाजी इस उत्सव का मुख्य आकर्षक होता हे,जिसमेँ कुशल योध्या अस्त्र शस्त्र विद्या का प्रदर्शन करते है । इस उत्सव मेँ शहरी व ग्रामीण लोक जीवन की मिली जुरी झाँकी देखने को मिलती है ।

***** #उत्तरप्रदेश और #हरियाणा की सीमाओँ से सटा #पांवटासाहिब का यह गौरवमय इतिहास सभी #हिन्दु याद रखेँ हृदयगंम करेँ .इससे सीख लेँ
और मिलजुलकर रहेँ ****


कथा पांवटा साहिब की... भाग 1

आनंदपुर साहिब मेँ एक बार गुरुगोविँद सिँह जी से मिलने तत्कालिन विलाशपुर राजा भीम चंद का आना हुआ ।
भीमचंद का वहाँ भव्य स्वागत हुआ ,
गुरुजी ने उन्हे दुसरे राजाओँ के द्वारा दिए गये नायाब उपहारोँ को दिखाया जिसमेँ #असम राजा द्वारा दिया गया सफेद हाथी "प्रसादी" भी था ।
राजा भीमचंद के मनमे प्रसादी को देखकर लोभ उत्पन हुआ जिसे गोविँद सिँह जी ताड़ गये परंतु अतिथी धर्म निर्वाह हेतु उन्होने कुछ नहीँ कहा !
अनकोँ उपहारोँ समेत भीमचंद जी स्व राज्य लौट तो आये परंतु उनके मन मेँ प्रसादी के पाने को पाने की लालसा बढ़गया था ।

1645 सदी मेँ गुरुगोविँद सिँह जी सिरमौर रियासत के मीरपुर गाँव मेँ ठहरे हुए थे
मीरपुर के शासक उन दिनोँ मेदनी प्रसाद थे , उन्हे पताचला कि गुरुजी उनके राज्य मे आये हुए है । मेदनी प्रसाद ने गोविदँ सिँह जी को अपने मंत्र शोभा राम के हातोँ नाहन आने का निमन्त्रण दिया । गुरुजी ने निमन्त्रण सहर्ष स्वीकार कर लिया ।
17 वैशाख को गोविँद सिँह जी नाहन पहँचे । राजा मेदनी प्रसाद ने उनका स्वागत सत्कार पश्चात झिझकते हुए अपना समस्या प्रकट किया ।
सिरमौर के पूर्व मेँ टिहरी गढ़वाल के राजा फतेहशाह के साथ राजा मेदनी प्रसाद का अनवन चल रहा था ।

तो मेदनी प्रसाद ने गुरुजी से आग्रह किया कि वे नाहन ओर श्रीनगर के सीमा पर एक किला बनवा देँ इससे फतेह शाह के मनमानी पर अंकुश लगसकेगा ।

गुरु गोविँद सिँह ने राजा को कहा जहाँतक हो सके मिलजुल कर रहेँ व मिलकर मोगल सत्ता के खिलाफ लढ़ेँ ।
मेदिनी प्रसाद कि इछाओँ को सम्मान देते हुए सिरमौर रियासत मेँ यमुना किनारे पाहाड़ोँ के बीच सुँदर वृक्षोँ से घिरा एक स्थल उन्हे बहुत पसंद आया । यहीँ वे अपने घोड़े से उतरे और अपने पाँव इस धरती पर टिकाए । गुरु गोविँद सिँह के यहाँ पाँव टिकाने के कारण ही इस क्षेत्र का नाम पाँवटिका पड़ा, जो बाद मेँ अपभ्रंस होकर पाँवटा साहिब पड़ गया !!

मेदनी प्रसाद ने गुरुजी के रहने के लिये यमुना किनारे एक स्थान बनवा दिया । गुरुजी अपने परिवार को भी यहाँ ले आये ।
यहीँ उनके बड़े पुत्र अजीत सिँह का जन्म हुआ ।
पाँवटा साहिब को पौराणिक काल से ही पवित्र माना जाता हे । ऐसी मान्यता है कि सर्वप्रथम कैलास से अवतरित भगवन शिव को यहीँ ज्ञान प्राप्त हुआ था । उसके बाद वह कपालमोचन तीर्थ गे । देवी दुर्गावती भी कैलास पर्वत से उतरकर इसी मार्ग से स्वर्गलोक के राजा इंद्र के सहायतार्थ गई ।
यहीँ परशुराम का भगवन रामचंद्र से मिलन हुआ था । यहाँ से थोड़ी ही दुर ऋषि जमदग्नि की धर्म पत्नी रेणुका का सरोवर है । पावंटा से थोड़ी ही दूरी पर ऋषि मार्कण्डेय व कालपी ऋषि का तपस्थल है ।
स्थानीय लोगोँ मे ऐसी भी मान्यता प्रचलित हे कि यहाँ यमुना मे स्नान करने पर व्यक्ति हर पापोँ से सर्वथा मुक्त हो जाता है ।

