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मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

प्यारे पापा

((अमरीका मैं एक निहायत ही बिगडैल लडका अपने पिता को एक चिट्ठी लिखता है.....))

प्यारे पापा,

मैं बहुत ही अफसोस और दुख के साथ आपको खत लिख रहा हूं ।
मुझे अपनी नई प्रेमिका के साथ भागना पड़ा, क्योंकि मैं माँ ओर आपके साथ वहश से बचना चाहता था .....
अब
मैं स्टेसी के साथ जीवन कि असली जुनून
का अनीभव कर रहा हूं,
और वह बहुत अच्छी है हालांकि, मुझे पता था कि आप उसके रंगढंग, टैटू व तंग मोटरसाइकिल कपड़े की वजह से उसे पसंद नहीं करेंगे ।
इसके अलावा भी, वह मेरे से बहुत बडी उम्र कि है.....

लेकिन पिताजी !!! आपको मैं बता दुँ
यह मेरा केवल जुनून नहीं है ।
वह गर्भवती है !!!!!!!!
स्टेसी ने कहा कि हम बहुत खुश होंगे !!!!
वह जंगल में एक ट्रेलर का मालिक है और शर्दीओं के छुट्टी को हम वहीं साथ बिताएगें....

आजकल हम दोनों
कई बच्चों के होने का एक सपना भी देख रहे है....

स्टेसी ने मेरी आँखें खोल दी है कि मारिजुआना वास्तव में किसी को चोट नहीं पहुँचाता है हम इसे खुद के लिए ओर बढा़ रहे है.....
पिछले दिनों हमने कोकेन का लत लगाया है
इससे हमारी इच्छाओं को नयी उडान मिलती है....

इस बीच, हम प्रार्थना करेंगे कि विज्ञान एड्स के लिए इलाज ढुंढ लें,
च्युंकि विचारी  स्टेसी को मैं खोना नहीं चाहता....
च्यूंकि इससे भी बेहतर हो सकता है हम ऐसे यकीन रखने के  हकदार है !

चिंता मत किजिएगा  पिताजी मैं 15 साल का हूँ, और मुझे अपना खखाल रखना आता है ।
किसी दिन, मुझे यकीन है कि हम वापस जाएँगे, ताकि आप अपने कई नाती-पोतों को जान सकें......

स्नेह.....
यहोशू

Ps. - पिताजी, उपरोक्त में से कोई भी बात सत्य नहीं है। मैं जेसन के घर पर हूँ मैं आपको याद दिलाना चाहता था कि रसोई की मेज पर स्कूल की रिपोर्ट की तुलना में जीवन में और भी बदतर चीजें हैं ।
आपको जब ठिक लगे कॉल किजिएगा मैं घर लौट आउगाँ.....

😀😀😀😁😂😂😂😂😂😀😀😁😂😂😂

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

●●●●खुनी शनिवार~संघाई बेबी●●●●

शीर्षक: खूनी शनिवार, शंघाई, चीन, 1937

यह चित्र सबसे प्रभावशाली तस्वीरों में से एक है ।
1935 के बाद से ही
जापान ,चीन ओर अन्य एसिआई देशों में खुलेआम बमबारी और अपना धाक मजबुत करने में जुटा हुआ था....

जापान के हमलावरों ने शनिवार, 28 अगस्त, 1 9 37 को दिन के बीच में शंघाई पर हमला करने के बाद यह तस्वीर ली गई थी ।

बम एक रेलवे स्टेशन पर गिराए गए थे जहां जापानी शरणार्थी ठहरे हुए थे ।

तस्वीर को बम गिरने के कुछ मिनट बाद लिया गया ।
चीनी फोटोग्राफर एच.एस. वोंग ने यह फोटो लिया था ।
उन्होंने एकबार उस दिन के घटना को याद करते हुए
कहा था
"वह बडे भयानक दिन थे ।
हमसब डरे हुए थे
इंसान जैसे लाश बनगये थे
हमें खुदको बचाने के लिए लाशों को लांघकर भी जाना होता था....उस दिन मेरे जूते खून से भिगो गए थे।"

वोंग ने अकेले बच्चे को अकेले में मृत मां  के साथ रेल पटरियों पर देखा उसने बच्चे को मदद करने के लिए जाने से पहले तस्वीरें लीं, जो जल्द ही उनके पिता ने ले लिया था ।

चीनी प्रेस से जारी की गई इस तरह के कई तस्वीरों ने विदेशों में नाजीवाद कि बर्बरता को जगजाहिर करदिया था.....

