दो बंगाली ऐसे हुए है जिन्हे ओडिशा मेँ अपना बचपन व कौशोरावस्था अतिवाहित कर बाद मेँ अंतराष्ट्रिय प्रसिद्धि मिली थीँ । एक हैँ नेताजी सुभाष चंद्र वोष ! उनके भारत को स्वतंत्र करने के अप्राण उद्यमोँ से अंग्रेजोँ कि फटगई थी उनके बारे मेँ आप सब जानते हि होगेँ ! वहीँ
एक और बंगाली मिहिर सेन ने कटक सहर के बुढ़ीठाकुराणी साहि मेँ अपना बचपन बिताया था व प्राथमिक शिक्षा ओडिशा मेँ पुरी कि थी ।
मिहिर सेन जी के नाम आन्तर्जातीय सिद्धि हे कि उन्होने 27 सेप्टेम्बर 1958 को डोभर् से काले तक तैर कर इंग्लिस चैनेल को पारकरनेवाले पहले भारतीय बनगये थे ।
इसके बाद उन्होने कभी पिछे मुडकर देखा हि नहीँ वे आगे बढ़ते चलेगये । 1966 मेँ मिहिर जी ने पाँच पाँच चैनल्स
[[[ पक् चैनेल्स , ष्ट्रेट्स अफ जिव्रालेटर , ष्ट्रेट अफ डार्डानेलिस् , वसफरस् चैनेल्स और पानामा केनाल ]]]
को तैर कर गिनिज वुक अफ रेकर्डस् मेँ मी नाम दर्ज करदिया था !
वे तो लंडन मेँ बारिष्टरी या लो पढ़नेगये थे , उन्होने कभी यह नहीँ सोचा था कि वे एक दिन इंलिश चैनल पार कर लेगेँ !!
लंडन मेँ पढ़ते समय वे काफी दुर्वल स्वास्थ्य हृ करता था और उनदिनोँ वे अपने अतिरिक्त खर्चा निकालने के लिये भारतीय हाईकमिसन मेँ किराणी कि नौकरी किया करते थे । एकबार उनके मन मेँ इंग्लिस चैनल पार करने का खयाल आया और बाद मेँ नशा बनगया । उन्होने अलग अलग क्षेत्रोँ से आठवार प्रयास किया और विफल हुए । परंतु बारबार विफल होनेपर भी उन्होने इसे जारी रखा और आखिरकार वे 4 साल वाद सफल हुए ।
मिहिर को उनकी युरोपीयन पत्नी Bella Weingarten से लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नहरु जी जैसे कई लोगोँ सहयोग मिला जिससे उन्हे यह सिद्धि लाभ हो पाया था । विदेश से लौटने के बाद मिहिर सेन नेँ कलकत्ता हाईकोर्ट मेँ वकिल के तौर पर जुडे और आखिरकार व्यापार मेँ भी हात आजमाया । उन्होने सिल्क रप्तानी हेतु एक उद्योग शुरु किया और देखते हि देखते यह उद्योग भारत द्वितीय वृहत्तम सिल्क रप्तानीकारी उद्योग बनगया तथा इसे भारत सरकार द्वारा पुरस्कारोँ नवाजा भी गया था । एक सफल व्यवसायी के रुप मेँ उनका जीवन ठिकठाक चल हि रहा था कि राजनीति के दलदल ने उनके बर्वादी तय करदिए । 1977 मेँ पश्चिमबंगाल के वामपंथी नेता जौति वसु नेँ उन्हे अपने दल मेँ सामिल होने का न्यौता दे भेजा ! परंतु वामपंथी चिँताधारा के घोरविरोधी मिहिरजी नेँ इसे ठुकरादिया व उपर से जौति वसु के खिलाफ निर्दलीय उम्मिदवार के रुप मेँ चुनाव मेँ खडे हो गये । वे चुनाव मेँ हारगये और वामपंथीओँ कि जीत हुई । फिर क्या था एक के वाद एक हमले होतेरहे मिहिर सेन पर !!! वामपंथीओँ ने उनके उद्योग का काम ठप्प करवादिया वहाँ रोज धर्मघट होनेलगे । विभिन्न तरिकोँ से सरकारी दवाव पडनेलगा उनपर , उनके व्यवसाय को गैरकानुनी ठहराया गया , उनके नाम से कई झुठे केस दायर कियागया , और आखिरकार उनका व्यापार डुबगया । इन सभी घटनाओँ से अवसादग्रस्त हो वे सिर्फ 50 के उम्र मेँ हि वे Alzheimer's और Parkinsons जैसे रोगोँ का शिकार हो गये !! आखरीदिनोँ मेँ वे वहुत अकेले हो गये थे ,अपनोँ ने तो कब का छोड़दिया था ! कोलकात्ता कि सल्टलेक इलाके मेँ आनेवाला आनन्दालोक हसपिटाल मेँ उनका चिकिस्चा चलरहा था !!! दवादारु मेँ रोज कि 3000.00 खर्चा होता था उनका और केन्द्र सरकार से केवल महिने मेँ 1000.00 हि मिलता था उन्हे !!!
देश समाज दोस्त परिवार सभी नेँ उन्हे ठुकरादिया और आखिरकार इंग्लिस चैनेल को तैरकर जीतनेवाला पहला भारतीय अपने हि देश के भ्रष्ट्र राजनीति से वाजी हारकर 1997 जुन 11 को अलविदा कहगया .....
मेँ अपने मन का दास कलम का कर्मचारी हुँ जो मन मेँ आया लिखदिया । कोई पागल कहे तो मुझे क्या ? कहता है तो कहने दो ।।
ब्लॉग आर्काइव
शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014
सोमवार, 1 दिसंबर 2014
दक्षिण भारतीय स्वतंत्रता संग्रामी वीरापांडिया कट्टावोम्मन
वीरापांडिया कट्टावोम्मा करुथाया
[Veerapandiya Kattabomma Karuthayya Nayakkar] दक्षिणभारत मेँ जन्मेँ स्वतंत्रता संग्रामी हे जिन्होने दक्षिण भारत मेँ सर्वप्रथम अंग्रेजोँ के खिलाफ जंग का ऐलान किया था । वे 18वीँ सदी मेँ Palayakarrar('Polygar') समाज के मुखिया थे और उनका जन्मस्थान Panchalankurichi,TamilNadu मेँ आता हे । उनका परिवार आँध्रप्रदेश राज्य के Kandukur , Prakasam जिल्ला से विजयनगर साम्राज्यकाल के समय तामिलनाडु चलाआया था . वे कट्टावोम्मा नायकर के नाम से भी जानेजाते हे । उन्होने प्रथम स्वतंत्रता से छह दशक पहले ही अंग्रेजोँ को चुनौति दे डाली थी और अंग्रोजोँ के हात पकडे जानेपर उनको सन 1799 CE मेँ फासी दे दिया गया . उनके किल्ला को अंग्रेजोँ के द्वारा ध्वस्त किया गया और उनके संपत्ति को लुटलिया गया । आज उनका जन्मस्थान Panchalankurichi गाँव तामिलनाडु की Thoothukudidistrict मेँ आता है । उनके जीवन पर 1959 मेँ एक दक्षिणभारतीय फिल्म उन्ही के नाम से रिलिज हुआ ! इस फिल्म मेँ Chevalier Sivaji Ganesan जी ने मुख्य भुमिका अदा कि थी और निर्दशन किया था B.R. Panthulu व Nadigar Thilagam जी ने !Sivaji Ganesan जी के करिअर का ये फिल्म सबसे कामियाब फिल्मोँ मेँ से एक हे .