बहरहाल गुरु गोविँद सिँह जी ने नाहन और श्रीनगर के बीच पाँवटा मेँ किला बनाया तो ये बात श्रीनगर के राजा फतेह शाह को नागवार गुजरा । वो गोविँद सिँह जी से मिलने पाँवटा आया और गुरुजी के व्यक्तित्व से प्रभावित हो गया ।
कहाँ वह झगड़ा करने आया था और कहाँ दोस्ती के बंधनोँ मेँ बंध गया ।
गुरुगोविँद सिँह ने मेदनी प्रसाद व फतेह शाह के बीच चलरहे मनमुटाव को दूर करते हुए उनमेँ संधि करवा दी । गुरुजी के मध्यस्दा पर फतेह शाह ने सिरमौर रियासत को उसके द्वारा दबाया हुआ भूभाग लौटा दिया ।
कुछ दिन पश्चात श्रीनगर नरेश फतेहशाह कि पुत्री का विवाह राजा भीमचंद के पुत्र के साथ होना निश्चित हुआ ।
ये भीमचंद वही था जिसके मनमेँ गुरुजी के हाथी को देखकर लालच आ गया था ।
फतेह शाह कि कन्या से विवाह तय होते ही उसने एक चाल चला ! अपने कुछ कारिँदे गुरु गोविँद सिँह जी के पास भेजकर उसने शादी के स्वागत समारोह के लिये प्रसादी हाथी को देने का अनुरोध किया ।
गुरु गोविँद सिँह को भीमचंद का युँ प्रसादी माँगना अछा नहीँ लगा सो उन्होने राजा के कारिँदोँ को खाली हाथ लौटा दिया ।
कारिँदो ने भीमचंद को उलटा सिधा कहकर और उकसाया वो यह सुनकर और आगबबुला हो उठा ।

बेटी की शादी का दिन निकट आते ही राजा फतेहशाह ने गुरु गोविँद सिँह को सपरिवार शादी मेँ पधारने का न्योता भेजा ।

उधर गुरुगोविँद सिँह को खबर मिला कि भीमचंद उनसे भीड़ने की तैयारी मेँ जुटा हुआ है ।

कहीँ शादी मेँ उन्हे देख कर राजा भीमचंद कोई बखेड़ा खड़ा न कर दे ,जिससे रंग मेँ भंग पड़ जाए .यह सोचकर गुरु गोविंद सिँह स्वयं शादी मेँ नहीँ गे और अपने दीवान नंदचंद के हाथ बहुमुल्य उपाहारोँ के साथ राज फतेहशाह के यहाँ भेज दिया ....

क्रमशः.....

बुधवार, 19 अगस्त 2015

मध्यप्राच्य का प्यारा द्वीप सोकोट्रा ...

सोकोट्रा.....Sokotra......

अमरिकीलोग इसे पृथ्वी पर परग्रह वासीओँ का द्वीप कहते है ।
Asia महादेश का यमन व African देश सोमालिया के मध्य समंदरमेँ आता है ये 4 द्वीपोँ वाला क्षेत्र !
4 द्वीपोँ मेँ सोकोर्टा सबसे बड़ा व मुख्य द्वीप है ।
यहाँ कि जनसंख्या कुल 30,000 के आसपास बताया जाता है ।
इसकी क्षेत्रफल 3796 वर्ग किलोमिटर हे ।
20वीँ सदी के शुरुवात मेँ पश्चिमी सोधकर्ता माना करते थे कि सोकोर्टा नाम संभवतः किसी ग्रीक शब्द का परिवर्तीत रुप होगा । परंतु बाद मेँ प्राच्य विद्वानोँ ने साबित किया कि सोकोर्टा मूल संस्कृत शब्द #सुखाधार का बदला हुआ रूप है । संस्कृत मेँ सुखाधार का अर्थ हे "सभी सुखोँ से लवरेज" !
सदीओँ पहले एसिआ व अफ्रिका व युरोप के बीच अछा व्यापारीक संपर्क हुआ करता था ।
सोकोर्टा का इसमेँ एहम योगदान हुआ करता था च्युँकि सोकोट्रा उन दिनोँ वाणज्यकेन्द बनकर उभरा था ।

गुजराती नौचालक इस द्वीप से आ रहे अजीव गर्जना के कारण इसे "सिकोतरो सिँह" कहते है ।

1967 से ये द्वीप यमन के शासनाधीन हे । इससे पहले लम्बे समयकाल तक यह द्वीप पर्तुगाली फिर अंग्रेजोँ के हातोँ मे आया था ।
सोकोर्टा का सबसे बड़ा सहर हाड़िवो मेँ जनसंख्या 8,000 है ,हालांकि बाकी 3 द्वीपोँ मे
कउतना विकाश नहीँ करपाया ।
यहाँ के लोग खजुर उत्पादन ,मत्स व पशुपालन आदि व्यवसाय के जरीये अपना गुजारा चलाते है ।
च्युँकि यहाँ कोई विद्युत उत्पादन व्यवस्था नही है अतः समूचे द्वीप मेँ मात्र जेनरटरो द्वारा ही विजली कि आपुर्ति कि जाती है !

आप यह जानकर और भी हैरान होगेँ कि यहाँ आज भी ऐसे लोग रहते हे जो रुपिया पैसा देकर नहीँ वरन अपनी मनपसंद चिजोँ के बदले सामान बेचा करते है ।
बैसे आधुनिकता ने यहाँ भी अपना कदम थाम लिया है परंतु लगता हे यहाँ वास्तुवादी विकाश मे अभी और वक्त लगेगा ।
अफ्रिकन आरब व भारतीय प्रजा के रक्तगत समिश्रण से सोकोट्रा प्रजा का सृष्ठि मानाजाता है । कहते है यमन का नाम दुनिया मेँ जनसंख्या के मुकाबले गन रखनेवाले देशोँ मे टप पर आता हे परंतु यमन का हिस्सा होकर भी सोकोर्टा के लोग हतियार नहीँ करते ।
यहाँ के लोगो का परस्पर अभिवादन का अपना एक अलग अनोखी रीत पायीजाती है ।
यहाँ के लोग आपसमेँ मिलते समय दुआ सलाम के बदले परस्पर नाक स्पर्श द्वारा अभिवादन करते है ।
सोकोर्टा मेँ बहत कम लोग अंग्रेजी बोलपाते हे इसलिये पुरे के पुरे द्वीप मेँ अलग अलग स्पेलिंग के साथ लिखा पायाजाता है सोकोर्टा नाम !!
द्वीतीय विश्वयुद्ध के दिनो मेँ नेदरलैँड ने इस द्वीप को कामचलाउ सैन्य कैँप बनाया था