द ब्लडी सटरडे(शंघाई बेबी) फोटो ने लोगों में  सहानुभूति और और नाजीवाद फासीवाद के खिलाफ उनके रुख बदले....क्योंकि यह हर प्रमुख समाचार स्थल पर जारी किया गया था और भी जनजागरण बढा था ।

शंघाई बच्चे ने देश को चौंका दिया, और युद्ध की निंदा जापान पर टूट गई ।

यह तस्वीर तबाही, मौत और दुःख को दिखाता है कि युद्ध कितना भयावह होता है .....

शनिवार, 4 मार्च 2017

निशाचर जिंदावाद

संस्कृत में एक कहावत है

"या निशा सर्वभूतानाम्
तस्मात् जाग्रति संयमीः ।"

प्राचीनकाल मे अपने परिवार तथा जनवस्ती को हिंस्रजन्तुओं से रक्षा करनेवालों के लिए.....
घर के पालतू कुत्तों के लिए
तथा निरंतर तप करनेवाले मुनि ऋषिओं के लिए संभवतः ऐसे कहावत प्रचलन मे आया हो ...

आजकल इंटरनेट के जमाने मे यह कहावत काफी हद् तक अर्थहीन हो गया है
परंतु आज भी इस कहावत को जीवित रखने को कुछ लोग व जीव यत्नवान है....

कुत्ते तो पिछले ७०००० साल से इंसानो के साथ है ही
उल्लु व चमकादड भी रात्रीको ही खाद्य अन्वेषण मे लगे रहते है । उनके लिए
दिन के अपेक्षा रात कहीं अधिक
सुरक्षित होता है ।

मानवों में गरीब मजदुर लोग नाइट सिफ्ट करते समय सयंम बरतते है
निद्रा के लिए मशीन तोड फोड नहीं देते.....
इसलिए #निशाचर प्राणिओं का सत्कार होना चाहिए
च्युंकि इन्होने जीवों कि उस आदिम संस्कृति को आज भी जीवित रखा हुआ है
है कि नहीं 😂😂😂😂😂
जय निशाचर जय हो 😉😉

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

सुवर्णरेखा नदी उत्पति जनसृति

अयोध्या के सूर्यवंशी राजा इक्ष्वाकु के एक पुत्र निमि ने विदेह/मिथिला जनपद मे अपना राज्य स्थापित किया,इसकी राजधानी तब जयन्तनगर हुआ करता था ।
निमि कि उपाधी विदेह थी इसलिए इस क्षेत्र का नाम कालान्तर मे विदेह रखागया ।
परवर्त्तीकाल मे इसी वंश मे मिथि नामक शक्तिशाली राजपुरुष का आविर्भाव हुआ । वह इतने दयालु प्रजापालक राजा थे कि जनता  उन्हे जनक,बापु पिता मानने लगी....
इससे विदेह नरेश को नुतन उपनाम प्राप्त हुआ #जनक तथा यह क्षेत्र मिथिला भी कहलाया.....
आनेवाले कई पीढीओं ने इसी जनक उपनाम को ही स्वयं का उपाधी बनाए रखा.....
विदेह के जनकों मे कुछ बडे प्रतापी
और यशस्वी हुए ।
त्रेतया युग मे श्रीराम के समय विदेह में #सीरध्वज जनक का राज था...
माता श्रीलक्ष्मी ने इन्ही के यहाँ देवी सीताजी के रुप मे जन्म लिया था...

सीताजी के जन्म को लेकर कथा है कि उन्हे भूमि मे हल जोतकर
जनक सीरध्वज ने एक पेटी मे पाया था । हल को मैथिली मे सीत कहते है इसलिए उनका नाम सीता रखागया.....
इसी कथा के साथ
झाडखंड के
पिसाक नगरी से जन्मीं सूवर्णरेखा नदी कि उत्पति प्रसंग जुडा जाता है...

जनसृति है कि एकबार जब विदेह मगध कोशल अंग आदि भूभागों मे भयानक अकाल पडा....
तब
राजर्षी जनक को उनके कुलगुरु ने एक परिष्कृत भूमि पर हल जोतने को कहा....
वह पिसाक नगरी मे आये उन्होने यहाँ हल चलाया जिससे एक तरफ सीताजी आविर्भूत हुई वहीं दुसरी ओर जल कि एक धार निकला जिससे समुचे क्षेत्र मे अकाल से लोगों को राहत मिला....
सूवर्णरेखा नदी का जन्म च्युंकि श्रीलक्ष्मी के साथ हुआ था इसलिए इसके वालु कणों मे आज भी सोना मिलता है.....
सूवर्णरेखा का एक नाम हिरण्यरेखा भी है...
हिरण्यभूम क्षेत्र मे प्रवाहित होने के कारण ऐसा नामकरण हुआ माना जाता है.....