[Veerapandiya Kattabomma Karuthayya Nayakkar] दक्षिणभारत मेँ जन्मेँ स्वतंत्रता संग्रामी हे जिन्होने दक्षिण भारत मेँ सर्वप्रथम अंग्रेजोँ के खिलाफ जंग का ऐलान किया था । वे 18वीँ सदी मेँ Palayakarrar('Polygar') समाज के मुखिया थे और उनका जन्मस्थान Panchalankurichi,TamilNadu मेँ आता हे । उनका परिवार आँध्रप्रदेश राज्य के Kandukur , Prakasam जिल्ला से विजयनगर साम्राज्यकाल के समय तामिलनाडु चलाआया था . वे कट्टावोम्मा नायकर के नाम से भी जानेजाते हे । उन्होने प्रथम स्वतंत्रता से छह दशक पहले ही अंग्रेजोँ को चुनौति दे डाली थी और अंग्रोजोँ के हात पकडे जानेपर उनको सन 1799 CE मेँ फासी दे दिया गया . उनके किल्ला को अंग्रेजोँ के द्वारा ध्वस्त किया गया और उनके संपत्ति को लुटलिया गया । आज उनका जन्मस्थान Panchalankurichi गाँव तामिलनाडु की Thoothukudidistrict मेँ आता है । उनके जीवन पर 1959 मेँ एक दक्षिणभारतीय फिल्म उन्ही के नाम से रिलिज हुआ ! इस फिल्म मेँ Chevalier Sivaji Ganesan जी ने मुख्य भुमिका अदा कि थी और निर्दशन किया था B.R. Panthulu व Nadigar Thilagam जी ने !Sivaji Ganesan जी के करिअर का ये फिल्म सबसे कामियाब फिल्मोँ मेँ से एक हे .
सोमवार, 24 नवंबर 2014
माजुली
माजुली - Mājuli
(Pron: ˈmʌʤʊlɪ)
( Assamese:মাজুলী)
आसाम राज्य के जोरहाट जिले पर ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य मेँ स्थित एक द्वीप है ! इस द्वीप का कुल आयतन कभी 1,250 square kilometres (483 sq mi) था किन्तु कुछ अनिश्चित कारणो से इसका आयतन (2001 मेँ) अब 421.65 square kilometres (163 sq mi) रहगया है . इस द्वीप के एक तरफ ब्रह्मपुत्र नदी और दुसरी तरफ को खेरकुटिया स्कुटि कहाजाता है, ब्रह्मपुत्र नदी कि एक शाखानदी यहाँ से उत्तर मे सुबनसिरि नदी मेँ जाकर मिलता है ! इस द्वीप से निकटतम सहर है जोरहाट जबकि. यह द्वीप गौवाहाटी सहर के पूर्व मेँ 200 किलोमिटर दूर पर आता हे . आसमी भाषा मेँ माजुली का अर्थ है नदी के मध्य मेँ स्थित भुमिखंड । 1661–1696 तक के कालखंड मेँ इस क्षेत्र मेँ हुए लगातार भुकंप हुआ था और ब्रह्मपुत्र नदी के इर्दगिर्द के कुछ भुमि धस्स गये थे । 1750 मेँ 15 दिनोँतक चले बाढ़ मेँ एक ऐतिहासिक घटना बना , ब्रह्मपुत्र नदी ने गतिपथ बदलकर यहाँ दो हिस्सो मेँ बँटकर प्रवाहित होनेलगी और इसतरह माजुली द्वीप प्रकाश मेँ आया । इस द्वीप के पश्चिम मेँ प्रवाहित चैनेल को Burhi Xuti और उत्तर मेँ प्रवाहित चैनेल को Luit Xuti या Kherkutia xuti कहाजाता है !. यहाँ के लोग मानते है कि श्रीकृष्ण अपने दोस्तोँ के संग यहाँ खेलते थे परंतु यह केवल दंतकथा है इसका कोई पौराणिक आधार नहीँ मिलते । माजुली मेँ वैश्णव संप्रदाय का प्रभाव रहा है और स्थानीय लोग अहमीया भाषा मेँ बात करते है । कहाजाता है कि वैश्णव धर्मप्रचारक Srimanta Sankardeva— 16वी सदी मेँ यहाँ -आये थे और कुछ काल बिताया था । उनके द्वारा माजुली मेँ अन्य हिँदु तौहारोँ के साथसाथ रास पर्व पालन कि शुरुवात हुई थी । इस क्षेत्र मेँ अहमिआ भाषा के अलावा #Mising, और #Deori भाषा वोलनेवाले लोग भी रहते है । इस द्वीप कि जनसंख्या कुल 150,000 और जनसंख्या घनत्व 300 लोग प्रतिकिलोमिटर हे ।
(Pron: ˈmʌʤʊlɪ)
( Assamese:মাজুলী)
आसाम राज्य के जोरहाट जिले पर ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य मेँ स्थित एक द्वीप है ! इस द्वीप का कुल आयतन कभी 1,250 square kilometres (483 sq mi) था किन्तु कुछ अनिश्चित कारणो से इसका आयतन (2001 मेँ) अब 421.65 square kilometres (163 sq mi) रहगया है . इस द्वीप के एक तरफ ब्रह्मपुत्र नदी और दुसरी तरफ को खेरकुटिया स्कुटि कहाजाता है, ब्रह्मपुत्र नदी कि एक शाखानदी यहाँ से उत्तर मे सुबनसिरि नदी मेँ जाकर मिलता है ! इस द्वीप से निकटतम सहर है जोरहाट जबकि. यह द्वीप गौवाहाटी सहर के पूर्व मेँ 200 किलोमिटर दूर पर आता हे . आसमी भाषा मेँ माजुली का अर्थ है नदी के मध्य मेँ स्थित भुमिखंड । 1661–1696 तक के कालखंड मेँ इस क्षेत्र मेँ हुए लगातार भुकंप हुआ था और ब्रह्मपुत्र नदी के इर्दगिर्द के कुछ भुमि धस्स गये थे । 1750 मेँ 15 दिनोँतक चले बाढ़ मेँ एक ऐतिहासिक घटना बना , ब्रह्मपुत्र नदी ने गतिपथ बदलकर यहाँ दो हिस्सो मेँ बँटकर प्रवाहित होनेलगी और इसतरह माजुली द्वीप प्रकाश मेँ आया । इस द्वीप के पश्चिम मेँ प्रवाहित चैनेल को Burhi Xuti और उत्तर मेँ प्रवाहित चैनेल को Luit Xuti या Kherkutia xuti कहाजाता है !. यहाँ के लोग मानते है कि श्रीकृष्ण अपने दोस्तोँ के संग यहाँ खेलते थे परंतु यह केवल दंतकथा है इसका कोई पौराणिक आधार नहीँ मिलते । माजुली मेँ वैश्णव संप्रदाय का प्रभाव रहा है और स्थानीय लोग अहमीया भाषा मेँ बात करते है । कहाजाता है कि वैश्णव धर्मप्रचारक Srimanta Sankardeva— 16वी सदी मेँ यहाँ -आये थे और कुछ काल बिताया था । उनके द्वारा माजुली मेँ अन्य हिँदु तौहारोँ के साथसाथ रास पर्व पालन कि शुरुवात हुई थी । इस क्षेत्र मेँ अहमिआ भाषा के अलावा #Mising, और #Deori भाषा वोलनेवाले लोग भी रहते है । इस द्वीप कि जनसंख्या कुल 150,000 और जनसंख्या घनत्व 300 लोग प्रतिकिलोमिटर हे ।
बुधवार, 19 नवंबर 2014
आर्पानेट से इंटरनेट तक.....