फिर कुछ कालोँ तक यह जमीन सोमालियन लुटेरोँ का चारणभूमि बना परंतु अंत मे यमन ने इसपर अपना अधिकार प्राप्त करने मे सफल हो पाया ।
सोकोर्टा मे सिर्फ इंसान ही नहीँ यहाँ दिखनेवाले जानवर व वृक्षोँ का स्वरूप मूल भंखण्ड से भिन्न पाया गया है ।

***300 वर्षोँतक जीवित पायेजानेवाला #लोवान वृक्ष सोकोट्रा का मुख्य आकर्षण तथा रहस्यमय विषय है ।
इसे अंग्रेजी मे ड्रेगन ब्लॉड़ ट्री कहाजाता है ।
इस वृक्ष कि खासियत इसकी खास आकार व जीवनधारण प्रणाळी हे !
दूर से लोबान वृक्षोँ को देखनेपर लगता है मानो ये वृक्ष नहीँ वरन यहाँ किसीने सजा कर गुलदस्ता रखदिया हो ।
ये चिँताजनक हे कि सोकाट्रा मेँ लोवान वृक्षोँ कि संख्या सीमित व निरंतर घटता जा रहा है जो आनेवाले दिनोँ मेँ सोकोट्रा के जैव विवधता को क्षति पहचाँ सकता है ।

वहीँ सोकोट्रा पर इन दिनोँ ISIS व अलकाएदा का नजर पड़ा है । कुछ दिनोँ पूर्व इंलण्ड कि "द इकोनोमिस्ट" पत्रिका मेँ इस विषय पर खास लेख छपा था ! यदि इन संगठनोँ को इस क्षेत्र मेँ आतंकी गतिविधी बढ़ाने का मौका मिला तो सोकोट्रा को भयावह परस्थितिओँ का सामना करना पड़ सकता है ।

शनिवार, 15 अगस्त 2015

अमरुद और मेरी उलझन.....

तिन दिन पूर्व मैने दो अमरुद के पैड़ लगाएँ
फिर अचानक मनमे क्या ख्याल आया.,. अमरुद के बारे मेँ गुगल पर रिसर्च करने बैठगया ।

17वीँ सदी मेँ मार्टेल प्रजाति कि
ये मिठा स्वादिष्ठ फल युरोपियन व्यापारीओँ के साथ भारत आया !

विदेशी आये और चले भी गये परंतु ये (Guava) वृक्ष करीब करीब 300 वर्षोँ से समुचे भारत के जमीनोँ पर कब्जा कर बैठा है ।

पतानहीँ क्युँ पर इस वृक्ष के खिलाफ आजतक #कट्टर
#स्वदेशी
#समर्थक #आन्दोलनकारीओ ने कोई विरोध नहीँ कि न इसपर संसदमे #कंग्रेसी ओ ने कभी हल्ला गुल्ला मचाया है ।

अब मैँ समझचुका था कि
मैने अमरुद का पौधा लगाकर बहत बड़ी गलती कर दी है......

ये बिलकुल ऐसा ही है
कि जैसे आप फेसबुक पर
#राजीव_दिक्षित जी के कट्टर समर्थक हो और बिना जानकारी आपने एक विदेशी द्रव्य को स्वदेशी समझकर इस्तेमाल कर लिया !!!

मेरे दिल को इस नयी जानकारी से गहरा धक्का तो लगा ही था और बचाकुचा जो अमरुद के लिये थोड़ी बहत ललक् बची हुई थी
उसे हमारे प्यारे चाचाजी के बातोँ ने पूर्णतः निर्मूलन् करदिया !!!

उन्होने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ एक अवैज्ञानिक(?) बात कहीँ
कि
"जिस तरह विदेशी संस्कृति
भारतीय समाज के लिये ज़हर साबित हुई है
उसी प्रकार ये विदेशी वृक्षोँ के द्वारा अत्सर्जरित Oxygen मे तथा उनके फलोँ मे मौजुद जहरीले तत्व (पोषक तत्व ) हमेँ पीढ़ी दर पिढ़ी कमजोर बना रहे है ।
'असल बात तो दरसल ये हे कि अंग्रेजोँ को इस वृक्ष कि बुराईओँ के बारे मे पता था परंतु ये चालक व्यापारी लोग जानवुझकर इसे भारतीयोँ को कमजोर बनाने के लिये छोड़गये है ताकि बाद मेँ फिर आ कर हम पर राज करसके ।"

फिर चाचाजी ने इस वृक्ष से जुड़ी एक सामाजिक मुद्दे कि और मुझे ध्यान दिलाते हुए
बताया
"देखो मनुआ
ए जो तुम आज इत्ते अमरुद के पौधे पोत रहे हो का सोचे हो कल को इस से अछा दिन आ जावेगा :]] अरे बचुआ तनिक समझदार बनो '
कलको तोहरे बच्चे होवेगेँ
हमरी तो तिन लौँडे हे ही....
कल को इन अमरुद के वृक्षोँ को लेकर के वो आपसमेँ महाभारत कर गये तो
का करपाओगे ? बचाने जाओगे तो उलटे तुमपर पड़ने का डर है मुझे ...."
ना...ये मेरे बच्चे ही कौरव है मे जानता हुँ
इसलिये कहरहा था
जो भी करो सोच समझकर करो"