महानदी तो मरने ही वाली है लेकिन सुवर्णरेखा को इंसानों ने धीरे धीरे मरने के लिए "स्लो पॉएजन" दे दिया है...

मानव एक समय नदीओं को माता कहकर उनकी पूजा किया करते थे
आज वही उनके मौत के मुख्य सुत्रधार बने है.....

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

बंगाली साहित्यकार बुद्धीजीवीओं ओडिआ भाषा को मार देने का षडयन्त्र रचा था..........

1866 अकाल तथा अंग्रेजी आक्रोश को झेल रहे ओडिआ लोगों के खिलाफ उनके अपने ही पडोशी भाईओं ने षडयन्त्र रचे थे....

Odia भाषा का कत्ल करदेना ...
यही उनका असली मसद था....

कान्तिलाल भटाचार्य ने इसकी नींव
यह कहते हुए रख दिया....

"ओडिआ ऐक् स्वतंत्रो भाषा नोय्,
इटा बांग्लादेर एकटा उपभाषा"

इसी विषय पर एक किताब भी छपा
Archive .com मे एक किताब इसी नामसे बंगाली मे उपलब्ध है....

राजेन्द्र लाल मित्र ....
पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ओडिशा के प्रत्नतत्व पर गहन शोध किया और इसपर अपना किताब भी लिखडाला....

उन्होने
एकबार कहा था....

"जबतक ओडिआ भाषा विलुप्त नहीं हो जाती ओडिआओं का विकाश असम्भव है"

उमाचरण हलदार बाबु को बंगाल ओडिशा एकत्रीकरण मे खास रुची थी
वह चाहते थे इस एकता हेतु उत्कलीय-ओडिआ लिपि कि बली चढादिया जाय.....

उनका बयान था
ओडिआ को बंगाली लिपि मे लिखा जाय.....
ज्ञात रहे बंगालीओं का बर्तमान लिपि কখগঘঙচছ मात्र 200 साल पुराना है....
इन लोगों ने उत्कलीय-ओडिआ लिपि से काफी हदतक मिलता जुलता अपना प्राचीन लिपि त्याग दिया था....
अब वो चाहते थे हम भी वैसा करें.....

राजाकृष्ण मुखोपाध्याय....महाराज ने तो यहाँ तक कहदिया था कि
समुचे बंगाल मे बंगाली को ही केवल मात्र शिक्षा क्षेत्र मे अग्राधिकार मिले
और बाकी ओडिआ विहारी भाषाएं जाएं तेल लेने.......

20 फरवरी 2014 मे ଓଡିଆ ओडिआ भाषा को शास्त्रीय मान्यता साबित करता है....
यह
सच्चाई....
1.*बंगाली खुद कई उपभाषाओं को इकट्ठा करके बनाया गया एक भाषा है
ओडिआ इसके उपरी भाषाओं मे से एक है.....
2.*ओडिआ आर्य भाषाओं मे संस्कृत के बाद सबसे अधिक शास्त्रीय तथा 6 भारतीय मौलिक भाषाओं मे से एक है...

3.*इस भाषा को राष्ट्रिय स्तर के शिक्षण संस्थानो़ मे भी पढाया जाय....
इसको सभी सरकारी कार्यालयों मे लागु किया जाय......

(डॉ. देवाशीश जेठी जी के वाल से.....)

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

दारुल ईस्लाम कि सच्चाई

-क्या कोई मुस्लिम जिसनें दारुल इस्लाम के लिए लाखों हिंदुओ का क़त्ल किया हो, क्या वो मरने के बाद हिंदुओ की मन्नतें पूरी करेगा"

सैयद सालार गाज़ी की क़ब्र के सामने हिंदुओ का माथा टेकना उन लाखों हिन्दू वीर योद्धाओं के साथ धौखा होगा जिन्होंने उस गाज़ी से लड़ते हुए अपने प्राण त्याग दिए,

आज के हिंदुओं का गाज़ी के सामने सर झुकाना उन लाखों माँओं के साथ विश्वासघात होगा जिन माँओं ने गाज़ी को रोकने के लिए अपने लाल खोए, उन अर्धांगिनियों के साथ विश्वासघात होगा जिन्होंने उस गाज़ी से लड़ने के लिये अपना सिंदूर उजाड़ा ।