अमरिका और रसिआ के बीच चलनेवाला कोल्ड वार के कारण कई वैज्ञानिक खोज हुए । उनमे प्रमुख था इँटरनेट (पुरानाम इँटर नेटवर्क) उनदिनोँ दोनोँ देशोँ को एक दुसरे से भय व अविश्वास था । इसलिये हर प्रकार कि सुरक्षा ज्यादा से ज्यादा मजबुत करने कि प्रकिया चलता था । उस जमाने मेँ कंप्युटर की आगमन हो गया था और आमेरीकि सरकार कि संरक्षण विभाग सहित अन्य विभागोँ मेँ कंप्युटर से काम शुरु हुआ था ।
वाशिँगटन मेँ स्थित अमेरिकन संरक्षण संस्थान मेँ बैठे अमरिकन धुरंधरोँ को डर लगा कहिँ रसिया कि कोई शस्त्र पेँटागन तक पहचँजाय और महत्वपूर्ण कंप्युटरोँ का नाश हो जाय तो ? अगर ऐसा होता है तो तमाम खुफिया जानकारी,शस्रोँ ने कमान्ड देनेवाली सुविधा ,परमाणु शस्त्रोँ कि चावी आदि नष्ट होनेपर अमरिका को इससे बहुत बड़ा खामी उठानी पडेगी ।
अमेरिकन सरकार नेँ इसपर सोचविचार करते हुए कम्प्युटर नेटवर्किगं के जानेमाने इंजिनियर पोल वेरन को बुलाकर उन्हे पेन्टागन का काम सोँपा । उनके मदद के लिये वेल्श कम्प्युटर सायन्स के डोनाल्ड वेल्श और लिँकन लेवोरेटरी के विज्ञानी लोरेन्स रोवर्ट भी सामिल हुए । इन तिनोँ के नेतृत्व मेँ बने इस टुकडी का कुल 14 सदस्य थे और उन्हे ऐसे नेटवर्क कि खोज का काम सोँपा गया था जो खुफिया और सुरक्षित हो । पेन्टागन नी दुसरी खुफिया प्रोजेक्ट कि तरह यह भी एक गुप्त प्रोजेक्ट था ।
इस 14 सदस्योँ वाली गुप्त समिति का नाम "आर्पा"(Advance research project) रखागया था । इसी क्रम मेँ इन्हे पताचला कि ऐसे नेटवर्क कि खोज वोल्ट,वार्नेक और न्युमेन(B.B.N.) नामके विज्ञानीओँ ने पहले से हि कर लिया है । आर्पा के सदस्योँ ने इनके मदद से ऐसे नेटवर्किगं बनाने का काम शुरु करदिया । बाद मेँ बस एक हि काम बाकी रहगया कम्युटर्स को आपस मेँ जोडना । ये काम टेलिफोन वायर के जरिए किया गया । लिनियार्ड क्लिनोर्के की लेवोरेटरी मेँ एक दुसरे से 15 फीट दुर रखेगये दो कम्प्युटर इतिहास के साक्षी बनने के लिये तैयार थे । इसमेँ विज्ञानीओँ को सफलता मिला और इसे देखने के लिये वहाँ 20 लोक मौजुद थे । ये शुरुवात था , अब वारी थी दुर रखेगये कम्प्युटरोँ को आपस मेँ जोडने कि,
इसी क्रम मेँ केलिफोर्निया और स्टेनफोर्ड युनिवर्सीटी मेँ रखेगये कम्प्युटरोँ के बीच संपर्क स्थापना करने मेँ बड़ा सफलता हता लगा । बाद मेँ अमरिकी सरकार नेँ इस खोज कि जानकारी दि गयी और इसे आर्पा और नेटवर्क को मिलाकर आर्पानेट नाम दिया गया । बाद मेँ यही आर्पानेट दुनिया मेँ इटंरनेट के नाम से जानागया (Inter+Network)
वाशिँगटन मेँ स्थित अमेरिकन संरक्षण संस्थान मेँ बैठे अमरिकन धुरंधरोँ को डर लगा कहिँ रसिया कि कोई शस्त्र पेँटागन तक पहचँजाय और महत्वपूर्ण कंप्युटरोँ का नाश हो जाय तो ? अगर ऐसा होता है तो तमाम खुफिया जानकारी,शस्रोँ ने कमान्ड देनेवाली सुविधा ,परमाणु शस्त्रोँ कि चावी आदि नष्ट होनेपर अमरिका को इससे बहुत बड़ा खामी उठानी पडेगी ।
अमेरिकन सरकार नेँ इसपर सोचविचार करते हुए कम्प्युटर नेटवर्किगं के जानेमाने इंजिनियर पोल वेरन को बुलाकर उन्हे पेन्टागन का काम सोँपा । उनके मदद के लिये वेल्श कम्प्युटर सायन्स के डोनाल्ड वेल्श और लिँकन लेवोरेटरी के विज्ञानी लोरेन्स रोवर्ट भी सामिल हुए । इन तिनोँ के नेतृत्व मेँ बने इस टुकडी का कुल 14 सदस्य थे और उन्हे ऐसे नेटवर्क कि खोज का काम सोँपा गया था जो खुफिया और सुरक्षित हो । पेन्टागन नी दुसरी खुफिया प्रोजेक्ट कि तरह यह भी एक गुप्त प्रोजेक्ट था ।
इस 14 सदस्योँ वाली गुप्त समिति का नाम "आर्पा"(Advance research project) रखागया था । इसी क्रम मेँ इन्हे पताचला कि ऐसे नेटवर्क कि खोज वोल्ट,वार्नेक और न्युमेन(B.B.N.) नामके विज्ञानीओँ ने पहले से हि कर लिया है । आर्पा के सदस्योँ ने इनके मदद से ऐसे नेटवर्किगं बनाने का काम शुरु करदिया । बाद मेँ बस एक हि काम बाकी रहगया कम्युटर्स को आपस मेँ जोडना । ये काम टेलिफोन वायर के जरिए किया गया । लिनियार्ड क्लिनोर्के की लेवोरेटरी मेँ एक दुसरे से 15 फीट दुर रखेगये दो कम्प्युटर इतिहास के साक्षी बनने के लिये तैयार थे । इसमेँ विज्ञानीओँ को सफलता मिला और इसे देखने के लिये वहाँ 20 लोक मौजुद थे । ये शुरुवात था , अब वारी थी दुर रखेगये कम्प्युटरोँ को आपस मेँ जोडने कि,