तिन दिन पूर्व मैने दो अमरुद के पैड़ लगाएँ फिर अचानक मनमे क्या ख्याल आया.,. अमरुद के बारे मेँ गुगल पर रिसर्च करने बैठगया । 17वीँ सदी मेँ मार्टेल प्रजाति कि ये मिठा स्वादिष्ठ फल युरोपियन व्यापारीओँ के साथ भारत आया ! विदेशी आये और चले भी गये परंतु ये (Guava) वृक्ष करीब करीब 300 वर्षोँ से समुचे भारत के जमीनोँ पर कब्जा कर बैठा है । पतानहीँ क्युँ पर इस वृक्ष के खिलाफ आजतक #कट्टर #स्वदेशी #समर्थक #आन्दोलनकारीओ ने कोई विरोध नहीँ कि न इसपर संसदमे #कंग्रेसी ओ ने कभी हल्ला गुल्ला मचाया है । अब मैँ समझचुका था कि मैने अमरुद का पौधा लगाकर बहत बड़ी गलती कर दी है...... ये बिलकुल ऐसा ही है कि जैसे आप फेसबुक पर #राजीव_दिक्षित जी के कट्टर समर्थक हो और बिना जानकारी आपने एक विदेशी द्रव्य को स्वदेशी समझकर इस्तेमाल कर लिया !!! मेरे दिल को इस नयी जानकारी से गहरा धक्का तो लगा ही था और बचाकुचा जो अमरुद के लिये थोड़ी बहत ललक् बची हुई थी उसे हमारे प्यारे चाचाजी के बातोँ ने पूर्णतः निर्मूलन् करदिया !!! उन्होने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ एक अवैज्ञानिक(?) बात कहीँ कि "जिस तरह विदेशी संस्कृति भारतीय समाज के लिये ज़हर साबित हुई है उसी प्रकार ये विदेशी वृक्षोँ के द्वारा अत्सर्जरित Oxygen मे तथा उनके फलोँ मे मौजुद जहरीले तत्व (पोषक तत्व ) हमेँ पीढ़ी दर पिढ़ी कमजोर बना रहे है । 'असल बात तो दरसल ये हे कि अंग्रेजोँ को इस वृक्ष कि बुराईओँ के बारे मे पता था परंतु ये चालक व्यापारी लोग जानवुझकर इसे भारतीयोँ को कमजोर बनाने के लिये छोड़गये है ताकि बाद मेँ फिर आ कर हम पर राज करसके ।" फिर चाचाजी ने इस वृक्ष से जुड़ी एक सामाजिक मुद्दे कि और मुझे ध्यान दिलाते हुए बताया "देखो मनुआ ए जो तुम आज इत्ते अमरुद के पौधे पोत रहे हो का सोचे हो कल को इस से अछा दिन आ जावेगा :]] अरे बचुआ तनिक समझदार बनो ' कलको तोहरे बच्चे होवेगेँ हमरी तो तिन लौँडे हे ही.... कल को इन अमरुद के वृक्षोँ को लेकर के वो आपसमेँ महाभारत कर गये तो का करपाओगे ? बचाने जाओगे तो उलटे तुमपर पड़ने का डर है मुझे ...." ना...ये मेरे बच्चे ही कौरव है मे जानता हुँ इसलिये कहरहा था जो भी करो सोच समझकर करो"


सोमवार, 10 अगस्त 2015

कवीरदास जी की टंक तोराणी

भारत मेँ एक प्रसिद्ध साधु हुए हेँ मुलक दास जी , वे प्रयाग नजदिक #कड़ागाँव मे जन्मे थे । एक दिन नियति ने उनसे उनकी पत्नी व पुत्री को छीन लिया । मृत्यु पश्चात् उनका परिवार कहाँगया अर्थात् उनकी गति ब्रह्मलोक मेँ हुआ अथवा अन्य लोकोँ मे ये जानने कि जिज्ञासा ने मुलकदास जी को साधु बनादिया ।
उनके गुरु श्रीरामानन्दचार्य
जी व गुरुभाई है श्री तुलसी दास जी !