लाखों हिंदुओ को मारने वाले गाज़ी के सामने सर झुकाने से बेहतर, मैं शमसान घाट की उन आत्मा के सामने सर झुकाना बेहतर समझूँगा जिसनें अपने जीवन में किसी का क़त्ल नही किया हो,

आप सभी क्या जानते हो "सैयद सालार गाज़ी" के बारे में कौन था वो, तो सुनों मैं आपको उसकी सच्चाई बताता हूँ

"आप सभी महमूद गज़नवी (गज़नी) के बारे में तो जानते ही होंगे, वही मुस्लिम आक्रांता जिसने सोमनाथ पर 17 बार हमला किया और भारी मात्रा में सोना हीरे-जवाहरात आदि लूट कर ले गया था।

महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर आखिरी बार सन् 1024 में हमला किया था तथा उसने व्यक्तिगत रूप से सामने खड़े होकर शिवलिंग के टुकड़े-टुकड़े किये और उन टुकड़ों को अफ़गानिस्तान के गज़नी शहर की जामा मस्जिद की सीढ़ियों में सन् 1026 में भी लगवाया।

उसी लुटेरे महमूद गजनवी का ही भांजा था सैयद सालार मसूद उर्फ़ आपका गाज़ी बाबा,
यह बड़ी भारी सेना लेकर सन् 1031 में भारत आया। सैयद सालार मसूद उर्फ़ गाज़ी बाबा एक सनकी किस्म का धर्मान्ध इस्लामिक आक्रान्ता था।

महमूद गजनवी तो सिर्फ़ लूटने के लिये भारत आता था,
लेकिन सैयद सालार मसूद उर्फ़ गाज़ी बाबा भारत में विशाल सेना लेकर आया था उसका मक़सद भारतभूमि को “दारुल-इस्लाम” बनाकर रहना था, और इस्लाम का प्रचार पूरे भारत में करना था जाहिर है कि तलवार के बल पर।

सैयद सालार मसूद अपनी सेना को लेकर “हिन्दुकुश” पर्वतमाला को पार करके पाकिस्तान (आज के) के पंजाब में पहुँचा, जहाँ उसे पहले हिन्दू राजा आनन्द पाल शाही का सामना करना पड़ा, जिसका उसने आसानी से सफ़ाया कर दिया।

मसूद के बढ़ते कदमों को रोकने के लिये सियालकोट के राजा अर्जुन सिंह ने भी आनन्द पाल की मदद की लेकिन इतनी विशाल सेना के आगे वे बेबस रहे। मसूद धीरे-धीरे आगे बढ़ते-बढ़ते राजपूताना और मालवा प्रांत में पहुँचा, जहाँ राजा महिपाल तोमर से उसका मुकाबला हुआ, और उसे भी मसूद ने अपनी सैनिक ताकत से हराया। एक तरह से यह भारत के विरुद्ध पहला जेहाद ही युद्ध था जो भारत को इस्लामिक मुल्क़ बनाने के लिए हुआ था। सैयद सालार मसूद सिर्फ़ लूटने की नीयत से भारत नही आया था बल्कि बसने राज्य करने और इस्लाम को फ़ैलाने का उद्देश्य लेकर भारत आया था।

पंजाब से लेकर उत्तरप्रदेश के गांगेय इलाके को रौंदते, लूटते, हत्यायें-बलात्कार करते सैयद सालार मसूद अयोध्या के नज़दीक स्थित बहराइच पहुँचा, जहाँ उसका इरादा एक सेना की छावनी और राजधानी बनाने का था। इस दौरान इस्लाम के प्रति उसकी सेवाओं को देखते हुए उसे “गाज़ी बाबा” की उपाधि दी गई।

इस मोड़ पर आकर भारत के इतिहास में एक विलक्षण घटना घटित हुई, ज़ाहिर है कि इतिहास की पुस्तकों में जिसका कहीं जिक्र नहीं किया गया है।

इस्लामी खतरे को देखते हुए पहली बार भारत के उत्तरी इलाके के हिन्दू राजाओं ने एक विशाल गठबन्धन बनाया, जिसमें लगभग 20 राजा अपनी सेना सहित शामिल हुए और उनकी संगठित संख्या सैयद सालार मसूद की विशाल सेना से भी ज्यादा हो गई।