इसी क्रम मेँ केलिफोर्निया और स्टेनफोर्ड युनिवर्सीटी मेँ रखेगये कम्प्युटरोँ के बीच संपर्क स्थापना करने मेँ बड़ा सफलता हता लगा । बाद मेँ अमरिकी सरकार नेँ इस खोज कि जानकारी दि गयी और इसे आर्पा और नेटवर्क को मिलाकर आर्पानेट नाम दिया गया । बाद मेँ यही आर्पानेट दुनिया मेँ इटंरनेट के नाम से जानागया (Inter+Network)
गाँधीजी के बाद नेहरुजी को मारने के हुए थे कई प्रयाश
आजकल भारत मेँ ऐसे युवापिढ़िओँ का उदय हुआ है जो मानता हे कि देश के प्रथम पधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु और महात्मा गान्धी ही देश विभाजन के एकमात्र जिम्मेदार है ! राजनीति के धुरन्दरो नेँ पिछले 10 वर्षोँ मेँ और खासकर पिछले 2 वर्षोँ मेँ इंटरनेट का इस्तेमाल इन्हे बदनाम करने के लिये किया और आज आलम यह है कि इनके नेता भारत मेँ बहुमत से चुनेगये और विदेश यात्राओँ मेँ व्यस्त है । इंटरनेट मेँ सर्च करते ही नेहरु व गाँधीजी के बारे मेँ कई कॉन्स्पीरसी थियरी पढ़ने को मिलजायेगा जैसे :- गाँधीजी के हत्या के पिछे नेहरुजी का हात था , सुबास चंद्र वोस जी के गायव होने के पिछे नेहरुजी का हात था , श्यामाप्रसाद मुखर्जी कि मौत नेहरु के कारण हुआ आदि !
मुझे तो डर हे किसी दिन ये लोग नेहरु व गांधीजी को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम विफल होने का जिम्मेदार न बना लेँ !
हिन्दुधर्म के नामपर राजनीति करनेवाले लोगोँ को इतिहास मेँ कोई रुचि नहीँ है वे चाहनेपर उसको तोडमरोडकर पैस कर सकते है । क्या कभी इन इंटरनेट वीरोँ ने नेहरुजी के हत्या प्रयाश के बारे मेँ कुछ लिखा या बताया ?
संभावना कम है ,पर हकिकत यह है कि गाँधीजी की हत्या करनेवाले कट्टरवादीओँ को नेहरु भी उतने हि खटक्कते थे । 1950 का दौर भारतके लिये मुश्किलोँभरा था । एक तरफ भारत मेँ लगातार शरणार्थीओँ का आना लगाहुआ था तो वहीँ सीमाविवाद, धार्मिक रक्तपात से देश रक्तरंजित हो गया था । ऐसे मेँ भारत के कुछ हिदुँ संगठनोँ ने भारत सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल लिया । हिँदु महासभा और राष्ट्रिय स्वयं सहायक संघ ने भारत को हिँदुराष्ट्र वनाने के लिये कमर कस ली । गाँधीजी को रस्ते से हटाने के बाद नेहरु उनके हट लिस्ट मेँ आ गये थे । 1950 मेँ हिँदुमहासभा के भूतपूर्व प्रमुख कि धरपकड के बाद भारत सरकार उंगली उठने लगी । तब सरदार पटेल ने संसद मेँ इसपर जबाव देते हुए कहा था कि जिन कट्टरवादीओँ नेँ गाँधीजी की हत्या कि कोशिश कि थी वे अब नेहरु को मारने के प्रयाश मे लगे हुए थे परंतु खुफिया जानकारी के कारण पोलिस नेँ इसे नाकाम करदिया । सरदारजी की मृत्यु के बाद 1953 मेँ नेहरुजी को मारने का एक और प्रयाश निष्फल हुआ । पंडित नेहरु अमृतसर एक्सप्रेस से मुँबई लौट रहे थे तब मुंबई थी लगभग 55 किलोमिटर दुर कलवन नजदिक रेल्वे ट्रेक पर बॉम लगाया गया था । परंतु पटरी पर पेट्रोलिंग करनेवाले पोलिस बल को ये बॉम दिखगया,गोलिवारी हुई और अपराधी भागखड़े हुए ।
1955 मार्च 12 मेँ नागपुर के रिक्शिचालक वावुराओ कोहली ने अपने चाकु के द्वारा नेहरु को मारने की प्रयाश हुआ । नेहरु के सहायक रहचुके "एम .ओ. मथाई"जी नेँ MY DAYS WITH NEHRU मेँ लिखा है कि कोहली एक प्रकार को पोल्टिकाल थिँकर थे . वे दृढ़तापूर्वक मानते थे कि कंग्रेस कि सरकार वहुमत से राज कर रहा है और इसमेँ उसकि कोई बाहदुरी नहीँ । कोहली कि धरपकड के बाद उसे अदालती कारवाई मेँ जुलाई 28 1955 के रोज प्रधानमंत्री के हत्या प्रयास के लिये आइ.पि.सी धारा 307 के अंतर्गत छ वर्ष कि सजा ए कैद मिला था ।
आज भारत पर संघपरिवार का राज है । हिँदु कट्टरवादीओँ का एक पुरा का पुरा फौज फेसबुक व ब्लॉगिगं के दुनिया मेँ मनगढ़न कहानी परोस रहा है । ऐसे मेँ साधारण पाठक को चाहिये कि वो इंटरनेट मेँ लिखगये लेखोँ को आँख बंदकरके यकिन न करेँ वरना एक दिन आयेगा जब हमारे समाज व देश मेँ कट्टरवादीओँ का राज होजायेगा और साधरण जनता को अन्याय सहन करना होगा ।
मुझे तो डर हे किसी दिन ये लोग नेहरु व गांधीजी को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम विफल होने का जिम्मेदार न बना लेँ !