मुलक दास जी ने मन की जिज्ञासा हल करने हेतु समुचे भारत का भ्रमण कर लिया ।
अन्त मेँ वे जगन्नाथ पुरी आये ,जगन्नाथजी कि दर्शन करते ही उनका मन शान्त हो गया और वे यहाँ पुरीधाम कि प्रशिद्ध श्मशाँनस्वर्गदार निकट आस्रम बनाकर रहने लगे । धीरे धीरे उनके यहाँ भी गुरुशिष्य परंपरा चलपड़ा । मुलकदास जी पर भगवत् भक्ति का रंग कुछ युँ चढ़ा कि वे प्रत्यह खिचड़ी बनाकर भगवनजी को भोगलगाने लगे । उनके
शिष्य इस भाव से सर्वथा
अनजान ही रहे !!!
मलुकदास जी ने ही अपने गुरुभाई संत कवीर दासजी को जगन्नाथपुरी आमन्त्रण किया था । अब कवीरदास थे मूर्तिपूजा की घोर विरोधी कैसे भी समझा बुझाकर मलुकदासजी ने उन्हे श्रीजगन्नाथ दर्शन हेतु राजी कर लिया ।
कबीरदास ने जब भगवनजी का दर्शन किया उनके मनमेँ परिबर्तन आ गया । उनके मुख से एकाएक निकलगया
"ठाकुर भले विराजो जी" ।
फिर उन्होने उसदिन यह भजन गाया और इसे सुनकर मलुक दास जी भी प्रभुचिन्तन मेँ निमग्न हो गये ।
कवीर दास जी अब रोज श्रीविग्रह दर्शन करने लगे । उन्होने
श्रीमंदिर मेँ बननेवाली महाप्रसाद को भी ग्रहण कर लिया । एक दिन कवीर दास जी ने सोचा क्युँ न इस महाप्रसाद मेँ जल मिलाकर इसे भक्तोँ को पिलाया जाय !!!!
शुभकार्य मेँ देरी किसबात कि !
यही हुआ कवीर दास जी का वह "महाप्रसाद जल" आगे चलकर श्रीक्षेत्र पुरी मेँ "टंक तोराणी" के नामसे प्रसिद्ध हुआ । जगन्नाथ पुरी मेँ
मलुक दास जी कि आश्रम निकट कवीरजी का ध्यान समाधी है । वहाँ उनके दो शिष्य रैदास व अमिमाता का भी समाधी हे ।
उनके नाम से प्रचलित कवीरचौरा मठ कि और से भक्तोँ को आज भी टंक तोराणी/महाप्रसाद जल पिलाया जाता है ।।

शनिवार, 8 अगस्त 2015

जनसृतिओँ मेँ गंजाम जिल्ला की मालतीगड़

पुरी गजपति राजा (संभवतः मुकुन्ददेव)
और उनके कनिष्ठ पुत्र के बीच किसीबात पर परस्पर मनोमालिन्य और फिर झगड़ा हो गया ।
इससे व्यथित हो राजपुत्र ने कुछ मित्रोँ को साथ लेकर घुमुसुर राज्य मेँ प्रवेश किया ।
अपना अलग राजनवर बनाने के लिये राजपुत्र ने निकटस्थ मालती पर्वत के निकट राजप्रासाद का निर्माण करवाया और इस क्षेत्र का नाम रखा मालतीगढ़ !
छोटो बड़े कुछ गाँव पर अधिकार करके वो राज करने लगा ।
इसी मालतीगढ़ के पूर्वीदिशा मेँ एक और राज्य था उसका नाम था जउगड़ !
कुछवर्षोँ बात जउगड़ के साथ सीमाविवाद हुआ और समाधान न मिलनेपर युद्ध छिड़गया ।
मालतीगड़ के राजा ने अपने कन्ध व सउरा जैसे आदिवासी सैन्योँ को साथ लेकर युद्ध के लिये जउगड़ कि और रवाना हो गये पर
"जाने से पहले महारानी को उन्होने पथ्थर से बना बड़ा दीप मेँ अग्नी प्रज्वलीत करते हुए कहा ये दीप जबतक जलता रहेगा तुम मेरी विजय कि उम्मिद रखना । यदि ये दीप बुझगया तो तुम इसमेँ कुदकर अपना सतीत्व रक्षा करना ।
राजा ने उस वृहद दीप कि रक्षा हेतु दो विश्वासी पाइक सैनिक नियुक्त किया ।
अब राजा युद्धभूमि कि और कुच कर गये !
अनेक दिनोँ तक युद्ध चला परंतु जउगड़ को जीत पाने मेँ मालतीगड़ के राजा विफल हुए ।
च्युँकि जउगड़ की द्वार जउ नामकी एक खास पदार्थ के आवरण से ढ़का था इसलिये इसपर किसी अस्त्र व गोलाबारुद का कोइ असर नहीँ हो पाता था ।

एक दिन मालतीगड़ राजा रात को जउगड़ मेँ भेस बदलकर घुसगये

हर जगह युद्ध कि बातेँ हो रही थी....
राजा ने सुना एक व्यक्ति कहरहा था
जउगड़ कि दिवार तोड़ना तबतक मुस्किल है जबतब उसमेँ जउ नामका द्रव्य लगा हुआ है
यदि इस द्रव्य को हटादिया जाय तबजाकरके मालतीगढ़ राजा इस राज्य को जीत पाएगेँ ।

राजा ने वैसा ही किया
और
दिवार तोड़ कर नवर मेँ प्रवेश कर गये ।
उधर जउगड़ के राजा ने देखा विपत्ति सम्मुख है
हार निश्चित है परंतु तबतक जउगड़ राजा ने मालतीगड़ को बरबाद करने की तैयारी कर ली थी !
जउगड़ हार भी जायेगा तब भी मालतीगड़ का अन्त निश्चित था । युद्ध के प्रारम्भिक दिनोँ मेँ ही
जउगड़ के राजा ने लोग भेजकर मालतीगड़ की लगातार जलरही दीप को बुझादिया था ।
अब रानी भी दुःखी हो सती हो गयी । युद्ध मेँ
मालतीगड़ का विजय हुआ ,राजा नवर लौटे तो देखा उनका सबकुछ लुट चुका है ।
प्रियतमा पत्नी की वियोग से वो नित्यान्त व्यथित हुए और निश्चय कर लिया च्युँकि उनके लिये रानी ने आत्मदाह किया वो भी उसी पथ्थर दीप मेँ कुदकर प्राणत्याग करेगेँ ।
राजकर्मचारीओँ ने बहुत समझाया पर राजा अटल रहे और वही किया ।
मालतीगड़ अब अराजक हो गया था ।
ये जानकर घुमुसुर के भंज राजा ने सैसन्य आ कर के मालतीगड़ अधिकार कर लिया ।
मालतीगड़ कि अधिष्ठात्री व्याघ्रदेवी को ले जा कर के कुलाड़गड़ मे पुनः स्थापना किया गया । मालतीगड़ के और एक मंदिर से विरंञ्जी नारयण कि मूर्ति को बुगुड़ा नामक क्षुद्र नगर के मंदिर मेँ पूजा गया ।