जैसी कि हिन्दुओ की परम्परा रही है, सभी राजाओं के इस गठबन्धन ने सालार मसूद के पास संदेश भिजवाया कि यह पवित्र धरती हमारी है और वह अपनी सेना के साथ चुपचाप भारत छोड़कर निकल जाये लेकिन सालार मसूद ने माँग ठुकरा दी उसके बाद ऐतिहासिक बहराइच का युद्ध हुआ, जिसमें संगठित हिन्दुओं की सेना ने सैयद मसूद की सेना को धूल चटा दी।

इस भयानक युद्ध के बारे में इस्लामी विद्वान शेख अब्दुर रहमान चिश्ती की पुस्तक मीर-उल-मसूरी में विस्तार से वर्णन किया गया है। उन्होंने लिखा है कि मसूद सन् 1033 में बहराइच पहुँचा, तब तक हिन्दू राजा संगठित होना शुरु हो चुके थे।

यह भीषण रक्तपात वाला युद्ध मई-जून 1033 में लड़ा गया। युद्ध इतना भीषण था कि सैयद सालार मसूद के किसी भी सैनिक को जीवित नहीं जाने दिया गया, यहाँ तक कि युद्ध बंदियों को भी मार डाला गया… मसूद का समूचे भारत को इस्लामी रंग में रंगने का सपना अधूरा ही रह गया।

बहराइच का यह युद्ध 14 जून 1033 को समाप्त हुआ।

जब फ़िरोज़शाह तुगलक बहराइच आया और मसूद के बारे में जानकारी पाकर वह बहुत प्रभावित हुआ और उसने उसकी कब्र को एक विशाल दरगाह और गुम्बज का रूप देकर सैयद सालार मसूद को “एक धर्मात्मा” के रूप में प्रचारित करना शुरु किया, एक ऐसा इस्लामी धर्मात्मा जो भारत में इस्लाम का प्रचार करने आया था।

मेरे हिन्दु भाईओं
इस इस्लामिक आक्रांता के आगे आप सभी माथा टेकते हो, जिसने अपने जीवित रहते हुए लाखों हिंदुओ को मारा हो क्या वो मरने के बाद हिन्दुओँ की मनोकामनाएं पूरी करेगा,
किसी के सामने सर झुकाने से पहले उसके इतिहास और चरित्र को तो जान लो फिर उसे सम्मान दो, जो भारतभूमि में भारत को सम्मान नही देता और हिन्दू धर्म को सम्मान नही देता, मैं उनके सामने अपना सर नही झुकाता।
ऐसे पापी अधमों के आगे आप भी माथा न झुकाओ अन्यथा अपने पूर्वजों का अनजाने में हीं अपमान कर बैठेगें ।