हिन्दुधर्म के नामपर राजनीति करनेवाले लोगोँ को इतिहास मेँ कोई रुचि नहीँ है वे चाहनेपर उसको तोडमरोडकर पैस कर सकते है । क्या कभी इन इंटरनेट वीरोँ ने नेहरुजी के हत्या प्रयाश के बारे मेँ कुछ लिखा या बताया ?
संभावना कम है ,पर हकिकत यह है कि गाँधीजी की हत्या करनेवाले कट्टरवादीओँ को नेहरु भी उतने हि खटक्कते थे । 1950 का दौर भारतके लिये मुश्किलोँभरा था । एक तरफ भारत मेँ लगातार शरणार्थीओँ का आना लगाहुआ था तो वहीँ सीमाविवाद, धार्मिक रक्तपात से देश रक्तरंजित हो गया था । ऐसे मेँ भारत के कुछ हिदुँ संगठनोँ ने भारत सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल लिया । हिँदु महासभा और राष्ट्रिय स्वयं सहायक संघ ने भारत को हिँदुराष्ट्र वनाने के लिये कमर कस ली । गाँधीजी को रस्ते से हटाने के बाद नेहरु उनके हट लिस्ट मेँ आ गये थे । 1950 मेँ हिँदुमहासभा के भूतपूर्व प्रमुख कि धरपकड के बाद भारत सरकार उंगली उठने लगी । तब सरदार पटेल ने संसद मेँ इसपर जबाव देते हुए कहा था कि जिन कट्टरवादीओँ नेँ गाँधीजी की हत्या कि कोशिश कि थी वे अब नेहरु को मारने के प्रयाश मे लगे हुए थे परंतु खुफिया जानकारी के कारण पोलिस नेँ इसे नाकाम करदिया । सरदारजी की मृत्यु के बाद 1953 मेँ नेहरुजी को मारने का एक और प्रयाश निष्फल हुआ । पंडित नेहरु अमृतसर एक्सप्रेस से मुँबई लौट रहे थे तब मुंबई थी लगभग 55 किलोमिटर दुर कलवन नजदिक रेल्वे ट्रेक पर बॉम लगाया गया था । परंतु पटरी पर पेट्रोलिंग करनेवाले पोलिस बल को ये बॉम दिखगया,गोलिवारी हुई और अपराधी भागखड़े हुए ।
1955 मार्च 12 मेँ नागपुर के रिक्शिचालक वावुराओ कोहली ने अपने चाकु के द्वारा नेहरु को मारने की प्रयाश हुआ । नेहरु के सहायक रहचुके "एम .ओ. मथाई"जी नेँ MY DAYS WITH NEHRU मेँ लिखा है कि कोहली एक प्रकार को पोल्टिकाल थिँकर थे . वे दृढ़तापूर्वक मानते थे कि कंग्रेस कि सरकार वहुमत से राज कर रहा है और इसमेँ उसकि कोई बाहदुरी नहीँ । कोहली कि धरपकड के बाद उसे अदालती कारवाई मेँ जुलाई 28 1955 के रोज प्रधानमंत्री के हत्या प्रयास के लिये आइ.पि.सी धारा 307 के अंतर्गत छ वर्ष कि सजा ए कैद मिला था ।
आज भारत पर संघपरिवार का राज है । हिँदु कट्टरवादीओँ का एक पुरा का पुरा फौज फेसबुक व ब्लॉगिगं के दुनिया मेँ मनगढ़न कहानी परोस रहा है । ऐसे मेँ साधारण पाठक को चाहिये कि वो इंटरनेट मेँ लिखगये लेखोँ को आँख बंदकरके यकिन न करेँ वरना एक दिन आयेगा जब हमारे समाज व देश मेँ कट्टरवादीओँ का राज होजायेगा और साधरण जनता को अन्याय सहन करना होगा ।
गुरुवार, 13 नवंबर 2014
अंत मेँ जीत सत्य और न्याय कि होती है
भारत पर हमलाकरनेवाले जातिओँ मेँ ज्यादातर या तो लुप्त हो गया दुर्वल होकर विखर गये ।
सबसे पहला उदाहरण ग्रीक् है
आज कहनेभर को ग्रीस और उसकी संस्कृति जीवित है ।
ज्यादातर ग्रीसवासी अब रोमान कैथोलिक है और ख्रीस्ट धर्म के अनुयायी रहगये हे ।
हुण ,कुशाण और सातवाहन भारतीय बनकर यहीँ के हो गये ।
फिर आये तुर्क इनका एक बडा तवक्का आज भी दुनिया मेँ अपने धाक जमाने के चक्कर मेँ लगा हुआ है जबकि तुर्कलोगोँ का देश तुर्कि इन सब लफडोँ से दुर चैन ओ अमन कि बात करता है । तो इनमेँ आपसी मतभेद हे और ये कुछ दिनोँतक ऐसे ही लढ़ते रहेगेँ ।
भारत मेँ मंगोल और मोगलोँ नेँ भी हमाला किया और अपने अपने परंपरा और संस्कृति को भारत मेँ छोडगये ।
मोगलोँ नेँ भारत मेँ ही अपना अंतिम शाँस लिया और आज इनके वारिस खुद को बादशाह और साहिव आदि कहकर घुमते फिरते मिलजाते है ।
17वीं शताब्दी के मध्यकाल में पुर्तगाल, डच, फ्रांस, ब्रिटेनसहित अनेकों युरोपीय देशों, जो कि भारत से व्यापार करने के इच्छुक थे, उन्होनें देश में स्थापित शासित प्रदेश, जो कि आपस में युद्ध करने में व्यस्त थे, का लाभ प्राप्त किया । अंग्रेज दुसरे देशों से व्यापार के इच्छुक लोगों को रोकने में सफल रहे और 1840 ई तक लगभग संपूर्ण देश पर शासन करने में सफल हुए । परंतु इन हारामखोर अंग्रेजोँ कि दुर्दशा देखिये ,,व्रिटेन तथा दुसरे युरोपीय देशोँ के लोगोँ से बना कॉकटेल कलचराल कंट्री ("cultural Cocktail country america" ) :-D :-D :-D
अमरिका नेँ अंग्रेज व अन्य युरोपीय देशोँ को न्युवर्लड से खदेड कर ही दमलिया । अब भारत व दुसरे एसिआन और अफ्रिकी देशोँ मेँ इनको मार भगाया । भारत मेँ तो 1945 के बाद के हालात से डर कर अंग्रेज भाग खडे हुए । आज अंग्रेज और अंग्रेजी जिँदा तो है पर अंग्रेज अपने छोटे से देश मेँ और अंग्रेजी अपनी औकात मेँ रहकर छटपटा रहे है बस । कभी सूर्यास्त न होनेवाला साम्राज्य अब अपने ही देश मेँ अलगाव का वोझ लेते फिरता है । भारत पर बुरे आँख रखनेवाले काल के आगे बरबाद हो गये उन्हे होना ही था । क्युँकि आखरी मेँ जीत सत्य व न्याय कि होती है ।
सबसे पहला उदाहरण ग्रीक् है
आज कहनेभर को ग्रीस और उसकी संस्कृति जीवित है ।
ज्यादातर ग्रीसवासी अब रोमान कैथोलिक है और ख्रीस्ट धर्म के अनुयायी रहगये हे ।
हुण ,कुशाण और सातवाहन भारतीय बनकर यहीँ के हो गये ।
फिर आये तुर्क इनका एक बडा तवक्का आज भी दुनिया मेँ अपने धाक जमाने के चक्कर मेँ लगा हुआ है जबकि तुर्कलोगोँ का देश तुर्कि इन सब लफडोँ से दुर चैन ओ अमन कि बात करता है । तो इनमेँ आपसी मतभेद हे और ये कुछ दिनोँतक ऐसे ही लढ़ते रहेगेँ ।