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मालतीगड़ को पुराणोँ मेँ खासकर जैनग्रंथोँ मेँ कोटितिर्थ कहागया है
जो आधुनिक गंजाम निकटस्थ आसिका नगर मेँ स्थित है ।






शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

भूपेन्द्र सिँह एक परिचय

भूपेन्द्र सिँह का जन्म 4 फरवरी 1940 को अमृतसर मेँ हुआ था उनके पिता अम्रृतसर मेँ म्युजिक के प्रोफेसर थे तो छोटी सी उर्म मे ही वे अपने पिता के साथ आ गये दिल्ली ! जाहिर है उन्हे संगीत कि तालिम पिता द्वारा प्राप्त हुआ । दिल्ली मेँ पढ़ाई खत्म करके वे अल इंडिया रेड़िओ से जुड़े और वतौर म्युजिसन और सिँगर काम करने लगे ।
अल इंडिया रेड़िओ ने वाहदुर शाह जाफर पर जब एक कार्यक्रम बनाया उसमेँ भूपेन्द्र सिँह ने वहादुर शाह जफर कि एक गजल रेकोर्ड कि जो दिल्ली वालोँ ने खुब पसंद किया । ये गज़ल थी

"लगता नहीँ है दिल मेरा उजड़े दयार मेँ" !

उन्ही दिनोँ रेडिओ प्रड्युसर सतीश भाटिया के पार्टी मेँ भूपेन्द्र जी और उनके हुनर से मदन मोहन रुबरु हुए ।
इससे भूपेन्द्रजी को फिल्म हकीकत मेँ मदनमोहन ने पहला ब्रेक दिया ।
इस फिल्म मेँ महम्मद रफी ,तलत् महम्मुद और मन्ना डे के साथ उन्होने अपना पहला गीत रेकोर्ड किया । ये गीत था

"हो के मजबुर उसने मुझे भुलाया होगा ज़हर चुपके से दवा जानके खाया होगा"

इत्तेफाक से ये गाना उन्ही पर फिल्माया गया था ।

"ऋत जबाँ जबाँ

इसके बाद भूपेन्द्र सिँह आरडी बर्मन के साथ बतौर गिटारिस्ट जुड़े !

दम मारो दम गाने मेँ बजे गिटार
उन्ही के द्वारा बजाया गया था ।

इसके बाद तो उन्होने अन्य म्युजिसन के साथ भी काम किया । आरडी बर्मन के साथ दोस्ती के कारण उन्हे
फिल्म "परिचय" मेँ
लता जी के साथ
डुएट गाने का मौका मिला । गीत के वोल थे
"बीते न बिताये रैना"

भूपेन्द्र को पहला सोलो संग गाने का मौका खैयाम ने दिया था ।
फिल्म थी आखरी खत
ओर गीत था
"ऋत ऋत जबाँ जबाँ रात महरबाँ"

भुपेन्द्र सिँह जी द्वारा गाये गये ज्यादातर यादगार गीत गुलज़ार के कलम से निकले है जैसे

दिल ढ़ुँढ़ता है फुरसत के रात दिन

नाम गुम् जायेगा चेहरा ये याद आयेगा ,

एक अकेला इस सहर मेँ

कभी किसी को मुक्कमल जाहाँ नहीँ मिलता" आदि ।

मिड 80के दशक मेँ भूपेन्द्र ने बंगाली सिँगर मिताली मुखर्जी से शादी कर ली और इन दिनोँ
वे साथ साथ स्टेज सो करते व आलबम् निकालते है ।
भूपेन्द्र जी की लम्बी उम्र कि कामना करते है






हिन्दी व गान्धी

1909 से ही गाँधीजी ने तय कर लिया था कि हिन्दी राष्ट्रभाषा होना चाहिये ! परंतु ये बात सिर्फ उनके मन मेँ सीमित था
1917 साल द्वितीय गुजराट शिक्षा सम्मिलनी मेँ उन्होने घोषणा किया कि हिन्दी को भारत मे राजभाषा का व आचँलिक भाषाओँ को राज्य भाषा का दर्जा मिले ।
इतना कहकर वे चुप नहीँ बैठे
उन्होने 1918 प्रयाग हिन्दी साहित्य सम्मिलनी मेँ ये बात फिर उठाया ।
उन्होने कहा "अब ये सम्मिलनी हिन्दी प्रचार के लिये भी कार्य करे"
ये कहने के साथ साथ उन्हे पता था व्रिटिस चाटुकार दिल्ली मेँ बैठे है जातीयतावादी बात सुनते ही मुसलमानोँ को उर्दु के नाम पर भड़काएगेँ !

फिर महात्मा ने दुसरा पदजोड़ा
"हिन्दी व उर्दु दो परस्पर विरोधी भाषा नहीँ अपितु प्रयाग गंगा जमुना रुपी दो नदी है" !!
मुसलमान नागरी मेँ न लिखना चाहेँ तो उर्दु अक्षर मेँ लिखे
तब विरोध कोई कारण नहीँ बचपावेगा !!"