मेरी आत्मकथा-पुष्प कि आत्मकथा

जी हाँ, मैं पुष्प हूँ -पुष्प! प्रकृति माँ का सब से सुकुमार, कोमल, भावुक और सुन्दर बेटा- पुष्प! उपवन मेरा घर है । हवा मेरी सहचर है । मेरी सुगंध का अदृश्य, कोमल, विस्तृत चारों ओर फैला हुआ मेरा संसार है । ऐसा संसार, जिस में आकर कोई भी मनुष्य भाव से भर कर आनन्द से मस्त हुए बिना नहीं रह पाता । यह कहे बिना भी नहीं रह पाता कि बड़े सुगन्धित पुष्प खिले हैं यहाँ! जी हाँ, ऐसा ही महक और मादकता भरा है मुझ पुष्प का संसार । उतना ‘ ही सुन्दर और .मुक्त भी'। मैं सुन्दरता का साकार रूप हूँ । अपनी सुन्दरता से सारे वातावरण को तो सुन्दर बना ही देता हूँ उसकी चर्चा भी दूर-दूर तक फैला दिया करता हूँ! जी हाँ, मुझे छू कर मेरी सुगंध को अपने अदृश्य पंखों में भर कर यह छलिया पवन दूर-दूर तक मेरी सुन्दरता और सुगंध का ढिंढोरा पीट आया करता है तब लोग मेरी तरफ भागे आते हैं । मुझे तोड़ कर ले जाते हैं । कोई गुलदस्ते में सजा कर अपने घर की शोभा बढ़ाता है, तो कोई हार में पिरो कर मुझे अपने गले का हार बना लिया करता है । कभी मैं गजरा बन कर किसी सुन्दरी के जूड़े पर धर कर उसकी सुन्दरता में चान्दनी भर देता हूँ तो कभी अकेला ही बालों में टाँगा जा कर सभी का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच लिया करता हूँ । कई बार सुन्दरियों के कानों में झूलकर उन के गोरे कोमल गालों को चूम लेने का सौभाग्य भी पा लिया करता हूँ । भगवान् के भक्त और पुजारी मुझे भगवान् के चरणों पर चढ़ा कर आनन्द पाते हैं, तो निराश प्रेमी अपनी प्रेमी- प्रेमिकाओं के मजासे पर अर्पित कर एक तरह की शान्ति प्राप्त करते हैं । कई बार मुझे गुलदस्ते या हार के रूप में विशिष्ट लोगों को भेंट में भी दिया जाता है । अरे हाँ, मुझे ‘एक भारतीय आत्मा’ नामक क्रान्तिकारी कवि की वे पंक्तियाँ आज तक याद हैं, कि जो मुझे देखकर, मेरी भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए उसके होंठों पर मचल उठी थीं; ''मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर तुम देना फेंक; मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक !''लेकिन ऐसा मान-सम्मान और प्रशंसा-गान मुझे ऐसे ही प्राप्त नहीं हो गया । इसके लिए मुझे बीज के रूप में कई दिनों तक धरती माँ की माटी भरी गोद में घुटती साँसों के साथ बन्द रहना पड़ा है । आप अनुमान नहीं लगा सकते, उस पल अपने साँसों को घुटते और तन को गलते-सड़ते देखकर तब मेरे मन पर क्या बीता करती थी । उस पर सूर्य की किरणें जब ऊपर से धरती को गर्मा और झुलसा दिया करतीं, तब धरती के भीतर भी कई बार पसीने से तर होकर दम और भी घुटने लगता । तब अचानक. कहीं से पानी की कोई धार आकर उस गर्मी से तो राहत पहुँचाती; पर सड-गल रहे तन की रक्षा उस से भी न हो पाती । कई बार किसी खाद के कडुवे-कसैले स्वाद भी चखने पडते, कई बार कड़बी-तीखी दवाइयाँ निगलकर मितली-सी भी आने लगती । कई बार ऐसा भी हुआ, माली या किसान की गुड़ाई ने मिट्टी के साथ-साथ मेरे तन-मन को भी उलट-पलट कर रख दिया । इस प्रकार की स्थितियों का सामना करते समय मन में क्या गुजरती है न तो वह सब बता पाना ही सभव है और न उस सब का आप अनुमान ही लगा सकते हैं । लेकिन यह क्या? एक दिन मैंने अपने -सडगल चुके शरीर में धरती माँ के आशीर्वाद से एक नया जोश, नया उत्साह अंगड़ाईयाँ लेते हुए अनुभव किया । मुझे लगा कि मैं अपने अंगों का विस्तार-फैलाव करते हुए धरती माँ से उछलकर उसकी गोद में आ रहा हूँ । मैंने माली से लगने वाले आदमी को किसी से कहते हुए सुना-बड़े सुन्दर अंकुर फूट रहे हैं इस बार तो । तो मुझे समझ आया कि जैसे मेरा नाम ‘अंकुर’ है । वह एक जन्म-नाम हुआ करता है न, वैसा ही कुछ मेरा भी था । कुछ दिन और बीतने पर उस आदमी के मुँह से फिर सुनाई पड़ा-'कितना बढ़िया है यह पौधा ।'बस, मैंने समझा कि मैं अंकुर नहीं, पौधा हूँ -पौधा । अब वह आदमी मेरा बडे ध्यान रखने लगा । ठीक समय पर पानी तो पिलाता ही, कुछ खाद-सी भी दो-एक बार डाल गया । बड़े ध्यान और सावधानी से निराई-गुड़ाई कर के उग आई फालतू घास, खरपतवार आदि को निकाल देता । इस प्रकार पौधे के रूप में लगातार बड़ा होता गया । एक दिन मैंने अपने ऊपरी पोरों में कुछ गाँठें-सी पड़ने का अनुभव किया । बस, चिन्ता में पड़ गया कि यह नई मुसीबत कौन-सी आने वाली है? अपने इस प्रश्न का उत्तर अभी प्राप्त भी नहीं कर पाया था कि एक बार मैंने उन गाँठों के धीरे-धीरे चटकने की आवाजें सुनी । 'हाय राम! यह क्या होने जा रहा है?'मैं चौक गया; लेकिन किसी के आने की आहट पा कर कुछ बोला नहीं, बस चुपचाप देखने लगा । देखा कुछ क्षण बाद वह आहट मेरे पास आकर रुक गई है । आने वाला मेरा रखवाला माली ही था । वह मेरी दशा देख कर मुस्करा उठा और लगातार मुस्कराता गया । फिर होंठों- हीं-होंठों में बोला-'सुबह तक ये कलियाँ (गाँठें) अवश्य ही खिल कर मुस्कराता फूल बन जाएँगी । 'फूल!'एक बार मैं फिर चौंक पड़ा । पहले बीज, फिर अंकुर उसके बाद पौधा, फिर वे गाँठें- सी चटकती हुईं और अब फूल? पता नहीं क्या-क्या बनना है अभी मुझे? लेकिन तब तक रात ढल आई थी, सो वह माली चला गया । मेरी चिन्ता कम नहीं हुई । रात भर चिन्ता में डूबा रहा । जैसे ही प्रभात काल की मन्द पवन का झोंका आया, उसका मधुर-कोमल स्पर्श पाकर मैं पूरी तरह से खिलकर जैसे अपनी ही सुगन्ध से नहा उठा । पवन के और झोंके आकर मुझे लोरियाँ देने लगे-देते रहे लगातार । जी हाँ , अब मैं खिलकर पुष्प जो बन चुका था । जी, बस इतनी सी ही है मेरी आत्म-कथा!