भारत मेँ मंगोल और मोगलोँ नेँ भी हमाला किया और अपने अपने परंपरा और संस्कृति को भारत मेँ छोडगये ।
मोगलोँ नेँ भारत मेँ ही अपना अंतिम शाँस लिया और आज इनके वारिस खुद को बादशाह और साहिव आदि कहकर घुमते फिरते मिलजाते है ।
17वीं शताब्दी के मध्यकाल में पुर्तगाल, डच, फ्रांस, ब्रिटेनसहित अनेकों युरोपीय देशों, जो कि भारत से व्यापार करने के इच्छुक थे, उन्होनें देश में स्थापित शासित प्रदेश, जो कि आपस में युद्ध करने में व्यस्त थे, का लाभ प्राप्त किया । अंग्रेज दुसरे देशों से व्यापार के इच्छुक लोगों को रोकने में सफल रहे और 1840 ई तक लगभग संपूर्ण देश पर शासन करने में सफल हुए । परंतु इन हारामखोर अंग्रेजोँ कि दुर्दशा देखिये ,,व्रिटेन तथा दुसरे युरोपीय देशोँ के लोगोँ से बना कॉकटेल कलचराल कंट्री ("cultural Cocktail country america" ) :-D :-D :-D
अमरिका नेँ अंग्रेज व अन्य युरोपीय देशोँ को न्युवर्लड से खदेड कर ही दमलिया । अब भारत व दुसरे एसिआन और अफ्रिकी देशोँ मेँ इनको मार भगाया । भारत मेँ तो 1945 के बाद के हालात से डर कर अंग्रेज भाग खडे हुए । आज अंग्रेज और अंग्रेजी जिँदा तो है पर अंग्रेज अपने छोटे से देश मेँ और अंग्रेजी अपनी औकात मेँ रहकर छटपटा रहे है बस । कभी सूर्यास्त न होनेवाला साम्राज्य अब अपने ही देश मेँ अलगाव का वोझ लेते फिरता है । भारत पर बुरे आँख रखनेवाले काल के आगे बरबाद हो गये उन्हे होना ही था । क्युँकि आखरी मेँ जीत सत्य व न्याय कि होती है ।
कश्यपनारद जन्मकथा
हरिवंशपुराण मेँ नारदजी की उत्पत्तिकथा वर्णित है । उस कथा का सारांश यह है कि सृष्टि के आरम्भ मेँ ब्रह्माजी के सात मानस पुत्रोँ मेँ एक देवर्षि नारद थे , जो बडे भगवद भक्त थे । जिस समय आदि प्रजापति दक्ष ने मैथुनी सृष्टि रची और वीरणा नामक प्रजापति की आसिक्री नामी कन्याके गर्भ से पाँच सहस्र पुत्र, जो हर्यश्व कहलाते है , उत्पन्न किये एवं उनको सृष्टि बढ़ाने की आज्ञा दी , उस समय उन हर्यश्वोँ को देवर्षि नारद ने गर्भवास के दुःखोँ का वर्णन करते हुए सृष्टि कि बृद्धि होने से रोक दिया । फिर दक्षप्रजापति नेँ सवलाक्षोँ को सृष्टि कर इस कार्य के लिये प्रेरित किया । परंतु इन्हे भी देवर्षि नारद द्वारा परमाधाम की ज्ञानपोदेश प्राप्त हुआ और वे सभी परमगति प्राप्त हो गये । तब दक्षप्रजापति क्रोधित हो गये और नारदजी को श्राप दे दिया कि वे तत् क्षणात् भश्म हो जाय । नारदजी ने उन्हे अज मुख लाभ का श्राप देकर अभिशाप के आग मेँ जलगये ।
अब देवलोक मेँ हलचल मचगयी च्युँकि नारदजी के बिना देवोँ के प्राथना पर परमपिता ब्रह्मा नेँ दक्षप्रजापति को समझाते हुए कहा "हे प्रजापते ! आप नारद को जीवित किजिये । क्युँकि बिना नारद के सृष्टि का काम नहीँ चल सकता ।'
इसपर दक्षप्रजापतिने कहा-- नारद भश्म हुए शरीर से तो जी नहीँ सकता ,क्युँकि हमारा श्राप अन्यथा नहीँ होगा ,परंत्नु हम आपकी आज्ञा का उलंघन भी नहीँ कर सकता ! अतएब इस विषय पर दुसरे उपाय करता हुँ । यह कहकर दक्षप्रजापति नेँ अपनी एक कन्या ब्रह्माजी को दी और कि इसीके गर्भ से नारद का जन्म होगा । ब्रह्माजी नेँ उस कन्या को कश्यप को दे दिया । उसी कन्या के गर्भ से नारद का जन्म हुआ व वे आगे चलकर कश्यपनारद के नाम से जानेगये । कश्यप नारद कि यह कथा नारद पुराण मेँ नारद जी को ब्रह्माजी के मुख से सुनाया गया है ।
आभार :- गीताप्रेस गोरखपुर
अब देवलोक मेँ हलचल मचगयी च्युँकि नारदजी के बिना देवोँ के प्राथना पर परमपिता ब्रह्मा नेँ दक्षप्रजापति को समझाते हुए कहा "हे प्रजापते ! आप नारद को जीवित किजिये । क्युँकि बिना नारद के सृष्टि का काम नहीँ चल सकता ।'
इसपर दक्षप्रजापतिने कहा-- नारद भश्म हुए शरीर से तो जी नहीँ सकता ,क्युँकि हमारा श्राप अन्यथा नहीँ होगा ,परंत्नु हम आपकी आज्ञा का उलंघन भी नहीँ कर सकता ! अतएब इस विषय पर दुसरे उपाय करता हुँ । यह कहकर दक्षप्रजापति नेँ अपनी एक कन्या ब्रह्माजी को दी और कि इसीके गर्भ से नारद का जन्म होगा । ब्रह्माजी नेँ उस कन्या को कश्यप को दे दिया । उसी कन्या के गर्भ से नारद का जन्म हुआ व वे आगे चलकर कश्यपनारद के नाम से जानेगये । कश्यप नारद कि यह कथा नारद पुराण मेँ नारद जी को ब्रह्माजी के मुख से सुनाया गया है ।
आभार :- गीताप्रेस गोरखपुर
रविवार, 9 नवंबर 2014
युरोपिआन पाइन मार्टेन
युरोपिआन पाइन मार्टेन [TheEuropeanpine marten]