उत्तर भारत से हिन्दी के लिये प्रतिबंधक थे मुसलमान तो दक्षिणभारत मेँ द्राविड़ लोगोँ से भी विरोध कि भारी संभावनाएँ थी ।
तब गाँधीजी ने तय किया कि वे दाक्षिणात्य मेँ हिन्दी कि प्रचार प्रसार हेतु विशेष ध्यान देगेँ ।
गांधीजी के उद्यम से 1918 मेँ मांद्राज मेँ दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा का गठन हुआ व हिन्दी प्रचार शुरुहुआ था ।
1920 मेँ गुजरात मेँ गुजराती जातीय विश्व विद्यालय कि स्थापना हुई और वहाँ हिन्दी भाषा शिक्षा वाध्य किया गया ।
फिर गांधीजी ने देखा हिन्दी भाषा के लिये कंग्रेस का साथ नित्यान्त आवश्यक है अतः उन्होने 1924 वेलगाँव अधिवेशन मेँ हिन्दी को कंग्रेस कार्यक्रमोँ मेँ जोड़दिया ।
वेलगाँव अधिवेशन मेँ सभापतित्व करते हुए गाँधीने हिन्दी पर चमत्कार भाषण दिया । उन्हे इसबात कि यकीन न था कि लोग उनकी बात नसिर्फ सुनेगेँ वरन इसके लिये उद्यमरत्त भी होगेँ ।
1925,कानपुर मेँ हुए अधिवेशन मे कंग्रेस ने एक और पग आगे चलते हुए तय करलिया कि अबसे उसका हर कार्य हिन्दी मेँ होगा ।
गाँधीजी बारबार कहते थे
कंग्रेस को ताकतवर बनाना हे तो हिन्दी भाषा मेँ कार्य करेँ ज्यादा से ज्यादा लोग आपसे जुडेगेँ ।
यदि विदेशी भाषा को प्राधान्य दिया तो अंग्रेजोँ कि भाँति तुम्हारा भी अंग्रेज साहेब कहकर अनादर किया जायेगा ।

गाँधीजी ने हिन्दी के लिये प्रारम्भिक योगदान दिया परंतु बाद मेँ गाँधीजी कि हिन्दोस्तानी पर हिन्दी साहित्य सम्मिलनी के तत्कालीन सभापति पुरुषोत्तम दास टंडन व गाधिँजी के बीच मतान्तर बढ़गया ।
च्युँकि गान्धीजी हिन्दी के बदले हिन्दोस्तानी पर ज्यादा जोर दे रहे थे पुरुषोत्तम जी ने इसका विरोध किया । श्री टंडन का कहना था

"क्युँकि हिन्दोस्तानी के नामसे कोई भाषा नहीँ और गाँधीजी दो भाषाओँ को आपस मेँ अवैज्ञानिक तौर मिलाकर इसे हिन्दोस्तानी का नाम दे रहे हे ये अग्रणयोग्य नहीँ है । इसतरह से ये दो भाषाओँ की खिचड़ी हो जायेगा जैसे "बादशाह राम" और "मल्लिका ए रघुकुल सीता" !!"

ये सुनकर गाँधीजी को भयंकर दुःख हुआ उन्होने साहित्य सम्मिलनीओँ से बराबर दुरी बना लिया ।
1935 के बाद हिन्दी का और प्रचार प्रसार हुआ....और आज भी लगातार जारी है.....

परंतु आज स्वाधीन भारत मेँ कंग्रेसने हिन्दी से दूरी बनालिया है....

*****1 वर्ष पूर्व चुनाव प्रचार मेँ स्टार प्रचारक कंग्रेसी नेता राहुल गांधी अंग्रेजी मेँ भाषण दे रहे थे संभवतः वे और समुचा कंग्रेस पार्टी महात्मा कि ये उक्ति भूलगये थे कि हिन्दी ही जनभाषा है अंग्रेजी मेँ बोलकर आप साधारण जनता कि दिल नहीँ जीतपायेगेँ सिर्फ काले अंग्रेज बनकर रहजायेगेँ ।
लेकिन ये बात याद थी वड़ोदरा मेँ जन्मे नरेन्द्र मोदी जी को
उन्होने प्रायः सभी प्रचार अभियान मे हिन्दी भाषा मेँ चुनाव प्रचार किया और फल आपके सामने है ।
आज नरेद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हे और संभवतः आगे भी रहेगेँ परंतु कंग्रेस को क्या मिला भारतीय भाषा सभ्यता संस्कृति को छोड़कर सिबाय हार के ???
अभी भी वक्त है कंग्रेसी सुधर जाय तो ठिक वरना लोगोँ को इन्हे सुधारना आता है ।

बुधवार, 29 जुलाई 2015

बामण्डा राजा सार् वासुदेव सुढ़लदेव एक संक्षिप्त परिचय प्रथम भाग

ये बर्तमान सम्बलपुर जिल्ला की बामण्डा क्षेत्र मेँ बासुदेवपुर गाँव कि बात है ।
1890 अंग्रेजी साल मेँ 80 वर्ष का एक बृद्ध ,
कन्या पक्ष को 250 रु की लालच देकर के अपना व्याह रचाने जा रहा था ।
जिस कन्या के साथ वो शादी करनेवाला था उसका उम्र केवल मात्र 8 वर्ष था ।
किसी तरह ये बात बामण्डा राजा सार् वासुदेव सुढ़लदेव जी को पताचला ।
वे तुरंत वहाँ पहँचे और उस शादी पर रोक लगाया । यहाँतक कि उस बृद्ध व्यक्ति द्वारा उत्कोच दियेगये धन को कन्यापक्ष को देते हुए
बृद्ध व्यक्ति पर व्यग्यं के बाण चलाते हुए बामण्डा राजा ने कहा