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

*महानदी जलविवाद*

#महानदी का #जन्म छतिशगड मे मगर #यौवन व #महासंगम ओडिशा में हुआ है । कभी #चित्रोत्पला के नामसे विख्यात रही यह नदी  लगभग 851 कि.मी लम्बा है जिसमें से केवल 286 km. छतिशगड में आता है ।

ओडिशा के पास ओर भी नदीआँ है लेकिन छतिसगड के पास सिर्फ महानदी ।
छतिसगड के 58.48% जलश्रोत महानदी ओर उसकी शाखा नदीओं के जल ही है ! 1948 में हिराकुद जैसे विशाल #डैम (25√किमी.) बनते समय #मध्यप्रदेश के हजारों लोग जो कि #ओडिआ ही थे को अपना भूमि गवाँना पडा था । आज हिराकुद के 87% हिस्सा छतिशगड में है बाकी ओडिशा में .........

#मध्यप्रदेश छतिसगड सरकार ने कई
बार #हिराकुद से लाभ लेना चाहा लेकिन ओडिशा सरकार ने होने नहीं दिया ......। ज्यादातर लाभ ओडिआओं को ही मिलता रहा ....छतिसगड का पानी ओडिआ लोग पिइते नहाते इंडस्ट्रिल युज करते रहे.......
छतिसगड बेचार ठगा सा वर्षौं मूकदर्शक बनारहा .....

छतिशगड नें महानदी व उसके शाखा नदीओं पर जब बांध बनाने लगा तब #bjd के #कुम्भकर्ण नेताओं कि #निद्रा भंग हुई । वो चिल्लाने लगे ....
लो जी हमें तो बताए ही नहीं ........
#छतिशगड बेवफा है 😂😂😂😂😂
इटिसी......

छतिसगड ने वाकायदा एक विदेशी संस्था #प्राइस वाटर हाउस को द्वारा पहले तो सर्वे किया फिर चतुरता के साथ बडे बांध के वजाय छोटे व मध्यम प्रकल्प लगाया लेकिन ये सब चोरीछिपे नहीं हुआ था । इसका कोई सबुत नहीं कि छतिसगड ने बांध बनवाके #सर्जिकल_स्ट्राइक करदिया हो ओर किसीको पता न चला.......
15 साल पहले प्रारम्भ किएगये तथा
90% काम पुरा हो चुके जलपरियोजनाओं पर #अंतिम अवस्था मे चिल्लाने से #छतिसगड CM का #पुतला जलाने से अब कछ्छु होनेवाला है नहीं........

#ओडिशावालों के पास 2 रास्ते है ....महानदी को बचने के लिये #फ्रिडेलकास्त्रो ......#चे_गुवारा टाइप #विद्रोह करो .........अपना दुजों का घर जलाओ ...... #उत्तरभारतीयों को ढुंढ के भगा भगा के मारो ..... #भारत से अलग हो जाओ

या ,,,,,,,

महानदी के शव को #दानामाझीं के तरह अपने #कन्धों पर ढोने को तैयार हो जाओ........

मुझे पता है ...

पहलावाला अप्सन तुमसे होने से रहा ,,,,,,

तो महानदी के #शवयात्रा में सामिल होने को तैयार रहो........

क्षेत्रवादी कौन ?