या "Martes martes" को युरोप के कुछ क्षेत्रोँ मेँ "थेपाइन मार्टेनिन" , "अस्पाइनेन्टेन", बाउम मार्टेन और स्विट मार्टेन भी कहा जाता है . यह प्राणी मुलतः युरोय और तुर्की तथा रसिया के कुछ हिस्सोँ मेँ पाया जाता है । अमरिका और न्युफाउलैँड मेँ भी पाइन मार्टेन देखेजाते हे और स्तानिय नाम के साथ इनका साधारण नामकरण किया जाता है जैसे अमेरिकन पाइन मार्टिन , न्युफाउलैँड पाइन मार्टेन आदि । यह प्राणी एक तरह का नेवला है और ये चुहोँ कि तरह दिखते है जबकी इनकी आकार बिल्लीओँ सा होता है । युरोपियन पाइन मार्टेन की शरीरिक लंबाई 53 सेमी (21) तक हो सकता हे और जंगली पूंछ 25 सेमी (10 में) होता है. पुरुष पाइन मार्टेन मादाओँ की तुलना में थोड़ा बड़ा कदकाठि के होते हे; औसत पर एक नेवला लगभग 1.5 किलोग्राम (3.3 पौंड) वजन का होता है. उनकी खाल गहरे भूरे रंग का होता हे और सर्दियों के महीनों के दौरान उनका लोम बढ़जाता हे । यह प्राणी आमतौर पर घने जंगलोँ मेँ निवाश करता है . यूरोपीय पाइन मार्टेन खोखले पेड़ों या उँचे वृक्षोँ पर अपनी मांद बनाते हैं. वे जमीन पर अपेक्षाकृत जल्दी से दौड़ते हैं, हालांकि ऐसे चढ़ाई या पेड़ की शाखाओं पर चलाने के रूप में अधिक वृक्षवासी जीवन शैली, नेतृत्व करने के लिए उन्हें सक्षम बनाता है । वे रात और गोधूलि बेला में मुख्य रूप से सक्रिय होते है । उनके छोटे स्तनधारी, पक्षी, कीड़े, मेंढ़क, और सड़ा खाने के लिए छोटे गोल, अत्यधिक संवेदनशील कान और तेज दाँत है तथा वे जामुन, पक्षी के अंडे, मांस, नट और शहद खाने के लिए जाने जाते हैं । यूरोपीय पाइन मार्टेन मल जमा करके अपनी सीमा को चिह्नित करता है और इसे Scat कहाजाता है । यूरोपीय पाइन मार्टेन पालतु होने पर 18 साल तक जीँई सकता हे लेकिन जंगल में आठ से दस साल ही जीवित रहपाता है । वे उम्र के दो या तीन साल में यौन परिपक्वता लाभ कर लेते है । पाइन मार्टेन का शिकार ज्यादातर लाल लोमड़िया और इगल के द्वारा होता हे वहीँ मनुष्य Martens पाइन के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं. वे मनुष्यों के साथ जीवनसंघर्ष मेँ कमजोर पड रहे हैं । अन्य प्रजातियों के लिए शिकारी नियंत्रण से उत्पन्न होने वाली, या पशुओं के शिकार और Denning के लिए बसे हुए इमारतों के उपयोग के बाद. Martens भी वुडलैंड नुकसान से प्रभावित हो सकता है । अवैध विषाक्तता और शूटिंग से, निवास स्थान के नुकसान , मानव द्वारा अप्राकृतिक विकास आदि कारणो से पाइन नेवला जनसंख्या में काफी गिरावट आया है . उन्हो उनके वेस किमती फर के लिये माराजाता है । यूनाइटेड किंगडम में, 1981and पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1990 के तहत यूरोपीय पाइन Martens और वन्यजीवोँ पूरी सुरक्षा देने की पेशकश कर रहे हैं । वहीँ अमरिकन देशोँ मेँ हाल ही मेँ कडे कानुन व्यवस्था और लोकजागृति से इनके आवादी मेँ आ रहे गिरावट को रोकने मेँ सफलता हात लगा है ।
या "Martes martes" को युरोप के कुछ क्षेत्रोँ मेँ "थेपाइन मार्टेनिन" , "अस्पाइनेन्टेन", बाउम मार्टेन और स्विट मार्टेन भी कहा जाता है . यह प्राणी मुलतः युरोय और तुर्की तथा रसिया के कुछ हिस्सोँ मेँ पाया जाता है । अमरिका और न्युफाउलैँड मेँ भी पाइन मार्टेन देखेजाते हे और स्तानिय नाम के साथ इनका साधारण नामकरण किया जाता है जैसे अमेरिकन पाइन मार्टिन , न्युफाउलैँड पाइन मार्टेन आदि । यह प्राणी एक तरह का नेवला है और ये चुहोँ कि तरह दिखते है जबकी इनकी आकार बिल्लीओँ सा होता है । युरोपियन पाइन मार्टेन की शरीरिक लंबाई 53 सेमी (21) तक हो सकता हे और जंगली पूंछ 25 सेमी (10 में) होता है. पुरुष पाइन मार्टेन मादाओँ की तुलना में थोड़ा बड़ा कदकाठि के होते हे; औसत पर एक नेवला लगभग 1.5 किलोग्राम (3.3 पौंड) वजन का होता है. उनकी खाल गहरे भूरे रंग का होता हे और सर्दियों के महीनों के दौरान उनका लोम बढ़जाता हे । यह प्राणी आमतौर पर घने जंगलोँ मेँ निवाश करता है . यूरोपीय पाइन मार्टेन खोखले पेड़ों या उँचे वृक्षोँ पर अपनी मांद बनाते हैं. वे जमीन पर अपेक्षाकृत जल्दी से दौड़ते हैं, हालांकि ऐसे चढ़ाई या पेड़ की शाखाओं पर चलाने के रूप में अधिक वृक्षवासी जीवन शैली, नेतृत्व करने के लिए उन्हें सक्षम बनाता है । वे रात और गोधूलि बेला में मुख्य रूप से सक्रिय होते है । उनके छोटे स्तनधारी, पक्षी, कीड़े, मेंढ़क, और सड़ा खाने के लिए छोटे गोल, अत्यधिक संवेदनशील कान और तेज दाँत है तथा वे जामुन, पक्षी के अंडे, मांस, नट और शहद खाने के लिए जाने जाते हैं । यूरोपीय पाइन मार्टेन मल जमा करके अपनी सीमा को चिह्नित करता है और इसे Scat कहाजाता है । यूरोपीय पाइन मार्टेन पालतु होने पर 18 साल तक जीँई सकता हे लेकिन जंगल में आठ से दस साल ही जीवित रहपाता है । वे उम्र के दो या तीन साल में यौन परिपक्वता लाभ कर लेते है । पाइन मार्टेन का शिकार ज्यादातर लाल लोमड़िया और इगल के द्वारा होता हे वहीँ मनुष्य Martens पाइन के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं. वे मनुष्यों के साथ जीवनसंघर्ष मेँ कमजोर पड रहे हैं । अन्य प्रजातियों के लिए शिकारी नियंत्रण से उत्पन्न होने वाली, या पशुओं के शिकार और Denning के लिए बसे हुए इमारतों के उपयोग के बाद. Martens भी वुडलैंड नुकसान से प्रभावित हो सकता है । अवैध विषाक्तता और शूटिंग से, निवास स्थान के नुकसान , मानव द्वारा अप्राकृतिक विकास आदि कारणो से पाइन नेवला जनसंख्या में काफी गिरावट आया है . उन्हो उनके वेस किमती फर के लिये माराजाता है । यूनाइटेड किंगडम में, 1981and पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1990 के तहत यूरोपीय पाइन Martens और वन्यजीवोँ पूरी सुरक्षा देने की पेशकश कर रहे हैं । वहीँ अमरिकन देशोँ मेँ हाल ही मेँ कडे कानुन व्यवस्था और लोकजागृति से इनके आवादी मेँ आ रहे गिरावट को रोकने मेँ सफलता हात लगा है ।
सोमवार, 13 अक्टूबर 2014
तु क्युँ सेकुलार बना फिरता है ? हर सेकुलार एक दिन भुला दिआ जाता है !!