"ये अपने बृद्धावस्ता मेँ शादी का यह मुकुट पहनकर क्या आप निकट भविष्य मेँ आनेवाली उस भयंकर मृत्यु को टाल जायेगेँ ? आप तो महायात्रा के यात्री है फिर ये क्षणीक मोह मेँ भला क्युँ घिरगये ???"
बृद्ध ये सुनकर निर्वाक हो गये लज्जित हो गये ! फिर
1893 मेँ बामण्डा (Sambalpur) राजा सार् बासुदेव सुढ़लदेव जी ने
अपने राज्य मेँ बृद्ध विवाह प्रथा निषिध कि थी !
1903 मेँ एक विज्ञप्ति के जरीये कन्या का सर्वनिम्न 12 वर्ष व वर का 14/15 वर्ष वाली कानुनी घोषणा किया गया था ।

अपने #चिलिका खण्डकाव्य मेँ ओड़िआ कवि राधानाथ राय जी नेँ वासुदेव सुढ़लदेवजी कि प्रशंसा करते हुए लिखते है

"Pahilani ghora taamsi jaamini
phutiba utkal bhasa kamalini
a ghora jamini abasaan sansi
kabyatara rupe bira
gangabansi
udile prathame
bamanda raajana
basudeb biswa kalyanbhajana "

वे एक परोपकारी राजा तथा ओड़िआ भाषा को अन्धकार से उजाले कि और ले जानेवाले प्रभावशाली कवि थे !
उन्होने हीँ परवर्ती साहित्य साधकोँ के लिये सारस्वत साधना हेतु प्रेरित किया था ।
नशीले द्रव्योँ पर उन्होने संबलपुर क्षेत्रमेँ निषेधाज्ञा लगया था । कम्भु खाँ नामसे एक कनेष्टस ने राज आदेश अवज्ञा की तो कार्य से निलम्बित किया गया तथा उसके खिलाफ संबलपुर हितैषिणी मेँ खास लेख छपाया गया था ।
ये संबादपत्र को कुछ आलोचक राजा जी का मानस पुत्र बताते है समाज को चीरजाग्रत करना था इसका परमोद्देश्य ।
सतीदाह प्रथा , कुलिप्रथा या दासत्वप्रथा , छृआँछुँत व जातपात जैसे सामाजिक व्याधी उन्मुलन के लिये बामण्डा राजा ने प्रयत्न किया था ।
उन दिनोँ दासत्वप्रथा के चपेट मेँ फाँसकर लोगोँ को सुदूर आसाम भेजदियाजाता था । सुढ़ळदेव वासुदेव जी ने पल्टिकाल एजेँटोँ से दासत्व प्रथा बंद कराने के लिये मजबुर करदिया ।
ख्रीस्तियन धर्मप्रचारक P.E. Heberlet का हिन्दुधर्म के प्रति भ्रान्त धारणाओँ का तिव्र समालोचना व खण्डन करते हुए उनकी सोच बदलने मेँ कामियाब हुए थे । उनदिनोँ उत्कल दिपिका पत्रिका मेँ ये लेख अंग्रेजी व ओड़िआ मेँ छपा था ।
बाद मेँ हेवर्लेट ने क्षमा याचना कि तो राजा ने उन्हे माफ करदिया था ।
मरहट्ट व अंग्रेजी राज काल मे संबलपुर क्षेत्र ओड़िआ माषा कम हिन्दी भाषा पर ज्यादा निर्भर करने लगा ।
वासुदेव सुढ़लदेव जी के चैष्टा के वजह से संबलपुर प्रान्त मेँ आज कुछ लोगोँ छोड़दिया जाय तो अधिकाँश लोग ओड़िआ भाषा समझते है ।

1872 मेँ राजा ने बामण्डा मेँ पहला विद्यालय कि स्थापना की थी और 1894 तक यहाँ 13 विद्यालय खुलचुके थे ।
1895 संबलपुर मेँ हिन्दी के बदले ओड़िआ को राजभाषा का दर्जा मिला तब मध्य ओड़िशा मेँ हर राजकाज अंग्रेजी हिन्दी मे हो रहा था ।

व्यासकवि फकीर मोहन सेनापति जी ने वासुदेव सुढ़ल देव जी के प्रंशसा मेँ "Abasara baasare" काव्य मेँ लिखा है

Bhasa joge chinna chinna thila ae utkal
bandhila aekata sutre tume hin kebal
kalpalata sammilani utkal desha re
prathama re uptabija tumbha hrudaya re
tumhara patrika labhiachi
uchastana
tumbhe aeka karijaan kabi nku sammana !

[[भावार्थ]]

भाषा आधार पर खण्ड खण्ड था ये उत्कल
बांधा एकता के सुत्र मेँ तुमने हीँ केवल

कल्पलता सम्मिलनी उत्कल देशे मे
प्रथम अंकुरोद्गम हुआ तुमरे मन मेँ
तुम्हारी पत्रिका को मिला सबसे उँचास्थान
तुम्हे ही जानते हो कैसे होता है कविका सम्मान ।

सम्बलपुर हितैषिणी के सँपादक विद्यारत्न द्वारा गढ़ागया गंजाम सम्मिलनी आगे चलकर उत्कल सम्मिलनी नामधारण पूर्वक ओड़िआ भाषा संस्कार रक्षक बनकर उभरता है ।

क्रमशः.....