#क्षेत्रवादी हमेशा #northeast #eastindian #southindia के लोग ही क्युँ होते है ?.....

क्या सिर्फ उत्तरभारतीय ही सच्चे देशभक्त तथा असली भारतीय है ?

1.
एक पढेलिखे उत्तरभारतीय को भी इन तिनों क्षेत्र के बारे में कम ही पता होता है.....

जबकी किसी तामिलभाषी..बंगाली या.ओडिआ को पुछकर देखिए उत्तरभारत के बारे मे उनसे ज्यादे ही बता देगें ...कमसे कम हमें पता होता है lakhnow युपी का विहार का पटना,भोपाल एम्पी की राजधानी है ......उत्तरभारतीयों को पुछलिजिए ओडिशा कहाँ है जी कहेगें उ केरल कै पास न भैया ...हम गये थे भैया घुमने बहुतै नारियल का पैड होता है उहाँ 😁😁😁

2.
उत्तर भारतीय हमारे भाषाओं को नहीं सिखते उन्हें ऐसी वाहियात भाषाओं को वोलते हुए भी कोई मिलगया न अपने 36 दान्त दिखाने से खुदको रोक नहीं पाते......
इधर हमारे यहाँ के देशद्रोही लोग उनके भाषाओं को भी समझलेते है और ना सिर्फ समझते है वल्की उनके भाषाको वोलकै गर्व भी अनुभव करते है (जैसे हिन्हीभाषी अंग्रेजी बोलकै स्टाईल मारते है 😂😂) ।.

3.
उत्तरभारतीओं द्वारा लिखेगये पुराणों में
दक्षिणभारतीय राक्षस,
पूर्वभारतीय उत्तरपूर्व के लोग म्लैछ यवन आदिवासी असुर आदि बताए गये है ......
हमने फिर भी उनके पुराणों,तौहार धर्म को अपनाया और यहाँतक कि समुचे विश्व में फैलाया लेकिन उन्हें ये भी नागवार गुजरा उन्होने इसका श्रेय आगस्त्य ऋषि को दे दिया ......


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हिन्दीभाषीओं के स्कुली किताबों में ओडिशा दक्षिणभारत नर्थ इस्ट का इतिहास व जननायकों पर तथ्य नहीं होते ।
नहीं होता उनके किताबों में सुरेन्द्र साए,वक्सी जगबन्धु के बारे में एक लाइन ......
लेकिन हमें पढने को बाध्य किया जाता है रानी लक्ष्मीवाई से लैके चन्द्रगुप्त तक का इतिहास ......

ऐसे सोचने पर कई पोएटं ओर मिलेगें ये प्रुफ करने में कि उत्तरभारतीय ही सच्चे भारतीय है शेष भारत के लोग क्षेत्रवादी जातिवादी विदेशी अनार्य देशद्रोही फलाना ढिमकाना 😏..............

मार्गारेट थार्चर

अपने सोच सम्भालो वो लव्स बनजाएगें......
अपने लव्सों को सम्भालो वो कर्म बनजाएगें......
अपने कर्मों को सम्भालो वो आदत बनजाएगी.....
आदतें सम्भालो वो तुम्हारा चरित्र बनजाएगा......
और चरित्र को सम्भालो क्युँकि ये तुम्हारी तकदीर बनजाएगी.........
हम जो अर्न्तमन से सोचते है बनजाते है.......

●मार्गारेट थ्राचर●

1982 में लातिन अमरिकी
देश अर्जेण्टीना ने #folkland पर अपना कब्जा करलिया....यह प्राय 200 द्वीपों से बना एक ब्रितानी क्षेत्र है । इसके अधिकार को लेकरके ब्रिटेन के साथ आर्जैटिंना का 150 साल से विवाद चल रहा था । दक्षिणी आटलांटिक folkland द्वीप समुहों से ग्रेटब्रिटेन 12000 किलोमिटर दूर है जबकी आर्जेटिंना सिर्फ 500 किमी .....उनदिनों मार्गारेट थार्चर ब्रिटेन कि प्राधानमन्त्री थी .....एक व्यापारी लडकी मार्गेरेट ने युद्ध का राह चुना और आर्जेटिंना अन्ततः हारकर आइलेंड छोडगया ......

मोदी व मार्गेरेट में 2 समानताएँ है

दोनो ही ऐसे ही वक्त पर PM बने जब देश कमजोर हो रहा था....

दोनों ही व्यापारी खानदान से विलोगं करते है
एक दुकानदार कि लडकी
दुजे चायवाला का लडका......