जम्मु कश्मीर ! नजाने किस मनहुस घडी मेँ भारत मेँ बिलय हुआ था जिसका सजा आज भी भारत भुगत रहा है ! मेँ उन सेकुलार किडोँ को अपने इस लेख द्वारा पुछना चाहुँगा की आप लोगोँ को वावरी कांड तो याद है पर आजादी मेँ तोफे मेँ मिला लाशोँ से भरा ट्रेन क्युँ याद नहीँ, वो 10 लाख औरतोँ का वलात्कार याद नहीँ और हिन्दु पंडितोँ पर हुआ अत्याचार क्युँ याद नहीँ आता ! क्या इस देश मेँ सहन करने का ठेका सिर्फ हिन्दुओँ नेँ ले रखा है ? और मुस्लीम क्युँ की अल्प संख्यक (21 करोड हो कर भी अल्पसंख्यक ?) हर सच्चा हिन्दोस्तानी मुसलमान कीतने इमानदार है ये अछी तरह जानता है । गुरु गोविंद सिंह जी को भी ऐन मौके पर पठान सैनिकोँ नेँ धोका दे कर गद्दार जय सिँह के साथ हो लिये थे । जिन्ना जिसे पाकिस्तानी "कायदे आजम" कहते फिरते सबसे बड़ा धोकेवाज निकला ।और आज अगर भारत मेँ हिन्दुँ मुसलमान आपस मेँ लढ मर रहे है इसका सिर्फ एक ही व्यक्ति जिम्मेदार है और वो है ये जिन्ना । 20वीँ सदी मेँ कौमी हिँसा फैलाने वाले माष्टर माईन्ड कोई और नहीँ यही जिन्ना थे । भारत मेँ हिन्दु वहुमत है इसलिये सेकुलार है नहीँ तो कब का मुस्लीम राष्ट्र बन चुका होता । तो ये सेकुलार और निरपेक्ष होने के ढ़ोगँ छोडो क्युँ की गीता मेँ भगवान श्रीकृष्ण नेँ भी कहा है इस दुनिया मेँ कोई निरपेक्ष नहीँ है । मेँ भी सदा धर्म के पक्ष मेँ रहता हुँ क्युँ की जहाँ धर्म वहाँ सत्य । इसलिये हे अर्जुन तुम धर्म मेँ स्थित हो कर धर्म युद्ध करो मेँ सदा तुम्हारे साथ रहुगां ।। जय हिन्दु जय हिन्दुस्तान ।।
दादामुनि कि पहली फिल्म जीवन नैया से जुड़ी कुछ यादेँ.....
दादामुनि के नाम से जानेजानेवाले अशोककुमार जी का पहला फिल्म था "जीवन नैया" ! फिल्म तो रिलिज हो गयी पर इस से उनके जीवन मेँ बहुत बड़ा भुचाल आ गया । उन दिनोँ उनका रिस्ता भागलपुर मेँ बहुत बड़े घराने मेँ होने जा रहा था । लेकिन इस फिल्म को देखने के बाद लड़कीवालोँ ने यह कहकर रिस्ता ठुकरा दिया कि "हम नौटकीँ मेँ काम करनेवाले भाण्डो से अपनी बेटी का रिस्ता नहीँ होने देगेँ ।
इधर अशोककुमार जी के पिता भी वौखलाये हुए थे उन्हे समझाबुझाकर फिल्म दिखाया गया तो वो और भड़कगये । उन्होने पुछा ये क्या तुम पराई औरत (देविकारानी) के साथ नाच गा रहे हो ?
दादामुनी नेँ कहा कि ये सब नाटक है और यह औरत पहले से शादीशुदा है(बिमल रोय से) ।
उनके पिता काफि नाराज हुए और दादामुनि अशोक कुमार चुप रहे ।
उनका अगला फिल्म था अछुत कन्या ! इसमेँ कुछ रोमान्टिक सिन्स सुट होनेवाला था पर अशोक कुमार नेँ इसे सुट करने से मनाकरदिया बाद मेँ उन्हे समझाबुझाकर फिल्म सुट किया गया । अछुत कन्या से अशोक कुमार मशहुर हुए और बाद मेँ उनका रिस्ता एक बहुत घराने मेँ तय किया गया ।
इधर अशोककुमार जी के पिता भी वौखलाये हुए थे उन्हे समझाबुझाकर फिल्म दिखाया गया तो वो और भड़कगये । उन्होने पुछा ये क्या तुम पराई औरत (देविकारानी) के साथ नाच गा रहे हो ?
दादामुनी नेँ कहा कि ये सब नाटक है और यह औरत पहले से शादीशुदा है(बिमल रोय से) ।
उनके पिता काफि नाराज हुए और दादामुनि अशोक कुमार चुप रहे ।
उनका अगला फिल्म था अछुत कन्या ! इसमेँ कुछ रोमान्टिक सिन्स सुट होनेवाला था पर अशोक कुमार नेँ इसे सुट करने से मनाकरदिया बाद मेँ उन्हे समझाबुझाकर फिल्म सुट किया गया । अछुत कन्या से अशोक कुमार मशहुर हुए और बाद मेँ उनका रिस्ता एक बहुत घराने मेँ तय किया गया ।
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